देश में कोरोना वायरस का प्रकोप बढ़ता ही जा रहा है। इसी को देखते हुए लॉकडाउन 3.0 के बाद की स्थिति पर कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी ने पार्टी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ आज बैठक की। इस बैठक में पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और पूर्व पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी समेत कई नेता मौजूद थे।
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने बैठक में केंद्र पर हमला करते हुए कहा कि, सरकार को यह बताना चाहिए कि उसने किस पैमाने पर लॉकडाउन 3.0 को लागू किया और 17 मई के बाद उसके पास क्या योजना है।
सोनिया गांधी ने कहा कि 17 मई के बाद देश में क्या होगा? सरकार ने लॉकडाउन जारी रखने के लिए क्या पैमाना लागू किया है? क्या आगे के लिए सरकार के पास कोई पैकेज है? इन तमाम प्रश्नों का जवाब सरकार को देना चाहिए। बैठक में शामिल पूर्व पीएम मनमोहन सिंह ने कहा कि सबकी चिंता यही है कि लॉकडाउन 3.0 के बाद क्या होगा। लॉकडाउन के बाद सरकार के पास क्या प्लान है, यह किसी को नहीं पता है।
राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत ने बैठक में कहा कि जब तक लोगों और राज्यों को आर्थिक पैकेज नहीं मिलेगा तो देश कैसे आगे बढ़ेगा? उन्होंने कहा, “हमें 10 हजार करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ है। हम लगातार पीएम से पैकेज की मांग कर रहे हैं, लेकिन अभी तक उधर से कोई रिस्पांस नहीं मिला है।”
बैठक में मुख्यमंत्रियों ने राजस्थान, पंजाब, छत्तीसगढ़ और पुदुचेरी के लिए केंद्र से राहत पैकेज की मांग की है। राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत, पंजाब के सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह, छत्तीसगढ़ के सीएम भूपेश बघेल और पुदुचेरी के सीएम नारायणसामी ने सरकार से राहत पैकेज की मांग की है। ताकि राजस्व को जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई जल्द से जल्द हो सके।
निर्देशक अयान मुखर्जी की बहुप्रतीक्षित फिल्म ब्रह्मास्त्र को लेकर जबरदस्त माहौल बना हुआ है। इस बीच ये चर्चा होने लगी थी कि कोरोना की वजह से शायद फिल्म की रिलीज़ डेट को भी आगे बढ़ाया जाए। लेकिन अब ये खबर आ रही है कि फिल्म का काम लॉकडाउन में भी नहीं रुका है। बल्कि इसके वीएफएक्स का काम लन्दन में जारी है।
अंग्रेजी अख़बार मिड डे की एक खबर के मुताबिक, लंदन में ब्रह्मास्त्र के वीएफएक्स पर काम किया जा रहा है। अयान मुखर्जी ने लंदन के एक स्टूडियो को फिल्म के वीएफक्स का काम पूरा करने की जिम्मेदारी सौंपी है। ऐसे में जब देश में कोरोना वायरस के चलते सभी काम ठप पड़े हैं, तब मेकर्स का ब्रह्मास्त्र का काम रोकने का कोई इरादा नहीं है।
बता दें कि इस पुरज़ोर तैयारी के पीछे अयान मुखर्जी का एक डर भी छिपा हुआ है। दरअसल अयान को लग रहा है कि फिल्म कहीं लीक न हो जाए, इस वजह से वो दिन रात फिल्म का काम ख़त्म करने में लगे हुए हैं। उन्होंने पांच लोगों की टीम का गठन किया है, जो इस काम को अंजाम तक पहुंचाएगी। वैसे फिल्म को लेकर कई तरह की अटकलें हैं।
खबर ऐसी भी आई थी कि कोरोना के बढ़ते प्रकोप के चलते फिल्म के बजट पर असर पड़ गया है। कलाकारों की फीस कम करने का फैसला लिया गया है। लेकिन इस खबर को करण जौहर ने गलत बता दिया था। उन्होंने कहा था, “मेरी मीडिया से गुजारिश है कि वो किसी भी तरह की धारणा ना बनाए। ये मुश्किल समय है। फेक न्यूज और ज्यादा मुसीबत खड़ी करती हैं। प्लीज आप किसी भी तरह की औपचारिक घोषणा का इंतजार करें।”
फिल्म ब्रह्मास्त्र में अमिताभ बच्चन, नागार्जुन, मौनी रॉय भी अहम रोल में हैं। मूवी को कई भाषाओं में डब किया जाएगा। ये एक ट्राइलॉजी सीरीज होने वाली है। चर्चा यह भी है कि फिल्म अपनी निर्धारित तिथि पर रिलीज़ हो पाएगी या नहीं।
द्वितीय विश्व युद्ध का पूरी दुनिया पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा और जीवन के हर आयाम ने परिवर्तन का अनुभव किया। कलात्मक अभिव्यक्तियों में भी नई प्रवृत्तियां दिखीं और चूंकि सिनेमा भी ऐसी ही अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम के रूप में उभर रहा था, उसमें भी कई परिवर्तन आए। इटालियन नवयथार्थवाद, एक आंदोलन के रूप में उभरा और इसका प्रभाव इतना दूरगामी था कि भारत में भी सिनेमा, इससे अछूता न रहा।
‘La terra trema’ (1948)
सिनेमा में नव यथार्थवाद के आंदोलन की भूमि इटली थी और इसकी शुरुआत, “सिनेमा” नाम के एक पत्रिका के कुछ संपादक, विसोन्ती/ विस्कोन्ती, पुक्किनी, ज़ावात्तिनी ने अपने साथियों के साथ मिलकर किया। ये सिनेमाई आंदोलन 1943-1952 तक अपने चरम पर रहा और इसे फ़िल्मों का सुनहरा दौर (Golden Age) भी कहा गया। ये एक राष्ट्रीय आंदोलन था और इसके अंतर्गत जो फिल्में बनाई जा रही थीं, उन्हें मज़दूरों की बस्ती, ग़रीबों की बस्ती, सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में शूट किया जा रहा था और बहुत ज़्यादा अभिनेता जो इन फ़िल्मों में काम करते थे, वे पेशेवर नहीं थे। इन फ़िल्मों में ग़रीबी, शोषण, अन्याय और बेचैनी को दिखाने की कोशिश की गई।
किसी भी काल, स्थिति, समाज और देश में, दो प्रमुख और विपरीत विचारधाराएं आपस में टकराती रहती हैं और इन्हीं के बीच सृजन के अवसर निकलते हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के पहले तक, इटालियन सिनेमा में जो दो विचारधाराएं, प्रवृतियां या विधियां थीं, वे थीं, “टेलीफ़ोनी बियांकी” और “कैलिग्राफ़िज़्मो”।
“टेलीफ़ोनी बियांकी” अमरीकी कॉमेडी का अनुकरण थी, जिसमें ऐसे घर/परिवार दिखाए जाते थे, जो संपन्न थे और जिनके यहां सफ़ेद टेलीफ़ोन सेट होते थे, जो संपन्नता के द्योतक थे। यहीं से ये नाम “टेलीफ़ोनी बियांकी”, लिया गया। दूसरी तरफ़ “कैलिग्राफ़िज़्मो”, के अंतर्गत की जाने वाली प्रस्तुतियों में कलात्मक गूढ़ता होती थी। नवयथार्थवाद, “कैलिग्राफ़िज़्मो” को सरल रूप में प्रस्तुत करने का पक्षधर था।
बस्तियों, झुग्गियों और ग्रामीण क्षेत्रों में सेटिंग करना उस दौर के फ़िल्मकारों की मजबूरी भी थी और ज़रूरत भी। मजबूरी इसलिए कि इटली का मशहूर “सिनेसिटा”, जो कि एक फ़िल्म सिटी जैसा प्रसार था, युद्ध की बमबारी में ध्वस्त हो गया था। ज़रूरत इसलिए कि यथार्थ की प्रस्तुति के लिए, स्टूडियो के बाहर की दुनिया बेहतर थी। जो फ़िल्मकार इस दौर को अपनी कला से सजा रहे थे, उनमें प्रमुख थे, फ़ेलीनी, रोसेलीनी और दे सीका।
इन तीन फ़िल्मकारों में से जिसका सबसे ज़्यादा प्रभाव भारतीय सिनेमा पर पड़ा, वो थे दे सीका। 1948 में आई, दे सीका की फ़िल्म “बायसाइकल थीव्स”, ने विश्व सिनेमा पर बहुत गहरा असर डाला और ये कहने की ज़रूरत नहीं कि भारतीय सिनेमा भी इससे प्रभावित हुए बिना न रह सका। इस फ़िल्म में एक मजदूर, अपनी साइकिल में ताला लगाना भूल जाता है, उसकी साइकिल चोरी हो जाती है और अपने बेटे के साथ, साइकिल खोजने के लिए वो कई जगहों पर जाता है और हर जगह उसे निराशा मिलती है। अंत में वो एक साइकिल चुराने की कोशिश करता है और पकड़ा जाता है, फिर छूट भी जाता है लेकिन अपने बेटे से लज्जित, चुपचाप चलता जाता है। लैम्बर्टो मैज्जियोरानी और एन्ज़ो स्टायोला के शानदार अभिनय ने दर्शकों को बहुत भावुक कर दिया।
‘दो बीघा ज़मीन’ (1953)
भारत के महान फ़िल्मकार सत्यजीत रे की “अपू ट्रायलॉजी” और बिमल रॉय की “दो बीघा ज़मीन” सरीखी महान फ़िल्में, इसी इटालियन फ़िल्म से बहुत हद तक प्रभावित हैं। दे सीका का सबसे ज़्यादा असर, राज कपूर की फ़िल्मों पर देखा जा सकता है। “बायसाइकल थीव्स” का असर तो “आवारा”, “श्री 420” में दिखता ही है। 1946 में दे सीका की फ़िल्म “शूशिया” या “शूशाइन” से प्रेरित हो कर, राज कपूर ने इसका भारतीय संस्करण “बूट पॉलिश” के रूप में बना डाला।
किसी भी आंदोलन का असर या कोई भी प्रवृत्ति पूर्णतः ख़त्म नहीं होती, नवयथार्थवाद भी समय समय पर भारतीय सिनेमा में दिखता रहता है। नई पीढ़ी के फ़िल्मकार, अनुराग कश्यप की “गैंग्स अॉफ़ वासेपुर” में भी ये प्रवृत्ति दिखी है।
‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’ (2012)
आज कल वेब सीरीज़ के दौर में भी कई लोग नवयथार्थवाद के अंतर्गत की गई प्रस्तुतियों का अनुकरण करने की कोशिश करते हैं लेकिन नग्नता और हिंसा परोस कर जल्दी प्रसिद्धि पाने की ललक में उनका यथार्थ फ़िसल कर फंतासी की दुनिया में चला जाता है।
(लेखक जाने-माने साहित्यकार, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)
हिन्दी सिनेमा के हर दौर में, बेहतरीन नायकों के साथ शानदार खलनायकों को भी अपना परचम लहराते देखा गया है| प्राण, प्रेम चोपड़ा, अमरीश पुरी, अमजद ख़ान और भी कई नाम हैं, जिन्हें कोई भी दर्शक हमेशा याद करेगा| इनकी अदाकारी में इतना दम था कि आज तक इनमें से कई अपने पर्दे के नाम से ही याद किए जाते हैं| इन सभी के पहले, जिस अदाकार ने खलनायक की परिभाषा को अपने ढंग से परिभाषित किया और जिसकी संवाद शैली में ज़मींदारों का रौब भी था और एक ख़ानदानी रईस की नफ़ासत भी, उसका नाम था कृष्ण निरंजन सिंह या के०एन० सिंह|
के०एन० सिंह
के०एन० सिंह का जन्म, 1908 में, देहरादून में हुआ| इनके पिता, चांदी प्रसाद सिंह, राजपरिवार के राजकुमार थे और एक मशहूर वकील भी| इनके पिता चाहते थे कि के०एन० सिंह भी वकील बनें|
” के०एन० सिंह को खेल कूद में बहुत दिलचस्पी थी और ये बेहद अच्छे खिलाड़ी थे. इन्होंने वकालत की पढ़ाई तो की लेकिन इस पेशे के झूठ और सच को बेहद क़रीब से, अपने पिता की पेशेवर ज़िंदगी में देखा. इसके बाद ये ठान लिया कि अब वे खेल कूद पर ही ध्यान देंगे.”
के०एन० सिंह इतने अच्छे खिलाड़ी थे, जैवेलिन थ्रो और शॉटपुट के, कि, 1936 के बर्लिन ओलंपिक में, इनका जाना, लगभग तय हो गया था, लेकिन क़िस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था| इसी साल इनकी बहन कलकत्ते में बीमार पड़ीं, और इन्हें वहाँ जाना पड़ा|
फ़िल्म ‘हुमायूँ’ में के०एन० सिंह (PC- MemsaabStory)
कलकत्ता में इनकी मुलाक़ात पृथ्वीराज कपूर से हुई, जो इनके पारिवारिक दोस्त भी थे| पृथ्वीराज कपूर ने के०एन० सिंह की मुलाक़ात देबकी बोस से करवाई| ये 1936 की बात है| इसी साल अपनी फ़िल्म, “सुनहरा संसार” में, के०एन० सिंह को अपना पहला काम मिला| 1938 में “बाग़बान”, से के०एन० सिंह एक स्थापित खलनायक बन गए|
फ़िल्म ‘हावडा ब्रिज’ में मधुबाला और धूमल के साथ के०एन० सिंह (PC-Pinterest)
इसके बाद तो “सिकंदर”, “ज्वार भाटा”, “आवारा”, “हुमायुं” और कई फ़िल्में, एक के बाद एक इन्हें मिलती रहीं और एक शानदार आवाज़, असरदार नज़र और सूट बूट वाले खलनायक के रूप में इनकी शोहरत लगातार बढ़ती रही| “ज्वार भाटा”, 1944 में आई थी और ये दिलीप कुमार की पहली फ़िल्म थी|
70 के दशक तक, ये लगातार काम करते रहे| “हाथी मेरे साथी”, “मेरे जीवन साथी”, “रेशमा और शेरा”, “रफ़ूचक्कर” और भी कई फ़िल्मों में इन्होंने काम किया| 1986 में आई, “वो दिन आएगा”, इनकी आख़िरी फ़िल्म थी|
1971 की फ़िल्म ‘प्यार की कहानी’ में अमिताभ बच्चन और के०एन० सिंह
के०एन० सिंह, बहुत भाषाएं जानते थे| लैटिन इन्होंने, विषय के तौर पर पढ़ी थी और रशियन भी बोल लेते थे| फ़िल्म, “आवारा”, बहुत मशहूर हुई थी और रूस में दर्शकों ने इसे बहुत ज़्यादा पसंद किया था| फ़िल्म की डबिंग जब हो रही थी, के०एन० सिंह, एकमात्र कलाकार थे जिन्होंने अपनी आवाज़ में ही रशियन भाषा में डब किया|
बाद के दौर में प्राण के अलावा किसी और खलनायक ने वो नफ़ासत भरी अदायगी नहीं दोहराई| सन् 2000 में के०एन० सिंह गुज़र गए, लेकिन उनकी शानदार अदाकारी को भूलना मुमकिन नहीं|
(लेखक जाने-माने साहित्यकार, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)
कोरोना वायरस अपना पैर धीरे-धीरे पसार रहा है। हर जगह इसी वायरस को लेकर हाहाकार मचा हुआ है, वहीं प्रयागराज में भी कोरोना पॉजिटिव मरीज़ों क़ी संख्या में लगातार इज़ाफ़ा हो रहा है। आरेंज ज़ोन से रेड ज़ोन की तरफ प्रयागराज बढ़ रहा है।
आज प्रयागराज में पांच कोरोना पॉजिटिव मरीज सामनें आए हैं। आर्किटेक्ट के परिवार के ही 3 लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं, लूकरगंज में कोरोना पॉजिटिव मिले आर्किटेक इंजीनियर के रिश्तेदार हैं। जिन्हें लेवल वन हॉस्पिटल कोटवा बनी भेजा गया है, वहीं एक केस कौडिहार औऱ एक नवाबगंज का है।
प्रयागराज में कोरोना पॉजिटिव के एक्टिव मरीज़ों क़ी संख्या बढ़कर 15 हो गयी है, वहीं एक तब्लीगी जमात में शामिल होकर नई दिल्ली से लौटे इंडोनेशियाई जिले का पहला संक्रमित केस था, हालांकि इलाज के बाद वह स्वस्थ हो चुका है।
गत 24 अप्रैल को मुंबई से अपने पिता की तेरहवीं में लौटे शंकरगढ़ के युवक और उसका चचेरा भाई कोरोना पॉजिटिव पाया गया था और इसी दिन शिवकुटी के शंकरघाट का एक युवक कोरोना पॉजिटिव पाया गया था।
पांच नये मामले सामने आने के बाद प्रयागराज में सुरक्षा इंतजाम और कड़े कर दिए गए हैं। यहां लॉकडाउन पर और सख्ती की जा रही है, साथ ही बेवजह बाहर निकलने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। जिले में आज दो नये हॉट स्पॉट बनाए गये हैं, इसके साथ ही प्रयागराज में हॉट स्पॉट की संख्या बढ़कर अब सात हो गई है।
फ़ोटो जर्नलिस्ट्स: यासीन डार, मुख्तार खान, चन्नी आनंद
न्यूज़ अपडेट | Navpravah Desk
भारत के तीन फ़ोटो जर्नलिस्ट्स को अमेरिका का प्रमुख पुरुस्कार पुलित्जर देने की घोषणा की गई है।
जम्मू-कश्मीर के निवासी ‘यासीन डार’,’मुख्तार खान’,’चन्नी आनंद’ को यह पुरस्कार दिए जाने की घोषणा की गई है। ये तीनों फोटो पत्रकार अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ एजेंसी ‘एसोसिएटेड प्रेस (AP)’ के लिए काम करते हैं।
मुख्तार खान की फ़ोटो
दरअसल गत वर्ष 5 अगस्त को भारत सरकार द्वारा संविधान संशोधन करते हुए जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य के दर्जे से हटाते हुए दो नए राज्यों की स्थापना की गई, जिसके बाद घाटी के हालातों की संवेदनशीलता को देखते हुए वहां कई प्रकार की पाबंदियों को लगाया गया था।
यासीन डार की फ़ोटो
कुछ जगहों पर सुरक्षा बलों पर पथराव जैसी घटनाएं भी सामने आईं थीं। इसी स्थिति की रिपोर्टिंग के दौरान इन तीनों पत्रकारों ने वहां की तस्वीरे खींची थीं।
चन्नी आनंद की फ़ोटो
पुलित्जर पुरस्कार की शुरुआत 1917 में की गई थी। यह अमेरिका का एक प्रमुख पुरस्कार है, जो समाचार पत्रों की पत्रकारिता, साहित्य एवं संगीत रचना के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वालों को दिया जाता है।
जम्मू कश्मीर के नेता ओमर अब्दुल्ला और कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने भी पुलित्जर विजेता फोटो जर्नलिस्ट्स के प्रति खुशी व्यक्त की है। उन्होंने अपनी खुशी ट्विटर के माध्यम से व्यक्त की है।
लॉकडाउन के तीसरे चरण की शुरुआत में मज़दूरों के घर भेजने के फैसले से सरकार ने वाहवाही लूटनी शुरू की ही थी कि मज़दूरों से पैसे वसूलने के मामला सामने आ गया। कांग्रेस शासित व समर्थित राज्य सरकारों ने केंद्र पर आरोप लगा दिया कि यह सरकार मात्र अमीरों के लिए है। अब इस मामले में केंद्र सरकार कुछ और कह रही है राज्य सरकारें कुछ और।
श्रमिक स्पेशल चलाये जाने से मज़दूर काफी खुश हैं। लेकिन इस बीच केंद्र सरकार और विपक्ष में घमासान शुरू हो गया है। केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि मज़दूरों को टिकट बेंचा ही नहीं गया है। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने स्पष्ट किया कि केंद्र ने रेलवे टिकट राज्यों को दिया। ये टिकट राज्य सरकार द्वारा तैयार सूची के आधार पर बांटना था।
कई राज्यों में सरकारों ने एक भी रुपये मज़दूरों से नहीं लिया, जबकि कुछ राज्यों ने मज़दूरों से पैसे वसूले। उन्होंने कहा कि हमने राज्यों को स्पष्ट कहा था कि केंद्र ८५ प्रतिशत पैसा अपनी तरफ से खर्च कर रही है, बाकी का १५ प्रतिशत पैसा राज्य सरकारें वहन करें या किसी स्वयंसेवी संस्था से सहयोग लें। इसमें अंतिम विकल्प था, मज़दूरों से बाकी का पैसा वसूलने का। उन्होंने कहा कि कुछ ऐसे राज्य हैं जिन्होंने श्रमिकों से पैसे लिए।
BJP vs Congress
कॉंग्रेस का केंद्र पर हमला-
तमाम शोरगुल के बीच सोमवार को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने ऐलान किया कि प्रवासी मजदूरों की टिकट वापसी का खर्च कांग्रेस पार्टी उठाएगी, उन्होंने इसके लिए प्रदेश इकाइयों को निर्देश भी जारी कर दिया। जिसके बाद कांग्रेस का सरकार पर हमला करना और भी आक्रामक हुआ।
भाजपा ने किया पलटवार-
कांग्रेस के द्वारा लगातार लगाए जा रहे आरोपों का जवाब देने के लिए भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज मैदान में उतरे। कई प्रवक्ताओं ने कांग्रेस के दावे को झूठा करार दिया तो केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने ट्वीट कर कांग्रेस पर ही आरोप मढ़ दिया। प्रकाश जावड़ेकर ने लिखा, ‘मजदूरों से रेल किराये की सच्चाई – सभी राज्य सरकारें मजदूरों के रेल के किराये का पैसा भर रही हैं। केवल महाराष्ट्र, केरल और राजस्थान सरकारें नहीं दे रहीं। वह किराया मजदूरों से ले रही हैं। बाकि सरकारें स्वयं दे रही हैं। यह तीन राज्य महाराष्ट्र, केरल और राजस्थान की सरकार मजदूरों से किराया ले रही हैं। इन राज्यों में सरकार शिवसेना गठबंधन, कम्युनिस्ट और कांग्रेस की है, यही चिल्ला रहे हैं। इसे कहते है ‘उल्टा चोर कोतवाल को डाटें।’
क्या कहते हैं मज़दूर ?
अब इस पूरे मामले में मज़दूरों ने स्पष्ट किया कि उनसे तो पैसे लिए ही गए। अब चाहे राज्य ने लिया हो या केंद्र सरकार ने। हमें ऐसी विकट परिस्थिति में सरकार से सहयोग की अपेक्षा थी, लेकिन मिली नहीं। बस ट्रेन चलाई, इसे चाहे आप जो समझ लें।
यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को गोली मारने की धमकी देने वाला आरोपित एएसआई बिहार के नालन्दा से पकड़ा गया है। उसने फ़ेसबुक पर मुख्यमंत्री योगी को गोली से मारने की धमकी दी थी। आरोपित की पहचान ग़ाज़ीपुर (यूपी) स्थित दिलदार नगर थाना क्षेत्र के गाँव रक़सदा निवासी तनवीर ख़ान के रूप में की गई है।
आरोपित तनवीर ख़ान ने यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को गोली मारने की बात फ़ेसबुक पर लिखी। फ़ेसबुक पोस्ट के ज़रिए दी गई इस धमकी के ख़िलाफ़ दिलदार नगर थाना क्षेत्र के धनंजय सूर्यवंशी और विशाल पाण्डेय ने एफ़आईआर कराया था। २४ अप्रैल को किए गए इस पोस्ट के बाद यह बात तेज़ी के साथ फैल गई।
उत्तर प्रदेश पुलिस ने अपनी छानबीन के बाद ख़ुलासा किया कि धमकी देने वाला व्यक्ति नालन्दा जिले में एएसआई के पद पर तैनात है। यह इनपुट मिलते ही यूपी पुलिस नालन्दा पहुँची और आरोपित को गिरफ़्तार कर प्रदेश ले आई।
इस मामले में दीपनगर (नालन्दा) के थानाध्यक्ष धर्मेन्द्र कुमार ने कहा, “आरोपित के खिलाफ यूपी में मुकदमा दर्ज है। दिलदारनगर की पुलिस उसे गिरफ्तार कर अपने साथ ले गयी।”
देश में कोरोना संक्रमित मामलों की संख्या 46,433 हो गई है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने संक्रमण के आंकड़ों की जानकारी देते हुए बताया कि इसका सबसे ज्यादा कहर 5 राज्यों में हुआ है जिनमें महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान हैं।
इस संक्रामक रोग से अब तक हुई 1,568 मौतों में से सबसे अधिक महाराष्ट्र में 583 लोगों ने जान गंवाई। देश में घातक विषाणु के चलते हुईं कुल 1,568 मौतों में से सर्वाधिक 583 लोगों की जान महाराष्ट्र में गई है। इसके बाद 319 लोगों की गुजरात में, 165 की मध्य प्रदेश में, राजस्थान में 77, दिल्ली में 64, उत्तर प्रदेश में 50 और पश्चिम बंगाल में 133 तथा आंध्र प्रदेश में 36 लोगों की मौत हुई है।
तमिलनाडु में मृतक संख्या 31, तेलंगाना में 29 जबकि कर्नाटक में मरनेवालों की संख्या 27 हो गई है।
कितनी ही बार सितारे टूटते हैं और बिना किसी आवाज़ के, रोशनी की एक बारीक़ लकीर सी खींचते हुए, ग़ायब हो जाते हैं| वक़्त, आहिस्ता आहिस्ता, वो सुनहरी लकीर भी मिटा देता है और भुला दिए जाते हैं वो सितारे, जिनकी चमक से पूरा फ़लक़ जगमगाता था| ख़ैरियत भी नहीं पता चलती उनकी कभी, न ख़ुद ही आते हैं वो जताने अपनी नाराज़गी, न होने शुक्रगुज़ार| ऐसा ही एक सितारा, हमारा भी खोया, नाम था काजल किरन|
काजल किरन
काजल का जन्म, 1958 में, मुंबई में, एक मराठी परिवार में हुआ| इनका असली नाम सुनीता कुलकर्णी रखा गया| ये एक मध्यमवर्गीय परिवार में पैदा हुई थीं और डॉक्टर बनना चाहती थीं| ये अभी स्कूल में ही थीं कि इन्हें, नासिर हुसैन की फ़िल्म, “हम किसी से कम नहीं” में काम करने का मौक़ा मिला और इनके साथ थे, शानदार और ख़ूबसूरत ऋषि कपूर| ये बात है 1977 की| फ़िल्म बहुत कामयाब हुई और इनपर फ़िल्माया हुआ गाना, “क्या हुआ, तेरा वादा”, आज भी सब की यादों में ताज़ा है|
फ़िल्म ‘हम किसी से कम नहीं’ में ऋषि कपूर और काजल किरन
काजल की कोई फ़िल्मी पृष्ठभूमि नहीं थी और ना ही उनका कोई संरक्षक था| नासिर हुसैन ने इनसे कहा था कि जब तक उनकी फ़िल्म रिलीज़ नहीं होती, काजल कोई और फ़िल्म न करें| काजल बहुत छोटी उम्र की थीं, फ़िल्म के बाद भी ये कह न पाईं कि अब वे नई फ़िल्में कर सकती हैं, और न ही किसी और ने इन्हें बताया, क्योंकि बहुत से शायरों और पुरानी नायिकाओं की बेटियों को भी सफल बनना था| इस कॉन्ट्रैक्ट की ग़लतफ़हमी की वजह से “बालिका वधु” और “अंखियों के झरोखों से”, जैसी फ़िल्में, इनसे छूट गईं|
“इसके बाद भी काजल को फ़िल्में मिलती रहीं| “सत्ते पे सत्ता”, “आंधी तूफ़ान”, “घर संसार” जैसी फ़िल्मों में भी ये छोटे लेकिन असरदार किरदार में दिखीं. ये सिनेमा के किसी बड़े परिवार से संबद्ध नहीं थीं और न ही इनकी कोई ख़ास जान पहचान थी फ़िल्म जगत में, तो फ़िल्मों के चुनाव के लिए, इन्हें कोई सलाह नहीं मिली. इन्होंने रामसे बंधुओं की डरावनी फ़िल्मों में भी काम किया.”
ये ख़ूबसूरत थीं और अभिनय भी अच्छा करती थीं| इसलिए इन्हें काम मिलना एकदम से बंद नहीं हुआ| जब सब सोच रहे थे कि इनका करियर ख़त्म हो जाएगा, इन्होंने मिथुन चक्रवर्ती के साथ, “वारदात” और “हम से बढ़कर कौन” जैसी फ़िल्मों से, फिर वापसी की|
काजल ने मलयालम, कन्नड़ और तमिल फ़िल्मों में भी काम किया| मोहन लाल जैसे दिग्गज अभिनेता के साथ भी इन्होंने काम किया| अचानक, 1990 में ये ख़बर मिली कि अपने गिरते हुए करियर से और न लड़ पाने का फ़ैसला कर, काजल ने शादी कर ली और नीदरलैंड चली गईं| अब इनकी कोई ख़बर नहीं, सलाहियत, एक बार फिर क़िस्मत के आगे लाचार और ख़ामोश है|
बस इतना वादा किया जा सकता है कि अब काजल किरन का नाम उस फ़ेहरिस्त से मिटा दिया जाएगा, जिसमें सिर्फ वो पहचानी शक्लें हैं, जिनका नाम हम नहीं जानते|
(लेखक जाने-माने साहित्यकार, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)