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Wednesday, September 2, 2026
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लखनऊ: कॉन्स्टेबल की गोली से ऐप्पल के मैनेजर की हुई मौत

कॉन्स्टेबल की गोली से ऐप्पल के मैनेजर की हुई मौत

सौम्या केसरवानी | navpravah.com

उत्तर प्रदेश की पुलिस पर एक बार फिर सवालिया निशान खड़े हो गए हैं, क्योंकि कल रात लखनऊ के पॉश इलाके गोमती नगर विस्तार में यूपी पुलिस के एक सिपाही प्रशांत चौधरी ने मल्टीनेशनल कंपनी के मैनेजर को गोली मारकर उनकी हत्या कर दी है।

मृतक विवेक तिवारी ऐपल कंपनी में सेल्स मैनेजर थे, विवेक को उस वक्त गोली मारी गई, जब वे अपनी सहकर्मी को ड्रॉप करने जा रहे थे। विवेक रात को अपनी सहकर्मी के साथ लौट रहे थे, उसी समय गोमतीनगर विस्तार के पास दो पुलिसवालों ने उन्हें गाड़ी रोकने का इशारा किया, लेकिन विवेक ने गाड़ी नहीं रोकी। जिसके बाद विवेक की गाड़ी पर फायरिंग की गई, जिससे उनकी मौत हो गई।

घटना के वक्त विवेक के साथ गाड़ी में मौजूद सहकर्मी सना खान ने कहा, मैं अपने सहयोगी के साथ घर जा रही थी, गोमती नगर विस्तार के पास हमारी गाड़ी खड़ी थी, तब तक दो पुलिस वाले सामने से आए, हमने उनसे बचकर निकलने की कोशिश की, इसके बाद अचानक गोली चली और विवेक को गोली लग गयी।

विवेक की पत्नी कल्पना तिवारी का कहना है कि उनके पति का अंतिम संस्कार तब तक नहीं किया जाएगा जब तक मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ यहां नहीं आते हैं, विवेक की पत्नी कल्पना ने यूपी सरकार पर सवाल उठाए हैं।

उन्होंने कहा है कि अगर उनके पति किसी संदिग्ध हालत में थे और उन्होंने गाड़ी नहीं रोकी तो आरटीओ दफ्तर जाकर उनकी गाड़ी का नंबर नोट करके उनके खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए थी, न कि उन्हें गोली मारनी चाहिए।

कल्पना के मुताबिक, मैं उस महिला को जानती हूं जो उस समय मेरे पति के साथ मौजूद थी, विवेक की पत्नी ने बताया कि अस्पताल के एक कर्मचारी ने फोन पर मुझे जानकारी दी कि आपके पति और उनके साथ मौजूद महिला को चोट लगी है, आखिर पुलिस ने मुझे इस बात की जानकारी क्यों नहीं दी?’ वहीं, विवेक के रिश्तेदार विष्णु शुक्ला ने पूछा कि क्या वे आतंकवादी थे जो पुलिस ने उन पर फायरिंग की।

ज्ञान और शिक्षा सिर्फ किताबी नहीं हो सकते -पीएम मोदी

PM मोदी

एनपी न्यूज़ डेस्क | navpravah.com

पीएम मोदी आज दिल्‍ली में शिक्षा पर आयोजित एक सम्‍मेलन में शामिल हुए। उन्‍होंने वहां कहा कि, शिक्षा वही है, जिससे जीवन बेहतर हो, उन्‍होंने कहा कि स्‍वामी विवेकानंद की शिक्षा को भुला दिया गया है।

पीएम मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि ज्ञान और शिक्षा सिर्फ किताबी नहीं हो सकते हैं। शिक्षा का मकसद व्यक्ति के हर आयाम का संतुलित विकास करना है और संतुलित विकास नवोन्मेष के बिना संभव नहीं है। पीएम मोदी ने कहा कि, हमें एक और वास्तविकता को स्वीकार करना होगा कि, आज दुनिया में कोई भी देश, समाज या व्यक्ति एकाकी होकर नहीं रह सकता है, हमें ‘ग्लोबल सिटीजन और ग्लोबल विलेज’ के दर्शन पर सोचना ही होगा।

उन्‍होंने कहा कि उच्च शिक्षा हमें उच्च विचार, उच्च आचार, उच्च संस्कार और उच्च व्यवहार के साथ ही समाज की समस्याओं का उच्च समाधान भी उपलब्ध कराती है, मेरा आग्रह है कि विद्यार्थियों को कालेज, यूनिवर्सिटी के क्लास रूम में तो ज्ञान दें ही, लेकिन उन्हें देश की आकांक्षाओं से भी जोड़ा जाए।

उन्‍होंने आगे कहा कि इसी मार्ग पर चलते हुए केंद्र सरकार की भी यही कोशिश है कि हम हर स्तर पर देश की आवश्यकताओं में शिक्षण संस्थानों को भागीदार बनाएं। इसी विजन के साथ हमने अटल टिंकरिंग लैब की शुरुआत की है।

बता दें कि दिल्‍ली के विज्ञान भवन में आयोजित इस सम्‍मेलन में देश के चुनिंदा 350 से ज्यादा विश्वविद्यालयों के कुलपति और निदेशक भी मौजूद हैं। कार्यक्रम का आयोजन यूजीसी, एआईसीटीई, आईसीएसएसआर सहित उच्च शिक्षा से जुड़े संगठनों ने किया है।

भोगी हुई ज़िन्दगी का जीवंत दस्तावेज़ है ‘बंजारे’

भोगी हुई जिंदगी का जीवंत दस्तावेज़ है 'बंजारे'
भोगी हुई जिंदगी का जीवंत दस्तावेज़ है 'बंजारे'

Navpravah.com

‘बंजारे’ डॉ. उमेशचन्द्र शुक्ल का सद्यः प्रकाशित गीत संग्रह है। आर. के. पब्लिकेशन, मुंबई द्वारा प्रकाशित इस कृति में कुल 73 गीत हैं। ये गीत डॉ. शुक्ल के नितांत निजी स्वर हैं। ‘स्व की खोज’ में उपजे शब्द गीत के रूप में ढलते चले गए। लालित्यपूर्ण प्रवाह इस गीत संग्रह की विशेषता है। 124 पृष्ठों में सिमटी यह पुस्तक मौन को शब्द देती-सी व्यापक बन पड़ी है।

पीड़ा जब असह्य होती है, तो कविता में उतर आती है, किंतु जब कविता असमर्थ होती है, तो वह गीत में ढल जाती है। इसीलिए नरेंद्र शर्मा जी ने लिखा होगा, “गद्य जब असमर्थ होता है, तो कविता जन्म लेती है। कविता जब असमर्थ हो जाती है, तो गीत जन्म लेता है।” सम्भवतः ‘बंजारे’ भी इसी तरह की सुपरिणति है।

पुस्तक के प्रारंभिक दो गीत ‘सरस्वती-वंदना’ और ‘कुल-गीत’ पारम्परिक होते हुए भी समसामयिक हैं। इसके उपरांत पृष्ठ क्रमांक 40 तक प्रेम और सौंदर्य के गीत अविरल प्रवाहित हो रहे हैं। वास्तव में उड़ना, एक तरह से चलना है। रुक जाना, हार मान लेना है। इसलिए जो कुछ भी जीवन में मिलता है, उसे स्वीकार कर आगे बढ़ते रहना चाहिए। थोड़ी समय के लिए रुकना ‘विश्राम’ है, किंतु पुनः उत्साह से चल पड़ना ‘बंजारों की रीति’ है। प्रस्तुत पुस्तक के अधिकांश गीत मानस-मंथन से निकले टटके नवनीत हैं। इनमें काल के साथ लंबी यात्रा करने का माद्दा है। संग्रह से गुजरते हुए शब्दों का जादू सिर चढ़कर बोलता है। गीतों की इस अनोखी यात्रा में कई पड़ाव हैं। कहीं रास्ते पर बिछा लाल-मखमली कालीन है, तो कहीं मह-मह करती वीथिकाएँ देवकानन का एहसास कराती हैं। कहीं सच्चाई की खुरदुरी जमीन है तो कहीं आक्रोश। अवधी एवं भोजपुरी के शब्द गीत को मतवाली-मदमाती गति देते हैं। एक बानगी देखें –
“मृग-तृष्णा का खेल छोड़ दो,
दौड़-दौड़ चकराया हिरना।
अब, पिंजरे का द्वार खोल दो,
बोल-बोल पथराया सुगना।।”

चीजों को देखकर गीतकार का अंतर्मन बेचैन है। वह प्रश्नों की झड़ी लगा देता है। ऐसी झड़ी जिसमें शाश्वत सत्य करवट लेता है। अपार सौंदर्य बिखरा पड़ा है। ‘कब छूटा संसार मिलेगा’ शीर्षक गीत में निसर्ग के निर्दोष विस्तार पर उत्पन्न कौतूहल को देखें , “कब नदिया के चंचल मन को / सागर का श्रृंगार मिलेगा/कब तक पंथ निहारे हंसा / कब मोती का प्यार मिलेगा।” डॉ. शुक्ल के गीत इनके जीवन के सच्चे दर्पण हैं। सुख-दुःख, उतार-चढ़ाव और मिलन-विछोह के जीवंत दस्तावेज़। हृदय की पीर गीतों में बह चली है। वे स्वयं ‘अपनी बात’ में स्वीकार करते हैं, “बंजारे मेरे बनने-बिगड़ने का साक्षी रहा है। मनुष्य का मन अनेकानेक रूप, कार्य व्यापारों में विचरण करता है। जब मनुष्य इदम, अहं की भावना का परित्याग करके विशुद्ध अनुभूतियों को ग्रहण करने लगता है, तब उसका हृदय बन्धनों से परे सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम् की ओर उन्मुख होता है।”

भारत एक उत्सवधर्मी देश है, यहाँ ऋतुओं के आधार पर त्योहार मनाए जाते हैं। गीतकार के जीवन पर उनके परिवेश का गहरा प्रभाव है। डॉ. शुक्ल का परिवेश मंदिर, घंट-घड़ियाल, शंख, शिवालय, नदी आदि से बनता है। इनके अलावा यहाँ फाग का चटक रंग, गोरी का धानी चूनर, अधखिली कलियाँ एवं महकता विश्वास है। सावन की कजली और कोयल की कूक का जादुई असर गीतों में आद्यंत मिलेगा। इनको पढ़ते समय मन तृप्त होता है, किंतु आत्मा की प्यास बढ़ती जाती है। इस संदर्भ में निम्नलिखित पंक्तियाँ ध्यातव्य हैं –
“झरनों ने जितने गीत लिखे,
सब तेरी ही अंगड़ाई है।
फूलों में जितने गंध बहे,
तेरी गलियों से आयी है।”

फागुन में एक नशा होता है। प्रकृति की ख़ुमारी से सभी मदमत्त हो उठते हैं। रंगों के अलमस्त मछेरे आँगन-आँगन घूमने लगते हैं। ऐसे में गीतकार ने एक खूबसूरत बिंब इस प्रकार प्रस्तुत किया है –
“महुआ की मादकता से, पागल हो जाती बस्ती है।
फागुन की फगुआई गोरी जब खिल-खिल कर हँसती है।”
इसी प्रकार ‘फागुन की गली’ शीर्षक में भी पूरा परिवेश जीवंत हो गया है। दूसरी ओर सावन के मौसम में टूटते नदियों के तटबंध और आवारा बादल की मनमानी बिना रोक-टोके चलती है। कोयल, पपीहा, जुगनू, मेंढक, कजरी, हरियाली आदि का समवेत चित्रण एक मांगलिक परिदृश्य प्रस्तुत करता है। ‘सावन’ शीर्षक की इन पंक्तियों की प्रभावोत्पादकता देखें –
“है टँगी चाँदनी बादल की,
हरियाली की कालीन बिछी ।
फसलें सज बनी बराती हैं,
हर तरफ खुशी की धूम मची ।
अमरायी में कोयल कूक रही,
जैसे बजती शहनाई है ।
मेंढक पण्डित बन जाता है,
मंत्रों से प्रकृति नहायी है ।”

डॉ. उमेश की पीड़ा मात्र अपनी मिट्टी से दूर होने की कसक को लेकर ही नहीं है, बल्कि इनके बहुतेरे गीत व्यक्ति और समाज के नैतिक पतन को भी रेखांकित करते हैं। राजनीति की बाजीगरी से कवि का मन चिंतित है। यथार्थ को बड़ी ईमानदारी के साथ बयां किया गया है। आज भी ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ वाला सामाजिक सिद्धांत हमारे देश में कायम है। समाज का एक कटु सत्य ‘चमचा महात्म्य’ शीर्षक गीत में इस प्रकार चित्रित है –
“जो कल का बज्र लोफर था,
बना वो टाप का वक्ता।
जो सचमुच देश प्रेमी था,
बना है मौन वो श्रोता।।”
पुस्तक में ‘आतंक क्यों’, ‘सुलग रही चिंगारी’, ‘भइया मैं तो किसान हूँ’, ‘हमें फिर जागना होगा’, ‘गंगो-जमन बेच देंगे’, ‘कहाँ पर द्वार है’, ‘सौदा न करो’, ‘सागर पार बसेरा है’, ‘सपनों का व्यापारी’, नेता’, ‘जीवन’, ‘कविता की पीड़ा’, ‘आरती गीत’, ‘धर्म की ध्वज’, ‘जागरण’, ‘ढूँढ़ रहा बंजारा’ और ‘कवि की चिंता’ जैसे गीतों में सामाजिक विद्रूपताओं को बड़ी गहराई से निरूपित किया गया है। यहाँ शुक्ल जी के कई मनोभाव जैसे चिंता, दुख, निराशा, क्षोभ, आक्रोश, करुणा, सहानुभूति, प्रेम, उम्मीद आदि गीतों में घुल-मिल गए हैं। तमाम विषमताओं के बावजूद ‘बंजारे’ का गीतकार युवाओं का आह्वान करते हुए लिखता है –
“क्यों हो पीछे खड़े, आओ आगे बढ़ो,
सामने है प्रगति, सीढ़ियां तुम चढ़ो।
देश की मूर्ति सुंदर बनानी है तो,
मूर्ति को खूब मन से लगाकर गढ़ो।।”
देश की बदहाली से क्षुब्ध रचनाकार की दृष्टि सीमित नहीं है। वह राष्ट्रवाद से ऊपर उठकर ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ के साथ खड़ा होता है। गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर के ‘यत्र विश्वैक नीडम्’ की कल्पना का अक्षरांकन करता है। रुडयार्ड किपलिंग के उस दुनिया में प्रवेश कर जाता है, जहाँ लोग निर्भय होकर सिर ऊंचा किए चलते हैं। ‘सागर पार बसेरा है’ शीर्षक गीत की इन पंक्तियों पर गौर फरमाएं –
“चल-चल उस गाँव जहाँ की गंगा पावन,
प्रतिपल-प्रतिक्षण झूल रहा इठलाता सावन,
युग-युग से मंगल ध्वनि की बजती शहनाई,
एकोहम का स्वर गूँजे मनभावन पावन।
नहीं दिशा के बंटवारे का भ्रष्ट ढिढोरा है,
गजलों जैसी रात वहाँ, गीतों सा सबेरा है।।”
‘अन्वेषण-अनुसंधान’ और ‘सृजन-आविष्कार’ के लिए गतिशीलता आवश्यक है। यही गतिशीलता जब किसी सर्जक में उतरती है तो ‘बंजारे’ जैसी कृति का निर्माण होता है। रचनाधर्मिता के लिए यह आवश्यक शर्त भी है। डॉ. उमेश ने बड़ी गहराई से बंजारा-प्रवृत्ति को व्यापकता प्रदान की है। यहाँ इनकी दार्शनिक दृष्टि ‘सहस्रार’ तक पहुंचती है। संपूर्ण सृष्टि के उत्स की ओर इशारा करते हुए ‘ढूँढ़ रहा बंजारा’ शीर्षक गीत में लिखते हैं –
“बरगद के पत्ते पर लेटा
बाल रूप मुस्काए,
सब बचपन का खेल महल था
हँसता हुआ बताए।
ब्रह्म हँसे ध्वनियों में निश्छल
ध्वनि हँसती शब्दों में,
शब्दों का भंडार यहाँ है
नाच उठा बंजारा।”
संग्रह में कहीं-कहीं टंकण संबंधी असावधानी के कारण शब्द-विपर्यय हुआ है जिसके कारण अर्थ-परिवर्तन एवं गीतों का प्रवाह बाधित है। प्रतीकों का अभिनव प्रयोग गीतों में चमत्कार पैदा करता है। श्रृंखलाबद्ध बिंब अपनी खूबसूरती में बेजोड़ हैं। शिल्प संबंधी भाषिक संरचना सफल एवं बेशकीमती हैं। आंचलिक शब्दों का प्रयोग सटीक और सार्थक बन पड़ा है। लीक से हटकर लोकभाषा में लिखे दो गीत अत्यंत मर्मस्पर्शी बन पड़े हैं – ‘नेता’ और ‘शहीद’। शहीद की माँ, बहन और पत्नी की गर्वोक्ति कथ्य को गहराई एवं घनत्व प्रदान करती है – “घनि-घनि अँचरा हमार की अँचरा फहरि गइलैं हो बहिनी / घनि मोरे दुधवा क धार की पुतवाँ अमर भइलै हो / तेल अपटनवां क मोल, जतनियाँ क मोल चुकउलैं / जाइके सिमवा प ललना चुकउलैं की बैरी हहरि गइलैं हो।”
गीत संग्रह में सौंदर्य ने कहीं भी अपनी मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया है। सादगी का ओज ‘बंजारे’ में सर्वत्र महसूस होता है।
निष्कर्षतः समकालीन गीत लेखन में ‘बंजारे’ अपना विशिष्ट स्थान रखती है। यह अपनी वैविध्यता में अनमोल है। भोगी हुई जिंदगी का जीवंत दस्तावेज़। इसे पढ़कर एक बहुरंगी किंतु यथार्थ की दुनिया आंखों में तैरने लगती है। सूखती संवेदनाओं के दौर में प्रस्तुत गीत संग्रह अपने पाठकों के अन्तःमन को भिगोने में पूर्णतया सक्षम है। मुझे यकीन है कि डॉ. उमेशचंद्र शुक्ल की यह पुस्तक हिंदी जगत को अपनी दमदार उपस्थिति से समृद्ध करेगी। अस्तु।

समीक्षक : डॉ. जीतेन्द्र पाण्डेय
पुस्तक – बंजारे (गीत संग्रह)
गीतकार – डॉ. उमेशचंद्र शुक्ल
प्रकाशक – आर. के. पब्लिकेशन, मुंबई
मूल्य – ₹ 175

URI का पोस्टर रिलीज़, सर्जिकल स्ट्राइक पर बेस्ड है फिल्म की कहानी

URI का पोस्टर रिलीज़, सर्जिकल स्ट्राइक पर बेस्ड है फिल्म की कहानी
URI का पोस्टर रिलीज़, सर्जिकल स्ट्राइक पर बेस्ड है फिल्म की कहानी

ज्योति विश्वकर्मा | Navpravah.Com  

एक्टर विक्की कौशल ने अपने दमदार एक्टिंग से बॉलीवुड में अपना सिक्का जमा। जिन भी फिल्मों में उन्होंने काम किया है उसमे उनकी जमकर तारीफ की गई है। कश्मीर के उरी बेस कैम्प पर हुए आतंकी हमले में भारतीय सेना के 19 जवान शहीद हो गए थे। इसी हमले के बदला लेते हुए आर्मी ने पीओके में सर्जिकल स्ट्राइक के जरिए आतंकी कैम्प खत्म कर दिए थे। उरी हमले के दो साल पूरे हो चुके हैं।
 
आज यानी 28 सिंतबर को देशभर में सर्जिकल स्‍ट्राइक की इस वर्षगांठ को पराक्रम दिवस के रूप में मनाया जा रहा है और इसी दिन इस हमले और सर्जिकल स्‍ट्राइक पर बनी फिल्‍म ‘उरी’ का टीजर रिलीज कर दिया गया है।
 
टीजर 1 मिनट 17 सेकंड का है। इसकी शुरूआत आर्मी के काफिले पर एक अटैक से होती है। टीजर देशभक्ति पूर्ण और भावुक कर देने वाला है। हाथों में बंदूक लिए विक्की कौशल भारतीय सेना के सशक्त ऑफिसर के रुप में नजर आ रहे हैं, जो पाकिस्तानी आतंकवादियों से अपने जवान शहीदों का बदला लेते नजर आ रहे है। टीजर रिलीज से पहले ही मेकर्स ने इसका दमदार पोस्टर भी रिलीज किया जिसमें विक्की बंदूक थामे अपने सैनिकों के साथ नजर आ रहे है।
 
‘उरी’ में विक्‍की कौशल और यामी गौतम की जोड़ी नजर आ रही है। साथ ही एक्‍टर परेश रावल भी इस फिल्‍म में अहम किरदार में नजर आएंगे। टीजर में कई बेहद दमदार डायलॉग सुनाई दे रहे हैं। ‘.. लेकिन अब हिंदुस्‍तान चुप नहीं बैठेगा। ये नया हिंदुस्‍तान है, ये हिंदुस्‍तान घर में घुसेगा भी और मारेगा भी…’

नाना पाटेकर और तनुश्री के झगड़े के बीच में आई एक कथित चश्‍मदीद

नाना पाटेकर और तनुश्री के झगड़े के बीच में आई एक कथित चश्‍मदीद
नाना पाटेकर और तनुश्री के झगड़े के बीच में आई एक कथित चश्‍मदीद

सौम्या केसरवानी | Navpravah.Com

बॉलीवुड एक्‍ट्रेस तनुश्री दत्ता इस समय सुर्खियों में हैं, उन्होंने 10 साल पहले अपनी फिल्‍म ‘हॉर्न ओके प्‍लीज’ के एक गाने के दौरान दिग्‍गज अभिनेता नाना पाटेकर पर उन्‍हें प्रताड़ित करने का आरोप लगाया था।
एक मामले की वजह से वे बालीवुड से दूर हो ग्रीन थी, लेकिन अब अपने एक ताजा इंटरव्‍यू में तनुश्री ने इस किस्‍से का फिर से जिक्र करते हुए इंडस्‍ट्री की तरफ से कोई मदद न मिलने की बात कही है।
तनुश्री ने इस इंटरव्‍यू में खुलासा किया है कि कैसे इंडस्‍ट्री के सब लोग सारी बात जानते हुए भी चुप्‍पी साधे थे, वहीं, नाना पाटेकर ने तनुश्री के इस आरोप को खारिज करते हुए कहा है कि वह कानूनी कारवाई कर सकते हैं।
अब इस मामले में एक नया मोड़ सामने आया है, तनुश्री और नाना पाटेकर के इस झगड़े के बीच एक कथित चश्मदीद सामने आई है, जिनका नाम जैनिस स्कवीरिया है और पेशे से वह एक पत्रकार हैं।
जैनिस ने इस मामले में सिलसिलेवार तरीके से कई ट्वीट्स कर इस पूरी घटना की जानकारी दी है, उन्होंने अपने ट्वीट्स के माध्यम से यह दावा किया है जब यह घटना घटी थी, तो वह उस वक्त मौके पर ही थीं।
जैनिस स्कवीरिया नाम की इस पत्रकार ने ट्वीट करते हुए बताया कि जिंदगी की कुछ कहानियां ऐसी भी होती हैं, जो हमेशा आपके अंदर ताजा रहती है, एक्ट्रेस तनुश्री दत्ता के साथ फिल्म ‘हॉर्न ओके प्‍लीज’ सेट पर जो हुआ, वो किस्सा भी इन्हीं में से एक है।
उन्होंने इस पूरी घटना पर अपना पहला ट्वीट करते हुए बताया कि 2008 में उन्हें आजतक और हेडलाइंस टुडे की ओर से फिल्म के गाने की शूट को कवर करने के लिए भेजा गया था, जब वह सेट पर पहुंची तो मुझे बताया गया कि शूटिंग रुक गई है, क्योंकि फिल्म की एक्ट्रेस तनुश्री दत्ता बहुत परेशानियां पैदा कर रही हैं।
जैनिस ने बताया कि उन्‍होंने सेट पर तनुश्री को देखा, जो कुछ हद तक परेशान थीं, सेट पर नाना पाटेकर, कोरियोग्राफर गणेश आचार्य और एक आदमी आपस में बातचीत कर रहे थे, वहीं बैक डांसर्स बैठे इंतजार कर रहे थे, ऑफिशियली यह कहा जा रहा था कि हीरोइन को-ऑपरेट नहीं कर रही है।
अगले ट्वीट में उन्होंने लिखा कि इसके बाद शूटिंग फिर शुरू हुई. पर कुछ ही देर में तनुश्री सेट छोड़कर चली गईं, इसके बाद उन्होंने अपने आप को वेनिटी वेन में बंद कर लिया और बाहर आने से मना कर दिया, इसके बाद शूटिंग फिर से रुक गई।
आज उन बातों को कई साल हो गए, लेकिन उनकी अभी की सारी बातें उस समय की बातों से हूबहू मिल रही हैं, इससे इतना तो साफ है कि वह उस वक्त भी सच ही बोल रही थीं, (हालांकि तनुश्री और जैनिस की वो सारी बातें ऑफ रिकॅार्ड थी, लेकिन उस दौरान भी तनुश्री ने कई चैनल को अपना इंटरव्यू दिया था)
कई लोगों का कहना है कि, इस बात को अभी उठाना सिर्फ इंडस्ट्री में वापस आने के लिए है तो ये गलत है, क्योंकि उन्होंने ऐसा किया था, तनुश्री ने उस दौरान भी प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस बारे में बात की थी, लेकिन तब उन्हें अनप्रोफेशनल करार कर दिया गया था।

 

 

इविवि चुनाव में पांच प्रत्याशियों ने वापस लिए नाम

इविवि चुनाव में पांच प्रत्याशियों ने वापस लिए नाम
इविवि चुनाव में पांच प्रत्याशियों ने वापस लिए नाम
सौम्या केसरवानी | Navpravah.Com
इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव मैदान में अब 55 प्रत्याशी बाकी रह गए हैं, क्योंकि 5 उम्मीदवारों ने नाम वापस ले लिए हैं, इनमें अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष दो से दो-दो और महामंत्री पद से एक उम्मीदवार ने नाम वापस लिया है।
इस तरह सभी पांचों नाम पांच प्रमुख पदों पर नामांकन कराने वाले प्रत्याशियों के वापस हुए हैं, अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महामंत्री, संयुक्त मंत्री और सांस्कृतिक सचिव के लिए अब 29 प्रत्याशी मैदान में हैं जबकि इन पदों के लिए 34 पर्चे दाखिल किए थे।
अध्यक्ष पद के लिए कुल दस प्रत्याशियों ने नामांकन कराया था, इनमें से दो प्रत्याशियों ने नाम वापस ले लिए हैं, अध्यक्ष पद के लिए मैदान में अब आठ दावेदार रह गए हैं।
इसी तरह उपाध्यक्ष पद से भी दो प्रत्याशियों ने नाम वापस लिए हैं, जिनमें श्रीकांत पांडेय और सौरभ विश्वकर्मा शामिल हैं। इन दो प्रत्याशियों की ओर से नाम वापस लिए जाने के बाद उपाध्यक्ष पद की लड़ाई अब सात प्रत्याशियों के बीच रह गई है।
वहीं, अध्यक्ष पद से नाम वापस लेने वाले अंकित यादव ने भी समाजवादी छात्रसभा के प्रत्याशी उदय प्रकाश यादव को अपना समर्थन दिया है, निर्वाचन अधिकारी प्रो. आरके उपाध्याय ने बताया कि नाम वापसी की प्रक्रिया पूरी होने के बाद प्रत्याशियों की अनंतिम सूची वेबसाइट पर अपलोड कर दी गई है।
नामांकन के बाद दो प्रत्याशियों ने आपत्तियां दर्ज कराईं और इन आपत्तियों के आधार पर इविवि प्रशासन को प्रत्याशियों की सूची में संशोधन करना पड़ा, इस संशोधन के बाद अब किसी भी पद के लिए निर्विरोध निर्वाचन नहीं हुआ है।

 

भीमा कोरेगांव मामला : निर्णय को लेकर सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीशों में मतभेद

भीमा कोरेगांव मामलों में भी जुदा दिखी सुप्रीम कोर्ट के जजों की राय
भीमा कोरेगांव मामलों में भी जुदा दिखी सुप्रीम कोर्ट के जजों की राय
सौम्या केसरवानी | Navpravah.Com
सुप्रीम कोर्ट ने भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में पांच कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के संबंध में हस्तक्षेप करने से आज इंकार कर दिया है, यही नहीं, न्यायालय ने उनकी गिरफ्तारी की जांच के लिए विशेष जांच दल के गठन से भी इंकार कर दिया है।
प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने 2:1 के बहुमत के फैसले में इन कार्यकर्ताओं की तुरंत रिहाई की मांग करने वाली याचिका को ठुकरा दिया गया है, लेकिन न्यायमूर्ति धनंजय वाई चन्द्रचूड़ ने इससे असहमति व्यक्त करते हुए अलग फैसला सुनाया है।
इस केस में न्यायमूर्ति ए. एम खानविलकर ने प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा और अपनी ओर से बहुमत का निर्णय सुनाया, लेकिन ने इससे असहमति व्यक्त करते हुए अपने निर्णय में अलग राय दी है।
उल्‍लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने भीमा कोरेगांव केस में सुनवाई करते हुए मामले में गिरफ्तार किए गए पांचों सामाजिक कार्यकर्ताओं की नजरबंदी को 4 सप्‍ताह के लिए बढ़ा दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए मामले की जांच विशेष जांच दल (एसआईटी) से कराने से इनकार कर दिया है, सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कहा कि आरोपी खुद जांच एजेंसी नहीं चुन सकते हैं।
मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि, अगर आरोपियों को राहत चाहिए तो उन्‍हें ट्रायल कोर्ट जाना होगा, न्‍यायालय ने मामले की एफआईआर रद्द करने से भी मना कर दिया, साथ ही पुणे पुलिस को मामले की जांच आगे बढ़ाने को कहा है।

Movie Review : कच्चे धागे में बंधी अनुष्का और वरुण की पक्की प्रेम कहानी है सुई धागा 

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ज्योति विश्वकर्मा | Navpravah.Com 

स्टारकास्ट : अनुष्का शर्मा, वरुण धवन, रघुवीर यादव 
डायरेक्टर : शरत कटारिया

जॉनर : कॉमेडी, ड्रामा 
रेटिंग : 2*
 
अनुष्का शर्मा और वरुण धवन की फिल्म सुई धागा फाइनली आज सिनेमाघरों में दस्तक दे चुकी है। डायरेक्टर शरत कटारिया ‘दम लगाके हईशा’ के बाद फिर से देसी कहानी लेकर लौटे. ‘दम लगाके हईशा’ में एक अलग ही दुनिया रचने वाले शरत कटारिया ‘सुई धागा ‘ में वो पैनापन नहीं ला सके, जिसकी उम्मीद उनसे की जा रही थी। ‘सुई धागा’ साल 2014 में सरकार द्वारा शुरू किए गए ‘मेक इन इंडिया’ अभियान पर आधारित है, जिसका उद्देश्य देश के स्वदेशी कपड़ा उद्योगों को बढ़ावा देना है। 
 
स्टोरी : 
 
‘सुई धागा’ की कहानी दरजी मौजी (वरुण धवन) और उसकी कढ़ाई में माहिर पत्नी ममता (अनुष्का शर्मा) की है। मौजी किसी दूसरे के यहां काम करता है, जहां हर बात पर उसका मजाक बनाया जाता है, और एक दिन मौजी कि ऐसी दुर्गति होती है कि ममता को गुस्सा आ जाता है। ममता मौजी से अपने पांव पर खड़े होने के लिए कहती है, और फिर मौजी-ममता का संघर्ष शुरू हो जाता है। लेकिन मौजी की जिंदगी में कुछ भी ठीक होना नहीं लिखा है, कोई न कोई पंगा होता रहता है। फिर हमेशा कोसने वाला पिता है और बीमार रहने वाली मां भी है। फिल्म में इन दोनों के किरदारों के बीच बिना रोमांस के भी प्यार दिखाई देता है। इस दौरान उनकी जिंदगी में कई उतार चढ़ाव आते हैं लेकिन निम्नमध्यवर्गीय परिवार के जोड़े अंत: अपनी मंजिल पाने में कामयाब हो जाता हैं।
 
एक्टिंग :
 
एक्टिंग की बात करे तो वरुण धवन की एक्टिंग फिल्म में कबीले-तारीफ है।  वरुण धवन ने पूरी ईमानदारी के साथ अपना किरदार निभाया है लेकिन कमजोर कहानी उन्हें कैरेक्टर के साथ इंसाफ नहीं करने देती है। हालांकि कई सीन्स में उनके पंच मजेदार हैं। जबकि अनुष्का ने भी आसानी से अपने कैरक्टर को जी लिया है। साधारण साड़ी और कम मेकअप में अनुष्का हमेशा अपना किरदार जी जाती हैं।  सपॉर्टिंग किरदारों में रघुवीर यादव आपको मौजी के पिता के रूप में जरूर इम्प्रेस करेंगे। मौजी की मां के रूप में आभा परमार को देखना भी सुखद है क्योंकि वह स्क्रीन पर हर समय अपने किरदार के साथ न्याय करती हैं। 
 
सॉन्ग्स : 
 
फिल्म का गाना पहले से लोगों की जुबान पर चढ़ा हुआ है। फिल्म में निम्नमध्यवर्गीय परिवार के बीच रोज होने वाली झिझक और रोमांस आपको बीच बीच में हंसने के लिए विवश कर देंगे।  फिल्म का संगीत और गाने कहानी से जुड़ते दिखाई देते हैं। हालांकि फिल्म कभी-कभी इतनी सीरियस तो कभी काफी बोर कर सकती है।
 
डायरेक्शन : 
 
डायरेक्टर शरद कटारिया ने फिल्म को काफी रियल रखा है। फिल्म के फर्स्ट हाफ में सारे किरदार अपनी समस्याओं के साथ स्थापित हो जाते हैं। डायलॉग्स को ऐसे अंदाज में लिखा गया है जो रोजाना कि समस्या के बीच भी आपको गुदगुदाते हैं। फिल्म उपदेश देती हुई नहीं दिखती है और आपको अंत का अंदाजा भी नहीं लगता है। हालांकि फिल्म कभी-कभी इतनी सीरियस हो जाती है कि बोर करने लगती है। फिर भी अच्छी कहानी और अनुष्का-वरुण की बेहतरीन ऐक्टिंग के लिए आप इस फिल्म को देख सकते हैं।  
 
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जल्द आएगी नई शिक्षा नीति, कोर्स होगा आधा

नई शिक्षा नीति
नई शिक्षा नीति

एनपी न्यूज़ डेस्क |navpravah.com 

केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने मेल टुडे एजुकेशन समिट में कहा कि देश की नई शिक्षा नीति का जीरो ड्राफ्ट तैयार कर लिया गया है। यह ड्राफ्ट अक्टूबर के अंत तक सरकार के पास पहुंच जाएगा।

जावड़ेकर ने कहा कि नई शिक्षा नीति अगले 2020 से 2040 तक देश में शिक्षा के क्षेत्र का दिशा निर्देशन करेगी, इस नीति के जरिए जिला से लेकर गांव तक देश में क्वालिटी एजुकेशन को सुनिश्चित किया जाएगा। हालांकि, जावड़ेकर ने कहा कि केन्द्र सरकार की नई शिक्षा नीति का फोकस देश के लिए देश के लिए अच्छा नागरिक और प्रत्येक नागरिक को एक अच्छा इंसान बनाने पर रहेगा, इस नीति का जोर लोगों को स्किल देने पर होगा।

जावड़ेकर ने ये भी कहा कि रोजगार जरूरी है, लेकिन शिक्षा का मकसद सिर्फ रोजगार नहीं हो सकता है। शिक्षा के जरिए अच्छा नागरिक तैयार करना प्राथमिकता होनी चाहिए, बच्चों में वैल्यू एजुकेशन को महत्व देना चाहिए।

वहीं, उच्च शिक्षा पर जावड़ेकर ने कहा कि रोजगार यहां एक बड़ा मुद्दा है। जावड़ेकर ने दावा किया कि देश में ज्यादातर विश्वविद्यालयों में बीते कई दशकों से कोई सुधार नहीं किया गया है। अब केन्द्र सरकार विश्वविद्यालयों के लिए नया कैरिकुलम तैयार कर रही है। जावड़ेकर ने बताया कि पुराने सामान्य डिग्रियों में सबसे ज्यादा लोग बेरोजगार रहे हैं। लिहाजा, अब प्रोफेशनल कोर्स के जरिए छात्रों को रोजगार पाने के लिए ज्यादा सक्षम बनाने की तैयारी है।

केरल: SC का बड़ा फैसला, सबरीमला मंदिर में महिलाओं को जाने की मिली इजाजत

सबरीमला मंदिर
सबरीमला मंदिर

सौम्या केसरवानी | navpravah.com

केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश वर्जित मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने आज ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि, मंदिर में भगवान अय्यप्पा की पूजा होती थी और वह हिंदू थे, इसलिए मंदिर में किसी भी महिला के प्रवेश पर रोक नहीं लगाया जा सकता है।

देश के प्रमुख न्यायाधीश दीपक मिश्रा समेत 5 जजों की संवैधानिक पीठ ने कहा, महिलाएं पुरुषों से किसी भी मामले में कम नहीं हैं, तो उनके मंदिर में प्रवेश पर रोक लगाना सही नहीं है। कोर्ट ने कहा, एक तरफ हम औरतों की पूजा करते हैं, लेकिन दूसरी तरफ उन्हीं के मंदिर में प्रवेश पर रोक कैसे लगा सकते हैं। इसलिए सबरीमाला मंदिर में महिलाओं को प्रवेश से रोकना असंवैधानिक है।

कोर्ट ने कहा, सबरीमाला मंदिर में जिन भगवान अय्यप्पा की पूजा होती है, वह हिंदू थे, ऐसे में उनके भक्तों का अलग धर्म ना बनाया जाए, महिलाओं को मंदिर में पूजा करने से रोकना उनकी गरिमा का अपमान है, सबरीमाला के रिवाज हिंदू महिलाओं के हक के खिलाफ हैं।

जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने कहा, धार्मिक परंपराओं में कोर्ट को दखल नहीं देना चाहिए, किसी को धार्मिक प्रथा पर भरोसा है, तो उसे उसका सम्मान करना चाहिए, संवैधानिक पीठ के फैसले से अगल बोलते हुए इंदु मल्होत्रा ने कहा कि कोर्ट का काम धार्मिक मान्यताओं में न तो दखल देना है और न ही उन्हें रद्द करना है।

बता दें कि, 15 साल से ऊपर की लड़कियां और महिलाएं इस मंदिर में नहीं जा सकतीं हैं, यहां सिर्फ छोटी बच्चियां और बूढ़ी महिलाएं ही प्रवेश कर सकती हैं, इसके पीछे मान्यता है कि भगवान अयप्पा ब्रह्मचारी थे।