अनुज हनुमत | नवप्रवाह.कॉम
लखनऊ | यूपी की सियासत में ‘दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर गुजरता है’ वाली कहावत अभी पुरानी भी नहीं हुई थी कि 2027 के विधानसभा चुनाव की बिसात अभी से बिछनी शुरू हो गई है। लोकसभा चुनाव के नतीजों से उत्साहित विपक्षी खेमे के भीतर से भविष्य की जमीन तैयार करने वाली पहली बड़ी सुगबुगाहट सामने आई है। यह सुगबुगाहट किसी बंद कमरे की नहीं, बल्कि सीटों के बंटवारे के उस ‘जादुई फॉर्मूले’ की है, जो सूबे की राजनीति में नए समीकरण गढ़ सकता है।
कांग्रेस के उत्तर प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम के होठों से निकले एक बयान ने राज्य के राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। संकेतों की मानें तो आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच ‘बराबरी’ के आधार पर सीटों का बंटवारा हो सकता है। लोकसभा चुनाव में जहां समाजवादी पार्टी ‘बड़े भाई’ की भूमिका में थी, वहीं विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस का यह ‘बराबरी का दावा’ यह साफ करता है कि दिल्ली की संजीवनी के बाद अब कांग्रेस यूपी में बैकफुट पर खेलने के मूड में बिल्कुल नहीं है।
पिछले कुछ विधानसभा चुनावों में हाशिए पर रही कांग्रेस अब यूपी में खुद को क्षेत्रीय दलों के रहमो-करम पर नहीं छोड़ना चाहती। लोकसभा में मिले जनसमर्थन को कांग्रेस अपने सांगठनिक पुनरुत्थान के तौर पर देख रही है और बराबरी का दावा इसी बदली हुई आक्रामकता का प्रतीक है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव के लिए यह फॉर्मूला एक बड़ी परीक्षा जैसा होगा। लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी सपा क्या विधानसभा में अपने गढ़ और मजबूत जमीन को कांग्रेस के साथ आधी-आधी सीटों पर बांटने को तैयार होगी? यह देखना दिलचस्प होगा कि पीडीए का नैरेटिव इस नए फॉर्मूले में कैसे फिट बैठता है।
यह सुगबुगाहट बताती है कि विपक्ष यह भांप चुका है कि अगर 2027 में सत्ता विरोधी लहर का फायदा उठाना है, तो आपसी सिरफुटव्वल से बचकर ‘वन-टू-वन’ की सीधी लड़ाई लड़नी होगी। सीटों का जल्द तालमेल गठबंधन को जमीन पर बगावत रोकने और उम्मीदवारों को तैयारी का पूरा मौका देगा।
लोकसभा और विधानसभा के चुनाव दो अलग मिजाज के होते हैं। स्थानीय मुद्दे, क्षेत्रीय क्षत्रपों की महत्वाकांक्षाएं और जमीनी कार्यकर्ताओं का दबाव अक्सर कागजी फॉर्मूलों को बिगाड़ देता है। राजेंद्र पाल गौतम का यह बयान गठबंधन के भीतर भविष्य की सौदेबाजी की शुरुआत है या आपसी सहमति की परिपक्वता, यह तो वक्त बताएगा। लेकिन एक बात साफ है कि यूपी की चुनावी ढोलक पर थाप अभी से पड़नी शुरू हो गई है और इसकी गूंज 2027 तक बनी रहेगी।











