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Tuesday, September 8, 2026
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मशहूर संगीत निर्देशक खैय्याम से एक मुलाक़ात

By Amit Dwivedi 

आप हीरो बनने आये थे ?

खैय्याम : मुझे सहगल साहब बहोत पसंद थे, जब भी उन्हें देखता मन में ये बात कौंधती की यार मुझे भी हीरो बनना है। मेरी इस बात पे मेरे घर का कोई भी शख्स राज़ी नहीं था सारे लोग इसके विरोध में थे । मेरी बातों और जिद से लोग नाराज़ थे और सब समझ भी गए थे कि अब शायद रोक पाना मुश्किल होगा। घर वालों ने तमाचे भी जड़े लेकिन क्या करें? घरवालों ने तो साफ़ कह दिया था कि अगर आपको हमारे साथ रहना है तो आप इन सब चीज़ों के बारे में सोचना छोड़ना पड़ेगा।

…तो हीरो बनने के लिए खैय्याम साहब ने क्या किया ?

खैय्याम : उन दिनों मैं गवर्नमेंट हाई स्कूल में पढता था , पांचवी में था उस समय। उस समय मन में ये ख्याल आया कि सारे बड़े काम दिल्ली से ही हुआ करते हैं तो शायद फिल्में भी वहीँ बनती होंगी. दिल्ली के लिए रवाना हो गए वहीँ दिल्ली में ही हमारे चाचा जान रहा करते थे. जब हम चाचा के यहाँ पहुचे तो वो बड़े खुश हुए लेकिन अगले ही पल उन्होंने पूछा कि भाई जान कहाँ हैं? तो मैंने कहा कि मैं अकेले आया हूँ सारा माज़रा वो समझ गए बस और क्या था जड़ दिए कुछ थप्पड़ | गनीमत थी कि दादी उन दिनों चचा के यहाँ ही रहती थीं उन्होंने बचाया मुझे. चचा ने मेरा एडमिशन वहीँ के एक स्कूल में कराया तो ज़रूर लेकिन जल्दी ही समझ गए कि इसका मन पढ़ाई में लगता नहीं मेरी रूचि
भी वो जल्दी ही समझ गए. हीरो तो नहीं बने लेकिन दिल्ली ने म्यूजिक के लिए एक दिशा ज़रूर दी |

चिश्ती बाबा से आपका गहरा जुड़ाव रहा , कुछ बताएं |

खैय्याम : चिश्ती बाबा से मेरी मुलाक़ात मेरे दोस्त ने करवाई थी . जब मैंने चिश्ती साहब को देखा तो वह उस वक़्त वो पियानो पर बड़ी सुन्दर धुन बजा रहे थे कुछ देर बजाने के बाद उन्होंने अपने एक साथी से पूछा की मैं कौन सा टुकड़ा बजा रहा था? साथी ने कहा बाबा आप इतनी साड़ी धुनें बजा चुके हैं याद नहीं आ रहा की कौन सी धुन थी , इतने में मैंने उनकी भूली हुई धुन बता दी। पहले तो गुस्सा हुए की बिना अनुमति के ये कौन घुस आया है लेकिन जब बाद में उन्हें सारी बातें पता चली तो खुश हुए और गले लगाया और तभी से मैं उनका शिष्य भी बना । उन दिनों चिश्ती बाबा के पास काफी प्रोजेक्ट थे काम करने के लिए। मुझसे उन्होनें रहने और खाने के बारे में पूछा तो मैंने स्पष्ट उन्हें बता दिया, कोई पनाह तो थी नहीं मेरे पास तो बाबा के यहाँ ही ठिकाना मिला।

आप चिश्ती बाबा के यहाँ सीखने लगे , आमदनी का कोई श्रोत था उन दिनों ?

खैय्याम : म्यूजिक के लोग बड़े खुशमिजाज़ और मौजी किस्म के होते हैं लेकिन मैं हमेशा से बड़ा शांत रहता था ,कोई नशा नहीं करता था मैं। मुझे इस बात की खबर नहीं थी की इस बात पर बी . आर . चोपड़ा साहब गौर कर रहे थे। एक दिन सबको पैसे दिए जा रहे थे ,सब बुलाया जाता और उन्हें पैसे दिए जाते लेकिन मेरा नाम अंत तक नहीं लिया गया तो चोपड़ा साहब ने पूछह की भाई खय्याम का नाम क्यूँ नहीं? चिश्ती सहा ने कहा की साहब ये तो अभी सीख रहे हैं। चोपड़ा साहब ने अपने असिस्टेंट को बुलाया और मुझे भी पैसे दिए, तब से मुझे हर महीने 125 रुपये हर महीने पगार मिला करता। इस तरह से मेरी पहली कमाई शुरू हुई।

जोहरा जी के साथ आपने ‘रोमियो-जूलिएट’ फिल्म में गाया भी। उससे कुछ फायदा हुआ कैरियर को?

खैय्याम : मेरे गुरूजी की वजह से मुझे ‘रोमिओ-जूलिएट ‘ फिल्म में जोहरा जी के साथ गाने का मौका मिला . इसी गाने को सुनकर नर्गिस जी की माँ नेमुझे बुलवाया। उन दिनों मेरा नाम ‘प्रेम कुमार’ रख दिया गया था। मुझे डर लगा कि मुझसे कुछ गड़बड़ तो नहीं हो गई, क्योंकि नर्गिस जी की माँ खुद संगीत की बहोत अच्छी जानकार थीं। उनका नाम जद्दन बाई था लेकिन उन्हें लोग बीबी के नाम से बुलाते थे। मुझे घर बुलाकर उन्होंने गाना सुना ,खुश हुईं और आश्वाशन दिया की मिलते रहना , काम देंगे तुम्हे। उनका इतना कहना ही मेरे लिए किसी काम से कम नहीं था।

फिल्म ‘फूटपाथ’के बारे में कुछ बताएं।

खैय्याम : फूटपाथ दिलवाने में नर्गिस जी की माँ का और दिलीप साहब का बड़ा योगदान था . इस फिल्म में आशा जी से मैंने चार गाने गवाए .

‘फिर सुबह होगी’ यह फिल्म काफी चर्चित रही। क्या कहेंगे आप इसके बारे में ?

खैय्याम : क्या कहने यार, आउटस्टैंडिंग …जितनी तारीफ करें कम होगी। साहिर साहब को जब डिटेल्स मिलीं तो उन्होंने म्यूजिक के लिए मेरा नाम लिया . सहगल साहब ने कहा की अगर खैय्याम राज साहब (राज कपूर) को धुन सुनाएं और उन्हें पसंद आ जाये तो मुझे कोई ऐतराज नहीं । साहिर साहब ने कविता लिखी ‘ वो सुबह कभी तो आएगी’ और मुझे सारी बातें बताई तो मैंने पांच धुनें बनाई उसकी। मैंने जब उन्हें पहली ही धुन सुनाई वो एकदम खुश हो गए,ऐसे ही एक एक करके मैंने उन्हें पाँचों धुनें सुनाई। सहगल साहब को राज साहब लेकर गए तो मैंने सोचा की अब हमें ये फिल्म तो नहीं मिलने वाली . हम इंतज़ार करते रहे ,सहगल साहब लौटे तो मेरा माथा चूमने लगे और बधाई दी। बाद में राज साहब आये तो फिर से पांचो धुनें सुने और कहा की हम पाँचों धुनें रिकॉर्ड करेंगे .

पहले कुछ ‘आखिरी ख़त’ के बारे में बताएं फिर ये बताएं की आखिरी ख़त के बाद ‘कभी-कभी’ में इतना लम्बा गैप क्यों ?

खैय्याम : चेतन साहब ने कहा की एक ही गाना करना है आपको। मैंने सोचा की खुद न खास्ता कुछ गड़बड़ हो गई तो … ? फिर से फ़ोन आया उनका मीटिंग हुई साथ में कैफ़ी साहब भी थे उन्होंने कहा की खैय्याम गाना एक ही है और आप ही को करनी है। “बहारों मेरा जीवन सँवारो ” यह उन्हें इतना पसंद आया की आगे हमने इसी फिल्म के लिए पांच गाने रिकॉर्ड किए . ‘आखिरी ख़त’ और ‘कभी-कभी’ के बीच में इतने लम्बे गैप के बारे में इंडस्ट्री के ही लोगो का सोचना है की फिल्म इंडस्ट्री ने मुझे अकेला छोड़ दिया था लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं है। हम फिल्में चुनाव करके ही करते थे। उस दरमियान हमने ढेरों भजनों और ग़ज़लों के एलबम्स किये जो काफी ज्यादा लोकप्रिय रहे।

इतनी सारी बेहतरीन फिल्में आपने दी हैं, ढेरो सम्मान आपको मिला। इतना लम्बा सफ़र …कैसा लगता है बीते कल के बारे में सोचकर ?

खैय्याम : बड़ा सुकून मिलता है और इस बात की बड़ी ख़ुशी होती है की हमने जितनी भी फिल्में की भले ही वो अदद में कम हों लेकिन ऐतिहासिक रहीं । उम्र के इस पड़ाव पर बीते हुए कल को याद करके आप मुस्कुरा दें इससे अच्छा क्या हो सकता है।

 

साहित्य, समाज और सिनेमा

लेखक: डॉ. पुनीत बिसारिया 
(वरिष्ठ प्राध्यापक, हिन्दी विभाग, नेहरू पी. जी. कॉलेज, ललितपुर, उ. प्र.)
साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है। यदि इस नज़रिए से सिनेमा को देखा जाए तो सिनेमा को समाज की अन्तर्शिराओं में बहने वाले रक्त की संज्ञा दी जा सकती है। प्रारम्भ से ही सिनेमा ने समाज पर सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों ही प्रकार के प्रभाव छोड़े हैं। भारत की पहली फिल्म सत्य हरिश्चन्द्र देखकर बालक मोहनदास करमचंद गांधी रो पड़े थे और ‘राजा हरिश्चंद्र’ की सत्यनिष्ठा से प्रेरित होकर उन्होंने आजीवन सत्य बोलने का व्रत ले लिया था। वास्तव में इस फिल्म ने ही उन्हें मोहनदास से महात्मा गांधी बनने की दिशा में पहला कदम रखने हेतु प्रेरित किया था। स समाज, न नवीन, म मोड़ अर्थात् सिनेमा ने समय-समय पर समाज को नया मोड़ देने में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है। साहित्य ने भी समाज के इस महत्त्वपूर्ण दृश्य-श्रव्य माध्यम के पुष्पन-पल्लवन में अपना योगदान यदि हम शुरूआती सिनेमा की ओर नज़र दौड़ाएँ, तो पाते हैं कि इसकी शुरूआत ही पौराणिक साहित्य के सिनेमाई रूपान्तरण से हुई। ‘सत्य हरिश्चन्द्र’, ‘भक्त प्रह्लाद’, ‘लंका दहन’, ‘कालिय मर्दन’, ‘अयोध्या का राजा’, ‘सैरन्ध्री’ जैसी प्रारंभिक दौर की फिल्में धार्मिक ग्रंथों की कथाओं का अंकन थीं।
इन फिल्मों का धार्मिक और आर्थिक के साथ-साथ सामाजिक उद्देश्य भी था। चौथे दशक से फिल्मों में सामाजिक कथाओं की भी आवश्यकता को महसूस किया जाने लगा और इसके लिए समकालीन साहित्य के रचनाकारों की ओर देखना लाज़मी हो गया। नतीजा यह हुआ कि सिनेमा को मण्टो का साथ लेना पड़ा। मण्टो की लेखनी से ‘किसान कन्या’, ‘मिजऱ्ा गालिब’, ‘बदनाम’ जैसी फि़ल्में निकलीं। प्रेमचंद और अश्क भी इस दौर में सिनेमा से जुड़े और मोहभंग के बाद वापस साहित्य की दुनिया में लौट गए। बाद में ख्वाजा अहमद अब्बास, पाण्डेय बेचन शर्मा उग्र, मनोहरश्याम जोशी, अमृतलाल नागर, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, रामवृक्ष बेनीपुरी, भगवतीचरण वर्मा, राही मासूम रज़ा, सुरेन्द्र वर्मा, नीरज, नरेन्द्र शर्मा, कवि प्रदीप, हरिवंशराय बच्चन, कैफी आज़मी, शैलेन्द्र, मज़रूह सुल्तानपुरी, शकील बदायूँनी इत्यादि ने भी समय-समय पर हिन्दी सिनेमा में किसी न किसी रूप में अपनी आमद दर्ज कराई। अनेक हिन्दी, उर्दू तथा बांग्ला की कालजई रचनाओं पर भी फिल्में बनाई गईं और उनमें साहित्य की आत्मा डालने की कोशिशें की गईं। वास्तव में आठवें दशक तक सिनेमा ने हिन्दी-उर्दू में कोई फर्क ही नहीं माना। उर्दू के अफसानानिग़ार मण्टों की कहानी पर बनी फिल्म ‘अछूत कन्या’ सुपरहिट साबित हुई। बांग्ला लेखक शरतचंद्र के उपन्यास ‘देवदास’ पर हिन्दी में चार फिल्में बनीं और कमोबेश सभी सफल रहीं। प्रेमचन्द की कहानी ‘शतरंज के खिलाड़ी’ पर सत्यजीत रॉय ने इसी नाम से फिल्म बनाई, जो वैश्विक स्तर पर सराही गई। भगवतीचरण वर्मा के अमर उपन्यास ‘चित्रलेखा’ पर भी फिल्में बनीं, जिनमें एक सफल रही। बाद में साहित्यिक कृतियों पर आधारित फिल्मों को आर्ट फिल्मों के खांचे में रखकर इनका व्यावसायिक और हिट फिल्मों से अलगाव कायम करने का प्रयास किया गया, जिससे ऐसी फिल्मों का आर्थिक पहलू प्रश्नचिह्नांकित हो गया और फिल्मकारों ने साहित्यिक कृतियों पर फिल्म बनाने से परहेज करना शुरू कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि ‘एंग्री यंग मैन’ युग आ गया और यथार्थ से कटी हुई अतिरंजनापूर्ण ‘अमिताभीय’ फिल्मों का दौर आ गया। मैं इस दौर को हिन्दी सिनेमा का ‘अंधकार युग’ मानता हूँ, जिससे हमें नवें दशक में आकर मुक्ति मिल सकी। यह युग वस्तुतः समाज की सोच, उसकी आकांक्षाओं एवं उसके स्वप्नों से कटा हुआ था और इसमें आम जनता की सहभागिता नगण्यप्राय थी। इन फिल्मों के अर्थ-दृष्टि से सफल होने का बड़ा कारण यह था कि अमिताभ के ‘लार्जर दैन लाइफ’ अवतार में तल्लीन तत्कालीन युवा वर्ग को अपनी समस्याएँ तीन घण्टे के लिए ही सही खत्म होती दीखती थीं। ऐसे में बाकी समाज की उन्हें न तो ज़रूरत थी और न ही उसकी कोई आर्थिक उपयोगिता थी। इस नैराश्यपूर्ण दौर में समाज और साहित्य को तो हाशिए पर रहना ही था। हालांकि अमिताभीय युग में भी सत्यजीत रॉय, मृणाल सेन, कमाल अमरोही, ऋषिकेश मुखर्जी, बासु भट्टाचार्य, श्याम बेनेगल, एम. एस. सत्थू, एन. चंद्रा, मुजफ्फर अली, गोविन्द निहलानी, आदि ने अपने-अपने स्तर से साहित्य, सिनेमा और समाज का त्रयी में सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास किया लेकिन ये सभी चाहे-अनचाहे ‘आर्ट सिनेमा’ में बँधने को बाध्य हुए। एक कारण और भी था कि इस दौरान साहित्यिक कृतियों पर बनने वाली फिल्में एक-एक कर असफल होने लगी थीं। प्रेमचंद की रचनाओं पर बनीं ‘गोदान’, ‘सद्गति’, ‘दो बैलों की कथा’, फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास पर बनी ‘तीसरी कसम’, मन्नू भंडारी की रचनाओं पर आधारित ‘यही सच है’, ‘आपका बंटी’ और ‘महाभोज’, शैवाल की कहानी पर आई फिल्म ‘दामुल’, धर्मवीर भारती के उपन्यास पर आधारित ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’, चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ की कहानी पर आधारित ‘उसने कहा था’, संस्कृत की रचना ‘मृच्छकटिकम्’ पर आधारित ‘उत्सव’, राजेंदर सिंह बेदी के उपन्यास पर बनी ‘एक चादर मैली सी’ आदि का असफल होना सिनेमा और साहित्य से दूरी की एक बड़ी वजह बन गया। इसके कारण समाज से भी फिल्मों की दूरी बढ़ने लगी।  हालांकि इन फिल्मों के फ्लॉप होने की अन्य कई वजहें थीं लेकिन यह मिथ्या धारणा फिल्मकारों के मन में घर कर गई कि साहित्यिक कृतियों पर बनी फिल्मों का आर्थिक महत्त्व नहीं है। यद्यपि कमलेश्वर को फिल्म जगत में काफी सफलता मिली लेकिन एक साहित्यिक लेखक न होकर जब वे फॉर्मूलाबद्ध कथानक रचने लगे, तभी उनकी फिल्में सफलता का स्वाद चख सकीं और निर्देशकों ने उनकी कहानियों पर फिल्में बनाईं। ‘द बर्निंग ट्रेन’, ‘राम-बलराम’, ‘सौतन’ आदि उनकी फिल्में कहीं से भी साहित्य के चौखटे में फिट नहीं होतीं। यहाँ एक तथ्य यह भी महत्त्वपूर्ण और रेखांकित करने योग्य है कि हिन्दी फिल्म जगत में जितनी सफलता कवियों और शायरों को मिली, उतनी सफलता कथाकारों को नहीं मिल सकी। इसका एक कारण यह हो सकता है कि कथाकारों की कथा का कैनवॉस अत्यधिक विस्तृत होता है और इनमें ‘शब्दों की महत्ता’ सर्वोपरि होती है, जबकि सिनेमा में ऐसा नहीं होता। सिनेमा को अपने समूचे विस्तार को दो से तीन घण्टों के भीतर दृश्यों के माध्यम से समेटना होता है और यहाँ शब्द से अधिक महत्त्वपूर्ण ‘अभिव्यक्ति’ और ‘प्रस्तुति’ होती है।
नाटक के चारों अवयव – वाचिक, सात्त्विक, कायिक और आहार्य सिनेमा में आकर शब्दों, अलंकारों पर भारी पड़ने लगते हैं। सिनेमा दृश्य-श्रव्य माध्यम है और साहित्य पाठ्य माध्यम। यह अन्तर न समझ पाने वाले लेखक अथवा फिल्मकार इस रास्ते पर चलकर असफलता का स्वाद चखते हैं। फिल्मी नज़रिए से नाटक और एकांकी ही सिनेमा के सबसे नज़दीकी सम्बन्धी दिखाई देते हैं। वहीं कवियों और शायरों के लिए ऐसी कोई बन्दिश है ही नहीं। उन्हें तो किसी ‘सिचुएशन’ के मुताबिक गीत या गज़ल भर लिखनी होती है और सिनेमा के अन्य ज़रूरी आयामों से उन्हें कोई लेना-देना नहीं होता।
साहित्य और सिनेमा के अन्तर्सम्बन्धों पर गुजराती फिल्म समीक्षक बकुल टेलर ने बेहद सारगर्भित टिप्पणी की है। उनका कहना है, “साहित्यिक कृतियों पर बनी फिल्म अपने आप अच्छी हो, ऐसा नहीं होता। वास्तविकता यह है कि साहित्यिक कृति का सौन्दर्यशास्त्र और सिनेमा का सौन्दर्यशास्त्र अलग-अलग हैं और सिनेमा सर्जक भी साहित्यकृति के पाठक रूप में साहित्यिक आस्वाद तत्वों पर मुग्ध होकर उनका सिनेममेटिक रूपांतरण किए बगैर आगे बढ़ जाते हैं।
एक अन्य तथ्य यह भी उल्लेखनीय है कि कई बार गलत पात्र चयन से भी साहित्यिक फिल्मों की आत्मा मर जाया करती है। इसका सबसे सटीक उदाहरण ‘गोदान’ फिल्म का है, जिसमें होरी की भूमिका में अभिनेता राजकुमार को ले लेने से यह फिल्म अविश्वसनीय लगने लगी क्योंकि दमदार डायलॉग बोलने वाले राजकुमार कहीं से भी दीन-हीन होरी के रोल में फिट नहीं थे। इसके अलावा कृति के मुताबिक परिवेश का अंकन भी फिल्मकारों के लिए बड़ी चुनौती होती है। उदाहरण के लिए बंकिमचंद्र की कृति पर बनी ‘आनंदमठ’, विमल मित्र कृत ‘साहब बीबी और गुलाम’, आर. के नारायण के अंग्रेज़ी उपन्यास पर बनी ‘गाइड’, उडि़या लेखक फकीर मोहन सेनापति की रचना पर बनी ‘दो बीघा ज़मीन’ और मिर्ज़ा हादी की उर्दू कृति पर बनी ‘उमराव जान’ फिल्मों की सफलता का सबसे बड़ा कारण परिवेश की समनुरूपता रहा है। साहित्यकारों की एक बड़ी समस्या यह भी है कि वे प्रायः बन्धनों में बँधकर सृजन करना पसन्द नहीं करते। यही कारण है कि वे सिनेमा में जाने से दूर भागते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि उन्हें फिल्म के निर्माता अथवा निर्देशक के दबाव में कहानी में बदलाव करने पड़ सकते हैं। दूसरी समस्या पटकथा लेखकों की है। वे अक्सर अतिनाटकीयता और अतिरंजना को ही फिल्मों की सफलता की एकमेव कसौटी मान लेते हैं। इसका सबसे भोंडा उदाहरण टी.वी. धारावाहिक ‘चन्द्रकान्ता’ का है, जिसमें अतिनाटकीयता और अतिरंजना को बढ़ाने के लिए बाबू देवकीनंदन खत्री के मूल उपन्यास की आत्मा ही नष्ट कर दी गई। एक अन्य बड़ी समस्या यह है कि अधिकांश साहित्यकार फिल्म निर्माण के विभिन्न तकनीकी पहलुओं से प्रायः अनभिज्ञ होते हैं और वे कैमरे की ज़रूरत के मुताबिक कथ्य दे पाने में असफल हो जाते हैं। नवें दशक में आई भूपेन हजारिका की फिल्म ‘रूदाली’ ने समाज, साहित्य और सिनेमा की त्रयी को ‘आर्ट सिनेमा’ के सीमित सांचे से बाहर निकालने में अहम् भूमिका निभाई और इस धारणा को पुनः स्थापित किया कि साहित्य से जुड़ी हुई और समाज का वास्तविक अंकन करने वाली फिल्में भी हिट हो सकती हैं बशर्ते उनमें निहित साहित्यिक संवेदनाओं का सिनेमाई रूपांतरण सफलतापूर्वक किया जाए। बाद में ‘परिणीता’ और ‘थ्री ईडिएट’ जैसी फिल्मों ने इसी धारणा को पुष्ट किया। ‘मोहल्ला लाइव’ कार्यक्रम में अनुराग कश्यप जैसे आज के दौर के फिल्मकार तो यह बात कहने में नहीं हिचके कि हिन्दी का अधिकांश लेखन फिल्मों की दृष्टि से अनुपयोगी है और समकालीन लेखक सिनेमा की ज़रूरतों के मुताबिक लेखन कार्य नहीं कर रहे हैं। कमोबेश यही राय निर्देशक सुधीर मिश्रा और फिल्म समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज की भी है। हमें ऐसी चुनौतियों को गम्भीरता से लेना होगा और साहित्य जगत को अपने भीतर से ऐसे साहित्यकार पैदा करने होंगे, जो फिल्म लाइन की बारीकियों की जानकारी रखते हों और चित्रपट की आवश्यकताओं के मुताबिक पटकथा लेखन करने में सक्षम हों, वरना हम हॉलीवुड की फिल्मों की घटिया नकल और बासी रीमेक फिल्मों अथवा पुरानी कहानियों की भोंडी पुनर्प्रस्तुतियों को देखने के लिए अभिशप्त ।

क्या है व्यापमं घोटाला…?

By Amit Dwivedi@Navpravah.com

व्यापमं  घोटाले की जांच कर रहे पत्रकार अक्षय की संदिग्ध हालत में हुई मौत ने लोगों का उस शक  को यकीन में बदल दिया है जिसमें कहा जा रहा था कि इस घोटाले में ऐसे लोग शामिल हैं जो नहीं चाहते कि उनका असली चेहरा लोगों के सामने आये।

क्या है व्यापमं घोटाला..?
व्यापमं घोटाले की वजह से लगातार हो रही मौतों को लेकर यह बात हर व्यक्ति के मन में आ रही है कि आखिर ये घोटाला है क्या? दरअसल व्यापमं एक प्रोफेशनल एजुकेशन का संक्षिप्त रूप है, जिसके तहत राज्य में प्री-मेडिकल टेस्ट, प्री इंजीनियरिंग टेस्ट और कई सरकारी नौकरियों के एग्जाम होते हैं। यह एक मंडल के  रूप में काम करता है। लेकिन व्यापमं परीक्षा प्रक्रिया ने घोटाले की शक्ल तब अख्तियार कर लिया जब कॉन्ट्रैक्ट टीचर वर्ग-1 और वर्ग-2 और मेडिकल एग्जाम में ऐसे लोगों को उत्तीर्ण किया गया, जिनकी योग्यता परीक्षा में शामिल होने की भी नहीं थी। इस मामले में  सरकारी नौकरियों में करीब हजार से अधिक और मेडिकल एग्जाम में करीब 500 से ज्यादा भर्तियां शक के घेरे में हैं।

घेरे में शिवराज भी-
व्यापमं घोटाले में कई गणमान्यों के इतर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज भी घेरे में हैं। वही इस मामले में हो रहे लगातार मर्डर्स की वजह से मामला और भी पेंचीदा होता जा रहा है।

घोटाले के आग की लपट में ये भी-
इस घोटाले में आईपीएस अधिकारी व डीआईजी आरके शिवहरे, अरबिंदो मेडिकल कॉलेज के विनोद भंडारी, पूर्व मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा और उनके ओएसडी ओपी शुक्ला जैसी शख्सियत पर अंगुलियां उठ रही हैं।

45 लोगों की मौत-
अब तक व्यापमं घोटाले से जुड़े 45 लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें राज्यपाल रामनरेश यादव के बेटे की मौत भी शामिल है। आधिकारिक तौर पर हालांकि 25 मौतों की पुष्टि की गई है। फिलहाल मामला एसआईटी के हाथ में है।

विपक्ष का प्रहार-
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने शिवराज सिंह पर हमला बोला। उन्होंने कहा कि हर मसले की सीबीआई जांच कराने वाले शिवराज अब इस जांच से क्यों कतरा रहे हैं।

अमित शाह बोले, राम मंदिर का मुद्दा सुलझाने के लिए 370 सीटें चाहियें

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि अयोध्या में राम मंदिर निर्माण जैसे अहम मुद्दों को सुलझाने के लिए पार्टी को संसद में दो तिहाई बहुमत चाहिए। शाह ने मोदी सरकार के एक साल पूरे होने के अवसर पर पार्टी मुख्यालय में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में यह बात कही। उनसे पूछा गया था कि मोदी सरकार के एक साल होने के बाद भी पार्टी के अहम मुद्दों पर कोई प्रगति नहीं हुई है।

भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि कोर मुद्दों को सुलझाने के लिए पार्टी को लोकसभा में दो तिहाई बहुमत यानी 370 सीटें चाहिए। उल्लेखनीय है कि भाजपा के प्रमुख मुद्दों में अनुच्छेद 370 हटाना, देश में …।