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Friday, July 31, 2026
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Gendalal Dixit : एक ऐसा क्रांतिवीर जिसे इतिहासकारों ने किताबों में जगह ही नहीं दी

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Gendalal Dixit : एक बार क्रांतिकारी रास बिहारी बोस ने किसी संगठन की तारीफ करते हुए कहा था कि “संयुक्त प्रांत का संगठन भारत के सब प्रांतों से उत्तम, सुसंगठित तथा सुव्यवस्थित था

क्रांति के लिए जितने अच्छे रुप में इस प्रांत ने तैयारी कर ली थी उतनी किसी अन्य प्रांत ने नहीं की थी” यहां रास बिहारी जी जिस संगठन का जिक्र कर रहे हैं उस क्रांतिकारी दल का नाम था “मातृवेदी” जिसके संस्थापक थे रामप्रसाद बिस्मिल जी लेकिन आज हम जिनकी गाथा आपको सुनाने जा रहें वह रामप्रसाद बिस्मिल जी नहीं हैं यह गाथा है “मातृवेदी” दल के कमांडर-इन-चीफ एवं उत्तर भारतीय क्रांतिकारियों के द्रोणाचार्य मानें जाने वाले “पंडित गेंदालाल दीक्षित जी” की एक ऐसा क्रांतिवीर जिसने शिक्षण क्षेत्र की कुशल जिंदगी छोङ क्रांति कें शोर को सुना और अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध स्वतंत्रता संघर्ष में कूद पड़े.. अपने साहसिक कारनामों से इस युवा क्रांतिकारी ने तत्कालीन अंग्रेजी हुकूमत को हिलाकर रख दिया था मगर अफसोस की जिस युगांतर ने इस देश के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया उसके अपने ही उसकी स्मृति नहीं सहेज सकें..चूक तंत्र की हों या फिर तंत्रीय भावनाओं से लबरेज इतिहासकारों की मगर एक जाबांज योद्धा का बलिदान इतिहास के पन्नों में सही स्थान नहीं प्राप्त कर पाया..

पंडित गेंदालाल दीक्षित जी का जन्म चंबल घाटी के भदावर राज्य आगरा अंतर्गत बटेश्वर के पास एक छोटे से गाँव मई में 30 नवम्बर,1890 को हुआ था

अल्पायु में मातृत्व वात्सल्य से मरहूम होने वाले इस योद्धा की जिंदगी कष्टकारी जरुर बनी पर इस मरहूमयत को उन्होंने अपनी कमज़ोरी नहीं बल्कि ताकत बनाया वो मानसिक एवं शारीरिक दोनों स्वरूपों में मजबूत बन कर उभरे..

घर की आर्थिक स्थिति ठीक ना हों पाने के कारण इन्होंने अपनी हाईस्कूल तक की शिक्षा पूरी कर औरैया के डीएवी स्कूल में शिक्षक की नौकरी कर ली।1905 में हुए बंग-भंग के बाद चले स्वदेशी आन्दोलन का उन पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा था। अंग्रेजी सेना का अत्याचार देख वे नौकरी छोड़ क्रांतिकारी बन गए। उस वक्त डकैतों का मजबूत प्रभाव था लोग उनसे खौफ खाते थे अपनी निजी स्वार्थ के लिए वों लोगों को लुटने का काम करते थे हालांकि वे लोग बहादुर तो थें ही..यह सब देख पंडित जी को एक उपाय सूझा उन्होंने सोचा कि क्यों का इनके नकारात्मक कार्य को सकारात्मक रुप से स्वतंत्रता आंदोलन के लिए उपयोग किया जाए उन्होंने गुप्त रूप से डकैतों को एकत्रित कर एक संगठन बनाया जिसका नाम था “शिवाजी समिति”  शिवाजी की तरह ही छिप कर यह उत्तर प्रदेश में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अपने अभियान को सक्रिय रूप से करने लगे धीरे धीरे यह बात बाकी क्रांति दलों तक पहुंची एवं पंडित जी की शौर्य गाथा मशहूर होने लगी.

जब इनकी वीरता के किस्से महान क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल जी तक पहुंची तों उन्होंने पंडित जी से अपने अभियान के लिए मदद मांगी पंडित जी ने सहर्ष इस प्रस्ताव को स्वीकार किया एवं जल्द ही बिस्मिल जी ने शिवाजी समिति के संग मिलकर साल 1916 में “मातृवेदी” की स्थापना की इसका मुख्य केन्द्र “मैनपुरी” हीं थी..शायद यह पंडित जी की कल्पनाशील नेतृत्व और अद्भुत सांगठनिक क्षमता का ही परिणाम था कि एक समय “मातृवेदी” दल में दो हज़ार पैदल सैनिक के अलावा पाँच सौ घुड़सवार थे। इसके अलावा संयुक्त प्रांत के 40 ज़िलों में 4 हज़ार से ज़्यादा हथियारबंद नौजवानों की टोली थी। दल के खजाने में आठ लाख रुपए थे। सबसे दिलचस्प बात यह है कि “मातृवेदी” दल की केन्द्रीय समिति में चंबल के 30 बाग़ी सरदारों को भी जगह मिली हुई थी।

देखें वीडियो और जानें शहीद गेंदालाल जी के बारे में वो अनकही बातें जिन्हें इतिहासकारों ने अनदेखा कर दिया:

आख़िरकार क्रांति की एक तारीख़ 21 फ़रवरी, 1915 मुकर्रर हुईं इस दिन बङी संख्या में सैनिक इस दल में शामिल होने वाले थे लेकिन कहते हैं ना कि घर के भेदी लंका डाहे ऐसा ही कुछ इनके साथ भी हुआ इनके संगठन का एक सदस्य दलपत सिंह अंग्रेजों का मुखबिर बन गया और उस विश्वासघाती ने अंग्रेजों को उनके अड्डे का पता बता दिया अंग्रेजी अधिकारी ने वहां छापामारी कर गेंदालाल दीक्षित सहित उनके कई साथियों को गिरफ्तार कर लिया था अंग्रेजी अधिकारियों ने उनसे उनके बाकी साथियों का पता लगाने का हरसंभव प्रयास किया पर उनके इरादों को तोङना अंग्रेजी अधिकारियों के बस में कहा था..

गिरफ्तारी के बाद पंडित जी को बाकी युवा क्रांतिकारियों से अलग बैरक में रखा गया उन सभी से गहन पूछताछ की गई प्रताङित किया गया ताकि बाकी लोगों का पता वो बता सकें जब उन्हें एहसास हुआ कि उनके दोस्त अंग्रेजों की प्रताङना बर्दाश्त नहीं कर पायेंगे और बाकियों का पता बता देंगे इस पर पंडित जी एक कुशल संगठनकर्ता का परिचय देते हुए उस सिपाही को कहा कि ” उन बच्चों से क्या पूछते हों मुझसे पूछों मैं जानता हूं षड्यंत्र के बारे में मैं बताऊंगा पूरी कहानी लेकिन मेरी एक शर्त है मुझे भी उन सबके साथ रहने दों” अंग्रेजी अधिकारी उनके झांसे में आ गये एवं उन्हें भी उनके बाकी साथियों के साथ एक ही बैरक में रख दिया गया अब जेल में पंडित जी का अगला लक्ष्य था सरकारी गवाह को मजिस्ट्रेट के समक्ष गवाही देने से रोकने का उन्होंने ने फिर अपनी बुद्धि लगाईं एवं अधिकारी से कहा कि सरकारी गवाह अभी तुम्हें जों जानकारी दें रहा है वह अधुरी है मगर वो मेरा मित्र हैं अगर मैं बात करूं तो तुम्हें सही जानकारी देगा इसके लिए मुझे उससे बात करनी होगी जेलर ने उन्हें उसकी बैरक में डाल दिया

मुकदमा दर्ज हों चुका था चार्जशीट दाखिल की गई उसमें पंडित जी पर नवयुवकों को अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध भङकाने का आरोपी बनाया था लेकिन

जेल की सलाखें ज्यादा दिनों तक उन्हें कैद नहीं कर सकी अपनी सूझबूझ एवं बौद्धिक कुशलता से वह जेल से सरकारी गवाह सहित फरार हो गए अंग्रेजी हुकूमत ने बहुत कोशिशें की ताकि उन्हें पकङा जायें लेकिन निराशा से ज्यादा उनके हाथ कुछ नहीं आया यह कांड स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास में “मैनपुरी षड्यंत्र” के नाम से जाना गया

इस अभियान में पकड़े गए कयी क्रांतिवीरों को फांसी की सजा हुई..इस नाकाम क्रांति कें बाद भी पंडित जी ने हार नहीं मानी वह सिंगापुर, बर्मा और संघाई जाकर वहाँ काम कर रहे क्रांतिकारी संगठनों से देश की आज़ादी के लिए समर्थन माँगा। “मातृवेदी” को नये सिरे से खड़ा करने के लिए काफ़ी जद्दोजहद की, लेकिन कामयाब नहीं हुए।

महज तीस साल की छोटी सी उम्र में 21 दिसम्बर, 1920 को गेंदालाल दीक्षित की शहादत क्षय रोग से हुई।  उनकी शहादत के कई साल बाद तक अंग्रेज़ हुकूमत उनके कारनामों से खौफजदा रही। सरकार को यक़ीन ही नहीं था कि गेंदालाल दीक्षित अब इस दुनिया में नहीं हैं।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के ऐसे कितने ही सेनानी हैं जिनकी शौर्य गाथा हमारे इतिहासकार हम तक नहीं पहुंचा पाए.. आजादी के  सालों बाद ही सही जरुरत हैं उनके योगदान को याद करने की जिनके वजह से आज हम खुली हवा में सांस ले रहे हैं…इस स्वतंत्रता दिवस नमन ऐसे शूरवीरों की जिसने हमारी पीढ़ी को स्वतंत्रता बिना किसी देय के दे दी।

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Ratan Tata : भारतीय उद्योग जगत के शिखरपुरुष

ratan tata indian business icon

Ratan Tata : CNN पर प्रसारित एक कार्यक्र्म में एक पत्रकार ने रतन टाटा से सवाल किया कि आप भारत के सबसे अमीर व्यक्तियों के सूची में नही है पर मुकेश अंबानी हैं। ऐसा क्यों?

उन्होंने बड़े सादगी और विनम्रता से जवाब दिया कि मुकेश अंबानी बिज़नेस मैन है और वे उद्योगपति…. मैं इस अंतर को काफी देर बाद समझ पाया। मैं अपने जीवन में तीन इंसान का बहुत बड़ा प्रशंसक रहा हूँ। जिनमें से एक रतन नवल टाटा जी हैं। Most Valuable Group के मामले में टाटा समूह ने Microsoft और Google तक को पीछे छोड़ दिया है। टाटा समूह का मार्केट कीमत तकरीबन 11.42 लाख करोड़ हैं जबकि मुकेश अंबानी के रिलायंस की मार्केट कीमत 6-7 लाख करोड़ हैं। रतन टाटा की सादगी इसी बात से नजर आ जाती हैं कि मुकेश अम्बानी भारत के सबसे अमीर व्यक्ति हैं पर रतन टाटा नही ! टाटा ग्रुप ने व्यापार से पहले राष्ट्र को रखा और ऐसा कहना अनुचित न होगा कि उस राष्ट्रभक्ति की इमारत को मजबूत और खूबसूरत बनाने का काम रतन नवल टाटा ने किया। रतन टाटा से सभी भारतीय प्यार और आदर का भाव रखते हैं जबकि ऐसा भाव और किसी बिजनेसमेन के लिए नहीं। और वो खुद भी कहते हैं कि वो बिजनेस मेन नही हैं बल्कि उद्योगपति हैं।

उद्योग जगत में उनका कदम-

1971 में रतन टाटा को राष्ट्रीय रेडियों और इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी लिमिटेड( नेल्को) का डायरेक्टर इन चार्ज नियुक्त किया गया, जो कम्पनी वित्तिय घाटा से जूझ रही थी। 1972 से 1975 तक नेल्को ने बाजार में अपनी हिस्सेदारी 20% तक बढ़ा ली तथा अपना वित्तिय घाटा को भी पूरा कर लिया।

वैश्विक बाजार में टाटा कंपनी का डंका बजना –

1991 में JRD टाटा के बाद टाटा सन्स की जिम्मेदारी का भार रतन टाटा को सौपी गयी। रतन टाटा ने अपना पूरा जीवन टाटा परिवार को समर्पित करते हुए टाटा को एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के रूप में विश्व मे स्थापित किया। डच स्टील कंपनी कोरस का 2006 में अधिग्रहण किया और टाटा स्टील को विश्व के 10 स्टील कंपनी में ला खड़ा किया जहाँ वो विश्व के 50 कंपनियों में भी नही था। रतन टाटा ने 1998 में भारतीयों को पहला स्वदेशी कार दिया जिसका नाम इंडिका रखा लेकिन वो कार भारतीय लोगों के मापदंड पर खड़ा नही उतर सकी जिस कारण उन्हें घाटे का सामना करना पड़ा और उन्हें उस कार कंपनी को बेचने पर विवश होना पड़ा जिस सिलसिले में वो फोर्ड MD से मिले लेक़िन उनके व्यवहार को देख(रंगभेद) उन्होंने इरादा बदल दिया 2008 में फोर्ड की कंपनी लैंड रोबर और जैगुआर की वित्तिय हालात खस्ता होने के कारण रतन टाटा ने उसका अधिग्रहण किया….जो टाटा मोटर्स के लिए एक बूम साबित हुई तथा विश्व के ऑटोमोबाइल सेक्टर में टाटा मोटर्स का सिक्का स्थापित हुआ।

मेक इन इंडिया और इंडिया फ़र्स्ट में टाटा ग्रुप का अप्रतिम योगदान –

भारत के प्रधानमंत्री सुरक्षा के लिहाज़ से BMW कार इस्तेमाल करते थे लेकिन अब वे स्वदेशी के तर्ज पर टाटा मोटर्स की गाड़ी को अपने बेड़े में शामिल किया हैं जिस कारण अब आप प्रधानमंत्री मोदी को कई बार लैंड रोवर से भी सफर करते हुए देखा होगा । ये कार लैंड रोवर का आर्म्ड वर्जन है। सुरक्षा के लिहाज से ये कार काफी दमदार है. इस कार पर बम धमाकों और कैमिकल अटैक का भी असर नहीं होता है. लैंड रोवर सेंटिनेल में VR8 बैलिस्टिक सुरक्षा दी गई है. इस कार में 5.0-लीटर का सुपरचार्ज्ड V8 इंजन लगा है, जो 375bhp की पावर और 508Nm का टॉर्क जेनरेट करता है. इसका इंजन 8-स्पीड ऑटोमैटिक गियरबॉक्स से लैस है. कार की स्पीड 218 किलोमीटर प्रति घंटे है. इसकी कीमत करीब 3 करोड़ है। रतन टाटा के मार्गदर्शन में, टाटा कंसलटेंसी सर्विसेस सार्वजनिक निगम बनी और टाटा मोटर्स न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध हुई। TCS की मार्केट वेल्यू 109 बिलियन US डॉलर हैं जो विश्व के प्रतिष्ठित IT कंपनी में गिनी जाती है। TCS की स्थापना JRD टाटा ने किया लेकिन आज वो जिस मुक़ाम पे स्थापित है उसका श्रेय रतन टाटा को ही जाता हैं। इतना ही नही चीन का दबदबा खत्म करने के उद्देश्य से भारतीय सरकार के Product Linked Incentive Plan के तहद टाटा केमिकल्स लिमिटेड ने 10 गीगा वॉट का प्लांट गुजरात में स्थापित करने का निर्णय लिया जिसमे चार हजार करोड़ इन्वेस्टमेंट करने का ऐलान किया ताकि लिथियम बैटरी में भारत को आत्मनिर्भर बना सकें और पूरे विश्व मे चीन के दबदबे को खत्म कर सकें.. गोरेतलब है कि आने वाले समय मे इलेक्ट्रॉनिक कार का दौर होने वाला हैं। इलेक्ट्रॉनिक कार के दाम का 40% मूल्य सिर्फ़ लिथियम बैटरी का होता हैं। मौजूदा समय में पूरे विश्व मे लिथियम बैटरी का आपूर्तिकर्ता में चीन का दबदबा है।

कोविड महामारी की चुनौती का सामना –

रतन टाटा ने हमेशा भारतीय सरकार की मदद करने का भरपूर प्रयत्न किया. चाहें वो भारतीय सैनिक के लिए ट्रक का निर्माण हो, या तोप का हमेशा राष्ट्रीय मूल को प्राथमिकता प्रदान किया। अभी जब कोरोना वैश्विक महामारी का दौर है तब वैक्सीनेशन में सरकार के पास लोजीटिक्स एक बहुत बड़ी समस्या खड़ी हो गयी वो दूर-दराज (गाँव) मे वैक्सीन की उपलब्धता कैसे सुनिश्चित करें? क्योंकि अधिकतर वैक्सीन को 2 से 8 डीग्री टेम्परेचर पर स्टोर कर के रखना होता है अन्यथा उसका प्रभाव खत्म हो जाता हैं, टाटा ने आगे आकर रेफ्रिजरेटर कंपनियों से टाईअप कर उन्नत किस्म के ट्रक का निर्माण किया जिससे भारतीय सरकार जल्द से जल्द अपने वैक्सिनेशन कर्यक्रम को सफल बना सकें और भारतीयों को सुरक्षित कर सकें।

टाटा ग्रुप चेरीटेबल संस्था के लिए पाथेय –

टाटा समूह के पास 96 कंपनी हैं लेक़िन उनमे से लिस्टेड 26 कंपनी हैं जिसे ऑपरेट करता हैं टाटा सन्स। टाटा सन्स के 66% शेयर टाटा के ही चैरिटेबल ट्रस्ट के पास है जो उस पैसे को चैरिटी में खर्च करती हैं। जहाँ तक शिक्षा का सवाल है, तो इस के लिए तो केवल टाटा मैक्ग्रा (Tata Mcgraw) का नाम लेने मात्र से ही इस क्षेत्र में टाटा समूह की सफलता को बयां किया जा सकता है। पर टाटा का शिक्षा से जुड़ाव केवल इस मशहूर प्रकाशन कंपनी तक ही सीमित नहीं है। अनेक सरकारी संस्थानों व कम्पनियों की शरुआत टाटा द्वारा ही की गयी, जैसे – भारतीय विज्ञान संस्थान (Indian Institute of Science) जहाँ से भारतीय वैज्ञानिकों की नई पौध तैयार की जाती हैं, टाटा मूलभूत अनुसंधान केन्द्र (Tata Institute of Fundamental Research), टाटा समाज विज्ञान संस्थान (Tata Institute of Social Sciences) और टाटा ऊर्जा अनुसंधान संस्थान (Tata Energy Research Institute, होमी भाभा कैंसर अस्पताल सिंगूर पंजाब(Homi Bhabha cancer Hospital)। यहाँ तक की भारत की आधिकारिक विमान सेवा एयर इन्डिया का भी जन्म टाटा एयरलाइन्स के रूप में हुआ था। इसके अलावा टाटा मैनेजमेन्ट ट्रेनिंग सेन्टर, पुणे और नेशनल सेन्टर फार पर्फार्मिंग आर्ट्स भी ऐसे संस्थान हैं जिनका श्रेय टाटा समूह को दिया जाना चाहिए।

अतीत के झरोखो मे टाटा ग्रुप का उद्योग –

जमशेद जी टाटा ने 1877 में Empress Mill की स्थापना नागपुर में किया, जो एक टैक्सटाइल कंपनी थी। नागपुर से ही टाटा कंपनी का जन्म हुआ कहें तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। एम्प्लाइज प्रोविडेंट फण्ड की शुरूआत जमशेद जी टाटा के द्वारा ही एम्प्रेस मिल के कर्मचारियों के लिए की गई जिसे उस समय एक क्रांतिकारी कदम बताया गया क्योंकि उस समय यूरोप या लंदन की किसी कंपनी के कर्मचारियों के लिए ये व्यवस्था नही थी। 1893 में स्वामी विवेकानंद से Impress of India जहाज पर जमशेद जी की मुलाक़ात हुई तथा विभिन्न विषयों पर चर्चा हुई। उसी चर्चा से भारत में एक वैज्ञानिक संस्थान का होना कितना अनिवार्य है उभर केर आई । इसका ऐहसास जमशेद जी को हुआ और इसके निर्माण को वह दृढ़संकल्पित हुए, लेक़िन इस संस्था के निर्माण में सरकारी स्तर पर काफी बाधाओं का सामना करना पड़ा सबसे बडी दुखद समस्या जमशेद जी की मृत्यु थी। 1909 में जमशेदजी के ज्येष्ट पुत्र दोराब जी टाटा ने Indian Institute Of Science, Bengaluru का निर्माण कर सरकार के हाथ मे सौप दिया। 1920 और 1924 Olympic Games में आर्थिक संकट के बावजूद भारतीय डेलिगेशन को खुद के खर्चे पर भाग लेने भेजना भी टाटा समूह का एक साहसिक निर्णय था जिसका हम सभी भारतीय आदर पूर्वक सम्मान करते हैं, तभी हम कहते हैं राष्ट्रीय हित को टाटा ने सर्वोपरि रखा हैं।

सिनेमा के शुरुआती दौर के प्रणेता नुमाइर भाई ने अपनी पहली फिल्म का पिरिमियम बम्बई के आलिशान बुडसें होटल में 7 जुलाई 1896 को आयोजित किया, इसे देखने मात्र अंग्रेज लोग आए थे क्योंकि होटल के दरवाज़े पर एक तख्तियां लगी होती थी “भारतीय और कुत्ते को अंदर इजाज़त नही हैं” ! जमशेद जी को भी प्रवेश नही मिला जिससे वो काफी आहत हुए। महज़ दो साल बाद वोडसें होटल के ठीक सामने ताज का निर्माण चालू हुआ और 16 दिसम्बर 1903 को मुंबई के मस्तक में चार चांद लगते ताज होटल को भारतीय के लिए खोल दिया गया जो किसी मायने में भी यूरोप के किसी पाँच सितारा होटल से कम नही था.। उस समय ताज के दरवाज़े पर एक तख्तियां लटकी हुई होती थी ” ब्रिटिश और बिल्लियां अंदर नही आ सकती” ! अपने पाठक को याद दिला दु कि बुड्से होटल आज के समय में ओबेराइ होटल से जाना जाता है।

बिनोबा भावे का भू दान योजना और टाटा ग्रुप –

पंचगनी में खुद के लिए खरीदा हुआ बंगला हॉस्पिटल के लिए दान में दे दिया तथा विनोवा भाबे के भूदान आंदोलन में भी कुछ भूमि का दान किया। दोराब जी टाटा के पत्नी के मृत्यु के पश्चात लेडी टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल की नींव रखी, जो आज के प्रसिद्ध टाटा केंसर हॉस्पिटल में गिना जाता हैं जहां देश भर के मरीज के साथ साथ पाकिस्तान, बंगालदेश, अफ्रीका एवं अन्य देशो से केंसर से पीडित मरीज आते है और सस्ती और विश्व स्तरीय इलाज कि सुविधा प्राप्त करते है।

रतन टाटा का निजी जीवन-

निजी जीवन मे अगर झाँके तो रतन टाटा का एक और उदात्त चरित्र नजर आता है। आपका बचपन दुख मे ही बीता। माता पिता का अलग रहना और दादी की परवरिशमें बढ़ना और बाद में दत्तक पुत्र बनना जीवन का सुखद अध्याय तो बिलकुल नही था। हारवर्ड में बिज़नस स्टडीज के दौरान एक सुंदर लड़की से प्रेम पाना और फ़ीर सदा के लिए जुदा हो जाना बहुत कष्टकर रहा होगा। तमाम परेशानी और जीवन के झ्ंजावत उनके फौलादी आत्मबल को डिगा नही सका। स्त्री प्रेम से ऊपर उन्होने बृध् और बीमार दादी की सेवा को वरीयता दी। जिसका जिक्र उन्होंने खुद सोशल मीडिया के माध्यम से किया है । वो कहते है कि अगर मेरी दादी की तबियत नासाज न होती तो मैं 1962 में भारत नही आता और मैं भी शादी-शुदा होता… रतन टाटा LA(USA) में ही जॉब कर रहे थे वहीं घर बसाये होते।

रतन टाटा जी का भारतीय उद्योग जगत में कद –

कुछ दिन पूर्व की ही घटना हैं जब इंफ़ोसिस के संस्थापक और अध्यक्ष नारायण मूर्ति रतन टाटा को लाइफ टाइम अचिएवमेंट अवार्ड फॉर चेंजीग बिज़नस लेंडस्केप पुरुस्कार प्रदान कर रहे थे उनका फ़ोटो और वीडियो वायरल हुआ। इस कार्यक्र्म की विशेषता यह थी जब रतन टाटा को नारायण मूर्ति पुरुस्कार प्रदान करते हैं तो मूर्ति जी सबसे पहले रतन टाटा का चरण स्पर्श करते हैं। व्यवसाय जगत में इस तरह की परिपाटी देखने को नही मिलती. वो हैंड शेक और हग करतें हैं लेकिन भारतीय मूल्य को इन दोनों जीवित धरोहर ने जीवंत बना दिया. मूर्ति जी के नजर में रतन टाटा क्या है उस सुखद दृश्य ने बता दिया। टाटा परिवार (पारसी परिवार) ने हमेशा राष्ट्र की उन्नति को सर्वोपरि रखा स्वाभिमान को झुकने न दिया। हम भारतीय कभी टाटा के ऋण को उतार नही पाएंगे। मेरे नजर में भरतीय संस्कृति और मुल्यों को धारण कर आगे बढ्ने वाला यह समूह अन्यत्र दुर्लभ हैं। इस ग्रुप के वर्तमान चेयरमेन इमेरिटस रतन टाटा को आप लिविंग लिजेंड कहे या लिविंग ट्रेजर अथवा दोनों कहना उनकी क्षमता योग्यता और प्रतिभा का एक परिचय भर है। वे भारतीय उद्योग जगत के लिए शिखर पुरुष और उनकी उपलब्धि मील का पत्थर ।

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Taliban Latest News : इंसानियत का तालीबानीकरण जिसकी हैवानियत देख रूह काँप जाए

Taliban Latest News

Taliban Latest News : भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी ने एक बहुत अच्छी बात कही थी युद्ध एवं शांति पर.. उनके अनुसार

“आँख के बदले में आँख पूरे विश्व को अँधा बना देगी ” वर्तमान काल में इस शब्द कें क्या आयाम हैं, यह कह पाना तो थोड़ा कठिन है परंतु अगर गहन अध्ययन किया जाए तो पाते हैं कि यह वाक्य हर काल में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में सक्षम है..

बीते दिनों कुछ खबरें ऐसी मिली जहां हिंसा, अशांति, दर्द अपने चरम पर रहा फिर चाहे वह अफीक्रा में हों रही हिंसा की घटनाएं हों या फिर पुनर्जागृत होते तालिबान की कहानियां.. भारतीय फोटो जर्नलिस्ट की मौत अफगानी कमांडर के अनुसार तालिबान की ओर से की जा रही गोलीबारी में भारतीय पत्रकार सहित एक अफगान अधिकारी भी मारे गए। इस खबर ने ना सिर्फ भारतीय मीडिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया बल्कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया के समक्ष भी असमंजस भरी स्थिति पैदा कर दी.. “क्या तालिबान फिर से अपने रुख पर आ चुकी हैं”

वास्तव में तालिबान के पिछले कारनामों से सिर्फ अफगानिस्तान हीं नहीं बल्कि सारी दुनिया परिचित हैं.. अमेरिका एवं तालिबानी लड़ाकों के बीच संघर्ष कोई नया नहीं हैं लगभग दों दशक से चल रहें इस खूनी संघर्ष में ना जाने कितने ही जानें गयी फिर चाहे वह सैनिक हों, तालिबानी लड़ाकें या फिर आम नागरिक लेकिन अमेरिका के द्वारा अब इस संघर्ष पर विराम लगने वाला हैं.. पिछले साल फरवरी के महीने में कतर के दोहा में तालिबान के वार्ताकार मुल्ला बिरादर एवं दूसरी ओर से अमेरिका के वार्ताकार ज़लमय खलीलजाद ने शांति समझौते पर हस्ताक्षर किया था जिसके अंतर्गत अगले 14 महीने में अमेरिका अफगानिस्तान से अपने सभी सैन्य बलों को वापस बुला लेंगी.

समझौते के अनुसार, अफगानिस्तान में मौजूद अपने सैनिकों की संख्या में अमेरिका धीरे-धीरे कमी लाएगी। इसके तहत अग्रिम छह माह में करीब 8,600 सैनिकों को वापस अमेरिका भेजा जाएगा। हालांकि इस समझौते की बुनियाद तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्ंम्प के समय ही गढ़ी गयी थी इसके बाद अमेरिका में सत्ता परिवर्तन हुआ एवं ट्ंम्प के जगह राष्ट्रपति की गद्दी जों बाइडन ने संभाली उनके सत्ता में आने के बाद कयास लगाए जा रहे थे इस समझौते पर पुनर्विचार किया जायेगा.. हालांकि समझौते की कोशिश पुर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के समय भी की गई थी पर तालिबान समर्थक इस मुद्दे को मानने को तैयार नहीं हुए थे..अब अमेरिका अपने सैनिकों को उनके वतन भेजने की कवायद में तेजी ला रहा हैं वहीं दूसरी ओर तालिबान का वही पुराना स्वरूप वापस देखने को मिलना आरंभ हो चुका हैं..समझौते के अनुसार तालिबान ने अपने नियंत्रण वाले इलाक़े में अल क़ायदा और दूसरे चरमपंथी संगठनों के प्रवेश पर पाबंदी लगाने की बात  कही थी और राष्ट्रीय स्तर की शांति बातचीत में शामिल होने का भरोसा भी दिया था.

लेकिन समझौते के अगले साल से ही तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान के आम नागिरकों और सुरक्षा बलों को निशाना बनाना जारी रखा.

अब जब अमेरिकी सैनिक अफ़ग़ानिस्तान से विदा होने की तैयारी कर रहे हैं तब तालिबानी समूह तेजी से पूरे देश अपने पांव पसार रहा हैं.. जिस वजह से मध्य एशिया के देशों के लिए यह एक गहन चिंतन का विषय बनता जा रहा हैं.

90 के दशक का शायद ही कोई बच्चा ऐसा होगा जो कि “तालिबान” के नाम से परिचित नहीं होगा उनके नृशंस कांडों से भयभीत नहीं होगा..जब 2011 में अमेरिका के सील कमांडो ने पाकिस्तान के एबोटाबाद में घुस कर तालिबानी आतंकी ओसामा बिन लादेन का खात्मा किया था तों पूरे विश्व में जश्न की लहर दौड़ गई थी सब ने कहा कि यह श्रद्धांजलि हैं 9/11 हमलों में मारें गयें लोगों की जी हां न्यूयॉर्क के ट्विन टावर्स और वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर 11 सितंबर 2001को 19 अल कायदा आतंकियों ने जानबूझकर दो विमानों को टकरा दिया था माना जाता हैं कि मानवीय इतिहास में इससे दूर्दांत हमला और कुछ नहीं था.. इसमें सिर्फ अमरीकी मूल के नागरिक हीं नहीं बल्कि अन्य देशों के लोग भी कार्यरत थें जिनकी मौत हों गई थी..इस हमलें का मास्टर माइंड ओसामा बिन लादेन हीं था.

तालिबान के पुनर्जागृत होने से समस्या ना सिर्फ अफगानिस्तान के लिए हैं बल्कि चिंता का विषय संपूर्ण मध्य एशियाई देशों के लिए हैं.. बीते वर्षों में भारत और अफगानिस्तान के संबंध बहुत मजबूत हुए हैं.. आधारभूत संरचना एवं विभिन्न परियोजनाओं कें पुनर्निर्माण में भारत अब तक तीन अरब डॉलर से अधिक का निवेश कर चुका है.

भारत ने अफ़ग़ानिस्तान के संसद भवन का निर्माण किया है और अफ़ग़ानिस्तान के साथ मिलकर एक बड़ा बाँध भी बनाया है. भारत ने शिक्षा और तकनीकी सहायता भी दी है. साथ ही, भारत ने अफगानिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों में निवेश को भी प्रोत्साहित किया है.

ज़ाहिर है, इस तरह के सुदृढ़ संबंध के कारण भारत अफ़ग़ानिस्तान में किए अपने निवेशों के लिए चिंतित है. तालिबान जिस तरह की हिंसा अफ़ग़ानिस्तान में कर रहा है उस स्थिति में उसके सत्ता हासिल कर लेने की वैधता पर भारत के लिए चिंताजनक स्थिति उत्पन्न होने की संभावना हैं वहीं दूसरी ओर भारत के लिए चिंता का  माहौल पाकिस्तान के ख़िलाफ़ अपनी सामरिक बढ़त खोने को लेकर भी हैं. अफ़ग़ानिस्तान में भारत के मज़बूत होने का एक मनोवैज्ञानिक और सामरिक दबाव पाकिस्तान पर रहता है, वहाँ भारत की पकड़ कमज़ोर होने का मतलब है पाकिस्तान का दबदबा बढ़ना एवं मजबूत होना.

तालिबान के प्रवक्ता सुहैल शाहीन ने अफ़ग़ानिस्तान के भविष्य को लेकर तालिबान का स्टैंड स्पष्ट किया कहा कि “जब बातचीत के बाद काबुल में ऐसी सरकार बनेगी जो सभी पक्षों को स्वीकार होगी और अशरफ़ गनी की सरकार चली जाएगी तो तालिबान अपने हथियार डाल देगा.” बीतें दिनों अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ़ गनी ने अपने भाषण में तालिबान पर हमला करने की बात कही थी. जिसके जवाब में तालिबान ने अशरफ़ गनी को जंग का सौदागर करार दिया है.

तालिबान का इतिहास कोई नया नहीं हैं..

1980 का दशक खत्‍म होते-होते सोवियत संघ के अफगानिस्‍तान के जाने के बाद वहां पर कई गुटों में आपसी संघर्ष शुरू हो गया था इस संघर्ष से उत्पन्न तनाव को खत्म करने के लिए जब तालिबान सामने आया तो अफगानिस्‍तान के लोगों ने उसका स्वागत किया था.

कहा जाता है कि शुरुआत में तालिबान ने अफगानिस्‍तान में मौजूद भ्रष्‍टाचार को काबू में किया और अव्यवस्था पर नियंत्रण लगाया. आज डर और दहशत का पर्याय बन चुके तालिबान ने अपने नियंत्रण में आने वाले इलाको को सुरक्षित बनाया ताकि लोग व्यवसाय कर सकें.

तालिबान दरअसल सुन्‍नी इस्‍लामिक आंदोलन था जिसकी शुरुआत सन् 1994 में दक्षिणी अफगानिस्‍तान में हुई थी.

पश्‍तो भाषा के शब्‍द तालिबान का अर्थ होता है “विद्यार्थी” यानी वह छात्र जो इस्लामिक कट्टरपंथ की विचारधारा में यकीन करते हैं. तालिबान को एक राजनीतिक आंदोलन के तौर पर माना गया जिसकी सदस्यता पाकिस्तान और अफगानिस्तान के मदरसों में पढ़ने वाले छात्रों को मिलती है.नॉर्थ पाकिस्‍तान में 1990 के दशक में तालिबान और ज्‍यादा ताकतवर हुआ. उस समय अफगानिस्तान से सोवियत संघ की सेनाओं की वापसी हो रही थी. पश्‍तूनों के नेतृत्व में तालिबान और ज्‍यादा ताकतवर हुआ. कहते हैं कि तालिबान सबसे पहले धार्मिक आयोजनों या मदरसों के जरिए मजबूत होता गया और इसका ज्‍यादातर पैसा सऊदी अरब से आता था. शरीया कानून को तरजीह देते हुए तालिबान ने सज़ा देने के इस्लामिक तौर तरीकों को लागू किया जिसमें हत्या और व्याभिचार के दोषियों को सार्वजनिक तौर पर फांसी देना और चोरी के मामलों में दोषियों के अंग भंग करने जैसी सजाएं शामिल थीं.

पुरुषों के लिए दाढ़ी और महिलाओं के लिए पूरे शरीर को ढकने वाली बुर्क़े का इस्तेमाल ज़रूरी कर दिया गया. तालिबान ने टेलीविजन, संगीत और सिनेमा पर पाबंदी लगा दी और 10 साल और उससे अधिक उम्र की लड़कियों के स्कूल जाने पर रोक लगा दी.

हालांकि वर्तमान स्थिति पर तालिबान ने कहा है अब हमारे नियमों एवं नीतियों में काफी बदलाव किया गया हैं हम भी अमन चाहते हैं.

हालांकि उनके कायाक्लपों से यह प्रतीत नहीं होता हैं कि वह शांति स्वरूप से तंत्र में आना चाह रहे हैं अफगानिस्तान के लगभग 90% इलाके जों हैं उस पर तालिबान समर्थकों नें अपना कब्जा जमा रखा है. अफगानिस्तान की धरती  बीते तीन दशकों से जंग का दंश झेल रही हैं अब वहां की आवाम भी शांति व्यवस्था चाहती हैं. आम जनता में भी दहशत का आलम बना हुआ हैं ऐसे लोग जिन्होंने कभी तालिबान के खिलाफ आवाज उठाई थी या उनके विरोध कुछ बोलने की हिम्मत दिखाई थी उन सबों को भी जान का खतरा काफी सता रहा हैं..एक अनुमान से यह भी पता चला है कि तालिबान के मुख्य टारगेट में भारत उच्च स्थान पर हैं.. इस कार्य में उसके पुराने साथी पाकिस्तान का सहयोग भी अपेक्षित है वहीं दूसरी ओर अफगानिस्तान में रह रहे भारतीय जनता के लिए भी खतरा साफ साफ दिख रहा हैं.. भयभीत पाकिस्तान भी हैं क्योंकि अफगानिस्तान से पाकिस्तान का एक बड़ा सीमावर्ती इलाका आता हैं जिस पर क़ब्जे के लिए तालिबान तत्पर हैं इसलिए ख़तरे की घंटी पाकिस्तान के लिए भी हैं..मगर उसे खुशी खुद की बर्बादी से ज्यादा भारत में अस्थिरता उत्पन्न करने से हैं.. भारत के लिए चुनौतियां कई हैं एक ओर जहां भारत उसे अफगानिस्तान के साथ अपने संबंध की मधुरता को बरकरार रखना हैं वहीं अपने नागरिकों की सुरक्षा को भी ध्यान में रख कर आगे बढ़ने का भी हैं.. तालिबान वक्तव्य करने हेतु भारत से तत्पर हैं तों वहीं उसकी शर्तों की जटिलता भी कुछ कम नहीं हैं.. तालिबान पुनः सरकार में आतीं हैं कि नहीं यह तो बाद की बात हैं..पर पुरा विश्व चाहता हैं अफगानिस्तान के हालात फिर से सुदृढ़ हों एवं खुश ख़राबे का माहौल समाप्त हो कर राष्ट्र एक बार फिर से प्रगति की ओर बढ़ चलें.

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“हिंदी सिनेमा को सम्मान व प्रोत्साहन दे भारत सरकार” – निर्देशक अशोक त्यागी

indian cinema needs support from government film director ashok tyagi

आज से हज़ारों वर्ष पूर्व भरत मुनि द्वारा रचित नाट्यशास्त्र की प्रस्तावना में उल्लेख है कि जब देवताओं और दानवों के बीच सहस्राब्दियों से चल रहे युद्ध पर सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी ने अपने प्रयास से युद्ध विराम लगवाया तो कुछ समय तो समुद्र मंथन में व्यतीत हो गया जिसमे दोनों – देवताओं और दानवों ने भाग लिया था।

परन्तु उसके पश्चात दोनों के सामने समय व्यतीत करने की समस्या खड़ी हो गई। युद्ध दोनों पक्षों को दिन रात व्यस्त रखता था मगर अब शांति काल होने के कारण दोनों के पास खाली समय था और उस समय का उपयोग करने के लिए कोई उपक्रम न होने के कारण वो बहुत ऊब रहे थे। उबासी इतनी बढ़ी कि वो परेशान होकर वापिस ब्रह्मा जी के पास गए और अपना दुखड़ा उन्हें सुनाया। उनका दुखड़ा सुन कर ब्रह्मा जी उन पर करुणा करते हुए बोले – जीवन का मार्गदर्शन करने के लिए मैंने जिन चार वेदों की रचना की है उनका लाभ केवल साक्षर ही उठा सकते हैं अतैव अब मैं एक ऐसे पांचवे वेद की रचना करूंगा जिसे देखा भी जा चुके और सुना भी जा सके (दृश्यम-श्रव्यम) जिसका आनंद साक्षर धनाढ्य भी उठा सकेंगे और असाक्षर श्रमजीवी भी। ब्रह्मा जी आगे बोले – मैं इसमें ऋग्वेद से ज्ञान, सामवेद से गान, यजुर्वेद से ध्यान, अथर्वेद से मान के अतिरिक्त इतिहास का समावेश करूँगा ताकि जीव अतीत में घटित घटनाओं से प्रेरणा एवं मार्गदर्शन प्राप्त कर सकें। ये कह कर ब्रह्मा जी ने नाट्यवेद की रचना की जिसमे नाट्यविद्या के सभी पहलुओं एवं अवयवों का विस्तृत वर्णन है।

नाट्यवेद को असुरों एवं देवों को प्रदान करते हुए उसके प्रयोग से होने वाले लाभों को गिनाते हुए ब्रह्मा जी ने कहा ये नाट्यवेद जो मैं तुम्हे प्रदान कर रहा हूँ इसके प्रयोग से उत्पन्न दृश्यों और ध्वनियों के दर्शन एवं श्रवण से जीवों को तीन लाभ होंगे। मनोरंजन, मानसिक विश्रांति एवं हितोपदेश अर्थात जीवन को बेहतर बनांने के लिए प्रेरित करने वाला सन्देश। कालान्तर में नाट्यवेद, नाट्यशास्त्र के नाम से प्रचलित हुआ और सदियोँ के निरन्तर प्रयोग से भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता का अभिन्न अंग बन गया।

जब यवनों का भारत पर राज्य चला जिनकी मान्यता के अनुसार नाट्य अधार्मिक होने के कारण वर्जित था उस दौरान वो लोकनाट्य का रूप धारण कर यवनों की राजधानी और छावनियों से दूर भारत के ग्रामीण परिवेश में जीवित रहा। अंग्रेज़ों के आगमन के साथ नाट्य पुनःशेक्सपियर के नाटकों के रूप में पुनर्स्थापित होकर राजकीय वर्जना से मुक्त हुआ और अंग्रेज़ों की तात्कालिक राजधानी कोलकाता में बंगाली नाटकों का प्रचलन आरम्भ हुआ जिसे रबीन्द्रनाथ टैगोर ने उसकी पराकष्ठा तक पहुँचाया। कोलकाता से प्रेरित होकर मुंबई में सर जीजीभाय ने हिंदी एवं गुजराती नाटकों के मंचन के परम्परा की नींव रखी जो पारसी थिएटर के नाम से लोकप्रिय हुई।

पारसी थिएटर के अधिकतर नाटक आग़ा हश्र कश्मीरी द्वारा लिखित थे जो भारतीय पौराणिक धरोहर के अतिरिक्त अलिफ़ लैला एवं शेक्सपियर की कहानियों पर आधारित होते थे। १८९५ में विश्व में सिनेमा का आविष्कार हुआ और १९१३ में दादा साहेब फ़ाल्के की फिल्म “राजा हरिश्चंद्र” के प्रदर्शन के साथ भारतीय सिनेमा का जन्म हुआ जो १९३० तक मूक था और जिसके दर्शक म्याँमार से लेकर अफगानिस्तान तक फैले हुए थे। १९२९ में अमरीका में पहली सवाक फिल्म “जैज़ सिंगर” प्रदर्शित हुई और १९३१ में मुंबई में अर्देशिर ईरानी ने पहली भारतीय सवाक फिल्म “आलम आरा” की रचना की जो इसी नाम के आग़ा हश्र कश्मीरी द्वारा लिखित पारसी थिएटर में बेहद कामयाब नाटक का सिनेमाई रूपांतरण थी। इस प्रकार ब्रह्मा जी के नाट्यशास्त्र ने वर्तमान काल में भारतीय क्षेत्रीय एवं हिंदी सिनेमा का रूप धारण कर लिया। इसीलिए हर भारतीय फिल्म मनोरंजन के साथ साथ मानसिक विश्रान्ति एवं हितोपदेश भी प्रदान करती है क्योंकि इन्हीं से लाभान्वित होने के लिए ब्रह्मा जी ने नाट्यवेद की रचना की थी।

भारतीय सिनेमा की पहली सवाक फ़िल्म “आलम आरा” हिंदी में बनाई गयी क्योंकि हिंदी ही वो भाषा थी जो म्यांमार से लेकर अफ़ग़ानिस्तान तक के भारतीय मूक सिनेमा के दर्शकों की समझ में आ सकती थी। धीरे धीरे अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में भी फ़िल्में बनना शुरू हुईं और उन्होंने अपने अपने मार्किट स्थापित किये परन्तु मुम्बई में जन्मे हिन्दी सिनेमा ने अपनी अभूतपूर्व अखिल भारतीय प्रतिभा से भारत वर्ष के सभी दर्शकों का मन जीत लिया और हिंदी भाषा को स्वतंत्र भारत की राष्ट्रीय भाषा बनाने के गाँधी जी के सपने को साकार किया। १९४७ में समस्त राजवाड़ों के विलय के साथ सरदार पटेल ने जिस महान भारत वर्ष की नींव रखी थी उसकी एकता और अखंडता को बनाये रखना एक घटना नहीं एक निरंतर प्रक्रिया थी और भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के पुनरुद्घाटन, पुनर्मूल्यन एवं पुनर्स्थापन के साथ साथ वर्तमान समाज को भारतीय सामाजिक मूल्यों से अवगत करा कर हिंदी सिनेमा ने भारत की एकता और अखण्डता कोसांस्कृतिक निरंतरता प्रदान कर भारत माता की जो अपूर्व सेवा की है उसकी आज तक कोई भी प्रशंसा होना तो दूर कोई स्वीकृति भी नहीं हुई है। राष्ट्रीय भाषा को लोकप्रिय बनाने और भारतवर्ष की एकता और अखण्डता को निरंतरता देने के अतिरिक्त हिंदी सिनेमा का समस्त क्षेत्रीय फिल्मों के साथ भारत वर्ष की अर्थव्यवस्था के उत्थान में महत्वपूर्ण योगदान है। भारतीय फिल्म उद्योग हज़ारों करोड़ सरकार को जीएसटी एवं अन्य करों के रूप में प्रदान करने के साथ साथ भारतीय अर्थव्यवस्था में अप्रत्यक्ष योगदान देता है। आज सारी फ़िल्में मल्टीप्लेक्सों में प्रदर्शित होती हैं जो मॉलों में स्थित है। जब दर्शक फ़िल्म देखने मल्टीप्लेक्स में आते हैं तो मॉल में अतिरिक्त फुटफॉल होते है जो फ़ूड कोर्ट से लेकर मॉल में स्थित अन्य सेवाओं और सामग्रियों की बिक्री में परिवर्तित होते है। साथ ही साथ वो जिस गाडी से मॉल आते हैं उसके पार्किंग चार्जेज से पार्किंग वाले की आमदनी होती है और यदि वो ऑटो या टैक्सी से आते हैं तो ऑटो और टैक्सी वालों की आमदनी होती है।

आज प्रधानमंत्री मोदी संसार में भारत की जिस साख को बढ़ाने के लिए विश्व भ्रमण करते हैं उसी साख को हिंदी सिनेमा अपनी अंतर्राष्ट्रीय लोकप्रियता से दशकों से बढ़ा रहा है। आज संसार में ऐसा कोई भी देश नहीं जहाँ हिंदी सिनेमा लोकप्रिय और प्रतिष्ठित ना हो। अपनी इस अंतर्राष्ट्रीय लोकप्रियता से हिंदी सिनेमा ने विश्व भर में भारतीय संगीत, भारतीय संस्कृति और भारतीय सभ्यता का ध्वज फहराया हुआ है। अमरीका के हॉलीवुड सिनेमा के बाद समस्त विश्व में केवल भारत के बॉलीवुड सिनेमा का डंका ही बजता है। भारत ने ना अतीत में कभी किसी देश अथवा सभ्यता पर हमला किया है और ना कभी भविष्य में करेगा परन्तु हिंदी सिनेमा ही वो माध्यम है जिसके द्वारा भारत विश्व गुरु के रूप में स्थापित होगा। आज अमरीका भली भांति समझता है की यदि उसकी सैन्य शक्ति उसकी हार्ड पावर है तो हॉलीवुड उसकी सॉफ्ट पावर है परन्तु आज अमरीका के समकक्ष बनने का सपना देखने वाले भारत ऐसा नहीं समझता। समय आ गया है कि भारत सरकार इस ऐतिहासिक भूल का समाधान करे और हिंदी सिनेमा को वो सम्मान एवं प्रोत्साहन दे जिसका कि वो दशकों से अधिकारी है।

भारत सरकार को तुरन्त हिंदी सिनेमा के संरक्षण एवं विकास के लिए निम्न लिखित बिंदुओं पर क्रियाशील होना चाहिए:

१. हिंदी सिनेमा जो विश्व भर में बॉलीवुड के ब्रैंड नेम से स्थापित एवं प्रतिष्ठित है उसे भारतीय अर्थव्यवस्था के एक अति महत्वपूर्ण उद्योग के रूप में मान्यता प्रदान की जाय और उसके सतत उत्थान के लिए वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय दिशा निर्देश जारी करे।

२. जिस प्रकार समस्त राज्य अपनी क्षेत्रीय भाषा के सिनेमा के लिए अनेकों प्रोत्साहन देते हैं उसी प्रकार केंद्रीय सरकार हिंदी सिनेमा को प्रोत्साहन देने के लिए हिंदी फिल्मों के अखिल भारतीय प्रदर्शन से प्राप्त हज़ारों करोड़ केंद्रीय जीएसटीमें से १०% का हिंदी फिल्म उद्योग में पुनर्निवेश करे और इस कार्य को वित्त मंत्रालय संपन्न करे।

३. उपरोक्त राशि से हिंदी सिनेमा कारपोरेशन स्थापित किया जाय जो आत्मनिर्भर फिल्मकारों की फ़िल्में मल्टीप्लेक्सों, टीवी चैनलों और ओटीटी प्लॅटफॉर्म पर रिलीज़ करे।

४. प्रतियोगिता एक्ट २००२ (कम्पटीशन एक्ट २००२) को सख़्ती के साथ हिंदी फिल्म उद्योग पर लागू किया जाय ताकि आत्मनिर्भर फिल्मकारों का मल्टी नेशनल कंपनियों, कॉर्पोरेट कंपनियों और बड़े बैनरों के कार्टल द्वारा शोषण समाप्त हो। इस दिशा में सक्रिय होने के लिए प्रतियोगिता कमीशन को तुरंत निर्देश जारी किये जाँय।

५. हिंदी सिनेमा द्वारा भारतीय संस्कृति को विश्व में लोकप्रिय करने के पुरस्कार स्वरुप संस्कृति मंत्रालय हिंदी सिनेमा के उत्थान के लिए एक पृथक कमेटी का गठन करे.

६. भारत वर्ष को हिंदी सिनेमा के अभूतपूर्व योगदान के निरन्तर सम्मान के लिए सूचना एवं प्रसरण मंत्रालय उद्योग द्वारा स्थापित वार्षिक हिंदी सिनेमा सम्मान समारोह में भागीदार बने।

७. हिंदी फिल्म उद्योग एवं केंद्रीय सरकार के बीच सतत संवाद हो ताकि भविष्य में उठने वाली चुनौतियों का समय पर सामना करने के लिए कदम उठाये जा सकें।

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पोर्न फिल्म मास्टरमाइंड के तौर पर गिरफ्तार राज कुंद्रा आदतन अपराधी है

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2013 में IPL में राज कुंद्रा को सट्टेबाजी के आरोप में दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया था।

कुंद्रा ने खुद इस बात को स्वीकार किया था कि उन्होंने स्पॉट फिक्सिंग की थी। उसके बाद राजस्थान रॉयल्स 2 साल के लिए बैन रही और राज पर आजीवन प्रतिबंध लगा।

2017 में भी मुंबई पुलिस ने राज कुंद्रा को करीब 24 लाख रुपए की धोखाधड़ी करने के आरोप में अरेस्ट किया था। यह मामला एक ऑनलाइन शॉपिंग चैनल से संबंधित था।

2018 में राज कुंद्रा पर बिटकॉइन स्कैम करने के आरोप लगे। पुणे पुलिस की क्राइम ब्रांच और ईडी की जांच में यह बात सामने आई थी इस स्कैम से कई लोगों को करीब 200 करोड़ रुपए का चूना लगाया गया था।

राज कुंद्रा का नाम अंडरवर्ल्ड से भी जुड़ चुका है। इकबाल मिर्ची के साथ कनेक्शन होने की वजह से 2019 में प्रवर्तन निदेशालय ने कुंद्रा से 10 घंटे पूछताछ भी की थी।

तलाक के करीब 12 साल बाद राज कुंद्रा ने अपनी पिछली पत्नी के खिलाफ चरित्रहीनता के आरोप लगाए। इन आरोपों से राज ने अपनी पहली पत्नी और अपनी बहन दोनों के घरों को नुकसान पहुँचाने की कोशिश की।

कल राज कुंद्रा पॉर्न फिल्मों के मास्टरमाइंड का तौर पर गिरफ्तार हुए हैं।

असल में राज कुंद्रा जैसे लोगों ने ही भारत में महिला को असुरक्षित करने और उन्हें ‘उत्पाद’ बनाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई है। इन जैसे लोगों की वजह से ही अश्लील क्लिप को वेबसाइट पर अपलोड करने पर पिछले कुछ 4 सालों में बेतहाशा रुपये मिलने लगे थे और उसके बाद मॉल के चेंजिंग रूम, गर्ल्स हॉस्टल के वाश रूम, होटल के कमरे और स्कूल के रेस्ट रूम बच्चियों और महिलाओं के लिए असुरक्षित होते गए।

न्यूज पेपर के रंगीन पेज पर हँसते मुस्कुराते आने वाले राज कुंद्रा जैसे अनगिनत लोग ऐसे ही अंदर से खोखले हैं जिनके लिए पैसे का मूल्य किसी भी अन्य मूल्य से अधिक है।

उम्मीद करते हैं कि नए मंत्री OTT के लूप होल्स को कम से कम अब भरने का प्रयास करेंगे, ना तो ऐसे ही तमाम राज कुंद्रा और एकता कपूर OTT जैसे सार्थक प्रयोग को भारत में केवल सेमी पॉर्न इंडस्ट्री बना कर रख देंगे।

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“मेरे साहब चले गये..” -दिलीप कुमार को याद कर भावुक हुए नाना पाटेकर

nana patekar dilip kumar post

हर दिल अजीज़ फ़नकार दिलीप कुमार साहब के निधन के बाद पूरा फ़िल्म जगत उन्हें अपने अपने तरीके से याद कर रहा है.

ऐसे में सुप्रसिद्ध अभिनेता नाना पाटेकर ने अपनी फेसबुक पोस्ट के माध्यम से दिलीप साहब से अपनी मुलाकात के अद्भुत क्षणों को बयां किया है. पढ़ें क्या कहते हैं नाना:

हिमालय कि परछाई

मेरे साहेब चले गए, बहुत लोग लिखेंगे, बहुत कुछ लिखेंगे। शब्द फिर भी बौने रह जाएंगे। बहुत बड़ा कलाकार और बेहद जहीन इंसान। स्मृति वंदन करते हुए मै रुंधा हुआ हूं कि उनकी आखरी यात्रा में सहभागी नहीं हो सका. मरते दम तक खलता रहेगा ये खोया हुआ पल। पिता समान थे वो मेरे।

मेरी पीठ पर उन्होने हाथ फेरा था, वो आज भी मेरे हौसले की वजह है। मुझे आज भी याद है, एक दिन घर गया था उनके, बुलाया था उन्होंने मुझे। काफी बारिश थी और में पूरा भीगा हुआ। पहुंचा तो दरवाजे पर खड़े थे। अंदर गए, टॉवेल लाए, मेरा सिर पोंछने लगे। अंदर से खुद का शर्ट लाकर पहनाया मुझे। मैं सूखा कहां रहता, भीतर तर भीगा ही रह गया था. आँखें दगा दे रही थी, लेकिन मैं फिर भी खुद को सँभालने की कोशिश कर रहा था. कितनी तारीफ़ कर रहे थे, क्रांतिवीर फिल्म की। फिल्म के एक-एक प्रसंग पर उनकी टिप्पणी सुनते हुए मैं तो पूरा उनमें गुम हो गया था। मैं उनकी आंखे पढ़ रहा था। आंखों से बयां किये हुए कई संवाद मैंने सुने है उनके।

‘गंगा जमना’ यह उनका पहला चित्रपट मैंने देखा था तब ही अंदर मैंने तय कर लिया कि मैं बस दिलीप कुमार बन जाऊंगा। मेरी नजर में कलाकार होना यानी दिलीप कुमार होना। मेरे तो जेहन में भी नहीं आया था कि मैं कभी मिल भी पाऊंगा उनसे। लीडर की शूटिंग चल रही थी, इतनी भीड़ कि कुछ दिखाई नहीं पड़ता था। मैं पीछे कहीं भीड़ का हिस्सा था। स्टेज से दिलीप साहेब ने जोर से पुकारा कि मट्ठी ऐसे पकड़ो और हाथ से हवा में घुमा दो और बोलो,मारो। सबने किया ऐसा, लेकिन मैंने जरा ज्यादा दम से किया। लीडर फिल्म देखते हुए उस भीड़ में आसमान में हाथ उछालते हुए मैं अपने आपको ढूंढ रहा था। लेकिन परदे पर दो ही लोग थे, भीड़ और दिलीप कुमार। आज भी मैं अभिमान से कहता हूं कि मेरी पहली फिल्म लीडर है।

एक फुटबॉल मैच रखा था किसी की मदद के लिए क्रिकेटर्स और कलाकारों के बीच। दिलीप साहेब रेफरी थे। मेरा सारा ध्यान उन पर ही। खेलते-खेलते किरण मोरे का घुटना मेरे पेट में घुस गया। दर्द के मारे मैं गिर पड़ा। मुझे गाडी में डालकर नानावटी अस्पताल ले गए मेरे साहेब मुझे। मैंने किरण मोरे को शुक्रिया कहा, ये सौभाग्य ही था मेरा कि चोट की वजह से मैं उनके करीब था कुछ वक्त के लिए।

बहुत यादें है सभी के पास। छोटे से क्लोज-अप में सब कुछ कह जाने वाले दिलीप साहेब। मेरी पीढ़ी को तो मगर उनका स्पर्श हुआ है। आज सुख-दुख, हर्ष-विमर्श, प्रेम -विद्वेष सभी की व्याख्या बदल चुकी है। मैं उनका कौन था, फिर भी मैं असीम पीड़ा महसूस कर रहा हूं. उनकी जीवन संगिनी सायरा जी पर क्या बीत रही होगी इस वक्त। पत्नी होना उनका कब कहां, खत्म हुआ था, रुक गया… किसने जाना। तब भी मां, कभी बाप,भाई, बहन,मित्र। कितनी भूमिकाएं निभाती रहीं वो, और कितने बेहतरीन तरीके से। अपने चेहरे की मुस्कान कभी ढलने नहीं दी उन्होंने। क्या याद करती होंगी अब? आंखों का क्या है, झरती हैं, बहती हैं। लेकिन मन का क्या? घर का हर कोना, साहेब का होगा।

मैं तो कल-परसो भूल भी जाऊं शायद, वो कैसे सहेंगी? कभी-कभी ऐसा लगता है, ये जो आखिरी वक्त साहेब को कुछ याद नहीं आ रहा था, ये शायद उनका अभिनय होगा। इर्द-गिर्द के सामाजिक, राजनीतिक परिस्थिति देखकर शायद उन्होंने सोचा हो कि भूलना ही बेहतर है। अकेले में सायरा जी से जरूर बात करते होंगे। एक-दूसरे की दुनिया बनकर रह रहे थे दोनों। सायरा जी मैं आपको झुककर प्रणाम कर रहा हूं, आपके जरिए मेरे भगवन तक मेरा भाव, मेरी श्रद्धा जरूर पहुंचेगी, मुझे पूरा यकीन हैं।

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Rajinikanth In Politics : एक बार फिर सुर्ख़ियों में रजनी अन्ना

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अभिनेता रजनीकांत ने राजनीति से तौबा कर लिया था, लेकिन अमेरिका से लौटने के बाद अभिनेता अपनी राजनीतिक पारी को लेकर एक बार फिर चर्चा में हैं।

पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि पार्टी पदाधिकारियों से विमर्श के बाद ही मैं अपनी ज़िम्मेदारियों और पार्टी के काम को लेकर कुछ कह सकूँगा, अभी कुछ कह पाना सम्भव नहीं है।

रजनीकांत के इस बयान के बाद से एक बार फिर राजनीतिक गलियारे में खलबली मच गई है। साफ़ सुथरी छवि के अभिनेता रजनीकांत के राजनीति में आने से तमिलनाडु के लोग काफ़ी उत्साहित थे। लेकिन उन्होंने गत वर्ष राजनीति से दूर ही रहने की बात कह कर सब को चौंका दिया था। अब जब उन्होंने पार्टी पदाधिकारियों से विमर्श की बात कही है तो, वे एक बार फिर से सुर्ख़ियो में हैं।

हाल ही में स्वास्थ्य जांच कराकर अमेरिका से लौटे अभिनेता ने संवाददाताओं से कहा, “क्या मक्कल मंदरम को बने रहना चाहिए, और अगर हां तो उसका काम क्या होगा और यह सवाल पदाधिकारियों और प्रशंसकों के मन में उठ रहा है।”

उन्होंने कहा, “सवाल यह भी हैं कि भविष्य में मैं राजनीति में आउंगा या नहीं।” उन्होंने कहा कि वह मंदरम पदाधिकारियों से चर्चा करेंगे और फिर चर्चा के नतीजों के बारे में बताएंगे।

नेतृत्व के अभाव में अस्तित्व के संकट से जूझ रही है ये पॉलिटिकल पार्टी ?

सम्पादकीय | नवप्रवाह डॉट कॉम

देश का सबसे पुराना राजनीतिक दल अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है। इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि गत दो वर्षों में तमाम चुनावी शिकस्त के बावजूद पार्टी राष्ट्रीय अध्यक्ष का चयन नहीं कर पा रही। हालाँकि, इस बीच तमाम मुद्दों को लेकर पार्टी पहले से अधिक मुखर नज़र आई है। किसी भी मुद्दे को लेकर पार्टी पहले से अधिक आक्रामक दिख रही है। लेकिन इन सबके बावजूद कोई भी निश्चित राष्ट्रीय नेतृत्व न होने का नुक़सान भी पार्टी को हुआ है। 

कहने को पार्टी को सोनिया गांधी का नेतृत्व प्राप्त है लेकिन आज भी नेताओं की अलग-अलग मंडली है, जिसमें कोई राहुल का झंडा ऊँचा करता दिखता है तो कोई प्रियंका का। इस परिस्थिति की वजह से युवा नेताओं को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। नेता यही नहीं निर्धारित कर पा रहे हैं कि वे किस के पीछे चलें, किसे कहें अपना नेता। कुछ युवा कांग्रेसी नेताओं का मानना है कि हम यही नहीं समझ पाते कि हमें किस की जय-जयकार करनी है।
हाल में राजस्थान में युवा कांग्रेस में काफ़ी युवा नेताओं को स्थान दिया गया। संगठन महासचिव जैसे पद का सृजन किया गया। इस से यह तो समझ आता है कि पार्टी भविष्य को लेकर बेहद गम्भीर है, लेकिन निश्चित केंद्रीय नेतृत्व के अभाव में कोई भी दल कितनी तरक़्क़ी कर सकता है यह विचारणीय मसला है।
हाल में ही सैम पित्रोदा की अध्यक्षता वाली इण्डियन ओवरसीज़ कांग्रेस ने भी कई नियुक्तियों की घोषणा की है। अब जब से यह घोषणा हुई है, तब से यह चर्चा भी तेज़ हो गई है कि अब कांग्रेस भारत से ज़्यादा विदेशों में राजनीतिक माहौल बनाने में लगी है।
कांग्रेस लगातार दो लोकसभा चुनाव और कई विधानसभा चुनाव हार चुकी है, बावजूद इस के कांग्रेस देश में फ़ोकस करने से ज़्यादा विदेशों में अपनी स्थिति मज़बूत करने में लगी है। चर्चा यह भी है कि मोदी की इंटर्नैशनल पॉलिटिकल कंडीशन को देखते हुए कांग्रेस ने यह फ़ैसले किए हैं। अब इसमें कितनी सच्चाई है, ये तो कांग्रेस के आलाकमान ही जाने, लेकिन लगातार चुनावी शिकस्त की वजह से पार्टी की जो फ़ज़ीहत हुई है, उस को लेकर पार्टी कितनी संवेदनशील है यह आने वाला समय ही बताएगा।
अमित द्विवेदी 

“मुट्ठी भर आसमान-मीनाक्षी सिंह” -यह तो आसमान को मुट्ठी में कर लेने जैसी ख्वाहिश है!

Meenakshi singh mutthi bhar asman reviewed by dr brijesh singh

Mutthi Bhar Asman : मीनाक्षी सिंह की पहली किताब “बस तुम्हारे लिए” पिछली बार जब हाथ में आई थी तो उसे पढ़कर ही महसूस हुआ था कि कुछ समय बाद एकबार फिर से उनकी कोई नई किताब पढ़ने को जरूर मिलेगी।

यह सच भी हुआ, जब “मुट्ठी भर आसमान” ने एकबार फिर से आकर्षित किया।

सारा ब्रह्मांड हम आसमान की तरफ ही देखकर निहारते हैं, कोई भी नीचे की ओर नहीं देखता। लेखन कला से जुड़े लोगों की ख्वाहिश होती है कि वह आसमान में उड़े। मीनाक्षी ने सिर्फ एक मुठ्ठी आसमान को पकड़कर कुल 21 कहानियां रच दी हैं, यही क्या कम है।

इनकी कहानियों की बहुत सारी बातें उन आधुनिक समाज के रिश्तों से जुड़ी दिखाई देती हैं जो दिखने में तो पर्दे के भीतर हैं, किन्तु जब हम उनकी परतों को कुदेरते हैं तो अचानक से सामने एक आश्चर्य खड़ा हो जाता है।

बेजान रिश्तों के बीच की अधूरी ख्वाहिश

पहली कहानी “अधूरी ख्वाहिश” है जो बेजान से रिश्तों के बीच घूमती है। पति-पत्नी के रिश्तों का बेजान हो जाना कहाँ तक घातक हो सकता है, यह बात इस कहानी में सरलता से समझा दिया गया है।

यह कोई जरूरी नहीं कि एक व्यक्ति हमेशा किसी महान व्यक्तित्व से ही सीखता आया हो। कोई भी घटना आपकी आंखें खोल सकती हैं और कोई भी व्यक्ति, जो आपके आसपास है, चाहे वह आपके घर कामवाली ही क्यों न हो, वह भी एक बड़ी सीख देने की कूबत रखती है। कुछ ऐसा ही कहानी “मुट्ठी भर एहसान” में है।

पति-पत्नी के बीच झगड़े के कई कारण हो सकते हैं, किन्तु मीनाक्षी सिंह ने “मुट्ठी भर एहसान” में जिन कारणों को समझया है वह इस कहानी को पढ़कर ही अंदाजा लगाया जा सकता है।

इस किताब ने कुल 21 कहानियां हैं और यदि कोई इसे गम्भीरता से पढ़ ले तो वह लेखिका को 21 तोपों की सलामी देना चाहेगा!!

एक कहानी है “मैं पुरूष हूँ” जिसमें लेखिका ने कुछ अलग ही नजरिये से एक पुरूष के मन के जकड़न को पकड़ा है। दुनिया में जिसे हम समाज कहते हैं वह कोई स्थिर रहने वाली चीज नहीं है। यह परिभाषा कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, यहां पर आकर संदेह के घेरे में आ जाता है। इंसान अपनी मर्जी से जब अपने खुद के परिवार का सत्यनाश करने पर तुला हो तो उसे कौन रोक सकता है? यहां पुरूष नहीं, बल्कि एक महिला की मनःस्थिति को लेखिका ने मानों चिमटे से पकड़कर अपनी कलम के अंदर डाल लिया हो, इस कहानी को पढ़कर कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है।

“आईने की तरह साफ जिंदगी” पढ़िए अथवा अपना “आखरी फर्ज” निभाइये, आपको तो हर कहानी में कुछ न कुछ ऐसी बातें जरूर मिल जाएंगी जिससे शायद आप परिचित न हों! हाँ, कुछ कहानियों के शीर्षक, ऐसे प्रतीत होते हैं मानों गुस्से में लिखी गयी हों। इनमें से “दोगले लोग” एक है। एक महिला का दूसरी महिला के साथ आपसी रिश्ते कभी -कभी इस कदर बिगड़ जाते हैं कि उसे अक्सर कथाओं में बयान नहीं किया जा सकता। किन्तु मीनाक्षी सिंह ने ऐसे रिश्तों को भी सामने लाया और शायद यही कारण रहा होगा कि कहानी का शीर्षक कुछ ऐसा बन गया हो।

कुल 111 पेज की यह कथा संग्रह हर्फ़ पब्लिकेशन , नई दिल्ली से प्रकाशित हुई है। किताब की कीमत मात्र 150 रुपये है तो जेब पर अधिक भार नहीं पड़ने वाला।

यहां पर हम यह कहना चाहेंगे कि एक अच्छी सी किताब को हाथ में रखने के लिए किसी भी पढ़ाकू इंसान को जेब खाली होने का भय कभी भी नहीं सताता । आखिरकार किताब इंसान के हाथों में रखा एक बाग की तरह ही तो है।

मीनाक्षी सिंह फ़ेसबुक पर हमारी मित्रों की सूची में बहुत ऊपर रही हैं। आजकी दुनिया में,खासकर हिंदी सहित्य की दुनिया में, मुँह फुला कर बैठने से बेहतर है कि लोग अपने मित्रों का खुले मन से समर्थन करें। कुछ भी रचने में समय और मेहनत लगती है। सोशल मीडिया पर एक पोस्ट भी कोई मेहनत से ही लिखता/लिखती हैं, यहां तो एक कहानी संग्रह की बात है। तो, मेहनत बर्बाद न हो इन्हीं शुभकामनाओं के साथ मीनाक्षी सिंह को बहुत बधाई ।

आप इस पुस्तक को यहाँ से ऑनलाइन ऑर्डर कर सकते हैं:

सोशल मीडिया की नकेल कसने SC पहुँची ‘पाठशाला’

ब्यूरो | नवप्रवाह डॉट कॉम 
सोशल मीडिया पर बिना पुष्टि के उपलब्ध भ्रामक तथ्य के ख़िलाफ़ राजनीति की पाठशाला नामक संस्था ने सुप्रीम कोर्ट में एक पीआईएल दाख़िल किया। गुरुवार को दाख़िल इस जनहित याचिका में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि किस तरह सोशल मीडिया पर ग़ैरज़िम्मेदाराना तथ्य प्रकाशित किए जा रहे हैं।
सोशल मीडिया पर भ्रामक लेख और इंफ़ोग्राफ़िक्स की भरमार है। जिन पर तत्काल प्रभाव से लगाम लगाने की आवश्यक्ता है। सर्च इंजन गूगल पर जाकर अगर आप विश्व में सबसे बड़े आपराधिक लोगों की सूची देखें तो आप को ऐसे नाम दिखेंगे कि आप भौचक्के रह जाएँगे। ऐसे तमाम तथ्य आप को परेशान कर सकते हैं। इस मामले पर संज्ञान लेते हुए राजनीति की पाठशाला के संस्थापक डॉक्टर अजय पाण्डेय ने गुरुवार को एक जनहित याचिका दाख़िल की, जिसमें उन्होंने ऐसे प्लैट्फ़ॉर्म्स को क़ानूनी दायरे में रखने की वकालत की। पाण्डेय ने कहा कि हमारे देश को महान विभूतियों के साथ खिलवाड़ सर्वथा अनुचित है और ऐसे लोगों पर कठोर कार्रवाई की भी आवश्यक्ता है, जो इन सब कृत्यों के पीछे हैं।
सोशल मीडिया पर नकेल न होने की वजह से कई बार साम्प्रदायिक दंगे भी हुए हैं, जिसने आम जनमानस की भारी क्षति हुई है। जिसके बाद पुलिस प्रशासन को भी भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है।