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व्यापम घोटाला: सीबीआई ने पेश की चार्जशीट, 4 पूर्व अधिकारियों समेत 592 आरोपियों के नाम
एनपी न्यूज़ डेस्क | Navpravah.com
मध्य प्रदेश के बहुचर्चित व्यापम घोटाले में एक बड़ी खबर सामने आ रही है। पीएमटी-2012 मामले में सीबीआई ने गुरुवार को चार्जशीट पेश कर दी। 28 महीने चली लंबी पड़ताल में जांच एजेंसी ने 592 लोगों को आरोपी ठहराया है। इस लिस्ट में व्यापम के चार पूर्व अधिकारियों के नाम भी शामिल हैं, जिसके तहत पंकज त्रिवेदी, नितिन मोहिंद्र, अजय कुमार सेन और सीके मिश्रा जैसे बड़े नाम सामने आए हैं।
सीबीआई द्वारा बनी आरोपियों की इस लंबी सूची में व्यवसाइयों के नाम भी शामिल हैं, जिसमें पीपुल्स ग्रुप के चेयरमैन सुरेश एन. विजयवर्गीय, उनके दामाद और डायरेक्टर एडमिनिस्ट्रेशन अंबरीश शर्मा, पीपुल्स के मेडिकल डायरेक्टर अशोक नागनाथ, पीपुल्स यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर विजय कुमार पांडे और चिरायु मेडिकल कॉलेज के डायरेक्टर डॉ. अजय गोयनका समेत दो अन्य मेडिकल कॉलेज के कर्ता-धर्ता भी शामिल हैं।
विदित हो कि पीएमटी-2012 मामले में 2000 करोड़ से ज्यादा का लेन-देन हुआ था। इतना ही नहीं, इस घोटाले के चलते तक़रीबन 5000 स्टूडेंट्स का करियर दांव पर लग गया था। इस मामले में 500 अभिभावकों सहित करीब 2000 आरोपी हैं। इस दाखिले में एमबीबीएस दाखिले का रेट 80 लाख था। इतना ही नहीं 1.5 करोड़ रुपए तक प्री-पीजी दाखिले के लिए वसूले गए।
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शिक्षा से उखड़ रहे हैं हिंदी के पाँव
डॉ. जितेन्द्र पाण्डेय | Navpravah.com
भूमण्डलीकरण के दौर में हिंदी की दिन दूनी रात चौगुनी प्रगति देखकर हर हिंदुस्तानी का सीना गर्व से चौड़ा हो रहा है। विश्व की अट्ठारह प्रतिशत जनता हिंदी बोलती है और समझती है। दुनिया की बारह भारोपीय भाषाओं में से चार भारोपीय भाषाएं तो हमारे देश में अपनी खुशबू लुटा रही हैं। भाषाओं की इस विविधता पर कोई भी राष्ट्र इतरा सकता है। ये खुशनुमा यथार्थ हमें विश्वगुरु का एहसास दिलाता है। इन सबके अलावा मेरा सरोकार यथार्थ के कुछ अन्य चट्टानों से टकराना है।
तकरीबन डेढ़ दसक के अंदर-अंदर देश में अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों की बाढ़-सी आ गई है। अंग्रेजी भाषा के नाम पर अप्रशिक्षित छोकरे (अध्यापक) राष्ट्र के भविष्य से खिलवाड़ कर रहे हैं। स्कूल प्रबंधन को भी कम दाम में चोखा काम (आर्थिक लाभ) मिल रहा है। कुकुरमुत्ते की तरह पनपे इन स्कूलों का हमला सर्वप्रथम भारतीय भाषाओं पर होता है। ऐसा प्रतीत होता है ‘वर्नाकुलर’ शब्द भारतीय भाषाओं की गरिमा पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रहा हो। हिंदी भाषा को हेय दृष्टि से देखते ये शैक्षणिक संस्थान “कैम्पस फ्री हिंदी” की बात करते हैं। उन छात्रों पर फाइन लगाते हैं, जो हिंदी बोलने की ज़ुर्रत करते हैं। यह है हिंदुस्तान की ज़मीनी हक़ीकत। विद्या के इन मंदिरों को तो यह एहसास होना चाहिए कि कोई भी व्यक्ति मात्र अंग्रेजी बोलकर विवेकशील, ज्ञानी और बुद्धिमान नहीं बनता। यदि ऐसा होता तो बंग्ला में लिखी ‘गीतांजली’ को नोबेल पुरस्कार नहीं मिलता। हर साल अंग्रेजी भाषा के ही साहित्य को यह प्रतिष्ठित अवार्ड दिया जाता।
पिछले दिनों जब मैं हिंदी के एक समारोह में शामिल होने मुंबई गया था,तो एक अज़ीब वाकया सामने आया। एक सम्मानित विद्यालय के प्राचार्य ने बताया कि वे अपने संस्थान में हिंदी बोलने की इजाज़त नहीं देते। सिर्फ ब्रेक में। अपनी बात आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा, “यदि कोई ब्रेक में हिंदी बोलता है तो मैं कहता हूँ, बच्चों ने हिंदी बोला नहीं, मैंने सुना नहीं।” शैक्षणिक संस्थानों में हिंदी की यही असलियत है। ज़ुर्माना, दंड, घृणा आदि। यदि इसे मनोवैज्ञानिक ढंग से विश्लेषण किया जाय, तो पाएंगे कि हमें जिस साँचे में ढालने की कोशिश हो रही है, हम ढल रहे हैं। अंग्रेजियत हिंदी को दब्बू और हतवीर्य बनाने पर आमादा है। आधुनिकता के नाम पर भारतीय शिक्षा में हिंदी माध्यम को पिछड़ा मानना और मनवाना गहरे षड्यंत्र का उदाहरण है। आखिर इस विचार को क्या कहेंगे ?
“We must do our best to form a class who may be interpreters between us and the millions whom we govern;a class of persons Indian in blood and colour, but English in taste, in opinions, words, and intellect. ” (हमारे तथा जिन पर हमारा शासन है, ऐसे करोड़ों जनों के बीच दुभाषिए का कार्य करने में समर्थ एक वर्ग तैयार करने के लिए हमें भरपूर कोशिश करनी है; उन लोगों का वर्ग जो खून एवं रंग में भारतीय हों, लेकिन रुचियों, धारणाओं, शब्दों एवं बुद्धि से अंग्रेज हों।)
– T.B. Macaulay
हम सभी जानते हैं कि भाषा और संस्कृति अभिन्न हैं। जब कोई हमारी भाषा छीनता है, तो वह परोक्ष रूप से हमारे ऊपर सांस्कृतिक हमला करता है। हमारी नई पीढ़ी अपनी संस्कृति से कितनी दूर जा चुकी है! इसके लिए शिक्षा जगत में प्रचलित कुछ उदाहरण ज़रूर देखें- भारतीय परिधान धारण करने में हीन भावना, हिंदी बोलने में शर्मिंदगी महसूस करना, किसी के द्वारा पैर छूता देख हँसी के फव्वारे छूटना, आदरसूचक शब्दों के प्रयोगकर्ता को मूर्ख समझना इत्यादि। नई पीढ़ी की यही सोच जब व्यापक और व्यवहारिक स्तर पर उतरती है, तो वृद्धाश्रमों में बेतहाशा बढ़ोत्तरी होती है। आत्महत्याओं का ग्राफ बढ़ने लगता है और अपराध निरंकुश हो उठता है। संवेदनाएं सूखती हैं और मानवता मरने लगती है।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारी सरकारें और ब्यूरोक्रेसी आए दिन अंग्रेजी को बढ़ावा दे रही हैं। इनका यही मानना है कि कोई भी व्यक्ति अथवा राष्ट्र अंग्रेजी पढ़कर ही विकास कर सकता है। संभवतः इसी कारण दिल्ली नगर निगम की सभी पाठशालाओं को अंग्रेजी माध्यम में बदलने की योजना बनाई गई होगी। बाल-मन पर भाषा का गहरा असर पड़ता है। यह वही समय होता है, जब स्वभाषा के प्रति बालक के मन में अनुरक्ति और आदर जगाया जा सकता है, अन्यथा सरकारी तंत्र है। उनका राजभाषा विभाग है। हिंदी दिवस पर छलछलाता भाषाई प्रेम है। हिंदी सेवी संस्थाओं के मान-सम्मान, पुरस्कार हैं। उनके प्राप्तकर्ताओं तथा दाताओं की अपनी दुनिया और अपना पैतरा है।
मुझे लगता है कि हिंदी की सच्ची सेवा तो तब होगी, जब शिक्षा जगत में उसे उचित स्थान मिले। बच्चा-बच्चा हिंदी बोले और हिंदी जिए। आज सवा सौ करोड़ भारतवासियों की भावनाओं पर अंग्रेजियत राज कर रही है। अभी हम भाषाई गुलाम हैं। प्रतिभाएं दम तोड़ रही हैं। यह गुलामी ही कही जा सकती है, जिसके कारण विश्व के शीर्ष 200 विश्वविद्यालयों की सूची में भारत का नाम तक नहीं है। उधार पैसा हो, मकान हो, कपड़ा हो या भाषा, कभी भी गौरव का कारण नहीं बन सकती। हिंदी के सभी आंदोलन यदि शिक्षा पर फोकस करें, तो बात बनें अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब किसान का बेटा, मजदूर का बेटा, सब्जी विक्रेता का बेटा, ऑटो चालक का बेटा हिंदी बोलने से कतराएगा। बोलेगा अंग्रेजी ही, भले टूटी-फूटी हो। गली-मोहल्ले में अंग्रेजी माध्यम के स्कूल जो खुल रहे हैं।
हतभाग्य हमारा कि हिंदी जैसी समृद्ध भाषा को छोड़ हम ‘पर भाषा’ के पीछे दौड़ लगा रहे हैं। कितना खो रहे हैं! इसका अनुमान भी हम नहीं लगा सकते। पिछले दिनों भारत के उपराष्ट्रपति माननीय वेंकैया नायडू ने इसी तरह की पीड़ा को एक समारोह में शब्द दिया था, “उस समय दक्षिण में हिंदी का विरोध जोरों पर था। रेलवे स्टेशन, पोस्ट ऑफिस पर लगे हिंदी के बोर्ड्स उखाड़े जा रहे थे, उन पर कालिख पोती जा रही थी। उन आंदोलनकारियों में मैं भी था। मुझे नहीं मालुम था कि यह कालिख हिंदी पर नहीं बल्कि हमारे भाग्य पर पोती जा रही थी।” कमोबेश यही स्थिति पूरे देश की है। दुनिया के साथ कदमताल करने और करवाने की ललक में हम सभी जिम्मेदार हैं।
मानसिक गुलामी की इस अमावस का सवेरा होना हमारे अस्तित्त्व के लिए ज़रूरी है। उम्मीद की किरण कहीं-न-कहीं अवश्य है। आइए, पहचानें और अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाएं।
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और नवप्रवाह.कॉम के साहित्य सम्पादक हैं।)
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पिंजड़े से निकला हाफ़िज़ और बोला, “कश्मीर लेकर रहेंगे”
एनपी न्यूज़ डेस्क | Navpravah.com
आतंकवाद के मुद्दे पर एक बार फिर से पकिस्तान की सच्चाई वैश्विक मंच पर सबके सामने आ ही गई। जिस आतंकी ने भारत में आतंकी हमला करवाया, उसे पाकिस्तानी हुकूमत ने खुले आम आतंक फैलाने के लिए आज़ाद कर दिया। और आज़ाद होते ही हाफ़िज़ सईद कश्मीर का राग भी अलापने लगा।
जिस आतंकी को यूनाइटेड नेशंस और अमेरिका ने भी आतंकवादी नेता घोषित कर दिया है, उसे पाकिस्तान ने मुक्त कर दिया। प्राप्त जानकारी के मुताबिक़, इस आतंकी को जेल से बाहर निकालने में मात्र पाकिस्तान सरकार का हाथ नहीं है, बल्कि पाकिस्तानी आर्मी और उसकी खुफिया एजेंसी ISI ने भी भरपूर सहयोग दिया है।
जिस आतंकी को छुड़वाने में पाकिस्तान ने पूरा बल लगा दिया, उसने बाहर निकलते ही भारत के खिलाफ ज़हर उगलना शुरू कर दिया। जेल से आज़ाद होते ही हाफ़िज़ सईद ने कहा कि कश्मीर हम लेकर ही छोड़ेंगे। हाफ़िज़ सईद जैसे कुख्यात आतंकी को जेल से बाहर करने वाला देश पाकिस्तान यूनाइटेड नेशंस में आतंकवाद का रोना रोता है। यूएन में पाकिस्तान कहता है वो आतंकवाद से पीड़ित है।
नज़रबंदी पर कोर्ट में बहस हो रही थी, लेकिन पाकिस्तान की सरकार ने न्यायालय को उसे आतंकी सिद्ध करने के लिए एक भी सबूत पेश नहीं किया। यहाँ तक कि जो भारत ने पाकिस्तान को सबूत सौंपा था, वह भी कोर्ट को नहीं दिया गया, जिसकी वजह से कोर्ट को उसे बरी करने का आदेश देना पड़ा।
वरुण धवन सड़क पर लेने लगे सेल्फी, मुंबई पुलिस ने सरेआम की बेईज्ज़ती, भेजा ई-चालान
अमित द्विवेदी | Navpravah.com
अक्सर अपनी सक्रियता की वजह से मुंबई पुलिस चर्चा में रहती है। मुंबई पुलिस कितनी सक्रिय रहती है, इसका एक ताज़ा उदाहरण देखने को मिला है। अपने ट्विटर हैंडल के ज़रिए मुंबई पुलिस ने अभिनेता वरुण धवन को टैग करते हुए एक ट्वीट किया। इस ट्वीट में मुंबई पुलिस ने वरुण धवन को एक सजग और ज़िम्मेदार मुंबईकर बनने की नसीहत भी दी, साथ ही उनके घर ई-चालान भी भेज दिया। इस ट्वीट के जवाब में वरुण ने एक ट्वीट किया, जिसमें उन्होंने अपनी गलती के लिए माफी मांगी।
दरअसल अभिनेता वरुण धवन ट्रैफिक के बीचो-बीच अपनी गाड़ी का शीशा नीचे करके एक लड़की के साथ सेल्फी लेते हुए नज़र आए, जिसके बाद मुंबई पुलिस ने उन्हें ट्वीट करके ऐसा न करने की नसीहत दी। मुंबई पुलिस ने अपनी ट्वीट में लिखा, “वरुण इस तरह का एडवेंचर निश्चित ही सिल्वर स्क्रीन पर अच्छा लगता होगा, लेकिन मुंबई की सड़कों पर नहीं। आपका यह कृत्य आपकी जान को तो जोखिम में डालेगा ही, साथ ही जो आपके प्रशंसक हैं, उन्हें भी गलत सन्देश मिलेगा। हम आप जैसे एक बेहद ज़िम्मेदार मुंबईकर से इस तरह के कृत्य की आशा नहीं करते। हालाँकि इस गलती के लिए हमने आपको ई-चालान भेज दिया है।”
.@Varun_dvn These adventures surely work on D silver screen but certainly not on the roads of Mumbai! U have risked ur life,ur admirer’s & few others. V expect better from a responsible Mumbaikar & youth icon like U! An E-Challan is on d way 2 ur home. Next time, V will B harsher pic.twitter.com/YmdytxspGY
— Mumbai Police (@MumbaiPolice) November 23, 2017
मुंबई पुलिस के इस ट्वीट के बाद देखते देखते सैकड़ों लोगों ने पुलिस की सक्रिय सेवा की तारीफ़ की। लोगों ने अपने ट्वीट के ज़रिए मुंबई पुलिस का हौसला बढाते हुए लिखा कि “हमें इस बात की ख़ुशी और फ़क्र है कि हम एक ऐसे शहर में रहते हैं, जहां की पुलिस भेदभाव नहीं करती।
My apologies 🙏 Our cars weren’t moving since we were at a traffic signal and I didn’t want to hurt the sentiment of a fan but next time I’ll keep safety in mind and won’t encourage this. https://t.co/MEJk56EksG
— Varun Dhawan (@Varun_dvn) November 23, 2017
हालाँकि मुंबई पुलिस के ट्वीट के बाद वरुण धवन ने भी माफी भरा एक सन्देश ट्वीट किया। वरुण ने लिखा कि उस समय ट्रैफिक रुका हुआ था और मैं अपने फैन का दिल दुखाना नहीं चाहता था, इस वजह से मैंने सेल्फी ले ली, लेकिन मैं इस हरकत से शर्मिंदा हूँ, और माफी मांगता हूँ। मैं विश्वास दिलाता हूँ कि भविष्य में मुझसे ऐसी भूल नहीं होगी।”















