कोरोना संकट के बीच पहली बार हुई जीएसटी काउंसिल की बैठक हुई। इस बैठक के दौरान व्यापारियों की सबसे बड़ी समस्या जीएसटी लेट फ़ीस में राहत दी गई है। बैठक में छोटे टैक्सपेअर्स को राहत देने की बात पर भी सहमति बन गई है।
सालाना 5 करोड़ रुपये से कम टर्नओवर वाले कारोबारियों को फरवरी से जून 2020 के बीच रिटर्न फाइल करने पर सिर्फ 9 फीसदी ब्याज चुकाना होगा।
जीएसटी काउंसिल ने बैठक के दौरान कई महत्वपूर्ण फ़ैसले लिए, आइए सिलसिलेवार तरीक़े से जानते हैं काउंसिल की बैठक के फ़ैसले के बारे में-
जुलाई 2017 से जनवरी 2020 तक लेट फीस माफ की गई। जिनकी जीएसटी निल होगी, उन कारोबारियों की लेट फीस माफ होगी। GTB 3B के लिए लेट फीस 500 रुपये/महीने देना होगा। 5 करोड़ रुपये से कम टर्नओवर पर 18% की जगह 9% ब्याज लगेगा।
वित्त मंत्री ने जीएसटी काउंसिल की बैठक के बाद कहा, जुलाई, 2017 से जनवरी, 2020 के दौरान मासिक जीएसटी बिक्री रिटर्न दाखिल नहीं करने पर अधिकतम लेट चार्ज 500 रुपये तय किया गया। यानी कोरोना वायरस शुरू होने से पहले जिन कारोबारियों पर टैक्स की देनदारी थी उनका लेट फीस कम कर दिया गया है।
इसके अलावा जुलाई, 2017 से जनवरी, 2020 के दौरान शून्य जीसटी रिटर्न वाली रजिस्टर्ड यूनिट पर भी कोई लेट फीस नहीं लगेगा। वहीं 5 करोड़ रुपये से कम टर्नओवर वाले कारोबारियों को फरवरी से जून 2020 के बीच रिटर्न फाइल करने पर सिर्फ 9 फीसदी ब्याज चुकाना होगा।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि काउंसिल कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भी शुल्क ढाँचा सुधारने की कोशिश में लगी है, ताकि व्यापारियों की समस्या को कम किया जा सके।
जीवन में एक व्यक्ति कई सम्बन्ध बनाता है और इन्हीं के सहारे या ये भी कहा जा सकता है कि इन्हीं के आधार पर, उसकी सारी गतिविधियां, मान्यताएं और विचाधारा विकसित होती है। जिन दो बातों का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है, किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व के निर्माण में , वे होती हैं, अनुवांशिकता और वातावरण। अभिभावकों के स्वभाव और उनकी शारीरिक संरचना का कुछ अंश, व्यक्ति में तो आता ही है, लेकिन भावनात्मक और व्यवहारात्मक स्तर पर जो परिवर्तन लगातार चलते रहते हैं, उनमें वातावरण का बहुत प्रभाव होता है।
हृषिकेश मुखर्जी
सभी सम्बन्ध विशेष होते हैं और उनका अपना महत्व होता है लेकिन पिता और संतान का सम्बन्ध, इतना गहरा होता है कि कई बार शब्द अक्षम होते हैं, इसे बता पाने में। पिता होना, स्वयं को अपने हाथों से रचने जैसा है, एक अलग जीवन विस्तार के लिए। सुरक्षा, पालन और सुविधाएं प्रदान करने की क्रियाओं के आवरण में, प्रेम छिप अवश्य जाता है लेकिन आधार वही बना रहता है। पितृत्व की एक ऐसी ही कहानी बताती है, हृषिकेश मुखर्जी की फ़िल्म, “आशीर्वाद”।
फ़िल्म के एक दृश्य में ‘अशोक कुमार’
“आशीर्वाद”, 1968 में आई और बहुत सुन्दर ढंग से पितृत्व की इस भावना को इस फ़िल्म ने प्रदर्शित किया। पिता-पुत्री के प्रेम का अद्भुत चित्रण था, इस फ़िल्म में।
फ़िल्म में अशोक कुमार (जोगी ठाकुर) को अपनी पत्नी वीणा (लीला चौधरी) के पिता की संपत्ति प्राप्त होती है, हालांकि उसपर वश उनकी पत्नी का ही होता है, अशोक कुमार (जोगी ठाकुर), ज़मींदार जैसा व्यवहार बिल्कुल नहीं रखते और सभी तपके के लोगों के साथ मिलते जुलते रहते हैं। एक बार उनकी जानकारी के बिना, उनसे कुछ कागज़ों पर धोखे से दस्तख़त लेकर , ग़रीबों की बस्ती में आग लगा दी जाती है। इससे दुखी होकर अशोक कुमार (जोगी ठाकुर), अपने घर से चले जाते हैं, कभी न लौटकर आने के लिए। पीछे छूट जाती है उनकी बेटी नीना।
फ़िल्म के एक दृश्य में ‘हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय’
अशोक कुमार (जोगी ठाकुर) को हमेशा नीना की याद आती रहती है और एक बच्ची, जो उन्हें पार्क में दिखती है और उसका भी नाम नीना ही होता है, इनसे बहुत जुड़ जाती है। लेकिन बीमारी के कारण वह गुज़र जाती है, इसके बाद परिस्थितियों के जंजाल में पड़कर, हत्या के आरोप में, अशोक कुमार (जोगी ठाकुर), जेल चले जाते हैं और वहीं माली का काम करते हैं।
“जेल में संजीव कुमार (डॉ० बीरेन) इनकी कविताएं सुनते हैं और उन्हें इनसे लगाव हो जाता है। एक दिन अचानक, अशोक कुमार (जोगी ठाकुर) को पता चलता है कि संजीव कुमार (डॉ० बीरेन) की शादी, उनकी बेटी सुमिता सान्याल (नीना) से ही होने वाली होती है। अब तक कथानक का संचालक “संयोग” ही बना रहता है। अपनी बेटी को आशीर्वाद देने के लिए, अशोक कुमार (जोगी ठाकुर) तड़प उठते हैं और हृदयविदारक स्थितियों में आशीर्वाद देने जाते भी हैं और दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं।”
फ़िल्म का निर्देशन, हृषिकेश मुखर्जी ने किया, संपादन भी किया और इसके निर्माण में भी एन०सी० सिप्पी के साथ रहे। कहानी, अनिल घोष की थी और संवाद, गुलज़ार जैसे सिद्धहस्त लेखक ने लिखे। सिनेमैटोग्राफ़ी, टी०बी० सीताराम की थी और 2 घंटे, 26 मिनट की ये फ़िल्म, दर्शकों को एक भावनात्मक यात्रा पर ले जाने में, पूर्णतया सफल थी। वसंत देसाई का संगीत भी अत्यंत प्रशंसनीय रहा। इस फ़िल्म का गाना, “रेलगाड़ी रेलगाड़ी”, अशोक कुमार ने गाया और कई जगहों पर इसे भारत का पहला रैप भी कहा गया है। इस गीत को महान साहित्यकार,हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय ने लिखा था, जो इस फ़िल्म में “बैजू ढोलकिया” के किरदार में थे।
फ़िल्म के एक दृश्य में ‘संजीव कुमार’ और ‘अशोक कुमार’
इस फ़िल्म को 1969 में सर्वश्रेष्ठ हिन्दी फ़ीचर फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला और अशोक कुमार को, सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।
फ़िल्म के कथानक की परिस्थितियां, बिल्कुल, टॉमस हार्डी के उपन्यासों की तरह, “संयोग” पर आश्रित होती हैं, आगे बढ़ने के लिए और हार्डी की ही तरह, इस फ़िल्म में घटनाओं का कर्ता, “अमर्त्यों का अध्यक्ष (प्रेसिडेंट ऑफ़ इम्मोर्टल्स)” , अर्थात् ईश्वर होता है। कुल मिलाकर ये, पितृत्व, प्रेम और अमर्त्यों के अध्यक्ष की कहानी है, जिसने इस फ़िल्म को अविस्मरणीय बना दिया है।
(लेखक जाने-माने साहित्यकार, फ़िल्म समालोचक, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि, कैबिनेट मंत्री है फरार और किसी को पता नहीं
न्यूज़ डेस्क | Navpravah.com
देश में कोरोना के संक्रमण से होने वाली मौत का आंकड़ा तेजी से बढ़ रहा है। अस्पतालों में कोरोना मरीज़ों के शवों के साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार के मामले में संज्ञान लेते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार को फटकार लगाई है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जब महामारी का संक्रमण बढ़ रहा है तो चेन्नई और मुंबई की तुलना में दिल्ली में जांच कम क्यों की जा रही हैं। मरीज़ों के शवों के साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार पर सुप्रीम कोर्ट ने सख़्त टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिल्ली के अस्पतालों में नियमों का लगातार उल्लंघन का मामला सामने आ रहा है।
अस्पताल डेड बॉडी का रख रखाव और निपटारा केंद्र सरकार की ओर से बनाए गए नियमों के मुताबिक नहीं कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मरीजों की मृत्यु के बाद उनके परिवार को भी सूचना नहीं दी जा रही है। न्यायालय ने कहा कि ऐसे भी मामले देखे गए कि मरीज का परिवार उनके अंतिम संस्कार में भी शामिल नहीं हो सका, क्योंकि सम्बंधित विभाग ने परिवारवालों को सूचना ही नहीं दी।
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार और उनके अस्पताल की ओर से बरती गई लारवाही पर जवाब दाखिल करने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने एलएनजेपी अस्पताल की स्थिति को गंभीरता से लिया है और उसे भी जवाब दाखिल करने को कहा गया है।
मध्य प्रदेश के रतलाम जिले में झांड-फूंक करने वाले एक बाबा की कोरोना से मौत हो गई है। ये बाबा हाथ चूम कर इलाज करते थे। बाबा खुद भी कोरोना से मर गये हैं और 23 लोगों को संक्रमित भी कर गए हैं।
बाबा की ख्याति सिर्फ रतलाम शहर में ही नहीं थी, बल्कि आसपास के इलाकों से भी लोग इनके पास अंधविश्वास के चक्कर में इलाज करवाने आते थे। ये बाबा हाथ को चूम कर बड़ी-बड़ी बीमारियों को दूर करने का दावा करता था।
इस बाबा का नाम असलम बाबा था, असलम का असली नाम अनवर शाह है। रतलाम के नयापुरा इलाके में करीब 15 वर्षों से अपने परिवार के साथ रह रहा था, असलम बीमारी दूर करने के नाम पर लोगों से मोटी रकम भी ऐंठता था।
स्थानीय लोग बताते हैं कि बाबा अपने भक्तों का इलाज हाथ चूम कर करते थे, बाबा के पास हर रोग का इलाज था। हालांकि बाबा खुद कैसे कोरोना से संक्रमित हुआ, इसके बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं है। तबीयत खराब होने के बाद इसे इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
असलम बाबा की 4 जून को मौत हुई थी, उसके बाद जिले के अधिकारियों में हड़कंप मच गया। मौत के बाद स्वास्थ्य विभाग को पता चला कि यह झांड़-फूंक करने का काम करता था। उसके बाद बाबा के संपर्क में आए लोगों की तलाश शुरू हुई।
अब तक बाबा के 23 भक्त कोरोना से संक्रमित हैं, जिसमें 7 इसके परिवार के लोग हैं, ज्यादातर लोग तो डर से सामने आ ही नहीं रहे हैं, असलम बाबा के पास हर दिन दर्जनों लोग उसके जाल में फंसकर इलाज के लिए आते थे।
उत्तर प्रदेश में प्राथमिक विद्यालयों में 69 हजार सहायक अध्यापकों की भर्ती के मामले की जांच का ज़िम्मा एसटीएफ़ को दिया गया है। ठगी के इस मामले में एसटीएफ़ ने ब्योरा जुटाना शुरू कर दिया है। एसटीएफ़ की टीम ने ठगी में शामिल सभी लोगों के नेट्वर्क को खंगालना शुरू कर दिया है। कई संदिग्धों को हिसारत में लेकर पूछताछ भी की गई है।
प्रतापगढ़ के एक अभ्यर्थी राहुल सिंह ने एफ़आईआर किया था, जिसके आधार पर जाँच को आगे बढ़ाया गया है। इसी मामले में डॉ. के.एल. पटेल समेत आठ लोगों को नामज़द किया गया है, जिसमें से पटेल समेत सात अभियुक्त गिरफ़्तार किए जा चुके हैं। एक अभियुक्त की तलाश अभी जारी है।
हिंदुस्तान की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, परीक्षा के दिन पकड़े गए साल्वर गैंग के लोगों को फिर से अपनी जाँच के दायरे में लिया है। जाँच की टीम पूरी सख़्ती से इस पूरे मामले की पड़ताल कर रही है। उम्मीद यही जताई जा रही है कि जल्दी इसमें कुछ पुख़्ता जानकारी सामने आएगी, जिससे ये पता चल पाएगा कि इस ठगी के तार कहाँ तक फैले हुए हैं।
फ़िलहाल एसटीएफ़ की टीम इनकी पड़ताल में जुटी है। सूत्रों का कहना है कि यह सॉल्वर गैंग अब नए सिरे से एसटीएफ के निशाने पर है।
गुज़रता हुआ वक़्त, कोरे सफ़हे जैसा है और आवाज़ के अलावा, कुछ नहीं है रोशनाई । माज़ी की तफ़्तीश और मुस्तक़बिल के ख़्वाबों के दरमियान जो सबसे ज़्यादा असर छोड़ जाती है , वो आवाज़ होती है। हम वाक़िफ़ हैं कि किस तरह दूरदर्शन हमारी ज़िन्दगी का हिस्सा बनता चला गया और वो दौर भी आया जब ज़्यादातर घरों को टेलीविज़न हासिल था और लोग दिन -ब- दिन, दिखाए जाने वाले धारावाहिकों और उनमे आने वाले किरदारों से जुड़ते चले गए। ये नहीं था कि ऐसे किरदारों से उनका जुड़ाव पहले नहीं था। सिर्फ ज़रिया बदला था, रेडियो की बेशक्ल आवाज़ों को अब चेहरे मिल गए थे और जुड़ाव एक अलग मक़ाम पर जा पहुंचा था। लेकिन जो आवाज़ें आदत बन चुकी थीं, सुनने वालों की वो रेडियो तक रुकी नहीं रही, उन्होंने भी एक सफर तय किया रेडियो से टेलीविज़न तक का और बने रहे मुसलसल लोगों के साथ।
आर.डी.बर्मन, आशा भोसले, और अमीन सयानी
आवाज़ की भी ख़ुसूसियत होती है, और इसे सबसे पहले हिन्दुस्तान में साबित किया अमीन सयानी ने। रेडियो सेलोन के “बिनाका गीतमाला” से शुरू होकर AIR के पहले प्रायोजित कार्यक्रम “सैरिडॉन के साथी ” से होते हुए “संगीत के सितारों की महफ़िल” तक आते आते , अमीन सयानी साहब ने लगभग 54000 रेडियो कार्यक्रमों के लिए काम किया और अंदाज़न 19000 इश्तेहारों के लिए काम किया। इनकी शानदार आवाज़ इतनी मक़बूल और मशहूर रही कि आज भी आवाज़ से जुड़ा हुआ कोई भी फ़नकार, काम अच्छे से करता है तो पहली तुलना इन्हीं से की जाती है।
अमीन और अमिताभ
अमीन सयानी के बारे में कई दफ़ा बहुत से लोगों ने लिखा और बताया। यही नहीं, इन्हें कई इनामों से भी नवाज़ा गया जिसके ये हक़दार भी थे। ऐसे भी बहुत से नाम हैं जो अमीन सयानी साहब के बाद हमसे जुड़े और उतने ही असरदार तरीक़े से। लेकिन उनका कम ही ज़िक़्र हो पाता है।
“80 के दशक तक लगभग सारे इश्तेहार जो टेलीविज़न पर दिखाए जाते थे, उनकी भाषा अंग्रेजी ही होती थी। चाहे अमूल बटर हो चाहे गोल्ड स्पॉट, चाहे पंजाब नेशनल बैंक हो या मैगी , लगभग सभी इश्तेहार अंग्रेज़ी में ही बनते थे हालांकि 80 के दशक के आख़िरी सालों में हिंदी भी असरदार तरीके से सुनाई पड़ने लगी थी। जब अंग्रेज़ी में इश्तेहार बन रहे थे तब अमीन साहब जैसी ही बुलंद आवाज़ की तलाश टेलीविज़न के लिए प्रचार बनाने वालों को भी थी। “
एक आवाज़ ने आने वाले कई सालों तक अपनी आवाज़ अंग्रेज़ी के इश्तेहारों में दी और ये आवाज़ थी प्रताप शर्मा की जो कि देश के जाने माने साहित्यकार के रूप में भी उभर रहे थे। इन्होंने बच्चों के लिए ढेर सारी कहानियां लिखी थी, खूब नाटक भी किया था और कुछ फिल्मों में भी काम किया था। हम पुराने दूरदर्शन के इश्तेहार कई बार यूट्यूब पर देखते और सुनते हैं और यादों में खो जाते हैं, उन इश्तेहारों में जो आवाज़ स्क्रीन पर दिखने वाले किरदारों की लगती है, और फर्राटेदार अंग्रेज़ी, बेहतरीन तलफ़्फ़ुज़ के साथ सुनाई पड़ती है, वो 80 फीसदी प्रताप शर्मा की ही होती है। हिंदी फिल्मों की मशहूर अदाकारा तारा शर्मा, इन्हीं की बेटी हैं। एक और नाम जो प्रताप शर्मा के अलावा अंग्रेज़ी के इश्तेहारों में कई किरदारों की आवाज़ बना, वो निखिल कपूर का है।
प्रताप शर्मा
शम्मी नारंग ने भी बहुत से इश्तेहारों में अंग्रेज़ी बोली है। जब हिंदी के प्रचार बहुत मशहूर होने लगे तब लगभग सभी बड़ी कंपनियों ने हिंदी में प्रचार बनाना शुरू कर दिया। “वीको वज्रदंती में हैं 51/45 औषधियों और जड़ी बूटियों के गुण ” , “ओह्हो दीपिका जी , लीजिये आपका सब सामान तैयार है “, इन संवादों को आज तक कोई नहीं भूला और कितनी बेहतरीन आवाज़ में ये बातें कही जाती थीं, कितनी खनक होती थी उनमें।
ये दोनों संवाद, विनोद शर्मा जी की आवाज़ में थे , जिन्होंने लगभग हर कंपनी के इश्तेहार के लिए अपनी आवाज़ दी। “आपकी पारखी नज़र और निरमा सुपर”, चश्मा पहन कर जो दुकानदार बने संजीदा बुज़ुर्ग, स्क्रीन पर दिखते थे, वो ख़ुद विनोद शर्मा जी ही थे। उनकी आवाज़ कई इश्तेहारों में सुनी जा सकती है। बृज भूषण की आवाज़ भी कई इश्तेहारों में सुनाई पड़ी।
निखिल कपूर
ऐसा नहीं था कि केवल पुरुष ही आवाज़ की दुनिया में नाम कमा रहे थे। कुछ महिलाएं भी बहुत मशहूर हुईं अपनी आवाज़ के लिए। सरिता सेठी जो सर्फ़ के फायदे बताती हुई ललिता जी की आवाज़ बनीं या नमिता मथान जो अंग्रेज़ी और हिंदी के कई इश्तेहारों में अपनी खनकदार आवाज़ के साथ सुनाई पड़ीं। बाद के दौर में हरीश भीमानी, पीयूष मिश्रा , रघुबीर यादव जैसे लोगों ने भी अपनी आवाज़ इश्तेहारों में दी।
सुनें गीतमाला-
अब तो ऐसे कई कलाकार हैं जो इश्तेहारों में अपनी आवाज़ देते हैं, और ये एक बहुत बड़ा और फायदेमंद काम बन चुका है। लेकिन बीते ज़माने की वो आवाज़ें जो कभी राजू के दांतों की तारीफ़ किया करती थीं, तो कभी हाजमोला की ख़ूबियां गिनाया करती थीं, आज भी हमारे ज़ेहन में ज़िंदा हैं और ताउम्र रहेंगी।
(लेखक जाने-माने साहित्यकार, फ़िल्म समालोचक, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इंडियन चैम्बर ऑफ कॉमर्स के 95वें वार्षिक दिवस पर आज देश को संबोधित किया। इस कार्यक्रम में पीएम ने कहा कि, ‘ICC ने 1925 में अपने गठन के बाद से आज़ादी की लड़ाई को देखा है। अब इस बार की ये AGM एक ऐसे समय में हो रही है, जब हमारा देश विविध परेशानियों से जूझ रहा है।’
पीएम ने कहा कि, ‘आत्म निर्भर भारत, आत्मनिर्भरता का ये भाव बरसों से हर भारतीय ने एक एस्पिरेशन की तरह जिया है, लेकिन फिर भी एक बड़ा काश, हर भारतीय के मन में रहा है। भारत कोरोना से लड़ रहा है, लेकिन कोरोना के अलावा अन्य तरह के संकट भी सबके सामने खड़े हैं। कही बाढ़, कहीं टिड्डों की समस्या, कहीं तेल क्षेत्र में आग तो कहीं भूकंप, पर ये हमारी संकल्पशक्ति हमारी स्ट्रेंथ है।
उन्होंने कहा, ‘बीते 5-6 वर्षों में, देश की नीति और रीति में भारत की आत्मनिर्भरता का लक्ष्य सर्वोपरि रहा है। अब कोरोना संकट में जिसे आयात करने के लिए देश मजबूर हैं, वो भारत में ही कैसे बने, इस दिशा में हमें और तेजी से काम करना है।’
पीएम मोदी ने कहा कि, ‘किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए जो निर्णय हाल में हुए हैं, उन्होंने एग्रीकल्चर इकोनॉमी को बरसों की गुलामी से मुक्त कर दिया है। अब भारत के किसानों को अपने प्रोडक्ट, अपनी उपज देश में कहीं पर भी बेचने की आज़ादी मिल गई है।’ पीएम ने आगे कहा कि, ” LED बल्ब के इस्तेमाल से 19,000 करोड़ की बचत हुई है, गरीब और मध्यम वर्ग लोगों को इससे फायदा भी हुआ है।
किसी भी संभ्रांत समाज में रहने वाले नागरिक को अपने कर्तव्यों और अधिकारों का बोध होता है और जहां भी अधिकारों का बोध कर्तव्यों से ज़्यादा होने लगता है , वहाँ सहयोग की कमी होने लगती है और घर्षण बढ़ने लगता है। ऐसे में जिन दो पक्षों में घर्षण हो रहा होता है, उसमे से सबल पक्ष मानवता की प्रत्याशित और अपेक्षित धारणाओं के बिलकुल परे जाकर शक्ति प्रदर्शन करने लगता है और निर्बल पक्ष अगर कायर नहीं होता तो एक अल्पकालीन संघर्ष करता है और अगर भयभीत होता है तो तत्काल पराजय स्वीकार कर लेता है और अपना अधिकार खो देता है।
‘दीना पाठक’ व ‘भीष्म साहनी’
अभिव्यक्ति की जितनी भी कलात्मक विधाएं हैं, उनमे साहित्य ने सबसे प्रबल तरीके से इन विसंगतियों को प्रदर्शित किया है।
“जब से सिनेमा का अत्यधिक प्रभाव लोगों पर पड़ने लगा, इसके माध्यम से भी ऐसी प्रस्तुतियां की गयीं। प्रचलित सिनेमा में पोएटिक जस्टिस को आधार बनाया गया और 70 के दशक में जब यथार्थ को आधार बनाकर पैरलेल सिनेमा ने स्थान बनाना शुरू किया, तब से सामाजिक जीवन से जुडी ऐसी फिल्में खूब बनायीं गयीं, जिनमें सबल और निर्बल का संघर्ष था। 1984 में आयी फिल्म “मोहन जोशी हाज़िर हो!” भी ऐसी ही एक फ़िल्म थी। “
सईद अख्तर मिर्ज़ा ने यह फिल्म बनाई थी और इसमें एक आम आदमी के जीवन को दिखाया गया है जो मुंबई की एक चॉल में रहता है। भीष्म साहनी ( मोहन जोशी ), अपनी पत्नी (दीना पाठक), बेटे और बहु (मोहन गोखले और दीप्ति नवल) के साथ रहते हैं और हमेशा उस चॉल की हालत खराब ही रहती है, उसे मरम्मत की बहुत ज़रुरत होती है लेकिन चॉल का मालिक अमजद खान (कुंदन कपाड़िया ), मरम्मत करवाना नहीं चाहता। वो चाहता था कि भले ही चॉल गिर जाए ताकि वहां एक बड़ी बिल्डिंग बनाई जा सके।
नसीरुद्दीन शाह
भीष्म साहनी (मोहन जोशी) पहले तो अमजद खान (कुंदन कपाड़िया ) से शिकायत कर के ये मुद्दा सुलझाना चाहते हैं, लेकिन जब ऐसा नहीं हो पाता तो वे अदालत में जाते है। वहाँ इनकी मुलाक़ात नसीरुद्दीन शाह ( अधिवक्ता मलकानी ) और सतीश शाह (अधिवक्ता गोखले) से होती है। ये दोनों मिलकर भीष्म साहनी (मोहन जोशी) को बहुत दिन तक ठगते हैं और ये अदालत की धीमी प्रक्रिया के कारण संभव हो पाता है। पंकज कपूर , अमजद खान (कुंदन कपाड़िया ) के बनाई जा रही नयी परियोजनाओं के लिए लोगों को बहलाने का काम करते हैं। जब अदालत में बहुत देर होती है और आशाएं ख़त्म होने लगती हैं तब एक दिन बिल्डिंग का निरीक्षण करने कुछ लोग आते हैं और ये साबित करने और दिखाने में कि बिल्डिंग जर्जर है, दुर्घटना घट जाती है और एक हिस्सा मकान का गिर जाता है, जिसके नीचे दब कर भीष्म साहनी ( मोहन जोशी ) मर जाते हैं। इन सब के बीच , “जस्टिस डिलेड ईज़ जस्टिस डिनाइड ” और “बेटर लेट दैन नेवर ” का झगड़ा चलता रहता है।
अमज़द खान
फिल्म का निर्देशन, सईद अख्तर मिर्ज़ा ने किया था और इसकी कहानी भी लिखी थी। पटकथा युसूफ मेहता ने लिखा था और संवाद सुधीर मिश्रा ने। सिनेमैटोग्राफ़ी वीरेन्द्र सैनी की थी और संपादन रेणु सलूजा का था। फ़िल्म के गानों में यह दिखाने की चेष्टा की गई है कि जिस मुंबई को सपनों का शहर कहा जाता है, उसकी असलियत कुछ और ही है। “आमची मुंबई है तुमची भी”, इस गाने से ही फ़िल्म शुरू भी होती है। फ़िल्म का संगीत, वनराज भाटिया ने दिया। सभी कलाकारों ने अद्भुत अभिनय किया है और रोहिणी हतंगडी, अच्युत पोटदार जैसे कलाकारों ने, इस फ़िल्म को और सशक्त बनाया है।
दीपक काज़िर केजरीवाल
न्यायपालिका और धनवान के बीच के रहस्यमयी एवं आश्चर्यजनक अन्योन्याश्रय संबंध से एक सजग और साधारण व्यक्ति या नागरिक के मन और जीवन में कितना खीझ भर सकता है, इस यथार्थ का मार्मिक चित्रण करती है ये फ़िल्म।
(लेखक जाने-माने साहित्यकार, फ़िल्म समालोचक, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)
अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प के प्रशासन के एक अधिकारी ने भारत में धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर सवाल खड़ा कर दिया है। इंटर्नैशनल रिलिजियस फ़्रीडम के ऐम्बैसडर सैम्यूअल ब्राउनबैक ने भारत की धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति को लेकर चिंता व्यक्त की। उन्होंने इस सम्बन्ध में ये बातें इंटर्नैशनल रिलीजियस फ़्रीडम २०१९ की रिपोर्ट आने के बाद कही।
सैम्यूअल ने भारत की वर्तमान स्थिति के मद्देनज़र अपना मत व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि भारत का इतिहास बेहद समृद्ध रहा है, ऐसे में भारत में कोरोना प्रसार के लिए मुस्लिमों को ज़िम्मेदार ठहराना बिल्कुल ग़लत है। उन्होंने कहा कि भारत में हमेशा से अन्य धर्म के लोगों की इज़्ज़त होती रही है।
इंटर्नैशनल रिलीजियस फ़्रीडम २०१९ की रिपोर्ट अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोंपियो ने जारी किया। ये रिपोर्ट हर साल दुनियाभर के देशों में धार्मिक अधिकारों को लेकर बनाई जाती है। हालाँकि इसके पहले भी भारत इनके रिपोर्ट्स को ख़ारिज करती रही है। भारत ने कहा था कि किसी विदेशी सरकार के पास भारत की धार्मिक स्वतंत्रता के बारे में गहरी पड़ताल का क्या तरीका मौजूद है। भारत में धार्मिक आज़ादी का अधिकार संविधान प्रदत्त है।
इस सम्बन्ध में सैमुअल ब्राउनबैक ने पत्रकारों से बातचीत में कहा है कि भारत मुख्य रूप से चार धर्मों के लोग रहते हैं। उन्होंने भारत में घटनाओं को लेकर चिंता व्यक्त की। भारत का इतिहास अन्य धर्मों के सम्मान के मामले में शानदार रहा है, लेकिन इस वक्त हम लोग ढेर सारी परेशानियां देख रहे हैं। सैम्यूअल ने कहा कि मैं सोचता हूं कि भारत में अंतरधार्मिक संबंधों पर बातचीत की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि अगर इस मामले पर गम्भीरता से विचार न किया गया, तो भविष्य में हिंसक घटनाओं में इज़ाफ़ा भी हो सकता है।
कोरोना वैक्सीन को लेकर और अच्छी ख़बर प्रकाश में आई है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, भारतीय बायोटेक्नोलॉजी कंपनी पैनासिया बायोटेक लिमिटेड कंपनी COVID-19 वैक्सीन के विकास, निर्माण और वितरण में अमेरिका स्थित रिफाना इंक के साथ भागीदारी कर रही है। इस साझेदारी के तहत, पैनासिया पर दवा के उत्पादन, क्लीनिकल डेवलपमेंट और वाणिज्यिक निर्माण की जिम्मेदारी होगी।
पैनासिया और रिफ़ाना दोनों अपने संबंधित क्षेत्रों में वैक्सीन की बिक्री और वितरण का कार्य करेंगे। कोरोना वैक्सीन के सम्बंध में पनसिया बायोटेक के मैनेजिंग डायरेक्टर राजेश जैन ने कहा कि ‘दुनिया को एक ऐसी दवा चाहिए जो सुरक्षित हो, असरदार हो और उपलब्ध हो और जो वैश्विक मांग को पूरी कर सके।’
जैन ने स्पष्ट किया कि हमारा लक्ष्य है कि कोरोना के मरीजों के लिए हम 500 मिलियन से अधिक खुराक बनाएँ। हमें यह उम्मीद है कि अगले साल की शुरुआत में 40 मिलियन से अधिक खुराक डिलिवरी के लिए उपलब्ध होगी।
जैन ने कहा कि आगामी महीने में हम दिल्ली और पंजाब में अपनी लैब्स में वैक्सीन को डिवेलप करेंगे और उम्मीद करते हैं कि ऑक्टोबर तक ह्यूमन ट्रायल के पहले चरण को शुरू कर दिया जाएगा।