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Thursday, August 6, 2026
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भूली हुई यादें- “अनवर हुसैन”

डॉ. कुमार विमलेन्दु सिंह | Navpravah Desk

“कोई दम का मेहमां हूं ऐ अह्ले महफ़िल

चिराग़े सहर हूं, बुझा चाहता हूं

भरी बज़्म में राज़ की बात कह दी

बड़ा बेअदब हूं, सज़ा चाहता हूँ”

-इक़बाल

जब अपनी ही आवाज़ के मायने नग़्मापरदाज़ी से बदल कर दिलख़राश मामलों में उलझ जाए और भीड़ में खो जाने का डर उसे सताने लगे, तो बेशक गुमनामी के अब्र तले पूरी शख़्सियत, मायूसी से भीगी सी लगने लगती है| ऐसा कई दफ़ा हो चुका है और खो गए हैं जाने कितने सितारे, और सबसे पहले ग़ैब के हवाले वे हुए, जिन्हें दुनिया आफ़ताब, मान ही लेने वाली थी| कभी उन्हें बेअदब ठहराया गया तो कभी ज़िंदगी आसान न रही| ऐसी ही कहानी है, अनवर हुसैन की, जो गाता था तो सब ठहर जाता था और जब वो ठहरा तो फिर कभी चल न सका|

अनवर के वालिद आशिक़ हुसैन, एक बेहतरीन सितार और हारमोनियम वादक थे| वे मशहूर मौसिक़ार ग़ुलाम हैदर के असिस्टेंट थे| अनवर की मौसिक़ी की तालीम उस्ताद अब्दुल रहमान ख़ान से मिली| मो० रफ़ी से अनवर की आवाज़ इतनी ज़्यादा मिलती थी कि जब 1973 में कमल राजस्थानी के साथ, फ़िल्म “मेरे ग़रीब नवाज़”, में इन्होंने, अपना पहला गाना, “क़समें हम अपने जान की”, रिकॉर्ड किया, तो ख़ुद रफ़ी साहब ने, अपने आस पास पूछना शुरू कर दिया कि “ये गाना मैने कब रिकॉर्ड किया?”

एक टीवी इंटरव्यू में अनवर (PC-RajyaSabhaTV)

इसके बाद 1977 में आई फ़िल्म “जनता हवलदार” में उनका गाना, “हमसे का भूल हुई, जो ये सज़ा हमका मिली”, बहुत मशहूर हुई| एक शानदार सफ़र, एक चमकदार सितारे का, शुरू हो चुका था| 1981 में आई नसीब और 1984 में आई, “सोहनी महिवाल” के गीतों ने इनकी आवाज़ को आवाम से आशना कर दिया| “सोहनी मेरी सोहनी सोहनी”, “ज़िंदगी इम्तेहान लेती है”, इन गानों को कौन भूल सकता है|

इनके गीत 1991 में आई फ़िल्म “साथी” के आने तक मशहूर हुआ करते थे, लेकिन इनका मुस्तक़बिल उसी वक़्त तय कर दिया गया था जब इन्होंने मनमोहन देसाई और राज कपूर साहब से अपने हक़ के कुछ पैसे खुलकर मांग लिए| इनकी फ़ीस 80 के दशक में 5000 रुपये हुआ करती थी, इन्होंने 6000 मांगे, क्योंकि काम थोड़ा ज़्यादा किया था| इसे बेआदबी कह कर , धीरे धीरे इन्हें काम मिलना कम हो गया और फिर बंद|

ग़ुरबत से बचने के लिए ये अमरीका चले गए और अपना एक म्यूज़िक स्कूल खोल लिया| लेकिन ये भी बहुत चल न सका| इन्हें वापस मुंबई आना पड़ा|

वापस आ कर इन्होंने फिर से कोशिश की, एक एल्बम भी “तोहफ़ा” के नाम से निकाला और ये करने के लिए क़र्ज़ भी लिया| एल्बम नहीं चली और इनका घर भी ज़ब्त हो गया| हालात इतने बिगड़े कि इन्हें मैख़ानों तक में गाना पड़ा| अभी भी हालातों से लड़ते हुए, इनकी ज़िंदगी बसर हो रही है और इनके भाई (सौतेले), मशहूर अदाकार अरशद वारसी भी, मदद तो दूर, इनका ज़िक्र करते भी नहीं सुने जाते|

ऑटो ट्यूनर के ज़माने में, आलिया भट्ट, सलमान ख़ान, परिनीति चोपड़ा जैसे अदाकारों को गायक साबित करने की ज़िद के दौर में, तरन्नुम के मायने बदल से गए हैं और एक शास्त्रीय संगीत के जानकार और तैयार गायक को जद्दोजहद करनी पड़ रही है|

आज जब अनवर अपने गाए गाने “मोहब्बत अब तिजारत बन गई है” को सुनते होंगे तो इसके मायने ज़्यादा समझते होंगे और फिर अपने ही एक गीत से मन को बहला भी लेते होंगे, जिसके बोल थे:

हाथों की चंद लकीरों का

सब खेल है ये तक़दीरों का”

(लेखक जाने-माने साहित्यकार, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)

भूली हुई यादें- “सज्जन लाल पुरोहित”

डॉ० कुमार विमलेन्दु सिंह | Navpravah Desk

“शायर-ए-फ़ितरत हूँ मैं,

जब फ़िक़्र फ़रमाता हूँ मैं

रूह बनकर, ज़र्रे ज़र्रे में

समा जाता हूँ मैं”

-जिगर

फ़ितरत की ही तो बात होती है, आग़ाज़ और अंजाम की परवाह के बग़ैर, हयात में, हर ज़र्रे को अपना मान लेना, क़लंदर की तरह हर मुसाफ़िरख़ाने को अपना आशियाना मान लेना, सब का मुदावा करने की फ़िक़्र में होना और कम-व-कास्त, लेकिन फ़क़ीर होना| ये मिज़ाज किसी किसी को कभी-कभी ही मिलता है और अगर ये फ़क़ीरी,  किसी अदीब, फ़नकार या सियासतदान को मिले, तो तारीख़ में दर्ज़ हो जाती है उसकी शख्सियत, जिसे हम भुलाना भी चाहें तो नहीं भुला सकते, और अगर कभी, धूल पड़ भी जाए, वक़्त के साथ तो सबा-ए-बहार, उसे फिर से ताज़ा तरीन कर देती है|

1941 में ऐसा ही एक क़लंदर और क़लमदस्त, ईस्ट इंडिया कंपनी में, बतौर मुलाज़िम, कलकत्ता (अब कोलकाता) पहुंचा, नाम था, सज्जन लाल पुरोहित| जल्दी ही लिखने के शौक़ और एक बेहतर ज़िंदगी की ख़्वाहिश ने, क़दम, बंबई (अब मुंबई) की ओर मोड़ दिए| दूसरी जंग-ए-अज़ीम, ज़ोरों पर थी, पर इनके दिल में सपने पल रहे थे|

1953 की फ़िल्म ‘मालकिन’ के पोस्टर में सज्जन (PC- Cinestaan)

बंबई पहुंचते ही कुछ छोटे किरदार करने के बाद, इन्होंने मशहूर डायरेक्टर किदार शर्मा की शागिर्दी में काम करना शुरू किया| महान अभिनेता राज कपूर भी उन दिनों, वहीं काम सीख रहे थे|

1944-1950 के बीच इन्होंने, अभिनय के साथ, “मीना”, “दूर चलें” और “धन्यवाद” जैसी फ़िल्मों के डायलॉग और गीत भी लिखे. 1950 में आई फ़िल्म, “मुक़द्दर” में मशहूर अदाकारा नलिनी जयवंत, इनकी नायिका थीं और इस फ़िल्म ने #सज्ज्न जी को ख़ूब शोहरत दी.

1950 से 1960 के बीच, इन्होंने ख़ूब काम किया और तमाम बड़ी अदाकाराएं, जैसे, मधुबाला, नरगिस वगैरह, इन फ़िल्मों में इनकी नायिकाएं रहीं| वैसे तो इन्होंने 1986 तक फ़िल्मों में काम किया, इसी साल आई फ़िल्म “शत्रु” में, राजेश खन्ना के साथ ये दिखे| बतौर नायक, इनकी आख़िरी फ़िल्म “दो चोर” थी| इतना काम करने के बाद, जिस किरदार ने उन्हें कभी न भूलने वाला चेहरा बनाया, वो था इनका निभाया , बेताल का किरदार, जो इन्होंने मशहूर धारावाहिक “विक्रम और बेताल” में निभाया| ये कभी न भूलने वाला किरदार था|

80 के दशक में दूरदर्शन प्रसारित धारावाहिक ‘विक्रम और बेताल’ में बतौर बेताल एक दृश्य में सज्जन (PC-Moserbaer)

एक कामयाब अदाकार होने के साथ ये शानदार शायर और बेहतरीन अदीब भी थे| मशहूर फ़ोटोग्राफ़र ओ०पी०शर्मा के साथ इन्होंने, भरतमुनि के नाट्यशास्त्र पर आधारित किताब , “रस, भाव, दर्शन” लिखी, जो आज भी पढ़ी जाती है|

नाट्यशास्त्र पर आधारित पुस्तक ‘रस भाव दर्शन’ जिसकी रचना सज्जन ने फोटोग्राफ़र ओपी शर्मा के साथ की. (PC-Exotic India)

एक दौर वो भी था जब सब के महबूब ग़ज़ल गायक तलत महमूद, सभी जलसों में, इनकी लिखी, एक ग़ज़ल ज़रूर गाते थे|

“मेरा प्यार मुझे लौटा दो

मैं जीवन में उलझ गया हूं

तुम जीना सिखला दो”

साल 2000 में इनका इन्तक़ाल हो गया| इतनी सलाहियत रखने वाला एक बेहतरीन अदाकार, शायर और अदीब, बेपरवाह फ़क़ीर सा, अपने धुन में चलता रहा, ये सोचे बिना कि क्या मिलेगा, वो हमेशा शुक्रगुज़ार रहा उसके लिए जो मिला था, फ़रेब की रोशनियों के परे सय्यार की ख़ुशी भी इसी नामालूमी में है कि सरचश्मा मिले न मिले|

(लेखक जाने-माने साहित्यकार, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)

ट्रम्प के आरोपों के बाद एक बार फिर घिरे WHO अध्यक्ष डॉ टेड्रोस ऐडनम

US President-elect Donald Trump speaks during a press conference January 11, 2017 at Trump Tower in New York. Trump held his first news conference in nearly six months Wednesday, amid explosive allegations over his ties to Russia, a little more than a week before his inauguration. / AFP / TIMOTHY A. CLARY (Photo credit should read TIMOTHY A. CLARY/AFP/Getty Images)

अमित द्विवेदी | Navpravah.com

डब्ल्यूएचओ के अध्यक्ष टेड्रोस ऐडनम अपने ही देश इथोपिया में तीन महामारियों को छुपाने के आरोपों से एक बार फिर घिर गए हैं। टेड्रोस ऐडनम के ऊपर आरोप लगाया जा रहा है कि जब वह इथियोपिया के स्वास्थ्य मंत्री थे, तब उन्होंने वहां 3 बार फैली कॉलरा की महामारी को दर्ज ही नहीं किया था।

हाल ही में डब्ल्यूएचओ के अध्यक्ष डॉ टेड्रोस ऐडनम के ऊपर कोरोना वायरस के अपडेट और गाइडलाइन्स जारी करने में देरी किये जाने को लेकर दुनियाभर से आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था। और अब इन आरोपों की वजह से टेड्रोस की मुश्किलें बढ़तीं नज़र आ रही है। हालाँकि पिछली बार की तरह उन्होंने इस बार भी तमाम आरोपों से पल्ला झाड़ते हुए इसे पिछले आरोपों का ही हिस्सा बताया।

टेड्रोस ने इन आरोपों का खण्डन करते हुए कहा है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जो WHO के ऊपर चीन का पक्ष लेने का आरोप लगाया है, ताजा आरोप भी उसी का हिस्सा है।

ज्ञातव्य है कि गत वर्ष सितंबर में अमेरिका के चिकित्सकों ने टेड्रोस को खत लिखकर कहा था, ‘सूडान में जो हो रहा है, उस पर आपकी चुप्पी की निंदा की जानी चाहिए। सूडान से जेनेवा पीड़ितों के सैंपल भेजने में आप असफल रहे, जिसकी वजह से कॉलरा की आधिकारिक पुष्टि नहीं की जा सकी। हर दिन यह साबित हो रहा है कि यह एक महामारी है और इस तकलीफ के आप जिम्मेदार हैं।’

खबर के मुताबिक़, टेड्रोस के ऊपर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने पर्यटन को नुकसान से बचाने के लिए ‘कॉलरा’ की जगह ‘अक्यूट वॉटरी डायरिया’ टर्म का इस्तेमाल किया था। टेड्रोस ने इस आरोप का खंडन भी किया था और आरोप लगाया था कि उन्हें बदनाम करने के लिए ऐसे आरोप लगाए जा रहे हैं।

यूपी: भदोही में कलयुगी माँ ने अपने 5 बच्चों को गंगा नदी में फेंका

अंकित द्विवेदी | Navpravah.com
उत्तर प्रदेश के भदोही जिले में एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है। यहाँ एक महिला ने अपने ही पाँच बच्चों को आधी रात गंगा नदी में फेंक दिया। सुबह जब स्थानीय पुलिस को इस घटना की सूचना मिली, तब आनन-फ़ानन में रेस्क्यू शुरू हुआ।
भदोही पुलिस द्वारा प्राप्त जानकारी के मुताबिक़, यह घटना गोपीगंज कोतवाली क्षेत्र के जहांगीराबाद गंगा घाट की है। जहांगीराबाद गांव की रहने वाली मंजू देवी के दो बेटे और तीन बेटियां हैं। मंजू देवी रात में करीब ढाई बजे अपने बच्चो को लेकर गंगा घाट पर पहुंची, इसके बाद वो गहरे पानी में चली गई और अपने बच्चों को नदी में फेंक दिया। इसके बाद रात को ही अपने घर चली आई।
पति से थी परेशान-
इस मामले में जब महिला से बात की गई तो उसने बताया कि उसका और उसके पति का अक्सर झगड़ा होता रहता था, जिससे तंग आकर उसने इस घटना को अंजाम दिया। महिला ने कहा कि रोज़ के झगड़े से वह त्रस्त हो चुकी थी, इसीलिए उसको यही कदम सही लगा।
बताया जा रहा है कि जब वह अपने बच्चों को लेकर गंगा घाट की ओर गई, तब घर में उसका पति मौजूद नहीं था। जिन बच्चों को महिला ने गंगा में फेंका है, उनके नाम हैं वंदना (12 साल), रंजना (10 साल), पूजा ( 6 साल), शिव शंकर ( 8 साल), संदीप ( 5 वर्ष ) के रूप में हुई है।
घटना की जानकारी के बाद ज़िलाधिकारी, एसपी पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे और उन्होंने स्थानीय गोताखोरों की मदद से बच्चों की तलाश शुरू कर दी है। हालांकि, अभी तक बच्चों का पता नहीं चल पाया है। फ़िलहाल, पुलिस आरोपी मां से पूछताछ कर रही है।

भूली हुई यादें- “हेमलता”

डॉ० कुमार विमलेन्दु सिंह | Navpravah Desk

“दयारे इश्क़ में अपना मुक़ाम पैदा कर

नया ज़माना, नया सुब्ह-ओ-शाम पैदा कर”

-इक़बाल

ये गुज़ारिश या ये हिदायत, कर कोई भी सकता है, दे कोई भी सकता है, मगर जिससे ये गुज़ारिश की जाती है और जिसको ये हिदायत दी जाती है, उसका ख़ास होना, ज़हीन होना, बेहद ज़रूरी है, और उससे भी ज़रूरी है रज़ामंद होना तक़दीर से, डूब कर हर लम्हे को जी लेने जज़्बा होना, फ़क़ीरों सी बेफ़िक्री और मजाज़ जैसा मिज़ाज, कि “पी भी गए, छलका भी गए|”

ये हिदायतें दे रहे थे नौशाद साहब जैसे अज़ीम मौसिक़ार, और गुज़ारिश कर रहे थे रौशन मुस्तक़बिल के मालिक, रवीन्द्र जैन साहब और जो ये सब सुन रही थीं, उनका नाम था “लता भट्ट”| लता, एक मारवाड़ी ब्राह्मण परिवार में , हैदराबाद में पैदा हुईं और इनका बचपन कलकत्ता में बीता| इनके संगीत के शौक़ की वजह से पूरा परिवार बंबई (अब मुंबई) आ गया और यहाँ आते ही, इन्हें उस्ताद अल्लारखा खां और नौशाद साहब की निगरानी और बेहतरीन तरबियत मिली| लता के नाम से पहले से ही लता मंगेशकर गा रही थीं और उनकी सलाहियत से पूरी फ़िल्मी दुनिया आशना थी| ऐसे में किसी नई गायिका का जगह बना पाना बहुत ही मुश्किल था| लता भट्ट का नाम #हेमलता हो गया और शाहीन की तरह बेपरवाह, वो उड़ने को तैयार थीं| पहली परवाज़, इन्होंने, उषा खन्ना जी की धुनों के साथ, 1968 में भरी| उनका पहला गीत जो दुनिया को सुनाई पड़ा, वो फ़िल्म, “एक फूल, एक भूल” का था|| इसके बाद 1970 से 1972 तक कई मशहूर गानों का कवर वर्ज़न गाया|

हेमलता (PC- Google)

1972-1975 तक रवीन्द्र जैन ने इन्हें “गीत गाता चल” और कुछ और फ़िल्मों में मौक़ा दिया, पर बात नहीं बनी| 1976 में आई “फ़कीरा” के गीत, “सुन के तेरी पुकार” ने उन्हें मशहूर कर दिया| एक शानदार सफ़र का आग़ाज़ हो चुका था| इसका संगीत भी रवीन्द्र जैन ने ही दिया था|

1977 में आई फ़िल्म “चितचोर” में येसुदास के साथ इन्होंने, एक गीत गाया जिसके लिए इन्हें फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड से नवाज़ा गया| गीत के बोल थे, “तू जो मेरे सुर से सुर मिला ले”|

क़िस्मत साल दर साल किश्तों में मेहरबान हो रही थी| 1979 में आई फ़िल्म, “अंखियों के झरोखों से”, का टाइटल गीत, सभी के दिलों में घर कर गया| कुछ ही सालों बाद 1982 में आई फ़िल्म “नदिया के पार” के सारे मशहूर गाने इन्होंने ही गाए| इनका गाया, “बबुआ ओ बबुआ”, “कौन दिसा में ले के”, “जोगी जी धीरे धीरे” और भी कुछ गानों को कोई आजतक नहीं भूल पाया है|

1990 के दशक में अकसर येसुदास के साथ, दूरदर्शन पर इनका एक ग़ैर फ़िल्मी गाना, ” तीस्ता नदी सी तू चंचला, मैं भी हूं बचपन से मनचला”, प्रसारित किया जाता था| ये दशक, टेलीविज़न का था और रामायण, महाभारत, श्री कृष्णा जैसे धार्मिक धारावाहिक, 90 के दशक के शुरूआती सालों तक चले| रामायण और श्री कृष्णा में ज़्यादातर गाने इन्ही के गाए हुए हैं|

येसुदास के साथ सबसे ज़्यादा गाने इन्होंने ही बतौर हिन्दी भाषी गायिका, गाए हैं| ये भारत की एकमात्र ऐसी गायिका हैं, जिन्होंने अमरीका में अपनी अकादमी खोली और भारतीय शास्त्रीय संगीत को फैलाने का काम किया| इन्होंने मो०रफ़ी, महेन्द्र कपूर और मन्ना डे जैसे फ़नकारों के साथ, पूरी दुनिया में घूमकर भारत का परचम लहराया|

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी इन्होंने संगीत के लिए बहुत कुछ किया| पाक़िस्तान के मशहूर क्रिकेट खिलाड़ी (अब प्रधानमंत्री) के कैंसर अस्पताल के लिए, वहां के मशहूर गायक अत्ताउल्लाह ख़ान के साथ मिलकर कई चैरिटी वाले जलसों में शामिल हुईं| अत्ताउल्लाह ख़ान के साथ ही इन्होंने दो एल्बम, “सरहदें” और “इश्क़ भी निकाली|

एक इंटरव्यू में हेमलता (PC- Rajyasabha TV)

हेमलता ने बहुत शोहरत कमाई, लेकिन हमारे देश में, ख़ासकर साहित्य, संगीत और अदाकारी की दुनिया में नायक/नायिका पूजन की ऐसी रस्म है, जिसके आगे कई हुनरमंद या तो गुमनाम हो गए या उन्हें तरजीह नहीं मिली| ऐसे नायक/नायिका आज भी किसी हुनरमंद को देखकर परेशान हो जाते हैं, इनकी एक अपनी दुनिया है, जिसमें सारे इनाम ये एक दूसरे को ही देते हैं, मगर कुछ #हेमलता से भी फ़नकार हुए, जो भले ही ख़यालों में ज़्यादा देर ठहर नहीं पाए लेकिन बिना रुके चलते रहे, एक नई सहर की तलाश में, शब को नकारते हुए, ये सोचते हुए कि:

“काम अपना है सुबह ओ शाम चलना

चलना, चलना मुदाम चलना|”

-इक़बाल

(लेखक जाने-माने साहित्यकार, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)

भूली हुई यादें- “हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय”

डॉ० कुमार विमलेन्दु सिंह | Navpravah Desk

Tonight the night to me

Is very dear

The poem is returning .

To the Poet. **

(आज अति-प्रिय कहता हूँ,

रात्रि-छवि को

कविता लौट रही है,

अपने ही कवि को|)***

ये पंक्तियां उस कवि की हैं जिसकी अंग्रेज़ी कविताओं की प्रशंसा, अरविंद घोष जैसे संत करते थे और जिसके हिन्दी में लिखे गीत, रबीन्द्रनाथ टैगोर जैसे महापुरुष को पसंद थे| जो अंग्रेज़ी साहित्य के प्रशंसक हैं या रहे हैं, वो इन्हें एक बहुत ही अच्छे कवि के रूप में जानते हैं और जो सिनेमा में दिलचस्पी रखते हैं, वो इन्हें एक बेहतरीन चरित्र अभिनेता के रूप में जानते हैं| जो इन्हें दोनो तरह से जानते हैं, उन्हें ये नहीं पता कि ये स्वतंत्र भारत के प्रथम चुनाव में विजयवाड़ा के प्रथम सांसद के रूप में लोकसभा में गए थे और जो ये सब जानते हैं, वो ये भूल चुके होंगे कि इनकी बहन का नाम सरोजिनी नायडू था| इस महान व्यक्तित्व का नाम था- हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय|

हैदराबाद में, एक बेहद शिक्षित, सशक्त और कुलीन ब्राह्मण परिवार में इनका जन्म हुआ| इनके पिता, श्री अघोरनाथ चट्टोपाध्याय, एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण और दार्शनिक प्रवृत्ति के शिक्षाविद् थे और माता सुन्दरी देवी, कवयित्री थीं| ऐसी पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण साहित्य और संगीत के प्रति इनका लगाव रहा| उच्च शिक्षा के लिए हरीन्द्रनाथ केंब्रिज गए|

१९७२ की प्रसिद्द फिल्म बावर्ची के एक दृश्य में हरीन्द्रनाथ (PC-YouTube)

1918 में, अंग्रेज़ी में इनकी पहली कविता संग्रह, “The Feast of Youth”, आई और इसी साल इन्होंने “अबू हसन”, नाम का नाटक भी लिखा| इसके बाद वे लगातार कई वर्षों तक लिखते रहे| 60 के दशक से इन्होंने फ़िल्मों में काम करना शुरू किया| 1962 में आई गुरूदत्त की चर्चित फ़िल्म “साहब, बीबी और ग़ुलाम” में इन्होंने अभिनय यात्रा, असरदार ढंग से शुरू की| इसके बाद कई हिन्दी और बांग्ला फ़िल्मों में भी ये काम करते रहे| इन्होंने ज़्यादातर, बतौर चरित्र अभिनेता ही काम किया और इन्हें प्रशंसा भी मिलती रही|

१९६८ की फिल्म आशीर्वाद में ढोलकिया के किरदार में हरीन्द्रनाथ (PC-YouTube)

अभिनेता के तौर पर इन्हें सबसे अधिक प्रशंसा मिली, 1972 में आई फ़िल्म, “बावर्ची” से, जिसमें इन्होंने एक संयुक्त परिवार में रहने वाले विधुर और वृद्ध पिता की भूमिका निभाई थी| हालांकि इसके पहले भी, वे “आशीर्वाद”, “नौनिहाल” और “तीन देवियां”, जैसी मशहूर फ़िल्मों में दिख चुके थे| 80 के दशक तक ये फ़िल्मों में सक्रिय रहे| इन्होंने बच्चों के लिए, हिन्दी में कई कविताएं लिखीं| 1968 में आई, “आशीर्वाद” में अशोक कुमार पर फ़िल्माए गए गीत “रेलगाड़ी, रेलगाड़ी” को इन्होंने ही लिखा था और धुन भी इनकी ही थी| इस गाने को वे आकाशवाणी से कई बार अपनी आवाज़ में भी प्रस्तुत करते थे|

१९६३ की फिल्म तेरे घर के सामने में अभिनेत्री नूतन के साथ हरीन्द्रनाथ (PC-Google)

हरीन्द्रनाथ का वैवाहिक जीवन भी बहुत सुखद नहीं चला. इनकी पत्नी कमलादेवी और इनके बीच जो तलाक़ हुआ, वो संभवतः, स्वतंत्र भारत के इतिहास में अदालत से मंज़ूर हुआ पहला तलाक़ था.

1990 में, हरीन्द्रनाथ का निधन हो गया|

ऐसा नहीं है कि उनका जीवन गुमनामी में बीता| उनका पूरा जीवन, उपलब्धियों और प्रसिद्धि में ही बीता, लेकिन ये सब उनकी सशक्त राजनैतिक उपस्थिति के कारण था| अंग्रेज़ी कविता में आध्यात्मिक परंपरा के कवि के रूप में जो प्रतिष्ठा उन्हें मिलनी चाहिए थी, नहीं मिली और सिनेमा जगत में भी जिस आत्मविश्वास के साथ उन्होंने काम किया, उतनी प्रसिद्धि उन्हें नहीं मिली| यह भारतीय सिनेमा का दुर्भाग्य ही माना जाएगा कि आजतक किसी भी उच्च कोटि के साहित्यकार, संगीतकार या अदाकार को उतना नहीं दे पाया जितना मिलना उनका हक़ था| ऐसा हर बार होना, फ़िल्म जगत के आधारभूत संरचना और व्यापार करने के ढंग पर एक प्रश्नचिन्ह लगाता है|

** यह हरीन्द्रनाथ जी द्वारा लिखित, मूल अंग्रेज़ी कविता का अंश है जो संग्रह, “Spring In Winter”, में आई थी|

*** हिन्दी अनुवाद डॉ. विमलेन्दु सिंह द्वारा किया गया है|

(लेखक जाने-माने साहित्यकार, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)

CORONA VIRUS के खौफ से ओला-उबर भी बंद, अब आप नहीं कर पाएंगे यात्रा

नई दिल्ली॥ CORONA VIRUS मुसीबत के बीच टैक्सी सेवाएं उपलब्ध कराने वाली कम्पनी ओला और उबर ने अपनी साझा यात्रा सेवाओं क्रमश: ओला शेयर और उबर पूल को अस्थायी रूप से बन्द कर दिया है।दोनों कम्पनी की इन साझा यात्रा सेवाओं का इस्तेमाल कर एक ही रास्ते पर सफर करने वाले कई यात्री एक साथ यात्रा कर सकते हैं। ओला ने कहा कि CORONA VIRUS के फैलाव को रोकने की कोशिशों के तहत कम्पनी ओला शेयर सुविधा को अगली सूचना तक अस्थायी तौर पर बंद कर रही है।

कम्पनी ने कहा कि उसकी माइक्रो, मिनी, प्राइम, रेंटल और आउटस्टेशन सेवाएं जारी रहेंगी। वहीं उबर ने कहा कि CORONA VIRUS के फैलाव को कम करने में सहायता के लिए हम प्रतिबद्ध हैं। इसलिए जिन शहरों में हम सेवाएं देते हैं, उन शहरों में देशभर में उबर पूल की सेवाएं निलंबित रहेंगी।

निर्भया कांड: फांसी के बाद जल्लाद पवन ने बताया, दरिंदों को नहीं था अपनी गलती का कोई पछतावा

क्राइम डेस्क।। 7 साल के लंबे इंतजार के बाद आखिरकार निर्भया को इंसाफ मिल गया है. निर्भया के चारों दोषियों को शुक्रवार सुबह 5:30 बजे फांसी दे दी गई. पूरे देश ने इस दिन को ‘इंसाफ का सवेरा’ बताया तो वहीं निर्भया के दोषियों को फांसी पर लटाकने वाले पवन जल्लाद ने फांसी के दिन की कहानी बयां की. दोषियों को फांसी देने वाले पवन जल्लाद ने बताया कि फांसी घर में किसी को बोलने की अनुमति नहीं होती है. जिसकी वजह से फांसी वाले दिन भी केवल इशारों से काम किया गया. पवन जल्लाद ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि मैंने निर्भया के चारों दोषियों को फांसी देकर अपना धर्म निभाया है. यह हमारा पुश्तैनी काम है.’ उनका कहना था कि फांसी होने से पहले दरिंदों को पश्चाताप होना चाहिए था, लेकिन उनमें से किसी को पश्चाताप नहीं था.’उन्होंने बताया कि वे 17 मार्च के दिन तिहाड़ आए थे और डमी ट्रायल किया. डमी ट्रायल करने से पहले उन्होंने सबसे पहले फांसी के फंदों को दही और मक्खन पिलाकर मुलायम किया. वहीं अगले दिन सुबह चार बजे फंदों को दोबारा दुरुस्त कर लगाया. पवन जल्लाद का कहना है कि फांसी वाले दिन सुबह दोषियों के हाथ बांधकर फंदे तक लाया गया. सबसे पहले अक्षय और मुकेश को फांसी घर लाया गया इसके बाद पवन और विनय को तख्ते पर ले जाया गया. हर गुनहगार के साथ पांच-पांच बंदीरक्षक थे. उन लोगों को एक-एक कर तख्ते पर ले जाकर खड़ा किया गया.

इसके बाद चारों आरोपियों के फंदे को दो लीवर से जोड़ा गया. इसके बाद उनके चेहरे पर कपड़ा डालकर सभी के गले में फंदा डालकर संतुष्टि की गई और समय के अुनसार जेल अफसर के इशारे पर लीवर खींच दिया गया और उनको फांसी दे दी गई.

Corona virus: UP के गा‎जियाबाद जिला अस्पताल को मिली बड़ी सफलता, कोरोना मरीज हुआ ठीक

हेल्थ डेस्क।। गा‎जियाबाद में मिले दूसरे कोरोना पॉजिटिव को जिला MMG अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। दरअसल, उसकी लगातार दो रिपोर्ट निगेटिव आयी है। हालांकि उसे एहतियातन अगले 14 दिन तक होम आइसोलेशन की सलाह दी गई है। इसके अलावा कम्बाइंड अस्पताल में भर्ती पांच संदिग्ध मरीजों की भी रिपोर्ट निगेटिव आने के बाद उन्हें भी छुट्टी दे दी गई है। वहीं शुक्रवार को 4 संदिग्ध मरीजों को कम्बाइंड अस्पताल के आइसोलेशन में भर्ती किया गया है। इनमें से 3 संदिग्धों का सैंपल लेकर जांच के लिए भेजा गया है, जबकि तीसरे मरीज का सैंपल नोएडा में लिया गया है, जिसकी अभी रिपोर्ट नहीं आई है।आपको बता दें, ‎कि जिले में कारोबारी पिता और उनके बेटे में कोरोना की पुष्टि हुई थी, जिसके बाद पिता को दिल्ली में भर्ती करवाया गया था, जबकि बेटे को जिला एमएमजी अस्पताल के आइसोलेशन वॉर्ड में भर्ती किया गया था। दो दिन पहले दिल्ली सफदरजंग में भर्ती कारोबारी को छुट्टी दे दी गई थी। वहीं उनके बेटे की भी लगातार दूसरी रिपोर्ट निगेटिव आई हैं, इस‎लिये उसे भी अस्पताल से छुट्टी दे गई। जिले के दोनों पॉजिटिव मरीजों के सही होने पर स्वास्थ्य विभाग ने राहत की सांस ली है। हालांकि पिता-पुत्र दोनों को 14 दिनों तक होम आइसोलेशन में रहने की सलाह दी गई है।

CM योगी आदित्यनाथ ने कई MLA को दी हिदायत, सिंगर कनिका की पार्टी में कर रहे थे मस्ती

लखनऊ।। कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया में अपना खौफ फैला रखा है. लेकिन इससे फिलहाल सबसे प्रभावित देश चीन और इटली ही हैं. इसके साथ ही कोरोना वायरस दुनिया भर के लिए एक विकराल समस्या बनता जा रहा है. इस बीच कोरोना वायरस के संक्रमण से निपटने के लिए उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ ने अपने सभी मंत्रियों को वर्क फ्रॉम होम की हिदायत दी है.प्राप्त जानकारी के मुताबिक उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री जय प्रताप सिंह लखनऊ में गायिका कनिका कपूर की पार्टी में शामिल थे. इसके बाद उन्होंने अपना कोरोना वायरस टेस्ट कराया है और खुद को आइसोलेट कर लिया है. गुरुवार को जयप्रताप सिंह से मुलाकात करने वाले बीजेपी के तीन विधायकों ने भी खुद को आइसोलेट कर लिया है.

इसके साथ ही नोएडा के MLA और बीजेपी के प्रदेश महासचिव पंकज सिंह, जेवर के विधायक धीरेंद्र सिंह और दादरी के विधायक तेज पाल को सभी से पृथक कर लिया है क्योंकि वे बृहस्पतिवार को ग्रेटर नोएडा में स्वास्थ्य मंत्री से मिले थे. बता दें कि यूपी में अबतक कोरोना वायरस से 24 लोग पॉजिटिव घोषित किए जा चुके हैं. इनमें से 9 लोगों का इलाज हो चुका है यानी कि अब वे स्वस्थ्य हैं.