अयोध्या के पास के वन में गर्ग कुल के त्रिजटा नामक एक अत्यंत गरीब ब्राह्मण रहते थे जो मिट्टी खोद कर जीवन यापन करते थे, वे बहुत गरीब थे और कई दिनों तक भूखे रहने की वजह से उनका शरीर अत्यंत दुबला पतला, कमजोर हो गया था। कमजोर शरीर के चलते वह अपना आत्मविश्वास भी खो चुके थे और दान दक्षिणा लेने हेतु नगर और अन्य ग्रामीण क्षेत्रों में जाना भी छोड़ दिया था, उनका जीवन अत्यंत कष्ट में था, पत्नी और बच्चे कई-कई दिन भूखे रहते थे।
एक दिन त्रिजटा की पत्नी ने त्रिजटा को सलाह दी कि उन्हें श्री राम के पास जाकर अपनी वास्तविक स्थिति से अवगत कराते हुए कुछ दान दक्षिणा प्राप्त करना चाहिए। पत्नी की सलाह मानने के बाद त्रिजटा श्रीराम से मिलने के लिए अयोध्या निकल गए। संयोग से यह वही दिन था जिस दिन श्री राम वनवास के लिए जाने वाले थे और वनवास जाने से पहले अपनी संपूर्ण संपत्ति का दान कर रहे थे।
रामानंद सागर कृत धारावाहिक रामायण का एक दृश्य (PC- Sagar Enterprises)
त्रिजटा की स्थिति से अवगत होने के बाद श्रीराम ने त्रिजटा से कहा कि अपनी छड़ी उठाइये और इसे अपनी पूरी शक्ति से दूर तक फेंकिये। आप की छड़ी जितनी गायों के ऊपर से जाएगी, मैं वह सारी गाय आपको दान दे दूंगा.
यह बात सुनकर त्रिजटा को लगा कि श्रीराम उनका उपहास कर रहे हैं और उनके दुर्बल शरीर का मजाक उड़ा रहे हैं। यह बात सुनकर वहां पर उपस्थित कई अन्य लोग त्रिजटा को देखकर हंसने भी लगे। यह देख कर त्रिजटा ने मन में प्रण लिया कि वह पूरी हिम्मत से छड़ी फेंकेंगे। इसके बाद त्रिजटा ने अपनी कमर कसी और छड़ी को भरपूर शक्ति के साथ हवा में उछाल दिया, छड़ी सरयू नदी को पार कर नदी के तट पर घास चर रही लगभग एक हजार गायों के झुंड के पार गिरी। वहां पर उपस्थित सभी लोग त्रिजटा की कमजोर काया की इस अदम्य शक्ति को देखकर आश्चर्यचकित रह गए।
तब श्री राम ने त्रिजटा को गले से लगाया और कहा हे ब्राह्मण बंधु मेरी शर्त का बुरा ना माने,”मैं बस यह चाहता था कि आपको अपनी असाधारण शक्ति का विश्वास हो। मनुष्य के लिए उसका आत्मविश्वास ही उसका सबसे बड़ा अस्त्र है, आत्मविश्वास के बल पर कमजोर स्थिति, कम संसाधन और बुरी परिस्थिति में भी मनुष्य असाधारण कार्यों को अंजाम दे सकता है।”
निष्कर्ष– कुछ भी त्याग दो लेकिन आत्मविश्वास कभी मत त्यागो।
(लेखक बिहार राज्य के मुख्य निर्वाचन कार्यालय में बतौर निर्वाचन अधिकारी कार्यरत हैं.)
एबीवीपी के ऑनलाइन संवाद कार्यक्रम में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा के कुलपति प्रो. रजनीश शुक्ल ने बताया कि ‘पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानव सिद्धान्त’ ही धर्म आधारित दर्शन है। उन्होंने इसे मनुष्य की सार्वभौमिकता के सिद्धान्त की संज्ञा दी है।
लॉकडाउन के चलते प्रो. शुक्ल शनिवार अपने ऑनलाइन कार्यक्रम में अवध प्रान्त इकाई द्वारा एकात्म मानव दर्शन पर अपने विचार प्रस्तुत कर रहे थे। प्रोफेसर शुक्ल के फेसबुक पेज व प्रोफाइल के माध्यम से इस व्याख्यान का सीधा प्रसारण किया गया, जिससे हजारों विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता व दर्शक इस व्याख्यान में सम्मिलित हो लाभ ले सके।
ऑनलाइन व्याख्यान के सम्बोधन के दौरान कुलपति प्रो. रजनीश शुक्ल (PC- Facebook Live)
अपने सम्बोधन में प्रो.शुक्ल ने कहा कि, ‘”पंडित दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानव दर्शन मनुष्य का निर्माण करता है और उसे जोड़कर विश्व व्यवस्था की रचना करता है। यह दर्शन धर्म आधारित होकर अखंड मंडलाकार ब्रहमांड की अवधारणा प्रस्तुत करता है। धर्म ही मनुष्य को विशिष्ट बनाता है। यह मनुष्य और पशु में अंतर भी दर्शाता है।”
व्याख्यान में प्रो. शुक्ल कहते हैं कि पंडित दीनदयाल धर्म की जिस अवधारणा की चर्चा करते हैं, उसमें वह पंथ आधारित समाज या राजव्यवस्था की बात नहीं करते। पंडितजी की दृष्टि में धर्म व्यक्ति के लिए मानव मूल्य है। समाज धर्म में यह परोपकार, करुणा और अहिंसा है। इसी तरह राजधर्म के रुप में यह समस्त समाज को बगैर किसी भेदभाव के विकसित होने का अवसर प्रदान करता है।”
” व्यक्ति अपनी आत्मा को संतुष्ट करते हुए अन्य लोगों के सुख हेतु यत्न कर सके, ऐसी पोषक व्यवस्था को निर्मित करना ही राजधर्म है। एकात्म मानव दर्शन मानव जीवन व सम्पूर्ण सृष्टि के एकमात्र सम्बन्ध का दर्शन है। दुनिया के अन्य सिद्धान्त एकांगी रहे, जिनमें मनुष्य के शोषण की दृष्टि रही। इसी का परिणाम द्वितीय विश्व युद्ध रहा। वहीं पंडित दीनदयाल का सिद्धान्त प्राचीनतम जीवन मूल्यों पर आधारित अधुनातन समाज और भविष्य के जीवन निर्माण के लिए एक दार्शनिक अवधारणा का निर्माण करता है। “
सम्बोधन में प्रो. शुक्ल कहते हैं कि, “एकात्म मानव दर्शन के केंद्र में मनुष्य है। यह अखंडमंडलाकार रचना में एक ऐसी अवधारणा है जो वृत्ताकार न होकर वर्तुलाकार होकर व्यक्ति से समाज, फिर राष्ट्र, विश्व और अंत में सम्पूर्ण ब्रम्हांड को अपने में समाविष्ट किये है। इस अखंडमंडलाकार आकृति में व्यष्टि का सम्पूर्णता के साथ एक नैरन्तरता का संबंध है और इससे विश्व व्यवस्था का निर्माण हो रहा है। इसमें कोई किसी का शोषक नहीं है। इसीलिए इनमे किसी संघर्ष की कोई गुंजाइश भी नहीं है।”
व्याख्यान के उत्तरार्ध में विद्यार्थी परिषद के कुछ सदस्यों ने ऑनलाइन माध्यम से ही कुलपति जी से कुछ सवाल भी किये, जिनका केंद्र बिंदु पंडित दीनदयाल के दर्शन और वर्तमान में उसकी प्रासंगिकता को लेकर था। एक श्रोता ने कोरोना वायरस को भी पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के विचारों से जोड़ने का प्रयास किया एवं कहा कि वह विदेशी व्यापार को मना करते थे। उसने यह भी आशंका व्यक्त की कि कोरोना वायरस विदेशी व्यापार का ही परिणाम हो सकता है।
सभीकी जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए प्रो0 रजनीश शुक्ल ने कहते हैं कि, “पंडित दीनदयाल स्वदेशी के पोषक थे, लेकिन वह अंतरराष्ट्रीय व्यपार के विरोधी कभी नहीं रहे।” उन्होंने आज के कार्यक्रम को कोरोना से न जोड़ने की सलाह दी। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि प्रकृति का अधिकाधिक शोषण ही तमाम विषाणुओं को पैदा करता है।
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद द्वारा डा. भीमराव आंबेडकर की जयंती 14 अप्रैल से लगातार इस तरह का कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। इसके अंतर्गत सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों के माध्यम से संपर्क और संवाद के कार्यक्रम देश भर में आयोजित हो रहे हैं। विद्यार्थी परिषद से जुड़े लोगों का कहना है कि कोरोना के चलते देश में जारी लॉकडाउन तक ये कार्यक्रम इसी प्रकार आयोजित किये जायेंगे ।
तख़सीस इतनी ज़्यादा कि छुप न सकें, नूर ऐसा कि दीदाबाज़ी को जी चाहे, आवाज़ ऐसी कि नाहीद भी खामोश हो और इन सब के बाद भी ज़िन्दगी ऐसी कि कोई हमअसर, हमराज़ न हो। किसी से कह लें अपनी बातें, ऐसा हमसफ़र न हो और छूटते चले जाएँ वो सारे सहारे जो अपने थे कभी। कई दफा ऐसा हो ता है कि सारी खुसूसियत के बावजूद, ज़िन्दगी अंधेरों में ग़र्क़ होती चली जाती है। ऐसा इसलिए भी होता है क्योंकि इस तरीके का इंसान खुले दिल का होता है और उसे दुनियादारी की समझ नहीं होती। सुलक्षणा पंडित का ज़िक़्र आते ही ये सारी अफसानों जैसी लगने वाली बातें असल ज़िन्दगी कि बातों में बदल जाती हैं।
सुलक्षणा पंडित (PC- pinterest)
सुरैया और नूरजहां के बाद हिंदुस्तान की फ़िल्मी दुनिया में ऐसी कोई अदाकारा नहीं आयी थी १९७० के पहले, जो देखने में भी खूबसूरती की मिसाल हो और गाने में भी माहिर हो। ये कमी पूरी हुई सुलक्षणा पंडित के आने से।
१९७० के दशक और ८० के दशक के शुरूआती सालों में सुलक्षणा काफी मसरूफ रहीं अदाकारा और गायिका दोनों के तौर पर। इनके पिता प्रताप नारायण पंडित एक मशहूर शास्त्रीय संगीत गायक और विद्वान् थे और इनके चाचा, पंडित जसराज को आज भी हमारे देश का एक नगीना माना जाता है। ये भी मशहूर शास्त्रीय संगीत गायक और विद्वान हैं।
संजीव कुमार के साथ एक फिल्म के दृश्य में सुलक्षणा पंडित (PC- pinterest)
सुलक्षणा, १९५४ में पैदा हुईं और घर में बहुत ही अच्छा माहौल था संगीत सीखने और सिखाने का तो इन्होने बाक़ायदा, संगीत की तालीम, अपने भाई बहनों के साथ ली। छोटी सी उम्र में ही १९६७ में आयी फिल्म,”तक़दीर’ का गाना ,”पापा जल्दी आ आना”, लता मंगेशकर के साथ गाया। १९७० के दशक में इन्होने बतौर अदाकारा और गायिका काम करना शुरू कर दिया और अपने समय के लगभग सभी बड़े सितारों के साथ काम किया। जीतेन्द्र, संजीव कुमार, विनोद खन्ना, राज बब्बर और कई बड़े सितारों के साथ इन्होने अदाकारा के तौर पर काम किया और इसी दौरान ये रफ़ी साहब, किशोर कुमार, शैलेन्द्र सिंह, येसुदास और कई गायकों के साथ गए भी रही थीं।
” पूरे ७० के दशक में इनके हुनर और इनकी खूबसूरती के चर्चे रहे। १९८१ आते आते, इनकी बहन विजेता पंडित, कुमार गौरव के साथ “लव स्टोरी” में काम कर के रातों रात मशहूर हो चुकी थीं। सब कुछ ख्वाब जैसा हसीं चल रहा था और इसी दौरान इन्होने कई फिल्में कर ली थीं। सबसे ज़्यादा इन्होने संजीव कुमार के साथ काम किया। ये उनके साथ ७ फिल्मों में ने आयीं। सुलक्षणा, संजीव कुमार के साथ ज़िन्दगी बिताना चाहती थीं पर उन्होंने मना कर दिया। यहीं से सुलक्षणा टूट गयीं और उनका ध्यान काम से हटने सा लगा।”
सुलक्षणा बहुत अच्छा कर रही थीं। उन्हें दूसरी भाषाओं की भी फिल्में मिल रही थीं। १९८० में उन्होंने ग़ज़लों का एक एल्बम भी निकला जिसका नाम “जज़्बात” था। इसके पहले १९७५ में वे अपने गाने के लिए फिल्मफेयर अवार्ड भी जीत चुकी थीं। लेकिन संजीव कुमार का इनकार वे सह न पायीं। समय बीतता गया और धीरे धीरे उन्हें काम मिलना कम होता चला गया। फिर एक वो भी समय आया जब काम मिलना बिलकुल बंद ही हो गया।
सुलक्षणा पंडित (PC- Google)
इनके तीन में से दो भाई जतिन और ललित बहुत मशहूर म्यूजिक डायरेक्टर बने और कई लोगों को मौके भी दिए, लेकिन अपनी बहन सुलक्षणा के लिए कुछ ख़ास नहीं किया। १९९६ में आयी फिल्म “ख़ामोशी”, के एक गाने में आलाप उन्होंने अपनी बहन से गाने को कहा। इसके अलावा कोई बड़ा काम तो उन्हें नहीं दिया। एक समय बिलकुल बेज़ार होकर, सुलक्षणा अपने अपार्टमेंट के फ्लैट में रह रही थीं, जिसमे कोई फर्नीचर तक नहीं था। इनकी बहन और बहनोई ( विजेता पंडित और मशहूर म्यूजिक डायरेक्टर आदेश श्रीवास्तव), ने उनको अपने पास रखना शुरू किया और मशहूर अदाकार जीतेन्द्र ने सुलक्षणा का वो फ्लैट बिकवाया जिससे उनकी हालत बेहतर हुई। आदेश उनके साथ एक बड़ा कम करने की सोच ही रहे थे कि उनकी ज़िन्दगी भी ठहर गयी और वे इस दुनिया से चले गए।
अभी भी सुलक्षणा अपनी बहन के ही साथ रहती हैं, एक बार गिर जाने के कारण, अब वे ठीक से चल नहीं पातीं और बहुत कम निकलती हैं। २०१७ में उनकी आवाज़ एक रेडियो इंटरव्यू में सुनाई दी थी। अब उनकी ज़िन्दगी को देख कर, सुदर्शन फ़ाकिर का एक शेर याद आता है:
“ज़िन्दगी कुछ भी नहीं,फिर भी जिए जाते हैं,
तुझपे ऐ वक़्त हम, एहसान किये जाते हैं “
-डॉ० कुमार विमलेन्दु सिंह
(लेखक जाने-माने साहित्यकार, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)
पीएम मोदी ने 14 अप्रैल को देश को संबोधित करते हुए, लॉकडाउन को 3 मई तक बढ़ाने की घोषणा कर दिया था, पहला लॉकडाउन 21 दिन का था और दूसरा लाकडाउन 19 दिन का है।
पीएम ने जब 24 मार्च को 21 दिन के लॉकडाउन की घोषणा की थी, तो उन्होंने कहा था कि यह 21 दिन लोगों के 21 साल के भविष्य का फ़ैसला करेंगे। ये 21 दिन अगर लोग साथ देंगें तो हम कोरोना से लड़ने में बहुत हद तक साथ दे सकते हैं।
21 दिनों का लॉकडाउन का पार्ट-1 पूरा हो गया है और दूसरा चल रहा है, दूसरा लाकडाउन 19 दिनों का है, पीएम ने अपने इस बार के घोषणा में कहा था कि यदि लोग दूसरे लाकडाउन का पालन अच्छे से करते हैं तो कुछ चीजों में छूट दी जायेगी और लाकडाउन जल्द से जल्द खत्म होगा।
पीएम मोदी ने जनता से अपील की थी कि, वो कोरोना वायरस के ख़िलाफ काम कर रहे लोगों के लिए घर से थाली या ताली बजाएं, तो यह हुआ भी, लोगों ने बड़े उत्साह से पीएम की इस बात को मानकर किया, इसके बाद पीएम ने देश की जनता से अपील की, कि कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ एक उमंग और जोश जगाने के लिए घर की बत्तियां बंद करके छत या दरवाज़े से दीप, टॉर्च, मोमबत्ती या मोबाइल की फ़्लैशलाइट जलाये, इसे भी जनता ने बड़े उत्साह के साथ किया। दूसरे लॉकडाउन में ऐसा कुछ होगा या नहीं होगा, अभी कुछ कहा नहीं कहा जा सकता है।
अभी भी देश के कई हिस्सों में मज़दूर और आम लोग फंसे हुए हैं, यह अभी साफ़ है कि पहले लॉकडाउन की तरह ही दूसरे लॉकडाउन में उन मज़दूरों को घर भेजने के लिए सरकार की कोई योजना नहीं है।
लॉकडाउन बढ़ाने को लेकर दिए गए भाषण में पीएम मोदी ने दोहराया था कि देश में अनाज और दवाओं की कमी नहीं है इसलिए परेशान होने की ज़रूरत नहीं है, पहले की तरह ही खाने-पीने के ज़रूरी सामानों और दवाइयों की ख़रीदारी के लिए कोई रोक नहीं होगी।
पीएम ने पहले लाकडाउन में कहा था कि, देश में सभी प्रकार का यातायात का साधन बंद रहेगा, इसके बाद रेलवे ने 31 मार्च तक अपनी सभी ट्रेनें रद्द कर दी थीं, जिसके बाद इसे बढ़ाकर 14 अप्रैल कर दिया था, और दूसरे लाकडाउन में रेल मंत्रालय ने ये साफ़ कर दिया है कि, मालगाड़ियों को छोड़कर सभी तरह की ट्रेनों का परिचालन 3 मई की आधी रात तक के लिए बंद कर दिया गया है, वहीं नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने भी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उड़ान को भी 3 मई तक बंद रखने की घोषणा की है।
पीएम ने कहा कि, 20 अप्रैल तक देश के हर गली, मोहल्ले को बारीकी से परखा जाएगा कि, लॉकडाउन का कैसे पालन हो रहा है और जहां कोरोना वायरस के मामले नहीं होंगे, उन इलाक़ों को कुछ छूट दी जाएगी, हां यह छूट सशर्त दी जाएगी और अगर ये शर्तें टूटेंगी तो उनसे छूट छीन ली जाएगी, लेकिन पहले लॉकडाउन में ऐसा नहीं था।
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद ने पहले लाकडाउन के वक्त कहा था कि, उसकी क्षमता हर रोज़ 13,000 टेस्ट करने की है और वो हर दिन 25,000 टेस्ट तक कर सकता है, हालांकि, आईसीएमआर का कहना है कि वो अपनी क्षमता 1,00,000 टेस्ट प्रतिदिन करना चाहता है जिसके लिए उसे टेस्ट किट की ज़रूरत है जो अगले कुछ दिनों में चीन से आने वाली है।
दूसरे लॉकडाउन में टेस्टिंग कितनी तेज़ होगी यह तो वक़्त ही बताएगा लेकिन प्रधानमंत्री ने लोगों को कहा है कि वो धैर्य बनाकर रखें क्योंकि वो उनका साथ मांग रहे हैं, अगर लोगों ने उनका साथ दिया तो वो इस बीमारी से लड़ पायेगें।
इस फ़ानी दुनिया में ख़ूबसूरती एक खु़लूक़ की तरह, उम्र के साथ गुज़र जाती है और रह जाती हैं यादें , माज़ी की। मुन्कज़ी साल मसलसल आँखों में ख़्वाबों की तरह भरते हैं और फिर से उस वक़्त को जी लेने की ललक उठती है। दुनिया के दानिशमंदों ने अब तक ऐसी कोई सूरत या तरकीब नहीं बनायी है गुज़रे वक़्त में जाने की, लेकिन कभी कभी शिद्दत इतनी ज़्यादा होती है कि गुज़रा हुआ वक़्त वही सारे अंदाज़ लेकर वापस आता है। कुछ ऐसी ही दास्ताँ है, परी-चेहरा, नसीम बानो की।
नसीम बानो (PC- Wikipedia)
“परी-चेहरा”, ये नाम उन्हें उनकी खू़बसूरती की वजह से दिया गया था और नसीम बानो की फ़िल्मों के इश्तेहारों में उनका नाम इसके साथ ही लिखा जाता था। नसीम बनो की माँ का नाम शमशाद बेगम था लेकिन वे छमियां बाई के नाम से पुरानी दिल्ली में मशहूर थीं और उनका पेशा गाने बजाने का था। वे अपने दौर में बहुत मशहूर थीं। नसीम के वालिद, हसनपुर के नवाब अब्दुल वहीद खान थे।
जब नसीम पैदा हुई थीं तो इनका नाम रोशन आरा बेगम रखा गया था। ये 1916 की बात है। नसीम की माँ ने उनका दाखिला एक अच्छे से स्कूल में कराया और वे इन्हे डॉक्टर बनाना चाहती थीं। लेकिन नसीम का ध्यान तो फिल्मों में ही था। एक बार जब उनका बम्बई (अब मुंबई) जाना हुआ और उन्होंने शूटिंग देखी, उन्होंने मन में ये तय कर लिया की उन्हें काम करना तो फिल्मों में ही है।
वे इतनी खूबसूरत थीं की शूटिंग के दौरान ही सोहराब मोदी जैसे अज़ीम फ़नकार ने उन्हें फ़िल्मों में काम करने की दावत दे दी। नसीम की माँ इसके लिए बिलकुल राज़ी न थीं लेकिन उनकी ज़िद के आगे उन्हें मानना ही पड़ा और उन्होंने इजाज़त दे दी।
सोहराब मोदी ने अपनी कंपनी मिनर्वा मूवीटोन के लिए नसीम के साथ क़रार किया और ठीक इसके बाद, 1935 में आयी फिल्म “खून का खून”, जो कि अंग्रेज़ी नाटक “हैमलेट” पर आधारित थी। नसीम का किरदार, “ओफीलिया” का था और उनकी खूबसूरती और अदाकारी कि खू़ब तारीफ़ हुई। इसके बाद उन्होंने 1938 तक, “खान बहादुर”, “तलाक़” और “मीठा ज़हर” जैसी फ़िल्मों में काम किया लेकिन उन्हें शोहरत मिली नूरजहां का किरदार निभाने के बाद, जो उन्होंने फ़िल्म “पुकार” में निभाया। उनकी खूबसूरती और बेहतरीन अदाकारी के इतने चर्चे थे कि उन्हें ढेर सारी फिल्मों के लिए बुलाया जाने लगा लेकिन सोहराब मोदी उन्हें क़रार से आज़ाद करने को तैयार न थे। इस बात से दोनों में कुछ अनबन हुई।
१९३८ की नसीम बानो अभिनीत फ़िल्म “मीठा ज़हर” का पोस्टर (PC- Cinestaan)
कुछ समय बाद नसीम ने मुहम्मद एहसान के साथ, जो अब उनके शौहर भी थे, ताज महल पिक्चर्स की शुरुआत की और कई फिल्में बनाईं। इसके पहले उन्होंने फ़िल्मिस्तान जैसे स्टूडियो में काम भी कर लिया था तो उन्हें तजुर्बा भी था। 1942-53 तक वे अपने शौहर के साथ मिलकर फिल्में बनाती रहीं। “उजाला”, “अजीब लड़की”, “चांदनी रात” जैसी कई फिल्में बनाईं। मिनर्वा कंपनी के ही बैनर तले, 1957 में आयी फिल्म ,”नौशेरवां-ए-दिल”, इनकी आखिरी फिल्म साबित हुई क्योंकि इसके पहले कुछ निचले स्तर की, जादुई क़िस्म की फिल्में जैसे, “सिंदबाद जहाज़ी” और “बाग़ी” में, जो कि उनके अपने ही प्रोडक्शन में बनी थी, दर्शकों ने नकार दिया और खूबसूरत नसीम ने जान लिया कि सभी रोशनियों की उम्र होती है और बेहतर है कि बुझ जाने के पहले अपनी लौ से एक और शमा रौशन की जाए।
1957 में अदाकारी को अलविदा कहने के बाद इन्होने 1961 से बतौर ड्रेस डिज़ाइनर का काम करना शुरू किया और फिर एक परी- चेहरा बनाया, जिसे उन्होंने पैदा भी किया था और संवारा भी था। ये थीं इनकी बेटी, जो मशहूर अदाकारा बन जाने वाली थीं और नाम था सायरा बानो। नसीम के बाद आज तक कई खूबसरत अदाकाराएं आयीं , लेकिन परी-चेहरा का ख़िताब सिर्फ़ सायरा बानो को ही दिया गया। इसके लिए नसीम ने अपने शौहर से भी दूर रहना मंज़ूर किया था और बंटवारे के वक़्त, पाकिस्तान न जा के, हिन्दोस्तान में ही रह कर अपने बच्चों की परवरिश की।
बेटी सायरा बानो के साथ नसीम (PC- Hamara Photos)
नसीम बानो की खूबसरती और उनकी सलाहियत सायरा बानो में भी आयी और इसी सुकून की बात के साथ, एक तवील उम्र जी कर, वो खूबसूरत अदाकारा 2002 में इस जहाँ से उस जहाँ को चली गयीं।
“अगरचे फ़ानी है दुनिया तो हुआ करे
आते हैं लौट कर, ताब-ओ-अदब”
–विमलेन्दु
(लेखक जाने-माने साहित्यकार, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)
कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और जेडीएस नेता एचडी कुमारस्वामी के बेटे निखिल की शादी सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ाते हुए आज हो गयी। लॉकडाउन के बीच हुई इस शादी के लिए कर्नाटक सरकार ने सशर्त अनुमति दी थी।
एचडी कुमारस्वामी ने पहले से ही कहा था कि शादी बेहद सादे समारोह में होगी और सिर्फ परिवार के लोग ही इसमें शिरकत करेंगे, लॉकडाउन और कोरोना संकट के बीच हो रही इस शादी के लिए राज्य सरकार ने दिशा-निर्देश जारी किए थे।
इस शादी के लिए कर्नाटक सरकार ने संबंधित प्राधिकरण को वहां पूरे कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग कराने को कहा था। सरकार के मुताबिक, यदि इस दौरान नियमों का उल्लंघन होता है तो कार्रवाई की जाएगी। बंगलूरू में स्थित कुमारस्वामी के आवास पर कल से ही शादी की रस्में शुरू हो गई थीं।
कुमारस्वामी के बेटे की शादी रेवती से हो रही है, जो कांग्रेस नेता और एम कृष्णप्पा की पोती हैं। कृष्णप्पा इससे पहले कर्नाटक के आवास मंत्री के रूप में कार्य कर चुके हैं, वह कृष्णप्पा की भतीजी मंजू और श्रीदेवी की बेटी हैं। निखिल और रेवती की शादी में पारिवारिक सदस्य मौजूद रहे और शादी काफी सादगी से हुई, दोनों परिवारों ने रामनगर के जनपडा लोक के पास एक भव्य शादी समारोह करने का फैसला किया था।
लॉकडाउन से पहले कुमारस्वामी का परिवार शादी की समारोह की तैयारियों में जुटा हुआ था। यह शादी एक बड़े पैमाने में होने वाली थी, लेकिन लॉकडाउन के चलते ऐसा नहीं हुआ, लेकिन शादी का आज का दिन वहीं रखा गया। लोगों के एक तबके के अनुसार, ये शादी सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ाते हुए हुई है, कुछ लोगों ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि क्या लॉकडाउन हम गरीबों के लिए है, अमीरों से इससे कोई मतलब नहीं है।
हालांकि कुमारस्वामी ने यह संकेत दिया है कि आगे चलकर जब स्थितियां अनुकूल होंगी तो एक सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित होगा, ताकि उनके करीबी और शुभचिंतक शादीशुदा जोड़े को आशीर्वाद दे सकें, इसलिए अभी एक एक भव्य रिसेप्शन टाला जा रहा है।
कोरोना वाइरस की वजह से लॉकडाउन की स्थिति बनने के कारण कई देशों के लोग जगह-जगह फंसे हुए है। सभी अपने-अपने देश लौटने के लिए परेशान हैं। भारत ने ऐसे फंसे हुए लोगों की तकलीफ को ध्यान में रखते हुए 41 पाकिस्तानी नागरिकों को अपने वतन लौटने की अनुमति दे दी, जिसके बाद उन्हें पाकिस्तान भेज दिया गया।
भारत से 150 पाकिस्तानियों में से 41 अपने देश लाहौर आ गए, जो लोग वापस लौटे हैं, उनमें मुस्लिम, सिख और हिंदू शामिल हैं, उनकी यात्रा का मकसद धार्मिक कार्यक्रम में शिरकत करना था।
भारत ने इन पाकिस्तानियों को वापस जाने में पूरा सहयोग किया है, ताकि वे अपने वतन को जल्द से जल्द लौट सकें। दिल्ली स्थित पाकिस्तानी उच्चायोग ने लॉकडाउन की वजह से भारत में फंसे पाकिस्तानियों की देश वापसी कराने की प्रक्रिया पर निगरानी रखा और बताया कि बाकी रह गए पाकिस्तानी जल्द ही वापस भेजे जाएंगे।
विदेश मंत्रालय इन पाकिस्तानी नागरिकों को उनके देश भेजने की कोशिश में हरहाल में जुटा है। भारत अपनी दरियादिली दिखाते हुए अपने यहां फंसे पाकिस्तानी नागरिकों को उनके देश वापस लौटने की व्यवस्था कर रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, ये लोग दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश में फंसे थे और उनकी पाकिस्तान वापसी सुनिश्चित करने को लेकर विभिन्न राज्यों को विदेश मंत्रालय की ओर से एक पत्र भी लिखा गया था।
विदेश मंत्रालय की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया है कि पाकिस्तान लौटने वाले सभी लोगों की अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार, स्क्रीनिंग हुई और आगे भी होगी, और केवल ऐसे लोगों को ही घर वापसी की अनुमति होगी, जिनमें कोरोना वायरस से संक्रमित होने के लक्षण नहीं होंगे।
“क़सीदा” से शुरू होकर “ग़ज़ल” बन जाने तक, अल्फ़ाज़ों का सफ़र बेहद दिलचस्प है और ग़ज़लों का ज़िंदगी में, इस क़दर शामिल हो जाने का क़िस्सा भी|
अरब के देशों से जब क़सीदा पढ़ने का चलन, एक तवील सफ़र के बाद हमारे देश पहुंचा, उसमें काफ़ी तब्दीलियां हो चुकी थीं और ग़ज़ल नमूदार हो चुकी थी| इस बीच जो हुआ वो तफ़सील से कहने वाली एक कहानी है लेकिन जो इसके बाद हुआ, उसने ग़ज़लों को हर ज़ुबान और हर दिल तक पहुंचाया|
एक सम्मान समारोह में कुलदीप सिंह (PC-YouTube)
मीर, ग़ालिब, मोमिन, ज़ौक़ के दीवानों से निकल कर बहादुरशाह ज़फ़र के क़िले के मुशायरों से होते हुए, जब अश’आर तवायफ़ों के कोठों तक पहुंचे, तब इन्हें “मुजराई ग़ज़ल” के नाम से जाना गया और जो सबसे बेहतरीन बात हुई, वो थी, अल्फ़ाज़ों को मौसिक़ी का साथ मिलना| ये कहना भी ग़लत न होगा कि ग़ज़लें यहीं से मशहूर हुईं|
उर्दू के अदीबों ने इसे संभाले रखा और जब हमारे यहाँ (भारत में) सिनेमा आया और उसमें मौसिक़ी को जगह मिली, ग़ज़लों का दायरा और बड़ा हो गया और ये हर ख़ास और आम शख़्स के ज़िंदगी का हिस्सा बन गईं|
फ़िल्मों में ग़ज़लों का इस्तेमाल होता आया था लेकिन ये सारे ग़ज़ल बीते ज़माने के बड़े शायरों के हुआ करते थे, मसलन ग़ालिब, मीर वगैरह के| बाद में भी जिन शायरों की ग़ज़लों को फ़िल्मों में लिया गया, वो फ़ैज़, साहिर, जानिसार अख़्तर, मजरूह जैसे बड़े अदीब थे, जिनको समझने के लिए दिमाग़ के मशक़्कत और तालीम के असर की ज़रूरत थी| लेकिन 80 के दशक के शुरूआत से ही ऐसी ग़ज़लें फ़िल्मों के लिए लिखी जाने लगीं जिसके मायने सब को समझ आने लगे, और ऐसे शायरों में जावेद अख़्तर और गुलज़ार का नाम आता है, कुछ ऐसे गुलूकार हुए जिनकी आवाज़ सबको जानी पहचानी सी लगी| जगजीत सिंह, भुपिन्दर, ग़ुलाम अली जैसे फ़नकारों का नाम इस फ़ेहरिस्त में आता है, लेकिन बस वाहिद नाम है, जिसकी मौसिक़ी ने ग़ज़लों को उम्र बख़्शी और हमेशा के लिए सबकी ज़िंदगी के पुरसुकून लम्हों में शामिल कर दिया| वो नाम है, कुलदीप सिंह जी का|
नाटक ‘आख़िरी शमा’ के एक किरदार में कुलदीप सिंह (PC- Facebook)
1982 में फ़ारूक़ शेख़ और दीप्ती नवल ने फ़िल्म साथ-साथ में काम किया और इस फ़िल्म में एक ग़ज़ल थी, जिसे जगजीत सिंह जी ने गाया था और शायर जावेद अख़्तर थे, इस ग़ज़ल में जो सुकून और रुमानियत भरी मौसिक़ी थी, वो कुलदीप सिंह जी की ही थी| वो ग़ज़ल थी, “तुमको देखा तो ये ख़याल आया”| जिसे भी ज़रा भी दिलचस्पी है ग़ज़लों में वो आज भी ये ग़ज़ल ज़रूर सुनता है| ग़ज़ल गायकी में बेशक मेहदी हसन और बेग़म अख़्तर का कोई सानी नहीं, लेकिन ये ग़ज़ल आवाम के दिल और दिमाग़ में चस्पा हो गई|
कुलदीप सिंह जी ने 1986 में आई फ़िल्म अंकुश में भी अपने हुनर का जादू दिखाया और इसका एक गाना, “इतनी शक्ति हमें देना दाता”, इतना मक़बूल हुआ कि आज भी कई बैंकों में इसे बतौर थीम सौंग रखा गया है| इन्होंने IPTA के लिए लगातार काम किया और 2009 में इन्हें संगीत नाटक अकादमी अवार्ड से भी नवाज़ा गया| इनके बेटे जसविंदर सिंह भी एक मशहूर ग़ज़ल गायक हैं|
बेटे जसविंदर सिंह और सुरेश वाडकर के साथ कुलदीप सिंह (PC- Facebook)
वैसे तो कई लोगों ने बहुत अच्छा काम किया ग़ज़लों और मौसिक़ी की दुनिया में लेकिन जिन्होंने आज़ाद हिंदुस्तान में ग़ज़लों को सबका बनाया और सब को ग़ज़लों से आशना किया, उनमें कुलदीप सिंह जी का नाम हमेशा लिया जाएगा|
उनके लिए उनके ही बनाए हुए सुर-ताल में डूबे अल्फ़ाज़,
“…एक मैं क्या, अभी आएंगे दीवाने कितने
अभी गूंजेंगे, मोहब्बत के तराने कितने…”
(लेखक जाने-माने साहित्यकार, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)
ज़िन्दगी जब जश्ने अज़ीम की तरह गुज़रे और हर वक़्फ़े में खुसूसियत आपका आक़िब हो, आप से रोशन हो, सब जो दूर हो या जिसको आपकी क़ुरबत नसीब हो, तब भी वहम को नमूदार जानिये, भले ही वो छिपा हो आने वाले लम्हों के लिबास में। कब समां बदल जाए और आपका ज़हीन होना ही आपकी परेशानी का सबब हो जाए, ये कोई नहीं जानता। कई बार ये भूल चुके होते हैं चाँद के लिए क़सीदे पढ़ने वाले, कि, वो भी रोशन आफ़ताब से ही है। ऐसा ही एक नूर-ए-आफ़ताब , ऐसी ही एक ग़ैरत-ए-तरन्नुम थीं, शमशाद बेगम, जिनकी आवाज़ के साये में कितनी ही आवाज़ों ने तरबियत पायी और फिर अचानक क़िस्मत ने एक ऐसी ख़ामोशी भर दी इनकी ज़िन्दगी में कि, वो कशिश भरी आवाज़ फिर सुनाई न पड़ी।
शमशाद बेगम (PC- The New York Times)
शमशाद बेगम , 14 अप्रैल, 1919 को, यानि कि जलियांवाला बाग़ के क़त्ल-ए -आम के ठीक एक दिन बाद पैदा हुईं। इनके वालिद एक मैकेनिक थे। बचपन से ही इन्हे गाने का बहुत शौक़ था लेकिन घर में इसे अच्छा नहीं माना जाता था। 16 साल की उम्र में इनके एक चाचा, जो की ग़ज़लों के शौक़ीन थे, इन्हे लेकर ज़ेनफोन स्टूडियो गए और वहां शमशाद बेगम ने मशहूर मौसीक़ार ग़ुलाम हैदर को बहादुर शाह ज़फर की ग़ज़ल, “मेरा यार मुझे मिल जाए अगर, सुनाई। हैदर साहब को इनकी आवाज़ बहुत पसंद आयी और कई गानों का क़रार उन्होंने कर लिया। ये 1931की बात है, इसके बाद कई सालों तक शमशाद गाती रहीं और लोगों के दिलों तक उनकी आवाज़ जाती रही। इनके वालिद ने इनसे वादा लिया था कि ये कभी कैमरा के सामने नहीं जाएंगी और हमेशा बुर्क़े में ही गाएंगी। ये वादा तो इन्होने कर दिया लेकिन शादी इन्होने एक हिन्दू से कि जिनका नाम था गणेश लाल बत्तो। इस शादी के खिलाफ बहुत लोग थे लेकिन फिर भी ये शादी हुई।
बंटवारे के बाद ग़ुलाम हैदर पाकिस्तान चले गए, लेकिन शमशाद यहीं रहीं और मुंबई को अपने रहने के लिए चुना क्योंकि तब तक उन्होंने फ़िल्मों में गाना शुरू कर दिया था और मशहूर भी हो चुकी थीं। 1941-47 के बीच इन्होने कई फिमों में गाया जिसमे “खजांची , “ख़ानदान” और “तक़दीर”, बहुत मशहूर हुए। “तक़दीर “, 1943 में आयी थी और ये इसलिए भी यादगार है कि इसी फिल्म में पहली बार नरगिस दिखीं और शमशाद बेगम ही उनकी आवाज़ थीं।
आज़ादी के बाद से 1960 तक ये लगातार कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ रही थीं, हालांकि 1955 में एक रोड एक्सीडेंट में इनके शौहर के गुज़र जाने के बाद इनकी रफ़्तार बहुत धीमी हो गयी। इन्होने नौशाद साहब के शुरूआती दिनों में उनकी बहुत मदद की थी और उन्होंने भी शमशाद बेगम को ताउम्र इज़्ज़त बख़्शी। 1957 में आयी फ़िल्म “मदर इंडिया” के 12 में से 4 गाने इन्हीं को दिए। “गाड़ी वाले गाड़ी धीरे हाँक रे”, आज भी उसी मोहब्बत से सुना जाता है। 1960 में आयी फिल्म मुग़ल-ए-आज़म में लता मंगेशकर के साथ गाया, इनका गाना,”तेरी महफ़िल में क़िस्मत आज़मा के हम भी देखेंगे”, आज भी बेहतरीन और ताज़ा लगता है।
शमशाद बेगम (PC-Cinestaan)
इन गानों के अलावा इन्होने कई गाने गाये जो, जिन्हें आज भी नए कलेवर में बार बार पेश किया जाता है। इनके कुछ मशहूर गाने जो कभी भी नहीं भूल पायेगा कोई:
“ले के पहला पहला प्यार”
“मेरे पिया गए रंगून”
“कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना”
“सैयां दिल में आना रे”
“रेशमी सलवार कुरता जाली का”
“कजरा मोहब्बत वाला”
इनके अलावा भी कई ऐसे गाने हैं जो हमेशा गाये जाते रहेंगे और इनकी याद दिलाते रहेंगे। शौहर के गुज़र जाने के बाद ये बिलकुल टूट गयीं और बहुत से ऐसे मौसीक़ार जो इनके साथ काम करना चाहते थे, वो इन्हें उतने पैसे नहीं दे पाते थे जो इनकी फ़ीस थी। इनकी जगह बहुत सारा काम, लता मंगेशकर और आशा भोंसले को मिलने लगा, क्योंकि वे गाती भी अच्छा थीं लेकिन बड़ी वजह ये थी कि वे पैसे भी इनसे काम लेती थीं। शमशाद बेगम का इतना असर था की शुरुआती दौर में लता मंगेशकर भी इन्ही के अंदाज़ में गाने की कोशिश करती थीं, क्योंकि डायरेक्टर भी यही चाहते थे।
1940-42 के बीच मदन मोहन और किशोर कुमार इनके साथ कोरस में गाते थे। वे उस वक़्त बहुत छोटे थे। उसी वक़्त शमशाद बेगम ने कह दिया था की मदन मोहन बहुत अच्छे संगीतकार बनेंगे और वे उनसे कम फ़ीस लेकर उनके लिए गा दिया करेंगी। किशोर कुमार के बारे में भी उन्होंने कहा था की आने वाले समय के सितारे वही होंगे।
इतनी समझ और खुशदिली होने के बाद भी उन्हें काम मिलना बंद होता चला गया और उन्होंने अपना ध्यान अपनी बेटी की परवरिश में ही लगा दिया। 2009 में उन्हें पद्म भूषण मिला और 2013 में वे गुज़र गयीं। ठीक एक साल पहले 2012 में एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा था, “मेरे गाने जब मशहूर होने लगे तो मैंने किसी म्यूज़िक डायरेक्टर को सिर्फ मुझे ही गाने देने के लिए, मजबूर नहीं किया या करवाया जो कि और बहुत से लोगों ने किया, क्योंकि मेरा मानना है की दे बस ऊपर वाला सकता है” उनकी इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि उन्हें फ़िल्मी दुनिया के कुछ रिवाज़ों से चोट पहुंची थी। एक इंटरव्यू में उनकी बेटी उषा ने भी कहा था की उनकी माँ कभी नहीं चाहती थीं की वे भी उनकी तरह फिल्मों में काम करें क्योंकि उस दुनिया के रिवाज़ अलग हैं, हिसाब अलग हैं। 2016 में इनके नाम और तस्वीर के साथ एक डाक टिकट भी जारी किया गया।
शमशाद बेगम पर जारी डाक टिकट (PC-Wikipedia)
कितने अदब से गुज़र गयीं शमशाद बेगम, अपने सारे दुःख और दर्द खुद में समेटे हुए, एक शिकायत छोड़ गयीं लेकिन,जिसका एहसास होता ही रहता है मगर जिसकी शिद्दत का अंदाज़ा लगाना मुश्किल है|
“करेंगे शिकायत किसी और जहाँ में
न तेरी महफ़िल होगी, न तेरा आस्तां होगा”
–विमलेन्दु
(लेखक जाने-माने साहित्यकार, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)
तोड़ देंगे तुम्हारे शरीर का कोना कोना, मगर होने नहीं देंगे तुमको कोरोना।
अमित द्विवेदी | Navpravah.com
कोरोना से जारी जंग में हर कोई अपनी क्षमता के हिसाब से जुटा है। पुलिस से लेकर चिकित्सक और नर्सिंग स्टाफ सभी दिन रात जी जान लगाकर मेहनत कर रहे हैं ताकि कोरोना वाइरस से हो रहे इस युद्ध में देश जीते। इन दिनों सोशल मीडिया पर एक पुलिस के जवान का विडिओ काफी तेज़ी से वाइरल हो रहा है।
इस विडिओ में पुलिस के कांस्टेबल ने लोगों से घर से बाहर न निकलने के लिए एक अपील की है। इस अपील को लोग सीरियस कम, मज़े के लिए ज़्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं। ये विडिओ हाल में आम आदमी पार्टी के सांसद (राज्यसभा) संजय सिंह ने ट्वीट किया था। संजय ने लिखा था कि इस पुलिसवाले की बात का भी अगर आप पर असर ना हुआ, तो आपका बचना मुश्किल है। सुनिए भाई की भावुक अपील।
दरअसल, सांसद संजय सिंह ने जो वीडियो शेयर किया है, उसमें एक पुलिसकर्मी लॉकडाउन के दौरान पेट्रोलिंग करता हुआ दिख रहा है। साथ ही वह कह रहा है कि कोई भी अपने घर से बाहर नहीं निकलेगा। विडिओ में यह पुलिस वाला कहता दिख रहा है कि तोड़ देंगे तुम्हारे शरीर का कोना कोना, मगर होने नहीं देंगे तुमको कोरोना।
देखें विडिओ-
इस पुलिस वाले की बात का भी अगर आप पर असर न हुआ तो आपका बचना मुश्किल, सुनिए “भाई की भावुक अपील” pic.twitter.com/uLNkXB1djW
दरअसल सूरत के उधना थाने के कांस्टेबल प्रवीण पाटिल को भीमनगर स्लम एरिया में भीड़ इक्ट्ठा होने का सन्देश मिला और वो पीसीआर वैन के साथ वहां पहुंच गए। लोग पथराव न करें, इसलिए पीसीआर वैन में लाउडस्पीकर लगाकर वो लोगों से अपने घर जाने की अपील करने लगे। इसी दौरान कॉन्स्टेबल प्रवीण पाटिल ने कहा तोड़ देंगे तुम्हारे शरीर का कोना कोना, मगर होने नहीं देंगे तुमको कोरोना।