ब्यूरो | नवप्रवाह.कॉम
मुम्बई | ऑपरेशन टाइगर की कामयाबी के बाद शिवसेना सांसद श्रीकांत शिंदे का राजनीतिक कद राष्ट्रीय स्तर पर तेज़ी से बढ़ता हुआ दिख रहा है। इस पूरे ऑपरेशन का मास्टरमाइंड उन्हें माना जा रहा है। दिल्ली के सियासी गलियारों में अब उन्हें किंगमेकर के तौर पर देखा जा रहा है।
आमतौर पर लाइमलाइट से दूर रहकर संगठन का काम करने वाले श्रीकांत शिंदे इस बार खुलकर सामने आए। उन्होंने उद्धव बालासाहेब ठाकरे (उबाठा) गुट के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए नाराज सांसदों को शिवसेना के पाले में लाने का काम किया। सूत्रों के अनुसार, ऑपरेशन की शुरुआत एक साल पहले ही हो गई थी। शिंदे ने बेहद गोपनीय तरीके से उद्धव गुट के असंतुष्ट सांसदों से संपर्क साधा। इसकी जानकारी उनके कुछ चुनिंदा भरोसेमंद लोगों को ही थी।
क्यों हुए सांसद नाराज ?
श्रीकांत शिंदे की राजनीतिक सूझबूझ ने भांप लिया था कि महाविकास अघाड़ी में कांग्रेस और एनसीपी के बढ़ते प्रभाव से उद्धव गुट कमजोर पड़ रहा है। उनके नेता स्वतंत्र निर्णय लेने में असमर्थ थे, जिससे कई सांसद असहज महसूस कर रहे थे। श्रीकांत शिंदे ने इन सांसदों को ताकत दी, जिससे उनका भरोसा शिवसेना पर बढ़ा।
रणनीतिक रूप से काम करते हुए शिंदे ने उद्धव गुट के 6 नाराज सांसदों का विश्वास जीता। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात का समय तय करने से लेकर कानूनी कागजी कार्रवाई तक, हर पहलू पर उन्होंने खुद निगरानी रखी। दिल्ली से मुंबई तक मीडिया और विपक्ष की नजरों से बचाकर पूरे ऑपरेशन को अंजाम दिया गया।
संसद में मुद्दे मजबूती से रखने के साथ-साथ डॉ. शिंदे ने विदेश में भी देश की छवि बेहतर की है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान विदेशों में भारत का पक्ष रखकर मजबूत समर्थन जुटाया, जिसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उनकी सराहना की थी।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, सांसदों के साथ निरंतर संवाद और संगठनात्मक समन्वय ने इस अभियान को सफल बनाया। डॉ. शिंदे केवल संसदीय राजनीति तक सीमित नहीं, बल्कि रणनीति और राजनीतिक प्रबंधन में भी अहम भूमिका निभा रहे हैं। पार्टी के बड़े फैसलों में उनका सुझाव महत्वपूर्ण माना जाता है। एक सामान्य महिला कार्यकर्ता को राज्यसभा भेजने का निर्णय भी उन्हीं की पहल पर हुआ था।















