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Saturday, September 12, 2026
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‘गिलगित-बाल्टिस्तान हमारा, खाली करे पाकिस्तान’ :भारत

न्यूज़ अपडेट | Navpravah Desk

भारत ने पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट के उस फ़ैसले का कड़ा विरोध किया है, जिसमें उसने गिलगित और बाल्टिस्तान में चुनाव कराए जाने का आदेश दिया है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने साफ़ कर दिया है कि सम्पूर्ण जम्मू-कश्मीर क्षेत्र और लद्दाख़ के अलावा गिलगित-बाल्टिस्तान पर भारत का एकाधिकार है।

भारत ने यह प्रतिक्रिया पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट के उस फ़ैसले के बाद दिया, जिसमें उसने पाकिस्तान की सरकार से इस क्षेत्र में आम चुनाव करवाने का आदेश दिया था। विदेश मंत्रालय के मुताबिक, “चूंकि गिलगित-बाल्टिस्तान भारत का अभिन्न हिस्सा है, लिहाजा पाकिस्तान इसे फौरन खाली कर दे। उसका यहां कब्जा गैरकानूनी है। हमने पाकिस्तान के एक सीनियर डिप्लोमैट को तलब कर उन्हें अपना पक्ष बता दिया है।”

पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से 2018 के एक कानून में संशोधन और वहां चुनाव कराने को कहा है। जिसके बाद तत्काल प्रभाव से भारत सरकार ने पाकिस्तान को आगाह किया कि वो गिलगित-बाल्टिस्तान को अपना इलाक़ा समझने की ग़लती न करे।

विदेश मंत्रालय ने बयान में आगे कहा, “हमने पाकिस्तान को साफ बता दिया है कि जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और गिलगित-बाल्टिस्तान कानूनी तौर पर भारत का हिस्सा हैं। अवैध कब्जे वाले इस हिस्से पर पाकिस्तान सरकार या वहां की अदालतें कोई फैसला नहीं ले सकतीं। भारत इन हरकतों को कभी सहन नहीं करेगा।”

विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया “पाकिस्तान की हालिया हरकतें गैरकानूनी कब्जों पर पर्दा नहीं डाल सकतीं। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में मानवाधिकार उल्लंघन की शिकायतें गलत हैं। यहां लोग सात दशकों से पूरी आजादी के साथ रह रहे हैं।”

एमपी: गुना में मजदूर परिवार शौचालय में किया गया क्वारंटाइन

न्यूज़ अपडेट | Navpravah Desk

एमपी के गुना जिला के देवीपुरा गांव में सहारिया आदिवासी परिवार को एक स्कूल के टॉयलेट में क्वारनटीन करने का मामला सामने आया है, राजगढ़ जिले से लौटे इस परिवार के साथ ऐसा किया गया‌ है।

नई दुनिया अखबार के मुताबिक टॉयलेट में खाने की थाली के साथ परिवार के मुखिया भैया लाल की एक तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है, और तभी यह मामला सबके सामने आया है, इस तस्वीर के सामने आने के बाद लोग सरकार पर कई तरह के आरोप लगा रहे हैं।

इस वाक्ये पर कांग्रेस ने अपने एक ट्वीट में बीजेपी नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया पर निशाना साधते हुए कहा कि, यह गुना की एक तस्वीर है, जहां एक परिवार को टॉयलेट में क्वारनटीन किया गया है, जो लोग हर किसी मुद्दे पर सड़कों पर उतरने की धमकी देते थे, वो लोगों की नजरों से उतर गए हैं।

सिंधिया ने इसी साल मार्च में कांग्रेस के हाथ को छोड़कर बीजेपी का दामन थामा था, उसी के बाद मध्य प्रदेश में कमलनाथ की अगुआई वाली कांग्रेस सरकार गिर गई और बीजेपी के शिवराज सिंह चौहान फिर राज्य के मुख्यमंत्री बने थे।

मामला यह है कि, भैया लाल सहारिया, अपनी पत्नी भूरी बाई और दो बेटों के साथ शुक्रवार की शाम को अपने गांव देवीपुरा लौटे थे, ग्रामीणों ने उन्हें तब तक गांव में घुसने देने से इनकार कर दिया जब तक कि इस पूरे परिवार का कोरोनावायरस टेस्ट नहीं हो जाता, इसलिए स्थानीय प्रशासन ने परिवार को रात प्राइमरी स्कूल में बिताने के लिए कहा।

रविवार की सुबह स्वास्थ्य और जिला प्रशासन के अधिकारियों की एक टीम स्कूल पहुंची, इस टीम ने भैया लाल सहरिया को टॉयलेट के अंदर खाने की थाली के साथ देखा, टीम के एक सदस्य ने तस्वीर खींच कर स्वास्थ्य विभाग के निगरानी अधिकारियों को भेज दी और फिर यह तस्वीर वायरल हो गई‌।

महान नहीं ईर्ष्यालु आक्रांता था बख्तियार खिलजी, नालंदा विश्वविद्यालय को किया था नष्ट

अमित द्विवेदी | Editorial Desk

प्राचीन भारत में नालंदा विश्वविद्यालय उच्च शिक्षा का एक ऐसा केंद्र था जहाँ विश्व के तमाम देशों के विद्यार्थी ज्ञानार्जन करने आते थे। दुनिया के सबसे प्राचीन विश्वविद्यालयों में से एक नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना 5वीं शताब्दी में गुप्त वंश के शासक सम्राट कुमारगुप्त ने की थी। इस विश्वविद्यालय में दूर देशों जैसे कोरिया, जापान, तिब्बत, चीन, ग्रीस और पर्शिया तक के विद्यार्थी अध्ययन के लिए आया करते थे।

नालंदा विश्वविद्यालय के अवशेष

महायान बौध धर्म के इस विश्वविद्यालय में हीनयान बौद्ध धर्म के साथ अन्य धर्मों की शिक्षा दी जाती थी। अनेक पुराभिलेखों और सातवीं सदी में भारत भ्रमण के लिए आये चीनी यात्री ह्वेनसांग तथा इत्सिंग के यात्रा विवरणों से इस विश्वविद्यालय के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है। ख़ुद चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी यहां लगभग साल भर शिक्षा ली थी।

प्राचीन काल में भी इस विश्वविद्यालय में जो सुविधाएँ प्रदान की जाती थीं, वह अकल्पनीय हैं। यह पहला ऐसा विश्वविद्यालय था जो पूरी तरह से आवासीय था और कोई शुल्क नहीं लिया जाता था। छात्रों और शिक्षकों के लिए विश्वविद्यालय परिसर में ही आवास का पूरा इंतज़ाम था। विश्वविद्यालय में सभी संकायों को मिलाकर लगभग दो हज़ार शिक्षक थे।

अब प्रश्न यह उठता है कि शिक्षा का अलख जगाने वाले ऐसे विश्वविद्यालय को नष्ट क्यों कर दिया गया? एक ऐसा विश्वविद्यालय जो विश्व के तमाम देशों के विद्यार्थियों को बिना किसी भेदभाव के शिक्षित करता था, उसे नष्ट क्यों कर दिया गया? आइये जानते हैं नालंदा विश्वविद्यालय को कितनी बार नष्ट किया गया और कौन सा ऐसा विनाशकारी हमला था जिसने शिक्षा के इस महामंदिर को हमेशा के लिए खण्डहर में तब्दील कर दिया।

जब स्कंदगुप्त यहाँ का शासक हुआ करता था, उस समय ह्यून के कारण पहला विनाशकारी हमला हुआ था। इस हमले में विश्वविद्यालय को काफी क्षति पहुंची थी लेकिन स्कंदगुप्त के उत्तराधिकारियों ने इसकी मरम्मत करवाई और कुछ समय के बाद विश्वविद्यालय पूर्ववत संचालित होने लगा।

विश्वविद्यालय को नष्ट का सिलसिला यहीं नहीं थमा, नालंदा विश्वविद्यालय पर दूसरा विनाशकारी हमला किया गौदास ने। इस बार, बौद्ध राजा हर्षवर्धन (606-648 ईस्वी) ने विश्वविद्यालय की मरम्मत करवाई थी।

नालंदा विश्वविद्यालय के अवशेष

इस के बाद साल 1193 में तुर्की आक्रमणकारियों ने नालंदा को लूटा और विश्वविद्यालय को पूरी तरह से नष्ट कर दिया। तुर्क सेनापति इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी और उसकी सेना ने बिहार में भीषण तबाही मचाई और खूब धन लूटा। उसने धन संपत्ति के साथ भारत वर्ष की संस्कृति को भी काफी क्षति पहुंचाई।

“इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी इस बात से परेशान था कि बौद्ध धर्म एक बड़े धर्म के रूप में कैसे उभर रहा है जबकि वह इस्लाम का पताका लहराने के लिए कुछ भी करने को तैयार था, किसी भी स्तर तक गिर जाने में संकोच नहीं करता था। इस्लाम का ध्वज फहराने के लिए उसने सबसे सशक्त शिक्षा के केंद्र नालंदा विश्वविद्यालय को चुना। उसने यह तय किया कि इस विश्वविद्यालय का समूल विनाश करने के बाद बौद्ध धर्म के अस्तित्व को वह समाप्त कर देगा। खिलजी ने नालंदा विश्वविद्यालय के पुस्तकालय को भी पूरी तरह से नष्ट कर दिया। उसने लगभग 90 लाख किताबों को ख़ाक कर दिया। जानकारों के मुताबिक़ खिलजी ने जब पुस्तकालय को आग के हवाले किया, तो तीन महीने तक वह आग बुझी ही नहीं। लगातार तीन महीने तक किताबें जलती ही रहीं। “

नालंदा विश्वविद्यालय के क्षतिग्रस्त होने की वजह से प्राचीन भारतीय वैज्ञानिक विचारों की अपूरणीय क्षति हुई।

तबाकत-ए-नासिरी के आधार पर नालंदा विश्वविद्यालय का विनाश कैसे हुआ था, आइये जानते हैं-

तबाकत-ए-नासिरी, फारसी इतिहासकार ‘मिनहाजुद्दीन सिराज’ द्वारा रचित पुस्तक है। इसमें मुहम्मद ग़ोरी की भारत विजय तथा तुर्की सल्तनत के आरम्भिक इतिहास की लगभग 1260 ई तक की जानकारी मिलती है। बता दें कि उस समय मिनहाज दिल्ली का मुख्य क़ाज़ी था। इस पुस्तक में ‘मिनहाजुद्दीन सिराज’ ने नालंदा विश्वविद्यालय के बारे में भी ज़िक्र किया है कि खिलजी और तुर्की सेना नें हजारों भिक्षुओं और विद्वानों को जला कर मार दिया, क्योंकि वह नहीं चाहता था कि बौद्ध धर्म का विस्तार हो। वह इस्लाम धर्म का प्रचार-प्रसार करना चाहता था। इसलिए उसने नालंदा की लाइब्रेरी में उसने आग लगवा दी और सारी पांडुलिपियों को जला दिया।

ऐसा माना जाता है कि धार्मिक ग्रंथों के जलने के कारण भारत में एक बड़े धर्म के रूप में उभरते हुए बौद्ध धर्म को सैकड़ों वर्षों तक का झटका लगा था और तब से लेकर अब तक यह पूर्ण रूप से इन घटनाओं से नहीं उभर सका है।

भूली हुई यादें- “संगीतकार जयदेव”

डॉ० कुमार विमलेन्दु सिंह | Navpravah Desk

कुछ क़िस्से बड़े दिलचस्प होते हैं, उनमे से कोई एक किरदार, लड़ता है, गिरता है, उठता है और फिर जीतता है| उस किरदार को जीतता हुआ देखना, बड़ा सुकून भरा होता है, लेकिन क़िस्सागो कितना भी बढ़िया क्यों न हो, उस किरदार के मन के अंदर के डर, अफ़सोस और जद्दोजहद को एकदम वैसे ही बयां नहीं कर सकता, जैसा उस किरदार ने महसूस किया होता है| संगीतकार जयदेव की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, जिसमें शोहरत है, अर्श है, महफिलें हैं एक तरफ़, तो दूसरी ओर गुमनामी है, ज़मीन की भीड़ है और तन्हाई है|

१९६१ में आई फ़िल्म ‘हम दोनों’ के दौरान देवानंद और जयदेव (PC-Pinterest)

जयदेव, 1918 में, नैरोबी, केन्या में पैदा हुए और कुछ ही दिनों बाद, उनका परिवार, लुधियाना, पंजाब आ गया| एक बार जयदेव ने कहीं, फ़िल्म, “अलीबाबा और चालीस चोर” देखी और उनके ऊपर जुनून सवार हो गया, फ़िल्मों में काम करने का|नतीजा ये हुआ कि महज़ 15 साल के कमउम्र जयदेव, बंबई (अब मुंबई) भाग गए| वहां से इन्हें पकड़ कर वापस लाया गया, लेकिन वापस आने के पहले, जयदेव 8 फ़िल्मों में, बहैसियत चाइल्ड आर्टिस्ट काम कर चुके थे|

रुना लैला, भूपेन्द्र, व जयदेव (PC-HamaraPhotos)

वापस लुधियाना आ कर उन्होंने पाया कि उनकी दिलचस्पी मौसिक़ी में भी है| उन्हें रेडियो में गाने का मौक़ा भी मिला, लेकिन जल्दी ही, सांस फूलने की बीमारी ने ये तय कर दिया कि बतौर गायक, वे ज़्यादा कामयाब न हो सकेंगे| उन्होंने हार नहीं मानी और उस्ताद हरबल्लभ मेला से शुरूआती तालीम ली|

” इसके बाद ये फिर मुंबई जा पहुंचे और 1934 में आई फ़िल्म, “वामन अवतार” में, नारद का किरदार निभाया. इस दौरान वे जावकर बंधुओं से संगीत भी सीखते रहे. अब सब संभल ही रहा था कि अचानक इन्हें फिर वापस लुधियाना आना पड़ा, क्योंकि इनके पिता, अंधे हो चले थे. “

1943 में, इनके पिता गुज़र गए और सभी ज़िम्मेदारियों से फ़ारिग होकर, उसी साल ये लखनऊ पहुंच गए और मशहूर अली अकबर ख़ान से सीखना शुरू किया| जब 1951 में, अली अकबर, नवकेतन फ़िल्म्स के बहुत बार बुलाने पर, उनकी फ़िल्म, “आंधियां” और “हमसफ़र” में म्यूज़िक देने गए, तो जयदेव भी बतौर असिस्टेंट उनके साथ गए| यहीं, जयदेव, महान म्यूज़िक डायरेक्टर सचिन देव बर्मन से मिले और उनके असिस्टेंट के तौर पर भी काम करने लगे|

जयदेव, जगजीत सिंह व चित्रा सिंह (PC-Cineplot)

वक़्त ने करवट लिया और 1961 में आई फ़िल्म, “हम दोनों”, जो कि नवकेतन बैनर की आख़िरी B&W फ़िल्म थी| इस फ़िल्म का संगीत देने का भार जयदेव. को दिया गया| वैसे तो सभी गाने बेहतरीन बने, लेकिन 3 गाने इतिहास बने| वे तीन गाने थे:

“अभी ना जाओ छोड़कर”

“मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया”

“कभी ख़ुद पे, कभी हालात पे रोना आया”

आज भी ये तीनों गाने मिसाल हैं पुरकशिश नग़्मों के| इसके बाद जयदेव रुके नहीं| इन्होंने लगभग चालीस फ़िल्मों में संगीत दिया और ज़्यादातर को, इनके संगीत के लिए ही जाना जाता है| इन्हें 3 राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले, 1972 में “रेशमा और शेरा” के लिए, 1979 में “गमन” के लिए और 1985 में “अनकही” के लिए| मशहूर गायक हरिहरन को पहली बार “गमन” में, जयदेव ने ही काम दिया था| “तू चंदा, मैं चांदनी”, “सीने में जलन, आंखों में तूफ़ान सा क्यों है”, ये गीत आज भी अपनी कशिश से किसी को भी रोक लेते हैं| जयदेव में शास्त्रीय संगीत और लोक संगीत का मिश्रण करने की अद्भुत क्षमता थी| जयदेव मौलिक काम करना चाहते थे, आपने गुरु सचिन देव की तरह लेकिन ज़माना राहुल देव बर्मन का था, जो शानदार तो थे, लेकिन बहुत मौलिक नहीं|

जयदेव ने कम ही फ़िल्मों में संगीत दे पाए, लेकिन उनका असर हमेशा ज़िंदा रहेगा| 1987 में जयदेव गुज़र गए, लेकिन जाने के पहले, रामानंद सागर के धारावाहिक “रामायण” में अपना संगीत दिया|

जयदेव को उनके शानदार संगीत के लिए हमेशा याद किया जाएगा|

(लेखक जाने-माने साहित्यकार, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)

कोरोना पीड़ित मरीज़ की दर्दनाक मृत्यु से भावुक अमेरिकी नर्स ने की दुनिया से यह अपील

न्यूज़ अपडेट | Navpravah Desk

अमेरिका के मेसेचुसेट्स राज्य की राजधानी बोस्टन में एक अस्पताल में बतौर नर्स काम करने वाली कॉलीन ओ’रैली ने ने अपने सोशल मीडिया फेसबुक प्रोफाइल पर एक मार्मिक पोस्ट किया है।

दरअसल कॉलीन का एक कोरोना पीड़ित मरीज ऑक्सीजन न ले सकने के कारण मर गया, जिसके बाद नर्स उसकी मृत्यु से बेहद आहत हो गई। अपनी इस पोस्ट में उस मरीज़ की मनोव्यथा और अपनी सम्वेदनाओं को जाहिर किया है, जिसे हर व्यक्ति को पढ़ना चाहिए। साथ ही उन्होंने संकट की इस घड़ी में ईश्वर के प्रति आभारी रहते हुए अपने घरों में ही रहने की अपील भी की है।

कॉलीन लिखती हैं कि, ” मैं तीन सप्ताह से COVID यूनिट के साथ हूँ बतौर ट्रैवेल नर्स। लेकिन पिछले दिनों जो कुछ भी घटा उससे मेरा मन बड़ा व्यथित है। मैं बिल्कुल अच्छा महसूस नहीं कर रही हूँ। इसलिए मैंने ये निश्चय किया कि गत दिनों जो कुछ बीता है वो मैं अबके साथ साझा करुँगी।

बुधवार रात 55 वर्ष के एक बुज़ुर्ग व्यक्ति मेरी निगरानी में थे, मुझे उनका ख़याल रखना था। वे बड़े खुशमिजाज़ व्यक्ति थे। गुरूवार को सुबह उन्होंने मुझे पास बुलाया और कहा कि वायदा करो कि तुम मुझे नाश्ते के अलावा कुछ बढ़िया चीज़ खिलाओगी। उनकी बातों से यह झलक रहा था कि वो अंडे से आजिज़ आ चुके हैं। साथ ही वे सफ़ेद चावल से भी बेहद चिढ़े हुए थे। उस समय वे बेहद खुश थे। मैं बाकी के जाँच पड़ताल में जुट गई तभी मैंने महसूस किया कि उन्हें सांस लेने में दिक्कत होने लगी और कुछ ही समय बाद उन्हें भारी मात्रा में ऑक्सीजन की आवश्यकता पड़ गई।

दूसरी रात जब मैं अस्पताल पहुंची तो मैंने देखा कि बुज़ुर्ग और अधिक दिक्कत में आ गए थे और उनसे बिल्कुल सांस नहीं लिया जा रहा था। लगभग 7 बजे उनकी स्थिति गंभीर होने लगी थी और मैंने देखा कि लगभग आधे घंटे बाद ही ऑक्सीजन लेवल काफी गिर गया और उनकी हृदय गति धीमी पड़ने लगी।

हमें अपने काम पर गर्व होता है इसलिए भी कि सबसे गंभीर अवस्था में भी हमें लोगों की सेवा का अवसर मिलता है। इसलिए मुझे लगता है कि यदि आप इसे मुश्किल समय में किसी के काम आ सकें तो वह आपका सौभाग्य है। लेकिन इस बार मुझे अपनी स्थिति और पाबंदियों से बड़ी तकलीफ हुई। एक ही कमरे में मुझे मिलाकर तीन स्वास्थ्यकर्मी थे लेकिन मजबूरी ऐसी कि हममे से कोई भी इस प्राण त्यागते बुज़ुर्ग व्यक्ति की सहायता नहीं कर सका। मैं चाहती थी कि मैं अपना दस्ताना उतारकर इस बुज़ुर्ग का हाथ थाम लूँ। मैं रो पड़ी लेकिन कुछ कर न सकी।

यह बुज़ुर्ग व्यक्ति पिछले छः दिनोंसे अस्पताल में था। जिस संकट से पूरा विश्व जूझ रहा है , इसमें किसी भी रोगी को पूरी तरह से शारीरिक संपर्क में आने पर पांबंदी है। ऐसे समय में कोई भी अस्पताल में मरीज को देखने नहीं आ सकता। मरीज किसी को छू नहीं सकता। ये बुज़ुर्ग पिछले ६ दिनों से बिल्कुल तनहा था अपने अंतिम दिनों में मजबूरी में ही सही लेकिन ऐसा बर्ताव हुआ जैसा बिल्कुल भी नहीं होना चाहिए।

मेरी हमेशा ये कोशिश होती है कि जो भी पेशेंट मेरी निगरानी में रहे मैं हर संभव उसकी मदद कर सकूँ। उसको एक बच्चे, दोस्त या एक थेरेपिस्ट कि तरह उसका ख्याल रख सकूँ लेकिन इस बार ऐसा बिल्कुल भी नहीं कर पाई। मैं बेहद भावुक हूँ इस समय, क्योंकि मैं मशीन नहीं हूँ। न तो मरीज जानवर है न ही स्वास्थ्यकर्मी रोबोट।

जो हाल है उसको देखते हुए मैं लोगों से यही विनती करती हूँ कि कृपा करके आप सभी अपने घरों में रहें। क्वारंटाइन कर लें स्वयं को अपने आशियाने में। हम इस संकट से उबर सकते हैं लेकिन इसके लिए खुद हमें ख्याल रखना होगा। ईश्वर का आशीष हमपर बना रहे। आप सभी अपना ख्याल रखें।”

पाक की घुसपैठ की नापाक साज़िश नाकाम, घाटी में पांच जवान शहीद

न्यूज़ अपडेट | Navpravah Desk

हंदवाड़ा (उत्तर कश्मीर) में आतंकियों से मुठभेड़ में कर्नल आशुतोष शर्मा और एक मेजर सहित पाँच सुरक्षाकर्मी शहीद हो गए। हंदवाड़ा के चंजी मोहल्ले में हुई मुठभेड़ में दो आतंकवादी भी मारे गए।

कुपवाड़ा जिले में हुई इस मुठभेड़ के ऑपरेशन को २१ आरआर, सीआरपीएफ़ और एसओजी की संयुक्त टीम हैंडल कर रही थी। आतंकियों की सूचना मिलने के बाद सेना की टीम ने तलाशी अभियान शुरू किया। जानकारी मिली कि आतंकियों ने घर वालों को बंधक बना लिया है।

शहीद कर्नल आशुतोष शर्मा (फ़ाइल फोटो)

शनिवार शाम क़रीब साढ़े तीन कर्नल शर्मा के नेतृत्व में टीम ने घर में घुसकर बंधक बनाए गए लोगों को तो बचा लिया, लेकिन बाहर निकलते समय आतंकियों ने जवानों पर फ़ायरिंग शुरू कर दी। जवानों ने आतंकियों पर जवाबी कार्रवाई शुरू किया लेकिन इसी बीच जवानों का उनकी टीम से सम्पर्क टूट गया। सम्पर्क स्थापित करने की तमाम कोशिशें नाकाम रहीं, तब कर्नल शर्मा के मोबाइल पर कॉल किया गया। लेकिन कर्नल का फ़ोन एक आतंकी ने उठाया और बोला ‘अस्सलाम वालेकुम’। ख़तरे को भांपते हुए इस आपरेशन में विशेष सुरक्षाबलों को शामिल किया गया।

सुरक्षाबलों और आतंकियों के बीच देर तक गोलीबारी होती रही। बारिश और अंधेरे की वजह से कुछ देर के लिए जवानों ने गोली बारी बंद किया, इसी बीच भागने की कोशिश कर रहे दो आतंकियों ने जवानों ने मार गिराया। इस ऑपरेशन में सीओ २१-आरआर कर्नल आशुतोष शर्मा, मेजर अनुज सूद, पुलिस सब इन्सपेक्टर शकील क़ाज़ी, एक लांस नायक और एक राइफ़ल मैन समेत मेन टीम के सभी पाँच सदस्य शहीद हो गए।

एयर फोर्स ने की कोरोना वारियर्स पर पुष्पवर्षा

न्यूज़ अपडेट | Navpravah Desk

देश के विभिन्न राज्यों में वायु सेना द्वारा एक ही समय पर कोरोना वारियर्स मेडिकल स्टाफ़ पर पुष्प वर्षा की गई है। कोरोना से लड़ाई लड़ रहे मेडिकल स्टाफ़ में इस बात को लेकर बेहद खुशी है और उनका उत्साह दोगुना हो गया है।

झारखण्ड के रांची में भी रिम्स ट्रामा सेंटर के बाहर एयर फोर्स के द्वारा कोरोना पैंडेमिक फ्रंटलाइन वर्कर्स के सम्मान में हेलीकॉप्टर से फ़ूलों की बारिश की गई।

रिम्स के लगभग 200 स्टाफ जिसमें डॉक्टर, नर्सेज, टेक्नीशियन, सफाई कर्मी आदि मौजूद थे, सभी रिम्स की अलग अलग छतों। सभी लोग हाथ हिलाकर एयर फोर्स का अभिवादन भी करते रहे।

इन सभी ने वायु सेना के सम्मान का हार्दिक स्वागत किया और आभार जताया।

एयर फोर्स हेलीकॉप्टर से लगभग 20 मिनट तक लगातार पुष्प वर्षा की जाती रही।

भूली हुई यादें- “गीतकार शैलेन्द्र”

डॉ० कुमार विमलेन्दु सिंह | Navpravah Desk

महफ़िल में ज़िक़्र हो न हो, न हो चाहे हिस्सा, किसी मरासिम का, उनका नाम, बात जब भी छिड़ती है रोशनी की, शमा की तरह याद आते हैं कुछ शख़्स| जब मुख़ातिब होते हैं ये हाज़िरीन-ए-महफ़िल से, सब परवाने, इनके पास ही ठहरते हैं और जब ग़ैब के सुपुर्द हो जाते हैं ये, तो नई शमा जलाई जाती है एक आह के साथ कि “तुम रौशन तो हो, पर उसकी तरह, पुरसुकून नहीं|” भारतीय सिनेमा में गीतकार, अदीब, शायर या जो कह लें, शैलेन्द्र ही वो शमा थे| वो गुल, जो बहुत जल्दी हसीन हुआ और जवान ही चल बसा|

राजकपूर और शैलेन्द्र

शैलेन्द्र का जन्म 1923 में रावलपिंडी, पाकिस्तान में हुआ था, हालांकि इनके पुरखे, आरा, बिहार के थे| इनके पिता सेना में थे, तो तबादलों की वजह से वे कई जगहों पर रहते आ रहे थे| रावलपिंडी में रहने के दौरान बहुत मुसीबतें, मतलब ग़रीबी और उससे होने वाली तमाम दिक़्कतें शैलेन्द्र के पिता को होने लगीं| परेशान हो कर, वे मथुरा आ गए| यहाँ भी कुछ बहुत बेहतर न हुआ और शैलेन्द्र की इकलौती बहन चल बसीं| शैलेन्द्र जवान हो रहे थे, सो बहुत असर हुआ उनपर| रेलवे की नौकरी के सिलसिले में वे, 1947 में, मुंबई पहुंचे और यहीं से शुरू हुआ उनका सफ़र, शोहरत की ओर|

अंदर भरे मवाद को, वे कविता के रूप में निकाला करते थे और मुशायरों में भी जाया करते थे| यहीं शैलेन्द्र, IPTA से भी जुड़े|

बहुत कम लोगों को पता है कि ” ज़ोर, ज़ुल्म के टक्कर में, हड़ताल हमारा नारा है”, और ऐसे कई स्लोगन, शैलेन्द्र की ही स्याही से निकले थे|

पंडित नेहरु के साथ शैलेन्द्र (PC-Bargad)

किसी मुशायरे में, शैलेन्द्र की कविता, ” जलता है पंजाब”, सुनकर, राज कपूर ने उन्हें 500 रुपये देने की कोशिश की और कहा कि वे उनकी 1948 में आने वाली फ़िल्म, “आग” के लिए गाना लिखें| शैलेन्द्र ने ये कह कर मना कर दिया कि, उनके शब्द बिक नहीं सकते| राज कपूर ने उनके स्वाभिमान का सम्मान किया और कहा कि जब भी शैलेन्द्र चाहें, उनसे मिलें, उनकी फ़िल्मों के लिए लिखे|

बहुत जल्दी ही, ये मौक़ा आया, शैलेन्द्र को ज़रूरत आ पड़ी और उन्होंने राज कपूर की बात मानते हुए, 1949 में आई फ़िल्म “बरसात” के लिए दो गीत लिखें, “पतली कमर है” और “बरसात में”| ये दोनों गाने ख़ूब मशहूर हुए|

लता जी और शैलेन्द्र (PC-Filmfare)

1951, शैलेन्द्र के लिए एक यादगार साल बन जाने वाला था| बात ये थी कि ख्वाजा अहमद अब्बास, फ़िल्म, “आवारा” की कहानी, शैलेन्द्र को सुना रहे थे और बार बार कह रहे थे कि “नायक आवारा है, उसके हिसाब से ही गाना लिखना होगा, समझे!” शैलेन्द्र, बिना कुछ बोले लगातार सिगरेट पीए जा रहे थे| अब्बास साहब ने खीझ कर राज कपूर से कहा कि, ” ये किस बेवकूफ़ को बिठा दिया है, कुछ बोलता ही नहीं|” ये बात स्वाभिमानी शैलेन्द्र को बहुत बुरी लगी| इससे पहले कि राज कपूर कुछ कहते, शैलेन्द्र ने उठते हुए कहा, ” या गर्दिश में हूं, आसमान का तारा हूं” और उसके बाद जो हुआ वो इतिहास है| ये गीत, अब तक के सबसे मशहूर हिन्दी फ़िल्मी गानों में से है| न सिर्फ़ भारत में, विदेशों में भी इस गाने की धूम मच गई|

अंग्रेज़ी फ़िल्म, “डेडपूल” में “मेरा जूता है जापानी” का इस्तेमाल भी हुआ| ये महज शुरुआत थी| इसके बाद तो हर बार शैलेन्द्र की कलम से ऐसे गीत निकले कि दुनिया हैरान रह गई:

  • “सजन रे झूठ मत बोलो”
  • “सुहाना सफ़र और ये मौसम हसीं”
  • “सजनवा बैरी हो गए हमार”
  • “रमैय्या वस्तावैय्या”
  • “मेरा जूता है जापानी”
  • “आज फिर जीने की तमन्ना”
  • “याद न जाए, बीते दिनों की”
  • “किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार”

और फ़ेहरिस्त इतनी लम्बी है कि वक़्त बहुत बीत जाएगा गिनने में|

बात ये है कि किसी गीतकार का एक या दो गीत मशहूर हो जाए तो उसकी शोहरत आसमान छूने लगती है और उसका व्यवहार भी बहुत बदल जाता है| शैलेन्द्र ने हर बार अच्छा लिखा, हर एक गीत अच्छा लिखा और ज़मीन से जुड़े रहे|

परिवार के साथ शैलेन्द्र (PC-The Statesman)

उनके दौर में बहुत से शायर, फ़िल्मों में लिखने लगे| उनको पढ़ते हुए, आगे भी इन्दीवर, आनन्द बख़्शी और गुलज़ार जैसे लोग भी उभरे लेकिन किसी में शैलेन्द्र जैसी सादगी और असर न था| साहिर के गीतों में उर्दू शायरी की बारीक़ी थी, जो सब को समझ नहीं आती थी| गुलज़ार ने अत्यधिक “objective correlative” का प्रयोग कर के गीतों में भावनाओं की जगह चीज़ों को भर दिया और उनका “मानवीकरण” (personification) करते रहे और यही लगातार किया, मसलन “उम्र से लंबी सड़कें”, “तुम जो कह दो तो चांद डूबेगा नहीं”, “आंखें भी कमाल करती हैं, पर्सनल से सवाल करती हैं”, और भी कई गीत ऐसे हैं| ज़्यादातर तो ख़ूब पसंद किए गए और शानदार हैं भी| लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो कवि आश्वस्त हो कर लिखता है कि, लोग तो पसंद कर ही लेंगे|

“गुलज़ार से सभी गीतकारों की तुलना इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि ये बात जानना बहुत ज़रूरी है कि बेशक़ वे एक बेहतरीन शायर हैं, लेकिन ये मान लेना कि उतना बेहतरीन कभी हुआ ही नहीं या अब नहीं हो पाएगा, ये ग़लत है. हमारी पीढ़ी ने जो एक अंतिम माप बना दिया है उनको, ये ठीक नहीं. गुलज़ार ने ख़ुद भी कई बार शैलेन्द्र को ही सबसे बेहतरीन बताया है.”

1966 में, बिहार की मिट्टी ने शैलेन्द्र को आवाज़ दी, फणीश्वरनाथ रेणु जैसे महान साहित्यकार ने उसी मिट्टी पर उनके लिए लिखा और “तीसरी क़सम”, फ़िल्म बनी| इसके निर्माता शैलेन्द्र ही थे| फ़िल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार तो मिला लेकिन धन बहुत नहीं कमा पाई| शैलेन्द्र टूट गए| उस साल, वे “मेरा नाम जोकर” के लिए गीत लिख रहे थे, लेकिन पूरा करने के पहले ही, वे गुज़र गए| उनके बेटे शैली शैलेन्द्र ने कुछ छूटे हुए हिस्से को पूरा किया|

आज पूरे फ़िल्म जगत को, उनकी माटी, बिहार को और देश को, इस कलम के सिपाही को ये बताना होगा कि हम उसे आज भी चाहते हैं, इज़्ज़त करते हैं, याद करते हैं, क्योंकि अपने जानिब से तो कभी न टूटने वाला वादा किया, ये कह कर गया वो:

“भूलोगे तुम, भूलेंगे वो

पर हम तुम्हारे रहेंगे सदा”

(लेखक जाने-माने साहित्यकार, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)

एलोन मस्क के ट्वीट ने टेस्ला कम्पनी के 1 लाख करोड़ रुपये डुबाये, खतरे में टेस्ला CEO की जॉब

न्यूज़ अपडेट | Navpravah Desk

अपने ट्वीट्स के चलते हमेशा सुर्खियों में रहने वाले, दुनिया के नामचीन बिज़नेस पर्सन और टेस्ला कम्पनी के संस्थापक एलोन मस्क इस बार अपने ट्विटर को लेकर मुसीबत में हैं। दरअसल एलोन मस्क ने एक सात शब्दों वाला ट्वीट किया जिसमें उन्होंने कहा कि, ‘मेरे हिसाब से टेस्ला के स्टॉक प्राइस कुछ ज्यादा ही हैं।’

उनके इस एक ट्वीट ने कम्पनी को 14 अरब डॉलर (करीब 1 लाख करोड़ रुपये) का नुकसान पहुंचा दिया है। जिसकी वजह से उनकी CEO की नौकरी भी ख़तरे में हैं। उनके इस एक ट्वीट ने उनकी कंपनी की वैल्यूएशन को तगड़ा झटका दिया है। शुक्रवार को कंपनी का शेयर प्राइस 755 डॉलर था, लेकिन बाजार बंद होने तक यह लुढ़ककर 701 डॉलर प्रति शेयर के भाव पर चला गया।

दरअसल, 1 मई को एलोन मस्क ने लगातार कई ट्वीट किए। उन्होंने अपनी सारी संपत्ति बेचने तक की बात की। साथ ही एक अन्य ट्वीट में उन्होंने कहा कि उनके इस फैसले से उनकी प्रेमिका ग्रिम्स उनपर गुस्सा हैं। उनकी प्रेमिका एक पॉप म्यूजिशियन हैं।

वर्तमान में ट्विटर पर एलन मस्क के 3.3 करोड़ लोग फॉलो करे हैं। अब कहा जा रहा है कि टेस्ला CEO एलन मस्क की जॉब जा सकती है। कंपनी के बोर्ड मेंबर एलन मस्क के अजब-गजब ट्वीट से हुए नुकसान को गंभीरता से ले रहे हैं।

छलका नीतू सिंह का दर्द, ऋषि की याद में लिखीं ये बातें

Remembering Rishi Kapoor
Remembering Rishi Kapoor

सौम्या केसरवानी | Navpravah.com

अभिनेता ऋषि कपूर अब हमारे बीच नहीं हैं। 30 अप्रैल को ऋषि कपूर ने अचानक दुनिया को अलविदा कह दिया, उनके जाने से उनके परिवार सहित फिल्म जगत के लोगों में शोक की लहर दौड़ गई। उनके जाने से कपूर परिवार में मातम छाया हुआ है, ऋषि कपूर को कैंसर था, जिसका इलाज वो विदेश में करवा रहे थे।

अब उनकी यादों के बीच पत्नी नीतू कपूर ने सोशल मीडिया पर अपने पति ऋषि कपूर की एक पुरानी फोटो शेयर करके इमोशनल कैप्शन लिखा है, उन्होंने लिखा है कि ‘हमारी कहानी का अंत।’

एक्ट्रेस नीतू कपूर आखिरी समय तक अपने पति ऋषि कपूर के साथ रहीं, आखिरी वक्त में उनका साथ निभाया। ऋषि के जाने से वे बहुत दुखी हैं और अब वे उन्हें बहुत मिस भी कर रही हैं। एक्ट्रेस नीतू कपूर और ऋषि कपूर की लव स्टोरी काफी फेमस रही, सभी उनकी जोड़ी की तारीफें भी खूब करते थे। बता दें कि नीतू और ऋषि की पहली मुलाकात फिल्म ‘जहरीला इंसान’ के सेट पर हुई थी, पहले तो दोस्ती हुई और फिर प्यार की शुरुआत हुई।

न्यूयॉर्क से अपने ट्रीटमेंट के बाद भारत लौटकर ऋषि कपूर अपनी अगली फिल्म “शर्माजी नमकीन” की शूटिंग कर रहे थे, जो कि रितेश सिधवानी और फरहान अख्तर के एक्सेल एंटरटेनमेंट द्वारा निर्माणाधीन है, अफसोस ऋषि का यह प्रोजेक्ट अधूरा रह गया।