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Tuesday, September 8, 2026
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एक साधारण किसान परिवार में जन्म, फिर वकालत के क्षेत्र में सुप्रीम कोर्ट तक परचम, राजस्थान की राजनीति में मचाया धमाल और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल बनने से लेकर अब उपराष्ट्रपति तक का सफर.. जानिए NDA प्रत्याशी जगदीप धनखड़ की पूरी कहानी…

जब भाजपा ने राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार के रुप मे जनजातीय समुदाय से आने वाली महिला प्रत्याशी के रूप में द्रौपदी मूर्मु के नाम की घोषणा की थी तभी से उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के नामों पर चर्चा तेज हो गई थी। सब इसी सोच में उलझे थे कि NDA गठबंधन के उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार कौन होगा क्या वह पिछङा वर्ग से होगा, अल्पसंख्यक होगा वगैरह वगैरह कुछ नाम पर चर्चा का बाजार भी काफी गर्म था कभी केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद पर कयास लगाए जा रहे थे तो कभी पूर्व केंद्रीय मंत्री मुख़्तार अब्बास नकवी पर लेकिन इन सभी सवालों पर आज विराम लग गया जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने एनडीए गठबंधन के उपराष्ट्रपति पद प्रत्याशी के रूप में जगदीप धनखड़ का नाम लिया, जी हां वर्तमान में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल के रूप मे पदस्थापित जगदीप धनखड़ को NDA गठबंधन ने अपना उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया हैं।

वर्तमान में जगदीप धनखड़ पश्चिम बंगाल के राज्यपाल हैं

जगदीप धनखड़, ममता बनर्जी एवं धनखड़ की पत्नी

जगदीप धनखड़ वर्तमान में पश्चिम बंगाल में राज्यपाल हैं 30 जुलाई 2019 को भारत के महामहिम राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद जी के द्वारा उन्हें पश्चिम बंगाल का राज्यपाल नियुक्त किया गया था। राज्यपाल बनने के बाद वह काफी सुर्खियों में भी रहें अपने बयानों और कुछ अनुशासनात निर्णय की वजह से, चूंकि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का शासन है और वहां राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी हैं विचारधारा मतभेदों के कारण ममता से धनखड़ की हमेशा से ठनी रही कभी बनी हैं। इस दौरान उनकी माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी से घनिष्ठता और भी बढ़ी शायद यह दोनों एक अहम कारण हों सकते हैं जिनका उन्हें यह इनाम मिला।

जगदीप धनखड़ और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

जगदीप धनखड़ का प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

जगदीप धनखड़ का जन्म राजस्थान के झूंझनू जिलें के किठाना गांव में 18 मई 1951 में हुआ था। उनके माता पिता का नाम स्वर्गीय गोकल चंद और केसरी देवी हैं। उनका जन्म एक किसान परिवार में हुआ। वह तीन भाई और एक बहन है, वह राजस्थान के जाट समाज से आते हैं। उन्होंने कक्षा 1 से कक्षा 5 तक की पढ़ाई प्राथमिक सरकारी विद्यालय किठाना से की आगे की शिक्षा के लिए वह 1962 में सैनिक स्कूल चित्तौड़गढ़ चले गए। उसके बाद उन्होंने जयपुर के महाराज कॉलेज से भौतिक विज्ञान में स्नातक की डिग्री प्राप्त की तथा उसके बाद उन्होंने राजस्थान विश्वविद्यालय से एलएलबी की पढ़ाई की।

वकालत, करियर और सामाजिक क्षेत्र

पढ़ाई पूरी होने के बाद उन्होंने वकालत की शिक्षा को अपने आगामी करियर के रूप में आगे बढ़ाने की सोची वह वकालत करते करते देश के शीर्ष एवं अग्रणी वकीलों की सूची में शामिल हुए। वह राजस्थान हाईकोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करते थे,1987 में वह सबसे कम उम्र के राजस्थान उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन के अध्यक्ष चुने गए। 1988 में वह राजस्थान बार काउंसिल के निर्वाचित सदस्य बने। इन्होंने सामाजिक क्षेत्र में भी काफी उत्कृष्ट कार्य किया एवं राजस्थान में जाटों को आरक्षण दिलाने में एक अहम भूमिका निभाई थी।

राजनीतिक जीवन कैसा रहा।

साल 1989 में जगदीप धनखड़ ने राजनीति में प्रवेश किया एवं भाजपा के समर्थन से जनता दल के टिकट पर झूंझनू लोकसभा से चुनाव लड़ें और जीत कर पहली बार संसद तक का सफर तय किया। 1990 में चंद्रशेखर के नेतृत्व वाली अल्पमत सरकार में केन्द्रीय मंत्री बने और जब पी०वी० नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने कांग्रेस में जाना मुनासिब समझा और अजमेर लोकसभा सीट से उसी साल चुनाव लङा लेकिन यहां हार का सामना करना पड़ा। 1993-1998 तक वह कांग्रेस पार्टी से ही अजमेर की किशनगढ़ सीट से विधायक रहे। लेकिन जब राजस्थान की राजनीति में अशोक गहलोत का प्रभाव बढ़ने लगा तब जगदीप धनखड़ ने कांग्रेस से किनारा किया एवं साल 2003 में वह भाजपा में शामिल हों गयें एवं जल्दी ही वसुंधरा राजे के करीबी नेताओं की सूची में भी अपना स्थान बना लिया। इसके बाद 30 जुलाई 2019 को उन्होंने पश्चिम बंगाल के 28वें राज्यपाल के रूप में अपना कार्यभार संभाला और अब वह उपराष्ट्रपति पद के लिए NDA उम्मीदवार के रुप में नामित किए गए

बतौर पश्चिम बंगाल के राज्यपाल रहते हुए इनके विवाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से हमेशा सुर्खियों में छाई रही।एक कार्यक्रम में उन्होंने यह भी कहा कि पश्चिमी बंगाल में लोकतंत्र नहीं हैं बल्कि एक शासकीय राज हैं। पश्चिम बंगाल चुनाव के दौरान और चुनाव जीतने के बाद जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और बीजेपी के कार्यकर्ताओं की हत्याएं होती रही उन सभी मुद्दों पर भी जगदीप धनखड़ ने बेबाकी से मुखङ हो कर अपनी बातों को सबसे साझा किया एवं ममता सरकार के विरोध में खड़े रहे। ममता सरकार की ग़लत नीतियों एवं सरकारी तंत्रों में हो रही पदाधिकारियों की कर्तव्य अनियमितता पर भी वह सोशल मीडिया पर सदैव सरकार के खिलाफ खङे दिखें, अपने सरकारी तंत्रों के विरुद्ध उजागर होते इन कलापों को देखते हुए ममता बनर्जी ने राज्यपाल जगदीप धनखड़ को Twitter पर ब्लांक कर दिया तथा राष्ट्रपति से उनके बदलाव की भी मांग कर डाली।

उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए नामांकन की अंतिम तिथि 19 जुलाई को होगी, मतदान की तारीख 6 अगस्त को हैं एवं शपथ ग्रहण समारोह 11 अगस्त को होंगी।

“स्वयं धर्मस्वरूप प्रमुख स्वामी जी महाराज का धर्माचरण” -साधु अमृतवदनदास जी

राम रावण युद्ध शुरू हो रहा था। तुरही बज रही थी। युद्ध के शौर्य के ढोल जोर जोर से बज रहे थे जिससे कायर भी बहादुर बन गए थे ।

पूरा वातावरण वीर रस से प्रचुर था। शूरवीरों की छाती गज से फूल रही थी । सभी युद्ध के लिए तैयार थे। उस समय विभीषण ने देखा कि रावण एक बहुत बड़े रथ पर खड़ा है और उसकी मूंछों को तान रहा था । जब उन्होंने भगवान राम की ओर देखा तो वे निर्भय होकर पादुका पहने जमीन पर खड़े थे। विभीषण ने अधीर होकर राम से कहा, ‘ आपके पास रथ नहीं है, आपके पास ढाल नहीं है, तो आप युद्ध कैसे जीतेंगे ?’ तब श्रीराम ने कहा, ‘जिस रथ से विजय प्राप्त होती है वह दूसरा रथ होता है। उनके शौर्य, धीर्य नाम के दो पहिए हैं। सच्चाई और शील का एक मजबूत बंधन है। बल, विवेक, दम – इन्द्रीयनिग्रह और परपकाररूपी उसके चार घोड़े हैं। वह क्षमा, दया, समता की रस्सी से रथ से बंधा हुआ है। भगवान का भजन रूप चतुर सारथी है। वैराग्य ढाल, संतोष तलवार, दान फरशी, यम और नियम जैसे अनेक बाण हैं। गुरु की पूजा एक अभेद्य ढाल है। जिसके पास इतना पवित्र रथ है, उसे कोई शत्रु नहीं हरा सकता। ‘ बहुत खूब! और वास्तव में ऐसा हुआ। पवित्र राम ने दुष्ट रावण का वध किया। तो महाभारत में कहा गया है कि यतो धर्मस्तो जय। जहां धर्म है वहां विजय है।
भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण, दुर्योधन, दुशासन आदि अधर्मी थे, वे हार गए और पांडव जीत गए। इस प्रकार धर्मपरायण व्यक्ति की विजय होती है। लोग उन्हें पसंद करते हैं। उन पर विश्वास करते हैं । लोगों को अक्सर यह कहते सुना जाता है कि भले ही वे ज्यादा पैसे लेते हैं, लेकिन उनका सामान साफ-सुथरा होता है। कारण यह है कि वे धर्म के मार्ग पर चलने में भ्रमित नहीं होते हैं। आज के जमाने में लोग नकली माल बेचने से शर्माते नहीं हैं ।

ओलिवर विलियम्स और जॉन हॉक के साथ-साथ जोसेफ सुलिवन और थॉमस मैकमोहन ने कुछ धर्म पालन करने वाले व्यापारियों की व्यावसायिक नैतिकता और प्रथाओं का दस्तावेजीकरण करके उन्हें और प्रमाणभूत किया। उनका कहना है कि लोगों को धार्मिक व्यक्तियों पर ज्यादा भरोसा होता है। ऐसे कई समाजशास्त्री कहते हैं कि जीवन के किसी भी क्षेत्र में एक नेता के लिए धर्म बहुत महत्वपूर्ण है। धर्म ही मनुष्य की असली पहचान है। व्यक्ति का धर्म उनकी आंख एवं उसकी दृष्टि से जाना जाता है। उनकी चाल से पहचाना। उनकी बातों में से जाना जाता है। उनकी व्यवहार से जाना जाता है।

वर्ष 1984 में स्वामीजी अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान ह्यूस्टन में थे। एक धर्मस्थल के मुखिया उनसे मिलने आया। बातचीत के दौरान उन्होंने उनकी गतिविधियों के बारे में बताया। धर्मस्थान के तहत चलने वाले स्कूलों और अस्पतालों के खर्च को वहन करने की योजना के बारे में उन्होंने कहा कि हम इसके लिए जुआघर (बिंगो) चला रहे हैं.’ स्वामीजी को आश्चर्य हुआ और उन्होंने पूछा, ‘क्या आपके शास्त्रों में जुए के बारे में कहीं लिखा है?’ उन्होंने कहा, ‘ऐसा कोई निर्देश नहीं है।’ स्वामीजी ने बड़े आदर और स्नेह से उनसे कहा, ‘तो क्या धार्मिक संस्था के रूप में जुआ खेलना और लोगों की हराम प्रवृत्ति को खिलाना सही है? आज अगर हम धर्म वाले ही जुआ खेलते हैं तो युवाओं के साथ भी ऐसा ही होगा कि धर्म में भी जुए की अनुमति है। इससे मनुष्य में एक प्रकार की चोरी की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है।’ उस दरवेश के पास स्वामी जी के इस कथन का कोई उत्तर नहीं था। लेकिन उन्होंने कहा, ‘लेकिन आदमी आखिर आदमी है। उसके पास कुछ मनोरंजन होना चाहिए! ‘ स्वामीश्री ने कहा, ‘क्या उनके मनोरंजन के लिए हमारे पास कुछ और नहीं है? वह बाहर जो कुछ भी करता है, वह धर्म में नहीं करना चाहिए। धर्म तो लोगों को चोरी, जुआ, ड्रग्स, व्यसन से दूर करता ।’ स्वामीजी की ऐसी उच्च धार्मिक भावना को देखकर वह भाई अंतर्दृष्टि करने लगे ।

Swaminarayan Temple Huston

स्वामी जी ऐसे ही धार्मिक व्यक्ति थे। उन्होंने अपने जीवन के हर क्षण में धर्म को सबसे पहले रखा और दूसरों को ऐसी शुभ प्रेरणा दी।
वर्ष 1995 में मुंबई के चूनाभट्टी में अमृत महोत्सव चल रहा था। वहां लाखों श्रद्धालु आते थे। उत्सव स्थल देखते ही उन्हें पवित्र जीवन की प्रेरणा मिलती थी । एक बार एक मटका (जुआघर ) चलाने वाला व्यक्ति वहां आती है। उन्हें यहां बालनागरी, जीवनपरक प्रदर्शनी, व्यसनमुक्ति प्रदर्शनी, मंदिर आदि को देखकर बहुत प्रसन्नता होती है। वह स्वामी जी को मिलना चाहता था। सौभाग्य से उनके लिए कोई उन्हें स्वामीजी के पास ले आता है। यह भाई बहुत प्रसन्न होता है और स्वामीजी को प्रणाम करता है। उत्सव की सराहना करते हैं।

इसके बाद उन्होंने संस्था को दान देने की इच्छा जताई। स्वामीजी ने पूछा कि वह कौनसा व्यवसाय करते हैं। तो यह पता चला कि उसका पैसा एक अधर्म तरीके से आता है। स्वामीजी ने उसके अनैतिक दान को स्वीकार करने के लिए अनिच्छा दिखाई। वह भाई तो देखते रहे! उन्होंने पहली बार धार्मिक पुरुष देखा जिन्होंने अधर्म और अधर्म के पैसे को स्वीकार करने में अनिच्छा दिखाई हो । उन्होंने स्वामी जी को इस सूदखोरी और हराम धन की दुनिया में बेहद पवित्र पाया। उसी समय उन्होंने धर्म के मार्ग का अनुसरण किया और धर्म मय रूप से अर्थ कमाने का नियम लिया।

ऐसा था स्वामीजी का पवित्र नेतृत्व। इसलिए आज वे सभी दिशाओं में, सभी क्षेत्रों में, सभी क्षेत्रों मे उनका जय जय कार हो रहा है ।

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राष्ट्रपति चुनाव: शिवसेना भी जायेगी द्रौपदी मूर्मु के साथ उद्धव ने किया समर्थन देने का ऐलान, जानिए किन-किन पार्टीयों ने किया हैं NDA के राष्ट्रपति उम्मीदवार को समर्थन देने का ऐलान।

महाराष्ट्र में राजनीतिक उथल पुथल के बीच एक बङा सवाल था कि शिवसेना राष्ट्रपति चुनाव में किसे देंगी समर्थन, सरकार बदलने के बाद इस सवाल का जवाब थोङी साफ होती दिख रही थी पर मंगलवार शाम आते आते शिवसेना प्रमुख ने सवालों पर विराम लगाते हुए अपना समर्थन NDA समर्थित प्रत्याशी द्रौपदी मूर्मु को देने का ऐलान कर दिया।

क्या वजह रही समर्थन देने की

वर्तमान में शिवसेना के 16 सांसद हैं एवं जब उन सभी के द्वारा उद्धव ठाकरे को पत्र लिखा गया एवं उसमें साफ तौर पर उन्होंने अपना समर्थन एनडीए प्रत्याशी को देने की बात कही,तब उद्धव ठाकरे हालात को देखते हुए इस पर राजी हो गए क्योंकि बीते दिनों अपनी पार्टी में अंदरुनी बगावती के दंश से परिचित थे एवं दूबारा उसे झेलनी की परिस्थिति में नहीं हैं शुरुआती दौर में जब मूर्मु का नाम NDA की उम्मीदवार के तौर पर आया था तो उन्होंने विपक्षी दल के उम्मीदवार यशवंत सिन्हा को समर्थन देने पर सहमति जताई थी। लेकिन जब एकनाथ शिंदे के बगावती तेवरों ने सत्ता के सिंहासन को हिला डाला और उद्धव सरकार अल्पमत में आ गई और सरकार गिर गई। वैसे स्थित उद्धव ठाकरे किसी प्रकार की बगावत भङे सुर को नहीं झेलना चाहतीं हैं एवं सांसदों के विचार पर मुहर लगाते हुए द्रौपदी मूर्मु को समर्थन देने के लिए तैयार हो गई हैं। हालांकि शिवसेना नेता संजय राउत ने बयान जारी कर कहा कि शिवसेना मुर्मू के नाम पर विचार कर रही है और फैसला 2-3 दिन में ले लिया जाएगा। साथ ही उन्होंने यह भी साफ कहा कि मुर्मू को समर्थन देने का मतलब ये नहीं हैं कि हम लोग भाजपा का साथ दे रहे हैं। यह सब सांसदो के पत्र लिखने के बाद हुआ था।

आगामी 18 जुलाई को 10 बजे से 5 बजे तक भारत के नये राष्ट्रपति के लिए चुनाव होना तय हैं।


इसके लिए 56 प्रत्याशियों ने नामांकन दाखिल किया हैं, लेकिन सबकी निगाहें दो दिग्गजों नामों पर टिकी हैं वह हैं द्रौपदी मुर्मू और यशवंत सिन्हा। इस रेस में एनडीए उम्मीदवार मुर्मू का जीतना लगभग तय माना जा रहा है।झारखंड की पूर्व राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू सत्तारूढ़ एनडीए सरकार की उम्मीदवार हैं, जबकि पूर्व भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री यशवंत सिंह इस पद के लिए संयुक्त विपक्ष के उम्मीदवार हैं। कई राजनीतिक दल पहले ही पुष्टि कर चुके हैं कि वे किसे अपना समर्थन दे रहे हैं। हालांकि, कुछ का वोट अभी भी रहस्य बना हुआ है। आइए जानते हैं कौन सी पार्टियां द्रौपदी मुर्मू को अपना समर्थन दें रहीं हैं।

NDA समर्थित उम्मीदवार द्रौपदी मूर्मु एवं विपक्षी एकता के उम्मीदवार यशवंत सिन्हा

1. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा)
2. जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू)
3.अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके)
4. बीजू जनता दल (बीजद)
5. बहुजन समाज पार्टी (बसपा)
6. युवजन श्रमिक रायथू कांग्रेस पार्टी (वाईएसआरसीपी)
7. अपना दल सोनेलाल (एडीएस)
8. राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी (आरएलजेपी)
9. असम गण परिषद (एजीपी)
10. पट्टाली मक्कल काची (पीएमके)
11. नागा पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ)
12. नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी)
13. जननायक जनता पार्टी (जेजेपी)
14. यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल (यूपीपीएल)
15. मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ)
16. निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल (निषाद)
17. नेशनलिस्ट प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक पार्टी (एनडीपीपी)
18. ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू)
19. लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास)
20. महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे)
21. जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जेसीसी)
22. सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा (एसकेएम)
23. हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (एचएएम)
24. बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ)
25. राष्ट्रीय समाज पक्ष (आरएएसपी)
26. जन सेना पार्टी (जेएसपी)
27. अखिल भारतीय नमथु राजियम कांग्रेस (एआईएनआरसी)
28. हरियाणा लोकहित पार्टी (एचएलपी)
29. यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी (यूडीपी)
30. पीपुल्स डेमोक्रेटिक फ्रंट (पीडीएफ)
31. महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी (एमजीपी)
32. हिल स्टेट पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (एचएसपीडीपी)
33. कुकी पीपुल्स एलायंस (केपीए)
34. रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया अठावले (आरपीआई-ए)
35. तमिल मनीला कांग्रेस मूपनार (टीएमसी-एम)
36. इंडिजिनियस पीपल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आईपीएफटी)
37. पुरानी भारतम काची (पीबीके)
38. शिरोमणि अकाली दल (शिअद)
39. तेलुगु देशम पार्टी (तेदेपा)
40. शिवसेना

इन पार्टियों के अलावा कांग्रेस के साथ गठबंधन में झारखंड की सत्ता पर काबिज झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) भी एनडीए के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को अपना समर्थन दे सकती है। क्योंकि मुर्मू झारखंड राज्य की राज्यपाल भी रह चुकी हैं एवं आदिवासी समुदाय से आती हैं। हालांकि इसके मुर्मू के समर्थन में आने की संभावना है क्योंकि आदिवासी झारखंड की आबादी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। यूपीए का हिस्सा रहे झामुमो पर दबाव का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शनिवार को हुई बैठक में यह फैसला वह नहीं कर पाई कि वह किसे समर्थन दे। अगर द्रौपदी मूर्मु यह चुनाव जीत जाती हैं तो वह देश की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति होंगी।

जापान में सत्तारूढ़ लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी ने 76 सीटें जीत उच्च सदन में कायम रखा अपना बहुमत, रविवार को हुए थे चुनाव इससे दो दिन पूर्व ही कर दी गई थी पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे की हत्या।

जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे की पश्चिमी जापान के नारा शहर में शुक्रवार को गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। उस वक्त वे अपनी पार्टी लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार के समर्थन में एक चुनावी रैली को संबोधित कर रहे थे।

रविवार को जापान के उच्च सदन में चुनाव हुए एवं चुनाव के परिणाम में दिवंगत पीएम की पार्टी ने सदन में 76 सीटों पर जीत हासिल कर बहुमत कायम रखने में सफल रही। इस चुनाव में लगभग 52.05 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने मताधिकार का उपयोग किया, जों कि 2019 चुनाव के मुकाबले अधिक थी। जापान की क्योदो समाचार एजेंसी के मुताबिक, प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा की पार्टी एलडीपी के पास 248 सदस्यों वाले ऊपरी सदन में 166 से अधिक सीटें हो गई हैं। एलडीपी गठबंधन का 2013 के बाद से ये सबसे बेहतर प्रदर्शन है। वहीं, जापान की प्रमुख विपक्षी संवैधानिक डेमोक्रेटिक पार्टी के पास 23 सीटें थीं, वह अब 20 के नीचे पहुंच गई है। हालांकि जीत के बाद भी एलडीपी के नेतागणों पर एक मायूसी साफ झलक रही थी। रविवार रात प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा और एलडीपी के बाकी पदाधिकारीगण मीडिया से रूबरू हुए और आबे के निधन के चलते शोक स्वरूप रिबन के साथ काले रंग की टाई और कपड़े पहन रखे थे। इन नेताओं ने मौन रखकर आबे को श्रद्धांजलि दी। जब पीएम किशिदा ने आबे की तस्वीर पर गुलाबी फूल चढ़ाए तो उनके चेहरे पर जीत की खुशी नहीं बल्कि शिंजो आबे को खोने का ग़म साफ दिखाई दे रही थी।
पीएम किशिदा ने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा कि हिंसा ने चुनाव प्रक्रिया व लोकतंत्र की नींव को खतरे में डाल दिया, ‘मैं हर कीमत पर ये चुनाव कराने के लिए दृढ़ था”

चुनाव में मिली जीत के बाद पीएम किशिदा के समक्ष चुनौतियां भरपूर होंगी।

वर्तमान में जापान कई मोर्चों पर कठिनाइयों से जूझ रहा हैं, देश की आर्थिक स्थिति दुरुस्त नहीं हैं, महंगाई अपने चरम पर हैं नए पूंजीवाद, कूटनीति, सुरक्षा, संविधान संशोधन जैसे मुद्दों किशिदा के लिए मुश्किल भङे दौर का सफर लंबा कर सकते हैं। उन्होंने कहा है कि वे इस दिशा में काम जारी रखेंगे। द जापान टाइम्स के अनुसार रविवार की जीत किशिदा सरकार के लिए एक नई शुरुआत है। वे अपनी कैबिनेट में भी फेरबदल करने पर विचार कर रहे हैं। कैबिनेट में वे सितंबर में बदलाव कर सकते हैं।

Sunday Special Interview : जो दिल को सुकून न दे, वो संगीत कैसा – Shree N

मनोरंजन डेस्क | नवप्रवाह डॉट कॉम 

संगीत हमेशा से ही भारतीय संस्कृति की परिचायक रही है। पौराणिक से वर्तमान युग तक संगीत विभिन्न वाद्ययंत्रो के साथ जुड़ कर सदा ही मिट्टी की खुशबू बिखेरती रही है। वक्त के साथ संगीत पॉप, जैज, रॉक और न जाने कितने माध्यमों से अपने रुप बदलकर श्रोताओं के मनोरंजन करने में जुट गई पर वह ठहराव वो मधुरता दिला पाने में बिल्कुल सार्थक नहीं हुई जिसमें संगीत की धुन दिल में सीधा बस जाती हैं, जहां हिन्दुस्तानी मिट्टी की पहचान भीड़ को चीरती हुई सीधा  कानों में कभी शास्त्रीय तो कभी सूफी सी लगती है।

इन्हीं सब बातों पर गौर फरमाते हुए मिट्टी की खुशबू को सहेजने और श्रोताओं के कानों से उनके दिल में उतर जाने का प्रयास किया है युवा गायक श्री एन. ने। अपने नये एल्बम दिल-ए-जार में इस एल्बम के माध्यम से उन्होंने प्रेम की वास्तविक कहानियों के साथ-साथ अबूझ प्रसंगों को जीवंत करने का प्रयास किया है। मिलन – जुदाई जैसे मीठे नमकीन किस्सों को खुशी गम के हिस्से को अद्भुत काव्य मंजूषा में पिरो कर मनोरम एकांत तक ले जाने की कोशिश की है।

इस एल्बम में शब्दों की माला को गूंथा है जानेमाने गीतकार समीर कबीर ने एवं गानों की शुटिंग हुई हैं पुष्कर और अजमेर में। अगर बात करें युवा गायक श्री एन की तो, श्री मूल रूप से उत्तर प्रदेश के इटावा के रहने वाले हैं। प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा इनकी वहीं हुई हैं एवं संगीत में विशेष रुचि होने के कारण पिछले कई वर्षों से यह गाजियाबाद में संगीत की शिक्षा गुरु हरीश डाकले जी से ले रहे हैं। संगीत क्षेत्र में वह अपना आदर्श दिवंगत गायक के.के, लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी एवं सोनू निगम को मानते हैं। साथ ही इनसे काफी प्रभावित भी हैं।

सोनू निगम के साथ काम करने वाले सवाल पर उन्होंने कहा भी कि वह दिन मेरे लिए काफ़ी खुशनुमा होगा, जिस दिन मुझे उनके साथ काम करने का अवसर मिलेगा। सूफी और शास्त्रीय संगीत में काफी लगाव है लेकिन सभी क्षेत्रों के संगीत का सम्मान करते हैं।

जब उनसे पूछा गया कि अगर उन्हें हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री, साउथ फिल्म इंडस्ट्री या भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में काम करने का अवसर मिलेगा तो किसे चुनेंगे, तो उन्होंने कहा कि हम तो मां सरस्वती के उपासक हैं, बस भेद सिर्फ भाषा की है। जहां काम करने का अवसर मिलेगा, वहां कोशिश रहेगी कि अपना शत प्रतिशत दूं। भोजपुरी इंडस्ट्री से भी बैर नहीं है, काफी मधुर भाषा है। उत्तर भारत से मैं आता भी हूं तों भोजपुरी से स्नेह थोड़ा गहरा अवश्य है, पर बाकी भाषाओं के लिए भी उतना ही प्रेम और सम्मान है। बकौल श्री, उन्होंने इस एल्बम में भारतीय संगीत की विभिन्न विधाओं को सहेज कर एकत्रित किया है एवं एक आम आदमी की कहानी को उनके एहसासों को सबके सामने प्रस्तुत करने की कोशिश की है। यह एल्बम इस महीने में रीलीज़ होने वाली है। 

“अनजाने में भी नीति न छोड़ने वाले प्रमुख स्वामी जी महाराज” -साधु अमृतवदनदास जी

रामकृष्ण परमहंस ने कहा है कि सारी साधना का फल यह है कि हमारा मन और मुख एक हो जाए ।

नीति तब शुरू होती है जब मानव मन और मानव मुख एक हो जाते हैं।  नीतिमय पुरुष नीति के बारे में बात कर सकते हैं और उस पर लिख सकते हैं।  चाणक्य नीति लिखने वाले चाणक्य ऋषि एक बहुत पवित्र आत्मा थे।  वे जैसे रहते थे वैसे ही बोलते थे ।  वे राज्य एक जिम्मेदार मंत्री थे।  इसलिए उनके पास साधन एवं उपकरणों की कोई कमी नहीं थी।  फिर भी उन्होंने घर में दो दीपक रखे थे।  जब राज्य का काम पूरा हो जाता, तो वे एक दिया बुझा देते और दूसरा जलाते थे।  फिर वे उस दिये के प्रकाश से पूजा आदि कार्य करते थे।  उन्हें ऐसा करते देख किसी ने उससे पूछा कि आप ऐसा क्यों कर रहे हों ?  आप केवल एक दीपक का उपयोग करें।  चाणक्यजी कहते हैं: “पूजा मेरे व्यक्तिगत जीवन के लाभ के लिए है। उसके लिए मैं राज्य के धन एवं राज्य के दीपक का उपयोग नहीं करता ।”  कितनी ऊँची नीति है यह !  आज बड़े लोग अपने बच्चों के लिए सरकारी विमानों और चार्टर्ड उड़ानों का उपयोग करने से नहीं हिचकिचाते हैं.  ऐसा करने में, उन्हें ऐसा लगता है कि उन्होंने देशभक्तिपूर्ण नैतिक कार्य का एक बड़ा कार्य किया है।

 प्रमुख स्वामी महाराज की नीति थी कि भगवान के लिए भी कोई भी अवैध रूप से कुछ भी लाना या उपयोग नहीं करना चाहिए।  उन्होंने वैसा ही व्यवहार किया और दूसरों को भी वैसा व्यवहार करने का सिखाया ।

 1977 के वर्ष में स्वामीजी इंग्लैंड के एक शहर लेस्टर मे थे । वहां डोनकास्टर रोड दयाभाई पटेल के घर उनका निवास था ।  बच्चों को स्वामी जी की प्रात:कालीन पूजा के लिए ताजे फूल लाने की सेवा सोपी गई थी ।  बच्चे  सड़क पर घूमते रहे और दर्ज किया करते थे कि एक अंग्रेज भाई  के घर के बगीचे से कितने फूल लेने हैं।  अंग्रेज भाई भले ही एक-दो फूल लिखते हैं, लेकिन बच्चे दो की जगह तीन फूल तोड़ते थे और सोचते हैं कि शाम को उन्हें बता दिया जाएगा।  स्वामीजी को यह जानकारी मिली।  उन्होंने एक सुबह एक संत से पूछा: ‘फूल कौन लाता है? जो बच्चा फूल लाता उसे मेरे पास लाओ’. एक बच्चा खुश खुश होकर स्वामी जी के पास पहुंचा।  उसने सोचा कि मेरी फ़ूलों लाने की सेवा से स्वामी जी प्रसन्न हुए है और मुझे आशीर्वाद देंगे।

जब वो स्वामी जी के पास पहुचा तो स्वामी जी उस समय शिक्षापत्री पढ़ रहे थे।  उसे एक श्लोक दिखाकर स्वामी जी बोले : ‘ भगवान स्वामिनारायण ने लिखा है कि मालिक से पूछे बिना एक भी फूल नहीं तोड़ा जाना चाहिए।  अगर हम एक फूल भी ले लें तो इसे चोरी कहते हैं।  अगर मेरी पूजा में फूल न हो तो चलेगा , लेकिन मुझे ऐसे फूल नहीं चाहिए।  सत्संगी कभी चोरी नहीं करते!’  बच्चे तो इजाज़त से फूल लाते थे, लेकिन दो की जगह तीन तोड़ देते थे।  ऐसा करना भी  स्वामीजी के मन में एक चोरी ही थी.. भले ही उसने शाम को मालिक को बताया क्यों न हो।

फ्रेंक्लिन रूजवेल्ट

अमेरिकी राष्ट्र के राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने एक बार डर के मारे कहा था कि A man who will steal for me, is a man who will steal from me. जो आदमी मेरे लिए चोरी करेगा वह एक दिन मुझसे भी चोरी करेगा।  स्वामी जी को ऐसा कोई भय नहीं था।  क्योंकि उसके पास लूटने के लिए कुछ नहीं था।  उनके पास लिखने के लिए एक साधारण कलम तक नहीं थी।  लेकिन उन्हें इन बच्चों को शुद्ध नैतिक जीवन की उच्च भूमिका में ले जाना था ।

स्वामीजी ऐसे नीतिमंत संत थे. वे अनजाने मे भी नीति छोड़ते नहीं थे.

एक बार स्वामीजी बोचासन मंदिर में थे।  एक दिन विश्राम के लिए जाते समय उन्होंने एक भक्त को बुलाया और कहा, ‘जन्मदिन के लिए निकले सोवेनियर में से दो विज्ञापन मुझे पसंद नहीं आए।  आइए मैं आपका ध्यान उस ओर आकर्षित करता हूं।  एक तंबाकू के विज्ञापन और दूसरा विज्ञापन है पेस्ट्री फार्म का  ।”  फिर वे कहते हैं,” हमें जो करने से मना किया गया है, उसका विज्ञापन हमें नहीं करना चाहिए।  भले ही वह करोड़ों रुपये क्यों न दे! आप सभी इस पर विचार करें।

संस्थागत आधार पर इस तरह के विज्ञापन न लेने का निर्णय लिया गया है।” स्वामीजी के मन में श्रेष्ठतम नैतिकता थी।  कहना कुछ और करना कुछ और य़ह उनकी नीति नहीं थी।  उनके ऐसे आग्रह  के कारण छोटे-छोटे गांवों में रहने वाले सत्संगी भी तिनका भर भी हराम का नहीं रखते और न ही उसे पचाने की वृत्ति रखते हैं।

धरमपुर के छोटे से गांव वाहियाल में आदिवासी हरिभक्त रसिकभाई लल्लूभाई मोहिला में रहते हैं।  वे 15 साल से डेकोरेटर की कंपनी में काम कर रहे हैं।  एक बार, वापी में एक मानव कल्याण क्षेत्र में एक शादी के बाद मंडप से निकलने समय, उन्हें आधी रात को मंडप के एक कोने में एक बड़ा बैग मिला।  जब  उन्होंने बेग खोला तो अंदर दो छोटे बैग देखे।  एक में सोने के आभूषण और दूसरे में रुपये थे।  उसने बैग को सुरक्षित स्थान पर रख दिया ताकि कोई लालच में आकर उसे ले न जाए ।  अगले दिन सुबह 11 बजे जिस भाई के  घर में शादी थी वह भागे भागे आए ।  वे बहुत चिंतित लग रहे थे।  उनको अपनी बेग की जरूरत थी ।  यहां उनकी मुलाकात रसिकभाई से हुई।  बैग के बारे में पूछने पर वे भाई बताते है कि , ”बैग में 1,60,000 रुपये नकद थे और 20,000 रुपये की साड़ी और एक लाख रुपये से ज्यादा कीमत का सोना है.  रसिकभाई को यकीन हो गया कि बैग इसी भाई का है।  उन्होंने बैग लाकर उसे दे दिया।  भाई ने बैग खोलकर संपत्ति की जांच की।  अंदर सब कुछ सुरक्षित देख भाई प्रसन्न हुए और आश्चर्य से पूछा, “तुमने इसमें से कुछ रखा क्यों नहीं ?”  तब रसिकभाई कहते हैं, ”मुझे खुशी है कि अब घर पर मेरे सो रुपये हैं और मैं सुखी हू. पराया धन मुझे खुशी नहीं देगा ।  मैं प्रमुखस्वामी महाराज के सत्संग से खुश हूं।’

 स्वामीजी के सैद्धांतिक नेतृत्व ने दुनिया में ऐसे ईमानदार और नैतिक जीवन जीने वाले लाखों बाई भाई भक्तों की एक विशाल सेना बनाई है।  अगर उनके पास नीतिमय सौ रुपये हैं, तो भी वे पर्याप्त है. उनके लिए मन की नीति और भक्ति ही सच्चा धन है।  यह स्वामीजी के नैतिक नेतृत्व का चमत्कार है।

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“शत प्रतिशत नैतिकता ही नैतिक जीवन की प्रथम योग्यता” -साधु अमृतवदनदास जी

नेतृत्व की पहली योग्यता है नैतिक जीवन।  इसके बिना किसी भी व्यक्ति का समाज और लोगों पर प्रभाव नहीं पड़ता ।

इसीलिए हितोपदेश में कहा गया है कि

मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम् ।

मनस्यन्यद् वचस्यन्यद् कर्मण्यन्यद् दुरात्मनाम् ॥

दैत्यों के मन, वचन और कर्म अलग-अलग होते हैं, महान आत्माओं के मन, वचन और कर्म एक ही होते हैं।  लोग तो अलग अलग तरह से बोलते और जीते हैं।  यह एक अद्भुत सुभाषित है।

अक्सर ऐसा होता है कि नीति-सिद्धांतों की बात करने वाला व्यक्ति समय आने पर आदर्शों को भूल जाता है।  स्टोनी ब्रुक विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क के प्रो. पीटर डी स्किओली ने अपना शोधनिबंध Equity or Equality? Moral judgments follows the money में कहा है कि नैतिक निर्णय धन का अनुसरण करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि जब धन का लाभ प्रकट होता है या कुछ लाभ दिखाई देता है, तो व्यक्ति अपने सिद्धांतों को त्याग देता है।  पैसा आने पर नैतिकता का स्तर बदल जाता है।

कुछ दिनों पहले कानपुर के एक इत्र उद्योगपति पर CBIC (केंद्रीय बोर्ड ऑफ इंडिरेक्ट टेक्सस एन्ड कस्टम ) ने छापा मारा ।  उन्हें वहाँ से 150 करोड़ रुपये नकद मिले!  यह सारा पैसा बेहिसाबी था।  इसे गिनने के लिए भारी संख्या में अधिकारी आए थे । इनके अलावा  नोट गिनने की तीन मशीनें भी लगानी पड़ीं।  एक एक पैसा इस बात का पुख्ता सबूत था कि नैतिकता को उन्होंने  किनारे कर दिया गया है।

इत्र बनाने वाले का जीवन बिना नीति के गंदगी की गंध से कलंकित हो गया था।

यदि कोई अच्छा व्यक्ति एक पैसे को भी बिना हिसाब के देख लेता है, तो वह चिंतित हो जाता है।  हालाँकि, इस कलियुग में ऐसा शुद्ध सज्जन कहाँ मिल सकता है?  बहुत कम होंगे।

एक अन्य मामले में विश्व प्रसिद्ध मुंबई के एक अरबपति को डराने-धमकाने के लिए 2021 में बम की धमकी दी गई थी।  उसकी जाँच से पता चला कि अपराधी बहुत बड़े वर्दीधारी अधिकारी ही थे! जो लोग के सिर पर कानूनी रूप से लोगो की सुरक्षा अवलंबन कराने की जिम्म्मेदारी थी, वही लोग खतरे और भय का कारण बने।  कोई नीति नहीं, कोई नियम नहीं।

प्रमुख स्वामी महाराज के जीवन में ऐसे कई सुभाषित जीवित और सुगंधित थे। उनकी नीति की प्रेरणा नदी निरंतर बह रही थी।

baps swaminarayan temple london
BAPS स्वामीनारायण मन्दिर, लंदन

वर्ष 2002 में स्वामी जी लंदन मंदिर में थे।  ठाकुरजी को प्यार से झूले में झुलाकर स्वामीजी गुंबद के नीचे बैठे मेहमानों की ओर मुड़े। यहाँ बच्चों की आज दर्शनार्थियो में खास उपस्थिति थी ।  ललितभाई के चिरंजीवी तिलक उठ खड़े हुए।  उसने स्वामी जी के हाथ में एक सोने की अंगूठी रख दी और कहा: “पिताजी!  यह घनश्याम महाराज के लिए दी है।  स्वामी जी ने अंगूठी नहीं ली।  पहले पूछाः “कहां से लाए?”  “माँ ने दिया।”

 “माँ से पूछा था?”  “हाँ।”

 “तुम्हारे पिता ने तो ना कही थी।”

 ” उन्होंने ही देने को कहा है।”  “बहुत अच्छा।”  यह कहकर स्वामी जी ने ठाकोर जी के चरणों में अँगूठी भेंट की।  लेकिन जब ललितभाई नीचे पाए गए, तो स्वामीजी ने तुरंत पूछा: ‘उसने ( तिलक ने ) वह अंगूठी दी है, क्या उसने तुमसे पूछा था?’  ललितभाई ने कहा: “हाँ, मैंने इसे घर से दिया था। ” स्वामीजी उनकी मंजूरी से संतुष्ट थे। उनका वही रवैया था। उनकी एक ही नीति थी। उनके दिमाग में यह था कि भगवान की सेवा के लिए भी नीति नहीं बदलेंगे। .

देश के एक छोटे से केंद्र में सुनामी पीड़ितों के लिए कुछ पैसे एकत्र किए गए थे।  यहाँ के छोटे से सत्संग मंडल को ध्यान में रखते हुए, कुछ ग्राम प्रधानों ने सलाह दी, ‘इस धन का उपयोग आप अपना मंदिर बनाने में करें।’  जब यह मामला स्वामी जी के सामने आया, तो उन्होंने तुरंत कहा: ‘सुनामी के पैसे का उपयोग संगठन में नहीं किया जाता है।  जिस हेतु सेवा आई है, उसे वहाँ भेज देना चाहिए।

एक एक पैसे का हिसाब शुद्धि से रखना चाहिए।  हमें वही हिसाब सरकार को देना है।  भले ही फिर पांच रुपये आए हो, लेकिन वह राशि समाज सेवा में ही जानी चाहिए।’  स्वामीजी के इस सैद्धांतिक प्रशासन से ही आज संस्था की प्रतिष्ठा अग्रिम स्थान पर है।

स्वामीजी ने वर्षों तक BAPS स्वामीनारायण संस्थान का संचालन किया।  इन सभी वर्षों में उन्होंने देश-विदेश में 1200 मंदिरों का निर्माण किया।  अन्य कई गांव शहर और देशो में जमीन भी संपादित किये ।  इन सभी जगहों का व्यवहार उन्होंने स्वयं किया है।  उन्होंने कभी भी किसी किस्म का दुर्व्यवहार नहीं किया।  ऐसा एक भी उदाहरण नहीं है जहां किसी स्थान का दुरुपयोग किया गया हो या गलत कागजात दाखिल किए गए हों या किसी के दिल को चोट पहुचाई हो ।  किसी को ऐसा करने के लिए मजबूर भी नहीं किया गया था।  किसी के जबरदस्ती दस्तावेज़ पर उनके हस्ताक्षर नहीं करवाये।  किसी के पेट पे लात नही मारी ।  किसी ने दहाड़ नहीं लगाई।  किसी से नफरत नहीं की।  किसी को नाराज करने के लिए झूठे आरोप नहीं लगाए।  किसी भी व्यक्ति पर किसी भी प्रकार के राजनीतिक सामाजिक-आर्थिक पारिवारिक आदि का दबाव नहीं डाला।

सरकार या समाज का कोई कानून नहीं तोड़ा।  किसी भी शास्त्रीय वैदिक सामाजिक और सरकार की नीति का उल्लंघन नहीं किया गया है।  वे स्वयं नीति का एक जीवंत रूप थे।  वे मूर्तिमंत नीति थे।  उन्होंने जो भी कहा, किया लिखा, सोचा सब कुछ सौ प्रतिशत नैतिक था।  उनके एक वचन से लाखों लोगों ने नैतिक जीवन जिया है।  इसमें कोई शक नहीं कि नारायण स्वयं वहीं होते हैं जहां ऐसा सैद्धांतिक नेतृत्व होता है।

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“विशालमन विभूति प्रमुख स्वामी जी महाराज” -साधु अमृतवदन दास जी

दुनिया में कई परोपकारी लोग हैं। उन्होंने अरबों रूपयों का दान किया है। पैसों के मामले में भारत के जमशेदजी टाटा द्वारा शुरू की गई चैरिटी अब तक करीब 3,103 अरब का दान दे चुकी है।  वह आज भी नंबर वन हैं।

बिल गेट्स और वारेन बफेट ने गिविंग प्लेज नाम से एक आंदोलन शुरू किया है।  जिसमें अमीरों के लिए अपनी संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा समाज कल्याण के लिए दान करना ऐसा एक शुभ विचार है।  2021 तक 25 देशों के 220 प्रस्तावों को उसमे पंजीकृत किया गया है।

कई उदार लोग हैं जो अपनी अधिकांश संपत्ति समाज, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य आवश्यकताओं के लिए दान करते हैं।  लेकिन आप कितने लोगों को जानते हैं जिन्होंने समाज और दुख के लिए अपना सब कुछ दे दिया?  शायद बहुत कम नाम याद हों या शायद एक भी नाम याद न हो।

दधीचि ऋषि ने देवताओं और पृथ्वी और त्रिलोक को वृत्तासुर से बचाने के लिए अपना शरीर त्याग दिया।  देवताओं ने उनकी हड्डी से एक वज्र अस्त्र बनाकर राक्षस को मार डाला।

समय-समय पर ऐसे मनुष्य इस धरती पर जन्म लेते हैं ताकि दूसरों का जन्म और जीवन सार्थक हो जाए।  वे दूसरों के लिए अपना सब कुछ बलिदान कर देते हैं।

प्रमुख स्वामी महाराज एक ऐसे संत थे, जिन्होंने समाज के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया।  वह खुद को दूसरों की मदद करने के बारे में नहीं सोचते था।

कुछ साल पहले स्वामीजी एक महत्वपूर्ण धार्मिक समारोह में भाग लेने के लिए इलाहाबाद जाने वाले थे। उस समय उनके पैर मे एक बड़ी गांठ थी। डॉक्टरों ने चेतावनी दी कि ऐसे में वहां जाना आपकी सेहत के लिए बेहद खतरनाक है।  लेकिन स्वामी जी ने किसी की नहीं सुनी।  बस वहाँ गए और दर्द की परवाह किए बिना सभी को बहुत खुश किया।  उस समय गुजरात के नानी वावड़ी गांव के कुछ भक्त स्वामी जी से मिले।  उन्होंने स्वामी जी से कहा कि वे सब यहाँ यात्रा कराने आए हैं।

आयोजक ने पहले वादा किया था कि हम आपके भोजन की व्यवस्था करेंगे।  लेकिन यहां आकर उन्होंने हाथ खड़े कर दिए हैं।  भोजन के लिए कोई मेल नहीं है।  स्वामीजी ने तुरंत संतों को आदेश दिया कि वे सभी भोजन आदि इन लोगों को दें जो हम अपने साथ लाए हैं। सभी संत स्तब्ध होकर देखते रह गए क्योंकि अंजान जगह पर दूसरी व्यवस्था कैसे स्थापित करें?  लेकिन स्वामीजी यही चाहते थे इसलिए उन्होंने सारा खाना उन भक्तों को दे दिया।  स्वामीजी की ऐसी उदार भावना से उपस्थित सभी मनोमन अभिभूत  हो गए।  खुद का बना बनाया बिगाड़ कर दूसरों का भला करने के लिए बड़े दिल की जरूरत होती है।

स्वामीजी का नेतृत्व कितना उदार था, इसके कई प्रसंग हैं।  कुछ साल पहले आंध्र प्रदेश में भारी बारिश हुई थी।  कम से कम दो स्थानों पर तो बाढ़ के खतरे के चरम स्तर की घोषणा की गई।  काफी तबाही मची थी। सरकार का पूरा तंत्र बचाव और राहत कार्य मे जुट गया था। इस बीच सिकंदराबाद के बीएपीएस स्वामीनारायण मंदिर में भी पानी भर गया।  मंदिर के निर्माण के लिए लकड़ा एवं अन्य चीजे बाढ़ के प्रवाह मे बह चुकी थी।

BAPS Sri Swaminarayan Mandir, Sikandrabad

भक्तों ने यह बात स्वामी जी को बताई।  स्वामी जी ने कहा कि बारिश से हमारे मंदिर भी नुकसान हुआ है ।  लेकिन आपको दूसरों की मदद करनी चाहिए। जो जरूरतमंद हैं या जो पीड़ित हैं उनकी सहायता करें।  स्वामी जी के मन में यह भाव था कि वह स्वयं कष्ट सहकर भी यथासंभव दूसरों की सहायता करें।

उनकी यह आत्मा शाश्वत है।  उसे यह आभास होता है कि आज भी कहीं कोई समस्या हो तो मदद मांगने का मैसेज तुरंत आ जाता है।

हाल ही में यूक्रेन-रूस युद्ध में ऐसा ही हुआ था।  यूक्रेन में पढ़ने वाले हमारे भारतीय छात्र वहाँ के भीषण युद्ध मे बुरी तरह से फँस गए थे। उनको पोलैंड मैं से भारत देश वापस लाने की व्यवस्था की जा रही थी। चारों ओर बुलेट, बम मिसाइल के धमाके सुनाई पड़ते थे।  संकट का समय था ।  सरकार उनके लिए पोलिश सीमा से भारत लौटने की व्यवस्था कर रही थी।

ऐसे कठिन समय में हमारे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र भाई मोदी ने संतों को फोन कर के यूक्रेन से आ रहे छात्रों और अन्य लोगों के लिए रहने और खाने की व्यवस्था करने का निवेदन किया।  BAPS स्वामिनारायण संस्था की ओर से तुरंत योजना शुरू की गई।  हमारे यूरोपीय देशों जैसे इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, पोलैंड, हॉलैंड आदि देश एवं अमरिका के हमारे संत, स्वयंसेवकों और हरिभक्तों ने इस अत्यंत खतरनाक और जीवन के लिए खतरनाक माहौल में सरकार के आदेश के अनुसार सभी व्यवस्था करना शुरू कर दिया।  सबसे पहले इस जगह पर मोबाइल किचन भेजा गया।  सभी लोगों को गर्मागर्म भोजन का प्रबंध किया गया। तत्पश्चात उन्होंने अपने साथ एक गोदाम रखा और उसमें सभी भारतीयों के रहने एवं परिवहन की अच्छी व्यवस्था की।  पीड़ित लोगों को सिम कार्ड की भी दिए गए। और अन्य सुविधाएं भी दी गई। इससे लोगों को अभी काफी राहत मिल गई । सब धीरे धीरे शांत होने लगे। यह सब स्वामी जी ने हम सभी को सिखाया है।

जो व्यक्ति अपने से ज्यादा दूसरों के दर्द को महत्व देता है और उन्हें दुःखमुक्त करने का यथोचित प्रयास करता है वही विभूति पूरी दुनिया को बेहतर बना सकती है।

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“प्रमुख स्वामी जी महाराज एवं उनका उदारहृदय नेतृत्व” -साधु अमृतवदन दास जी

कुछ दिन पहले एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाले एक युवक ने अपने ऑफिस के एक वरिष्ठ अधिकारी की खूबियां बताईं।

जब यह युवक मुसीबत में मदद के लिए उसके पास जाता है, तो साहब तुरंत उसकी मदद करते  है।  यह एक अच्छी बात है।

प्रश्न यह है कि अपनी कंपनी के कर्मचारी की मदद की जाती है, तो क्या दूसरी कंपनी या उसके कर्मचारी की मदद उसी भांति की जा सकती है?  बहुत कम लोग ऐसा शिष्टाचार सद्भाव दिखा सकते हैं, क्योंकि वहां कंपनी की प्रोटोकॉल पॉलिसी आदि तुरंत आड़े आ जाती है।  हो सकता है कि कोई थोड़ी बहुत मदद करे लेकिन लोग प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उसका चार्ज तो वसूल कर ही लेते है।

एक बड़े केस में सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी उलझे हुए थे।  सामनेवाली कंपनी बहुत उद्दंड थी।  वह किसी भी तरह अपनी मनमानी कर ही लेती थी।  उनका मामला कोर्ट में विचाराधीन था।  किसी ने उन्हें एक शख्स से मिलने की सलाह दी और कहा कि वह भी सरकारी आदमी हैं। वह आपको निःशुल्क परामर्श देंगे।  अधिकारी उस व्यक्ति से  मिलते है।  साथ बैठकर पूरा केस समझते है ।  कुछ मिनट की चर्चा के बाद वे अपने घर वापस लौट आए । अगली सुबह उसे उस विशेषज्ञ से एक बड़ा बिल मिलता है।  बिल की रकम देख उन्हें चक्कर आ जाता है।  उन्होंने महसूस किया कि मुफ्त जैसी कोई चीज नहीं होती है।  इस समाज में कुछ भी मुफ्त नहीं है।

प्रमुख स्वामी महाराज एक ऐसे संत थे जिन्होंने हमेशा बिना कोई शर्त रखे और बिना किसी इनाम की अपेक्षा के अजनबियों की मदद की।  उन्होंने कभी भी किसी भी व्यक्ति की लाचारी का फायदा नहीं उठाया।

सन् 1997 का वर्ष था । सत्यम शिवम सुंदरम समिति ने वडोदरा शहर के मध्य में सुरसागर सरोवर में दुनिया की सबसे ऊंची 111 फीट ऊंची शिव प्रतिमा की स्थापना करने का आयोजन किया गया ।  काम बहुत बड़ा था।  इसलिए जब भी कोई समस्या होती, तो समिति के अध्यक्ष योगेश भाई और उनके सहयोगी स्वामीजी के पास दौड़ पड़ते।  स्वामीजी उन्हें शांति से सुनने और उनकी मदद करने और प्रोत्साहित करने के लिए समय निकालते थे।  उन्होंने मुख्य मूर्ति के चारों ओर 10 से 12 फीट ऊंची महादेवजी की विभिन्न आठ मूर्तियों को स्थापित करने की भी योजना बनाई।  लेकिन छह से आठ महीने की छोटी सी अवधि में इसे तैयार करना असंभव था।

यह भी अनुमान लगाया गया कि कुल लागत 50 लाख रुपये से अधिक होगी।  योगेशभाई आदि फिर स्वामीजी की सहायता लेने आए।  उन्होंने विनम्रता से स्थिति बताते हुए मूर्तियों को खड़ा करने की गुहार लगाई।  स्वामीजी ने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और उनकी उपस्थिति में हर्षदभाई चावड़ा को फोन किया और शिवजी की मूर्तियां बनाने का आदेश दिया।  उन्होंने यह भी सिफारिश की कि कम लागत पर सबसे अच्छा काम किया जाए।  एक तरफ दिल्ली अक्षरधाम का काम अलग-अलग जगहों पर तय कार्यक्रम के मुताबिक युद्धस्तर पर चल रहा था ।  स्वामीजी के कहने पर एक स्थल का कार्य छह माह के लिए स्थगित कर दिया गया और वहां सर्वोच्च प्राथमिकता महादेवजी की आठ प्रतिमाओं को गुलाबी पत्थर से तराशने की दी गई।

सुरसागर झील

समिति को उनके निर्धारित समय से पहले प्रतिमाएं दी गईं!  समिति के कार्यकर्ताओं को डर था कि जल्दबाजी में किया गया काम संतोषजनक नहीं होगा।  लेकिन मूर्तियों को देखकर वे बहुत खुश और चकित हुए!  अपेक्षा से अधिक सुंदर, कलात्मक मूर्तियों को देखकर उनके हृदय को शान्ति पहुंची।  मूर्तियों के जिस काम में लाखों रुपये खर्च होने थे, वह स्वामी जी बहुत कम दाम में  करवा दिया था और वह भी समय से पहले!  स्वामीजी की सहायता मंदाकिनी वहीं नहीं रुकी।  आयोजकों ने उद्घाटन समारोह के दौरान योजना बनाने और व्यवस्था करने में स्वामीजी से मदद मांगी।  स्वामीजी के आदेश से वडोदरा जिले के एक हजार स्वयंसेवकों ने ही उनकी सेवा में लगन से काम किया और समिति के सदस्यों, आमंत्रित अतिथियों और शहर के लोगों का दिल जीत लिया।

इस प्रकार, उन्हें विश्व की इस विशाल शिव प्रतिमा के निर्माण से लेकर इसके लोकार्पण तक की यात्रा में स्वामी जी का सहयोग मिला।  सब बहुत खुश थे।  मन ही मन स्वामीजी का वंदन कर रहे थे ।  ऐसे उदार हृदय वाले संत ही वास्तव में सत्यम, शिवम और सुंदरम हैं।

इसके अलावा, जब भी गुजरात या देश या विदेश में भूकंप, सूखा, भारी बारिश या अन्य प्राकृतिक आपदा आती है, तो स्वामी जी सबसे पहले बचाव के लिए आगे आते हैं।  उनके कहने पर बीएपीएस संगठन ने अपनी कार्यक्षमता से अधिक सेवायें की है। स्वामीजी ने किसी भी तरह के भेदभाव के बगैरह सेवा व मदद की है ।

 जैसा कि महा उपनिषद में कहा गया है

अयं निज: परो वेत्ति गणाना लघुचेतसाम् ।

उदारचरितानां तू वसुधैव कुटुंबकम् ॥

छोटे मन वाले व्यक्ति मेरा तेरा करते है, लेकिन प्रमुख स्वामी महाराज के मन में कोई अपना पराया नहीं था।  वे वसुधैव कुटुम्बकम की भावना के साथ जीते थे।  इस तरह उन्होंने पूरी दुनिया का दिल जीत लिया।  स्वामी जी का नेतृत्व ऐसा उदार था।

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ऋषि भारद्वाज को मानद डॉक्टरेट की उपाधि

नई दिल्ली | Navpravah Desk

देश के प्रख्यात ज्योतिषी पण्डित ऋषि भारद्वाज को इंटरनेशनल इनोवेटिव फ्यूचर एजुकेशन समिट – 2022 में इंटरनेशनल इंटर्नशिप यूनिवर्सिटी (आई आई यू ) की ओर से मानद डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया।

यह सम्मान उन्हें आध्यात्मिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए प्रदान किया गया।

कोरोना महामारी के दौरान जब लोग डरे हुए थे, उस समय आध्यात्म ही एक ऐसा मार्ग था जिसने लोगों को मानसिक रूप से स्वस्थ रखा। योग, ध्यान और आध्यात्म ने आम जनमानस को उस कोविड जैसी भीषण समस्या से जूझने की शक्ति दी।

दिल्ली के कंस्टीटूशन क्लब ऑफ़ इंडिया, संसद मार्ग के ऑडिटोरियम में वैश्विक शिक्षा सम्मलेन 2022 के अंतर्गत दीक्षांत समारोह हुआ। इसमें कोविड-19 परिस्थितियों में आध्यात्मिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए पण्डित भारद्वाज को यह मानद उपाधि दी गई। इस वैश्विक शिक्षा सम्मलेन में दुनिआ के दस देशों से प्रतिनिधि शामिल हुए थे।