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“मैसी साहिब (1985)” -शासित और शोषित का मनोवैज्ञानिक चित्रण
डॉ० कुमार विमलेन्दु सिंह | Cinema Desk
1973 में, स्वीडेन की मीडिया ने, एक बैंक डकैती के बारे में लिखते हुए, “स्टॉकहोल्म सिन्ड्रोम”,इस संज्ञा का प्रयोग, एक मानसिक स्थिति को दर्शाने के लिए किया। घटना ये थी, कि बैंक में डकैती के दौरान अपराधियों ने, चार लोगों को बंधक बना लिया था और जब छूटने के बाद बंधकों से अपराधियों को दंड दिलवाने की बात की गई, तो एक आश्चर्यजनक बात हुई। बंधकों ने न केवल अपराधियों को पहचानने से मना कर दिया, सहानुभूति भी जताई उनके लिए। ये मानसिक स्थिति जहाँ प्रताड़ित, प्रताड़ना देने वाले का समर्थन करने लगे, बहुत भयावह है और पूर्ण आत्मसमर्पण है शोषित या प्रताड़ित का।
ठीक ऐसी ही मानसिक स्थिति के फलस्वरूप, उपनिवेशवाद का शिकार हुए देश और वहां की शासित जनता, शासकों के प्रत्ययों को, जैसे कि वीरता, सौन्दर्य आदि को ही प्रशंसनीय मानने लगती है। शासित, शासक जैसा बनना चाहता है और उसका अनुकरण करने लगता है। ऐसा ही मनोवैज्ञानिक चित्रण, शासितों का, 1985 में आई फ़िल्म, “मैस्सी साहिब” में किया गया।

फ़िल्म के मुख्य कलाकार, रघुबीर यादव (मैस्सी साहिब) होते हैं, जो धर्म परिवर्तन कर के इसाई बन गए होते हैं। स्वतंत्रता के पहले और बाद, जितने धर्मांतरण हुए, सब के पीछे, जो मुख्य मनोवैज्ञानिक तथ्य था, वो था, शासकों के बीच गिने जा सकने की लालसा, अतः जो वर्ग जितना अधिक दमन झेल चुका था और जितना दूर था अपने सांस्कृतिक परिचय से, वो उतना ही जल्दी परिवर्तित हुआ।

रघुबीर यादव (मैस्सी साहिब) के साथ भी ऐसा ही हुआ, वे स्वयं को शासकों का प्रतिनिधि समझने लगे और सैला (अरूंधति रॉय) से चर्च में शादी भी की, सैला का भाई वीरेन्द्र सक्सेना (पासा), इस शादी का गवाह भी बना। रघुबीर यादव (मैस्सी साहिब), चार्ल्स ऐडम्स (बैरी जॉन) के कार्यालय में क्लर्क होते हैं और चार्ल्स डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर। चार्ल्स ऐडम्स (बैरी जॉन), सड़क बनाना चाहते हैं लेकिन पैसों की कमी होती है, इस स्थिति में रघुबीर यादव (मैस्सी साहिब) युक्ति लगाते हैं और ग्रामीणों को कभी डरा कर, कभी किसी अलग तरीके से, ये काम करवा लेते हैं। बाद में जब इसकी जांच होती है, तो रघुबीर यादव (मैस्सी साहिब) फंस जाते हैं और चार्ल्स ऐडम्स (बैरी जॉन), जिनके लिए उन्होंने, सारा श्रम किया होता है, पल्ला झाड़ लेते हैं। रघुबीर यादव (मैस्सी साहिब), विषम परिस्थितियों का सामना करते हुए, हत्या के आरोप में फंस जाते हैं और कुछ समय बाद, दुखद अंत के भागी बनते हैं।

फ़िल्म का निर्देशन, प्रदीप कृशन ने किया और NFDC ने इसका निर्माण किया। यह फ़िल्म, जोइस कैरी के उपन्यास, “मिस्टर जॉनसन” पर आधारित थी। सिनेमैटोग्राफ़ी, आर०के०बोस का था और संगीत वनराज भाटिया ने दिया था।
“इस फ़िल्म को कई पुरस्कार मिले और रघुबीर यादव को भी। इनकी खूब प्रशंसा हुई। इनके पहले, सिद्धार्थ बसु को इस रोल के लिए चुना गया था, लेकिन नियति ने यह रघुबीर यादव के लिए ही रखा था।”
किन परिस्थितियों में एक व्यक्ति, जो शासित है, अपना सब छोड़ एक नए परिवेश से तुरंत जुड़ जाता है, किस मानसिकता के प्रभाव में, वह अपने शासक का ही अनुकरण करने लगता है, ऐसे प्रश्नों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करती है ये फ़िल्म और बताती है कि अपना सब छोड़ कर, सब नया ले लेने से भी कोई दूसरे वांछित वर्ग में, पूर्णतया स्वीकार्य नहीं हो सकता। ये विश्लेषण, बहुत सारे धर्मों के प्रसार युग का इतिहास भी समझाता है। अरूंधति रॉय के अलावा सभी का अभिनय अद्भुत है। अरूंधति रॉय ने इस फ़िल्म के बाद मैन बूकर प्राईज़ जीत कर, अलग विधा में अपना सामर्थ्य दिखाया। ये फ़िल्म हमेशा याद रखी जाएगी।
(लेखक जाने-माने साहित्यकार, फ़िल्म समालोचक, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)
देखें फ़िल्म का प्रोमो-
राहुल गाँधी के सवाल पर भड़की सेना और सरकार, कहीं ये बातें
न्यूज़ डेस्क | navpravah.com
आज केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस की ओर से भारत-चीन सीमा विवाद पर पूछे जा रहे सवालों का जवाब देते हुए कहा है कि, राहुल गांधी अर्थ नीति और सामरिक नीति को कितना समझते हैं, इसपर बहस होनी चाहिए। उन्हें पता होना चाहिए कि चीन जैसे अतंरराष्ट्रीय मुद्दे पर ट्विटर पर सवाल नहीं पूछे जाते हैं।
रविशंकर ने कहा कि, राहुल गांधी में इतनी समझदारी तो होनी चाहिए कि चीन जैसे अतंरराष्ट्रीय मुद्दे को लेकर ट्विटर पर सवाल नहीं पूछे जाते हैं। ये वही व्यक्ति हैं जिन्होंने उरी हमले पर सवाल उठाया था, अब चीन पर सवाल कर रहे हैं।
भाजपा सांसद ने ट्वीट में दावा किया है कि, चीन ने कांग्रेस कार्यकाल में भारतीय जमीन पर कब्जा किया था। बता दें कि राहुल गांधी ने ट्वीट कर पूछा था कि क्या चीन ने लद्दाख में भारतीय जमीन पर कब्जा किया है।
वहीं सेनानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल आरएन सिंह ने राहुल गांधी के सवालों को लेकर कहा, ‘उन्हें ऐसे सवाल नहीं करने चाहिए कि सरकार क्या कर रही है क्योंकि ये चीजें गुप्त हैं और इन्हें उजागर नहीं किया जा सकता है। एक समझदार व्यक्ति इस तरह का बयान कभी नहीं दे सकता है।’
कोरोना वाइरस प्रकोप के बीच आई अच्छी ख़बर
आम आदमी पार्टी ने बढ़ाई आम आदमी की टेन्शन
कम्युनिटी ट्रांस्मिशन: केंद्र और दिल्ली में मतभेद, किस की मानें बात !
सौम्या केसरवानी | navpravah.com
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने दिल्ली सरकार की कम्युनिटी ट्रांस्मिशन की बात को खारिज किया। एक वक्तव्य जारी करते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि कोरोना का सामुदायिक प्रसार अभी नहीं हो रहा है, साथ ही उन्होंने दिल्ली सरकार की कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग पर भी सवाल खड़ा कर दिया।
दिल्ली सरकार की ओर से कल कहा गया था कि राज्य में कोरोनवायरस का कम्युनिटी स्प्रेड शुरू हो गया है और जितने भी मामले आ रहे हैं, उनमें से 50 फीसदी मामलों में संक्रमण के स्रोत का पता नहीं चल रहा है। जिसके बाद केंद्र ने दिल्ली की राज्य सरकार के संक्रमण खोजने के ज़रिए पर भी सवाल खड़ा कर दिया। उन्होंने कहा कि दिल्ली सरकार को वाइरस के स्रोत को खोजने को लेकर उसके तौर-तरीकों में बदलाव की अवाश्यकता है।
स्वास्थ्य मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि कंटेनमेंट स्ट्रेटेजी के तहत वायरस के मामलों को ढूंढ निकालने के लिए डोर टू डोर अभियान को और दुरुस्त करने की जरूरत है। सरकार का कहना है कि 11 जिलों में से कुछ बेहतर हालत में भी हैं, लेकिन कई जिलों में ये समस्या जस की तस बनी हुई है।
बता दें कि मंगलवार को दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने कहा था कि, दिल्ली में कोरोनावायरस का कम्युनिटी स्प्रेड हो रहा है और संक्रमण के जितने भी मामले आ रहे हैं, उनमें से 50 फीसदी मामलों में नहीं पता चल रहा कि मरीज को संक्रमण कहां से हुआ है। जिसका जवाब देते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने उनके इस दावे का खंडन करते हुए उनके ही तौर-तरीकों पर सवाल खड़ा कर दिया।
“रुई का बोझ (1997)” -मोह, अपेक्षा और जीवन का त्रिकोण
डॉ० कुमार विमलेन्दु सिंह | Cinema Desk
जिजीविषा मनुष्य की सबसे प्रबल भावना है और बाकी सारी भावनाएं, इसी को और प्रबल या क्षीण बनाती हैं। सारे संबंधों के बनने के पहले, निभाए जाने के दौरान और टूटने या समाप्त होने तक , बस यही जिजीविषा बची रहती है। अगर ध्यानपूर्वक अवलोकन किया जाए तो हम पाते हैं कि अब तक जितनी भी कथाएं मानव सभ्यता ने अपने सचेत होने के बाद बनायी या बतायी हैं, उन सब में जीते रहने की भावना, न जीने की भावना और अच्छे से जीने की भावना, बस इन्ही को प्रदर्शित किया गया है।
महान ऑस्ट्रियन मनोवैज्ञानिक सिग्मंड फ्रायड ने अपनी व्याख्याओं में मनुष्य के मस्तिष्क में “इरोस” और “थानाटोस” का कई बार ज़िक्र किया है। “इरोस” (सुखपूर्वक जीते रहने की भावना), “थानाटोस” (मर जाने की इच्छा) भी इसी जी सकने या न जी सकने से ही सम्बंधित है। सम्मान और अपमान के परे भी जीजिविषा बनी रहती है और ये होना ही मनुष्य होने का प्रतीक भी है। एक कहानी के माध्यम से यही दिखाने का प्रयास किया गया 1997 में आयी फिल्म, “रुई का बोझ ” में।

ये फिल्म NFDC ने प्रोड्यूस की थी और इसमें पंकज कपूर (किसुन साह ) अपने बुढ़ापे में अपना सारा धन अपने परिवार के सदस्यों में बाँट कर अपने सबसे छोटे बेटे रघुबीर यादव (राम शरण ) और बहु (रीमा लागू) के साथ रहने का फैसला करते हैं।

इनके घर में सब कुछ सामान्य नहीं रहता है और जिस सम्मान की अपेक्षा पंकज कपूर (किसुन साह ) अपने बच्चों से रखते हैं, वो उन्हें नहीं मिलता, या ये भी कहा जा सकता है कि वे मिल रहे सम्मान को समझ नहीं पाते, क्योंकि उसका स्वरुप उनके प्रत्याशा के अनुरूप नहीं होता। वे मुखर हो कर अपनी अपेक्षाएं बताते है अपने बेटे और बहु से लेकिन उनके सामर्थ्य के परे होती हैं ये अपेक्षाएं , अतः संबंधों में घर्षण शुरू होता है।
“कुछ संवाद बहुत ही सामयिक और सच हैं वर्तमान परिप्रेक्ष्य में। एक संवाद में पंकज कपूर (किसुन साह ) कहते हैं , “बाप वो संपत्ति होता है जिसे बेटा अपने भाइयों को देने के लिए हमेशा तैयार रहता है।”
एक और संवाद में पंकज कपूर (किसुन साह ) का पोता उनसे कहता है कि “आप 10 -15 पैसे नहीं दे सकते तो आप दादा कैसे हुए”। एक अवसर पर बात इतनी बढ़ जाती है कि पंकज कपूर (किसुन साह ) और बेटे रघुबीर यादव (राम शरण ) में हाथा पाई तक हो जाती है और पंकज कपूर (किसुन साह ) , कभी न लौटने के लिए घर छोड़ कर निकल जाते हैं, लेकिन यात्रा के दौरान उन्हें आभास होता है की उनके बच्चों ने उनका अपमान तो किया है पर बहुत से अवसरों पर उनका ध्यान भी रखा है और उनके प्रति मोह उमड़ पड़ता है । जिजीविषा को बस एक तृण , एक बूँद की आवश्यकता होती है जीवन का वन या महासागर बनाने के लिए, वापस मुड़ जाने के लिए जीवन की तरफ़।

ये फ़िल्म, चन्द्रकिशोर जायसवाल के उपन्यास, “गवाह गैरहाज़िर”, पर आधारित है और इसका निर्देशन, सुभाष अग्रवाल ने किया। सिनेमैटोग्राफ़ी महेश चंद्रा की थी और संगीत के० नारायण का था।
फ़िल्म के लगभग अंतिम भाग में पंकज कपूर का मोनोलॉग, “मेरा मोहभंग हो गया है”, मानव जीवन की सबसे भ्रामक उक्तियों में से एक है, क्योंकि मोहभंग की अवस्था प्राप्त करना, मानवीय संबंधों से भी, एक मोह ही है। भारतीय सिनेमा के अभूतपूर्व फ़िल्मों में से एक है, “रूई का बोझ”, जिसमें मोह, अपेक्षा और जीवन का त्रिकोण है।
(लेखक जाने-माने साहित्यकार, फ़िल्म समालोचक, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)
देखें फ़िल्म-
गम्भीर लक्षण वाले मरीजों को ही किया जाएगा अस्पताल में भर्ती -महाराष्ट्र सरकार
TOI की खबर के मुताबिक, उद्धव सरकार का कहना है कि जिन कोरोना मरीज़ों में कोई लक्षण नहीं है या मामूली लक्षण हैं, वो अपने-अपने घर पर ही ठीक हो सकते हैं और उन्हें अस्पताल में भर्ती होने की ज़रूरत नहीं है। सिर्फ गंभीर लक्षण वाले मरीजों को ही अस्पताल में भर्ती किया जाएगा।
बीएमसी ने निर्णय लिया है कि अब मरीजों को स्वाब टेस्ट देने के लिए अस्पताल में नहीं जाना पड़ेगा। मरीज को घर में ही क्वारंटाइन किया जाएगा। सिम्टम्स के आधार पर उनका स्वाब टेस्ट घर से लिया जाएगा। बीएमसी अधिकारी और डॉक्टर स्वाब टेस्ट जमा कर जांच के लिए लैब में भेजेंगे। पहला टेस्ट 5 दिन में और दूसरा टेस्ट 10 दिन में लिया जाएगा। डॉक्टर मरीज को जो दवा लेने की सलाह देंगे मरीज को घर पर लेते रहना होगा। मरीज की स्थिति के आंकलन के आधार पर अस्पताल में भर्ती किया जाएगा।
बीएमसी कमिश्नर इकबाल सिंह चहल ने मुंबई के सभी 24 वार्डों के लिए अलग से वार्ड वॉर रूम बनाने का निर्णय लिया है। हर वार्ड के लिए 30 फोन लाइन होगी, जो 1916 पर फोन करने के बाद संबंधित वार्ड ऑपरेटर के पास ट्रांसफर हो जाएंगी।
महिला ने गर्भवती सौतन को गोली से उड़ाया, लहराती रही पिस्तौल
न्यूज़ डेस्क | navpravah.com
मुरादाबाद में कल शाम एक महिला ने अपनी गर्भवती सौतन को गोली मार दी। मौके पर ही उसके सौतन की मौत हो गयी। इस वारदात को अंजाम देने के बाद आरोपी महिला पिस्टल लेकर शव के चारों तरफ घूमती रही और आस-पास के लोग ये तमाशा देखते रहे।
आस-पास जमा भीड़ में से किसी ने इस घटना का वीडियो भी बना लिया, मौके पर पहुंची पुलिस ने आरोपी महिला को गिरफ्तार कर लिया और महिला से पूछताछ करने में जुट गयी।
ट्रांसपोर्ट कारोबारी जफर की पहली पत्नी शबाना पति के साथ ही रहती है, जबकि उसकी सौतन आलिया पड़ोस में किराए के मकान में रहती थी, वह सात महीने की गर्भवती थी, डेढ़ साल पहले जफर ने उससे शादी कर ली थी, वह पहले हिंदू थी और शादी के बाद उसने अपना धर्म बदल लिया था, वे मानसी से आलिया बन गयी थी।
जफर ने जबसे दूसरी शादी की तब से शबाना अपनी सौतन से बदला लेने का मौका देख रही थी, जब कल सोमवार की शाम उसकी सौतन बाहर कहीं अपनी भतीजी मुस्कान के साथ आ रही थी, तभी शबाना ने उसका रास्ता रोक लिया था।
शबाना ने पहला फायर मुस्कान पर किया, लेकिन वह चूक गयी, आलिया मुस्कान को बचाने के लिए सामने आई तो शबाना ने उस पर 4 गोलियां चला दी, इसके बाद शबाना पिस्टल लहराते हुए उससे बात करती रही। कुछ देर बाद आलिया ने दम तोड़ दिया। बता दें कि उसका पति जफर फरार है।
















