“एक डॉक्टर की मौत (1990)” -हमारे सिस्टम से सवाल पूछती कालजयी फ़िल्म

डॉ० कुमार विमलेन्दु सिंह | Cinema Desk

1990 में आई फ़िल्म, “एक डॉक्टर की मौत”, एक बेचैन कर देने वाली कहानी है, प्रतिभा के हनन की कहानी है, समाज में औसत दर्ज़े की बुद्धि वाले लोगों की भीड़ में एक कुशाग्र बुद्धि पुरुष के खो जाने की कहानी है।  यह फ़िल्म, रामपद चौधरी की कहानी, “अभिमन्यु” और डॉ० सुभाष मुखोपाध्याय के जीवन पर आधारित है।  डॉ० सुभाष मुखोपाध्याय, उसी वैज्ञानिक का नाम है, जिसने IVF को लेकर बहुत काम उसी दौर में कर लिया था, जब डॉ० रॉबर्ट एडवर्ड, इंग्लैंड में इसी विषय पर काम कर रहे थे, लेकिन हमारे देश की व्यवस्था ने, डॉ० सुभाष मुखोपाध्याय का साथ नहीं दिया और एक अभूतपूर्व आविष्कार से भारत चूक गया।

डॉ० सुभाष मुखोपाध्याय (PC-Wikipedia)

फ़िल्म में भी डॉ० दीपंकर रॉय (पंकज कपूर), कोढ़ (Leprosy) की दवा बना लेते हैं और मीडिया में ये बात फैल जाती है।  एक जूनीयर डॉक्टर की ख्याति से उसके सीनियर और उसके मित्र ईर्ष्या से भर जाते हैं और आगे बढ़ते इस डॉक्टर (पंकज कपूर) को व्यवस्था का हवाला दे कर , हर संभव तरीके से परेशान करते हैं।

फ़िल्म के एक दृश्य में पंकज कपूर और शबाना आज़मी

इंग्लैंड के प्रतिष्ठित, जॉन एंडरसन फ़ाउंडेशन से,  डॉ० दीपंकर रॉय (पंकज कपूर) के लिए चिट्ठी भी आती है लेकिन उसे दबा दिया जाता है।  अमरीका के दो डॉक्टरों को, ठीक वही दवाई जो पहले ही  डॉ० दीपंकर रॉय (पंकज कपूर) ने बना ली थी, उसी का आविष्कारक घोषित कर दिया जाता है।  ये सब देखकर पंकज कपूर टूट जाते हैं और फिर उसी जॉन एंडरसन फ़ाउंडेशन के बुलाने पर, ये सोच कर चले जाते हैं कि, आख़िरकार मानवता की सेवा करना ही तो उनका लक्ष्य है।

फ़िल्म के एक दृश्य में इरफ़ान खान

फ़िल्म में पंकज कपूर का अभिनय, इतना शानदार है कि ये कहा जा सकता है, निर्विवाद रूप से उन्होंने एक वैज्ञानिक की जीवन शैली और भावनाओं को पर्दे पर जीवित कर दिया है।

“शबाना आज़मी के बिना भी ये फ़िल्म बन सकती थी, लेकिन उन्हें कम संवादों के साथ भी रखा गया है क्योंकि उस दौर में  नसीरुद्दीन शाह और शबाना आज़मी को कलात्मक गुणवत्ता का परिचायक, मानने और मनवाने में पूरा फ़िल्म उद्योग व्यस्त था।”

इरफ़ान ने “अमूल्य” का किरदार निभाया है और बहुत प्रशंसनीय ढंग से निभाया है।  फ़िल्म में वनराज भाटिया का संगीत है।

देखें फ़िल्म:

भारत में हर दौर में प्रतिभाओं के साथ अन्याय होता रहा है और ऐसा क्यों है, कब तक होगा, व्यवस्था से ऐसे ही सवाल पूछती फ़िल्म है, “एक डॉक्टर की मौत। “

(लेखक जाने-माने साहित्यकार, फ़िल्म समालोचक, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)

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