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Tuesday, September 8, 2026
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“सरल स्वभाव, सेवा भाव और सहज व्यक्तित्व विशेषता वाले प्रमुख स्वामीजी महाराज” – साधु अमृतवदनदास जी

प्रमुख स्वामी महाराज हर किसी को प्रोत्साहित करते थे। अगर कोई कुछ नया विचार या नई योजना लेकर आए, तो वे ध्यान से और सम्मानपूर्वक सुनते थे।

वह अपने विचारों को एक तरफ रख देते और सामने वाले व्यक्ति के बेहतर सुझाव पर अमल करने में तनिक भी संकोच न करते।

दिल्ली अक्षरधाम का एक प्रसंग है। संस्था ने यमुना के किनारे 100 एकड़ जमीन लिया। उस समय क्या किया जाए, इसकी कोई ठोस योजना नहीं थी। स्वामीजी का संकल्प था कि यहाँ भी अक्षरधाम का निर्माण किया जाए। अक्षरधाम टीम के एक जिम्मेदार संत पू श्रीजीस्वरूप स्वामीजी के पास एक ड्रॉइंग लेकर आए। उन्होंने स्वामीजी से निवेदन किया कि हम ऐसे अक्षरधाम परिसर का निर्माण कर सकते है। स्वामीजी ने इसमें रुचि ली। तत्पश्चात अक्षरधाम की पूरी टीम से इस संबंध में विचार विमर्श हुआ, इस पर चर्चा चलती रही। पूरी टीम ने उस डिजाइन को ध्यान में रखा और सुधार के बारे में सोचने लगी। समय-समय पर स्वामीजी को सब कुछ बताया गया।

प्रमुख स्वामीजी महाराज ने सभी की प्रस्तुति, विचारों को ध्यान से सुना। फिर इसे केंद्र में रखते हुए अक्षरधाम जैसा विशाल और भव्य-दिव्य नया मंदिर बनाया गया। उन्होंने कहा कि गुरु योजीजी महाराज का संकल्प है, तो अक्षरधाम सर्वोच्च होगा। प्रमुख स्वामी ने अपनी स्वनिर्मित योजना को तरजीह न देते हुए दूसरों के विचारों को प्रमुखता दी। वह दूसरे के विचार की सराहना करते रहे और उन्हें समर्थन देना जारी रखा। इसी का नतीजा है कि आज सौ एकड़ में बना भव्य अक्षरधाम अद्भुत अनोखा हो गया है।

पहली नजर में ही लोग अवाक हो जाते हैं और दिव्यता की भूमि में भ्रमण करने लगते हैं। इसके मूल में है सहज योजना के विचार में स्वामीजी की रुचि, प्रोत्साहन और विश्वास।

संस्था के संयोजक एवं सद्गुरु संत पू. ईश्वरचरण स्वामी ने कहा कि स्वामीजी के प्रशासन कौशल की एक विशेषता यह है कि वे व्यक्ति में बहुत विश्वास रखते थे। अगर किसी के पास कोई अच्छा विचार है, तो उसे व्यक्त करने देते थे। उसे कार्य करने की स्वतंत्रता देते थे। आवश्यक वस्तुएँ उपलब्ध कराते थे।

एक स्थान पर मंदिर बनाने का निर्णय लिया गया। समिति ने क्षेत्र की आवश्यकता और सत्संग के अनुसार वहां सीमेंट का एक छोटा सा सुंदर मंदिर बनाने का निर्णय किया। उस छोटे से नगर मे रहने वाले एक भक्त ने स्वामी जी से विनती की कि हम यहां वर्षों से रह रहे हैं। साथ ही सभी भक्तों की इच्छा होती है कि यहां पत्थर का एक बड़ा मंदिर हो।

स्वामीजी ने तुरंत अपने मन की बात को छोड़ दिया। उन्होंने उनसे कहा कि आपकी इच्छा के अनुसार, पत्थर का एक बड़ा मंदिर बनाया जाएगा। स्वामीजी ने स्थानीय भक्तों की भावना के अनुसार एक सुंदर कलात्मक पत्थर का मंदिर बना भी दिया। उनके सेवकमय नेतृत्व से उस क्षेत्र के सभी भक्त बहुत प्रसन्न थे। इस प्रकार स्वामीजी के नेतृत्व ने बहुतों का दिल जीत लिया। वे
अपनी मर्जी को छोड़ देते थे और दूसरों की इच्छा के अनुसार बदल जाते थे। दूसरों को प्राथमिकता देना, सबको खुश रखना और संगठन का विकास करना उनकी सफलता का रहस्य था ।

“द लीडरशिप चैलेंज” किताब में कहा गया है कि लीडरशिप केवल दिमाग़ का मामला नहीं है, नेतृत्व दिल का मामला भी है। स्वामीजी सभी के दिलों की भावनाओं को समझ लेते थे और उसी के अनुसार चलते थे।

एक मंदिर में मास्टर प्लान के तहत कुछ पेड़ों को मंदिर में स्थानांतरित किया जाना था। स्वामी जी की उपस्थिति में मीटिंग का आयोजन किया गया। एक भक्त ने सहज रूप से वृक्षों का उल्लेख किया और कहा कि वृक्षों को जरा संभाल के पुनः स्थापित किया जाना चाहिए। क्योंकि वृक्षों का नई मिट्टी से चिपकना मुश्किल हो जाता है। तब स्वामी जी ने उसे रोका और कहा कि मैंने तो मन ही मन छोड़ दिया है, अब तुम भी छोड़ दो। यह सुनकर आयोजक हैरान रह गए। उन्हें लगा कि स्वामी जी ने हमसे इस बारे में कभी मीटिंग में बात नहीं की।

स्वामी जी की इच्छा थी कि उस स्थान पर एक बहुत ही पुराना लेकिन स्मृतिदायक स्थान है, जो मास्टर प्लान के हिसाब से निर्माण कार्य करने पर तोड़ना पड़ता। इस प्रकार स्वामीजी अक्सर दूसरों का सहयोग करते हुए उनकी योजना बनाने में शामिल हो जाते थे। जब उन्हें लगा कि मेरे दिमाग में जो कुछ है, उससे दूसरे व्यक्ति के दिमाग में कुछ अलग चल रहा है, तो वह तुरंत अपनी धारणा छोड़ देते थे। यह स्वामीजी के सेवकमय नेतृत्व की विशेषता थी।

उनका मंत्रिस्तरीय नेतृत्व बहुत सहज था। किसी से काम लेने का भाव नहीं था। उनके मन मे सबका शुभ हो, भला हो ऐसी ही भावना रहा करती थी।

जाने-माने लेखक जेम्स स्टॉक ने अपनी पुस्तक ‘सर्व टू लीड’ में कहा है कि इक्कीसवीं सदी के नेतृत्व संबंधों की गतिशीलता ऊपर से नीचे की बजाय नीचे से ऊपर की ओर है, अंदर से नहीं, बल्कि बाहर से। ऐसा था स्वामीजी का सेवकमय नेतृत्व। वे आदेश देने की बजाय दूसरों की आज्ञाओं का ज्यादा पालन करते थे। सरल स्वभाव, सेवा भाव और सहजता प्रमुख स्वामीजी महाराज के व्यक्तित्व की विशेषता थी।

मेतथा प्रोडक्शंस की वेब सीरीज ‘यिन्स एंड यांग्स’ को बेहतरीन रेस्पॉन्स

एंटरटेनमेंट डेस्क | Navpravah.com

6 मई, शुक्रवार को रीलीज़ हुई वेब सीरीज़ ‘यिन्स एंड यांग्स’ को बेहतरीन रेस्पॉन्स मिल रहा है। 65-70 मिनट की सीरीज़ 3 एपिसोड में विभाजित है, ये मर्डर मिस्ट्री OTT प्लेटफॉर्म एम 2 एम पर एक्सक्लूसिव उपलब्ध है।

सीरीज़ के लेखक-निर्देशक तरुण नीलकण्ठ ने ने बताया कि सीरीज़ ‘यिन्स एंड यांग्स’ मुंबई के पास महाराष्ट्र के एक ग्रामीण हिस्से में स्थापित एक काले और अबोल सांसारिक अवधारणा है जो ब्रह्मांड के सही और गलत, नैतिक और अनैतिक, सकारात्मक और नकारात्मक तत्वों को बताती है। सीरीज़ ‘यिन्स एंड यांग्स’ कुछ महीने पहले लेखक निर्देशक तरुण एस नीलकंठ के दिमाग में आया। तरुण एस नीलकंठ बचपन के दिनों से एक थिएटर कलाकार हैं, एक कलाकार जिसकी हमेशा निर्देशन में गहरी दिलचस्पी रही।

डार्क टोन में सेट, सिरीज़ यीन्स एंड यांग्स एक मर्डर मिस्ट्री-क्राइम थ्रिलर, एक मात्र लोकेशन की कहानी है, जिसे ग्रामीण महाराष्ट्र में एक ही स्थान पर शूट किया गया है। फिल्म की सह निर्मात्री सुनीता अय्यर ने बताया कि यह सीरीज़ पर्सनली मुझे बहुत पसंद है। और ऐसे में जब आम जनमानस का प्यार हमारी टीम को मिल रहा है तो ये और भी सुखद लग रहा है। तरुण की इस कहानी को हमारी पूरी टीम ने जिया है। हमें एम 2 एम की पूरी टीम का बढ़िया सपोर्ट मिला, जिसकी वजह से हम क्रिएटिव लिबर्टी का पूरा लाभ ले पाए।

लेखक तरुण कहते हैं, “कहानी कितनी भी बेहतर हो लेकिन जब हमें प्रोडूसर्स का सही सहयोग मिलता है, तभी बढ़िया प्रोडक्ट तैयार हो सकता है। इस मामले में हम लकी रहे कि हमें हमेशा निर्माताओं का सहयोग मिला।

“भगवान स्वामिनारायण महाराज के अद्वितीय सेवकमय नेतृत्व की महिमा” – साधु अमृतवदनदास जी

Sewakmay netritva of lord swaminarayan by sadhu amritvadan das

सन् 1970 में अमरिकी कन्सलटन्ट रॉबर्ट ग्रीनलीफ ने “सेवक के रूप में नेता” नामक एक निबंध में “सेवक नेतृत्व” शब्द गढ़ा।

इससे प्रबंधन में सेवक के रूप में काम करने का एक नया चलन सामने आया। यह आज भी कॉर्पोरेट जगत में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। इस पर व्याख्यान और सेमिनार आयोजित किए जाते हैं। कंपनी में लोग इस तरीके को अपनाने को तैयार हैं।

भगवान स्वामिनारायण ने ऐसे सेवक के गुण बताते हुए कहा कि यह सच है कि अभिमानी सेवक को कोई पसंद नहीं करता। कॉरपोरेट जगत में, अहंकार और दंभ अक्सर सबसे पहले प्रतिस्थापित या समाप्त होने वाले पहलु लगते हैं। उन्हें एक लो प्रोफाइल आदमी, एक समझदार नेता की भी जरूरत है। क्योंकि ऐसा नेता कार्यालय में एक ऐसा वातावरण बनाता है जिसमें कर्मचारी को अपनी क्षमता के अनुसार काम करने की संभावना 4.6 गुना अधिक होती है।

एक प्रसंग देखते है। शास्त्रों के अनुसार दुर्वासा ऋषि बहुत क्रोधित थे। साथ ही बहुत कम लोग उनके स्वभाव के अनुकूल होते थे। इसलिए कोई उन्हें अपने घर नहीं बुलाता था। एक बार वह भगवान कृष्ण के महल में अतिथि बने। परमेश्वर का सेवक बन गए और उसकी बहुत अच्छी सेवा की। ऋषि जब उनके महल में रहते थे तो कभी अकेले हजारों लोगों का खाना खाते थे, कभी बहुत कम खाते थे। कभी-कभी वे घर से भाग जाते थे। तो कभी रोते थे। बाकी सब ऊब गए। लेकिन एक भगवान कृष्ण शांत और स्वस्थ रहे। वे निर्माणी रहकर सेवा करते रहे। एक दिन ऋषि ने कहा कि मैंने खीर खानी है। भगवान उन्हें स्वादिष्ट खीर परोसी ।

ऋषि ने खीर खाने के बाद कहा कि अब इस खीर को अपने शरीर पर लगाएं। भगवान ने वह भी किया। यह देखकर रुक्मिणी जी मुस्कुरा रही थीं। ऋषि ने  उनको भी अपने शरीर पर खीर लगाने का फरमान किया। फिर उन्हों ने कृष्ण भगवान और रुक्मिणी जी को रथ से जोड़ा  और ऋषि उसमें बैठ गए। रथ चलते समय उन्होंने रुक्मिणी जी को भी कोड़े मारे। लेकिन भगवान कृष्ण और रुक्मिणी जी बिल्कुल भी नाराज़ नहीं हुए। उनकी भक्ति देखकर दुर्वासा बहुत प्रसन्न हुए और भगवान को आशीर्वाद दिए और कहा कि आपने जहा जहा खीर लगाई है वहा आपको कुछ नही होगा। उन्होंने रुक्मिणी जी को भी आशीर्वाद दिया और कहा कि आप सोलह हजार एक सौ आठ रानियों में सर्वश्रेष्ठ और सबसे प्रसिद्ध होंगी। भगवान कृष्ण ने अपने पैरों के तलवों पर खीर नहीं लगाई थी। वहां उन्हें एक शिकारी के तीर लगा और उन्होंने मृत्यु ग्रहण किया। इस प्रकार विनम्र सेवक सभी को प्रिय है। ऐसे कृष्ण भगवान कुरुक्षेत्र के महाभारत युद्ध में अग्रणी थे।

प्रमुख स्वामी महाराज ऐसे ही सेवक थे। वह हमेशा विनम्र, विनम्र, बहुत विनम्र और अति विनम्र थे। वे शुरू से ही अपने व्यवहार से सेवक नेतृत्व का प्रसार कर रहे थे।

उसी दिन जब प्रमुख स्वामी को संस्था का अध्यक्ष बनाया गया, तो उन्होंने उसी दिन हरिभक्ति के जूठे बर्तन धोए।

इससे पहले भी, जब उन्हें सारंगपुर मंदिर के मुख्य प्रबंधक (कोठारी) के रूप में नियुक्त किया गया था, तो वे सभी सेवाओं में शामिल हो गए थे। उन्हें पहले से ही पद का अहंकार नहीं था। उनमें सत्ता का क्षय नहीं हुआ। गौशाला, बर्तनों की सफाई, वस्त्रों की धुलाई, पुजारी, रसोई आदि सभी सेवा वे बड़े भाव और विनम्रता के साथ करते हैं। उन्हें देखकर सभी को सेवकाई में शामिल होने और अच्छा करने की प्रेरणा मिलती है।

एक बार ऐसा हुआ कि एक भक्त चाय पी रहा थे। वह चाई मे चीनी नही थी। उनका मूह बीगड गया।

स्वामीजी ने यह देखा। तुरंत चीनी मंगवाई । चाय में चीनी डाली और उसने अपनी कोमल उंगली को गर्म और चिपचिपी चाय में डुबोया । चाई को मीठी बनाई और उन्हें मधुर चाय पिलाई। लोग बस उसकी सेवा की भावना को देखते रहे! उन्हें यह सेवक सक्कर भी मीठा लगे।

स्वामी जी के प्रेरक जीवन से सभी संत प्रेरित हैं और किसी भी प्रकार की सेवा करने से नहीं हिचकिचाते।

सन् 1981 में अहमदाबाद में मनाए गए भगवान स्वामीनारायण के द्विशताब्दी उत्सव में हरिभक्तों के जूठे भोजनपात्र उठाने वाले संस्था के  साधुओ  को देखकर बौद्ध धर्म के एक वरिष्ठ संत भदंत आनंद कौशल्यायन हैरान रह गए।

मेहसाणा के चंदूभाई पटेल दिल्ली अक्षरधाम महोत्सव की सेवा में थे। उस समय बारिश के कारण नाला जाम हो गया था। चंदूभाई ने संतों को गंदे नाले साफ करते देखा। इसलिए वह खुद शामिल हो गए। वे 5 फीट गहरे गड्ढों में उतरते हैं और  हथौड़े से मारकर बाहर आते हैं, सांस लेते हैं और फिर से गोता लगाते हैं। ऐसा उन्होंने सात दिनों तक किया। गटरों की बदबू, बीमारी की अधिकता और शरीर की थकावट के बावजूद चंदूभाई ने अथक परिश्रम किया और कुल 20 गटर साफ किए।

दास नेतृत्व का एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रमुख स्वामी महाराज हैं। उनके विनम्र व्यवहार को ध्यान में रखते हुए, आज हजारों भक्त बर्तन धोने के अलावा कुछ नहीं करते और कुछ ऐसा करते हैं जो उन्होंने अपने जीवन में कभी नहीं किया। आज, कई बाई भाई भक्त मंदिर के बर्तनों की सफाई शुरू करते हैं। इसके अलावा, उन्हें शौचालय, स्नानघर आदि को साफ सुथरा रखने की कोई आवश्यकता महसूस नहीं होती है। किचन का काम भले ही बहुत भारी हो, लेकिन इसमें शामिल होने की जहमत किसी को नहीं है।  अमरिका, कनाडा, इंग्लैंड और अन्य विदेशी देशों में, एक व्यवस्था है कि भोजन के बाद, सभी एक साथ, रसोईघर को अच्छी तरह से साफ किया जाता है। इसी तरह मंदिर के अन्य छोटे-बड़े रखरखाव कार्यों में भी लोग उत्साह के साथ शामिल होते हैं।

जैसा कि स्वीकार किया गया डॉ. राजीव व्यास। वह चेरीहिल (यूएसए) शहर के एक धनी और सम्मानित डॉक्टर हैं। उनके हाथों में 800 व्यक्ति काम करते हैं और 3 डॉक्टर उनके सहायक के रूप में ड्यूटी पर हैं। वह न्यू जर्सी के एक प्रसिद्ध अस्पताल के निदेशक भी हैं। फिर भी सालों से वह चेरी हिल मंदिर में हर सुबह ठाकोरजी के दर्शन करने के बाद मंदिर के शौचालय और स्नानघर की सफाई करते हैं।

यह सब प्रमुख स्वामी महाराज के अद्वितीय दास नेतृत्व की महिमा है।

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अगर आपको पसंद हैं हीरे के गहने, तो ये ख़बर आप के लिए है

Dhanji Jewels

विशाखा मिश्रा । नवप्रवाह डॉट कॉम

आम जनमानस के लिए डायमंड इंडस्ट्री से एक अच्छी खबर है। लगातार सोने के बढ़ रहे भाव के बीच एक राहत देने वाली खबर ये है कि अब हीरा आपकी पहुंच से दूर नहीं है। ज्वेलरी इंडस्ट्री में धनजी ज्वेल्स की चर्चा ज़ोरों पर है। कंपनी ने हाल ही में अपना एक ई-कॉमर्स वेबसाइट लांच किया है, जिसके प्रोडक्ट्स बेहद किफ़ायती हैं, जिसे आम आदमी अफ़्फोर्ड कर सकता है। महज़ चार से पांच हज़ार रुपये में ही इसके प्रोडक्ट्स की रेंज शुरू होती है।

हीरे के व्यवसाय में लगभग एक दशक से एक्टिव महासुख चाँदपारा के मन में हमेशा से ये बात थी कि देश के हर वर्ग के व्यक्ति के पास सोने की तरह हीरे का भी गहना हो। सोचा तो उन्होंने काफी समय से था ये, लेकिन यह फलीभूत हुआ कुछ महीने पहले जब उन्होंने निर्णय किया कि वे धनजी को ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर लेकर आएंगे। हाल ही में धनजी ने अपना ई-कॉमर्स वेबसाइट लांच किया, जिसके ज़रिये पूरी दुनिया भर से लोग आसानी से ज्वेलरी की खरीददारी कर सकेंगे।

नवप्रवाह के संवाददाता ने जब कंपनी के निदेशक महासुख से पूछा कि धनजी बाकी हीरे कंपनियों से कैसे अलग है तो उन्होंने बताया कि हमारे लिए यह सिर्फ व्यवसाय नहीं है, इमोशन भी है। हमारे लिए मुनाफे से ज़्यादा मायने रखता है, हमारे ग्राहकों के चेहरे की मुस्कान। अगर आपको कोई चीज़ बहुत पसंद है, लेकिन आप के पास उसे खरीदने के लिए पर्याप्त धन नहीं है, तो आप को निश्चित दुःख होगा। अब ऐसे में आप के पास एक ऐसा विकल्प हो, जिससे आप अपनी ख्वाहिश पूरी कर सकें तो आप ज़रूर खुश होंगे। हम ई-कॉमर्स ( www.dhanjijewels.com ) के ज़रिये उन सब के पास पहुंचना चाहते हैं, जो हीरा पहनना चाहते हैं। हमने प्रोडक्ट्स का रेंज बेहद कम रखा है ताकि हर कोई इसे अपना बना सके।

महासुख ने बताया कि हमारा टारगेट है कि हम देश के हर कोने तक पहुंचे, सिर्फ बड़े शहर ही नहीं। उन्होंने कहा कि लगभग सभी बड़े शहरों में डायमंड को लेकर जागरूकता है, लेकिन टू-थ्री टियर सिटीज़ में अभी भी लोगों के मन में यह भ्रम रहता है कि हीरा है तो बहुत ज़्यादा महंगा होगा। जब कि ऐसा है नहीं, हीरे महंगे भी होते हैं और कम पैसे में भी आते हैं। सब क्वालिटी, कलर और क्लैरिटी का खेल है। उन्होंने कहा कि मीडिया के माध्यम से ही लोग जागरूक होंगे, इसलिए मीडिया को भी इस इंडस्ट्री की खबरों पर फोकस करना चाहिए।

योगी 2.0: यूपी का नया ब्राह्मण चेहरा होगा उपयोगी ?

नितीश कुमार मिश्र | नवप्रवाह डॉट कॉम 

उत्तर प्रदेश में योगी सरकार 2.0 की शुरुआत हो चुकी है और इसके साथ ही शुरुआत हो चुकी है विस्तारीकरण की। पिछली सरकार में दो उपमुख्यमंत्री थे, केशव प्रसाद मौर्य एवं दिनेश शर्मा। इस बार केशव प्रसाद मौर्य के चुनाव हारने के बाद कयास लगाए जा रहे थे कि केशव प्रसाद को पुनः उपमुख्यमंत्री का दायित्व नहीं मिलेगा, लेकिन उनका स्थान यथावत रखा गया है एवं दिनेश शर्मा कोपद से हटा कर एक नया नाम शामिल किया गया है, वह हैं ब्रजेश पाठक।

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि दिनेश शर्मा ब्राह्मण वोटरों को रिझाने में उतने सफल नहीं हो पाए जितनी की उम्मीद उनसे की गई थी।

कौन हैं ब्रजेश पाठक ?

ब्रजेश पाठक का जन्म 25 जून 1964 को हरदोई जिले के मल्लावां कस्बे में हुआ था। ब्रजेश पाठक पेशे से वकील हैं। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से विधि स्नातक की शिक्षा ग्रहण की है। छात्र राजनीति से ही इन्होंने अपने राजनीतिक सफ़र की शुरुआत की थी। वर्ष 1989 में लखनऊ विश्वविद्यालय छात्र संघ के उपाध्यक्ष बने और 1990 में लखनऊ विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष भी बने। इसके बाद वे कांग्रेस में शामिल हुए और मुख्य धारा की राजनीति में कदम रखा। साल 2002 के विधानसभा चुनाव में मल्लावां विधानसभा सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव भी लड़े, लेकिन करीबी मुकाबले में मात्र 130 वोटों से चुनाव हार गए।

इसके बाद ब्रजेश पाठक साल 2004 में बसपा में शामिल हो गए और 2004 में उन्नाव लोकसभा सीट से बीएसपी के टिकट पर चुनाव जीत कर सांसद बने। फिर 2009 में बसपा ने उन्हें राज्यसभा भेजा, जहां वे सदन में बसपा के मुख्य सचेतक भी रहे। लेकिन साल 2014 में प्रचंड मोदी लहर में जब उन्होंने दूसरी बार लोकसभा का चुनाव उन्नाव की सीट से लड़ा, तो इन्हें हार का सामना करना पड़ा। 

साल 2016 में उन्होंने एक बार फिर अपना पाला बदला एवं 22 अगस्त 2016 को इन्होंने तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा की मौजूदगी में बसपा का साथ छोड़ बीजेपी का हाथ थाम लिया। 

2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने इन्हें लखनऊ सेंट्रल से अपना उम्मीदवार बनाया और पार्टी की उम्मीदों पर खरे उतरते हुए इन्होंने इस सीट पर विजय हासिल की एवं जीत के पुरस्कार स्वरुप पार्टी ने इन्हें प्रदेश सरकार में कानून मंत्री का पद सौंपा।

ब्रजेश पाठक को इस बार भी लखनऊ कैंट विधानसभा से प्रत्याशी बनाया गया। पार्टी के विश्वास को कायम रखते हुए इन्होंने जीत दोहराई। पाठक ने समाजवादी पार्टी के सुरेंद्र सिहं गांधी उर्फ राजू गांधी को 39,512 वोटों से हराया है। लखनऊ कैंट विधानसभा ब्राह्मण बाहुल्य सीट है। पाठक पेशे से वकील हैं और बीते कुछ वक्त में उत्तर प्रदेश में बीजेपी के बड़ा चेहरे बनकर उभरे हैं।

मतदान में औसत गिरावट के कारण, जानिए, कैसे होगा इसमें सुधार

विशाल सिंह | navpravah.com

संसार के सभी देशों में सरकार चुनने का अपना अपना प्रावधान है। इनमें सबसे उत्तम तरीका लोकतांत्रिक तरीके से प्रत्यक्ष रूप से जनता के द्वारा सरकार का चुना जाना है, जो कि हमारे भारत देश में अपनाया गया है।

भारत में चुनाव को महापर्व जैसा माना जाता है और प्रतिनिधियों के साथ-साथ जनता में भी काफी उत्साह होता है। इस महापर्व मे हिस्सा लेने वाला और यहाँ तक कि हिस्सा लेने की इच्छा मात्र रखने वाला भी, एक अच्छी और मजबूत सरकार बनाने के लिए उत्साहित रहता है।

जनता में इतना उत्साह होने के बावजूद भी अगर हम वोटिंग का औसत देखें तो वह बहुत ही निराशाजनक दिखाई देता है। हाल ही में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मतदान की स्थिति को देखे तो बड़ी आसानी से हमें पता चलेगा कि वोटिंग प्रतिशत् मात्र 50 से 60% ही रह रहा है। कहीं-कहीं तो 40% तक ही रहा वो भी उन बूथों पर जहाँ से हमारे बड़े बड़े माननीय लोग खुद ही प्रतिनिधि हैं। आखिर इतना उत्साह होने के बावजूद इस तरह की गिरावट क्यों है।

यह सोचने वाली बात है कि जिस देश मे प्रधानमंत्री, प्रदेशों के मुख्यमंत्री और नायक-नायिका, खिलाड़ी सभी लोग मतदाता को जागरूक करने के लिए प्रयासरत हैं। सबको उनके मताधिकार के बारे मे बता रहे, मतदान को सर्वोच्च कार्य की श्रेणी में रखने की सलाह दे रहे, वहां पर इतना कम वोटिंग आखिर क्यों ?

प्रश्न यही उठता है कि इसका मुख्य कारण क्या है और इसे सुधारा कैसे जा सकता है?

अक्सर इसका एक साधारण सा कारण सुनने को मिलता है कि लोग वोट के नाम पर छुट्टी का दिन समझते हैं, इस दिन या तो घर पर आराम करते हैं या फिर बाहर घूमने फिरने निकल जाते हैं पर जिस काम के लिए छुट्टी मिलती है, अर्थात वोटिंग के लिए वही नहीं करते हैं।

कुछ देर के लिए मान भी लिया जाए इस बात को, तो क्या इस तरह के लोग 50 या 60% हैं जो छुट्टी लेकर आराम करते हैं या घूमने चले जाते हैं। मुझे लगता है यह एक कारण हो सकता है कम वोटिंग का, लेकिन यही एकमात्र कारण है यह सच नहीं है।

आज यह समय की जरूरत है कि चुनाव आयोग, सभी माननीय और मतदाता भी इस पर विचार करें कि क्या सच में यही मात्र एक कारण है वोटिंग प्रतिशत् कम होने का ? इसके साथ साथ ही भविष्य मे वोटिंग प्रतिशत् को बढ़ाने का हर संभव प्रयास करें।

एक मुख्य कारण और है जो हमें समझ में आता है, आज के परिवेश में इस अर्थ प्रधान समय में, हर व्यक्ति रोजगार और युवा शिक्षा के लिए घर से दूर अन्यत्र किसी शहर या प्रदेश में जाकर रह रहे हैं। हर व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी निभाने मे संघर्षरत है। इस महगाई के दौर मे बच्चों की पढाई माँ पिता की ज़रूरतों को पूरा करना ही मुश्किल हो गया है।

आज के समय में हर परिवार से 40 से 50% लोग घर से दूर रह रहे, कुछ रोजगार के लिए तो कुछ शिक्षा के लिए या फिर कोई बीमार है तो कोई उसकी देखभाल मे लगा है और हर कोई सरकारी कर्मचारी नहीं है, जिसे वोट देने के लिए ड्यूटी लीव मिल रही है और अगर कोई सरकारी कर्मचारी भी है तो उसे मात्र एक दिन की लीव मिल रही है, जिसमें गृह जनपद जाना-आना और वोट देना सब संभव नहीं है।

गैर सरकारी कर्मचारी और विधार्थी को तो यह सुविधा भी नहीं मिल रही। ऊपर से पूरे परिवार को लेकर यात्रा करने का खर्च इस महगाई में अलग से। अतः यही वो 40% से 50% लोग हैं, जो चाहते हुए भी मतदान नहीं कर पाते हैं।

सरकार और चुनाव आयोग तथा मतदाता सभी को जागरूक होकर इस विषय मे सोचने की जरूरत है। आज का अत्याधुनिक भारत जो कि हर क्षेत्र ऑनलाइन सुविधा युक्त हो गया है, उसे वोटिंग के लिए भी कुछ इस तरह का प्रबंध करना चाहिए कि जो जहाँ है वही से वोट कर सके, बस इस प्रक्रिया में यह सुनिश्चित् होना चाहिए कि चुनाव की शुचिता पर कोई असर ना पड़े।

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गुजरात विधानसभा में हंगामा, कांग्रेसी विधायक सस्पेंड, गृहमंत्री को कहे आपत्तिजनक शब्द

पीयूष उपाध्याय | नवप्रवाह न्यूज़ नेट्वर्क 

गुजरात विधानसभा में आज प्रश्न काल के दौरान कांग्रेस ने इतना हंगामा किया कि विधानसभा अध्यक्ष ने कांग्रेस के उना के विधायक पूंजन वंश को 7 दिनों के लिए सस्पेन्ड कर दिया गया। दरअसल कांग्रेस विधायक नौशाद सोलंकी ने एक सवाल पूछा, सरकार से जवाब न मिलने की वजह से वो हाउस के अंदर जमीन पर बैठ गए। ऐसे में कांग्रेस के सभी विधायक खड़े हो कर हल्ला मचाने लगे, जिसके सामने भाजपा के विधायकों ने भी हल्ला शुरू कर दिया।

कांग्रेस के विधायक पूंजन वंश ने गृहमंत्री हर्ष संधवी के सामने इशारा करते हुए टपोरी जैसे आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया। इसको लेकर विधानसभा में और ज्यादा हंगामा शुरू हो गया और विधानसभा कुछ वक्त के लिए स्थगित हो गई। हालांकि, राजस्व मंत्री राजेन्द्र त्रिवेदी ने इन आपत्तिजनक शब्दों को वापस लेने के लिए कहा। इसपर पूंजा वंश ने कहा कि गृहमंत्री का बर्ताव उनके पद को शोभा नहीं देता है। विधानसभा अध्यक्ष को मामले में दखअंदाजी करनी पड़ी, तब जाकर मामला शांत हुआ।

बीजेपी की ओर से गृहमंत्री हर्ष संधवी के लिए आपत्तिजनक शब्दों का इस्तमाल करने वाले कांग्रेस के पूंजन वंश को 7 दिन के लिए हाउस से सस्पेन्ड करने का प्रस्ताव रखा गया। ये प्रस्ताव खुद बीजेपी के पंकज देसाई ने रखा। हाउस ने कांग्रेस विधायक को सात दिन के लिए निलम्बित कर दिया।

यूपी विधानसभा चुनाव 2022: क्या है भाजपा का जातीय समीकरण, कौन ख़ुश कौन ख़फा

up assembly elections 2022

यूपी विधानसभा चुनाव 2022 : भाजपा ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के पहले चरण के चुनाव प्रचार हेतु अपने प्रचारकों की लिस्ट जारी की हैं जिसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत 30 लोगों को शामिल किया गया हैं.

यूपी विधानसभा चुनाव 2022 : गौर करने वाली बात यह हैं कि इस लिस्ट में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री एवं लखीमपुर खीरी से सांसद अजय कुमार मिश्रा टेनी, पीलीभीत लोकसभा सीट से सांसद वरुण गांधी एवं सुल्तानपुर क्षेत्र से सांसद उनकी माता मेनका गांधी कों स्टार प्रचारकों के लिस्ट से दूर रखा गया हैं.

बीते दिनों वरुण गांधी ने राज्य की योगी सरकार एवं केन्द्र की मोदी सरकार पर कई सवाल खड़े किए थे इसलिए एक वजह यह भी देखा जा रहा हैं इस लिस्ट में उनकी एवं उनकी मां का नाम नहीं शामिल करने के पीछे.

वहीं दूसरी ओर अगर हम बात करें अजय कुमार मिश्रा टेनी की तों पार्टी किसान आंदोलन से जुड़े मुद्दों पर किसी भी तरह का रिस्क लेने के विचार में नहीं दिख रही हैं आंदोलन भले ही खत्म हों चुकी हैं किसान अपने घरों कों भी लौट चुके हैं और सरकार ने चुनाव से ठीक पहले तीनों विवादित कृषि बिल वापस लेकर अपनें चुनावी दांव चल दिए हैं.

लेकिन किसान नेताओं की एक बड़ी मांग अभी भी लंबित हैं उनकी मांग है कि लखीमपुर खीरी में किसानों पर गाड़ी चढ़ाए जाने के मामले पर सख्त ऐक्शन लेते हुए केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी को उनके पद से हटाया जाए। इस कांड में मुख्य आरोपी के तौर पर टेनी के बेटे आशीष मिश्र का नाम आया था अब अगर भाजपा किसानों को खुश करने कें चक्कर में टेनी से उनके इस्तीफे की पेशकश करतीं हैं तों एक बङा “ब्राह्मण वोट बैंक” से उन्हें हाथ धोना पर सकता है हालांकि पार्टी इस समय ऐसे किसी सोच में नहीं दिख रही हैं.

बीते दिनों जब विकास दुबे एनकाउंटर हुआ तों योगी सरकार पर ‘ब्राह्मणों का शोषण’ करने के आरोप लगने लगे थे।उस वक्त उस रोष कों शांत करने हेतु केंद्रीय कैबिनेट के विस्तार में टेनी कों राज्य मंत्री का ओहदा दिया गया था उस समय इसे साफ तौर पर ब्राह्मणों की नाराजगी कम करने के एक प्रयास के तौर पर देखा गया था.

हालांकि विपक्ष एकता ने उस समय यह आरोप लगाया था राज्य सरकार ने राज्य में “ब्राह्मण तुष्टीकरण’ करना शुरू कर दिया हैं और एक बड़े वोटबैंक को हाथ से फिसलता देख बीजेपी ने भी अपना यह दांव चला हैं. फिर  जोङ तोङकी राजनीति भी शुरू हुई एवं डेमेज कंट्रोल कें तहत पार्टी ने एक ओर जहां अजय मिश्र टेनी को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया तों वहीं दुसरी ओर इलाके के दूसरे बड़े ब्राह्मण नेता जितिन प्रसाद को कांग्रेस से बीजेपी में लाकर योगी सरकार में मंत्री बना दिया. सब सेट हों गया वोट बैंक विधिवत अपने जगह पर स्थापित रहें सरकार काफी हद तक अपने ऊपर लगे “ब्राह्मण विरोधी” के दाग़ को धोने में सफल भी रहीं.

लेकिन किसान आंदोलन के समय दिये पहले अजय मिश्र टेनी के भड़काऊ बयान फिर लखीमपुर-खीरी कांड ने सरकार कों फिर से परेशान कर कें रख दिया हैं.

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कोरोना, उत्तर प्रदेश और चुनाव, किसका चलेगा जोर?

Uttar Pradesh Legislative Assembly election

Uttar Pradesh Assembly Elections : बीते दिनों किसी मित्र ने सोशल मीडिया के माध्यम से एक पोस्ट शेयर किया था जिसमें लिखा था कि मुबारक हों कोरोना चंद दिनों में ही स्नातक हों जायेंगा और उम्मीद हैं कि अपनी डिग्री प्राप्त करके शायद अपने स्थान वापस लौट जायें.

इसके प्रतिउत्तर में किसी ने लिखा अच्छी बात है कि डिग्री लेकर वापिस लौट जायें क्योंकि अगर और पढ़ने की इच्छा जागृत हो गयी और सिविल सर्विसेज की तैयारियों में जुट गया तों बात कुछ और होंगी.. हालांकि यह कथन हास्यास्पद था पर संदेश और पीङा साफ साफ झलक रही थी यहां.

संपूर्ण विश्व इस वैश्विक महामारी कें चपेट में अपने आप कों असहाय महसूस कर रहा है आर्थिक, शारीरिक एवं मानसिक पीङा के इस दौर में जहां जनता अपने बहिखाता कों सुदृढ़ करने में प्रयास में जुटी हुई हैं वहीं जनता के सेवक इसें चुनावी मुद्दा समझ अपने अस्तित्व कों बचाने में लगे हुए हैं नेता नगरी में चुनावी बिगुल बज चुका हैं गद्दी की लालसा प्रबुद्ध हों चुकी हैं शह मात के इस खेल में पक्ष विपक्ष एकजुट हो कर अपनी भूमिका मजबूत करने में जुटे हैं वहीं जनता प्यादें की अहम भूमिका निभाने में मजबूर हों चुकी हैं और चुनाव आयोग कुशल रेफरी की तरह कोरोना मुक्त चुनाव कराने में कटिबद्ध हैं.

बीते 8 जनवरी को भारतीय चुनाव आयोग ने प्रेस कांफ्रेंस के माध्यम से बयान जारी कर कहा कि हम आगामी 10 फरवरी से 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव कराने जा रहें हैं जिसकी मतगणना 10 मार्च को होगी. राज्यों के नाम हैं पंजाब, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर और उत्तर प्रदेश जनता की उम्मीदों के अनुरूप फैसला निश्चित था यह आंकलन कोरोना काल में हुए चुनावों के आधार पर था.. चुनावी रणभेरी बिगुल बजने के बाद राजनीतिक एकत्रीकरण मजबूत हुई एवं जनता के प्रति समर्पित वियोग कोरोना की करुणा सत्ता सुख की लालसा में लुप्त सी हों गई.

चुनावी घोषणा एक राज्य की वजह से चर्चा का केंद्र बना हुआ हैं और वहां भी चुनाव होने निर्धारित हैं उसका कारण यह है कि जिस पार्टी ने भी यहां अपना किला फतह किया उसके लिए दिल्ली की दुरी आधी से भी कम हों जायेंगी जी हां हम बात कर रहे हैं उत्तर प्रदेश की जिसने सदैव ही भारतीय राजनीति में अपनी निर्णायक भूमिका निभाई हैं.

अगर बात करें उत्तर प्रदेश के विधानसभा सीटों की तों यहां कुल सीटों की संख्या 403 हैं और यहां 7 चरणों में वोटिंग होनी निर्धारित हैं । जिसकी शुरुआत 10 फरवरी से होगी और चुनाव के नतीजे 10 मार्च को आनें हैं ।

छोटे बङें सभी राजनीतिक दलों ने अपनी पूरी ताकत झोंकनें आरंभ कर दियें हैं आरोप प्रत्यारोप का दौर निरंतर चालू हैं राजनेता अपने बयानबाजी से एक-दूसरे पर निशाना साधने में जुट गयें हैं सभी दलों ने अपने चुनावी वादों का पोस्टर बांटना भी आरंभ कर दिया है.

अगर बात वर्तमान सत्तारूढ़ पार्टी की करें तों वहां अभी भारतीय जनता पार्टी की सरकार हैं और मुखिया हैं योगी आदित्यनाथ अगर भाजपा की बात करें तों वह इसे 2024 के आम चुनाव के तौर पर देख रहीं हैं उनके मुताबिक यह आगामी लोकसभा चुनाव कें सेमीफाइनल के तौर पर देख रहें हैं शायद इसलिए इनके प्रवक्ता यह कहने से भी पीछे नहीं हट रहें हैं कि साल 2022 में ‘योगी को जिताना’ है, क्योंकि 2024 में फिर से ‘मोदी को लाना’ है हालांकि यह वाक्य अपनी सिद्धता कों सफल करने में कितनी पकड़ रखतीं हैं इसकी सच्चाई तों मतगणना के पश्चात पता चल जायेगी.

हालांकि अगर बात हम पिछले चुनावों की करें तों बीजेपी नेतृत्‍व वालें गठबंधन नें 325 सीटें हासिल कर सरकार बनाई थी हालांकि उस चुनाव में भाजपा ने अपनें मुख्यमंत्री पद का दावेदार की घोषणा पहले नहीं थी बाकी एक तथ्य यह भी हैं कि विगत चुनाव के दौरान केशव प्रसाद मौर्य भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष थे, तो उनसे जुड़े समुदायों को लगा कि वही मुख्यमंत्री बनेंगे, शायद यह भी भाजपा के लिए एक सुनहरा तर्क था लेकिन चुनाव के बाद सिंहासन योगी आदित्यनाथ कों सौंप दिया गया उनके नाम पर मुहर लगने से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समेत सभी हिंदूवादी संगठन उत्साहित थे.

राजनीतिक जानकारों के अनुसार उस वक्त संघ ने हिन्दुत्व के एजेंडा को आगे बढ़ाने के लिए तब योगी का चयन किया था। योगी ने इस कार्य कों सफल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। योगी के कार्यकाल में भव्य राम मंदिर निर्माण शुरू हो गया। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का काम भी पूरा कर लिया गया। कई विख्यात बाहुबलियों कों कारागृहों में जगह दिलवाई , इनकाउंटर हुए अलग अलग तरीकों से अपराध पर अंकुश लगाने का भरपूर प्रयास किया गया.. वहीं महंगाई,कोरोना महामारी, बेरोजगारी एवं सबसे बड़ा मुद्दा किसान आंदोलन मतगणना में अहम भूमिका निभा सकते हैं.

साथ ही जात पात अंदरुनी मनमुटाव भी अपनी मौजूदगी अवश्य दर्ज करा सकतीं हैं दल बदल अगरा पिछङा की राजनीति भी धीमी गति से अपनी रफ़्तार बनायें हुए हैं हाल में भाजपा छोड़कर गए स्वामी प्रसाद मौर्य और उनके साथ जाने वाले विधायक अति पिछड़े समुदाय से आते हैं पूर्व में ये सभी विधायक बहुजन समाज पार्टी का साथ दें चुके हैं गणना के अनुसार उत्तर प्रदेश में मौर्य, शाक्य और सैनी के साथ कुछ और अति पिछड़ी जातियों के आठ फीसदी से ज्यादा वोट माने जाते हैं। साल 2017 के चुनाव में पिछड़े वोटों को एकजुटता ने हीं भाजपा की जीत की भागीदारी निभाई थी। कहा जा रहा है कि मौर्य के भाजपा छोड़ने का असर प्रदेश की करीब सौ सीटों पर पड़ सकता है।वहीं दस फीसदी ब्राह्मणों की नाराज़गी भी भाजपा के लिए चिंतन का सबब है ।

2017 के चुनाव में भाजपा के 312 विधायकों में से 54 ऐसे नेता थे, जिन्होंने चुनाव के वक्त भाजपा का दामन थामा था और कुल मिलाकर पार्टी ने ऐसे 67 लोगों को टिकट दिया था। वहीं चर्चा कें बाजार में एक बयार यह भी हैं कि भाजपा करीब 50 मौजूदा विधायकों के टिकट काट सकती है। हालांकि चुनाव से पहले भागदौड़ का किस्सा बिल्कुल भी नया नहीं है दल बदल पक्ष विपक्ष सारी आम बातें हैं।

अगर बात अब ओपिनियन पोल की करें तों सत्ता के इस संघर्ष में बीजेपी समर्थित पार्टी अपनी दावेदारी मजबूत करती दिखाई दे रही हैं आंकङों के अनुसार आशंका हैं कि 2022 में भाजपा 235 से 250 सीटों पर काबिज हों सकतीं हैं 2017 में यह आंकड़ा 325 था हालांकि सीटों का नुक़सान भाजपा कों भी होता दिख रहा हैं लेकिन चिंता की सुई कांग्रेस और बसपा के लिए भी बराबर अपनी खनक बना रहीं. खैर किसका चलेगा जोर जनता किसके ओर इस चीज कों देखनें के लिए मतगणना की प्रतीक्षा भी जरूरी हैं.

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भाजपा विधायक रविंद्र नाथ त्रिपाठी के पार्टी छोड़ने की ख़बर फ़र्ज़ी

अमित द्विवेदी | नवप्रवाह डॉट कॉम 
उत्तर प्रदेश में चुनावी सरगर्मियाँ ज़ोरों पर है। सत्ता सुख के लिए दल-बदलू नेताओं की नेतागीरी शुरू हो गई है। स्वामी प्रसाद मौर्य और दारा सिंह के भाजपा छोड़ने के बाद तमाम नेताओं का नाम सामने आने लगा है। इसी बीच भदोही से भाजपा विधायक रविंद्र नाथ त्रिपाठी के पार्टी छोड़ने की फ़र्ज़ी ख़बर ने हड़कम्प मचा दिया।
भाजपा विधायक रविंद्र नाथ त्रिपाठी ने एक विडियो जारी कर कहा कि उनके ख़िलाफ़ साज़िश की जा रही है। उन्होंने कहा कि उनका तन-मन और जीवन भाजपा को समर्पित है। उन्होंने इसे अफ़वाह क़रार करते हुए स्पष्ट किया कि उनके लेटर हेड को स्कैन कर के उसमें इस्तीफ़ा लिखा गया और फ़र्ज़ी हस्ताक्षर किया गया। उन्होंने कहा कि मैंने इसके ख़िलाफ़ एफ़आईआर करा दिया है और उत्तर प्रदेश पुलिस से माँग किया है कि दोषी के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई किया जाए।
रविंद्र नाथ त्रिपाठी ने कहा कि मेरी स्वामी प्रसाद मौर्य से ७-८ महीने से बात नहीं हुई। ऐसे में उनके कहने पर पार्टी छोड़ने का सवाल ही पैदा नहीं होता। उन्होंने यह भी कहा है कि वे इस मामले की तहक़ीक़ात करवाएँगे और जो भी दोषी होगा उसे कठोर दंड दिलाएँगे।
रविंद्र में पत्रकार रोहिणी सिंह के ट्वीट का स्क्रीन्शॉट शेयर करते हुए अपने ट्विटर हैंडल से लिखा कि उनके फ़र्ज़ी इस्तीफ़े की भ्रामक ख़बर फैलाने के लिए इन्हें दंडित किया जाना चाहिए। उन्होंने लिखा कि रोहिणी ने मेरा दुष्प्रचार किया है, जिसके लिए पुलिस को उन पर कठोर कार्रवाई करना चाहिए।
ग़ौरतलब है कि राजनेताओं के दल बदलने की ख़बर को लेकर लोग ट्विटर पर ख़ूब मज़े ले रहे हैं। ऐसे में लोग फ़र्ज़ी और मनगढ़ंत ख़बरें भी ख़ूब बना रहे हैं। वाहवाही लूटने के चक्कर में बिना जाँच पड़ताल किए लोग ब्रेकिंग न्यूज़ साझा कर रहे हैं। फ़िलहाल रविंद्र नाथ ने ये साफ़ कर दिया है कि वे अभी भी भाजपा के साथ बने हुए हैं।