अनुज हनुमत | नवप्रवाह.कॉम
चित्रकूट | प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का हालिया चित्रकूट और बांदा दौरा बुंदेलखंड की राजनीति और विकास के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मोड़ पर हुआ है। एक तरफ जहां सरकार ने ₹1600 करोड़ से अधिक की परियोजनाओं के जरिए इस पिछड़े क्षेत्र की तकदीर बदलने का खाका खींचा है, वहीं दूसरी तरफ आगामी राजनीतिक समीकरणों को साधने की कोशिशें भी साफ दिखी हैं। इस दौरे को सिर्फ एक प्रशासनिक कार्यक्रम के तौर पर देखना अधूरी तस्वीर होगी । इसके वास्तविक सामाजिक और राजनीतिक निहितार्थों को समझने के लिए हमें एक सजग नागरिक की उम्मीदों और एक तार्किक आलोचक के संशयों, दोनों पैमानों पर इसे कसना होगा ।
चित्रकूट को ₹950 करोड़ (124 परियोजनाएं) और बांदा को ₹709 करोड़ (229 परियोजनाएं) के विकास कार्यों की सौगात मिलना इस पिछड़े क्षेत्र की बुनियादी संरचना को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम है।मुख्यमंत्री द्वारा कामदगिरि की पंचकोसीय परिक्रमा करना और धर्मनगरी के विकास की बात करना, चित्रकूट को वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करने की प्रतिबद्धता दिखाता है। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार और व्यापार को बढ़ावा मिलेगा। बांदा में वीरांगना अवंतीबाई लोधी की प्रतिमा का अनावरण करना हमारे ऐतिहासिक नायकों और लोक-चेतना को सम्मान देने का एक सराहनीय प्रयास है।
मंच से विकास योजनाओं के लोकार्पण के साथ-साथ विपक्षी दलों (विशेषकर सपा) पर तीखे तंज और ‘सैफई बनाम बुंदेलखंड’ का नैरेटिव यह साफ करता है कि इस दौरे का बड़ा मकसद आगामी विधानसभा चुनावों के लिए जमीन तैयार करना था। भाषणों में प्रशासनिक जवाबदेही से ज्यादा राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता हावी दिखी।
लगभग ₹1600 करोड़ से अधिक की इन परियोजनाओं की घोषणा तो शानदार है, लेकिन असली चुनौती इनके समयबद्ध क्रियान्वयन की है। बुंदेलखंड आज भी पानी के संकट, अन्ना प्रथा (आवारा पशु), स्थानीय बेरोजगारी और युवाओं के भारी पलायन जैसी बुनियादी समस्याओं से जूझ रहा है। क्या ये परियोजनाएं इन कड़वी हकीकतों का स्थायी इलाज कर पाएंगी?
सरकार भले ही भू-माफियाओं पर ‘डंडे’ की बात करे, लेकिन बुंदेलखंड में अवैध खनन और स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक भ्रष्टाचार की जड़ें आज भी गहरी हैं, जिन पर केवल राजनीतिक भाषणों से नहीं, बल्कि कड़े जमीनी सुधारों से लगाम लगेगी।
मुख्यमंत्री का यह दौरा बुंदेलखंड के प्रति सरकार की सक्रियता को तो रेखांकित करता है, लेकिन एक नागरिक और मतदाता के रूप में हमारी उम्मीदें केवल शिलान्यास के पत्थरों तक सीमित नहीं हो सकतीं। विकास तब सार्थक माना जाएगा जब बुंदेलखंड का युवा रोजगार के लिए महानगरों की तरफ भागने को मजबूर न हो और चित्रकूट-बांदा की जनता को बूंद-बूंद पानी के लिए संघर्ष न करना पड़े। राजनीति अपनी जगह है, लेकिन वादों की कसौटी पर खरा उतरना सरकार की असली परीक्षा होगी।













