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Tuesday, September 8, 2026
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नीति आयोग की सूची में पिछड़ गया बिहार राज्य, क्या है समस्या और समाधान!

bihar election article by kapil sharma

नीति आयोग की सूची में बिहार का नाम नीचे आया है।

ये खेदजनक है, मेरी अपनी समझ, अनुभव और जानकारी से मानना है कि बिहार में अन्तराष्ट्रीय धार्मिक पर्यटन और नॉलेज इकॉनमी बनने की संभावना जितनी है, उतनी संभावना शायद ही अन्य राज्यों में हो। बिहार के आगे बढ़ने के लिए कुछ बातें जो बेहद जरुरी है।

बिहार में 38 जिले है लेकिन सारा प्रमुख कार्य पटना और उसके आस-पास हुआ है। इस केन्द्रीयकरण प्रवृत्ति से बचते हुए बिहार के मोतीहारी, गया, भागलपुर, गोपालगंज, छपरा, किशनगंज, कटिहार, नांलदा, समस्तीपुर जैसे जिलो पर व्यापक रुप से व्यवस्थित शहरीकरण और बुनियादी ढांचे को विकसित किया जाये। राष्ट्रीय व राज्य स्तर के शिक्षा, चिकित्सा व अन्य संस्थानों की स्थापना के लिए भी पटना के बाहर के जिलों को वरीयता दी जाये। विकेन्द्रीकरण बढ़ने से पटना से दबाव कम होगा और पटना से बाहर के लोगों के लिए पटना आने की मजबूरी घटेगी। क्षेत्रीय असमानता और पिछड़ापन खत्म होगा।

आस्था व संस्कृति का केंद्र बिहार

बिहार में जैन व बौद्व धर्म की उत्पति हुई है, सिख धर्म की जड़े है, हिन्दू धर्म बहुसंख्यक है। मुस्लिम सबसे बड़े अल्पसंख्यक है। बिहार में धार्मिक पर्यटन और अर्थव्यवस्था की पर्याप्त संभावना है लेकिन इस क्षेत्र में पूरी योजना के साथ विजन के साथ काम करने की आवश्यकता है।

इस क्षेत्र में सबसे ज्यादा काम होना चाहिये था। धार्मिक स्थलों को तीर्थाटन के लिए विकसित करना होगा, व्यवस्थित धर्मशालाएं, होटल, सड़क, खान-पान की सुविधा, यातायात का विकास करना होगा, आतिथ्य और सत्कार की भावना को अपनाना होगा, बेवकूफ बना कर लूट लेने की मंशा को त्यागना होगा, तंत्र सुविधाप्रदायक विकसित करना होगा। दूसरे राज्यों में रहने वाले लोगों के लिए नांलदा, केसरिया, वैशाली अजूबा है, सीतामढ़ी आस्था है और जब वे यहां आते है और उन्हें वैसा दर्शन नहीं मिलता जैसा उन्होंने सोचा था तो ये बहुत गलत संदेश जाता है।

श्रेष्ठ दिमागों को तैयार करें

बिहार के युवा जो मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, उड़ीसा, बंगाल और दिल्ली में उच्च शिक्षा के लिए जा रहे है, उनको वो उच्च शिक्षा यहीं देने के लिए बुनियादी ढांचा बनाना होगा, ऐसे में बिहार का रुपया भी बिहार से बाहर जाने से रुकेगा और इस रुपये से ही बिहार के भीतर ही शिक्षा के बुनियादी ढांचे का विकास होगा, नॉलेज इकॉनमी होने से बिहार के बाहर के लोग भी बिहार पढ़ने आयेंगे जैसे नांलदा के समय आया करते थे। बिहार भारत के श्रेष्ठ दिमागों को तैयार कर विकसित कर राष्ट्र निर्माण में भेजे, ऐसा होना चाहिए।

बिहार में जेजे स्कूल आफ आर्ट्स जैसे स्कूल खोले जाये ताकि मिथिला पेंटिग, पटना कलम को युवा पेशे के तौर पर अपना सकें। फैशन टेक्नोलॉजी, डिजाइन टेक्नोलॉजी, रिसर्च इंस्ट्रीटयूट , फिल्म इंस्टीटयूट, नाट्य संस्थान , संगीत संस्थान खोले जाये ताकि युवाओं को सरकारी बाबू बनने के अलावा कुछ और बनने और समझने का मौका मिले। नये नवाचारों का भरपूर मौका मिले।

तरीके में सुधार व सजगता की जरूरत

सबसे जरुरी बात लोगों को अपने तरीके में सुधार लाना होगा, जो भी राज्य आगे है, वे इसलिए आगे है क्योंकि वहां की जनता ज्यादा जिम्मेदार है, जनता जितनी जिम्मेदार, शासन-प्रशासन उतना प्रभावी और विजनरी हो जाता है। इंदौर का नाम या छत्तीसगढ़ के अंबीकापुर का नाम स्वच्छता में ऊपर आता है तो इसका कारण वहां के नागरिक है। इसलिए नागरिक जितने सजग, प्रगति उतनी ही ज्यादा।

ऐसे में दूसरों को मूर्ख मानने वाली ऐतिहासिक श्रेष्ठता की भावना से हटना होगा, सिविक सेंस विकसित करना होगा, सामाजिक द्वंद्व से उपजी जटिलता को छोड़कर साधारण बनना होगा, इसके अलावा लोगों को रचनात्मक रुप से कार्य करने वाला बनना पड़ेगा, अपनी कमियों में सुधार करने वाला बनना पड़ेगा और ऐसा हर व्यक्ति को करना पड़ेगा। तभी धीरे-धीरे बड़ा बदलाव आयेगा।

निश्चित तौर पर ये एक लंबी प्रक्रिया है लेकिन आज से ही शुरु किया जाये तो अगले ही कुछ वर्षो में तस्वीर कुछ और होगी।

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अभाविप काशी क्षेत्र के महानगर कार्यकारिणी का गठन, प्रभात रंजन उपाध्याय बने महानगर उपाध्यक्ष

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आज अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, काशी महानगर के “महानगर कार्यकारिणी – २०२१” की घोषणा हुई।

जिसमें दो बार से लगातार महानगर उपाध्यक्ष पद के दायित्व का निर्वाह करने वाले प्रभात रंजन उपाध्याय को पुनः इस पद पर नियुक्त किया गया है।

बता दें कि, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् ने गुरुवार को काशी क्षेत्र के नए कार्यकारिणी की घोषणा की. नई कार्यकारिणी में डॉ. उर्जस्विता सिंह को महानगर अध्यक्ष बनाया गया. वहीँ राजन गुप्ता को महानगर मंत्री का पदभार सौंपा गया है. विद्यार्थी परिषद् ने काशी क्षेत्र के कार्यकारिणी में कुल 47 सदस्यों को शामिल किया है.

महानगर अध्यक्ष बनीं डॉ.उर्जस्विता सिंह के साथ ही प्रभात रंजन उपाध्याय को महानगर उपाध्यक्ष पदभार सौंपा गया है.

कार्यकारिणी के सदस्यों के सूची इस प्रकार है-

1.महानगर अध्यक्ष – डा० उर्जस्विता सिंह जी

2.महानगर उपाध्यक्ष – प्रभात रंजन उपाध्याय

3.महानगर उपाध्यक्ष – डा० नीलम सिंह जी

4.महानगर उपाध्यक्ष – संध्या वर्मा जी

5.महानगर उपाध्यक्ष – डा० रिंकी सिंह जी

6.महानगर उपाध्यक्ष – कृष्ण कुमार सिंह जी

7.महानगर मंत्री – राजन गुप्ता जी

8.महानगर सहमंत्री – सौरभ सोनकर जी

9.महानगर सहमंत्री – मिनाक्षी मिश्रा जी

10.महानगर सहमंत्री – पायल राय जी

11.महानगर सहमंत्री – कु० शुभम सिंह जी

12.महानगर सहमंत्री – जानवी कसेरा जी

13.महानगर सहमंत्री – विपूल सेठ जी

14.महानगर सहमंत्री – युविका तिवारी जी

15.महानगर सहमंत्री – अभय शक्ति सिंह जी

16.महानगर मिडिया संयोजक – रजनीश जी

17.महानगर सोशल मीडिया संयोजक – सचिदानंद पाण्डेय जी

18.महानगर सोशल मीडिया सहसंयोजक – शिवांश मिश्रा जी

19.महानगर SFD संयोजक – रामेश्वर सिंह जी

20.महानगर SFD सह संयोजक – अखिलधर द्विवेदी जी

21.महानगर SFS संयोजक – कुंदन मिश्रा जी

22.महानगर SFS सह संयोजक – सिद्धार्थ सिंह जी

23.महानगर खेल आयाम संयोजक – प्रिया राय जी

24.महानगर खेल आयाम सह संयोजक – विकल्प शुक्ला जी

25.महानगर राष्ट्रीय कला मंच संयोजक – सुभा पाण्डेय जी

26.महानगर राष्ट्रीय कला मंच सहसंयोजक – स्वेता खरवार जी

27.महानगर राष्ट्रीय कला मंच सहसंयोजक – अंकिता जायसवाल जी

28.महानगर विश्वविद्यालय कार्य संयोजक – रवि जायसवाल जी

29.महानगर विश्वविद्यालय कार्य सहसंयोजक – मिथिलेश जी

30.महानगर महाविद्यालय कार्य संयोजक – गौरव राय जी

31.महानगर महाविद्यालय कार्य सहसंयोजक – सत्यम पटेल जी

32.महानगर इंटर कॉलेज संयोजक – गोपी किशन सिंह जी

33.महानगर इंटर कॉलेज सहसंयोजक – सत्यम सिंह जी

34.महानगर एग्रीविजन संयोजक – नितिश सिंह जी

35.महानगर एग्रीविजन सहसंयोजक – आकाश चंदेल जी

36.महानगर शोध कार्य संयोजक – रोशन कुमार जी

37.महानगर कार्यकारिणी सदस्य – संदीप सोनकर जी

38.महानगर कार्यकारिणी सदस्य – गोपाल प्रजापति जी

39.महानगर कार्यकारिणी सदस्य – अक्षय वर्मा जी

40.महानगर कार्यकारिणी सदस्य – दिपक सोनकर जी

41.महानगर कार्यकारिणी सदस्य – प्रग्या गिरी जी

42.महानगर कार्यकारिणी सदस्य – रोशनी कुमारी जी

43.महानगर कार्यकारिणी सदस्य – स्वेतांशी तिवारी जी

44.महानगर कार्यकारिणी सदस्य – आर्या अग्रहरी जी

45.महानगर कार्यकारिणी सदस्य – प्रियंका मिश्रा जी

46.महानगर कार्यकारिणी सदस्य – मनीषा दास जी

47.महानगर कार्यकारिणी सदस्य – सौम्या कुमारी जी

कवि संगम की ‘दस्तक’ में युवा कवियों ने बाँधा समां

नई दिल्ली | navpravah.com

पश्चिमी दिल्ली के रोहिणी स्थित टेक्निया सभागार में युवा कवि सम्मेलन ‘दस्तक’ का आयोजन किया गया, जिसमें देश भर से चयनित 15 युवा कवियों ने काव्य पाठ किया। यह कार्यक्रम राष्ट्रीय कवि संगम के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगदीश मित्तल के जन्मदिन के उपलक्ष में प्रत्येक वर्ष आयोजित किया जाता है।

जगदीश मित्तल की अध्यक्षता में आयोजित इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति योगेश सिंह, सम्मानित अतिथि के रूप में बाबा सत्यनारायण मौर्य, श्याम सुन्दर अग्रवाल, रोशन कंसल, संजीव गोयल, अश्वनी अग्रवाल, प्रवीण गर्ग व अन्य कई लोग उपस्थित थे।

कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्ज्वलन के साथ की गई। इस अवसर पर योगेश सिंह ने जगदीश मित्तल को जन्मदिन की शुभकामनाएं दीं और उनकी संस्था के द्वारा साहित्य जगत में किये जा रहे कार्यों की सराहना की। इसके बाद युवा कवि हरीश पटेल व शशि श्रेया के संचालन में सरस्वती वंदना के साथ कवि सम्मेलन प्रारंभ हुआ। सभी कवियों ने श्री राम पर केंद्रित कविता का पाठ कर श्रोताओं को आनंदित किया। इस दौरान छत्तीसगढ़ से आए उमाकांत टैगोर ने आज के आदमी पर शानदार कविता का पाठ किया। प्रशांत बजरंगी ने जहाँ देशद्रोहियों पर प्रहार किया, वहीं पीयूष मालवीय ने पढ़ा “कितने ही मैडल रसोइयों में कैद हैं‌”। गोपाल पांडे ने अपने ओज स्वर मे पढ़ा “बाबरी को बाबरे उजाडते चले गए”। साथ ही ऋतिका, दिव्या, वैभव अवस्थी, मधु गौड़, जीवन लाल, रोहिणी, उन्नति, अभिजीत, अंकिता, आदि ने भी श्रेष्ठतम काव्यपाठ कर खूब तालियां बटोरी।

मल्लिका रुद्रा, अशोक बत्रा के संयोजन में आयोजित इस कार्यक्रम में युवा कवियों के प्रोत्साहन के लिए मनमोहन गुप्ता, अरुण गोयल, सुनील गुप्ता, डा. जयदीप बंसल, राजीव अग्रवाल, सीताराम मित्तल सहित अनेक व्यक्ति उपस्थित थे। कार्यक्रम में देश के ओज के कवि डॉ हरिओम पंवार ने वीडियो सन्देश के माध्यम से अपनी शुभकामनाएं दीं। इस दौरान युवा कवियों के साथ साथ दर्शक दीर्घा में वरिष्ठ कवि सुदीप भोला, योगेन्द्र शर्मा, राजेश चेतन, अनिल अग्रवंशी, गजेन्द्र सोलंकी, रसिक गुप्ता, पीके आजाद, महेंद्र अजनबी, महेश शर्मा, कल्पना शुक्ला, मंजू शाक्या, बलजीत कौर, उपेंद्र पांडे, अशोक चावला, दास आरुही आनंद व अमरनाथ आदि उपस्थित थे। इस अवसर पर दिल्ली पुलिस अधिकारी पंचम दस्तक के कवि राजेन्द्र कलकल को जगदीश मित्तल काव्य पुरुस्कार से सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम के समापन में सभी आमंत्रित अतिथियों ने अपना वक्तव्य देते हुए संगम परिवार के इस प्रयास की सराहना की। कार्यक्रम के सफल आयोजन में अशोक बत्रा, महेश शर्मा, ईश्वर मित्तल, कपिल गर्ग आदि ने पूर्ण सहयोग दिया।

लखीमपुर-खीरी पर सियासत हो रही है और अभी और होनी बाकी भी है!

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बाबा साहेब आंबेडकर ने एक सभा के संबोधन में कहा था कि “लोकतंत्र का अर्थ है, एक ऐसी जीवन पद्धति जिसमें स्वतंत्रता, समता और बंधुता समाज-जीवन के मूल सिद्धांत होते हैं”

वैश्विक स्तर पर जब हम लोकतंत्र की परिचर्चा करते हैं तों तों हमें ज्ञात होता हैं कि भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र हैं पर यहां फिर वो सवाल अपने अस्तित्व की तलाश तेज कर देती हैं जिसमें वह संवैधानिक अधिनियमों का हवाला देते हुऐ भारतीय राजनेताओं के चयन पर सवाल करता है सभी जानते हैं लोकतंत्र का महत्व शासनतंत्र से प्रदर्शित होता है और शासनतंत्र की बुनियाद राजनीति से आतीं हैं जिनके संचालन का भार जनता के चुने प्रतिनिधियों यानी राजनेताओं के जिम्मे होता हैं फिर चाहे वह पक्ष में हों या विपक्ष में.. कोई भी राजनेता सत्ता सुख से विमुख नहीं होना चाहता है और तब तों बिल्कुल भी नहीं काबिज सत्ता के दुबारा मिलने की संभावना प्रबल हों.

बीते दिनों उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में घटित घटना काफी ह्दयविदारक एवं अमानवीय रहीं राजनीतिक संलिप्ताओं से भङकी इस रक्त-रंजित चिंगारी कों भारतीय संग अंतरराष्ट्रीय मीडिया नें भी काफी सुर्खियों में रखा। यह घटना जितनी दुखद रही उससे कहीं ज्यादा शर्मनाक थी..

इस घटना ने ना सिर्फ बाबा विश्वनाथ के प्रदेश की छवि धूमिल की बल्कि “विविधता में एकता” के संदेश कों सत्यापित करतीं विश्व की सबसे महान एवं प्राचीन संस्कृति पर भी कई सवाल खड़े किए। इस घटना में चार किसानों सहित 8 लोगों की मौत ने ना सिर्फ उत्तर प्रदेश सरकार बल्कि केंद्रीय नेतृत्व कों भी सवालों के घेरे में ला कर रख दिया। सरकार की तत्परता एवं न्यायिक प्रक्रिया की सजगता से प्रत्यक्षदर्शियों द्वारा चिन्हित एवं साक्ष्यों की प्रमाणिकता पर मुख्य आरोपियों कों गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में आगे की प्रक्रिया हेतु भेज दिया गया सत्तारूढ़ सरकार की शालीनता एवं उनके कियें सभी मुआवजों की जमहीनीयता भी दिखी जिसके अनुसार मृतकों के आश्रितों को 45-45 लाख रुपए और परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी तथा घायलों के परिजनों को 10-10 लाख रुपए दिए जाने थे जिसमें से मुआवजा राशि उनके परिजनों के हवाले कर दिया गयें हैं एवं बाकी के आदेश भी क्रमबद्ध होंगे..

बीते दिनों मृत किसानों की स्मृति में आयोजित अंतिम अरदास शांति पूर्ण स्वरुप में होना स्थानीय प्रशासन के लिए राहत की बूटी से कम नहीं रही.. हालांकि इसकी उम्मीद ना तो स्थानीय प्रशासन कों थी ना ही शासनतंत्र हालांकि परस्थितियों से निपटने हेतु सारे व्यापक व्यवस्था की गई थी परंतु शांतिपूर्ण ढंग से बीते कार्यक्रम बताते हैं कि सौहार्द की सौंदर्यता के समक्ष सब फीकें हैं..
लखीमपुर-खीरी की घटना से सभी वाकिफ होंगे क्यों हुआ? कैसे हुआ? किसने किया? इन सब सवालों के अब कोई मायने नहीं हैं ना हैं मैं यहां इनके जवाब देने आया हूं मेरा मानना है कि शायद ही कोई इंसान होगा जों इस ह्दयविदारक कृत से अवगत नहीं होगा फिर भी अगर अनभिज्ञ हैं तों निवेदन हैं कि इस डिजिटल युग में गुगल के रथ पर सवार हों ज्ञान की मीनार मजबूत कर सकते हैं।

अपने गन्ने की खेती एवं व्यवहारिक मधुरता के लिए मशहूर खीरी 7 तारीख के पहले भी शांत था और आज भी शांत हैं पहले की एकजुटता तंत्र के किसी कानून के विरुद्ध आंदोलन की ताकत दर्शाती थी वर्तमान एकत्रीकरण अंतिम अरदास के करुण शब्द सुनाते हैं…आज लखीमपुर-खीरी में ना कोई राजनेता हैं, ना कोई आंदोलनकारी, ना कोई मीडिया, न कोई अधिकारी.. अब हैं कुछ तो दर्द अफ़सोस, गुस्सा और कभी ना भुला देना वाला एक भयानक ज़ख्म..और एक बङा सा मौन..

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के मध्य सबसे बिफर जों चीज देखा गया लखीमपुर-खीरी में वों थी जनता के संवेदनाओं की आग में रोटी सेंकतें अति-संवेदनहीन राजनेताओं की सत्ता निहितता की भूख।
लोकतंत्र में सबकों अधिकार हैं कि आप अपनी मांगों कों मुखर स्वर में शासन के समक्ष रखें लेकिन जिस तरह की विपक्षी एकता लखीमपुर-खीरी में देखीं गयी वह निंदनीय हैं… उत्तर प्रदेश सरकार के निष्पक्ष न्यायिक जांच के लिए सहमत होनें के बावजूद भी किसानों कों उकसाना, तरह-तरह की अनुचित मांगों के लिए धरना प्रदर्शन कर उग्र करना उन्हें स्थानीय प्रशासन के विरुद्ध करना सुलझें अर्थों में बताता हैं कि चुनाव नजदीक हैं एवं इस मुद्दे के द्वारा विपक्षी दल वर्तमान सरकार कों घेरकर अपने राजनीतिक लाभों को सिद्ध करने में जुट हुआ हैं…

सियासत हों रहीं हैं और अभी और होने बाकी भी है. हालांकि इस मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए सत्ताधारी दल की भूमिका समझदारी भरी रहीं हैं द्वारा राहत घोषणा, मुआवजा राशि, नामजदों पर एफआईआर अभियुक्तों की गिरफ्तारी जाहिर करतीं हैं कि प्रशासन का रवैया साफ हैं हालांकि इसकी संदर्भता आगामी विधानसभा चुनाव भी हों सकती हैं परंतु इन्हीं रवैयों ने जनता कें बीच न्याय की उम्मीद जगा रखीं हैं.. अपनों से विमुख हो चुकें लोगों के लिए संपूर्ण एवं उचित न्याय हीं एकमात्र आसरा हैं उनके जख्मों पर मरहम लगाने शायद इसी का नतीजा था कि जिस अंतिम अरदास में उम्मीद लगाई जा रही थी हंगामों की वह शांतिपूर्ण बीता। स्थानीय निवासी राजनीतिक मायाजाल से दूर हों अपनी एक नयी शुरुआत करना चाहते हैं।

लखीमपुर-खीरी जैसी घटनाएं अपने अंदर कई सबक लेकर आतीं हैं यह हमें हमारे समाज में छुपे राजनीतिक संरक्षणों में पल-बढ़ रहे आपराधिक तत्वों को भी दिखातीं हैं तों उन पर शिकंजा कसतें हमारे कानून व्यवस्था की मजबूती कों भी दिखती हैं, यह एक ओर हमारे प्रशासनिक तंत्र को नुकसान पहुंचाती दलगत पक्षपात कों दिखाती हैं तों वहीं दूसरी ओर शासन-प्रशासन एवं राज्य सरकार की एकजुटता से त्वरित कार्रवाई कर शांति बहाल करने के तरीकों को भी दर्शाती हैं..
उत्तर प्रदेश सरकार के लिए चुनौतियां कम नहीं हैं एक ओर विपक्षी गठजोङों कों कमजोर करना वहीं दूसरी ओर शांति व्यवस्था कों बनाते हुए दुबारा सिंहासन पर विराजमान होना..

उम्मीदों कें सफ़र में गन्ने का यह क्षेत्र भी आगे बढ़ेगा एवं इन कङवी यादों कों पीछे छोड़ नयीं उर्जा के संग सौहार्द, सद्भावना, मिठास के साथ एक नयी सुबह का स्वागत करेंगा.

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अपनी ही पार्टी का विरोध कर रहे भाजपा सांसद को मिला ‘शिवसेना’ का साथ!

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पिछले कुछ समय से अपनी ही पार्टी पर निशाना साध रहे सांसद वरुण गांधी को अब शिवसेना का साथ मिल गया है। वरुण गांधी किसानों के मुद्दे पर लगातार भाजपा के विरोध में स्वर बुलंद करते देखे गए हैं। गत दिनों लखीमपुर खीरी में हुई हिंसा को लेकर वे काफी नाराज़ नज़र आए। शिवसेना ने मौके का फायदा उठाते हुए वरुण के सुर में सुर मिला दिया है। शिवसेना ने वरुण के बागी रुख पर टिप्पणी की, सेना ने कहा कि इंदिरा के पोते का खून उबाल गया है।

उत्तर प्रदेश के पीलीभीत से भाजपा सांसद वरुण गाँधी की बेबाकी की तारीफ करते हुए शिवसेना के मुखपत्र सामना में लिखा गया कि वरुण पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के पोते और संजय गाँधी के पुत्र हैं। लखीमपुर खीरी में हुई किसानों की हत्या को लेकर उनका खून खौल उठा है और उन्होंने बड़ी बेबाकी से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की। सामना ने लिखा कि अपने विचार व्यक्त करते हुए वरुण ने किसी भी परिणाम के बारे में नहीं सोचा, यह उनके साहस का प्रतीक है।

सामना वरुण गाँधी की तो जमकर तारीफ की, साथ ही बाकी सांसदों को घेरा भी। सामना में लिखा गया कि लखीमपुर खीरी में चार किसानों की हत्या हो गई और सांसदों का मुँह नहीं खुल रहा। मुखपत्र ने किसान नेताओं से वरुण की सराहना करते हुए एक प्रस्ताव पारित करने की मांग भी की।

गौरतलब है कि भाजपा सांसद वरुण गांधी पिछले कुछ समय से किसानों के मुद्दे पर लगातार अपनी राय रख रहे हैं। पिछले दिनों उन्होंने लखीमपुर खीरी में हुई हिंसक घटना को लेकर अपनी ही पार्टी पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने घटना से जुड़ा वीडियो साझा करते हुए दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की भी मांग की। वरुण गांधी ने पिछले दिनों ट्वीट करते हुए लिखा था कि लखीमपुर खीरी की घटना को हिन्दू बनाम सिख की लड़ाई बनाने की एक कोशिश हो रही है। यह न सिर्फ अनैतिक व गलत असर डालने वाली है बल्कि ऐसी कोई रेखा खींचना और उनके घावों को हरा करने का प्रयास करना खतरनाक है, जिन्हें ठीक होने में पीढ़ियां खप गईं। हमें राजनीतिक फायदे के लिए राष्ट्रीय एकता को ताक पर नहीं रखना चाहिए।

लखीमपुर खीरी हिंसा को लेकर वरुण गांधी के बगावती तेवर अपनाने के बाद उन्हें और उनकी मां मेनका गांधी को भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी से बाहर कर दिया गया। गौरतलब है कि बीते दिनों लखीमपुर खीरी जिले के तिकोनिया क्षेत्र में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा के बेटे आशीष मिश्रा ने कथित रूप से प्रदर्शनकारी किसानों पर गाड़ी चढ़ा दी थी। इस हिंसक घटना में आठ लोगों की मौत हो गई थी। इनमें 4 किसान, 3 भाजपा कार्यकर्ता और एक पत्रकार शामिल थे। इस मामले में आशीष मिश्रा सहित कुल 3 लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार किया है।

डॉ साकेत रमण बने आचार्य भरत मुनि संचार शोध केंद्र के समन्वयक

 

मोतिहारी | navpravah.com

महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय मोतिहारी के आचार्य भरत मुनि संचार शोध केंद्र का समन्वयक, मीडिया अध्ययन विभाग के सहा. आचार्य व मीडिया गुरु डॉ. साकेत रमण को बनाया गया है। यह शोध केंद्र मीडिया एवं भारतीय संचार परम्परा केंद्रित उत्तर भारत का प्रथम संचार शोध केन्द्र है। शोध केंद्र की स्थापना इसी वर्ष फरवरी माह में विश्वविद्यालय द्वारा की गई थी।

डॉ. रमण ने बताया कि यह शोध केंद्र कुलपति प्रो. संजीव कुमार शर्मा की प्रेरणा से भारतीय संचार परम्परा के महत्तम व्यक्तित्वों पर केंद्रित वैयक्तिक अध्ययन कर संचार क्षेत्र में उनके अवदानों को रेखांकित करने को कटिबद्ध है। भारतीय संचार मीमांसा को केन्द्र, पुस्तक एवं शोध आलेखों के रूप में भी प्रकाशित कराएगा तथा बिहार एवं चंपारण केंद्रित पुरातन संचार उपयोगी अध्ययन कार्य के संपादन के साथ-साथ दो शोधार्थियों को पीएचडी भी कराएगा।

विश्वविद्यालय प्रशासन ने शोध केंद्र के पूर्व समन्वयक, मीडिया अध्ययन विभाग के डॉ. अंजनी कु. झा के स्थान पर डॉ. साकेत रमण को यह दायित्व प्रदान किया है। विश्वविद्यालय के ओएसडी एडमिन प्रो. राजीव कुमार, प्रॉक्टर प्रो. प्रणवीर सिंह, डॉ नरेंद्र सिंह, जनसंपर्क अधिकारी शेफालिका मिश्रा, कुलपति की निज सचिव कविता जोशी, अनुभाग अधिकारी दिनेश हुड्डा एवं मीडिया अध्ययन विभाग के डॉ. अंजनी कुमार झा, डॉ. परमात्मा कुमार मिश्र, डॉ. सुनील घोडके, डॉ. उमा यादव ने शुभकामनाएं दी।

यूपी में TATA एयरबस का लगेगा प्लांट, केंद्र से हुई 22 हजार करोड़ रुपये की डील

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उत्तर प्रदेश में मेक इन इंडिया के तहत बड़े निवेश की तैयारी है। दरअसल यहां टाटा एयरबस का प्लांट लगेगा।

जानकारी के अनुसार केंद्र से 22 हजार करोड़ रुपए की डील हो चुकी है। अब यूपी में टाटा समूह सैन्य विमानों का निर्माण करेगा। बता दें टाटा समूह देश की पहली निजी कंपनी होगी, जो मेक इन इंडिया के तहत सैन्य विमानों का निर्माण करेगी। टाटा समूह अब तक इन सैन्य विमानों को हैदराबाद या बेंगलुरु में तैयार करने की योजना बना रहा था। लेकिन अब टाटा समूह इस योजना के लिए उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों का भी रुख कर रहा है।

अगले 10 वर्षों में 48 विमान बनाएगी टाटा कंपनी

सैन्य परिवहन में इस्तेमाल होने वाले इन एयरबस को केंद्र सरकार ने अनुमति दे दी है। इस परियोजना के तहत इंडियन एयर फोर्स को 56 एयरबस मिलेंगे। केंद्र सरकार और टाटा समूह के साथ हुए करार के तहत स्पेन से 48 माह के अंदर 16 परिवहन विमान भारत आएगा। 60 दशक के बाद यह भारत का पहला यूरोपियन फर्म से रक्षा अनुबंध समझौता है। अगले 10 वर्षों में शेष 48 विमानों का निर्माण टाटा कंसोर्टियम कंपनी मेक इन इंडिया के तहत सैन्य विमानों का निर्माण करेगी।

6 साल पहले योजना पर बनी थी सहमति

केंद्र और टाटा ग्रुप में 6 साल पहले ही इस परियोजना पर सहमति बन गई थी। टाटा द्वारा तैयार किए जा रहे सी-295 एक बहु भूमिका परिवहन वाला विमान होगा। इस विमान से अधिकतम पे-लोड क्षमता 9.25 टन है। इस विमान की खासियत होगी कि यह छोटे रनवे वाले एयरपोर्ट पर भी आसानी से उतर व उड़ान भर सकता है। सभी 56 विमान स्वदेशी इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट के साथ स्थापित किए जाएंगे। यह परियोजना भारत में एयरो स्पेस पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देगी।

6 हजार से अधिक लोगों को मिलेगा रोजगार

यह एयरक्राफ्ट, टाटा और एयरबस मिलकर भारत में बनाएगी। यह पहला मौका है जब मिलिट्री एविएशन से जुड़ा कोई कॉन्ट्रैक्ट देश की किसी निजी कंपनी को दिया गया है। इससे आने वाले वर्षों में देश में 6,000 से ज्यादा रोजगार पैदा होने की उम्मीद है। साथ ही इससे देश में एविएशन की अत्याधुनिक तकनीक आएगी।

कोस्ट गार्ड और दूसरी एजेंसियां भी दे सकती हैं ऑर्डर

देश में 2012 से ही 56 C295MW ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट की दिशा में काम चल रहा है लेकिन इस साल फरवरी में यह मामला कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) के पास पहुंचा था। कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) ने नए मिलिट्री ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट की खरीद को हरी झंडी दे दी है। माना जा रहा है कि 16 विमान एयरबस डिफेंस (स्पेन) से आयात किए जाएंगे जबकि बाकी विमान 10 साल में टाटा की फैसिलिटी में तैयार किए जाएंगे। यह भी कहा जा रहा है कि कोस्ट गार्ड और दूसरी एजेंसियां भी इस तरह के विमानों के लिए ऑर्डर दे सकती हैं जिससे इनकी मांग बढ़ने की उम्मीद है। सूत्रों के मुताबिक भारत में बने C295MW विमानों को निर्यात किया जा सकता है क्योंकि यह एक किफायती प्रोजेक्ट हो सकता है।

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इंडियन आर्मी को मिलेगा ‘हंटर किलर’ अर्जुन मार्क 1ए टैंक, सरकार ने दिया ऑर्डर

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लम्बे इन्तजार के बाद गुरुवार को रक्षा मंत्रालय ने ‘मेक इन इंडिया’ पहल को और बढ़ावा देते हुए भारतीय सेना के लिए स्वदेशी 118 मुख्य युद्धक टैंक अर्जुन एमके 1ए की आपूर्ति के लिए ऑर्डर दे दिया है।

7,523 करोड़ रुपये का यह आदेश ऑर्डिनेंस फैक्टरी बोर्ड (ओएफबी) की हैवी व्हीकल फैक्टरी, अवाडी (तमिलनाडु) को दिया गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसी साल की शुरुआत में 14 फरवरी को चेन्नई के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे को पहला टैंक सौंपा था।

इससे लगभग 8,000 लोगों को मिलेगा काम

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) ने 23 फरवरी को 14 हजार करोड़ रुपये से अधिक के खरीद प्रस्तावों को मंजूरी दी थी, जिसमें 118 स्वदेशी अर्जुन मार्क-1ए टैंक भी शामिल हैं। टैंकों का उत्पादन आदेश जारी होने से मध्यम एवं लघु उद्योग में लगभग 8,000 लोगों को रोजगार के अवसर मिलेंगे। यह अत्याधुनिक रक्षा प्रौद्योगिकियों में स्वदेशी क्षमता का प्रदर्शन करने वाली एक प्रमुख परियोजना होगी। एमबीटी अर्जुन एमके-1ए को दो साल (2010-12) के भीतर डीआरडीओ की अन्य प्रयोगशालाओं के साथ कॉम्बैट व्हीकल रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टाब्लिशमेंट (सीवीआरडीई) ने डिजाइन और विकसित किया है। जून, 2010 से विकास गतिविधियां शुरू हुईं और जून 2012 में टैंक को उपयोगकर्ता परीक्षणों के लिए मैदान में उतारा गया।

सेना के सुझाव पर 72 तरह के सुधार किये गए

पूरी तरह से स्वदेशी इस टैंक को पहली बार 2004 में भारतीय सेना में शामिल किया गया था। मौजूदा समय में सेना के पास अर्जुन टैंक की दो रेजिमेंट हैं, जिन्हें जैसलमेर में भारत-पाकिस्तान की सीमा पर तैनात किया गया है। अर्जुन टैंक का इस्तेमाल करने के दौरान सेना को कई तरह के अनुभव हासिल हुए। इनके आधार पर सेना ने इसके उन्नत वर्जन के लिए कुल 72 तरह के सुधारों की मांग की। डीआरडीओ ने सेना के सुझावों को शामिल करते हुए हंटर किलर टैंक तैयार किया। इसके बाद भी सेना ने इस टैंक में कुछ और सुधार की मांग की थी। इसके बाद डीआरडीओ ने करीब 14 नए फीचर्स को टैंक में शामिल करके 4 टैंक तैयार किए।

प्रधानमंत्री कर चुके हैं अर्जुन टैंक की सवारी

पीएम मोदी जब नवम्बर, 2019 में सैनिकों के साथ दिवाली मनाने पाकिस्तान से लगी जैसलमेर (राजस्थान) के लोंगेवाला सीमा पर गए थे तो उन्होंने जिस अर्जुन टैंक की सवारी की थी, उसी का यह उन्नत संस्करण एमके-1ए है। उन्नत संस्करण अर्जुन मार्क-1ए ने 2020 में सभी परीक्षण पूरे कर लिए थे लेकिन सरकार से मंजूरी मिलने का इंतजार था। पीएम नरेन्द्र मोदी ने जब 14 फरवरी को चेन्नई के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे को डीआरडीओ अध्यक्ष डॉ. जी सतीश रेड्डी की मौजूदगी में पहला अर्जुन मार्क-1ए मुख्य युद्धक टैंक (एमबीटी) सौंपा, तभी उत्पादन के लिए औपचारिक आदेश देने का रास्ता साफ हो गया था।

इन टैंकों के लिए सेना बनाएगी 2 नई रेजीमेंट

टैंक का निर्माण अवाडी (तमिलनाडु) स्थित ऑर्डिनेंस फैक्टरी बोर्ड (ओएफबी) के हैवी व्हीकल फैक्टरी में किया जाएगा। सरकार से अनुबंध पर हस्ताक्षर होने के 30 महीनों के भीतर पांच एमबीटी का पहला बैच सेना को सौंप दिया जाएगा। डीआरडीओ के एक सीनियर अधिकारी ने बताया कि अब कुल 118 नए टैंक बनाए जाएंगे। भारतीय सेना अब इस टैंक की दो और रेजीमेंट बनाने वाली है जो अगले छह महीनों में सेना में शामिल कर ली जाएंंगी। प्रत्येक रेजीमेंट में 59 अर्जुन टैंक होंगे। 17 साल पहले सेना में शामिल किए गए 124 ‘अर्जुनों’ की तुलना में मार्क-1ए टैंक में बेहतर मारक क्षमता, गतिशीलता और सुरक्षा है।

अर्जुन मार्क-1ए टैंक है एंटी टैंक ग्रेनेड और मिसाइल से सुरक्षित

नए उन्नत वर्जन में इसकी फायर पावर क्षमता को काफी बढ़ाया गया है। साथ ही इसमें एकदम नई तकनीक का ट्रांसमिशन सिस्टम लगाया गया है। यह टैंक अपने लक्ष्य को स्वयं तलाश करने में सक्षम है। यह स्वयं तेजी से आगे बढ़ते हुए दुश्मन के लगातार हिलने वाले लक्ष्यों पर भी सटीक प्रहार कर सकता है। टैंक में कमांडर, गनर, लोडर व चालक का क्रू होगा। इन चारों को यह टैंक युद्ध के दौरान भी पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करेगा। टैंक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि रणक्षेत्र में बिछाई गई माइंस को साफ करते हुए आसानी से आगे बढ़ सकता है। कंधे से छोड़ी जाने वाले एंटी टैंक ग्रेनेड और मिसाइल का इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। यह टैंक विशेष रूप से भारतीय परिस्थितियों के लिए कॉन्फ़िगर और डिज़ाइन किया गया है और इसलिए यह प्रभावी तरीके से सीमाओं की रक्षा के लिए तैनाती के लिए उपयुक्त है।

दिन और रात में कर सकता है दुश्मन से मुकाबला

इसके अलावा केमिकल अटैक से बचाने के लिए इसमें विशेष तरह के सेंसर लगे हैं। केमिकल या परमाणु बम के विस्फोट की स्थिति में इसमें लगा अलार्म बज उठेगा। साथ ही टैंक के अंदर हवा का दबाव बढ़ जाएगा ताकि बाहर की हवा अंदर प्रवेश न कर सके। क्रू मेंबर के लिए ऑक्सीजन के लिए बेहतरीन फिल्टर लगाए गए हैं। यह दिन और रात की परिस्थितियों में और स्थिर और गतिशील दोनों मोड में दुश्मन से मुकाबला कर सकता है। इसके अलावा इसमें कई नए फीचर्स शामिल किए गए हैं, जो इस टैंक को न केवल बेहद मजबूत बनाते हैं बल्कि सटीक प्रहार करने में इसका कोई सानी नहीं है।

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जल जीव जंगल के लिये संकल्पित भूमिजा फाउंडेशन का हिन्दी दिवस के अवसर पर ऑनलाइन आयोजन

Hindi Diwas bhoomija doundation online seminar

भूमिजा फाउंडेशन के संस्थापक एवं लघु फ़िल्म निर्माता निर्देशक रवीन्द्र चौहान ने कहा हिन्दी बोलते समय हम स्वयं को अपमानित महसूस करने लगते जबकि अपनी मातृभाषा की अनुभूति अलहदा है।

जल जीव जंगल जीवन के लिय संकल्पित भूमिजा फाउंडेशन ने राजभाषा हिन्दी दिवस के अवसर पर ऑनलाइन संगोष्ठी एवं द्वितीय राष्ट्रीय सजग प्रहरी सम्मान २०२१ का आयोजन किया।

मुख्यातिथि के रूप में उपस्थित लेखक, निर्देशक ,अभिनेता डाॅ.आलोक सोनी ने संगोष्ठी में कहा हिन्दी विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है। हिंदी वर्तमान में भारत के अलावा पाकिस्तान, भूटान, नेपाल, बांग्लोदश, श्रीलंका, मालदीव, म्यांमार, इंडोनेशिया, सिंगापुर, थाईलैंड, चीन, जापान, ब्रिटेन, जर्मनी, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका, मॉरिशस, यमन, युगांडा और त्रिनाड एंड टोबैगो, कनाडा , में बोली जाने वाली भाषा है , 188 देशों के कुछ विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जाती है , हिंदी विश्व में , सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है।”

भूमिजा फाउंडेशन के संस्थापक एवं लघु फ़िल्म निर्माता निर्देशक रवीन्द्र चौहान ने कहा हिन्दी बोलते समय हम स्वयं को अपमानित महसूस करने लगते जबकि अपनी मातृभाषा की अनुभूति अलहदा है। हिन्दीभाषा/मातृ भाषा में उल्लेखनीय करने वाले व्यक्तियों को फाउंडेशन सम्मानित करता है।

वर्ष २०२० से आरम्भ हुए प्रथम सम्मान प्रख्यात फ़िल्म अभिनेता अखिलेन्द्र मिश्र को दिया गया था। वर्ष २०२१ के हिन्दी सजग प्रहरी सम्मान रंगमंच व फ़िल्म अभिनेता हेमन्त पाण्डेय एवं हिन्दी साहित्य मनीषी शिक्षक डॉ .कुश चतुर्वेदी को ऑनलाइन माध्यम से देकर सम्मानित कर रहे है।

अध्यक्षता करते हुए अध्यक्ष ध्रुव पुरवार ने कहा मातृभाषा को समृद्ध करने के लिये हम भविष्य में ,भाषा को समृद्ध करने के उद्देश्य से ,अच्छे समाज के निर्माण व भारतीय संस्कृति को मजबूत करने के लिये अच्छी सामाजिक विषयों पर लघु फिल्मों का निर्माण करते रहेगें।

इस संगोष्ठी व सम्मान कार्यक्रम में निर्देशक अशोक मेहरा, फिल्मलेखक निर्देशक विजय तिवारी ,वृक्षमित्र रंजीत सिंह यादव , नृत्य गुरु शीलेन्द्र प्रताप सिंह ने भी विचार रखे ‌।

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मिथिला में मनाए जाने वाले इस पर्व के बारे में आप जानते हैं ?

नितीश कुमार मिश्र | नवप्रवाह डॉट कॉम 

मिथिलांचल अपनी सभ्यता, संस्कृति व पर्व-त्योहारों की पुनीत परंपरा को लेकर सदैव ही प्रसिद्ध रहा है। यौगिक काल से ही मिथिलांचल में पर्व-त्योहारों की अलौकिक परम्परा रही है। इन पर्वों में धार्मिक व ऐतिहासिक मान्यताएं तथा प्रकृति उपासना जुड़ी रहती है। यही मान्यताएं हमारी सांस्कृतिक चेतना को अक्षुण्ण रखती है।भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि (चौठ) को गणेश चतुर्थी मनाई जाती है और इसी दिन शाम में पूजा की जाती हैं चौठचन्द्र की जिसे हम आम बोल चाल की भाषा में चौरचन भी कहते हैं।

इस तिथि को चंद्रमा को देखना दोष है। इसलिए पूरे भारत में इस दिन चंद्रमा का दर्शन करने से लोग परहेज करतें हैं। माना जाता हैं कि इस दिन का चंद्र दर्शन मिथ्या कलंक देने वाला होता है, लेकिन मिथिलांचल का क्षेत्र ही एकमात्र ऐसा क्षेत्र है, जहां इस पर्व को भरपूर उत्साह से पूजा-अर्चना कर मनाया जाता है। लोग चंद्रमा के दर्शन करते हैं ¨सह प्रसेन…मंत्र पढ़ते हुए उन्हें अर्घ्य देते हैं।

मान्यता के अनुसार, चांद ने भगवान गणेश की सूरत देख उनका मजाक उड़ा दिया था। इससे गणपति क्रोधित हो उठे थे एवं उन्होंने चंद्रमा को श्राप दिया कि आज की रात अगर किसी ने तुम्हारी सूरत देख ली, तों वह किसी माध्यम से कलंकित हों जायेगा। इस से भयभीत चंद्रमा ने गणपति से क्षमा मांगी पर वह नहीं मानें। फिर शुक्ल पक्ष चतुर्थी को उन्होंने विधिवत गणपति की पूजा की फिर उनकी पूजा से प्रसन्न होकर उन्होंने ने अपने श्राप से मुक्त किया और वरदान दिया कि आज के दिन जो भी व्यक्ति मेरे साथ साथ चंद्रमा की पूजा करेंगा वह कलंक के प्रभाव से मुक्त हो जायेगा। बारिश एवं बादलों से घिरे चंद्रमा के दर्शन इस दिन काफी मुश्किल भरे होते हैं।
इससे संबंधित एक कहावत मिथिला में काफी प्रचलित भी है। जैसे इस दिन चंद्रमा थोड़ी देर रहकर बादलों में छुप जाते हैं, वैसे ही जब कोई व्यक्ति बहुत दिनों बाद मिलता हैं तो कहा जाता है “अलखख चांद”।

एक कहानी और है जिसके अनुसार 16वीं शताब्दी से ही मिथिला में ये लोक पर्व मनाया जा रहा है। मिथिला नरेश महाराजा हेमांगद ठाकुर के कलंक मुक्त होने के अवसर पर महारानी हेमलता ने कलंकित चांद को पूजने की परंपरा शुरु की, जो बाद में मिथिला का लोकपर्व बन गया है।

सूर्यास्त होने और चंद्रमा के प्रकट होने पर घर के आंगन में सबसे पहले अरिपन (मिथिला में कच्चे चावल को पीसकर बनाई जाने वाली अल्पना या रंगोली) बनाया जाता है। उस पर पूजा-पाठ की सभी सामग्री रखकर गणेश तथा चांद की पूजा करने की परंपरा है। इस पूजा-पाठ में कई तरह के पकवान जिसमें खीर, पूड़ी, पिरुकिया (गुझिया) और मिठाई में खाजा-लड्डू तथा फल के तौर पर केला, खीरा, शरीफा, संतरा आदि चढ़ाया जाता है।

चौरचन पूजा यहां के लोग सदियों से इसी अर्थ में मनाते आ रहे हैं। पूजा में शरीक सभी लोग अपने हाथ में कोई न कोई फल जैसे खीरा व केला रखकर चांद की अराधना एवं दर्शन करते हैं। चैठचंद्र की पूजा के दैरान मिट्टी के विशेष बर्तन, जिसे मैथिली में छाछी कहते हैं, में दही जमाया जाता है। इस दही का स्वाद विशिष्ट एवं अपूर्व होता है।

घर की बुजुर्ग स्त्री या व्रती महिला आंगन में बांस के बने बर्तन में सभी सामग्री रखकर चंद्रमा को अर्पित करती हैं, यानी हाथ उठाती हैं। इस दौरान अन्य महिलाएं गाना गाती हैं ‘पूजा के करबै ओरियान गै बहिना, चौरचन के चंदा सोहाओन।’ यह दृश्य अत्यंत मनोरम होता है।

माता सीता के इस देश में प्रकृतिक पूजन की परंपरा आधुनिक युग से चलती आ रही है। चाहें वह छठ पर्व में भगवान भास्कर को अर्घ्य देना हो, चौरचन में शापित चंद्र को पूजना या फिर कार्तिक पूर्णिमा में “कोजागर” मनाना
किंवदंती एवं कहानियों के इस देश में आस्था भी भरपूर है। छोटी-छोटी कहानियों से उत्पन्न यह सभी पर्व-त्यौहार हमारे लिए कुछ नवीन ज्ञान लेकर आते हैं।