“आशीर्वाद (1968)” -पितृत्व, प्रेम और अमर्त्यों के अध्यक्ष की कहानी

डॉ० कुमार विमलेन्दु सिंह | Cinema Desk

जीवन में एक व्यक्ति कई सम्बन्ध बनाता है और इन्हीं के सहारे या ये भी कहा जा सकता है कि इन्हीं के आधार पर, उसकी सारी गतिविधियां, मान्यताएं और विचाधारा विकसित होती है।  जिन दो बातों का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है, किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व के निर्माण में , वे होती हैं, अनुवांशिकता और वातावरण। अभिभावकों के स्वभाव और उनकी शारीरिक संरचना का कुछ अंश, व्यक्ति में तो आता ही है, लेकिन भावनात्मक और व्यवहारात्मक स्तर पर जो परिवर्तन लगातार चलते रहते हैं, उनमें वातावरण का बहुत प्रभाव होता है।

हृषिकेश मुखर्जी

सभी सम्बन्ध विशेष होते हैं और उनका अपना महत्व होता है लेकिन पिता और संतान का सम्बन्ध, इतना गहरा होता है कि कई बार शब्द अक्षम होते हैं, इसे बता पाने में। पिता होना, स्वयं को अपने हाथों से रचने जैसा है, एक अलग जीवन विस्तार के लिए। सुरक्षा, पालन और सुविधाएं प्रदान करने की क्रियाओं के आवरण में, प्रेम छिप अवश्य जाता है लेकिन आधार वही बना रहता है। पितृत्व की एक ऐसी ही कहानी बताती है, हृषिकेश मुखर्जी की फ़िल्म, “आशीर्वाद”।

फ़िल्म के एक दृश्य में ‘अशोक कुमार’

“आशीर्वाद”, 1968 में आई और बहुत सुन्दर ढंग से पितृत्व की इस भावना को इस फ़िल्म ने प्रदर्शित किया। पिता-पुत्री के प्रेम का अद्भुत चित्रण था, इस फ़िल्म में।

फ़िल्म में अशोक कुमार (जोगी ठाकुर) को अपनी पत्नी वीणा (लीला चौधरी) के पिता की संपत्ति प्राप्त होती है, हालांकि उसपर वश उनकी पत्नी का ही होता है, अशोक कुमार (जोगी ठाकुर), ज़मींदार जैसा व्यवहार बिल्कुल नहीं रखते और सभी तपके के लोगों के साथ मिलते जुलते रहते हैं। एक बार उनकी जानकारी के बिना, उनसे कुछ कागज़ों पर धोखे से दस्तख़त लेकर , ग़रीबों की बस्ती में आग लगा दी जाती है। इससे दुखी होकर अशोक कुमार (जोगी ठाकुर), अपने घर से चले जाते हैं, कभी न लौटकर आने के लिए। पीछे छूट जाती है उनकी बेटी नीना।

फ़िल्म के एक दृश्य में ‘हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय’

अशोक कुमार (जोगी ठाकुर) को हमेशा नीना की याद आती रहती है और एक बच्ची, जो उन्हें पार्क में दिखती है और उसका भी नाम नीना ही होता है, इनसे बहुत जुड़ जाती है। लेकिन बीमारी के कारण वह गुज़र जाती है, इसके बाद परिस्थितियों के जंजाल में पड़कर, हत्या के आरोप में, अशोक कुमार (जोगी ठाकुर), जेल चले जाते हैं और वहीं माली का काम करते हैं।

“जेल में संजीव कुमार (डॉ० बीरेन) इनकी कविताएं सुनते हैं और उन्हें इनसे लगाव हो जाता है। एक दिन अचानक, अशोक कुमार (जोगी ठाकुर) को पता चलता है कि संजीव कुमार (डॉ० बीरेन) की शादी, उनकी बेटी सुमिता सान्याल (नीना) से ही होने वाली होती है। अब तक कथानक का संचालक “संयोग” ही बना रहता है। अपनी बेटी को आशीर्वाद देने के लिए, अशोक कुमार (जोगी ठाकुर) तड़प उठते हैं और हृदयविदारक स्थितियों में आशीर्वाद देने जाते भी हैं और दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं।”

फ़िल्म का निर्देशन, हृषिकेश मुखर्जी ने किया, संपादन भी किया और इसके निर्माण में भी एन०सी० सिप्पी के साथ रहे। कहानी, अनिल घोष की थी और संवाद, गुलज़ार जैसे सिद्धहस्त लेखक ने लिखे। सिनेमैटोग्राफ़ी, टी०बी० सीताराम की थी और 2 घंटे, 26 मिनट की ये फ़िल्म, दर्शकों को एक भावनात्मक यात्रा पर ले जाने में, पूर्णतया सफल थी। वसंत देसाई का संगीत भी अत्यंत प्रशंसनीय रहा। इस फ़िल्म का गाना, “रेलगाड़ी रेलगाड़ी”, अशोक कुमार ने गाया और कई जगहों पर इसे भारत का पहला रैप भी कहा गया है। इस गीत को महान साहित्यकार, हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय ने लिखा था, जो इस फ़िल्म में “बैजू ढोलकिया” के किरदार में थे।

फ़िल्म के एक दृश्य में ‘संजीव कुमार’ और ‘अशोक कुमार’

इस फ़िल्म को 1969 में सर्वश्रेष्ठ हिन्दी फ़ीचर फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला और अशोक कुमार को, सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।

फ़िल्म के कथानक की परिस्थितियां, बिल्कुल, टॉमस हार्डी के उपन्यासों की तरह, “संयोग” पर आश्रित होती हैं, आगे बढ़ने के लिए और हार्डी की ही तरह, इस फ़िल्म में घटनाओं का कर्ता, “अमर्त्यों का अध्यक्ष (प्रेसिडेंट ऑफ़ इम्मोर्टल्स)” , अर्थात् ईश्वर होता है। कुल मिलाकर ये, पितृत्व, प्रेम और अमर्त्यों के अध्यक्ष की कहानी है, जिसने इस फ़िल्म को अविस्मरणीय बना दिया है।

(लेखक जाने-माने साहित्यकार, फ़िल्म समालोचक, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)

सुनें फ़िल्म आशीर्वाद का यह गीत-

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