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Saturday, September 12, 2026
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भूली हुई यादें- “वनराज भाटिया”

डॉ. कुमार विमलेन्दु सिंह | Navpravah Desk

बीत चुका ज़माना अपनी ख़ूबियों को, अगले ज़माने में ज़ाहिर कर सकने का ज़रिया बना कर ही गुज़रता है और अगली नस्लें, अगर ज़हीन होती हैं, तो समेट लेती हैं नेअमत को और जो भूल जाती हैं अपने जड़ों को और बेख़बर होती हैं, आने वाले वक़्त की करवटों से, उनसे बहुत कुछ छूट जाता है|

साल दर साल, लगातार मौसिक़ी की दुनिया को सजाते रहने वाले, वनराज भाटिया, एक कभी न भूलने वाला अज़ीम नाम है| इन्होंने अपनी शानदार मौसिक़ी से, हिन्दुस्तान की कई पीढ़ियों के सपनों को तरन्नुम में ढाल कर, उनकी ज़िंदगी का हिस्सा बना दिया|

राष्ट्रीय पुरुस्कार विजेता वनराज भाटिया (PC-The Hindu)

1927 में जन्मे, भाटिया, न केवल हिंदुस्तानी क्लासिकल म्यूज़िक बल्कि मग़रिबी मौसिक़ी के भी जानकार हैं| इनकी पढ़ाई बंबई (अब मुंबई) में ही हुई और इन्होंने, अंग्रेज़ी अदब से MA किया, एलफ़िंस्टन कॉलेज मुंबई से| इस दौरान ये हिन्दुस्तानी मौसिक़ी सीखते रहे और इसके बाद ये 1954 तक लंदन और फिर 1958 तक फ़्रांस में भी मौसिक़ी सीखते रहे|

1959 में जब वनराज अपने देश लौटे, तो उन्होंने “शक्ति साड़ी मिल्स” के इश्तिहार के लिए म्यूज़िक दिया| यह पहला भारतीय इश्तिहार था, जिसमें म्यूज़िक का इस्तेमाल हुआ था| इसके बाद वनराज जी ने लगभग, 7000 इश्तिहारों में म्यूज़िक दिया| जिसमें लिरिल, गार्डेन वरेलिया, दिनेश और बहुत सारे ब्राण्ड रहे हैं| इन इश्तिहारों की म्यूज़िक, इतनी असरदार थी कि अब तक हमारे ज़हन में है|

एक टीवी इंटरव्यू में वनराज भाटिया (PC- Rajya Sabha TV)

New Wave Cinema के दौर में इन्होंने फ़िल्मों में भी म्यूज़िक देना शुरू किया| बतौर म्यूज़िक डायरेक्टर, 1974 में आई, श्याम बेनेगल की “अंकुर”, इनकी पहली फ़िल्म थी| इसके पहले 60 के दशक के आख़िरी सालों में, ये दिल्ली यूनिवर्सिटी में म्यूज़िक भी पढ़ा चुके थे| “अंकुर” के बाद इन्होंने “निशांत”, “मंथन”, “जाने भी दो यारों”, “मंडी”, “मैसे साहब” और न जाने कितने ही मशहूर फ़िल्मों में म्यूज़िक दिया| सिनेमा के बदलते दौर में भी, इन्होंने, “घातक”, “दामिनी”, “परदेस” और “चाईना गेट”, जैसी फ़िल्मों में बैकग्राउंड स्कोर भी दिया|

“वनराज भाटिया ने टीवी सीरियल और टेलीफ़िल्मों में भी अपना संगीत दिया. 1987 में आई टेलीफ़िल्म, “तमस” के लिए इन्हें नैशनल अवार्ड भी मिला. 1988 में आई, “वागले की दुनिया” टीवी पर ख़ूब मशहूर हुई. इसके बाद 1993 में आई, “बाइबिल की कहानियां” में भी एकदम सटीक और उचित संगीत दिया, लेकिन 1988 में ही “भारत एक खोज” का गीत, “सृष्टि का कौन है कर्ता”, आज भी कानों में गूंजता है और आज भी अपने साथ बचपन की कई यादें लिए आ जाता है. एक ऐसा ही गीत इन्होंने फ़िल्म “मंथन” में भी दिया था, “मेरो गाम काथा पारे…सुनो सुनो रे”, यही गीत बाद में बहुत दिनों तक AMUL दूध के इश्तिहार में भी इस्तेमाल होता रहा.”

मौसिक़ी सुन कर अपने माज़ी में पहुंच जाना, बेशक धुनों की ख़ूबी बताता है, लेकिन जब बीते हुए ज़माने की किसी ड्योढ़ी पर ठिठक कर, रुक कर, अगर किसी ख़ास राग, धुन या तरन्नुम के आने का, सुनाए जाने का इंतज़ार करते हैं, तो ये हमेशा ज़िंदा रहने का हुनर रखने वाले मौसिक़ार की ख़ूबी है|

93 साल के वनराज, आज भी मुंबई में रहते हैं, और इनके किए गए कामों की फ़ेहरिस्त भी इनके उम्र जितनी, या उससे ज़्यादा ही लंबी है| इन्हें और लंबी उम्र और सेहत नसीब हो|

नोट: वनराज भाटिया ने बहुत सारे विदेशी मौसिक़ारों के साथ भी काम किया है और कई तरीके से म्यूज़िक देते रहे हैं| इस लेख में, सिर्फ टीवी और फ़िल्मों में दिए गए म्यूज़िक की बात की गई है|

(लेखक जाने-माने साहित्यकार, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)

पत्थरबाज़ों की ख़ैर नहीं, सरकार सख़्त, होगी सात साल तक की सज़ा 

पत्थरबाज़ों की ख़ैर नहीं
पत्थरबाज़ों की ख़ैर नहीं
अमित द्विवेदी | Navpravah.com 
स्वास्थ्यकर्मियों पर लगातार हो रहे हमले को लेकर अब केंद्र सरकार ने कड़ा रूख किया है। केंद्रीय कैबिनेट में यह निर्णय किया गया है कि कोविड वॉरीअर्स पर जो भी हमला करेगा, उसको बख़्शा नहीं जाएगा। प्रधानमंत्री की अगुवाई में एक अध्यादेश पास किया गया है, जिसमें ३ महीने से सात साल तक की सज़ा का प्रावधान है। 
केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कैबिनेट बैठक में लिए गए फैसलों की जानकारी दी। जावड़ेकर ने कहा कि कई जगह डॉक्टरों के खिलाफ हमले की जानकारी आ रही हैं, सरकार इन्हें बर्दाश्त नहीं करेगी। सरकार इसके लिए एक अध्यादेश लाई है, जिसके तहत कड़ी सजा का प्रावधान किया गया है।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि मेडिकलकर्मियों पर हमला करने वालों को जमानत नहीं मिलेगी, 30 दिन के अंदर इसकी जांच पूरी होगी। 1 साल के अंदर फैसला किया जाएगा, जबकि 3 महीने से पाँच साल तक की सजा हो सकती है। उन्होंने कहा कि इसके अलावा गंभीर मामलों में 6 महीने से 7 साल तक की सजा का प्रावधान है। यही नहीं, गंभीर मामलों में 50 हजार से 2 लाख तक का जुर्माना भी लगाया जाएगा। अध्यादेश के अनुसार, अगर किसी ने स्वास्थ्यकर्मी की गाड़ी पर हमला किया, तो मार्केट वैल्यू का दोगुना ज्यादा भरपाई की जाएगी।
प्रकाश जावड़ेकर ने बताया कि देश में अब 723 कोविड अस्पताल हैं, जिसमें लगभग 2 लाख बैड तैयार हैं। इनमें 24 हजार आईसीयू बेड हैं और 12 हजार 190 वेंटिलेटर हैं, जबकि 25 लाख से अधिक N95 मास्क भी हैं। सरकार से प्राप्त जानकारी के मुताबिक़, 2.5 करोड़ N95 मास्क के ऑर्डर दिए जा चुके हैं।

सोशल मीडिया का वायरल टेस्ट

पवन कुमार तिवारी | Navpravah Desk

हम सब जानते है कि सोशल मीडिया क्या है!  सोशल मीडिया  प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तरह कोई ऐसा मीडिया नहीं है जो हमें देश विदेश के हाल समाचार से अवगत करता है, आज के परिपेक्ष्य में देखा जाये तो सोशल मीडिया एक तरह का प्लेटफॉर्म है जहाँ लोगों को सच और झूठ फ़ैलाने की आजादी है।  असल में सोशल मीडिया, अपने माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी,भैया -भाभी और न जाने बहुत सारे कितने रिश्तेदारों से दूर रहने वाले देशों के लोगों के लिए मनोरंजन का साधन था, तथा जहाँ लोग अपने हमउम्र के साथ अपनी मन की ब्यथा, सोच और समझ को शेयर कर सकें।

यह सच में पूछा जाये तो भारत के लिए नहीं बना था, लेकिन पश्चिमी देशों अर्थात कहा जाये तो विकसित देशों के लोगों के संपर्क में आने के  कारण और मोबाइल क्रान्ति के कारण इसने भारत देश में भी अपना बाजार बना लिया। आज आपको मालूम होगा की सैकड़ो सोशल मीडिया एप्लीकेशन उपलब्ध है जो हमसे हमारी, आजादी, माता पिता और बुजुर्गो की सेवा और देखरेख करने की आदत और कुछ मामलो में युवाओं और बच्चों की जिंदगी तक छीन रहे है।

अच्छी बात है की हमें भी आगे बढ़ना चाहिए और समझदार बनना चाहिए। सच मायने में हम समझदार बन भी गए है क्योंकि हमारे देश में लगभग करोड़  40 से 45  करोड़ स्मार्ट फ़ोन प्रयोगकर्ता है, यही आँकड़ा विकसित देशो में देखा जाय तो हमसे वह बहुत पीछे हैं, इन सब मामलो में इसका प्रत्यक्ष सम्बन्ध भारत की जनसंख्या से भी है। लेकिन अब हम बात करें कि क्या सही मायने में हम सोशल मीडिया के इस्तेमाल से शिक्षित या विकसित हो गए हैं? उत्तर यही होगा कि नहीं और आने वाले कई वर्षों तक भी नहीं होंगे,  क्योंकि आपने हाल के कुछ महिनों से वर्षो तक में देखा होगा की सोशल मीडिया का इस्तेमाल कैसे हो रहा है, कहाँ हो रहा है और क्या सामग्री डाली जा रही है।

भारत में सोशल मीडिया एक तरह से सच में विकसित देशों के उददेश्यों की पूर्ति का लिए बनाया गया जिनकी उददेश्यों की पूर्ति तो नहीं कर पाया लेकिन उसके उलट यहाँ लोगों के रिश्ते जरूर ख़तम कर दिए। आज भारत में सोशल मीडिया का इस्तेमाल दंगा भड़काने, धरना करने, बच्चों से सम्बंधित और अन्य तरह सेक्स सामग्री को एक दूसरे तक भेजने में, गलत सूचना भेजने में,  तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर किसी के शब्दों को आगे भेजने में,  और भी बहुत सारे निगेटिव समाचार को फ़ैलाने में प्रयोग हो रहा है।

“इस बात से इनकार बिलकुल नहीं कर सकते कि कुछ मामलों में यह लोगों के लिए सही भी साबित हुआ है, जिस कारण बहुत लोगों के हुनर, अदाकरी या कहें तो अभिनय जो दुनिया नहीं जानती थी उसका सही दिशा मिली है. यह प्रतिशत बहुत ही कम है अतः इस बात में ज्यादा जोर देने की जरूरत नहीं है।”

हम सभी को यह जानकारी होनी चाहिए कि सोशल मीडिया के द्वारा किसी भी तरह के अश्लील, गलत  और भड़काऊ सामग्री भेजने पर भारतीय दंड सहिता और अन्य कानूनों के तहत सख्त से सख्त सजा का प्रावधान है, अतः हमें कोई भी सामग्री भेजने से पहले अनेक प्रकार से विचार करना चाहिए, तब जाकर भेजना चाहिए। भारत के सभी सोशल मीडिया प्रयोगकर्ताओं को कोई भी मैसेज भेजने से पहले , यह सोचना चाहिए की क्या सबसे पहले यह मेरे पास आया है?  क्या मैंने इसे बनाया है ? क्या इससे पहले इसे किसी ने नहीं देखा है? नहीं सुना है ?  नहीं जानते है?  या सिर्फ मेरे पास ही यह सोशल मीडिया है ?  या सब अनपढ़ है और उन्हें नहीं पता है ?  क्या जो मेरे पास आया है उसकी सत्यता की जाँच मैंने कर ली है ?  तब जा कर कोई भी मैसेज हम आगे फॉरवर्ड करें तो अच्छा रहेगा और सोशल मीडिया का सही इस्तेमाल भी होगा।

कोरोना जैसी महामारी पर कितने मैसेज आपको रोज मिल रहे हैं, उसमे मरीजों की संख्या, बचाव के तरीके ,उपलब्ध दवाईया और बहुत सारे जोक्स भी है, इसके अलावा आपने CAA , NRC, NPR  और अन्य कारणों  से  हुयी हिंसा से जुड़े कितने वीडियो और ऑडियो के साथ बहुत सारे लेख भी देखे और पढ़े होंगे,  इसके अलावा आपको दिन भर में बहुत सारे ऐसे न्यूज़ और जोक्स से सम्बंधित सामग्री भी मिल जाती होगी जो आपको कभी भी अच्छी नहीं लगती होंगी। लेकिन इन्ही कारणों से परेशान हो कर कुछ लोग अच्छे विषय और सामग्री को भी नहीं पढ़ते हैं और वह उनके मोबाइल में पड़ा रहता है, जिस कारण अच्छी और सही सामग्री को उनका उचित सम्मान नहीं मिल पता और वह आम जानमानस तक नहीं पहुंच पाती।

सोशल मीडिया का इस्तेमाल सही कारणों के लिए, सही सामग्री, सही सूचना,  सही तरीके से किया जाना चाहिए. सबसे बड़ी बात उत्प्रेरक और अहिंसात्मक सूचना के लिए करें तो यह आपके जीवन के साथ करोडो लोगों के जीवन को बदल सकता है और ऊर्जावान होने के साथ रोजगार के मौके दे सकता  है।

यदि हमें जागरूक होना है और भारत की अपनी सभ्यता-संस्कृति और आदर्शों को बचाना है तो हमें सोशल मीडिया का सही इस्तेमाल और सदुपयोग सीखना होगा नहीं तो हम बिजली, पानी, और जवानी की तरह इंटरनेट और अपने समय की भी बर्बादी भी करते रहेंगे. समय गुजर जाने पर सोचेंगे कि हमने जिंदगी में क्या किया.

भूली हुई यादें- “विमी”

डॉ. कुमार विमलेन्दु सिंह | Navpravah Desk

“आसाइश मयस्सर न हुई हयात में

मसायल, महशर को मुकर्रर किया है मैंने”

-विमलेन्दु

पूछना मुनासिब नहीं जान पड़ता और बमुश्किल ज़िंदगी गुज़र रही होती है तो आसरा उम्मीदों पर ही होता है| उम्मीद कमसिन ही मरते हैं, अगर मंज़ूर नहीं होती दुआएं या ग़ैरत का साथ जब छूटता सा लगता है| जी लेने की ख़्वाहिश का ख़त्म होना मौत है और मौत है ऐतबार का खो जाना| कोई तरक़ीब, कोई सूरत, कोई शय, दिलख़राशी को दफ़ा नहीं कर पाती और गुज़रे हुए वक़्त की एक दर्दनाक तस्वीर बन कर रह जाती है कहानी कुछ ख़ूबरू चेहरों की| विमी भी एक ऐसे ही चेहरे का नाम था|

विमी (PC-Pinterest)

विमी एक सिक्ख परिवार में, 1943 में, जलंधर में पैदा हुईं| उनकी ख़ूबसूरती, उनसे पहले मशहूर हुई और कई हमसिन उनके साथ ज़िंदगी बसर करने को बेक़रार थे| विमी ने एक अमीर उद्योगपति शिव अग्रवाल को चुना और इनकी शादी हो गई| विमी के वालिद ने शुरू में, इस शादी की मंज़ूरी नहीं दी थी, लेकिन उन्हें अपनी बेटी की ज़िद को मानना ही पड़ा|

शिव कलकत्ते में भी अपना कारोबार करते थे और वहीं एक पार्टी में मशहूर म्यूज़िक डायरेक्टर रवि ने उन्हें देखा और शौहर के साथ बंबई (अब मुंबई)आने का न्यौता दे दिया| ये 1963-64 की बात है| मुंबई जाने पर रवि ने उनकी मुलाक़ात, बेहद मशहूर फ़िल्मकार बी०आर० चोपड़ा से करवाई| विमी इतनी ख़ूबसूरत थीं कि तुरंत ही बी०आर० चोपड़ा ने उन्हें अपनी फ़िल्म, “हमराज़” के लिए चुन लिया| ये फ़िल्म 1967 में आई और सुनील दत्त के साथ जब विमी, “न सर झुका के जियो”, गाने में नज़र आईं तो दर्शक इनकी ख़ूबसूरती के तिलिस्म में क़ैद हो गए|

हमराज़ १९६७ के एक दृश्य में सुनील दत्त व विमी (PC-Youtube)

फ़िल्म बहुत कामयाब रही लेकिन इस कामयाबी का बहुत फ़ायदा विमी को नहीं मिला| लेकिन इनकी ख़ूबसूरती ने असर पैदा किया था, सो अगले ही साल, 1968 में ये “आबरू” में भी नज़र आईं| ये फ़िल्म बिल्कुल नहीं चली| इसके बाद ये फ़िल्म, “पतंगा” में, शशि कपूर के साथ दिखीं, जिसका गाना, “थोड़ा रुक जाएगी तो तेरा क्या जाएगा”, बहुत पसंद किया गया, लेकिन फ़िल्म फिर नहीं चली|

“ये 1971 का साल चल रहा था और विमी की नाकामयाबी का दौर भी जारी था| उनके पति शिव ने भी तेवर बदल लिए थे, यहाँ तक कि उन्हें मारना पीटना तक शुरू कर दिया था| इन सबसे परेशान हो कर विमी ने अलग रहना शुरू कर दिया और रिश्ते ख़त्म से हो गए| 1974 तक उन्होंने कोशिश की, लेकिन फ़िल्मों ने उन्हें कोई शोहरत नहीं दी|”

इसके बाद उन्होंने कलकत्ते में ही कपड़ों का कारोबार शुरू किया लेकिन यहाँ भी बहुत नुकसान हुआ| इस तरह बेज़ार हुईं विमी कि शराब की लत में पड़ गईं| वे बंबई वापस चली गईं और अपनी लत में इतनी बरबाद हुईं कि जिस्मफ़रोशी तक का बदनुमा दाग़ उनपर लगा|

एक रिकॉर्डिंग के दौरान महेंद्र कपूर, किशोर कुमार, हसरत और शंकर के साथ विमी (PC-Masala)

1977 में एक दिन बहुत ख़राब हालत में, नानावती हॉस्पिटल के जेनरल वार्ड में लिवर की बीमारी के चलते, वे गुज़र गईं| ज़िंदगी के ज़ुल्म मौत के बाद भी बाक़ी थे| उनके पति ने, एक ठेले पर उनकी लाश को रखवाया और श्मशान ले जाकर उनका अंतिम संस्कार किया|जब भी कभी किसी फ़िल्म के किसी जगह उनका चेहरा दिखता है तो लगता है कि वे ज़माने से पूछ भी रही हैं और बता भी रही हैं कि:

       “बैठने कौन दे है फिर उसको

        जो तेरे आस्तां से उठता है”

          -मीर

विमी! आपको उस जहां में सुकून नसीब हो|

(लेखक जाने-माने साहित्यकार, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)

कोरोना संकट को अवसर में बदल सकता है भारत -अर्थशास्त्री पनगढ़िया

Arvind Pangaria
कोरोना संकट को अवसर में बदल सकता है भारत

अमित द्विवेदी | navpravah.com 

प्रख्यात अर्थशास्त्री अरविंद पनगढ़िया ने भारत को कोरोना संकट के बाद संभावित आर्थिक मंदी से उबरने का उपाय सुझाया है। पनगढ़िया ने कहा कि भारत इस संकट को भी अवसर में बदल सकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि भारत को कोरोना संकट का फायदा उठाते हुए चीन से बाहर निकलने वाली कंपनियों को अपने यहां आकर्षित करना चाहिए।

अर्थशास्त्री अरविन्द पनगढ़िया ने कहा कि कोविड-19 महामारी के मद्देनजर संभव है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां चीन से अपने ऑपरेशन को दूसरी जगह ले जाएं, जिसका भारत को फायदा उठाना चाहिए और औपचारिक क्षेत्र में अच्छे वेतन वाली नौकरियां तैयार करने के लिए दीर्घकालिक सोच के साथ काम करना चाहिए।

आप को बताते चलें कि नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविन्द पनगढ़िया फिलहाल कोलंबिया विश्वविद्यालय में इकोनॉमिक्स के प्राध्यापक हैं। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि मौजूदा संकट ने यह उजागर किया है कि किसी ऐसे झटके से भारतीय श्रमिक कितने असुरक्षित हैं। इस सम्बन्ध में पनगढ़िया ने न्यूज एजेंसी पीटीआई से बातचीत में कहा, ‘अब दूर की सोचने का समय है। संकट को व्यर्थ गंवा देना ठीक नहीं होगा। टीका उपलब्ध होने के बाद ही मौजूदा संकट खत्म होगा। निश्चित रूप से हमें उससे आगे सोचना होगा।’

चीन के व्यवहार से रोष में कम्पनियाँ-
कोरोना संकट के दौरान जिस तरह का व्यवहार चीन ने किया है, उससे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चीन के प्रति कई देशों में रोष व्याप्त है। पनगढ़िया ने कहा कि अब ज्यादातर जानकार यह मानने लगे हैं कि कोरोना के बाद वाले दौर में बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपनी मैन्युफैक्चरिंग और अन्य ऑपरेशन चीन से हटाना चाहेंगी और यह भारत जैसे उसके पड़ोसी देशों के लिए एक बड़ा मौका है।

एक निजी मीडिया हाउस ने अपनी एक खबर में स्पष्ट किया है कि कोरोना वाइरस की वजह से चीन में कंपनियों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ा है, जिससे कंपनियों ने चीन की जगह भारत को अपना केंद्र बनाने का सोचा है। इस माहौल में लगभग 1000 विदेशी कंपनियां भारत में एंट्री की सोच रही हैं। इनमें से करीब 300 कंपनियां भारत में फैक्ट्री लगाने को लेकर पूरी तरह से मूड बना चुकी हैं। जानकारी के मुताबिक़, इस संबंध में सरकार के अधिकारियों से बातचीत भी चल रही है।

पाकिस्तान: चंदे के चक्कर में बुरे फंसे इमरान खान, हो सकते हैं कोरोना पॉजिटिव

इमरान खान
इमरान खान हो सकते हैं कोरोना पॉजिटिव
News desk | Navpravah.com
कोरोना के चपेट में लगभग पूरा विश्व आ चुका है। ऐसे में हर देश सोशल डिस्टैंसिंग पर ख़ास ध्यान दे रहा है। लेकिन पाकिस्तान में इस बात को लेकर लोग गम्भीर नज़र नहीं आ रहे। पाक पीएम इमरान ख़ान के कोरोना ग्रस्त होने की आशंका जताई जा रही है।
दरअसल, फैसल एधी नाम के सामाजिक कार्यकर्ता ने हाल ही में पाकिस्तान के पीएम इमरान खान से मिलकर उन्हें चंदे का एक चेक दिया था। अब फैसल एधी कोरोना पॉजिटिव पाये गये हैं।
प्राप्त जानकारी के मुताबिक़, सामाजिक कार्यकर्ता अब्दुल सत्तार के पुत्र और एधी फाउंडेशन के चेयरमैन फैसल एधी ने 15 अप्रैल को इमरान खान से मुलाकात की थी। इस मुलाकात में फैसल एधी ने कोविड-19 रिलीफ फंड के लिये इमरान खान को एक करोड़ रुपये का चेक दिया था। फैसल एधी ने अपने हाथों से इमरान खान के हाथ में ये चेक दिया था।
बताया जा रहा है कि इमरान खान से इस मुलाकात के बाद ही फैसला एधी के अंदर कोरोना के लक्षण नजर आने लगे थे। इसके बाद फैसल एधी का कोरोना टेस्ट कराया गया। मंगलवार को फैसल एधी की रिपोर्ट कोरोना पॉजिटिव आई, तो पाकिस्तानी अथॉरिटी में हलचल पैदा हो गई। कहा ये भी जा रहा है कि इमरान खान को एहतियात के तौर पर क्वारनटीन किया जा सकता है।
वहीं, दूसरी तरफ फैसल एधी ने बताया है कि उनकी हालत सामान्य है। फैसल किसी अस्पताल में भर्ती नहीं हुये हैं बल्कि उन्होंने खुद को घर में सेल्फ आइसोलेशन में रख लिया है। लेकिन पीएम इमरान खान को लेकर अभी तक कोई निर्णय नहीं लिया गया है।
ग़ौरतलब है कि दुनिया के कई देशों में बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ भी कोरोना की चपेट में आ चुके हैं। ब्रिटिश प्रधानमंत्री बॉरिस जॉनसन से लेकर प्रिंस चार्ल्स तक कोरोना संक्रमित हो चुके हैं. इनके अलावा स्पेन की राजकुमारी का इस बीमारी के कारण निधन भी हो गया है।

कोरोना वायरस: मत-मजहब-पंथ को साधक बनना चाहिए, बाधक नहीं

प्रो.रजनीश शुक्ल | Editorial Desk

दुनिया बीते तीन-चार महीनों से कोरोना वायरस से उपजी कोविड-19 नामक एक ऐसी महामारी का सामना कर रही है जिसके बारे में कभी सोचा नहीं गया था। बीमारी हो या महामारी उससे लड़ने और निजात पाने के लिए औषधि और चिकित्सकीय साधनों को खोजना, विकसित करना और उनकी उपलब्धता सुनिश्चित करना चिकित्सा विज्ञान का काम है, लेकिन मनुष्य केवल विज्ञान पर जीने वाला प्राणी नहीं है इसलिए वह मानव जीवन के विविध आयामों को अभिलक्ष्य कर मानवता के सामने आई समस्या के समाधान का रास्ता खोजता है। बहुत दिनों बाद दुनिया में किसी आपदा के कालखंड में विज्ञान और धर्म के बीच युद्ध देखने को मिला है। धर्म हो या विज्ञान, दोनों का उद्देश्य श्रेष्ठ मनुष्य की निर्मिति है, लोक कल्याणकारी और परोपकारी जीवन वृत्ति का निर्माण है। इस रास्ते पर धर्म और विज्ञान में कोई विरोध नहीं है। यहां धर्म का आशय पंथ, मत-मजहब, उपासना पद्धति से है। हमें इसका मर्म समझना होगा।

भारत सहित दुनिया के तमाम देश जब एक अनजाने, अपरिचित और भयावह वायरस से समग्र मानव जाति को बचाने के रास्ते तलाश रहे हैं तो इस तलाश में मत-मजहब-पंथ को साधक बनना चाहिए, बाधक नहीं। कभी-कभी मत-मजहब-पंथ विज्ञान के माध्यम से मनुष्य के कल्याण के यत्न के सामने बाधक बनकर खड़े हो जाते हैं। उपासना की कोई भी प्रणाली जो मानवता की हानि की कीमत पर ईश्वर साधना का रास्ता बताती है, वह धर्म नहीं हो सकती। धर्म तो सबसे पहले मनुष्य की रक्षा है, लेकिन ऐसा होता हुआ नहीं दिखाई दे रहा है।

भारत सहित दुनिया के तमाम देश जब एक अनजाने, अपरिचित और भयावह वायरस से समग्र मानव जाति को बचाने के रास्ते तलाश रहे हैं तो इस तलाश में मत-मजहब-पंथ को साधक बनना चाहिए, बाधक नहीं। कभी-कभी मत-मजहब-पंथ विज्ञान के माध्यम से मनुष्य के कल्याण के यत्न के सामने बाधक बनकर खड़े हो जाते हैं। उपासना की कोई भी प्रणाली जो मानवता की हानि की कीमत पर ईश्वर साधना का रास्ता बताती है, वह धर्म नहीं हो सकती। धर्म तो सबसे पहले मनुष्य की रक्षा है, लेकिन ऐसा होता हुआ नहीं दिखाई दे रहा है।

यदि भारतीय संदर्भों में विचार किया जाए तो हिंदू और मुसलमान के रूप में दो सभ्यताओं की दृष्टि का प्रतिपादन निहित स्वार्थों के तहत किया गया और अब वह इतनी गहरी पैठ बना चुका है कि राज्य की लोक कल्याणकारी नीति हो, शिक्षा की मनुष्य निर्माण की प्रक्रिया हो, विज्ञान और तकनीक के द्वारा मनुष्य के जीवन को सरल-सुखद बनाने का यत्न हो, उसे धर्म विरुद्ध देखा जाने लगा है। वस्तुत: यह धर्मोन्माद है। यह धर्म के क्षरण का कालखंड है। भारतीय संस्कृति में यह ‘कलि: शयानो संजाति’ अर्थात कलि में धर्म सोया हुआ चलता है, के रूप में व्याख्यायित है। बंद आंखों से यथार्थ और सत्य का प्रकाश नहीं दिखता। वहां तो गहन अंधेरा होता है। धर्म के नाम पर विज्ञान का प्रतिरोध और विज्ञान के नाम पर धर्म की अवमानना ये दोनों मनुष्य को एक ही प्रकार के अंधकार में ले जाते हैं-अज्ञानता और जड़ता के अंधकार में। आज कोरोना के भयावह संकट में इसी अंध धार्मिकता की गहरी बैठी हुई सामाजिक दृष्टि ने देश को अकल्पनीय संकट में डाल दिया है।

धर्म संकटों से त्राण दिलाने का रास्ता है। उपासना पद्धति भेद, ईश्वर के निराकार-साकार होने के भेद के होते हुए भी धर्म इस एक दृष्टि से अभेद रखता है कि मनुष्य का कल्याण और परोपकार प्रत्येक मानव का साध्य है। एक धार्मिक मनुष्य ऐसा कुछ नहीं कर सकता कि उसके पड़ोसी को दुख पहुंचे या उसका जीवन संकट में आए। धर्म के किसी प्रारूप, संप्रदाय के द्वारा ऐसा होता दिखाई दे तो वह धर्म नहीं है, धर्माडंबर है। धर्माचरण के नाम पर मनुष्य के जीवन को संकट में डालना, उसकी प्रगति पथ में मृत्यु, रोग और विपत्ति के कांटे बोना वस्तुत: ओल्ड टेस्टामेंट से लेकर कुरान तक और वेदों से लेकर पुराण तक में जिस शैतानी या राक्षसी सभ्यता की चर्चा की गई है, उसको प्रशस्त करना है।

“धर्म का रास्ता तो तप, त्याग और परोपकार का रास्ता है, वह करुणा पूरित पथ है। धर्म की भूमिका वस्तुत: विज्ञान और तकनीक पर उस सतोगुणी अंकुश की है जिसके दबाव में विज्ञान राक्षसी वृत्ति की ओर यानी मानवता के संहार की ओर न बढ़े। जब धर्म की ओट में ही ऐसा होता दिखाई दे तो जाहिर है कि यह अत्यंत कठिन समय है। जब पाखंड धर्माचरण बन जाए तो वह सांस्कृतिक जीवन को दूषित कर देता है।”

धर्म का मूल तत्व आध्यात्मिकता है जो मनुष्य होने के मूल उद्देश्य जैसे सात्विक जीवन, प्रकृति के साथ तादात्म्य, पर्यावरण की सुरक्षा यानी जीवन के लक्ष्य की ओर हमें आगे बढ़ाती है। धर्म तो संस्कृतिकरण है। वह सभ्यता के समुद्र से गाहे-बगाहे निकलने वाले तकनीकजन्य विष का शमन करने का साधन है। धर्म दुनियावी स्तर पर मानव मेधा के द्वारा विज्ञान और तकनीक के सहयोग से उपलब्ध कराए गए संसाधनों का सबके कल्याण में उपयोग किए जाने के पथ का प्रतिपादन है।

धर्म वह नहीं है जो विज्ञान के विरोध में, सभ्यता और संस्कृति के विरोध में खड़ा हो। धर्म तो वह है जो विज्ञान और तकनीक को मानवीय और लोक कल्याणकारी बनाता है। यह तभी संभव है जब धर्म परोपकार और लोक कल्याण पर आधारित हो और स्व से ऊपर उठते हुए मनुष्य को सबके हित में सोचने वाले के रूप में रूपांतरित करे। यदि कोई तब्लीग, कोई मत, कोई पंथिक समूह इस रास्ते से अलग जाता है तो वह अधर्म के रास्ते का निर्माण करता है।

मनुष्य ईश्वर की अनुपम और श्रेष्ठतम कृति है। मनुष्य को दुख देने का कोई यत्न वस्तुत: ईश्वर के खिलाफ खड़ा होना है। यह न उपासना है न बंदगी। उपासना का कोई भी रास्ता यदि इस श्रेष्ठतम कृति और श्रेष्ठतम कर्म के लिए संभावनाओं की निर्मिति के प्रयास में बाधा बनता है तो वह अधार्मिक कर्म है। धर्म दया, करुणा और उपकार से परिपूर्ण समाज की सृष्टि के लिए अद्भुत ईश्वरीय विधान है। इन सद्गुणों से अलग हटकर धर्माचरण निंदनीय है।

( लेखक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति एवं धर्म एवं दर्शन के अध्येता हैं )

भूली हुई यादें- “पर्ल पदमसी”

डॉ. कुमार विमलेन्दु सिंह | Navpravah Desk

नफ़ाज़ हुआ है हुक्म लम्हात का

मुंतज़िर रहो सहर होने तक”

विमलेन्दु

लम्हा लम्हा गुज़रते हुए, एक गुज़ारिश करता है कि वाहिद वही है और आगे नहीं होगा, जी लिए जाने की दरख़्वास्त करता है और जो जी लेते हैं शाम होने के पहले, हाज़िरीन-ए-महफ़िल, उन्हीं को शोहरत और वक़ार बख़्शती है| पर्ल पदमज़ी(पदमसी)एक ऐसा नाम है जो किसी किसी को ही पता है, लेकिन ऐसी शक्ल है जिसे कोई नहीं भूला|

पर्ल पदमसी (PC-BCCL)

1931 में, इनकी पैदाइश, एक इसाई पिता और यहूदी मां के यहां हुई| ये बेहद चंचल थीं और इनके पिता, बहुत ही धार्मिक| पर्ल अपने पिता से बहुत कुछ सीखती थीं| कई धार्मिक कहानियां, उन्हें बचपन से ही याद थीं और अकसर अपनी ज़िंदगी की परेशानियों को, वे इन्हें पढ़कर ही सुलझाने की कोशिश करती थीं|

“इनकी पहली शादी, श्री चौधरी से हुई और इनके दो बच्चे हुए| बेटे का नाम रंजीत चौधरी था और बेटी का रोहिणी चौधरी| दोनों बच्चे छोटे ही थे कि इनका चौधरी साहब से तलाक़ हो गया और उसके कुछ ही दिनों बाद इन्होंने मशहूर नाटककार अलीक़ पदमज़ी से शादी कर ली| इस शादी के कुछ ही सालों बाद इनकी बेटी रोहिणी, जो महज़ 10 साल की थीं, गुज़र गईं| ज़िंदगी बहुत चोट दे रही थी |”

लेकिन अलीक़ एक जाने माने नाटककार थे और उनकी पत्नी होने के साथ साथ एक ख़ुशमिज़ाज अंदाज़ की वजह से, पर्ल को फ़िल्मों में काम मिलने लगा| इनके साथ साथ इनके बेटे रंजीत चौधरी** को भी दर्शकों ने पसंद करना शुरू कर दिया| रंजीत चौधरी वही हैं, जो “खट्टा मीठा”, “बातों बातों में” और “ख़ूबसूरत” जैसी फ़िल्मों में, छोटे भाई के किरदार में, कभी वॉयलिन बजाते, कभी गिटार बजाते, बिखरे बालों वाले कमउम्र लड़के की तरह नज़र आते थे| हाल ही में उनका इंतक़ाल हो गया|

रंजीत चौधरी (PC-Asianet Newsable)

पर्ल ने “खट्टा मीठा”, “बातों बातों में” यादगार किरदार निभाए और भी कुछ छोटे किरदार उन्होंने किए| 1996 में आई “कामसूत्र” और 1998 में आई “सच् अ लाँग जर्नी” जैसी अंग्रेज़ी फ़िल्मों में भी ये छोटे-छोटे किरदार निभाती नज़र आईं|  “सच् अ लाँग जर्नी”, रोहिन्टन मिस्त्री के उपन्यास पर आधारित फ़िल्म थी|

फ़िल्म कामसूत्र में सरिता चौधुरी और पर्ल पदमसी (PC-Twitter)

पर्ल का ज़्यादातर समय स्कूली बच्चों के लिए, थिएटर वर्कशॉप करते बीतता था| अलीक़ के साथ भी इनकी शादी लम्बी नहीं चली| इन दोनों की बेटी, राएल, मुंबई में अपनी थिएटर कंपनी चलाती हैं|

24 अप्रैल, 2000 को पर्ल, ये दुनिया छोड़ कर हमेशा के लिए चली गईं और इसाई धर्म के रीति रिवाज़ों के हिसाब से बांद्रा के कब्रिस्तान में दफ़ना दिया गया|

एक बात हमेशा ज़हन में आती है कि, पर्दे पर हंसते हुए चेहरों के पीछे की असल ज़िंदगी में कितना ग़ुबार, कितनी बेचैनी और न जाने कितनी ही अनकही कहानियां होती हैं

पर्ल जहां भी हों, ख़ुश हों|

(लेखक जाने-माने साहित्यकार, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)

“डॉ.अम्बेडकर का नवबौद्ध आन्दोलन” -प्रो.रजनीश शुक्ल

आनंद आर.द्विवेदी |Navpravah Desk

प्रोफेसर रजनीश शुक्ल, ने बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर के जीवन दर्शन पर व्याख्यान देते हुए उनके धर्म दर्शन, मानवीय मूल्यों, व समानता आदि की विस्तृत व्याख्या की है।

व्याख्यान में प्रो. शुक्ल कहते हैं कि, “बाबा साहब के बारे में चर्चा करना बाबा साहब की कठिनाइयों की चर्चा करना है। बाबा साहब के जीवन में आई तमाम प्रकार की अपेक्षित-अनपेक्षित बाधाओं की चर्चा करना है। इन तमाम बाधाओं के बीच आग में तप करके अपने उदय का और अपने समस्त समुदाय के उदय का और समुदाय के उदय के माध्यम से सम्पूर्ण राष्ट्र के उदय का रास्ता तलाशने वाले व्यक्तित्व की चर्चा करते हैं।

उस बालक को जिसे चाहते हुए भी मैट्रिक में बतौर विषय संस्कृत विषय का चयन नहीं करने दिया गया। उस कालखण्ड के अध्यापकों ने एक अछूत जाति का होने के नाते उसे संस्कृत नहीं पढ़ने दिया। वहीं स्वामी विवेकानंद जिन्होंने मद्रास में 1891 में कहा था कि दलितों को संस्कृत भाषा पढ़नी होगी जिससे उन्हें सम्मान व गौरव प्राप्त होगा व उनको अपने स्वत्व का बोध होगा। बाबा साहब के मन में भी ऐसी कोई बात रही होगी कि संस्कृत पढ़ने से समाज मे सम्मान की प्राप्ति होगी व हिन्दू धर्म के सत्य से परिचय होगा तथा सत्य से परिचय होने के नाते परिष्कार होगा किंतु यह उनको प्राप्त नहीं हुआ।

हम 1948-49 की बात करें जब हिन्दू कोड बिल की निर्मिति के समय संविधान सभा में संस्कृत के विद्वानों की एक बड़ी संख्या थी, उनका हिन्दू धर्मशास्त्रों के आधार पर प्रतिउत्तर देते हुए बाबा साहब के व्यक्तित्व में यह दिखता है कि जहाँ-जहाँ बाधा पहुंचाई गई बाबा साहब ने वह जीता व जिससे भी रोका गया वह सब अर्जित किया। एक बार मे पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए तो इंग्लैंड से वापस आना पड़ा, फिर संघर्ष किया, नौकरी की, असिस्टेंट प्रोफेसर बने, वापस गए और फिर पढ़ाई की। जब हम ज्ञान के प्रति लालसा से भरे ऐसे व्यक्ति की ज्ञान के प्रति निष्ठा का विचार करते हैं तब हम घर के जेवर बेंचकर, कर्ज लेकर ज्ञानार्जन करने वाले व्यक्तित्व की चर्चा कर रहे होते हैं।

बाबा साहब केवल हिन्दू जाति व धर्म व्यवस्था के अध्येता, आलोचक और प्रतिसंस्कर्ता नहीं हैं अपितु सम्पूर्ण भारतीय दृष्टिकोण को समझने वाले अद्भुत व्यक्तित्व हैं। कोलंबिया यूनिवर्सिटी के अपने व्याख्यान में उन्होंने पहली बार इस देश में दो प्रकार की जातियां “आर्य और द्रविड़” के होने की संभावना का नृतत्व शास्त्रीय आधार पर खंडन प्रस्तुत किया। यह वो कालखण्ड है जब तिलक जैसा महान विद्वान भी आर्यों का मूलदेश अरकांटिका तलाश रहा था, उस समय इस देश में आर्य व द्रविड़ दो जातियाँ नहीं हैं आर्य व दस्यु जैसे कोई विभाजन नहीं हैं, Racial Discrimination नहीं है इसको शास्त्रीय आधार पर सिद्ध करने वाले व्यक्तित्व का नाम बाबा साहब भीमराव अंबेडकर है जिन्होंने कहा आर्य दुनिया में कहीं और से नहीं आये, वो भारत के मूल निवासी हैं।

1945 के नागपुर के एक व्याख्यान में बाबा साहब ने कहा था कि हमें कम्युनिस्टों से सावधान रहना पड़ेगा क्योंकि उनकी हमारे लोगों में समानता की सम्भावना व्यक्त करने वाली बातें झूठी हैं। कम्युनिज़्म में स्वतंत्रता के लिए जगह नहीं है इसलिए उनकी साम्यवाद और समता कृत्रिम हैं और स्वाभाविक नहीं हैं।

इन सबके बीच बाबा साहब का मानना था कि हमें धर्म व्यवस्था तो वही बनानी है जो लौकिक जीवन मूल्यों, नैतिकता, स्वतंत्रता व समानता के लिए जगह बना सके। बाबा साहब का यह वैचारिक दृष्टिकोण हमें संविधान की प्रस्तावना में भी देखने को मिलता है। बाबा साहब इस कालखण्ड में समानता, स्वतंत्रता व बंधुत्व के महानायक हैं। उनकी यह विचारधारा फ्रांसीसी क्रांति से प्रेरित या राजतंत्र, कुलीनतंत्र के विरुद्ध प्रतिक्रिया नहीं है, अपितु यह राजतंत्र व कुलीनतंत्र के रूपांतरण, कायांतरण व समाज के निचले वर्ग को गरिमायुक्त, अस्मितायुक्त बनाना, उसकी पहचान व समाज में स्वीकृति दिलाना का दृष्टिकोण है लेकिन यह सब हिंसा के माध्यम से नहीं हो सकता।”

आगे प्रो. शुक्ल बाबा साहब का बौद्ध मत स्वीकार करने के बारे में चर्चा करते हुए बताते हैं कि, ” उस कालखण्ड में जब दुनिया में क्रिश्चियनिटी की बहुलता थी, तब बाबा साहब को भी प्रलोभन दिया गया, वो चाहते तो धर्मांतरण स्वीकार कर सकते थे किंतु बाबा साहब ने दुनिया के अन्य धर्मों का जो अध्ययन करना प्रारंभ किया था उससे उन्हें जो अनुभव प्राप्त हुआ था वह महत्वपूर्ण है। उन्होंने देखा कि केरल में जहां ईसाइयों की बहुलता थी वहाँ भी नंबूदरी, नाडार, नायर क्रिश्चचियन आदि का भेद आज भी जीवित है। हैदराबाद के निजाम ने इस्लाम ग्रहण करने के लिए बाबा साहब को करोड़ों का प्रलोभन देने का भी प्रयास किया। लोगों के मन में यह था कि इस्लाम के माध्यम से बाबा साहब के विचारों की प्राप्ति आसानी से सम्भव है, लेकिन इस्लाम में भी अशरफ़, अजलाफ़, अरजल जैसी भिन्न वर्ण व्यवस्थायें हैं। वहीं सिख सम्प्रदाय में भी अनेक प्रकार की जातिगत भिन्नताएं थीं। पारसी समाज में भी बाबा साहब को अत्यंत कटु अनुभव था। सयाजीराव गायकवाड़ के यहाँ बड़े अधिकार क्षेत्र में कार्यरत बाबा साहब को एक पारसी के घर में अपनी पहचान छुपाकर किराए का मकान लिया किंतु पारसी समाज को जब पता चला तो उन्होंने बाबा साहब के साथ बेहद कठोर व्यवहार किया। हिन्दू समाज के दलितों के लिए पारसी समाज में भी कोई स्थान नहीं था। बाबा साहब को भारतीय परंपरा में पला हुआ धर्म चाहिए था। बाबा साहब का मानना था कि जब तक ईश्वर कृत जगत की अवधारणा नहीं होगी, मनुष्य ईश्वर द्वारा निर्मित है और भाग्य के साथ निर्मित है जिसका फल खाने के लिए मनुष्य बाध्य है तब तक नैतिकता सम्भव नहीं है। इस प्रकार दुनिया के किसी अन्य धर्म में अछूतों, दलितों को न्याय मिलेगा इसपर बाबा साहब को संशय था। बाबा साहब लोकतांत्रिक व्यवस्था के समर्थक थे। उनके अनुसार बौद्ध धर्म में भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का विशेष महत्त्व है जहाँ विचारों को सर्वसम्मति से ही स्वीकार करने की परंपरा है। स्वयं बुद्ध कहते हैं कि केवल बुद्ध का कथन है इसलिए नहीं, अपितु युक्ति के आधार पर ही विचारों की स्वीकृति की जानी चाहिए।

बाबा साहब ने हाशिये पर स्थापित वंचित वर्ग के लिए धम्म का रास्ता स्वीकार किया था जिसपर किसी का भी आधिपत्य नहीं था। भारतभूमि स्वयं बुद्ध के उस महान धम्म से अपरिचित हो गई थी इसलिए इसमें पुरोहितवाद, कर्मकांड नहीं थी जिस कारण इसमें जड़ता नहीं थी व परिष्कार की संभावनाएं थीं। बाबा साहब को ऐसी ही धार्मिक संरचना व दार्शनिक दृष्टि स्वीकार थी जिसमें लौकिक जीवन के कल्याण के साथ मनुष्य की आध्यात्मिक उन्नति के भी रास्ते बन सकें जिसमें मानवीय मूल्यों का समावेश हो। बाबा साहब धम्म दृष्टि राष्ट्र विद्रोही न हो इसकी चिंता को भी व्यक्त करते थे। इसलिए उन्होंने हिन्दू कोड बिल में “हिन्दू” शब्द की व्याख्या में “सनातनी, जैन, बौद्ध, सिख आदि” सबको सम्मिलित किया जिनका उद्भव भारत भूमि में हुआ था। उनकी हिन्दू की अवधारणा उपासना व जाति पर आधारित नहीं है बल्कि यह ऐसी अवधारणा है जिसमें भारत भूमि के मूल निवासी की ही समाविष्टि है। बाबा साहब देश की सांस्कृतिक दृष्टि पर अभेद्य विश्वास रखने वाले व्यक्ति थे। या सांस्कृतिक दृष्टि को ही लेकर उन्होंने संविधान सभा में देश के एकीकरण को लेकर चल रही बहस के बीच जब कहा था कि, “इस देश में कलह पैदा करने वाले लोग बहुत हैं, कलह पैदा करने वाले एक दल का नेता मैं भी हूँ।”

“बाबा साहब मानते थे कि यह देश संवाद और चर्चा से एक जन एक राष्ट्र के रूप में ताकतवर बनकर उभरेगा और ऐसे राष्ट्रीय एकीकरण में सांस्कृतिक एकीकरण की दृष्टि का भी समावेश होगा।”

बाबा साहब पाली, प्राकृत और संस्कृत को अत्यंत महत्व देने वाले विधिशास्त्री थे। संविधान सभा में राष्ट्रभाषा व राजभाषा के प्रश्न के दौरान बाबा साहब संस्कृत को यह स्थान दिया जाए ऐसा प्रस्ताव कई दलित सदस्यों के समर्थन से लेकर आये। हिन्दू कोड बिल के दौरान बाबा साहब कहते हैं कि इस बिल में मैं दलितों व स्त्रियों को वह स्थान नहीं दे सकता जो स्थान स्मृतियों में उन्हें प्राप्त है। यह बाबा साहब की लाचारगी का प्रदर्शन नहीं है अपितु जिस दृष्टि से अब तक स्मृतियों को देखा गया उसका प्रश्न है। हालांकि उन्हींने मनुस्मृति को जलाया था लेकिन चंदन की लकड़ी पर जलाया ताकि उसकी सुगंधि बनी रहे। यहाँ सुगंधि से तात्पर्य उन नियमों से है जो विधि व्यवस्था के हित में हैं। नियम ऐसे नहीं होने चाहिए जो राज्य को सर्वोच्च में स्थापित करते हों और व्यक्ति की गरिमा को गिराते हों। इस प्रकार के नियमों को नष्ट हो जाना चाहिए। यह भारत के संविधान में भी सपष्ट रूप से दिखता है।

बाबा साहब अपने युग में नीति, विधि और व्यवस्था के महान निर्माता व धर्म शास्त्री थे। “

(यह आलेख प्रोफेसर रजनीश शुक्ल, कुलपति, महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, के बाबा साहब के जीवन दर्शन पर आधारित व्याख्यान के प्रमुख अंशों की चर्चा है। आचार्य शुक्ल अपने कार्यकाल का एक वर्ष आज पूर्ण कर रहे हैं। मैं बतौर सम्पादक, नवप्रवाह मीडिया नेटवर्क्स प्रा.लि.,उन्हें बधाई संदेश प्रेषित करता हूँ।)

भूली हुई यादें- “जलाल आग़ा”

डॉ. कुमार विमलेन्दु सिंह | Navpravah Desk

ज़िंदगी गुज़र जाती है, दाम-ए-ख़्वाहिश में उलझते निकलते और फिर एक शाम यकीन हो जाता है कि अगली सहर भी कुछ नए उस्लूब की सिफ़ारिश करती हुई आएगी और शिकायत करती हुई जाएगी| कुछ ऐसे भी शख़्स होते हैं जो शाम-ओ-सहर, ज़िंदगी बसर करते हैं और पोशीदा रखते हैं अपनी हसरतें, क्योंकि जो मिल रहा होता है उसे मुक़द्दर मान कर इंतज़ार करते हैं वे, मुफ़ीद वक़्त आने का| जलाल आग़ा की ज़िंदगी और उनके मिज़ाज के बारे में कहना भी ऐसी ही दिलचस्प क़िस्सागोई होगी|

जलाल आग़ा

इनकी पैदाइश, 1945 में हुई और इनके वालिद उस दौर के मशहूर कॉमेडियन, आग़ाजान बेग थे, जिन्हें फ़िल्मी दुनिया में आग़ा के नाम से जाना जाता था| जलाल, इकलौते बेटे थे और बहुत ही ज़हीन थे|

इन्होंने शुरूआत की, बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट और फ़िल्म का नाम था , “मुग़ल-ए-आज़म”| इस फ़िल्म में इन्होंने, शहज़ादा सलीम(दिलीप कुमार) के बचपन का किरदार बख़ूबी निभाया|  FTII, पुणे से इन्होंने एक्टिंग की तालीम ली और 1967 में इन्हें ख़्वाजा अहमद अब्बास की फ़िल्म, “बम्बई रात की बाहों में” में काम मिला और तब से 90 के दशक के शुरूआती सालों तक ये काम करते रहे| इन्होंने लगभग 60 फ़िल्मों में छोटे बड़े किरदार निभाए|

“इनके रोल फ़िल्मों में, बहुत बड़े तो नहीं थे लेकिन इनका स्क्रीन प्रेज़ेस इतना ज़बरदस्त था कि एक नज़र में ही ये दिल और दिमाग में चस्पा हो जाते थे| मसलन, फ़िल्म, “शोले”, में हाथों में रूबाब बजाते हुए, “महबूबा ओ महबूबा”, या “घर घर की कहानी”  में, गिटार के साथ, “समां है सुहाना”, अब तक कोई नहीं भूला |”

इसके अलावा भी “जूली” और “थोड़ी सी बेवफ़ाई” जैसी फ़िल्मों में इन्होंने छोटे लेकिन यादगार किरदार निभाए|इन्होंने “गरम हवा” में बलराज साहनी और एम०एस०सथ्यु जैसे बेहतरीन लोगों के साथ काम किया|

फिल्म शोले के “महबूबा” गाने के एक दृश्य में हेलेन के साथ जलाल आगा (PC-YouTube)

ये हमेशा से डायरेक्टर बनना चाहते थे लेकिन एक्टिंग के ही इतने काम मिलते थे कि मौक़ा ही नहीं मिला| इन्होंने एक फ़िल्म डायरेक्ट की भी, लेकिन वो रिलीज़ न हो पाई| 1989 में इनकी लिखी और निर्देशित फ़िल्म, “गूंज”, आई और इसे सराहना भी मिली| जलाल आग़ा ने कई अंग्रेज़ी फ़िल्मों भी काम किया| 1982 में आई “गांधी” इनकी मशहूर अंग्रेज़ी फ़िल्म साबित हुई| इसके अलावा इन्होंने “किम” और “द डिसीवर्स” जैसी अंग्रेज़ी फ़िल्मों में भी काम किया| बाद में इन्हें कई इश्तेहारों में भी देखा गया| गगन वनस्पति का इश्तेहार आज भी सब को याद है, जिसमें ये, “खाओ गगन, रहो मगन” बोलते हुए नज़र आते थे|

अभिनेता प्राण, जलाल आगा, किशोर कुमार, और रुमा गुहा ठाकुरता (PC- Pinterest)

इनकी तीन बहनें भी हैं, जिनमें से एक, शहनाज़ हैं जो कि मशहूर डायरेक्टर टीनू आनंद की शरीक़-ए-हयात हैं| बाक़ी दो बहनों के बारे में मालूमात नहीं है| जलाल की बेटी अमरीका में हैं और उनके बेटे गोवा में रेस्तरां के मालिक हैं|

जलाल आग़ा अपने दोस्तों से हमेशा कहा करते थे कि उन्हें कुछ चाहिए, तो ऐसी मौत जो चलते फिरते नसीब हो, और 1995 में, दिल्ली में, मार्च की एक सुबह, उनकी ये ख़्वाहिश भी पूरी हुई और वे इस दुनिया से चल बसे|

आज भी उनको कभी किसी गाने या सीन में देखकर, उस दौर की रूमानियत और संजीदगी को एक साथ महसूस किया जा सकता है|

(लेखक जाने-माने साहित्यकार, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)