नई दिल्ली |जम्मू-कश्मीर के बडगाम जिले के ब्रिल गांव में बुधवार को एक दर्दनाक हादसा हुआ, जब सीमा सुरक्षा बल (BSF) की एक बस गहरी खाई में गिर गई। इस बस में 36 जवान सवार थे, जिनमें से 27 जवान घायल हो गए हैं और दो की मौके पर ही मौत हो गई। गंभीर रूप से घायल जवानों को तुरंत नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उनका इलाज जारी है।
हादसे की जानकारी मिलते ही स्थानीय प्रशासन और बचाव दल मौके पर पहुंचा और घायलों को निकालने का कार्य शुरू किया। अधिकारियों के अनुसार, बस अचानक संतुलन खो बैठी और गहरी खाई में जा गिरी। हादसे के कारणों का पता लगाया जा रहा है, लेकिन माना जा रहा है कि खराब मौसम या सड़क की स्थिति के चलते यह दुर्घटना हुई हो सकती है।
यह हादसा उस वक्त हुआ है जब मंगलवार रात जम्मू-कश्मीर के राजौरी जिले में सेना का एक वाहन भी खाई में गिर गया था। मंजाकोट इलाके में हुए इस हादसे में चार जवान घायल हो गए थे, जिनमें से लांसनायक बलजीत सिंह ने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। राजौरी हादसे में स्थानीय ग्रामीणों और बचावकर्मियों ने तेजी से प्रतिक्रिया दी थी और घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया था, लेकिन बलजीत सिंह की जान नहीं बचाई जा सकी।
इन दोनों घटनाओं ने एक बार फिर से सुरक्षाबलों की कठिन परिस्थितियों को उजागर किया है, जहां दुर्गम इलाके और खतरनाक रास्तों पर उन्हें अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना पड़ता है। सरकार ने घटना की जांच के आदेश दे दिए हैं और सभी घायल जवानों के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की प्रार्थना की है।
नई दिल्ली | गुरुवार, 19 सितंबर 2024 को वफ्फ संशोधन बिल पर संयुक्त संसदीय समिति की 5वीं बैठक में हंगामेदार स्थिति देखने को मिली। एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने इस बैठक में गृह मंत्री अमित शाह के वक्फ से जुड़े बयान पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि जब मामला संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) में है, तो गृह मंत्री को बाहर इस विषय पर टिप्पणी करने का अधिकार नहीं है।
संजय सिंह ने बैठक में स्पष्ट किया कि क्या गृह मंत्री इस प्रकार के बयान देकर संसदीय समिति पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में जब जेपीसी का गठन हो चुका है, सरकार को सार्वजनिक बयान देने से बचना चाहिए।
अमित शाह ने क्या कहा था?
गृह मंत्री अमित शाह ने वक्फ संशोधन बिल के संबंध में यह कहा था कि यह बिल वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में सुधार लाएगा और वक्फ ट्रस्टों को अधिक पारदर्शिता और जवाबदेही प्रदान करेगा। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि इस बिल के माध्यम से वक्फ संपत्तियों के बेहतर उपयोग के लिए नीतिगत सुधार किए जाएंगे। उनके बयान का उद्देश्य यह बताना था कि यह संशोधन समाज के विभिन्न वर्गों के हित में है।
हालांकि, इस बयान पर संजय सिंह और असदुद्दीन ओवैसी ने सवाल उठाए, यह कहते हुए कि जब मामला जेपीसी में है, तो ऐसे बयानों की आवश्यकता नहीं थी।
इस बीच, पटना की चाणक्य लॉ यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर फैजान मुस्तफा ने बैठक में वक्फ बाय यूजर और वक्फ ट्रिब्यूनल का समर्थन किया। उन्होंने चेतावनी दी कि जिला प्रशासन (डीएम) को सभी अधिकार देना सही नहीं होगा, और केंद्र सरकार से अपील की कि वक्फ संशोधन में सावधानी बरती जाए। मुस्तफा ने जोर देकर कहा कि संशोधन उन बिंदुओं पर होना चाहिए जिन पर सभी की सहमति हो।
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी बैठक में भाग लिया और 200 पृष्ठों की एक रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें वक्फ बिल में संशोधन के खिलाफ विस्तृत बिंदु दिए गए हैं। बोर्ड के अध्यक्ष मौलाना सैफुल्लाह रहमानी और अन्य सदस्यों ने अपने विचार साझा किए, और इस मुद्दे पर एक संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल दिया।
इस बैठक ने स्पष्ट किया कि वक्फ संशोधन बिल पर विचार-विमर्श अभी जारी है, और सभी पक्षों के विचारों को सुनना आवश्यक है।
नई दिल्ली |चीन में कुछ प्रमुख व्यक्ति अचानक गायब हो जाते हैं, और ये घटनाएँ अक्सर भ्रष्टाचार की जांच से जुड़ी होती हैं। बाओ फ़ान जैसे बैंकरों से लेकर चिन गांग, हू जिंताओ, और जैक मा जैसे प्रभावशाली लोगों तक, ये गुमशुदगी का एक समान पैटर्न दिखाती हैं।
चीन का वन पार्टी सिस्टम, जहां चाइनीज़ कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) का एकाधिकार है, इस प्रकार की घटनाओं को बढ़ावा देता है। जब किसी व्यक्ति का रुतबा बढ़ता है या वह सत्ता के लिए खतरा बनता है, तो उन्हें अक्सर निशाना बनाया जाता है। यह स्थिति माओ ज़ेदोंग के समय से चली आ रही है, जब पार्टी ने आलोचना करने वाले व्यक्तियों को ठिकाने लगाने का काम किया था।
चिन गांग, पूर्व विदेश मंत्री, और हू जिंताओ, पूर्व राष्ट्रपति, जैसे उच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों का अचानक लापता होना दर्शाता है कि सरकार अपने भीतर के किसी भी संभावित खतरे को कैसे नकारती है। इसी तरह, जैक मा की कहानी भी इस प्रवृत्ति को दिखाती है। अलीबाबा के संस्थापक के रूप में उनकी सफलता ने उन्हें सार्वजनिक जीवन में एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाया, लेकिन जब उन्होंने चीनी बैंकों की आलोचना की, तो सरकार ने उन्हें निशाना बनाया।
उदाहरण के लिए, जैक मा, अलीबाबा के संस्थापक, भी इसी प्रकार की परिस्थितियों का सामना कर चुके हैं। जब उन्होंने चीनी बैंकों की आलोचना की, तो उनके खिलाफ सरकार ने कार्रवाई की, और वे 2020 के बाद से सार्वजनिक जीवन से गायब हो गए। इसी प्रकार, जाओ वेई, एक प्रसिद्ध अभिनेत्री, पर भी पश्चिमी जीवनशैली फैलाने का आरोप लगा था और वह भी कुछ समय के लिए गुम हो गई थीं।
बाओ फान : एक विशेष उदाहरण
बाओ फ़ान, 53 वर्ष के बैंकर, ने 2005 में चाइना रेनेसां की स्थापना की और जल्द ही ब्लूमबर्ग की 50 सबसे प्रभावशाली लोगों की सूची में शामिल हो गए। उनकी सफलता की कहानी अचानक ही एक रहस्य में बदल गई जब फरवरी 2023 से उनका कोई अता-पता नहीं है। बताया गया कि उनसे भ्रष्टाचार के मामलों में पूछताछ चल रही है। उनकी संपत्ति, जो 2021 में 6,500 करोड़ रुपये से अधिक थी, अब घटकर केवल 400 करोड़ रुपये रह गई है। यह गिरावट केवल उनकी व्यक्तिगत कहानी नहीं है, बल्कि चीन में उच्च-profile व्यक्तियों के अचानक गायब होने के व्यापक पैटर्न का हिस्सा है।
बाओ के जैसे कई अन्य प्रमुख व्यक्ति भी इसी प्रकार की परिस्थितियों का सामना कर चुके हैं। चीन के पूर्व विदेश मंत्री चिन गांग और पूर्व राष्ट्रपति हू जिंताओ से लेकर उद्योगपति गुओ गुआंगचांग तक, सभी अचानक गायब हो गए हैं। इन गायबियों का एक सामान्य पैटर्न है: पहले उनकी बीमारी का हवाला दिया जाता है, फिर उनके खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच की बातें होती हैं।
चीन में वन पार्टी सिस्टम के कारण, जहां चाइनीज़ कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) की निरंतरता है, यह प्रवृत्ति कोई नई नहीं है। माओ ज़ेदोंग के समय से इस तरह के “शुद्धिकरण अभियान” चलाए जाते रहे हैं, जिसमें संभावित विरोधियों को टारगेट किया जाता था। बाओ फ़ान की गुमशुदगी इसी सन्दर्भ में देखी जा सकती है, जहां सत्ता के साथ-साथ ऑप्टिक्स को भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
बाओ फ़ान का मामला विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करता है, क्योंकि उनकी कंपनी ने कई पुरस्कार जीते और उनकी स्थिति बुलंद थी। लेकिन जैसे ही उनके खिलाफ जांच शुरू हुई, उनकी कंपनी की कीमत आधी हो गई। हाल में एक रिपोर्ट में यह सामने आया है कि ग़ायब होने के बाद सरकारी अधिकारियों ने उनकी कंपनी को 92 करोड़ रुपये ट्रांसफ़र करने के लिए कहा। यह तथ्य यह सवाल उठाता है कि बाओ की गुमशुदगी के पीछे क्या और कौन है।
बाओ फ़ान की कहानी एक सतर्कता का संदेश देती है कि कैसे सत्ता और राजनीति के खेल में एक व्यक्ति की पहचान, उसकी मेहनत और सफलता भी एक पल में धूमिल हो सकती है। इस तरह के मामलों से यह साफ़ होता है कि चीन की राजनीति में किस तरह से ताकतवर लोग, जिनका रुतबा बहुत ऊंचा होता है, भी अचानक गायब हो सकते हैं। उनकी गुमशुदगी केवल एक व्यक्तिगत दुखदाई घटना नहीं है, बल्कि यह एक प्रणालीगत समस्या का संकेत है, जो देश की राजनीतिक स्थिरता को प्रभावित करती है।
नई दिल्ली |दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) में छात्र संघ चुनाव की तैयारियाँ अपने चरम पर हैं, जहां 27 सितंबर को छात्र संघ के चार महत्वपूर्ण पदों—अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव, और संयुक्त सचिव—के लिए मतदान होगा। चुनावी प्रक्रिया के तहत विश्वविद्यालय ने 19 सितंबर को सभी पदों के लिए उम्मीदवारों की प्रोविजनल सूची जारी की है। इसमें अध्यक्ष पद के लिए 8, उपाध्यक्ष के लिए 5, सचिव के लिए 4, और संयुक्त सचिव के लिए 4 उम्मीदवारों का नाम शामिल है।
छात्र संगठनों में सबसे पहले अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने अपने उम्मीदवारों की आधिकारिक घोषणा कर दी है। एबीवीपी ने अध्यक्ष पद के लिए ऋषभ चौधरी, उपाध्यक्ष के लिए भानु प्रताप सिंह, सचिव के लिए मित्रविन्दा, और संयुक्त सचिव के लिए अमन कपासिया के नामों का ऐलान किया है। एबीवीपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राज शरण शाही ने चुनाव में चारों सीटों पर विजय का दावा करते हुए संगठन के मजबूत आधार पर विश्वास जताया है। उन्होंने कहा कि एबीवीपी पिछले वर्षों की तरह इस बार भी छात्रों के मुद्दों को प्रमुखता से उठाएगी।
वहीं, नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई) ने भी चुनावी दंगल में कूदते हुए अपने उम्मीदवारों की घोषणा की है। एनएसयूआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष वरुण चौधरी ने आशा व्यक्त की है कि संगठन चारों सीटों पर विजय प्राप्त करेगा। उन्होंने कहा कि दिल्ली विश्वविद्यालय के राजनीतिक परिदृश्य में इस बार एक महत्वपूर्ण बदलाव की संभावना दिखाई दे रही है। एनएसयूआई अपने मैनिफेस्टो को 21 सितंबर को दोपहर 12 बजे लॉन्च करने की योजना बना रहा है, जिसमें छात्र कल्याण से संबंधित मुद्दों पर जोर दिया जाएगा।
जैसे-जैसे चुनाव की तारीख नजदीक आ रही है, एबीवीपी और एनएसयूआई के बीच प्रचार-प्रसार की होड़ तेज हो गई है। छात्र संगठनों ने मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए विभिन्न रणनीतियाँ अपनाई हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में एक लाख से अधिक मतदाता हैं, जो इस चुनाव में अपनी भागीदारी निभाएंगे। चुनावी प्रक्रिया के दौरान बैनर, पोस्टर, और किसी भी प्रकार की छपी सामग्री का प्रचार करने की अनुमति नहीं है, जिससे चुनाव की पारदर्शिता और निष्पक्षता बनी रहे।
चुनाव के परिणाम 28 सितंबर को घोषित किए जाएंगे, जो कि छात्र संगठनों के लिए एक महत्वपूर्ण दिन होगा। इस बार के चुनावों में उम्मीदवारों की संख्या और छात्रों के बीच बढ़ती जागरूकता यह संकेत दे रही है कि चुनावी प्रक्रिया पहले से कहीं अधिक प्रतिस्पर्धात्मक होगी।
दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र संघ चुनाव को लेकर अब हलचल तेज हो गई है, और सभी संगठनों ने अपने-अपने दावे और रणनीतियाँ स्पष्ट कर दी हैं। छात्रों की भागीदारी और उनकी जागरूकता इस बार के चुनाव को और भी महत्वपूर्ण बना रही है, जिससे विश्वविद्यालय का राजनीतिक माहौल और भी रोचक बनता जा रहा है। सभी की निगाहें अब 27 सितंबर की मतदान प्रक्रिया और उसके बाद आने वाले परिणामों पर टिकी हुई हैं।
नई दिल्ली | मैनपुरी थाना के बिछवां क्षेत्र में एक किशोर नदी में कूद गया, किशोर पर चोरी का आरोप लगा था, जिससे वह किशोर डरा व सहमा था, इस घटना की सूचना मिलते ही एसडीएम और बिछवां थाने के फोर्स मौके पर पहुंच गये।
नदी में किशोर की तलाश की जा रही है, लेकिन 24 घंटे बाद भी उसका अभी तक कुछ पता नहीं चल सका है, उधर किशोर के परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है, किशोर की मां रो-रो कर बेहोश हुई जा रही है।
शीशराम का पुत्र ऊदल कुमार जो कि 15 साल का था, कल बृहस्पतिवार की दोपहर भनऊ घाट के पास काली नदी के पुल के पास पहुंचा, वह रेलिंग पकड़ कर पुल पर चढने लगा तो वहां आसपास मौजूद लोगों ने उसे रोकने के लिए आवाज लगाई, लेकिन ऊदल ने किसी की नहीं सुनी और काली नदी में कूद गया।
किशोर को नदी में कूदता देख वहां मौजूद लाेगों में अफरा तफरी मच गई, भीड़ में ही किसी ने पुलिस को सूचना दी, सूचना मिलने के तत्काल बाद एसडीएम भोगांव अंंजली सिंह, सीओ सत्यप्रकाश शर्मा पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए।
ऊदल के पिता शीशराम ने बताया कि, पुत्र पर गांव निवासी एक व्यक्ति ने 30 हजार रुपये चोरी करने का आरोप लगाया था, आरोप लगने के बाद से उनका पुत्र आहत था, इस मामले में पंचायत हुई तो 30 हजार रुपये भी वापस करा दिए गए थे, इसके बाद भी आरोपी पुत्र को परेशान कर रहे थे। परेशान होकर पुत्र दोपहर करीब एक बजे घर से निकल आया था, और नदी पहुंचकर वह उसमें कूद गया।
लखनऊ |प्रदेश में मंगेश के बाद अब अजय यादव का एनकाउंटर हुआ है। वह सुल्तानपुर के ज्वैलरी शॉप लूट कांड में शामिल था, जिसके लिए उस पर 1 लाख का इनाम था। पुलिस के साथ मुठभेड़ के दौरान उसे पैर में गोली लगी। अब उसे इलाज के लिए जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
यूपी के सुल्तानपुर में ज्वैलरी शॉप लूटकांड में शामिल एक और बदमाश की गुरुवार को पुलिस के साथ मुठभेड़ हुई, जिसमें वह घायल हो गया। इस बदमाश की पहचान अजय यादव के रूप में हुई है, जो 1 लाख रुपये का इनामी था और उसे पैर में गोली लगी है। उसे इलाज के लिए जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया है। इससे पहले पुलिस ने लूटकांड में शामिल एक अन्य आरोपी, मंगेश यादव को एनकाउंटर में मार गिराया था।
गत 28 अगस्त को सुल्तानपुर में ज्वैलरी शॉप में हुई डकैती के मामले में पुलिस ने अब तक 5 बदमाशों को गिरफ्तार कर लिया है। इनमें से एक आरोपी मंगेश यादव, एनकाउंटर में मारा गया था। गिरफ्तार बदमाशों पर 1-1 लाख रुपये का इनाम था।
पुलिस ने बदमाशों के पास से 2 किलो 700 ग्राम हीरे जड़ित सोने के आभूषण बरामद किए हैं। डकैती के दौरान इस्तेमाल की गई बोलेरो गाड़ी भी बरामद हो गई है। इस गाड़ी के मालिक, त्रिभुवन कोरी को एनकाउंटर के बाद पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका है।
सुल्तानपुर में 28 अगस्त को ठठेरी बाजार स्थित ओम ऑर्नामेंट नामक दुकान में कुछ नाकाबपोश हथियारबंद बदमाशों ने दिनदहाड़े डाका डाला था। इस घटना के दौरान बदमाशों ने हथियार के बल पर दुकानदार और अन्य लोगों को बंधक बना लिया। पुलिस ने इस मामले में एक आरोपी, मंगेश यादव को एनकाउंटर में मार गिराया था।
नई दिल्ली | चेन्नई के चेपॉक स्टेडियम में भारतीय टीम और बांग्लादेश के बीच चल रही 2 मैचों की टेस्ट सीरीज का पहला मुकाबला बेहद रोमांचक हुआ। मैच के पहले दिन, गुरुवार (19 सितंबर), भारतीय टीम ने 6 विकेट पर 339 रन बनाए। स्पिन ऑलराउंडर रविचंद्रन अश्विन और रवींद्र जडेजा की शानदार बल्लेबाजी ने टीम को संभाला। अश्विन 102 रन और जडेजा 86 रन बनाकर नाबाद क्रीज पर हैं। दूसरे दिन, भारतीय टीम इन्हीं दोनों बल्लेबाजों के दम पर अपनी पारी को आगे बढ़ाएगी।
पहले दिन का खेल शुरू होने पर बांग्लादेशी गेंदबाजों ने भारत को शुरुआती झटके दिए थे। टॉस हारकर पहले बल्लेबाजी करते हुए भारतीय टीम ने 34 रनों पर ही तीन विकेट गंवा दिए थे। शुभमन गिल, यशस्वी जायसवाल और कप्तान रोहित शर्मा जल्दी ही पवेलियन लौट गए। इसके बाद विराट कोहली और केएल राहुल ने कुछ संघर्ष किया, लेकिन 144 रनों तक पहुंचते-पहुंचते आधी भारतीय टीम पवेलियन लौट चुकी थी।
बांग्लादेशी तेज गेंदबाज हसन महमूद ने चार विकेट लेकर भारत की शुरुआत को बुरी तरह हिला दिया। उनके साथ नाहिद राणा और मेहदी हसन मिराज ने भी एक-एक विकेट झटका। पहले सत्र में बांग्लादेश पूरी तरह से हावी थी और ऐसा लग रहा था कि भारत जल्द ही ढेर हो सकता है। लेकिन, इसके बाद मैदान पर आए रवींद्र जडेजा और रविचंद्रन अश्विन, जिन्होंने मैच की तस्वीर बदल दी।
अश्विन और जडेजा की इस जोड़ी ने बांग्लादेशी गेंदबाजों का डटकर मुकाबला किया। दोनों ने न केवल विकेट गिरने से रोका, बल्कि तेजी से रन भी बनाए। अश्विन ने अपना छठा टेस्ट शतक जड़ा, जबकि जडेजा ने 86 रनों की नाबाद पारी खेली। इन दोनों के बीच 227 गेंदों पर 195 रनों की नाबाद साझेदारी हुई, जो बांग्लादेश के खिलाफ सातवें या उससे निचले क्रम के किसी भी विकेट के लिए सबसे बड़ी साझेदारी बन गई है। इससे पहले यह रिकॉर्ड सचिन तेंदुलकर और जहीर खान के नाम था, जिन्होंने 2004 में बांग्लादेश के खिलाफ 133 रनों की साझेदारी की थी।
पहले दिन के अंत तक भारतीय टीम ने 339 रन बना लिए थे, और अश्विन-जडेजा की जोड़ी दूसरे दिन भी बल्लेबाजी की शुरुआत करेगी। बांग्लादेशी गेंदबाजों के लिए यह एक चुनौतीपूर्ण दिन होगा, क्योंकि उन्हें इन दोनों सेट बल्लेबाजों को जल्दी आउट करना होगा, ताकि भारतीय टीम को और बड़े स्कोर तक पहुंचने से रोका जा सके।
दूसरी ओर, भारत के पास अब बड़ा स्कोर खड़ा करने का सुनहरा मौका है। टीम के पास जसप्रीत बुमराह, मोहम्मद सिराज, आकाश दीप जैसे तेज गेंदबाजों के साथ-साथ अश्विन और जडेजा की स्पिन जोड़ी है, जो बांग्लादेशी बल्लेबाजों को मुश्किल में डाल सकती है। चेपॉक की पिच पर दूसरे दिन स्पिन का असर ज्यादा होने की उम्मीद है, इसलिए भारतीय टीम का ध्यान जल्द से जल्द बांग्लादेश को बैकफुट पर धकेलने पर रहेगा।
बांग्लादेश के बल्लेबाजों के लिए यह अग्निपरीक्षा होगी, क्योंकि पहले दिन गेंदबाजी में बेहतर शुरुआत के बावजूद वे भारतीय टीम को जल्दी आउट नहीं कर सके। अब उनके बल्लेबाजों को अपनी टीम को वापसी दिलाने की जिम्मेदारी निभानी होगी।
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के आरोपों के बाद, तिरुपति मंदिर के प्रसाद के सैंपल जांच के लिए भेजे गए। जांच के परिणामों में यह बात सामने आई कि प्रसाद में फिश ऑयल पाया गया है, जिसने विवाद को और भी बढ़ा दिया है।
आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने हाल ही में आरोप लगाया कि तिरुपति मंदिर के प्रसाद में घी की जगह जानवरों की चर्बी का इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने यह दावा किया कि पिछले कुछ समय से प्रसाद की गुणवत्ता में गिरावट आई है। नायडू ने कहा, “हमने यह सुनिश्चित किया कि प्रसाद में केवल असली घी का ही इस्तेमाल हो। लेकिन जो रिपोर्ट सामने आई हैं, उनसे स्पष्ट है कि घी की जगह घटिया सामग्री का उपयोग किया गया है।” उनके इस बयान ने मंदिर की पवित्रता और प्रसाद की गुणवत्ता को लेकर भक्तों में चिंता पैदा कर दी है।
जांच की प्रक्रिया:
नायडू के आरोपों के बाद, तिरुपति मंदिर के प्रसाद के सैंपल जांच के लिए भेजे गए। जांच के परिणामों में यह बात सामने आई कि प्रसाद में फिश ऑयल पाया गया है, जिसने विवाद को और भी बढ़ा दिया है। नायडू ने कहा, “यह रिपोर्ट हमारे लिए चिंता का विषय है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि भक्तों को केवल शुद्ध और पवित्र प्रसाद मिले।” इस स्थिति ने तिरुपति मंदिर के प्रति भक्तों की आस्था को चुनौती दी है।
जगन मोहन रेड्डी, आंध्र प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री, ने नायडू के आरोपों पर तीखा पलटवार किया है। रेड्डी ने कहा, “चंद्रबाबू नायडू ने तिरुपति की पवित्रता और करोड़ों हिंदुओं की आस्था को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की है। उनकी बातें बेहद घटिया हैं।” YSRCP पार्टी के प्रवक्ता ने आगे कहा, “क्या चंद्रबाबू अपने परिवार के साथ शपथ लेने के लिए तैयार हैं कि उनके आरोप सच हैं? उनकी इस तरह की टिप्पणियों से केवल राजनीति का स्तर गिरता है।”
भक्तों की आस्था पर असर:
इस विवाद ने तिरुपति मंदिर के भक्तों के मन में गहरी चिंता पैदा की है। भक्तों का मानना है कि तिरुपति का प्रसाद केवल एक धार्मिक सामग्री नहीं है, बल्कि यह उनकी आस्था का प्रतीक है। कई भक्तों ने अपनी चिंताओं को व्यक्त करते हुए कहा, “हम तिरुपति आते हैं ताकि हम भगवान से आशीर्वाद ले सकें। प्रसाद की गुणवत्ता हमारे लिए बेहद महत्वपूर्ण है। हमें उम्मीद है कि प्रशासन इस मामले को गंभीरता से लेगा।”
तिरुपति लड्डू की गुणवत्ता पर सवाल:
नायडू ने यह भी कहा कि तिरुपति लड्डू बनाने में घटिया सामग्री का इस्तेमाल होता है। उन्होंने कहा, “अब हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हर लड्डू शुद्ध सामग्री से बने और उसकी गुणवत्ता उच्चतम स्तर की हो।” टीटीडी (तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम) ने इस बात की पुष्टि की है कि वे प्रसाद की गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए कई उपाय कर रहे हैं।
क्या कहता है मंदिर प्रशासन?
तिरुपति मंदिर प्रशासन ने इन आरोपों को गंभीरता से लिया है। उन्होंने कहा कि वे हमेशा भक्तों की आस्था और प्रसाद की गुणवत्ता को सर्वोपरि मानते हैं। प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि सभी नियमों का पालन किया जा रहा है और किसी भी प्रकार की चूक को रोकने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। एक प्रवक्ता ने कहा, “हम भक्तों को उच्च गुणवत्ता का प्रसाद प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।”
तिरुपति मंदिर का प्रसाद सिर्फ एक भौतिक वस्तु नहीं है; यह करोड़ों भक्तों की आस्था और विश्वास का प्रतीक है। ऐसे में, यह आवश्यक है कि मंदिर की पवित्रता और प्रसाद की गुणवत्ता पर सही और स्पष्ट जानकारी सामने आए। सभी संबंधित पक्षों को मिलकर इस मुद्दे का समाधान निकालना चाहिए, ताकि भक्तों की आस्था को मजबूत किया जा सके और उन्हें उचित प्रसाद प्रदान किया जा सके।
नई दिल्ली | एक दृश्य ने मुझे गहरे विचारों में डाल दिया। सड़क किनारे एक स्थानीय महिला, जो समाज के वंचित वर्ग से थी, सब्जी बेच रही थी। यह दृश्य मेरे लिए नया नहीं था, लेकिन आज मैंने इसे अलग नज़र से देखा। मुझे एहसास हुआ कि हमारे देश, भारत में, जितनी भी वंचित वर्ग की महिलाएँ हैं, वे सदियों से अपने दम पर आर्थिक रूप से सशक्त रही हैं। चाहे वह सब्जी बेचना हो, सफाई का काम हो, चूड़ी बेचना हो, कपड़े धोना हो, या बर्तन मांजना हो- ये महिलाएँ हमेशा से अपने परिवार के आर्थिक मामलों में सहयोग करती आई हैं।
मुझे यह सोचने पर मजबूर किया कि आखिर क्यों उनके पतियों या परिवार के सदस्यों ने कभी उनसे यह नहीं कहा कि “तुम घर पर रहो, मैं कमाई करके लाऊँगा।” इसके विपरीत, समाज के संपन्न वर्ग की महिलाओं की स्थिति बिल्कुल उलट रही है। सदियों से, संपन्न वर्ग की महिलाएँ शायद ही कभी आर्थिक भागीदारी का हिस्सा हो और आज जब समाज में महिलाएँ खुद से कमाई करने की बात करती हैं, तो कई सवाल उठते हैं। “घर कौन देखेगा?” “बच्चों की देखभाल कौन करेगा?” “मैं पैसे कमा रहा हूँ, तुम्हें क्या ज़रूरत?” -कि तुम देश का भविष्य बना रही हो। (बच्चों की देखभाल को देश के भविष्य से जोड़ा जाता है।)यह सवाल सामाजिक ढाँचे और परंपराओं पर सवाल खड़े करते हैं।
वंचित वर्ग की महिलाएँ, जो हमेशा से कठिन परिश्रम करती रही हैं, उन्हें सशक्तिकरण की परिभाषा समझाने की आवश्यकता ही नहीं थी। वे पहले से ही आत्मनिर्भर थीं। उनके लिए घर और बाहर का संतुलन साधना उनकी ज़िंदगी का हिस्सा रहा है। वहीं संपन्न वर्ग की महिलाओं को घर की चारदीवारी में बंधी रहने के लिए मजबूर किया गया, उन्हें आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर बनने के अवसर ही नहीं दिए गए। और आज जब वे इस दिशा में कदम बढ़ाना चाहती हैं, तो उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
यह समझना भी ज़रूरी है कि केवल पैसा कमाना सशक्तिकरण की परिभाषा नहीं है। असल सशक्तिकरण तब होता है जब महिलाएँ अपने जीवन से जुड़े फैसले स्वयं ले पाती हैं। चाहे वह घर के भीतर काम करने का निर्णय हो या बाहर काम करने का, असली सशक्तिकरण यही है कि महिलाएँ खुद अपनी पसंद से निर्णय ले सकें। पैसा कमाना सशक्तिकरण का एक हिस्सा हो सकता है, लेकिन फैसले लेने की स्वतंत्रता असल सशक्तिकरण की पहचान है।
हमारे समाज में यह फर्क सिर्फ आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण से भी जुड़ा हुआ है। जहाँ वंचित वर्ग की महिलाएँ जीवनयापन के लिए बाहर काम करती हैं, वहीं संपन्न वर्ग की महिलाएँ घर की चारदीवारी में बंधी रहती हैं। यह अंतर इस बात की तरफ इशारा करता है कि सशक्तिकरण का असल अर्थ केवल आर्थिक आत्मनिर्भरता नहीं, बल्कि सामाजिक मानसिकता में बदलाव भी है।
समाज को यह समझना होगा कि महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता न केवल उनके लिए, बल्कि पूरे परिवार और समाज के लिए फायदेमंद है। महिलाओं के काम करने से उनके आत्मसम्मान में वृद्धि होती है और वे समाज में एक सक्रिय भूमिका निभाती हैं। इसके साथ ही, बच्चों और परिवार की देखभाल का भार केवल महिलाओं पर डालना एक पुरानी और गलत धारणा है।
परिवार एक साझेदारी होती है, और इसका संतुलन दोनों पति-पत्नी को मिलकर साधना चाहिए।यह सोचने का वक्त है कि आखिर क्यों हमारा समाज अब तक इन धारणाओं में बंधा हुआ है, और हमें इन्हें तोड़ने की दिशा में क्या कदम उठाने चाहिए। महिलाएँ, चाहे किसी भी वर्ग से हों, उन्हें सशक्त बनाना समय की मांग है। सशक्तिकरण केवल उनके काम करने से नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग में उनके प्रति सम्मान और समर्पण से भी होना चाहिए।
(नलिनी मिश्रा, एक दशक से अधिक समय से समाज सेवा में सक्रिय हैं।)
नई दिल्ली |आज भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने रोहतक से हरियाणा विधानसभा चुनाव को लेकर पार्टी का घोषणा पत्र जारी कर दिया है, घोषित पत्र जारी करते समय प्रदेश के मुख्यमंत्री नायब सैनी, केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर, प्रदेश प्रभारी सतीश पूनिया, हरियाणा चुनाव प्रभारी धर्मेंद्र प्रधान, केंद्रीय राज्य मंत्री कृष्णपाल गुर्जर, ओमप्रकाश धनखड़, सुभाष बराला, सुधा यादव व अन्य लोग मौजूद थे।
इस घोषणा पत्र में प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं –
1 – चिरायु-आयुष्मान योजना के तहत प्रत्येक परिवार को ₹10 लाख तक का मुफ्त इलाज एवं परिवार के 70 वर्ष से अधिक प्रत्येक बुजुर्ग को अलग से 5 लाख तक के मुफ्त इलाज की सुविधा
2 – 24 फसलों की घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद
3 – 2 लाख युवाओं को पक्की सरकारी नौकरी
4 – सभी महिलाओं को लाडो लक्ष्मी योजना के तहत प्रतिमाह 2,100 रुपये दिये जायेगें
5 – शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में 5 लाख आवास
6 – सरकारी अस्पतालों में डायलिसिस तथा सभी अस्पतालों में डायग्नोसिस मुफ्त
7 – हरियाणा को वैश्विक शिक्षा का केंद्र बनाकर आधुनिक स्किल का प्रशिक्षण प्रदान करेंगे
8 – दक्षिण हरियाणा में एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का अरावली जंगल सफारी पार्क
9 – हर घर गृहणी योजना तहत 500 रुपये में सिलेंडर
10 – अळल बालिका योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्र में कॉलेज जाने वाली प्रत्येक छात्रा को स्कूटर
11 – डीए और पेंशनों को जोड़ने वाले साइंटिफिक फॉर्मूले के आधार पर सभी सामाजिक मासिक पेंशनों में वृद्धि
12 – भारत के किसी भी सरकारी कॉलेज से मेडिकल और इंजीनियरिंग पढ़ने वाले ओबीसी एवं एससी जातियों के हरियाणा के विद्यार्थियों को पूर्ण छात्रवृत्ति
13 – भारत सरकार के सहयोग से विभिन्न रैपिड रेल सेवाओं एवं फरीदाबाद से गुरुग्राम के बीच इंटरसिटी एक्सप्रेस मेट्रो सेवा की शुरुआत
14 – छोटी पिछड़े समाज की जातियों के लिए पर्याप्त बजट के साथ अलग-अलग कल्याण बोर्ड
15 – हर जिले में ओलंपिक खेलों की नर्सरी
इस घोषणा पत्र को लेकर मेनिफेस्टो कमेटी के चेयरमैन ने कहा कि,
मुझे ये बताते हुए खुशी हो रही है कि 2 लाख से ज्यादा लोगों ने इस घोषणा पत्र को बनाने में अपने सुझाव दिए हैं, इस बार हमारे घोषणा पत्र में एरिया वाइज जरूरत की चीजों का शामिल किया है। इस पत्र में महिला, युवा, किसान, उद्योगपति, छोटे व्यापारी, पिछड़े वर्ग के लोग, बेरोजगार युवाओं के लिए संकल्प पत्र में कुछ न कुछ रखा गया है।