कल से उड़ेंगी फ्लाइट्स, केन्द्र-राज्य में तनातनी
“पार्टी (1984)” -विचारों के रंगीन कोलाज से बनी फ़िल्म
डॉ० कुमार विमलेन्दु सिंह | Cinema Desk
“बड़े दोगले होते हैं आप मार्क्सिस्ट भी, मिडिल क्लास की बात भी करते हैं और उनके टेस्ट (taste) की खिल्ली भी उड़ाते हैं।”
ये संवाद, आकाश खुराना (आगाशे) का है, 1984 में आई फ़िल्म “पार्टी” में, जिसे NFDC ने प्रोड्यूस किया था। ये बस एक डायलॉग नहीं था, ये एक मोड़ था, जहां से फ़िल्म में विचारों को एक निश्चित दिशा में गति सी प्राप्त होती है। ये डायलॉग फ़िल्म के 24वें मिनट में आता है और इसके पहले बहुत सारे रंग दर्शकों के सामने प्रस्तुत किए जा चुके होते हैं।
महेश एलकुंचवर के इसी नाम (पार्टी) के नाटक पर ये फ़िल्म आधारित है। नाटक 1976 में तैयार हुआ था और फ़िल्म बनी 1984 में। वसंत देव और गोविंद निहलानी ने महेश एलकुंचवर के साथ मिलकर ही पूरी फ़िल्म लिखी है। फ़िल्म शुरू होती है नसीरुद्दीन शाह की बैकग्राउंड से आती आवाज़ में एक कविता से, जिसमें वे बताते हैं कि “जबड़े भिंचे हैं” और “सिर क्रेटर की तरह फट” कर अंदर का लावा न निकाल दे, मतलब व्यवस्था के प्रति घनघोर निराशा और क्रोध है। नसीरुद्दीन शाह (अमृत) बहुत देर तक कैमरे के फ़्रेम से बाहर रहते हैं लेकिन लगभग हर किरदार उनके बारे में बात करता रहता है।
“कला की स्थिति और कलाकार की स्थिति में जो अद्भुत और आश्चर्यजनक अंतर है, शब्दों के आधिक्य से भरे जीवन में प्रेम और भावों के स्थान पर जो रिक्तियां हैं, उसे बेहद अच्छे ढंग से दिखाया गया है।”
मनोहर सिंह (दिवाकर बरवे) एक बहुत बड़े लेखक होते हैं और उनके सम्मान में विजया मेहता (दम्यंती राणे) एक पार्टी देती हैं और इस पार्टी में कला और समाज के प्रति अलग-अलग विचार लिए, कई किरदार आते हैं और आपस में इसी विषय पर बातें भी करते हैं। हर कलाकार पहले मनुष्य होता है और हर मनुष्य, एक प्रकार का पशु। इस पाश्विक प्रवृत्ति से कई बार आवरण हटता है इस फ़िल्म में। कई पात्र एक दूसरे के लिए वासना भरी भावनाएं रखते हैं, लेकिन पार्टी में, एक आवरण के अंदर रहते हुए, संभल कर व्यवहार करते हैं।

गुलन कृपानी (वृन्दा) एक पत्रकार होती हैं, जिनके बाल अजीब से स्टाइल में छोटे कटे हैं और ये लगातार सिगरेट पीती रहती हैं, और भी कई महिला पात्र शराब पीती हुई, चेहरे पर सशक्त महिला का भाव रखती हैं। वृन्दा, हर बात में असहमत होने को अपना अधिकार और अपनी बुद्धिमत्ता समझती हैं, ये बिल्कुल आज के पत्रकारों के छवि की प्रस्तुति है जिनके पास सिर्फ़ सवाल है जवाब नहीं, समस्या है, समाधान नहीं।
नसीरुद्दीन शाह (अमृत), जो वामपंथ का झंडा बुलंद करते हुए किरदार के रूप में गढ़े गए हैं, सभी अन्य पात्रों की बातचीत में, उन्हें मार देती है पुलिस। यहाँ, बहुत सुन्दर तरीके से ये प्रमाणित करने का प्रयास किया गया है और जो सच भी है कि वामपंथी क्रांति करते नहीं, हर क्रांति के घातक परिणामों से आहत नायकों से स्वयं को जोड़कर, साहित्य, कला और अन्य माध्यमों के सहारे, सहानुभूति के पात्र बने रहते हैं। इनके लिए, “सहानुभूति” उतना महत्वपूर्ण नहीं, “बने रहना” ज़रूरी है।

रोहिणी हतंगडी (मोहिनी बरवे), बार बार तथाकथित स्वतंत्र महिलाओं के अंदर की कुंठा, जो कि किसी भी संबंध से अलंकृत न होने के कारण होता है, उसका बेहतरीन चित्रण करती नज़र आई हैं। शफ़ी इनामदार (रवीन्द्र) एक मंच अभिनेता होते हैं और उनके किरदार के माध्यम से एक अभिनेता जो कि समाज के नियमों से बंधा एक नागरिक भी होता है, उसके अंतर्द्वंद को दिखाया गया है। ओम पुरी (अविनाश) एक पत्रकार और के०के० रैना एक उभरते हुए कवि के रूप में दिखे हैं, जिन्हें प्रतिभा से ज़्यादा, स्थापित महारथियों के प्रशस्ति की आवश्यकता होती है।
ध्यान से देखने पर, अलग अलग पात्रों में, अलग अलग रंग दिखते हैं और संवाद में प्रयोग की गई कविताएं, अत्यंत प्रशंसनीय हैं। रेणु सलूजा के बेहतरीन संपादन और सभी अदाकारों के शानदार अभिनय से, “पार्टी”, विचारों के एक सुन्दर और रंगीन कोलाज सी फ़िल्म बन पड़ी है।
(लेखक जाने-माने साहित्यकार, फ़िल्म समालोचक, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)
देखें फ़िल्म–
केंद्र की ‘उड़ान सेवा’ से राज्यों में टेंशन
सौम्या केसरवानी | navpravah.com
लॉकडाउन के बीच कल से घरेलू उड़ानों को शुरू करने की तैयारी बना ली गयी है, लेकिन अभी तक इससे जुड़े नियमों को लेकर कई राज्यों में भ्रम की स्थिति बनी हुई है। उड़ानें फिर से शुरू करने की केंद्र सरकार की योजना को लेकर महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु ने चिंता जताई है। इन राज्यों में देश के सबसे व्यस्त हवाई अड्डों में शुमार हवाई अड्डे आते हैं।
महाराष्ट्र सरकार ने उड़ानों को लेकर कहा कि, राज्य सरकार ने 19 मई के अपने लॉकडाउन संबंधी आदेश में संशोधन नहीं किया है। इस आदेश में सिर्फ कुछ विशेष उड़ानों की अनुमति दी गई है। इससे यह संकेत मिल रहा कि महाराष्ट्र ज्यादा लोगों के राज्य में आने को लेकर उत्सुक नहीं है।
महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख ने ट्वीट कर कहा कि ‘रेड जोन में हवाईअड्डे खोलने की सलाह अत्यंत नासमझी वाली है। केवल यात्रियों की थर्मल जांच करना और लार के नमूने लेना अपर्याप्त होगा, संक्रमित रोगी के आने से रेड जोन पर दबाव और बढ़ जाएगा।’
तमिलनाडु ने भी इसी तरह की चिंता जताते हुए विमानन मंत्रालय से योजना को 31 मई तक टालने का आग्रह किया है। कोरोना संक्रमण के मामलों के लिहाज से महाराष्ट्र के बाद तमिलनाडु दूसरा सबसे प्रभावित राज्य है। वहीं, पश्चिम बंगाल सरकार ने भी साइक्लोन अम्फान से हुई तबाही का हवाला देते हुए कहा कि कोलकाता की उड़ानों पर कम से कम 30 मई तक रोक लगाने का आग्रह किया है।
बोलती तस्वीरें- “ये जो है ज़िंदगी (1984)”
डॉ० कुमार विमलेन्दु सिंह | Navpravah Desk
दरहक़ीक़त, ज़िंदगी में खुशियां कम, रंज-ओ-ग़म ज़्यादा होते हैं, लेकिन कई दफ़ा, हंस भर लेने से बहुत से मसले सुलझ जाते हैं, ज़िंदगी आसान मालूम होती है। हर बार, कुछ किरदार हमारी हंसी का सबब होते हैं, वे हमें ज़िंदगी में किसी भी तरह से मिल जाते हैं। कभी किताबों में, कभी किस्सों और बातों में। 1984 में ये किरदार हिन्दुस्तान के लोगों को टेलीविज़न पर मिलने लगे। धारावाहिक, “ये जो है ज़िंदगी”, टेलीविज़न पर आने लगा था। इसे भारत का पहला सिटकॉम कहा जा सकता है।
“सिटकॉम (sitcom), जो कि situational comedy का छोटा रूप है, पहले रेडियो पर प्रसारित हुआ करता था, लेकिन टेलीविज़न पर पहला सिटकॉम, 1946 में BBC द्वारा प्रसारित किया गया और इसका नाम था, “Pinwright’s Progress.” 1950 से 1970 के बीच, अमरीका में, विलियम ऐशर ने कई मशहूर सिटकॉम बनाए और यहाँ से कई देशों में इसका चलन हो गया।”
1983 में आई फ़िल्म, “जाने भी दो यारों” ने कॉमेडी को एक नए अंदाज़ में पेश किया था और निर्देशक, कुंदन शाह को इसके लिए बहुत तारीफ़ मिली थी। जब टेलीविज़न के लिए, कॉमेडी सीरीज़ बनाने की बात आई, तो मंजुल सिन्हा और रमन कुमार के साथ, कुन्दन शाह को भी जोड़ा गया। इस धारावाहिक का शीर्षक गीत महान गायक किशोर कुमार ने गाया था। इस धारावाहिक का लेखन, शरद जोशी ने किया। इतने माहिर लोग तो पीछे थे पर्दे के। कलाकार भी सब, एक से एक चुने गए थे। शफ़ी इनामदार (रंजीत वर्मा) और स्वरूप संपत (रेणु वर्मा), राकेश बेदी (राजा), फ़रीदा जलाल (चाची) और सतीश शाह (विभिन्न किरदार) में नज़र आए।

ये रोज़मर्रा की ज़िंदगी के हल्के फुल्के और हंसने हंसाने वाली घटनाओं पर आधारित धारावाहिक था और इसके 67 एपिसोड बने। इतने ही एपिसोड में, इस धारावाहिक ने, कभी न भूलने वाली यादों को जोड़ दिया, दर्शकों की ज़िंदगी से।

सिटकॉम का एक नया रूप, ड्रामेडी (ड्रामा+कॉमेडी), इस धारावाहिक से भारतीय दर्शकों के बीच प्रचलित हो चला था और आने वाले समय में अन्य विधाओं और कलाकारों से जुड़कर, ऐसे कई और धारावाहिक, दर्शकों को मिलने वाले थे।
“ये जो है ज़िंदगी” के लगभग सभी किरदार निभा रहे कलाकारों ने सिनेमा जगत में भी कामयाबी के झंडे गाड़े। सिनेमा और टेलीविज़न के मज़बूत रिश्तों की क़ाबिल-ए-तारीफ़ बुनियाद पड़ चुकी थी और कई चेहरे इसी टेलीविज़न से निकल कर भारतीय सिनेमा की पहचान बन जाने वाले थे।
(लेखक जाने-माने साहित्यकार, फ़िल्म समालोचक, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)
‘फ़ादर्स डे’- ऐसे पिता की कहानी जिसे बेटे की तलाश ने बनाया भारत का सबसे बड़ा क्राइम जासूस
आनंद रूप द्विवेदी | Editorial Desk
अंग्रेजी में एक कहावत है, “Don’t judge a book by it’s cover” लेकिन बात जब सीनियर क्राइम जर्नलिस्ट और थ्रिलर राइटर प्रफुल शाह की हो, तो उनकी हर किताब, आप कवर से भी जज कर सकते हैं। जितना खूबसूरत प्रफुल शाह की किताब का कवर होता है, उतनी ही दमदार उसकी कहानी और कहानी में छिपे रहस्य की परतें।
प्रफुल शाह की कई किताबें गुजराती, अंग्रेजी, व हिंदी में प्रकाशित होकर अपना दमखम भी दिखा चुकी हैं। उनकी किताबों पर बॉलीवुड में फिल्में/वेब फिल्में भी बन चुकी हैं। उनकी किताब दृश्यम-अदृश्यम (फादर्स डे) पर आधारित एक फिल्म भी निर्माणाधीन है, जिसमें मुख्य भूमिका निभा रहे हैं बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता इमरान हाशमी। ‘बरोट हाउस’ , ‘पोशम पा’ जैसी बहुचर्चित साइकोलॉजिकल थ्रिलर वेब फिल्में, प्रफुल शाह की किताबों पर ही आधारित हैं।

प्रफुल शाह का डॉक्यु-नॉवेल ‘फ़ादर्स डे’ जो कि मूलतः गुजराती में “दृश्यम अदृश्यम” शीर्षक से काफ़ी पसंद किया गया, उसका अंग्रेजी संस्करण है। अब इस किताब का हिंदी संस्करण भी पाठकों के लिए अमेजन/किंडल आदि पर उपलब्ध कराया जा चुका है। दरअसल प्रफुल सस्पेंस और थ्रिलर उपन्यासों के लिए जाने जाते हैं, जिनकी कहानी और किरदार कभी एक दूसरे से अलग-थलग होते नहीं पाए जाते। यही कारण है कि, रचना और पाठकों को बांधकर रखने वाली कुशलता उनकी किताबों पर आधारित फिल्मों में भी देखने को मिलती है।
‘फादर्स डे’ की कहानी शुरू होती है महाराष्ट्र के शिरवल से, जहाँ छत्रपति शिवाजी महाराज के किले का वर्णन है। इतिहास की भयानक त्रासदी और युद्ध के नाद के समाप्त होते ही एक दूसरे युग की ओर रुख करते कथानक में ऐसी चित्रकारी है, जहाँ न राजा न प्रजा, न युद्ध न सैनिक, शेष है तो बस शून्य। ऐसा शून्य जहाँ अब सब सिर्फ़ इतिहास है। लेखक ने समय की शक्ति को दर्शाते हुए बड़ी चालाकी के साथ कहानी को इतिहास से वर्तमान की ओर धकेल दिया है।
कहानी का केंद्रबिंदु है, 32 साल का सिविल कॉन्ट्रेक्टर सूर्यकांत विष्णु भांडे पाटिल। जिसकी दुनिया उसकी पत्नी प्रतिभा और बेटे सौरभ व संकेत हैं। घर, परिवार, बच्चे और कामकाज के इर्द गिर्द घूमती सूर्यकांत की ज़िंदगी में उस वक़्त भूचाल सा आ जाता है जब उसका 3 साल का बेटा संकेत स्कूल से वापस ही नहीं लौटता। गली, मोहल्ले, पुलिस थाने के चक्कर काटता पिता, और व्यापार के लिए उत्तरदायी सूर्यकांत, हर सम्भव प्रयास करता है जो उसके बेटे के सकुशल घर लौट आने का रास्ता दिखाए। इसी क्रम में वह महाराष्ट्र के कद्दावर नेता शरद पवार के उत्तराधिकारी माने जाने वाले अजीत पवार से भी मिलता है और अपने बेटे की गुमशुदगी की गुहार लगाता है। बदले में उसे आश्वासन मिलता है, चिंता न करने का।
कहानी में घुसते ही पाठक का उससे बाहर निकल पाना मुश्किल हो जाता है। शायद यही वजह है कि फ़ादर्स डे को कई भाषाओं में अनुवादित भी किया गया है। भाई सौरभ को उम्मीद है कि उसका छोटा संकेत वापस आकर फिर से उसके साथ खेलेगा, कूदेगा। माँ की बात ही क्या, उसने तो जन्म दिया है। उसकी पीड़ा को तो स्वयं ईश्वर भी नहीं समझ सकता। दादा इस उम्मीद में है कि उसका पोता घर आएगा और उसके बेटे की ज़िंदगी मे वापस वही सुकून। इस सब के बीच सूर्यकांत के मन में द्वंद भी है और द्वेष भी। एक लड़ाई वह अपने बेटे की खोज में बाहर लड़ रहा है तो दूसरी लड़ाई अपने अंदर। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती जाती है सूर्यकांत हर कठोर वास्तविकता का सामना करने के लिए तैयार हो जाता है। फ़िरौती, नाकामी और लगातार सात महीने तक बेटे के लापता होने पर पिता का साहस अब स्थिर था, लेकिन उसकी भावनाओं का समुद्र किसी ज्वार भाटा की तरह उफ़ान ले रहा था। जब फ़ादर्स डे पर अख़बार में प्रकाशित एक परिशिष्ट पर सूर्यकांत की नज़र पड़ती है तो वह टूट जाता है। परिशिष्ट में एक असफ़ल पिता के शब्दों को वह स्वयं की बात ही समझ बैठता है।
बतौर लेखक, प्रफुल शाह जीवन के हर उस पहलू को उकेरने में सफल सिद्ध होते हैं, जिसमें न केवल भावनाओं, बल्कि आंतरिक विषाद से जन्में ग्लानि भाव को भी जगह मिलती है, जिसके परिणामस्वरूप कहानी में वेदनाओं का अथाह सागर भरा मिलता है। कहानी जैसे जैसे ढलती है , पिता अपने बेटे को पाने की उम्मीद भी खोने लगता है। उसका अपना संकेत भले ही अब कभी वापस न आने वाले रास्ते पर छोड़ दिया गया हो लेकिन, अब वह कई और बच्चों की गुमशुदगी के लिए भी काम करता है, उनकी खोजबीन में पुलिस के साथ कदम से कदम मिलाकर चलता है।
“प्रफुल शाह के गज़ब के कथानक को सारगर्भित कर पाना थोड़ा मुश्किल है, नाजायज़ भी और डॉक्यूमेंट्री नॉवेल के उद्देश्य के विरुद्ध भी। इसे पढ़ने के बाद ही आप यह आंकलन कर सकते हैं कि प्रफुल शाह अपने प्रयास में किस हद तक सफ़ल रहे हैं। “
बहरहाल, इस किताब पर फ़िल्म आने वाली है, जिसमें लीड रोल यानी शिवकांत के किरदार को निभाएंगे प्रसिद्ध अभिनेता इमरान हाशमी। फिल्म का अनाउंसमेंट इमरान हाशमी, ट्रेड एनालिस्ट तरण आदर्श और कोमल नाहटा ने ट्विटर पर भी किया है।
किताब के कुल 79 खण्ड हैं, हर एक खण्ड अपने में एक कहानी समेटे हुए है। पाठक को कहीं भी ऐसा अनुभव नहीं होगा कि उसे जबरन लंबा खींचा जा रहा है। आख़ीर में सत्यघटना के सभी पात्रों का परिचय, उनका साक्षात्कार और जाँच सम्बन्धी अन्य दस्तावेज संलग्न हैं, जो पुस्तक की सत्यनिष्ठा को सिद्ध कर सकने में सफल होते हैं। लेखक प्रफुल शाह किताब के आखिरी हिस्से में इस बात का ज़िक्र करते हैं कि, “इसकी वास्तविक पात्रों की जीवन यात्रा निरन्तर बढ़ती रहेगी। कथा प्रवाह को घटनास्पद बनाने के लिए पात्रों की मनोवेदनाएँ भला कितना उठाव दे सकती हैं? कथा भले ही पूर्ण हो गई हो, किंतु मनोवेदनाएँ समाप्त नहीं होती।”
इस लिंक पर जाकर आप इस किताब को ऑनलाइन ऑर्डर भी कर सकते हैं –
बिहार: क्वारंटाइन सेंटर में युवती के साथ गैंग रेप
केशव मेहता | navpravah.com
रोहतास जिले के दवथ थाना अंतर्गत एक गांव में बुधवार की देर शाम एक प्रवासी केंद्र में रहने वाले दो प्रवासी कर्मचारियों और चार अन्य लोगों द्वारा 18 वर्षीय एक लड़की के साथ कथित तौर पर सामूहिक बलात्कार किया गया। पीड़ित व्यक्ति के परिवार ने पुलिस की बेरुखी और राजनीतिक दबाव में इस मुद्दे को दबाने की कोशिश का आरोप लगाया। हालाँकि रोने और हंगामा करने पर दो व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया।
गुरुवार को सुरेश यादव (22), विजय यादव (20), चंचल यादव (22), मुकेश यादव (21), चुल्ली पासवान (18) और अमित पासवान (18) के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई। शुक्रवार को सासाराम सदर अस्पताल में उसकी मेडिकल जांच की गई। रोहतास के एसपी सत्यवीर सिंह ने कहा कि दो आरोपियों सुरेश और चंचल को गिरफ्तार किया गया है। वे क्वारंटाइन सेंटर में थे और फोन पर गांव से अन्य चार को बुलाया। घटना बुधवार रात क्वारंटाइन सेंटर के बाहर हुई।
एसपी ने शुक्रवार को घटनास्थल का दौरा करने के बाद कहा, “यह हादसा रात करीब 9.30 बजे हुआ, जब लड़की घर से बाहर शौच के लिए गई थी। पीड़िता ने अपने परिवार के सदस्यों को इस घटना के बारे में बताया। इन आरोपियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की गई। दोनों आरोपियों के नमूने को कोविड -19 परीक्षण के लिए भेजे गए हैं।
चुराई हुई कहानी है नेटफ्लिक्स की ‘बेताल’?
सिनेप्रवाह |Navpravah Desk
नेटफ्लिक्स की आगामी हॉरर सीरीज बेताल के निर्माताओं की मुश्किलें बढ़ती नज़र आ रही हैं। मराठी लेखक समीर वाडेकर और महेश गोस्वामी ने शाहरुख़ ख़ान की रेड चिलीज़ एंटरटेनमेंट और नेटफ्लिक्स के खिलाफ मामला दायर किया है।
उन्होंने बेताल के निर्माताओं पर आरोप लगाया है कि उन्होंने ज़ोम्बी फिल्म की कहानी चुराई है, जिसका शीर्षक है ‘वेताल’।
मिड डे में प्रकाशित एक खबर के मुताबिक़, पिछले हफ्ते जब बेताल का ट्रेलर रिलीज़ किया गया, उसके बाद बाद समीर और महेश ने बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख किया।
Zombie Story Haunts #Betaal! Marathi Writers Allege That Makers Lifted The Plot Of Their Film #Vetaal
Via. @MoharBasu https://t.co/dOS4AEiUGY
— Mid Day (@mid_day) May 23, 2020
खबर के अनुसार, समीर ने कहा कि हमने कई प्रोडक्शन हाउस को ये कहानी सुनाई थी, लेकिन ये कहानी हम रेड चिलीज़ के पास नहीं ले गए थे,इसलिए उनपर कोई दबाव नहीं है। लेकिन जिस प्लेटफार्म पर यह ट्रेलर रिलीज़ हुआ है, उन्हें तो यह पता होना चाहिए।
We had taken our script to several production houses. We hadn't pitched it to Red Chillies Entertainment, so the onus isn't on them, but on the platform that commissioned it. I haven't been able to figure out how [the idea] reached them-Sameer Wadekar https://t.co/ejWOKa3Nwy
— Fenil Seta (@fenil_seta) May 23, 2020
समीर ने बताया कि मेरी स्क्रिप्ट स्क्रीन राइटर्स एसोसिएशन के में रजिस्टर्ड है और मैंने इसकी जानकारी एसोसिएशन को दे भी दिया है।
बेताल का निर्देशन पैट्रिक ग्राहम और निखिल महाजन ने किया है, जबकि पैट्रिक ग्राहम और सुहानी कंवर ने इसे लिखा है। यह नेटफ्लिक्स पर 24 मई, 2020 को रिलीज होगी।
“वर्जिन भानुप्रिया” रूढ़िवादी लड़की की वर्जिनिटी खोने का अंतर्द्वंद्व
ट्रेलर रिव्यू | Cinema Desk
‘गुलाबो सिताबो’, ‘शकुंतला देवी’ और ‘घूमकेतु’ के बाद उर्वशी रौतेला की फिल्म ‘वर्जिन भानुप्रिया’ और किआरा आडवाणी स्टारर ‘इंदु की जवानी’ भी ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज होगी।
ये दोनों ही फैमिली कॉमेडी हैं। इन दोनों फिल्मों के अलावा भी कई और ऐसी फिल्में हैं, जिनकी डिजिटल रीलीज़ की चर्चा चल रही है। इनमें से अजय लोहान निर्देशित ‘वर्जिन भानुप्रिया’ हैं। इस फिल्म में आज के दौर के यंगस्टर्स और परिवार के साथ उनके रिश्तों को दिखाया गया है।
उर्वशी द्वारा निभाई गई भानुप्रिया एक कॉलेज जाने वाली रूढ़िवादी लड़की है, जो अपनी वर्जिनिटी खोने का फैसला करती है। वह सोचती है कि यह आज की दुनिया में सबसे आसान काम होना चाहिए, लेकिन कई उतार-चढ़ाव के बाद वह समझती है कि यह आसान काम नहीं है।
‘वर्जिन भानुप्रिया’ में गौतम गुलाटी, अर्चना पूरन सिंह, डेलनाज ईरानी, राजीव गुप्ता और बृजेन्द्र काला, निकी अनेजा वालिया और रुमाना मोला भी हैं।
देखें ट्रेलर-
बैंगलुरु से 4000 मणिपुरी प्रवासियों का पलायन, जमा हुई भीड़
न्यूज़ अपडेट|Navpravah Desk
बैंगलुरु के पैलेस ग्राउंड में लगभग 4000 मणिपुरी प्रवासी श्रमिको की भीड़ मच गई है। ये सभी श्रमिक घर वापस जाने के लिए हो रहे रजिस्ट्रेशन करवाने के लिए एकत्रित हुए हैं।
समाचार एजेंसी ANI ने ट्वीट कर यह जानकारी दी है। जिसके मुताबिक राज्यमंत्री के.सुधाकर ने कहा, ‘मैंने इन सब से बात की है। वो लोग चिंतित हैं और अपने घर मणिपुर जाना चाहते हैं।लेकिन मुझे उम्मीद है कि वो बैंगलुरु वापस आएंगे क्योंकि ये उनका दूसरा घर है।”
Around 4000 migrant workers from Manipur have gathered at Palace Grounds in Bengaluru for registration to return. K. Sudhakar, state minister says,"I talked to them,they are worried&want to go back to Manipur but I hope they will return to Bengaluru as this is their second home" pic.twitter.com/w8QakO7ini
— ANI (@ANI) May 23, 2020
गौरतलब है कि कोरोना के चलते प्रवासी श्रमिकों के घर वापस जाने की खबरें देश के कई हिस्सों से आ रही हैं। ऐसे में बैंगलुरु से यह प्रवासी श्रमिकों की बड़ी भीड़ है, जो विस्थापित हो रहे हैं।
लखनऊ वाले मियाँ मिर्ज़ा की पुरानी हवेली पर रहेगी आयुष्मान ख़ुराना की नज़र!
ट्रेलर रिव्यू |Cinema Desk
अमिताभ बच्चन और आयुष्मान खुराना अभिनीत फ़िल्म गुलाबो सिताबो का ट्रेलर रीलीज़ हो गया है। फ़िल्म को लिखा है जूही चतुर्वेदी ने और निर्देशक हैं शूजित सरकार। जूही और शूजित की जोड़ी हर बार एक नया लैण्डमार्क क्रिएट करती है, देखना है इस बार ये लेखक-निर्देशक क्या कमाल करते हैं।
कहानी-
लखनऊ में एक हैं मियाँ मिर्ज़ा, जो अपनी हवेली फ़ातिमा महल से बेपनाह मोहब्बत करते हैं। उसी हवेली में किराए पर रहते हैं बाँके, जिनसे मियाँ मिर्ज़ा का छत्तीस का आँकड़ा है।
बाँके न तो किराया बढ़ा रहे हैं, न कमरा ख़ाली कर रहे हैं। इसी वजह से मियाँ मिर्ज़ा को बाँके से बड़ी कोफ़्त है। बाँके को मियाँ महल से निकालने के लिए तरह-तरह का जुगाड़ करते हैं, लेकिन बाँके की ढिठाई मियाँ के जुगाड़ पर हर बार भारी पड़ता है।
बाँके और मियाँ मिर्ज़ा की कहानी को बड़ी ख़ूबसूरती से फ़िल्माया है शूजीत ने। इस गुदगुदाती कहानी में पुरातत्व विभाग, कोर्ट-कचहरी भी शामिल हैं, जो आप को और बांधेगी। फ़िल्म में विजय राज जैसे साथी कलाकार इसको और ख़ूबसूरत बनाते हैं।
देखें ट्रेलर:
इसका प्रीमियर आगामी 12 जून को होगा। इस फ़िल्म के ट्रेलर देखने के बाद लोगों की उत्सुकता बढ़ गई है। आयुषमान खुराना ने एक बार फिर बेहतरीन अभिनय किया है। अमिताभ बच्चन की आवाज़ आपको इस फ़िल्म में बदली सी सुनाई देगी, इसके पहले फ़िल्म अग्निपथ में ऐसा हुआ था।

















