विवादित ट्वीट मामले में कांग्रेस नेता पंकज पुनिया को गिरफ्तार किया गया था जिसके बाद उन्हें न्यायालय ने 14 दिवसीय न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है।
हमारे हिंदू समाज की धार्मिक भावनाएँ आहत करने के आरोपी पंकज पूनिया को आज कोर्ट ने 14-दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया है।
मेरी दिल्ली व करनाल की वकील मित्रों की टीम इस मामले में पूरी तरह से सतर्क है।
पंकज पूनिया द्वारा बेल लेने के हर प्रयास का मेरी टीम विरोध करती रहेगी🙏🏻
— Alakh Alok Srivastava (@advocate_alakh) May 22, 2020
कांग्रेस नेता पंकज पुनिया को हरियाणा के करनाल से गिरफ़्तार कर लिया गया था। पुनिया को उनके सोशल मीडिया पर किए गए आपत्तिजनक टिप्पणी के लिए गिरफ़्तार किया गया था।
पंकज पुनिया पर आरोप है कि उनके ट्वीट ने हिन्दुओं की भावनाओं को आहत किया है। उनके ख़िलाफ़ उत्तर प्रदेश के हजरतगंज और नोएडा पुलिस ने आईटी एक्ट सहित कई मामलो में एफ़आईआर दर्ज की थी। हजरतगंज में उनके खिलाफ धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के मामले में भी केस दर्ज हुआ था।
पंकज पुनिया के खिलाफ इस मामले में बुधवार को नोएडा, सेक्टर 39 थाना पुलिस ने एफआईआर दर्ज की थी। ये मुकदमा धारा 295ए, 500, 505, 153ए और 66 आईटी एक्ट के तहत दर्ज किया गया था।ग़ौरतलब है कि पंकज पुनिया ने मई 19, 2020 को अपने एक ट्वीट में संघियों को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी और श्रीराम के नाम का गलत इस्तेमाल किया था।
1990 में आई फ़िल्म, “एक डॉक्टर की मौत”, एक बेचैन कर देने वाली कहानी है, प्रतिभा के हनन की कहानी है, समाज में औसत दर्ज़े की बुद्धि वाले लोगों की भीड़ में एक कुशाग्र बुद्धि पुरुष के खो जाने की कहानी है। यह फ़िल्म, रामपद चौधरी की कहानी, “अभिमन्यु” और डॉ० सुभाष मुखोपाध्याय के जीवन पर आधारित है। डॉ० सुभाष मुखोपाध्याय, उसी वैज्ञानिक का नाम है, जिसने IVF को लेकर बहुत काम उसी दौर में कर लिया था, जब डॉ० रॉबर्ट एडवर्ड, इंग्लैंड में इसी विषय पर काम कर रहे थे, लेकिन हमारे देश की व्यवस्था ने, डॉ० सुभाष मुखोपाध्याय का साथ नहीं दिया और एक अभूतपूर्व आविष्कार से भारत चूक गया।
डॉ० सुभाष मुखोपाध्याय (PC-Wikipedia)
फ़िल्म में भी डॉ० दीपंकर रॉय (पंकज कपूर), कोढ़ (Leprosy) की दवा बना लेते हैं और मीडिया में ये बात फैल जाती है। एक जूनीयर डॉक्टर की ख्याति से उसके सीनियर और उसके मित्र ईर्ष्या से भर जाते हैं और आगे बढ़ते इस डॉक्टर (पंकज कपूर) को व्यवस्था का हवाला दे कर , हर संभव तरीके से परेशान करते हैं।
फ़िल्म के एक दृश्य में पंकज कपूर और शबाना आज़मी
इंग्लैंड के प्रतिष्ठित, जॉन एंडरसन फ़ाउंडेशन से, डॉ० दीपंकर रॉय (पंकज कपूर) के लिए चिट्ठी भी आती है लेकिन उसे दबा दिया जाता है। अमरीका के दो डॉक्टरों को, ठीक वही दवाई जो पहले ही डॉ० दीपंकर रॉय (पंकज कपूर) ने बना ली थी, उसी का आविष्कारक घोषित कर दिया जाता है। ये सब देखकर पंकज कपूर टूट जाते हैं और फिर उसी जॉन एंडरसन फ़ाउंडेशन के बुलाने पर, ये सोच कर चले जाते हैं कि, आख़िरकार मानवता की सेवा करना ही तो उनका लक्ष्य है।
फ़िल्म के एक दृश्य में इरफ़ान खान
फ़िल्म में पंकज कपूर का अभिनय, इतना शानदार है कि ये कहा जा सकता है, निर्विवाद रूप से उन्होंने एक वैज्ञानिक की जीवन शैली और भावनाओं को पर्दे पर जीवित कर दिया है।
“शबाना आज़मी के बिना भी ये फ़िल्म बन सकती थी, लेकिन उन्हें कम संवादों के साथ भी रखा गया है क्योंकि उस दौर में नसीरुद्दीन शाह और शबाना आज़मी को कलात्मक गुणवत्ता का परिचायक, मानने और मनवाने में पूरा फ़िल्म उद्योग व्यस्त था।”
इरफ़ान ने “अमूल्य” का किरदार निभाया है और बहुत प्रशंसनीय ढंग से निभाया है। फ़िल्म में वनराज भाटिया का संगीत है।
देखें फ़िल्म:
भारत में हर दौर में प्रतिभाओं के साथ अन्याय होता रहा है और ऐसा क्यों है, कब तक होगा, व्यवस्था से ऐसे ही सवाल पूछती फ़िल्म है, “एक डॉक्टर की मौत। “
(लेखक जाने-माने साहित्यकार, फ़िल्म समालोचक, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)
“ख़बररसां” कहते हैं उसे, ख़बरें पहुंचाना उसका काम होता है और जब से इंसान ने मआशरत में रहना सीखा, ख़बर पहुंचाने वाले, हरकारे, डाकिए, हर दौर में हुए। शहज़ादों के इश्क़ की बातें लिए, शहज़ादियों तक उड़ के जाते परिंदे हों या रास्तों पर ग़ुबार सा बना कर दौड़ते घुड़सवार हों। तरीक़ा बदला, दौर बदला, जो न बदला, वो था, ख़ैर-ओ-ख़बर जानने की ललक और इसी से पैदा हुए, रिसाले, अख़बार, और समाचार।
सलमा सुल्तान (PC-Salma Sultan fb)
दूरदर्शन, 15 सितम्बर, 1959 से शुरू हो चुका था और 1965 से न्यूज़ बुलेटिन की शुरुआत हो चुकी थी, जो रोज़ 5 मिनट के लिए, तमाम ख़बरों के साथ आता था। प्रतिमा पुरी और गोपाल कौल, रोज़ टेलीविज़न पर ये ख़बरें पढ़ते नज़र आते थे और यही दूरदर्शन के मशहूर चेहरे बनते जा रहे थे। 1967 में दूरदर्शन में एक और चेहरा शामिल हुआ, जिसे बहुत जल्दी सब पहचान जाने वाले थे, और ये चेहरा था, सलमा सुल्तान का।
समाचार उद्घोषणा के दौरान ‘सलमा सुल्तान’ (PC: Dream Treaders Films)
सलमा सुल्तान, 1947 में पैदा हुईं और इनके वालिद, जनाब मो० असग़र अंसारी, कृषि मंत्रालय में अधिकारी थे और बहुत उम्दा ख़यालात के थे। बचपन से ही सलमा की तरबियत इतनी अच्छी हुई कि नुक्ते का ख़याल हो चला और ज़ुबान ख़ूबसूरत। सलमा की स्कूल की पढ़ाई, सुल्तानपुर, मध्य प्रदेश से हुई और इन्होंने भोपाल से ग्रेजुएशन की। M.A. इन्होंने, अंग्रेज़ी को विषय बनाकर, दिल्ली के इन्द्रप्रस्थ कॉलेज से किया और इसके बाद ही, दूरदर्शन में अर्ज़ी दे दी, और चुन भी ली गईं।
सुप्रसिद्ध फ़िल्मी सितारे और ‘सलमा सुल्तान’
1967 से सलमा सुल्तान दूरदर्शन से जुड़ गईं, लेकिन वे बुलेटिन नहीं पढ़ती थीं, क्योंकि उस दौर में चिल्लाना, उछलना, जासूस या ख़बरगीर बनना, जर्नलिज़्म या पत्रकारिता नहीं कहलाता था, एक संजीदा आवाज़ और शख़्सियत की ज़रूरत होती थी और ये संजीदगी उम्र के साथ ही आती है। जवान जोश के नाम पर बेतरतीबियों और सनसनीख़ेज़ ख़बरें या अफ़वाहें फैलाने का दौर अभी बहुत दूर था दूरदर्शन से। प्रतिमा पुरी या गोपाल कौल ही बुलेटिन पढ़ते थे।
“एक बार कुछ ऐसा हुआ कि गोपाल कौल, बुलेटिन पढ़ना नहीं चाह रहे थे लेकिन सब उनपर, इसके लिए दबाव बना रहे थे। गोपाल कौल अगले दिन सिर मुंडवा कर आ गए और उन्हें इस तरह टेलीविज़न पर नहीं भेजा जा सकता था। यही वो दिन था जब पहली दफ़ा, सलमा सुल्तान से पूछा गया कि क्या वे बुलेटिन पढ़ लेंगी?”
सलमा मान गईं और उस वक़्त, रोज़ाना बुलेटिन,10 मिनट का हो चुका था। सलमा ने बुलेटिन पढ़ा और जब पढ़ कर वापस आईं तो सब ने बताया कि उन्होंने, 10 मिनट का बुलेटिन 5 मिनट में ही ख़त्म कर दिया था और संभालने के लिए फ़िलर डालना पड़ा था। लेकिन एक चीज़ सबने देखी थी कि इनका तलफ़्फुज़ बहुत बेहतरीन है। उसके बाद सलमा की आवाज़ और उनका अंदाज़, दूरदर्शन की पहचान बन गया। बालों में गुलाब लगाए, चेहरे पर ज़हीन होने का नूर लिए और गले के पास साड़ी का V बनाए, सलमा कई सालों तक दूरदर्शन के कभी न भूल पाने वाले चेहरों में में से एक बनी रहीं। साल दर साल, ये कई ख़ुशी और ग़म की ख़बरें हम तक पहुंचाती रहीं। 31 अक्टूबर, 1984 को, श्रीमती इंदिरा गांधी को गोली लगने की ख़बर भी सलमा सुल्तान ने ही पढ़ी थी।
सलमा अदब या साहित्य पढ़ी थीं, सो पढ़ने और रचने का शौक़ उन्हें रहा। लेन्सव्यू प्राइवेट लि० नाम से एक प्रोडक्शन हाउस भी इन्होंने बनाया और बच्चों के के लिए, “पंचतंत्र से” और “सुनो कहानी” जैसे धारावाहिक बनाए। “जलते सवाल” भी इनके प्रोडक्शन हाउस की एक बेहतरीन पेशकश थी।
सलमा सुल्तान के शौहर, आमिर क़िदवई एक बड़े ओहदे के इंजीनियर थे और इनकी बहन मैमूना सुल्तान, भोपाल से चार बार संसद सदस्य बनीं। इनके बेटे साद और बेटी सना अपनी ज़िंदगी में बेहद ख़ुश हैं।
एक इंटरव्यू में ‘सलमा सुल्ताना’ (PC: Dream Treaders Films)
सलमा सुल्तान, दिल्ली में रहती हैं और आज के दौर के हिन्दुस्तान में, किसी का बचपन, किसी के संघर्ष की याद तो किसी की ज़िंदगी का अहम दौर, इनकी शख़्सियत, इनके अंदाज़, इनकी आवाज़ और इनके चेहरे से सीधा जुड़ा हुआ है। सलमा सुल्तान को उम्र मिले, सेहत मिले, शिफ़ा मिले, ऐसी हम दुआ करते हैं।
(लेखक जाने-माने साहित्यकार, फ़िल्म समालोचक, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)
कोयला घोटाले से जुड़े झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा को आज दिल्ली हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। हाईकोर्ट ने मधु कोड़ा की याचिका को खारिज कर दिया है, इस याचिका में कोयला घोटाला मामले में दोषसिद्धि पर रोक लगाने की अपील की गयी थी।
Delhi High Court dismisses former Jharkhand CM Madhu Koda's (in file pic) plea seeking stay on his conviction order in a coal block allocation case, so that he can contest elections. pic.twitter.com/BrD3XFsuXf
न्यायमूर्ति विभु बाखरु ने कहा कि व्यापक राय यह है कि अपराधों से जुड़े व्यक्तियों को सार्वजनिक पदों के लिये चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए। कोड़ा ने 2019 के झारखंड विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए अपनी दोषसिद्धी पर रोक लगाने का अनुरोध करते हुए याचिका दायर की थी।
19 मार्च को अदालत ने उनकी याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया था। अदालत ने कहा, याचिकाकर्ता को तब तक सार्वजनिक पदों के चुनाव लड़ने देने की अनुमति देना ठीक नहीं है, जब तक कि वह निर्दोष साबित न हो जाएं।
एक निचली अदालत ने कोड़ा को झारखंड स्थित कोयला ब्लॉकों के कोलकाता स्थित कंपनी विनी आयरन एंड स्टील उद्योग लिमिटेड को आवंटन में 2017 में भ्रष्टाचार और षडयंत्र का दोषी पाया था।
लाहौर से कराची जा रही पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइंस की फ्लाइट लैंडिंग से पहले ही दुर्घटनाग्रस्त हो गई। विमान लगभग 100 यात्रियों को लेकर जा रहा था। पिया विमान कराची में जिन्ना अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा के पास एक आवासीय कॉलोनी के ऊपर दुर्घटनाग्रस्त हो गया।
अभी तक इस बात की कोई ठोस जानकारी नहीं मिली है कि नुक़सान कितना हुआ है। आवासीय कॉलोनी में कई लोगों की जान गई होगी, ऐसी सम्भावना जताई जा रही है। पीआईए के प्रवक्ता अब्दुल सत्तार ने दुर्घटना की पुष्टि की है। PIA उड़ान पी 8303- 91 यात्रियों और चालक दल के सदस्यों 8 ले जा रहा था।
Here's the latest situation near the flight #PK8303 crash site in Karachi. The Pakistan Army says troops have arrived for relief-and-rescue efforts #PIACrashpic.twitter.com/I0jFgxwHAE
बचे हुए लोगों के बारे में अभी तक कोई जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई है। पीआईए के प्रवक्ता ने कहा, “अभी कुछ भी कहना समय से पहले होगा। हमारे चालक दल को आपातकालीन लैंडिंग से निपटने के लिए प्रशिक्षित किया गया है। मेरी प्रार्थनाएँ सभी परिवारों के साथ हैं। हम पारदर्शी तरीके से जानकारी देते रहेंगे।”
चक्रवाती तूफान ‘अम्फन’ से पश्चिम बंगाल में हुई भारी तबाही का जायजा लेने पीएम मोदी आज कोलकाता पहुंचे, एयरपोर्ट पर राज्यपाल जगदीप धनखड़ और सीएम ममता बनर्जी ने उनका स्वागत किया।
पीएम मोदी और ममता बनर्जी ने हवाई सर्वेक्षण किया, उस दौरान प्रभावित इलाकों के ज्यादातर स्थान पानी से घिरे नजर आ रहे थे, हवाई सर्वेक्षण के बाद पीएम समीक्षा बैठक भी करेंगें।
सीएम ममता बनर्जी ने अम्फन तूफान से करीब 1 लाख करोड़ रुपये तक के नुकसान की आशंका जताई है, इसके चलते 72 लोगों की मौत हो गई और दो जिले पूरी तरह तबाह हो गए हैं।
पीएम मोदी ने सर्वेक्षण के दौरान कहा कि, मैं पश्चिम बंगाल के अपने भाइयों और बहनों को विश्वास दिलाता हूं कि इन कठिन समय में पूरा देश आपके साथ खड़ा है, पीएम मोदी ने जानकारी दी कि, एम्फन तूफान से प्रभावित पश्चिम बंगाल की तत्काल सहायता के लिए केंद्र सरकार द्वारा 1000 करोड़ रुपये का पैकेज दिया गया जाएगा।
Have been seeing visuals from West Bengal on the devastation caused by Cyclone Amphan. In this challenging hour, the entire nation stands in solidarity with West Bengal. Praying for the well-being of the people of the state. Efforts are on to ensure normalcy.
पीएम का इसके साथ ओडिशा भी जाने का कार्यक्रम है, लगभग तीन माह के अंतराल में पीएम मोदी का यह दिल्ली के बाहर पहला दौरा है, कोरोना वायरस की महामारी और देश में जारी लॉकडाउन के चलते पीएम इस दौरान दिल्ली में ही रहे, पीएम मोदी की दिल्ली के बाहर पिछली यात्रा 29 फरवरी को प्रयागराज और चित्रकूट की थी।
रिजर्व बैंक गर्वनर शक्तिकांत दास ने बड़ा फ़ैसला लेते हुए आज फिर लोन सस्ता करने का का ऐलान किया है। RBI की मौद्रिक नीति समिति की अग्रिम बैठक में नीतिगत दरों में कटौती का फैसला किया गया है।
रिजर्व बैंक गवर्नर ने कहा कि नीतिगत रेपो दर में 0.40 प्रतिशत की कटौती की गई है, जबकि रिवर्स रेपो दर को घटाकर 3.35% कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति ने ब्याज दर में 0.40 प्रतिशत कटौती के पक्ष में 5:1 से मतदान किया।
गवर्नर ने कहा कि ‘2020-21 में जीडीपी ग्रोथ नकारात्मक क्षेत्र में रहने की उम्मीद है, भारत में मांग घट रही है, बिजली, पेट्रोलियम उत्पाद की खपत में गिरावट, निजी खपत में गिरावट दर्ज की जा रही है। कोरोना वायरस के प्रकोप के कारण निजी उपभोग को सबसे ज्यादा झटका लगा है।’
बता दें कि इसी महीने कोरोना संकट के बीच पीएम मोदी ने 20 लाख करोड़ के राहत पैकेज का ऐलान किया था। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पैकेज के बारे में विस्तृत जानकारी देने के लिए लगातार पांच दिन प्रेस कॉन्फ्रेंस भी की थी।
घूमकेतु के ट्रेलर में नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी कहते हैं, “ई कौनो फ़िल्मी कहानी नहीं, हमरी कहानी है।” ट्रेलर में ये एक लाइन डालकर फ़िल्म मेकर अनुराग कश्यप आपके एक घण्टे चालीस मिनट का सत्यानाश करने का बीड़ा उठाते हैं और समीक्षा लिख रहे धुरंधरों का १० ग्राम ख़ून जलाने में कामयाब भी होते हैं।
कहानी-
घूमकेतु लखनऊ के पास के एक गाँव का नौजवान छोरा है, बचपन से उसकी बुआ उसको कहानियाँ सुनाती हैं, वहाँ से कहानियों के प्रति उसका रुझान बढ़ता है। बच्चा बड़ा होता है, कहानियों का चस्का चटकारे लेते फ़िल्मी शक्ल लेता है और अब ये लड़का पिच्चर लिखने का मन बनाता है। लिखने की प्रेरणा लड़के के मोहल्ले की एक लड़की भी बनती है, जिसको घूमकेतु चिट्ठी लिखता है, लड़की बताती है कि उसकी सेटिंग किसी और के साथ चल रही है, लेकिन तुम लिखना कभी मत छोड़ना। अब ये चिंगारी उसकी बुझने का नाम नहीं लेती और एक दिन आता है, जब घूमकेतु बम्बई जाने का प्लान बना लेता है। बुआ से मशविरा करता है और कुछ पैसे लपेट के निकल जाता है। वहाँ संघर्ष चलता है और महीने भर बाद वापस लौट आता है।
प्रेडिक्शन-
कुछ लोगों को श्राप होता है कि जब उनको सारी सुविधाओं से लैस कर दिया जाएगा वो चीज़ों को गाढ़े गोबर से लीप देंगे। यही श्राप मिला है अनुराग को, अनुराग कश्यप को। कश्यप को बड़े ऐक्टर्स की छाया सूट नहीं करती। कश्यप बौखला जाते हैं। उन्हें समझ नहीं आता कि वो करें क्या! यही हुआ उनके साथ इस फ़िल्म में।
एक सिंपल सी कहानी को अनुराग ने ऐसा लीपा कि इसमें अलंकरण की कोई सम्भावना नहीं बची। तो मेकर्स के पास उसमें थोड़ा एनिमेशन डालकर ख़ूबसूरत बनाने की कोशिश के अलावा कुछ बचा नहीं था, लेकिन जिस काम को बिगाड़ने में अनुराग लग जाएँ, उसको कौन बना सकता है?
देखें फ़िल्म का ट्रेलर:
अमिताभ बच्चन, रणवीर सिंह, सोनाक्षी सिंहा और चित्रांगदा सिंह ने फ़िल्म को ख़ूबसूरत बनाने की कोशिश की, लेकिन अनुराग के भारी भूकम्प के झटके में सब तहस-नहस हो गया।
निष्कर्ष-
यह बात ज़ोर देते हुए कही जाती है कि घूमकेतु के चक्कर में न पड़ें, नहीं तो एक घण्टे चालीस मिनट की फ़िल्म देखने के बाद आप अपना बाल नोच लें, इसका ज़िम्मा आप का।
(अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के आधार पर की गई समीक्षा एक जटिल काम है, जिसके अंतर्गत केवल पॉजिटिव कमेंट्स की उम्मीद रखना अनुचित है। हमारे यहाँ पेड रिव्यू जैसी भी कोई व्यवस्था उपलब्ध नहीं है।)
1982 में तत्कालीन प्रधानमंत्री, स्व० श्रीमती इंदिरा गांधी के स्वतंत्रता दिवस के भाषण के प्रसारण से टेलीविज़न पर रंगीन (कलर) प्रस्तुति का दौर शुरू हो चुका था। उसी साल एशियन गेम्स का आयोजन भी दिल्ली में ही किया गया था और दूरदर्शन ने इसे प्रसारित भी किया। टेलीविज़न के प्रति उत्साह जाग रहा था लोगों में और अगले ही साल, यानि 1983 में, कपिल देव के नेतृत्व में भारत ने क्रिकेट का विश्व कप जीत लिया। यह एक आशातीत सफलता थी और हर वर्ग के लोगों में, विशेषकर युवाओं में, कई वर्षों बाद, अपने देश के प्रति, गर्व की भावना जगी। अब हर घर में क्रिकेट के प्रति उत्साह था और क्रिकेट देखने की चाहत। विश्व कप विजय ने बहुत से घरों में टेलीविज़न पहुंचा दिया था और दूरदर्शन भी हर रोज़ नए आयाम जोड़ रहा था अपने साथ।
1982 में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के तत्कालीन मंत्री, स्व० वसंत साठे मेक्सिको दौरे पर गए थे और वहाँ उन्होंने उस समय मेक्सिको के टेलीविज़न पर दिखाए जाने वाले धारावाहिक, ” वेन कॉमिंगो” के बारे में जाना और जब वे भारत लौटे, तो दो साल अथक परिश्रम करना पड़ा, कलाकारों को, और दर्शकों को 1984 में एक उपहार मिला, जिसका नाम था, “हम लोग”।
टेलीविज़न पर धारावाहिक की पहली झलक
“हम लोग”, 7 जुलाई, 1984 को पहली बार दूरदर्शन पर दिखाई गई और यह भारत का पहला प्रायोजित धारावाहिक था जिसे सोप ओपेरा कह सकते थे।
सोप ओपेरा का चलन पहले रेडियो से शुरू हुआ था और पूरी दुनिया में सबसे पहले ये अमरीका के शिकागो में प्रसारित किया गया था। शिकागो के WGN रेडियो स्टेशन से 1930 में, “पेंटेड ड्रीम्स” नाम का धारावाहिक प्रसारित किया गया था, जिसे दुनिया का पहला सोप ओपेरा कहा जा सकता है। सोप ओपेरा इसलिए कहा जाता था, इन धारावाहिकों को क्योंकि इनकी प्रायोजक, साबुन की बड़ी कंपनियां हुआ करती थीं।
‘पेंटेड ड्रीम्स’ (PC-oldradioshows.org)
भारत आते-आते इस विधा को समय तो लगा, लेकिन टेलीविज़न पर प्रसारित करने के लिए जब “हम लोग” बनाने की बात आई, तो इसके दो लक्ष्य थे, पहला, लोगों को छोटे परिवार रखने के लिए प्रेरित करना और दूसरा मनोरंजन। धारावाहिक को शिक्षा और मनोरंजन दोनों देना था। धीरे-धीरे, ये इतना लोकप्रिय हो गया कि इसे घर-घर में सराहा गया।
“हम लोग”, मनोहर श्याम जोशी जी ने लिखी थी और इसका निर्देशन, पी० कुमार वासुदेव ने किया था। धारावाहिक का शीर्षक गीत, अनिल बिस्वास ने दिया था।
‘हम लोग’ के सभी पात्र
इस धारावाहिक के सभी पात्र, इतने असरदार थे कि आज तक दर्शकों की स्मृतियों में जीवित हैं। बसेसर, लल्लू, नन्हे, बड़की, मंझली, छुटकी, सब अपने ही घर के लोग लगते थे। 154 एपिसोड के प्रसारण के बाद, 17 दिसम्बर, 1985 को इस धारावाहिक का अंतिम भाग दिखाया गया। इस धारावाहिक में विनोद नागपाल, राजेश पुरी, मनोज पाहवा, सीमा पाहवा, जयश्री अरोड़ा, अभिनव चतुर्वेदी, सुषमा सेठ, आसिफ़ शेख़ समेत कई दिग्गज अभिनेताओं और अभिनेत्रियों ने काम किया।
“हर एपिसोड के अंत में महान अभिनेता, अशोक कुमार भी आते थे और सीधे दर्शकों से बातें करते थे। यह धारावाहिक 25 मिनट तक चलता था। अंतिम भाग ज़्यादा देर तक चला था। इस धारावाहिक की लोकप्रियता इतनी ज़्यादा थी कि, अशोक कुमार को चार लाख युवाओं ने इस निवेदन के साथ पत्र लिखा था कि वे उनके माता-पिता को समझाएं उन्हें अपने मन से विवाह करने देने के लिए। “
इस धारावाहिक की शूटिंग, गुरुग्राम (गुड़गांव) में हुआ करती थी और सभी कलाकार, मंडी हाऊस, दिल्ली से रोज़ गुड़गांव, एक वैन में बैठ कर जाते थे। “हम लोग” ने लोगों को टेलीविज़न के सामने बैठे हुए ख़यालों में तैरना सिखा दिया था। दर्शकों की मांग पर, इसे 1993 में, पुनः दूरदर्शन पर प्रसारित किया गया। दुर्भाग्य की बात है कि जिस धारावाहिक को देश के पहले सोप ओपेरा होने का गौरव प्राप्त है, उसकी रिकार्डिंग के रख- रखाव के बारे में, दूरदर्शन के लोगों और कर्मचारियों तक को नहीं पता। यूट्यूब पर भी बस इस धारावाहिक का पहला एपिसोड ही है।
धारावाहिक का पहला एपिसोड:
“हम लोग”, दूरदर्शन के आर्काइव्स से ग़ायब हो सकता है लेकिन, लोगों के मन में ये हमेशा रहेगा। “हम लोग” ने पूरे परिवार को एक साथ बैठ कर कहानियों में डूबना उतरना सिखा दिया था और आने वाले समय में दूरदर्शन, बच्चों और बड़ों को एक साथ समय बिताने के बेहतरीन मौक़े देने के लिए तैयार हो चुका था।
(लेखक जाने-माने साहित्यकार, फ़िल्म समालोचक, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)
अनुराग कश्यप निर्देशित फ़िल्म का ट्रेलर नेटफ़्लिक्स ने रीलीज़ कर दिया है। फ़िल्म में मुख्य किरदार निभाया है सय्यामी खेर ने। अनुराग इसके पहले भी ओटीटी के लिए फ़िल्म्स बना चुके हैं। फ़िल्म के ट्रेलर रीलीज़ होने के बाद डिजिटल मीडिया पर काफ़ी तारीफ़ मिल रही है।
फ़िल्म में सय्यामी एक बैंकर हैं, जो एक औसत जीवन जीती हैं। एक दिन अचानक से सय्यामी की ज़िन्दगी तब बदल जाती है, जब चोक हुए किचेन की नाली से पानी से पैसे के बंडल मिलते हैं। बस ज़िंदगी एकदम से बदल जाती है, ज़िन्दगी बड़ी मुश्किल और कंजूसी से चलाने वाली सय्यामी शाहख़र्च बन चुकी होती हैं। इस बदलाव की आदत परिवार को हो पाए, इसके पहले ही उनकी ज़िंदगी में नोटबंदी नाम की ट्रेजेडी हो जाती है।
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नोटबंदी की घोषणा कर देते हैं। सय्यामी की रंगीन ज़िंदगी एकदम से ब्लैक एण्ड व्हाइट हो जाती है।
अपने व्यक्तिगत जीवन में सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुखर विरोधी व कड़ी आलोचना और विवादित बयानबाजी के लिए मशहूर फिल्म मेकर अनुराग कश्यप ने इस बार अपनी फिल्म के मार्फ़त से नोटबन्दी जैसे राजनीतिक मुद्दे को टार्गेट करने की कोशिश की है। फ़िल्म में इसके नेगेटिव-पॉजिटिव पहलू में से किस पर अधिक ज़ोर दिया गया है, इसका आंकलन तो फ़िल्म देखने के बाद ही किया जा सकता है।
फ़िलहाल फ़िल्म के साथ कितना न्याय कर पाएँ हैं अनुराग, देखने के लिए ५ जून तक का इंतज़ार करना पड़ेगा। रीलीज़ की तारीख़ ५ जून ही निश्चित की गई है।