बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा की हुई हार की नैतिक ज़िम्मेदारी भले ही उसके वरिष्ठ नेता ले लें लेकिन उन बातों को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता, जिसकी वजह से बिहार में बीजेपी हवा हो गई. चाहे संघी बयानबाजी हो, दाल की कीमतों की हायतौबा या अवार्ड वापसी, हर मुद्दे ने बीजेपी की शाख को कमज़ोर ही किया. इसके अलावा भी चुनाव के दौरान ऐसी कई बातें सामने आई थी जिनकी वजह से भाजपा लगातार कमज़ोर होती नज़र आई.
कुछ ऐसे बिन्दुओं पर हम चर्चा करेंगे, जिसकी वजह से बिहार की जनता भाजपा से उस कदर नहीं जुड़ सकी, जितनी भाजपाइयों को अपेक्षा थी.
बागियों ने बिगाड़ा समीकरण-
पार्टी के खिलाफ की गई बयानबाजी और वरिष्ठ नेताओं पर आरोप लगाकर चुनाव के समय पार्टी छोड़ देने वाले नेताओं ने ही भाजपा को भारी नुकसान पहुँचाया. सुरेंदर सिन्हा, अमन पासवान और अजय मंडल जैसे कई विधायकों का शहनवाज हुसैन सहित अन्य पार्टी नेतों पर आरोप लगाते हुए पार्टी छोड़ देना और शत्रुघ्न सिन्हा एवं गृह सचिव रहे आर के सिंह जैसे नेताओं के बयानों से प्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष रूप से पार्टी को भारी नुकसान हुआ.
स्थानीय नेताओं पर अविश्वास-
बिहार विधानसभा चुनाव में पहले दो चरण तक पोस्टर और बैनर में किसी स्थानीय नेता को जगह नहीं मिली. भाजपा सिर्फ नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के चेहरे को दिखाकर चुनाव जीतना चाहती थी, जब तक गलती का एहसास होता बहुत देर हो चुकी थी. २ चरण के चुनाव हो गए थे तब जाकर बैनरों में पीएम नरेंद्र मोदी और अमित शाह की तस्वीरों कीजगह सुशील मोदी, गिरिराज सिंह, रविशंकर प्रसाद, राजीव प्रताप रूडी, शहनवाज हुसैन. हुकुमदेव नारायण यादव और सीपी ठाकुर जैसे स्थानीय नेताओं को जगह दी लेकिन इसका परिणाम पर कुछ ख़ास असर नहीं नज़र आया.
वादे पर खरा न उतरना-
लोकसभा चुनाव के समय भाजपा ने तमाम चुनावी वायदे किए थे, जिनमे से ऐसा कोई वायदा पूरा नहीं कर पाए जिसकी वजह से जनता को सरकार से सहानुभूति हो. महंगाई हो या महिला सुरक्षा, कश्मीर में जवानों की हत्या का मामला हो या नक्सली से निपटने का तरीका, अब तक मोदी सरकार किसी प्रभावी कदम उठाने में विफल रही है.
दाल और अवार्ड वापसी मामला-
चुनाव के समय ही दाल का २०० रूपए किलो का हो जाना और साहित्यकारों तथा फिल्मकारों द्वारा असहिष्णुता जैसे मुद्दे पर पुरस्कार वापस करने के मामले की वजह से आम जनता की सोच बदली. मंहगाई से आम जनता आहत हुई तो वहीँ बुद्धिजीवियों ने अवार्ड वापसी को गंभीरता से लेना शुरू कर दिया.
इसके अलावा और कई ऐसे बिंदु थे जिनकी वजह वोटरों को महागठबंधन की ओर रुख करना पड़ा. इसमें एक बड़ी वजह एनडीए के पास कोई मुख्यमंत्री का कोई चेहरा न होना भी है. बीजेपी के बारे में लोगों का ख़याल था कि इस पार्टी में वंशवाद के लिए कोई स्थान नहीं है लेकिन बीजेपी ने तीन बड़े नेताओं के लड़कों को टिकट दिया गया. पार्टी में असंतोष का माहौल दिखा ही साथ ही साथ जनता तक भी इसका गलत संदेश गया.
स्थानीय मुद्दों की कमी-
बिहार चुनाव के दौरान बीजेपी के पास मुद्दों की कमी भी नज़र आई. जबकि महागठबंधन ने स्थानीय समस्याओं के आधार पर वायदे किए, जिससे जनता का झुकाव तेज़ी से महागठबंधन की बढ़ा. बीजेपी अंत तक इस बात को समझ नहीं पाई कि बिना स्थानीय मुद्दे के विधानसभा चुनाव जीतना कितना कठिन है.
फिल्म हाफ गर्लफ्रेंड में बतौर प्रमुख अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत को साइन किया गया है। इस फिल्म के मेन लीड को लेकर तमाम कयाश लगाए जा रहे थे लेकिन फाइनली सुशांत का नाम निश्चित किया गया। फिल्म के निर्देशक मोहित सूरी ने कहा कि जब मैं हाफ गर्लफ्रेंड पढ़ रहा था तभी मुझे माधव का कैरेक्टर बड़ा इंटरेस्टिंग लगा।
निर्देशक मोहित सूरी अपनी आगामी फिल्म हाफ गर्लफ्रेंड को लेकर बेहद उत्साहित हैं। उन्होंने कहा कि इस फिल्म के लिए मुझे सुशांत ही परफेक्ट लगे. जिसकी वजह से हमने उनका चुनाव किया। सूत्रों की मानें तो कुछ दिन पहले सुशांत मोहित सूरी के घर गए और भोजपुरी में बात करना शुरू कर दिया, यही वजह है कि इस किरदार के लिए सुशांत का चुनाव किया गया।
निर्देशक मोहित सूरी ने कहा कि अब मैं माधव के किरदार में सुशांत के अलावा किसी और के बारे में सोच भी नहीं सकता। अब मुझे मेरा माधव झा मिल गया है जो की सटीक है।
सूरज बड़जात्या के निर्देशन में सलमान खान १५ साल के बाद ‘प्रेम’ की भूमिका में नज़र आएँगे अपनी अगली फ़िल्म ‘प्रेम रतन धन पायो’ में। इस फिल्म में सलमान खान के साथ नज़र आएंगी अभिनेत्री सोनम कपूर। अपनी पिछली फिल्म बजरंगी भाईजान की अपार सफलता के बाद सलमान ‘प्रेम रतन धन पायो’ को लेकर भी काफी उत्साहित हैं। उनका मानना है कि सूरज और प्रेम एक बार फिर से कुछ ख़ास करेंगे। दीपावली पर रिलीज़ होने जा रही फिल्म प्रेम रतन धन पायो और आगामी फिल्म सुल्तान के बारे में सलमान खान ने नवप्रवाह.कॉम से लम्बी बात की, प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश।
राजश्री प्रोडक्शन के साथ अभी तक का अनुभाव कैसा रहा?
राजश्री परिवार के साथ बिताया हर क्षण अतुल्य होता है, क्योंकि यह परिवार बहुत ही सभ्य और विनम्र है। मेरे हिसाब से सूरज बड़जात्या आज के दौर के सबसे बेहतरीन निर्देशक हैं।
सोनम कपूर के साथ कैसे केमिस्ट्री रही?
सोनम के साथ फ़िल्म साँवरिया में काम करने के बाद उनके साथ ये मेरी दूसरी फ़िल्म है। उनके साथ काम करने का अनुभव बहुत अच्छा रहा और साँवरिया के मुकाबले सोनम की कलाकारी में सात गुना प्रगति हुई है और मुझे उम्मीद है कि वे भविष्य में और भी बेहतर करेंगी।
प्रेम की भूमिका के बारे में क्या कहना चाहेंगे?
मैं पहले समझ नहीं पा रहा था कि मुझे करना क्या है, मगर सूरज ने जब मुझे कहानी और करैक्टर के विषय में अच्छी तरह समझाया तब मैं समझ गया कि मुझे क्या करना है। जिसके बाद मेरे लिए ‘प्रेम’ की भूमिका निभाना असान हो गया। इस फ़िल्म में लोगों को वही प्रेम देखने को मिलेगा मगर एक नये अंदाज़ में।
आगामी फिल्म सुल्तान के बारे में कुछ बताएं?
इस फ़िल्म के लिए मुझे अपने मशल्स बढ़ाने हैं, बस अभी उसी में लगा रहता हूँ दिन रात। मैं रोजाना कुश्ती और किक बॉक्सिंग की प्रैक्टिस करता हूँ और बहुत संतुलित आहार लेता हूँ क्योंकि वज़न बढ़ाना तो आसान है लेकिन मशल्स को बढ़ाना बड़ा कठिन है। इसलिए आजकल कड़ी मेहनत कर रहा हूँ। फ़िल्म की शूटिंग इसी महीने के अंत में शुरू करनी है इसलिए तैयारियां ज़ोरों पर चल रही हैं।
हाल ही में गीता पकिस्तान से लौटी है, आपको क्या लगता है कि फिल्म बजरंगी भाईजान का असर दिखा है?
देखिए, फिल्में समाज का आइना होती हैं। तो इनका असर तो अवश्य ही होगा। और अगर किसी चीज़ में आप इन्वाल्व हों और कुछ अच्छा हो जाए तो खुशी तो होते ही है। मैं आशा करता हूँ कि गीता को वही प्यार और सम्मान भारत में भी मिले जो उसे पकिस्तान में मिला। मैं प्राथना करता हूँ कि वो अपने सही परिवार से मिले, जिससे एक परिवार पूर्ण हो जाए और गीता को भी उनकी ख़ुशी मिल सके।
आपको लगता है कि प्रेम रतन धान पायो की कहानी से आम भारतीय परिवार खुद को जोड़ पाएगा?
बिल्कुल, मुझे पूरा विश्वास है। फिल्म की कहानी पूरी तरह से भारतीय संस्कृति और संस्कारों पर आधारित है। मुझे पूरा विश्वास है कि जब दर्शक इसे देखेंगे तो उन्हें अपने घर-परिवार या आस-पास की कहानी ज़रूर याद आएगी। मेरे ख़याल से हर परिवार की घटनाएं काफी मिलती जुलती हैं, बस उनके रहने,खाने और पहनने के स्तर में फर्क होता है।
आपको अपने करियर की सबसे बेहतरीन फिल्म कौन सी लगी?
बेशक ‘मैंने प्यार किया’। इसी फिल्म के बाद मैंने सफलता की सीढियां चढ़नी शुरू की। मुझे इसी फिल्म के बाद वो सब मिलना शुरू हुआ, जो एक कलाकार की ख्वाहिश होती है।
हमारा भारत विश्व का सबसे बड़ा और प्रतिष्ठित लोकतांत्रिक देश है और स्वस्थ लोकतंत्र भारत की नींव (जड़) है। हम सभी देशवासी इसके तने व पत्तियाँ हैं! सशक्त लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष के होने से देश मजबूत होता है। लोकतंत्र अन्य सब शासन प्रणालियों से श्रेष्ठ इसीलिए माना जाता है, जो शासकों की त्रुटियाँ बतलाता रहता है, उसकी आलोचना करता रहता है इसका अंकुश और उसके विरोध का भय सत्ता पक्ष शासकों को मनमानी करने से रोकता है। अतः निंदा या आलोचना से रूष्ट या दुखी होने अथवा बदला लेने की बात सोचने की बजाए उसका रचनात्मक उपयोग करना चाहिए इसी में सबका भला है। निंदा व आलोचना का उपयोग अपने उत्कर्ष और आत्म-परिष्कार के लिए किया जाता है ऐसी आशा की जाती है।
निंदा के प्रयास में अपने दुगुर्णों व दोषों को तलाशें और निंदक के प्रति सहिष्णुता बरतें। निंदक या आलोचक हमारे प्रछन्न प्रशंसक होते हैं। तभी तो कबीरदास जी ने कहा है कि ‘निंदक नियरे राखिये आंगन कुटी छवाय‘।
1950 से लेकर 1964 तक संसद निश्चित तौर पर हमारे लोकतांत्रिक प्रणाली का सबसे जीवंत मंच था। संसदीय प्रणाली के अध्येता आज भी डाॅ॰ राममनोहर लोहिया और पं॰ जवाहर लाल नेहरू के बीच होने वाली बहसों को याद करते हैं। 1963 ई॰ में डाॅ॰ राममनोहर लोहिया ने संसद में एक पर्चा बांटा था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि बतौर प्रधानमंत्री पं॰ जवाहर लाल नेहरू पर प्रतिदिन 25 हजार रूपयों का खर्च आता है, जबकि देश की आम जनता को प्रतिदिन 3 आने की कमाई पर निर्वाह करना पड़ता है। डाॅ॰ राममनोहर लोहिया के इस आरोप पर जब पं॰ नेहरू ने स्पष्टीकरण दिया तो डाॅ॰ लोहिया ने उनके हर तर्क का पुरजोर खंडन किया। पं॰ नेहरू का कहना था कि योजना आयोग की रिपोर्ट के अनुसार हिन्दुस्तान के प्रति नागरिक पर प्रतिदिन औसतन 15 आने खर्च होते हैं। पं॰ नेहरू को भी अंततः मानना पड़ा था कि आम आदमी के साथ अन्याय हो रहा है। अर्थात् एक व्यक्ति ने तत्कालीन सरकार का विरोध करके विपक्ष के आने वाले मजबूत स्वरूप का चित्रण कर दिया।
किसी भी लोकतंत्र की प्रतिनिधि संस्था में विपक्ष और उसके नेता की भूमिका भी साफ-साफ होनी चाहिए। मौजूदा लोकसभा के संदर्भ में नेता विपक्ष को लेकर जो विवाद हो रहा है और उस पर जो लेख लिखे जा रहे हैं, उन सभी को पढ़ते हुए यही लगता है कि नेता विपक्ष को लेकर स्पष्ट आख्या नही है। इन लेखों की एक विचित्र प्रवृत्ति है।
एक मजबूत लोकतंत्र के लिए जितना एक सशक्त सरकार की आवश्यकता होती है, उतनी ही सबल विपक्ष की। ऐसे उदाहरण सामने हैं, जब जनता ने कमजोर सरकार को जड़ से उखाड़ फेंका व उसके विकल्प में उस समय के सबल-विपक्ष को बहुमत दिया। कुछ ऐसे उदाहरण भी समाने आए हैं जिनमें यह देखने को मिला कि कमजोर विपक्ष के कारण देश में एक बहुमत वाली सरकार ने तानाशाही का रूप ले लिया। राजीव गाँधी ने नवीं लोकसभा (1989) में कांग्रेस की हार के बाद कहा था कि ‘हमें‘ जनता ने विपक्ष में बैठने की अनुमति प्रदान की है, वे सरकार में प्रहरी की भूमिका का निर्वाहन करेंगे।
सुदृढ़ व संगठित विपक्ष लोकतंत्र की निशानी है। विपक्ष शब्द विरोध की प्रतिध्वनि देता है, जबकि प्रतिपक्ष दायित्व बोध को प्रकट करता है। विश्व संसदों का जनक ब्रिटेन है, जहाँ का प्रधानमंत्री अपनी पत्नी से ज्यादा विपक्ष की जानकारी रखता है।
अगर हम संसद के इतिहास पर नजर डालें तो कई ऐसे उदाहरण दिखते हैं, जब विपक्ष ने मजबूती से तत्कालीन सरकार का विरोध किया। 1987 (बोफोर्स) घोटालों के विरोध में विपक्ष ने 45 दिनों तक संसद चलने ही नहीं दिया। इसी प्रकार 2001 ( तहलका खुलासा) में 17 दिनो तक संसद नही चली, तब जाकर सरकार को कार्य विधि करनी पड़ी।
इसी प्रकार अभी कुछ साल पहले 2010 (2 जी घोटाला) में तत्कालीन शीतकालीन सत्र बेकार हो गया था, तब 23 दिन के उस सत्र में महज चंद धण्टे काम हुआ और महज 32 विधेयकों पर चर्चा हुयी। लालकृष्ण आड़वानी पहले विपक्ष के नेता हैं जिन्हें कैबिनेट रैंक का दर्जा दिया गया। इसी प्रकार विपक्ष की अहमियत तब भी देखने को मिली जब 11वीं लोकसभा के दौरान सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित होने की पहली बार धरना इसी लोकसभा में हुयी जिसमें विपक्ष के सामने वी०पी० सिंह सरकार को झुकना पड़ा था, विपक्ष में इस सरकार को सत्ता से सत्ताच्युत कर दिया था।
पिछले दो दशक में नारेबाजी, विरोध प्रदर्शन के नजारे बहुत आम हो गए हैं। सांसदों को इनसे जैसे कोई फर्क ही नहीं पड़ता। जानकारों का मानना है कि संसद की कार्यवाही का टेलीविजन पर सीधा प्रसारण शुरू किये जाने के बाद से यह समस्या और बढ़ी है। सांसदो ने इसे अपने प्रचार का माध्यम बना लिया है बरहाल इसका खामियाजा आम जनता को ही भुगतना पड़ता है, जिनका पैसा व्यर्थ जा रहा है।
2004 से 2014 तक पिछले दो दशकों में विपक्ष संख्यात्मक दृष्टि से कमजोर लेकिन गुणात्मक एवं चारित्रिक रूप से प्रभावी था। भारतीय राजनीति के इतिहास में एक ऐसा समय भी आया जब समर्थन और विरोध दोनों बिकाऊ हो गए।विपक्ष को भी दलगत और पक्षपातपूर्ण राजनीति से ऊपर उठकर विधेयकों तथा राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर रचनात्मक वाद-विवाद करने की चुनौती होगी। क्या वे संसद को भार में डूबने की अनुमति देगें? यह आवश्यक है कि हमारे नये
सांसद (विपक्ष) तर्को पर ध्यान दें! इसके पूर्व कि लोग उनका उपहास करें।
लोकतंत्र अन्य सब शासन प्रणालियों से श्रेष्ठ इसीलिए माना जाता है, क्योंकि उसमें सत्ता पक्ष के अतिरिक्त एक सबल विपक्ष भी होता है, जो शासकों की त्रुटियाँ बतलाता है, उसकी आलोचना करता है, उस पर अंकुश और उसके विरोध का भय शासकों को मनमानी करने से रोकता है।
संसद की दुर्दशा को देखकर बारंबार धूमिल जी याद आते है, जिन्होंने लिखा था-
“एक आदमी रोटी बेलता है, एक आदमी रोटी खाता है, एक तीसरा आदमी भी है। जो न तो रोटी बेलता है, न ही खाता है, बल्कि वह सिर्फ रोटी से खेलता है।”
अर्थात् हर विपक्ष को इतना मजबूत होना चाहिए कि कोई भी सत्तारूढ़ दल/सत्ता आम नागरिकों की रोटियों से खेल न सके और न ही तानाशाही कर सके।
भारत में सदैव सत्तारूढ़ दल कुल मतदान का 49 प्रतिशत मत पाकर भी एकजुटता के कारण सत्ता में रहा तथा कुल मतदान का 51 प्रतिशत मत विपक्षी दलों के पास रहा, लेकिन खण्ड-खण्ड में विभाजित होने के कारण विपक्ष की आवाज नकारी जाती रही है। जहाँ सत्ता का संचालन करना सरकार की जिम्मेदारी है, वही विपक्ष का कार्य रेफरी की भांति चौकसी करना है कि सरकार सही रीति-नीति से शासन-प्रशासन का संचालन करें।
विपक्ष के प्रमुख कार्यों में लोकतन्त्र को लोकपथ पर लाना एवं लोभतंत्र से बचाना, सत्तारूढ़ दल की नाक में नकेल डालने का असरदार हथियार, जनता एवं सरकार के मध्य सेतु का कार्य भी विपक्ष का है और साथ में विपक्ष को संगठित, समर्पित व अनुशासित होना चाहिए क्योंकि विपक्ष देश की वैकल्पिक सरकार है।
अन्त में कलम का एक अदना सा सिपाही होने के नाते मैं सत्तारूढ़ पक्ष व विपक्ष दोनों से यही कहना चाहूँगा, कि-
देश में असहिष्णुता के नाम पर चल रहे विवाद पर एक बार फिर से अभिनेता अनुपम खेर ने हल्ला बोल दिया है। अनुपम पुरस्कार वापसी मामले पर अरुंधती रॉय पर बेहद नाराज़ नज़र आए। खेर ने कहा कि अरूंधति रॉय हमेशा ही देश के बाहर जाकर हिन्दुस्तान की बुराई करती रही हैं। मुझे उनकी स्पीच देखकर लगता है कि क्या ये हिन्दुस्तान की नागरिक हैं। और वैसे भी जब आप निजी स्वार्थ के लिए देश की बुराई करते हैं तो यह गलत है।
अनुपम खेर ने आज भी असहिष्णुता मामले पर सम्मान वापसी करने वालों को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि देश को बाहर बदनाम करना कोई भी भारतीय बर्दाश्त नहीं कर सकता। खेर ने कहा कि यह सोच कर भी आश्चर्य होता है कि इन १४ महीनों में लोगों को इतना भय लगाने लगा कि सम्मान वापसी तक मामला पहुँच गया।
मुझे इस बात का बिल्कुल डर नहीं कि मेरे इन बयानों से कुछ लोग मुझे अपनी फिल्मों में कास्ट करना छोड़ देंगे लेकिन मुझे इस बात का बिल्कुल भी डर नहीं है, क्योंकि देश मेरे प्रोफेशन से बढ़कर है।
अनुपम खेर
खेर ने उन सभी से प्रश्न किया जो अवार्ड वापस कर रहे हैं कि पिछले 14 महीनों में ही असहिष्णुता बढ़ी है? उन्होंने कहा कि बीते समय में सिखों की हत्या नहीं हुई, इमरजेंसी नहीं हुई? राष्ट्रपति भवन पर कलाकारों के मार्च के सवाल पर खेर ने कहा कि यह कि फिल्म नहीं है, कल अगर 5 लोग भी होंगे तो वो देश के लिए आएंगे।
महाराष्ट्र में वाशिम जिले के एक मोतियाबिंद जांच शिविर में चिकित्सकों द्वारा ऑपरेशन में की गई लापरवाही के चलते चार लोगों की आंखों की रोशनी चली गई और 19 अन्य लोगों की देखने की शक्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है। राज्य स्वास्थ्य विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारीके मुताबिक़ गड़बड़ी के मद्देनजर मरीजों का ऑपरेशन करने वाले डॉक्टर को निलंबित कर दिया गया है, जबकि अकोला चिकित्सकीय महाविद्यालय के एक चिकित्सक के निलंबन की भी सिफारिश भी की गई है। उन्होंने कहा, ‘‘ हमें इस संबंध में 31 अक्टूबर को ही रिपोर्ट मिली थीं। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने तत्काल कार्रवाई की और वाशिम एवं अकोला से 22 मरीजों को मुंबई के जे जे अस्पताल में भर्ती कराया है।
वाशिम अस्पताल और अकोला चिकित्सकीय कॉलेज में चिकित्सकों द्वारा गंभीर लापरवाही बरते जाने का पता लगने और रिपोर्ट मिलने के बाद राज्य के स्वास्थ्य मंत्री ने मोतियाबिंद जांच शिविर में करीब 14 मरीजों का ऑपरेशन करने वाली वाशिम की सिविल सर्जन सुरेखा मेंडे और डॉ.पी.पी. चौहान को निलंबित करने का आदेश दिया है। मुंबई के जे जे अस्पताल में आंखों के प्रतिष्ठित सर्जन टी पी लहाने ने बताया कि हम मरीजों की दृष्टि सही करने के लिए हर संभव कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘‘ उनकी आंखों में अत्यंत गंभीर ‘स्यूडोमोनास’ संक्रमण हुआ है। अभी तक हमने 21 मरीजों का आपरेशन किया है, जिनमें से 14 अत्यंत गंभीर रूप से प्रभावित हैं। हम चार मरीजों की आंखों की रौशनी लौटाने में सफल हुए हैं, जबकि चार अन्य मरीजों की आंखों की रौशनी चली गई हैं। लहाणे ने कहा, ‘‘आंखों संबंधी गंभीर समस्या से ग्रस्त 19 मरीज इस समय अस्पताल में भर्ती हैं और हम उनका उपचार करने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं। डॉ. लहाणे ने कहा कि यदि मरीजों को समस्या के शुरूआती चरण में भी जे जे अस्पताल लाया गया होता तो स्थिति इतनी नहीं बिगड़ती।
स्वास्थ्य अधिकारी के मुताबिक़, ‘‘इन मरीजों ने जब वाशिम अस्पताल आना शुरू किया तो चिकित्सकों ने समस्या का कारण जानने की कोशिश करने के बजाए उन्हें अकोला में चिकित्सकीय कॉलेज में भेज दिया और वहां भी दस से अधिक दिनों तक उन पर उचित ध्यान नहीं दिया गया, जो कि गंभीर एवं आपराधिक लापरवाही दर्शाता है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘स्वास्थ्य विभाग ने अकोला चिकित्सकीय कॉलेज के नेत्र रोग विशेषज्ञ उमेश तिवारी के खिलाफ कार्रवाई करने के संबंध में चिकित्सकीय शिक्षा विभाग से सिफारिश की है।’’ फिलहाल राज्य के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. दीपक सावंत इन मरीजों को मुहैया कराए जा रहे उपचार की स्वयं जानकारी ले रहे हैं।
ShikhaPandey@Navpravah.com
नवम्बर महीने में भी तापमान के उतार चढ़ाव ने मंबईकरों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है. सरकारी अस्पतालों से मिली जानकारी के मुताबिक़ अक्टूबर महीने में मौसमी बीमारी के चलते १३ हज़ार से भी अधिक मरीज भर्ती हुए हैं. दिन में तेज़ गर्मी और रात में हल्की ठंडी की वजह से आम जमानस में बीमारी तेज़ी से फ़ैल रही है. ठंडी हल्की होती है जिसकी वजह से लोग ज्यादा ख़याल नहीं रखते. इस लापरवाही के चलते मुंबई में भारी संख्या में लोग बीमार हो रहे हैं. मौसम की आँख मिचोली के चलते मरीजों की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है.
मनपा हेल्थ रिपोर्ट के मुताबिक़ अक्टूबर महीने में अस्पतालों में लगभग १३२२७ मरीज बरसाती बीमारियों के चपेट
में आकर मनपा और राज्य सरकार के विभिन्न अस्पतालों में भर्ती हुए. प्राप्त जानकारी के मुताबिक इनमे सबसे अधिक संख्या बुखार और गैस्ट्रो के मरीजों की थी. सरकारी अस्पतालों में मरीजों की भारी संख्या की वजह से मरीजों भय का माहौल बंता नज़र आ रहा है.
बारिश की शुरुआत में ही मनपा ने बीमारियों को नियंत्रित करने के लिए तमाम उपाय किया लेकिन इसके बावजूद बदलते मौसम के चलते पिछले एक महीने में १३२२७ मरीज विभिन्न अस्पतालों में भर्ती हुए.
अक्टूबर माह में विभिन्न बीमारियों की वजह भर्ती मरीजों का आंकड़ा-
सामान्य बुखार – ११०८१ ,
मलेरिया – ८६० ,
लेप्टो – १६ ,
डेंग्यू – २११,
एच१एन१ – २७,
गैस्ट्रो – ७६५,
टायफाईड – १६०
हेपेटाइटिस – १०६ और कॉलरा का एक मरीज शामिल है.
लगातार बिगड़ती स्थिति को देखते हुए मनपा ने मरीजों आवाहन किया है कि यदि लोग बदन दर्द, सिर दर्द, बुखार जैसी समस्याओं से गुजरे तो इसे आम न समझकर यथाशीघ्र अस्पतालों में जाकर इसका इलाज कराए. मनपा के स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि लोग हमेशा खुद से इलाज करने के कारण अस्पताल आने में देरी कर देते हैं, जिसके बाद उन्हें कभी-कभी अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ता है.
कुछदिन से मौसम में बदलाव आने और दिन में गर्मी रात में ठंडी होने से वायरल फीवर के मरीज बढे हैं. जहाँ एकदिन में बुखार के २० मरीज आते थे वो अब बढ़कर दोगुना हो गए हैं,जिससे लोगों को सतर्क होने की जरुरत है.
-डॉक्टर रेनू सिंह
(जनरल फिजिशियन )
मौसम में उतार चढ़ाव से लोगों को सर्दी, खांसी, बुखार, यूरिन समस्या बढ़ेगी और मरीज को डायरिया, फ़ूड पॉइज़निंग जैसी शिकयते होंगी. इन्हें बिल्कुल भी हल्के में न लें और चिकित्सक की परामर्श लेते रहे.
गुरूवार को राष्ट्रपति भवन में विज़िटर्स कांफ्रेंस के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि हमारे देश के राष्ट्रपति ज्ञान के सागर हैं और हम भाग्यशाली हैं जो हमें उनके साथ काम करने का मौक़ा मिला है।
रक्षा स्वदेशी प्रौद्योगिकी के विकास को लेकर उन्होंने देश के विश्वविद्यालयों के कुलपतियों और आईआईटी के प्रमुखों से कहा कि यह आपका सौभाग्य है कि उन्हें सीधे राष्ट्रपति मुखर्जी के निर्देश में काम करने का मौक़ा मिला है। आप सभी राष्ट्रपति के विराट कार्यानुभवों का लाभ अवश्य मिलेगा। और देश के शिक्षा संस्थानों का सीधा लाभ देश को मिलता है।
कॉन्फ्रेंस में प्रधानमंत्री ने कहा कि मुझे व्यक्तिगत रूप से प्रधानमंत्री बनने का सबसे बड़ा फायदा यही नज़र आता है कि मैं राष्ट्रपति मुखर्जी से मुलाकात कर पाता हूँ। वह हर मसले को बड़ी ही गंभीरता से समझाते हैं।
असहिष्णुता वाले मामले में शाहरुख खान के विरोध में ऊट-पटांग बयान देने वाले भाजपा नेता अपनी ही पार्टी के बयानों पर लीपा पोती करते दिख रहे हैं। योगी आदित्यनाथ और कैलाश विजयवर्गीय जैसे नेताओं के विवादित बयान से खुद को अलग करते हुए टेलिकॉम मंत्री रविशंकर प्रसाद ने अभिनेता शाहरुख ख़ान के बारे में कहा कि वे सच्चे भारतीय हैं और असाधारण प्रतिभा के धनी हैं। उनके पिता स्वतंत्रता सेनानी थे।
शाहरुख खान के बयान के बाद भाजपा नेताओं ने बयान तो दे दिया लेकिन अब उन्ही की पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेता मामले को संतुलित करने में लगे हैं। गौरतलब है कि कैलाश विजयवर्गीय के विवादित बयान के बाद सरकार के पक्ष में खड़े अनुपम खेर ने भी हिदायत दी थी कि भाजपा के नेता शाहरुख के बारे में उलटे सीधे बयान देने से बचें। जिसके बाद से पार्टी नेताओं ने मामले को शांत करने की कोशिश में लगे हुए हैं।
असहिष्णुता और देश में बन रहे विरोध के माहौल पर रविशंकर प्रसाद ने बीजेपी को सबको साथ लेकर चलने वाली पार्टी बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि बहस, चर्चा और विभिन्नता भारत की विरासत का हिस्सा है। हमारी सरकार भारत की समृद्ध विरासत के प्रति प्रतिबद्ध है।
प्रसाद ने उन लोगों पर भी हमला बोला जो जानबूझकर मामले को तूल देने की कोशिश में लगे हैं। उन्होंने कहा कि बीजेपी से नफरत करने वाले तमाम बुद्धिजीवी ऐसे मौकों पर शांत रहे, जब तसलीमा नसरीन बंगाल से निकाला गया, उस समय वहाँ सीपीएम की सरकार थी और सलमान रुश्दी की किताब पर पाबंदी लगाईं गई उस समय क्यों सन्नाटा पसरा था साहित्यिक जगत में।
Amit Dwivedi @Navpravah.com
सम्मान वापसी मुद्दे पर अब सलमान ख़ान के पिता सलीम ख़ान ने प्रधानमंत्री मोदी का बचाव किया है. उहोने अपने एक साक्षात्कार में कहा कि प्रधानमंत्री कम्युनल नहीं है. यही नहीं उन्होंने यह भी कहा कि क्या देश के मुसलमान पाकिस्तान,ईराक,ईरान या अफगानिस्तान जैसे देश में जाकर रह सकते हैं.
देश में लगातार बिगड़ते माहौल के दौरान नामचीन पटकथा लेखक सलीम ख़ान ने कहा कि मैं भारत को सबसे बेहतरीन देश मानता हूँ. यह कहना गलत न होगा कि मुसलमानों के रहने के लिए यह सबसे सुरक्षित जगह है. उन्होंने कहा कि मुस्लिमों के लिए इससे अच्छा देश कोई हो ही नहीं सकता.
संस्कृति और सभयता की बात पर सलीम ने कहा कि अगर मुस्लिमों को देश में रहना है तो देश और इसकी संस्कृति की इज्जत करनी होगी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में पूछे गए सवाल पर उन्होंने कहा कि मोदी सबका साथ सबका विकास पर अडिग नज़र आते हैं मुझे, उनके नेतृत्वा में मुझे कोई कमी नहीं नज़र आती.
लगातार लौटाए जा रहे अवार्ड के मसले पर सलीम खान ने स्पष्ट किया कि सरकार को इस पर काम करना चाहिए. उन्होंने कहा कि अगर देश का प्रबुद्ध वर्ग ऐसा कुछ कर रहा है तो अवश्य कुछ बात होगी. इस मसले पर सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए.