खाप पंचायत का आतंक: बलात्कार पीड़िता के परिवार का किया हुक्का-पानी बंद, लगाया पाँच लाख का जुर्माना
UP: असली अनामिका शुक्ला को मिली नौकरी, सहायक अध्यापिका के पद पर हुई नियुक्ति
GST काउंसिल बैठक: व्यापारियों को मिली बड़ी राहत, जीएसटी लेट फ़ीस माफ़
इसके अलावा जुलाई, 2017 से जनवरी, 2020 के दौरान शून्य जीसटी रिटर्न वाली रजिस्टर्ड यूनिट पर भी कोई लेट फीस नहीं लगेगा। वहीं 5 करोड़ रुपये से कम टर्नओवर वाले कारोबारियों को फरवरी से जून 2020 के बीच रिटर्न फाइल करने पर सिर्फ 9 फीसदी ब्याज चुकाना होगा।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि काउंसिल कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भी शुल्क ढाँचा सुधारने की कोशिश में लगी है, ताकि व्यापारियों की समस्या को कम किया जा सके।
“आशीर्वाद (1968)” -पितृत्व, प्रेम और अमर्त्यों के अध्यक्ष की कहानी
डॉ० कुमार विमलेन्दु सिंह | Cinema Desk
जीवन में एक व्यक्ति कई सम्बन्ध बनाता है और इन्हीं के सहारे या ये भी कहा जा सकता है कि इन्हीं के आधार पर, उसकी सारी गतिविधियां, मान्यताएं और विचाधारा विकसित होती है। जिन दो बातों का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है, किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व के निर्माण में , वे होती हैं, अनुवांशिकता और वातावरण। अभिभावकों के स्वभाव और उनकी शारीरिक संरचना का कुछ अंश, व्यक्ति में तो आता ही है, लेकिन भावनात्मक और व्यवहारात्मक स्तर पर जो परिवर्तन लगातार चलते रहते हैं, उनमें वातावरण का बहुत प्रभाव होता है।

सभी सम्बन्ध विशेष होते हैं और उनका अपना महत्व होता है लेकिन पिता और संतान का सम्बन्ध, इतना गहरा होता है कि कई बार शब्द अक्षम होते हैं, इसे बता पाने में। पिता होना, स्वयं को अपने हाथों से रचने जैसा है, एक अलग जीवन विस्तार के लिए। सुरक्षा, पालन और सुविधाएं प्रदान करने की क्रियाओं के आवरण में, प्रेम छिप अवश्य जाता है लेकिन आधार वही बना रहता है। पितृत्व की एक ऐसी ही कहानी बताती है, हृषिकेश मुखर्जी की फ़िल्म, “आशीर्वाद”।

“आशीर्वाद”, 1968 में आई और बहुत सुन्दर ढंग से पितृत्व की इस भावना को इस फ़िल्म ने प्रदर्शित किया। पिता-पुत्री के प्रेम का अद्भुत चित्रण था, इस फ़िल्म में।
फ़िल्म में अशोक कुमार (जोगी ठाकुर) को अपनी पत्नी वीणा (लीला चौधरी) के पिता की संपत्ति प्राप्त होती है, हालांकि उसपर वश उनकी पत्नी का ही होता है, अशोक कुमार (जोगी ठाकुर), ज़मींदार जैसा व्यवहार बिल्कुल नहीं रखते और सभी तपके के लोगों के साथ मिलते जुलते रहते हैं। एक बार उनकी जानकारी के बिना, उनसे कुछ कागज़ों पर धोखे से दस्तख़त लेकर , ग़रीबों की बस्ती में आग लगा दी जाती है। इससे दुखी होकर अशोक कुमार (जोगी ठाकुर), अपने घर से चले जाते हैं, कभी न लौटकर आने के लिए। पीछे छूट जाती है उनकी बेटी नीना।

अशोक कुमार (जोगी ठाकुर) को हमेशा नीना की याद आती रहती है और एक बच्ची, जो उन्हें पार्क में दिखती है और उसका भी नाम नीना ही होता है, इनसे बहुत जुड़ जाती है। लेकिन बीमारी के कारण वह गुज़र जाती है, इसके बाद परिस्थितियों के जंजाल में पड़कर, हत्या के आरोप में, अशोक कुमार (जोगी ठाकुर), जेल चले जाते हैं और वहीं माली का काम करते हैं।
“जेल में संजीव कुमार (डॉ० बीरेन) इनकी कविताएं सुनते हैं और उन्हें इनसे लगाव हो जाता है। एक दिन अचानक, अशोक कुमार (जोगी ठाकुर) को पता चलता है कि संजीव कुमार (डॉ० बीरेन) की शादी, उनकी बेटी सुमिता सान्याल (नीना) से ही होने वाली होती है। अब तक कथानक का संचालक “संयोग” ही बना रहता है। अपनी बेटी को आशीर्वाद देने के लिए, अशोक कुमार (जोगी ठाकुर) तड़प उठते हैं और हृदयविदारक स्थितियों में आशीर्वाद देने जाते भी हैं और दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं।”
फ़िल्म का निर्देशन, हृषिकेश मुखर्जी ने किया, संपादन भी किया और इसके निर्माण में भी एन०सी० सिप्पी के साथ रहे। कहानी, अनिल घोष की थी और संवाद, गुलज़ार जैसे सिद्धहस्त लेखक ने लिखे। सिनेमैटोग्राफ़ी, टी०बी० सीताराम की थी और 2 घंटे, 26 मिनट की ये फ़िल्म, दर्शकों को एक भावनात्मक यात्रा पर ले जाने में, पूर्णतया सफल थी। वसंत देसाई का संगीत भी अत्यंत प्रशंसनीय रहा। इस फ़िल्म का गाना, “रेलगाड़ी रेलगाड़ी”, अशोक कुमार ने गाया और कई जगहों पर इसे भारत का पहला रैप भी कहा गया है। इस गीत को महान साहित्यकार, हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय ने लिखा था, जो इस फ़िल्म में “बैजू ढोलकिया” के किरदार में थे।

इस फ़िल्म को 1969 में सर्वश्रेष्ठ हिन्दी फ़ीचर फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला और अशोक कुमार को, सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।
फ़िल्म के कथानक की परिस्थितियां, बिल्कुल, टॉमस हार्डी के उपन्यासों की तरह, “संयोग” पर आश्रित होती हैं, आगे बढ़ने के लिए और हार्डी की ही तरह, इस फ़िल्म में घटनाओं का कर्ता, “अमर्त्यों का अध्यक्ष (प्रेसिडेंट ऑफ़ इम्मोर्टल्स)” , अर्थात् ईश्वर होता है। कुल मिलाकर ये, पितृत्व, प्रेम और अमर्त्यों के अध्यक्ष की कहानी है, जिसने इस फ़िल्म को अविस्मरणीय बना दिया है।
(लेखक जाने-माने साहित्यकार, फ़िल्म समालोचक, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)
सुनें फ़िल्म आशीर्वाद का यह गीत-
मरीजों की लाशों के साथ हो रहे खिलवाड़ पर सुप्रीम कोर्ट सख़्त, दिल्ली सरकार को लगाई फटकार
चूमकर रोग ठीक करता था असलम बाबा, कोरोना से हुई मौत
सौम्या केसरवानी | Navpravah.com
मध्य प्रदेश के रतलाम जिले में झांड-फूंक करने वाले एक बाबा की कोरोना से मौत हो गई है। ये बाबा हाथ चूम कर इलाज करते थे। बाबा खुद भी कोरोना से मर गये हैं और 23 लोगों को संक्रमित भी कर गए हैं।
बाबा की ख्याति सिर्फ रतलाम शहर में ही नहीं थी, बल्कि आसपास के इलाकों से भी लोग इनके पास अंधविश्वास के चक्कर में इलाज करवाने आते थे। ये बाबा हाथ को चूम कर बड़ी-बड़ी बीमारियों को दूर करने का दावा करता था।
इस बाबा का नाम असलम बाबा था, असलम का असली नाम अनवर शाह है। रतलाम के नयापुरा इलाके में करीब 15 वर्षों से अपने परिवार के साथ रह रहा था, असलम बीमारी दूर करने के नाम पर लोगों से मोटी रकम भी ऐंठता था।
स्थानीय लोग बताते हैं कि बाबा अपने भक्तों का इलाज हाथ चूम कर करते थे, बाबा के पास हर रोग का इलाज था। हालांकि बाबा खुद कैसे कोरोना से संक्रमित हुआ, इसके बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं है। तबीयत खराब होने के बाद इसे इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
असलम बाबा की 4 जून को मौत हुई थी, उसके बाद जिले के अधिकारियों में हड़कंप मच गया। मौत के बाद स्वास्थ्य विभाग को पता चला कि यह झांड़-फूंक करने का काम करता था। उसके बाद बाबा के संपर्क में आए लोगों की तलाश शुरू हुई।
अब तक बाबा के 23 भक्त कोरोना से संक्रमित हैं, जिसमें 7 इसके परिवार के लोग हैं, ज्यादातर लोग तो डर से सामने आ ही नहीं रहे हैं, असलम बाबा के पास हर दिन दर्जनों लोग उसके जाल में फंसकर इलाज के लिए आते थे।
69 हज़ार शिक्षक भर्ती घोटाला: अभ्यर्थियों से ठगी का ब्योरा जुटाने में लगी एसटीएफ़
बोलती तस्वीरें- “अमीन सयानी”
डॉ० कुमार विमलेन्दु सिंह | Navpravah Desk
गुज़रता हुआ वक़्त, कोरे सफ़हे जैसा है और आवाज़ के अलावा, कुछ नहीं है रोशनाई । माज़ी की तफ़्तीश और मुस्तक़बिल के ख़्वाबों के दरमियान जो सबसे ज़्यादा असर छोड़ जाती है , वो आवाज़ होती है। हम वाक़िफ़ हैं कि किस तरह दूरदर्शन हमारी ज़िन्दगी का हिस्सा बनता चला गया और वो दौर भी आया जब ज़्यादातर घरों को टेलीविज़न हासिल था और लोग दिन -ब- दिन, दिखाए जाने वाले धारावाहिकों और उनमे आने वाले किरदारों से जुड़ते चले गए। ये नहीं था कि ऐसे किरदारों से उनका जुड़ाव पहले नहीं था। सिर्फ ज़रिया बदला था, रेडियो की बेशक्ल आवाज़ों को अब चेहरे मिल गए थे और जुड़ाव एक अलग मक़ाम पर जा पहुंचा था। लेकिन जो आवाज़ें आदत बन चुकी थीं, सुनने वालों की वो रेडियो तक रुकी नहीं रही, उन्होंने भी एक सफर तय किया रेडियो से टेलीविज़न तक का और बने रहे मुसलसल लोगों के साथ।

आवाज़ की भी ख़ुसूसियत होती है, और इसे सबसे पहले हिन्दुस्तान में साबित किया अमीन सयानी ने। रेडियो सेलोन के “बिनाका गीतमाला” से शुरू होकर AIR के पहले प्रायोजित कार्यक्रम “सैरिडॉन के साथी ” से होते हुए “संगीत के सितारों की महफ़िल” तक आते आते , अमीन सयानी साहब ने लगभग 54000 रेडियो कार्यक्रमों के लिए काम किया और अंदाज़न 19000 इश्तेहारों के लिए काम किया। इनकी शानदार आवाज़ इतनी मक़बूल और मशहूर रही कि आज भी आवाज़ से जुड़ा हुआ कोई भी फ़नकार, काम अच्छे से करता है तो पहली तुलना इन्हीं से की जाती है।

अमीन सयानी के बारे में कई दफ़ा बहुत से लोगों ने लिखा और बताया। यही नहीं, इन्हें कई इनामों से भी नवाज़ा गया जिसके ये हक़दार भी थे। ऐसे भी बहुत से नाम हैं जो अमीन सयानी साहब के बाद हमसे जुड़े और उतने ही असरदार तरीक़े से। लेकिन उनका कम ही ज़िक़्र हो पाता है।
“80 के दशक तक लगभग सारे इश्तेहार जो टेलीविज़न पर दिखाए जाते थे, उनकी भाषा अंग्रेजी ही होती थी। चाहे अमूल बटर हो चाहे गोल्ड स्पॉट, चाहे पंजाब नेशनल बैंक हो या मैगी , लगभग सभी इश्तेहार अंग्रेज़ी में ही बनते थे हालांकि 80 के दशक के आख़िरी सालों में हिंदी भी असरदार तरीके से सुनाई पड़ने लगी थी। जब अंग्रेज़ी में इश्तेहार बन रहे थे तब अमीन साहब जैसी ही बुलंद आवाज़ की तलाश टेलीविज़न के लिए प्रचार बनाने वालों को भी थी। “
एक आवाज़ ने आने वाले कई सालों तक अपनी आवाज़ अंग्रेज़ी के इश्तेहारों में दी और ये आवाज़ थी प्रताप शर्मा की जो कि देश के जाने माने साहित्यकार के रूप में भी उभर रहे थे। इन्होंने बच्चों के लिए ढेर सारी कहानियां लिखी थी, खूब नाटक भी किया था और कुछ फिल्मों में भी काम किया था। हम पुराने दूरदर्शन के इश्तेहार कई बार यूट्यूब पर देखते और सुनते हैं और यादों में खो जाते हैं, उन इश्तेहारों में जो आवाज़ स्क्रीन पर दिखने वाले किरदारों की लगती है, और फर्राटेदार अंग्रेज़ी, बेहतरीन तलफ़्फ़ुज़ के साथ सुनाई पड़ती है, वो 80 फीसदी प्रताप शर्मा की ही होती है। हिंदी फिल्मों की मशहूर अदाकारा तारा शर्मा, इन्हीं की बेटी हैं। एक और नाम जो प्रताप शर्मा के अलावा अंग्रेज़ी के इश्तेहारों में कई किरदारों की आवाज़ बना, वो निखिल कपूर का है।

शम्मी नारंग ने भी बहुत से इश्तेहारों में अंग्रेज़ी बोली है। जब हिंदी के प्रचार बहुत मशहूर होने लगे तब लगभग सभी बड़ी कंपनियों ने हिंदी में प्रचार बनाना शुरू कर दिया। “वीको वज्रदंती में हैं 51/45 औषधियों और जड़ी बूटियों के गुण ” , “ओह्हो दीपिका जी , लीजिये आपका सब सामान तैयार है “, इन संवादों को आज तक कोई नहीं भूला और कितनी बेहतरीन आवाज़ में ये बातें कही जाती थीं, कितनी खनक होती थी उनमें।
ये दोनों संवाद, विनोद शर्मा जी की आवाज़ में थे , जिन्होंने लगभग हर कंपनी के इश्तेहार के लिए अपनी आवाज़ दी। “आपकी पारखी नज़र और निरमा सुपर”, चश्मा पहन कर जो दुकानदार बने संजीदा बुज़ुर्ग, स्क्रीन पर दिखते थे, वो ख़ुद विनोद शर्मा जी ही थे। उनकी आवाज़ कई इश्तेहारों में सुनी जा सकती है। बृज भूषण की आवाज़ भी कई इश्तेहारों में सुनाई पड़ी।

ऐसा नहीं था कि केवल पुरुष ही आवाज़ की दुनिया में नाम कमा रहे थे। कुछ महिलाएं भी बहुत मशहूर हुईं अपनी आवाज़ के लिए। सरिता सेठी जो सर्फ़ के फायदे बताती हुई ललिता जी की आवाज़ बनीं या नमिता मथान जो अंग्रेज़ी और हिंदी के कई इश्तेहारों में अपनी खनकदार आवाज़ के साथ सुनाई पड़ीं। बाद के दौर में हरीश भीमानी, पीयूष मिश्रा , रघुबीर यादव जैसे लोगों ने भी अपनी आवाज़ इश्तेहारों में दी।
सुनें गीतमाला-
अब तो ऐसे कई कलाकार हैं जो इश्तेहारों में अपनी आवाज़ देते हैं, और ये एक बहुत बड़ा और फायदेमंद काम बन चुका है। लेकिन बीते ज़माने की वो आवाज़ें जो कभी राजू के दांतों की तारीफ़ किया करती थीं, तो कभी हाजमोला की ख़ूबियां गिनाया करती थीं, आज भी हमारे ज़ेहन में ज़िंदा हैं और ताउम्र रहेंगी।
(लेखक जाने-माने साहित्यकार, फ़िल्म समालोचक, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)
ICC में PM मोदी ने की ये अहम् बातें
न्यूज़ डेस्क | navpravah.com
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इंडियन चैम्बर ऑफ कॉमर्स के 95वें वार्षिक दिवस पर आज देश को संबोधित किया। इस कार्यक्रम में पीएम ने कहा कि, ‘ICC ने 1925 में अपने गठन के बाद से आज़ादी की लड़ाई को देखा है। अब इस बार की ये AGM एक ऐसे समय में हो रही है, जब हमारा देश विविध परेशानियों से जूझ रहा है।’
पीएम ने कहा कि, ‘आत्म निर्भर भारत, आत्मनिर्भरता का ये भाव बरसों से हर भारतीय ने एक एस्पिरेशन की तरह जिया है, लेकिन फिर भी एक बड़ा काश, हर भारतीय के मन में रहा है। भारत कोरोना से लड़ रहा है, लेकिन कोरोना के अलावा अन्य तरह के संकट भी सबके सामने खड़े हैं। कही बाढ़, कहीं टिड्डों की समस्या, कहीं तेल क्षेत्र में आग तो कहीं भूकंप, पर ये हमारी संकल्पशक्ति हमारी स्ट्रेंथ है।
उन्होंने कहा, ‘बीते 5-6 वर्षों में, देश की नीति और रीति में भारत की आत्मनिर्भरता का लक्ष्य सर्वोपरि रहा है। अब कोरोना संकट में जिसे आयात करने के लिए देश मजबूर हैं, वो भारत में ही कैसे बने, इस दिशा में हमें और तेजी से काम करना है।’
पीएम मोदी ने कहा कि, ‘किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए जो निर्णय हाल में हुए हैं, उन्होंने एग्रीकल्चर इकोनॉमी को बरसों की गुलामी से मुक्त कर दिया है। अब भारत के किसानों को अपने प्रोडक्ट, अपनी उपज देश में कहीं पर भी बेचने की आज़ादी मिल गई है।’ पीएम ने आगे कहा कि, ” LED बल्ब के इस्तेमाल से 19,000 करोड़ की बचत हुई है, गरीब और मध्यम वर्ग लोगों को इससे फायदा भी हुआ है।
“मोहन जोशी हाज़िर हो! (1984)” -न्याय प्रक्रिया पर प्रश्नचिन्ह अंकित करती एक फ़िल्म
डॉ० कुमार विमलेन्दु सिंह | Cinema Desk
किसी भी संभ्रांत समाज में रहने वाले नागरिक को अपने कर्तव्यों और अधिकारों का बोध होता है और जहां भी अधिकारों का बोध कर्तव्यों से ज़्यादा होने लगता है , वहाँ सहयोग की कमी होने लगती है और घर्षण बढ़ने लगता है। ऐसे में जिन दो पक्षों में घर्षण हो रहा होता है, उसमे से सबल पक्ष मानवता की प्रत्याशित और अपेक्षित धारणाओं के बिलकुल परे जाकर शक्ति प्रदर्शन करने लगता है और निर्बल पक्ष अगर कायर नहीं होता तो एक अल्पकालीन संघर्ष करता है और अगर भयभीत होता है तो तत्काल पराजय स्वीकार कर लेता है और अपना अधिकार खो देता है।

अभिव्यक्ति की जितनी भी कलात्मक विधाएं हैं, उनमे साहित्य ने सबसे प्रबल तरीके से इन विसंगतियों को प्रदर्शित किया है।
“जब से सिनेमा का अत्यधिक प्रभाव लोगों पर पड़ने लगा, इसके माध्यम से भी ऐसी प्रस्तुतियां की गयीं। प्रचलित सिनेमा में पोएटिक जस्टिस को आधार बनाया गया और 70 के दशक में जब यथार्थ को आधार बनाकर पैरलेल सिनेमा ने स्थान बनाना शुरू किया, तब से सामाजिक जीवन से जुडी ऐसी फिल्में खूब बनायीं गयीं, जिनमें सबल और निर्बल का संघर्ष था। 1984 में आयी फिल्म “मोहन जोशी हाज़िर हो!” भी ऐसी ही एक फ़िल्म थी। “
सईद अख्तर मिर्ज़ा ने यह फिल्म बनाई थी और इसमें एक आम आदमी के जीवन को दिखाया गया है जो मुंबई की एक चॉल में रहता है। भीष्म साहनी ( मोहन जोशी ), अपनी पत्नी (दीना पाठक), बेटे और बहु (मोहन गोखले और दीप्ति नवल) के साथ रहते हैं और हमेशा उस चॉल की हालत खराब ही रहती है, उसे मरम्मत की बहुत ज़रुरत होती है लेकिन चॉल का मालिक अमजद खान (कुंदन कपाड़िया ), मरम्मत करवाना नहीं चाहता। वो चाहता था कि भले ही चॉल गिर जाए ताकि वहां एक बड़ी बिल्डिंग बनाई जा सके।

भीष्म साहनी (मोहन जोशी) पहले तो अमजद खान (कुंदन कपाड़िया ) से शिकायत कर के ये मुद्दा सुलझाना चाहते हैं, लेकिन जब ऐसा नहीं हो पाता तो वे अदालत में जाते है। वहाँ इनकी मुलाक़ात नसीरुद्दीन शाह ( अधिवक्ता मलकानी ) और सतीश शाह (अधिवक्ता गोखले) से होती है। ये दोनों मिलकर भीष्म साहनी (मोहन जोशी) को बहुत दिन तक ठगते हैं और ये अदालत की धीमी प्रक्रिया के कारण संभव हो पाता है। पंकज कपूर , अमजद खान (कुंदन कपाड़िया ) के बनाई जा रही नयी परियोजनाओं के लिए लोगों को बहलाने का काम करते हैं। जब अदालत में बहुत देर होती है और आशाएं ख़त्म होने लगती हैं तब एक दिन बिल्डिंग का निरीक्षण करने कुछ लोग आते हैं और ये साबित करने और दिखाने में कि बिल्डिंग जर्जर है, दुर्घटना घट जाती है और एक हिस्सा मकान का गिर जाता है, जिसके नीचे दब कर भीष्म साहनी ( मोहन जोशी ) मर जाते हैं। इन सब के बीच , “जस्टिस डिलेड ईज़ जस्टिस डिनाइड ” और “बेटर लेट दैन नेवर ” का झगड़ा चलता रहता है।

फिल्म का निर्देशन, सईद अख्तर मिर्ज़ा ने किया था और इसकी कहानी भी लिखी थी। पटकथा युसूफ मेहता ने लिखा था और संवाद सुधीर मिश्रा ने। सिनेमैटोग्राफ़ी वीरेन्द्र सैनी की थी और संपादन रेणु सलूजा का था। फ़िल्म के गानों में यह दिखाने की चेष्टा की गई है कि जिस मुंबई को सपनों का शहर कहा जाता है, उसकी असलियत कुछ और ही है। “आमची मुंबई है तुमची भी”, इस गाने से ही फ़िल्म शुरू भी होती है। फ़िल्म का संगीत, वनराज भाटिया ने दिया। सभी कलाकारों ने अद्भुत अभिनय किया है और रोहिणी हतंगडी, अच्युत पोटदार जैसे कलाकारों ने, इस फ़िल्म को और सशक्त बनाया है।

न्यायपालिका और धनवान के बीच के रहस्यमयी एवं आश्चर्यजनक अन्योन्याश्रय संबंध से एक सजग और साधारण व्यक्ति या नागरिक के मन और जीवन में कितना खीझ भर सकता है, इस यथार्थ का मार्मिक चित्रण करती है ये फ़िल्म।
(लेखक जाने-माने साहित्यकार, फ़िल्म समालोचक, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)
देखें फ़िल्म-

















