अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत ने कल आत्महत्या कर ली, कोई भी अभी तक इस बात पर भरोसा नहीं कर पा रहा है। एक तरफ फैंस अपने सवालों का जवाब ढूंढ़ने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ बॉलीवुड से जुड़े सेलेब्रिटीज सोशल मीडिया पर अपना दुख जाहिर कर रहे हैं।
हालांकि इस बीच निर्देशक शेखर कपूर ने सुशांत के निधन से जुड़े पोस्ट में कुछ ऐसा कह दिया है, जिसे पढ़कर हर कोई हैरान रह गया है। उन्होंने खुलासा किया है कि, सुशांत उनके पास आकर रोया करते थे।
शेखर कपूर ने सुशांत सिंह राजपूत के निधन के बाद ट्विटर पर सनसनीखेज खुलासा किया है। उन्होंने अपने पोस्ट में लिखा है कि, ‘मैं जानता था कि तुम किस दर्द से गुजर रहे हो, मैं जानता था उन लोगों की कहानी, जिन्होंने तुम्हें इतनी बुरी तरह निराश किया था, काश मैं पिछले 6 महीनों में तुम्हारे आस-पास रह पाता, काश तुम मुझसे बात कर पाते, तुम्हारे साथ जो हुआ वो तुम्हारा नहीं, बल्कि उन लोगों के कर्मों का फल है।’
शेखर कपूर के इस ट्वीट से जाहिर है कि वो जानते थे कि सुशांत के साथ कुछ ऐसा हुआ है, जो उन्हें अंदर तक आघात पहुंचा गया है। इस बात का खुलासा तो शेखर ने कर दिया, लेकिन उस घटना या उन लोगों के बारे में उन्होंने कुछ नहीं बताया है, जिनके द्वारा सुशांत को निराश करने की बात वो ट्वीट में कर रहे हैं।
उनका आज विले पार्ले के सेवा समाज घाट पर अंतिम संस्कार किया गया, इस दौरान सुशांत के पिता, चचेरे भाई और तीन बहनें मौजूद थीं। सुशांत को कई हस्तियों ने श्रद्धांजलि भी दी, सुशांत की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में आत्महत्या की पुष्टि हुई है। डॉक्टरों ने उनके वाइटल ऑर्गन्स को आगे जांच के लिए जेजे अस्पताल भेजा है, रिपोर्ट अभी तक नहीं आयी है।
दिल्ली में कोरोना वायरस पर लगाम लगाने के लिए केंद्र सरकार सबसे सुझाव लेना चाहती है। आज केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दिल्ली में सर्वदलीय बैठक बुलाई थी, इस मीटिंग में आम आदमी पार्टी, बीजेपी, कांग्रेस और बसपा के प्रदेशस्तरीय नेता मौजूद रहे।
ऑल पार्टी मीटिंग में कांग्रेस ने डिमांड की है कि, टेस्टिंग सबके लिए होनी चाहिए क्योंकि यह हर एक का अधिकार है। कांग्रेस ने यह भी मांग की है कि कोविड-19 मरीज के परिवार को 10,000 रुपये की मदद दी जाए, साथ ही कंटेनमेंट जोन में रहने वाले हर परिवार को भी इतनी रकम मिले।
न्यूज एजेंसी ANI के अनुसार, पार्टी चाहती है कि हेल्थकेयर स्टाफ की कमी के चलते फोर्थ ईयर में पढ़ने वाले मेडिकल स्टूडेंट्स को नॉन-परमानेंट रेजिडेंट डॉक्टर्स की तरह इस्तेमाल किया जाए। हेल्थ स्टाफ के लिए बैचलर ऑफ फार्मेसी या नर्सिंग के फोर्थ ईयर स्टूडेंट्स काम आ सकते हैं।
केंद्रीय गृह मंत्री दिल्ली के हालात पर सीधे नजर रख रहे हैं, वह लगातार राज्य सरकार के संपर्क में हैं और जरूरी निर्देश व मदद मुहैया करा रहे हैं। कल उन्होंने उपराज्यपाल अनिल बैजल और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के साथ उच्चस्तरीय बैठक की थी, और इसी मीटिंग में चार-चार डॉक्टरों की तीन टीमें गठित करने, टेस्टिंग को तीन गुना करने का फैसला हुआ था।
दिल्ली में पिछले 24 घंटों में 2,200 से ज्यादा नए मामले सामने आए हैं। इस दौरान कोरोना के 7,353 टेस्ट हुए, जिनमें से 2,224 सैंपल कोरोना पॉजिटिव पाए गए, दिल्ली में कोरोना के कुल मामलेां की संख्या 41,182 हो चुकी है।
सुशांत सिंह राजपूत के निधन से देश और पूरा बॉलीवुड सदमे में है। सभी ने सुशांत की मौत पर दुःख जताया। लेकिन प्रोड्यूसर निखिल द्विवेदी ने बॉलीवुड के सेलेब्स पर ग़ुस्सा ज़ाहिर किया। उन्होंने कहा कि कभी कभी फ़िल्म इंडस्ट्री का दिखावा मुझे शर्मिंदा कर देता है।
फ़िल्म निर्माता निखिल द्विवेदी बॉलीवुड सेलेब्स पर भड़क गए। उन्होंने कहा कि मात्र दिखावा है बॉलीवुड में। जब कलाकारों को निर्माताओं के सहयोग की आवश्यक्ता होती है, तब कोई नज़र नहीं आता और जब कोई यह दुनिया छोड़ देता है, तब सब के घड़ियालू आँसूँ निकलने लगते हैं।
निखिल लगातार दो ट्वीट करते हुए लिखा कि आज जब सुशांत ने ग़लत उठा लिया, तब सबको दुःख हो रहा है, तब सबको दुःख हो रहा है, लेकिन जब सुशांत को लोगों की ज़रूरत थी तब कोई साथ नहीं था। उन्होंने कहा कि अपनी ही इंडस्ट्री के दोहरे चरित्र से वे बहुत आहत हैं।
अपने दूसरे ट्वीट में उन्होंने लिखा कि काश सुशांत के पास एक और रास्ता होता, तो वे हमारे साथ होते। इंसान के पास जब कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता होगा, तभी वह ऐसा फ़ैसला लेता है। निखिल ने कहा कि सब कह रहे हैं कि उन्हें सुशांत से टच में रहना चाहिए था, ‘लेकिन सच यह है कि आप लोग सुशांत के साथ टच में नहीं थे, क्योंकि उनका करियर ढलान पर था। क्या आप अभी इमरान खान, अभय देओल और बाकियों के टच में हैं? नहीं। लेकिन आप तब थे जब ये लोग अच्छा कर रहे थे’।
रविवार की रात लगभग 8 बजे गुजरात में भूकंप के तेज़ झटके महसूस किये गए। रिक्टर स्केल पर इसकी तीव्रता 5.5 बताई जा रही है। भूकंप का केंद्र राजकोट शहर से करीब 122 किलोमीटर दूर था।
गुजरात में इतने तेज़ झटके लगभग १९ साल बाद महसूस किया गया। इससे पहले भुज में 26 जनवरी 2001 में 7.7 की तीव्रता का भूकंप आया था, जिसमे 13 हज़ार से अधिक लोगों की जान गई थी। भूकंप के झटके राजकोट के अलावा जामनगर, सुरेंद्रनगर और जूनागढ़ में भी महसूस किए गए। खबर के मुताबिक़, अहमदाबाद में भी लोग डर के मारे अपने घरों से बाहर निकल आए। मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने राजकोट, कच्छ और पाटन जिले के कलेक्टरों से फोन पर हालात की जानकारी ली।
राजकोट के पास भूकंप आने के बाद रविवार रात करीब साढ़े आठ बजे जम्मू-कश्मीर के कटरा और आसपास के शहरों में भी भूकंप के झटके महसूस किए गए। भूकंप का एपिसेंटर कटरा से 90 किलोमीटर दूर था और तीव्रता 3 थी।
अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत ने रविवार दोपहर फाँसी लगाकर आत्महत्या कर लिया। उनके नौकर ने स्थानीय पुलिस को फ़ोन कर के इस घटना की सूचना दी। हालाँकि, अभी तक आत्महत्या के पीछे की वजह का कुछ पता नहीं चला है।
अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत ने अपना करियर टीवी सीरीयल से किया था। सुशांत सिंह राजपूत टीवी की दुनिया के चर्चित नाम थे। जब उन्होंने फ़िल्म में अपना करियर आज़माया, तो उसमें भी उन्हें काफ़ी सफलता प्राप्त हुई। काई पो छे ने उनके अभिनय को काफ़ी सराहा गया।
हाल ही में उनकी फ़िल्म छिछोरे और केदारनाथ काफ़ी सफल रही। सारा अली ख़ान और सुशांत की जोड़ी केदारनाथ में काफ़ी सराही गई थी।
निर्देशक– शूजीत सरकार स्टोरी-स्क्रीन्प्ले-डाइलॉग- जूही चतुर्वेदी कलाकार- अमिताभ बच्चन, आयुष्मान खुराना, विजय राज।
गुलाबो-सिताबो एक ऐसी फ़िल्म है, जिसका चेहरा चमका कर शूजीत ने अपना बाज़ार गर्म कर लिया। ट्रेलर देख कर लगा कि क्या पता ये एक क्लासिक फ़िल्म हो, कमोबेश सबका यही अंदाज़ा था, लेकिन शूजीत ने बढ़िया ट्रेलर के डिब्बे में मिलावटी मुरब्बा बनाकर परोस दिया। अमिताभ बच्चन-आयुष्मान अभिनीत फ़िल्म गुलाबो-सिताबो बहुप्रतीक्षित फ़िल्मों की लिस्ट में शुमार थी। तमाम दर्शकों की कल्पनाओं पर पानी फेर दिया है शूजीत ने।
जूही चतुर्वेदी और शूजीत सरकार का साथ लम्बे समय (विकी डोनर) से पसंद किया जा रहा है। बीच में फ़िल्म ऑक्टोबर की वजह से गुणवत्ता पर प्रश्न उठा, लेकिन ख़ास असर नहीं पड़ा। उम्मीद जगी कि गुलाबो-सिताबो अच्छी फ़िल्म होगी। इस फ़िल्म में भी डाइलॉग, कॉमडी पंचेज़ प्रभावशाली हैं, लेकिन पटकथा बेहद सुस्त, उबाऊ-थका देने वाला।
आइए जानते हैं कहानी क्या है-
लखनऊ में रहने 78 साल के मिर्ज़ा, उनकी 94 साल की बीवी फ़ातिमा, उनके ख़ानदानी महल और इसमें रहने वाले किराएदारों के इर्द-गिर्द घूमती है फ़िल्म गुलाबो-सिताबो की कहानी। मिर्ज़ा बेहद लालची क़िस्म का इंसान है, कई ऐब लिए मिर्ज़ा यही ख़्वाब देखता रहता है कि कब उसकी बीवी का इंतक़ाल हो और फ़ातिमा महल उसके नाम हो जाए। पैसे का इतना लालची है मिर्ज़ा कि अपने किराएदारों के कमरे के बाहर लगे बल्ब, उसकी साईकिल की घंटियाँ और छोटी-छोटी चीज़े चुराकर बाज़ार में बेच देता है।
कहानी में ट्विस्ट तब आता है, जब उसके किराएदार बाँके से वॉशरूम की दीवार टूट जाती है। दोनों के बीच नोक-झोंक होती है और मिर्ज़ा टॉइलेट रूम में ताला लगाकर उसके बग़ल में खटिया डालकर सो जाता है। ग़ुस्से में बाँके और मिश्रा उसे खटिया सहित बीच सड़क पर रख आते हैं। ग़ुस्से में मिर्ज़ा थाने जाता है, एफ़आईआर करने । वहाँ पुलिस के सामने मिर्ज़ा और किराएदारों की बहस होती है। वहीं एंट्री होती है पुरातत्व विभाग के शुक्लाजी की यानि ज्ञानेश शुक्ला की। कहानी यहाँ से अलग मोड़ ले लेती है। अब जहाँ मिर्ज़ा किराएदारों को बाहर करने के चक्कर में था, वहाँ उसी की परेशानी बढ़नी शुरू हो जाती है।
शुक्ला जी बताते हैं कि पुरातत्व विभाग इस महल को क़ब्ज़े में लेगा, क्योंकि महल १०० साल से ज़्यादा वक़्त का हो गया। अब मिर्ज़ा वक़ील से मिलता है, जो सलाह देता है कि हवेली बेच दी जानी चाहिए। अब मिर्ज़ा असली काग़ज़ के जुगाड़ में लगता है, जो उसकी बीवी उसको किसी हाल में नहीं दे सकती। क्या मिर्ज़ा, महल के असली काग़ज़ पाने में कामयाब होगा और फ़ातिमा महल बेच देगा, वर्षों से महल में रह रहे किराएदारों का क्या होगा ये देखने के लिए आपको फ़िल्म देखनी पड़ेगी।
निर्देशन-
शूजीत निःसंदेह एक बेहतरीन निर्देशक हैं, लेकिन एक बार फिर वो क़िस्से को बुनने में नाक़ामयाब रहे। जूही की सुस्त पटकथा इसकी एक बड़ी वजह रही। वे आयुष्मान जैसे कलाकार से काम नहीं ले पाए।
लेखन-
जूही की पटकथा उबाऊ है, लेकिन संवाद बेहतर हैं। संवाद के दौरान कॉमडी पंचेज़ बेहतरीन हैं। शब्दों का चयन बेहतर है, रीसर्च अच्छा है। लखनवी अन्दाज़ को पकड़कर रखा उन्होंने। लेकिन सुस्त पटकथा ने सब खेल बिगाड़ दिया।
अभिनय-
अमिताभ बच्चन कुछ भी कर सकते हैं, फ़िल्म देखने के बाद यही कहेंगे आप। जीवंत अभिनय, पूरी फ़िल्म में आपको अमिताभ बच्चन नहीं नज़र आएँगे, सिर्फ़ मिर्ज़ा मिलेगा आपको।
आयुष्मान, शायद बच्चन साहब की वजह से उतने नैचरल नहीं नज़र आए, जितना वे अपनी पहले की फ़िल्मों में नज़र आए हैं। इस फ़िल्म में वे निराश करते हैं।
विजय राज हमेशा की तरह प्रभावी रहे हैं। और सभी प्रमुख साथी कलाकारों ने भी अच्छा काम किया है।
देखें या नहीं-
अमिताभ बच्चन और जूही चतुर्वेदी के संवाद के लिए देखा जा सकता है। बस इसके अलावा कोई वजह नहीं।
कुल मिलाकर लगभग दो घंटे की ये फ़िल्म अमिताभ बच्चन जैसे महानायक की मौजूदगी के बाद भी निराश करती है।
(अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के आधार पर की गई समीक्षा एक जटिल काम है, जिसके अंतर्गत केवल पॉजिटिव कमेंट्स की उम्मीद रखना अनुचित है। हमारे यहाँ पेड रिव्यू जैसी भी कोई व्यवस्था उपलब्ध नहीं है।)
कोरोना के बढ़ते मामलों के बीच एक अच्छी ख़बर सामने आ रही है। देश में संक्रमण का मामला बढ़कर 3,20,922 तक पहुँच गया है और मरने वालों की संख्या बढ़कर 9200 हो चुकी है, वहीं ठीक होने वाले मरीजों की संख्या में भी तेज़ी से बढ़ोत्तरी हो रही है। देश में अब तक कुल 1,62,379 मरीज कोरोना से ठीक हो चुके हैं।
देश में सक्रिय मामलों की संख्या 1,49,348 है और ठीक हुए मरीजों की संख्या 1,62,379 है। कुल मरीजों के आधार पर अगर आकलन करें तो ठीक होने वाले मरीजों की दर 51.5 फीसद से ज्यादा हो गई है। हालाँकि देश में मामले लगातार बढ़ रहे हैं, लेकिन इसके बीच ठीक होने वाले मरीजों की संख्या में बढ़ोत्तरी से आम जनता की परेशानी कम ज़रूर होगी।
दिल्ली में कोरोना संक्रमण के अब तक लगभग 39000 मामले सामने आ चुके हैं। राज्य में अब तक 1271 लोगों की जान गई है। राज्य में 22,742 ऐक्टिव मामले हैं, जबकि 14945 मरीज ठीक होकर घर जा चुके हैं।
महाराष्ट्र में सर्वाधिक संक्रमण के मामले सामने आए हैं। राज्य में 1,04,568 मामले सामने आ चुके हैं। यहाँ अब तक 3830 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 49,346 ठीक हो चुके हैं। प्रदेश में अभी भी 49 हज़ार से अधिक सक्रिय मामले हैं।
देश में इस समय संक्रमण के 3,20,922 मामले सामने आए हैं, जबकि 9,195 मरीजों की मृत्यु हो चुकी है। ठीक होने वाले मरीजों की संख्या में लगातार इज़ाफ़ा हो रहा है। देश में अब तक कुल 1,62,379 मरीज कोरोना से ठीक हो चुके हैं। वहीं फिलहाल 1,49,348 एक्टिव केस हैं।
किसी भी व्यक्ति, समाज या वर्ग के सभी मानवीय गुणों का सम्मान अत्यंत आवश्यक है, सभी भावनाओं का ध्यान रखा जाना भी बहुत ज़रूरी है लेकिन वर्तमान में जिस किसी समाज को उत्थान का उत्कर्ष देखना है, वहाँ के लोगों, विशेषकर युवाओं में सबसे ज़रूरी भावना है देश प्रेम की भावना। मानवतावादी होने के लिए देश हित में सोचना या बोलना बंद करने की अनिवार्यता नहीं होती और देश को प्रमुखता देना, मानवता से विमुख होना भी नहीं होता।
चेतन आनंद पर जारी डाक टिकट
समाज में हर व्यक्ति अपने कृत्यों को उत्साह और कुशलता से सम्पादित करते हुए, अपने देश और समाज की सेवा कर सकता है और इसके लिए वो प्रशंसा का पात्र भी होता है।
“..लेकिन एक सैनिक जिस भावना से अपने देश की सेवा करता है , उसका मान हमेशा सबसे ज़्यादा होना चाहिए और उसकी वीरता को नमन करना चाहिए क्योंकि जिस देश में रहते हुए हम मानवीय स्वतंत्रता के विचार गढ़ते हैं , वहाँ विचार करते रह सकने की स्थिति बस सैनिकों के कारण ही होती है। सारी कलाओं, विधाओं, ग्रंथों और ज्ञान को मिटा दिया जाता है और मिटा दिया जाता है गौरवशाली इतिहास के पृष्ठ पर लिखा हुआ हर शब्द , जिस देश के सैनिक हार जाते हैं, इतनी महत्ता होती है सैनिकों की।”
कलात्मक प्रस्तुतियों में भी बार बार ऐसे निर्माण कार्य होने चाहिए जो युवा पीढ़ी के मन में सैनिकों और अपने देश के प्रति श्रद्धा और विश्वास पैदा कर सके और एक ललक जगे कि अपने देश के लिए जब कभी प्राणों की आहुति देने की बात आये तो हर बच्चा तैयार मिले। सिनेमा और टेलीविज़न ने ऐसी कई प्रस्तुतियां की हैं और बहुत बार ये फिल्में या धारावाहिक, युवाओं के लिए प्रेरणा बने हैं। 1988 में दूरदर्शन द्वारा प्रसारित धारावाहिक “परमवीर चक्र ” भी एक बहुत प्रेरणादायी प्रस्तुति थी।
फारुख शेख़ बतौर ‘मेजर सोमनाथ शर्मा’
चेतन आनंद ने “हकीकत” और “हिन्दुस्तान की क़सम” जैसी युद्ध और भारतीय सेना पर आधारित फिल्में बनाई थीं और इन फिल्मों को अपार सफलता भी प्राप्त हुई थी। 1980 के दशक में देश में बहुत अस्थिरता रही थी और इसका मुख्य कारण राजनैतिक स्वार्थ था। ये बहुत आवश्यक था कि उस दौर में युवाओं के मन में देश प्रेम की भावना को प्रबल किया जाए। ये बहुत ही प्रशंसनीय है कि दूरदर्शन ने इस उत्तदायित्व को समझा और चेतन आनंद ने केतन आनंद के साथ मिलकर ये धारावाहिक निर्देशित किया। इसके संपादक जेठू मंडल थे और भारत के सम्मानित सैनिक , जिन्हे परमवीर चक्र मिला था, उनकी जीवनी इस धारावाहिक में दिखाई गयी। उनके पारिवारिक जीवन और युद्ध क्षेत्र में उनके शौर्य का भी सुन्दर चित्रण किया गया था इस धारावाहिक में।
पुनीत इस्सर बतौर ‘नाइक जदुनाथ सिंह’
मेजर सोमनाथ शर्मा से लेकर लांस नाइक अल्बर्ट एक्का और मेजर धन सिंह थापा तक कई वीरों का जीवन इस धारावाहिक में दिखाया गया। इन किरदारों को निभाने वाले कलाकार भी चुनिंदा थे। फ़ारूक़ शेख , कंवलजीत, पुनीत इस्सर , नसीरुद्दीन शाह, गुरदास मान और पंकज धीर जैसे प्रसिद्ध चेहरों ने ये किरदार निभाए थे। अब तक 21 परमवीर चक्र दिए गए हैं और 14 वीरों को ये मरणोपरांत दिया गया है।
इन कहानियों को, इन वीर गाथाओं को केवल धारावाहिकों और फिल्मों तक ही नहीं रखना चाहिए। इस लेख के माध्यम से मैं ये आग्रह करता हूँ कि इन वीर गाथाओं को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए और बच्चों और युवाओं को, जो हमारे देश का भविष्य हैं, उन्हें ये बताया जाए कि कर्त्तव्य भी अधिकारों जितने ही महत्त्वपूर्ण हैं और ये सब हमें देश ही देता है। किसी भी अधिकार के लिए देश का होना बहुत आवश्यक है और देश का सुरक्षित और संपन्न होना सबसे महत्त्वपूर्ण है।
(लेखक जाने-माने साहित्यकार, फ़िल्म समालोचक, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)
कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या के हिसाब से भारत चौथे नंबर पर आ गया है। अब तक देश में 3.09 लाख कोविड-19 केसेज सामने आ चुके हैं। महाराष्ट्र में एक लाख से ज्यादा केस हैं, दिल्ली में पहली बार 2,000 से ज्यादा नए मामले सामने आए हैं।
बिहार में कोरोना मरीजों की संख्या 6 हजार पार कर चुकी है, मगर चिंता इस बात की है, जिस इलाकों में कोरोना बहुत कम फैला था, अब वहां पर विस्फोट जैसी स्थिति बनते दिख रही है।
पहले लद्दाख और सिक्किम, दोनों जगह केस बहुत कम थे, लेकिन शुक्रवार के पहले तक लद्दाख में कुल 135 मामले सामने आए, और कल 104 नए मामलों का पता चला। इसी तरह सिक्किम देश का वो राज्य था, जहां कोरोना वायरस सबसे आखिर में पहुंचा।
लद्दाख में कोरोना का पहला केस 8 मार्च को आया था, कोरोना की पहली वेव से 13 इन्फेक्शन हुए, जो बाद में 18 हो गए, फिर 43, उन 43 के रिकवर होने के बाद लद्दाख कुछ वक्त तक कोरोना मुक्त रहा, पर मई के आखिरी हफ्ते में, कोरोना की सेकेंड वेव आई। मगर शुक्रवार को अचानक 104 मामले सामने आने से हड़कंप मच गया।
वहीं 23 मई तक सिक्किम देश का इकलौता ऐसा राज्य था जहां कोरोना नहीं पहुंचा था, लेकिन उसी दिन पहला केस सामने आया। राज्य में कोरोना का दूसरा मामला 10 दिन बाद पता चला, हालांकि अब जो 50 नए मामले सामने आए हैं, उनमें ऐसे लोग ज्यादा हैं जो उन इलाकों से लौटे हैं जहां कोरोना के केसेज ज्यादा हैं।
नॉर्थईस्ट में दो हफ्ते पहले तक, सिर्फ असम और त्रिपुरा में ही केसेज की संख्या ज्यादा थी। मगर पिछले दो सप्ताह में न सिर्फ इन दो राज्यों में तेजी से कोरोना के मामले बढ़े हैं, बल्कि अन्य राज्यों से भी केसेज सामने आ रहे हैं, मणिपुर में अबतक 385 केस हो चुके हैं, जबकि नागालैंड और मिजोरम में भी 100-100 से ज्यादा केस हैं।
जीवन, क्षिप्रता से भागते हुए, उन क्षणों का समूह है, जो कई अर्थों के साथ, अप्रत्याशित घटनाक्रमों से साक्षात्कार करता हुआ, एक निश्चित अंत की ओर बढ़ता है। इसमें बहुत सी घटनाएं घटती हैं और हमारी स्मृतियों का हिस्सा बन जाती हैं। कुछ घटनाएं और स्मृतियां ऐसी होती हैं, जिनका, हमारे अलावा, दूसरा हिस्सा, बस एक और व्यक्ति होता/होती है, और हम उन स्मृतियों को भुला देना याद रखते हैं, हमेशा।
जब जीवन में संबंध बनते चले जाते हैं, तब उन स्मृतियों को और अधिक छिपा कर रखना, वर्तमान छवि की सुरक्षा के लिए, अनिवार्य हो जाता है, अंतर्मन और बाह्य जगत के बीच विसंगतियां बढ़ जाती हैं और एक निरर्थक चेष्टा के लगातार करते रहने से मन बोझिल सा रहने लगता है। कुछ लोग इस बोझ को तात्कालिक ही सही, समूल भूल कर, नए जीवन में प्रवेश कर जाते हैं, और कुछ, “कमला” की तरह, जीवन का अंत कर लेते हैं, आत्महत्या कर लेते हैं। 1989 में आई फ़िल्म, “कमला की मौत” की पात्र है “कमला”।
बासु चटर्जी (PC-The Indian Express)
कविता ठाकुर (कमला), फ़िल्म के पहले ही कुछ मिनटों में, अपने चॉल की बालकनी से कूद कर आत्महत्या कर लेती है और उसी चॉल में रहने वाले, पंकज कपूर (सुधाकर पटेल) की बेटियाँ रूपा गांगुली (गीता) और मृणाल कुलकर्णी (चारू), भी कविता ठाकुर (कमला) की लाश देखती हैं। दोनों घर जाकर अपने पिता पंकज कपूर (सुधाकर पटेल) और मां आशालता (निर्मला पटेल) से इस आत्महत्या के बारे में बताती हैं। दोनों बताती हैं कि, कविता ठाकुर (कमला), किसी भास्कर नाम के लड़के के साथ संबंधों की वजह से गर्भवती हो गई थी, इसलिए आत्महत्या की। पूरा पटेल परिवार इस घटना से आश्चर्यचकित तो होता है लेकिन संकीर्ण हो चुके मानव समाज के स्वार्थ के फलस्वरूप, स्वयं के साथ ऐसी दुर्घटना न होने की संतुष्टि, उस आश्चर्य को दुख में बदलने से रोक लेती है।
मृणाल कुलकर्णी व रूपा गांगुली
पूरा पटेल परिवार जब रात में सोने जाता है, तो उनका मन, उन स्मृतियों और कृत्यों का अवलोकन और उनपर चिंतन करने लगता है, जिन्हें भूलकर, उन्होंने जीवन को गतिशील रखा है।
रूपा गांगुली (गीता), अपने प्रेमी इरफ़ान ख़ान (अजीत) के साथ अपने संबंधों को लेकर आकलन करती है और उनकी छोटी बहन मृणाल कुलकर्णी (चारू), दीपक (आशुतोष गोवारिकर) के साथ अपने प्रेम प्रसंग पर विचार करती हैं। आशालता भी अपने अतीत में जाती हैं और उन्हें अपने शिक्षक (देवेन्द्र खंडेलवाल) के प्रति अपना एकतरफ़ा और ज़िद भरा प्रेम याद आता है, जिसके लिए, वे लज्जा की रेखा के बाहर चली गई थीं और जिसे सबसे छिपाकर, पंकज कपूर (सुधाकर पटेल) से विवाह कर, एक अच्छी गृहिणी बन कर जी रही थीं।
एक दृश्य में इरफ़ान खान और रूपा गांगुली
पंकज कपूर (सुधाकर पटेल) भी अपने पुराने प्रेम प्रसंगों के बारे में सोचते हैं। सुप्रिया पाठक (अंजू), जया माथुर (चमेली) और डिम्पल अरोड़ा (रश्मि) के साथ उन्हें अपने अंतरंग संबंध याद आते हैं और एक आश्वासन भी मिलता है कि उनकी पत्नी और बेटियाँ, उनका ये रूप नहीं जानतीं। यही आश्वासन, पटेल परिवार का प्रत्येक सदस्य, एक दूसरे से पाता है और एक-दूसरे पर विश्वास के लिए, मौन स्वीकृति देकर सब सो जाते हैं।
“यह फ़िल्म, स्वराज बंधोपाध्याय की कहानी पर आधारित है और इसका निर्माण, NFDC ने किया। निर्देशन और पटकथा का काम, महान बासु चटर्जी ने किया। सिनेमैटोग्राफ़ी अजय प्रभाकर और संगीत सलिल चौधरी का था। संपादन का काम, कमल सहगल का था।”
फ़िल्म के अंतिम दृश्य में सब को शांति से सोते हुए दिखाया गया है। चॉल को भी शांत दिखाया गया है, जो रेखांकित करता है इस तथ्य को, कि कोलाहल को दबाकर या छिपाकर ही संयमहीन जीवन में शांति बनी रह सकती है। यह भी प्रमाणित करती है यह फ़िल्म कि, “सौन्दर्य” की वास्तविक परिभाषा, “विसंगतियों को छिपाकर, स्वीकृति के अनुरूप प्रस्तुति ही है।”
(लेखक जाने-माने साहित्यकार, फ़िल्म समालोचक, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)