28.1 C
Mumbai
Thursday, August 6, 2026
Home Blog Page 129

भूली हुई यादें- “चित्रगुप्त श्रीवास्तव”

डॉ० कुमार विमलेन्दु सिंह | Navpravah Desk

सलाहियत और ज़हानत, ऐसी नेअमत हैं, जो किसी किसी को मिलती हैं| कभी कभी कोई इसमें अपनी कोशिशों से इज़ाफ़ा कर लेता है, तो कोई नाज़ कर बैठता है और नाकाम रह जाता है उसका इल्म| कुछ शख़्स ऐसे होते हैं जिन्हें क़ुदरत ने बहुत सारी खूबियां दी होती है और उसे चुनना होता है कि किस हुनर से वो क़ायनात का शुक्रिया अदा करे| चित्रगुप्त श्रीवास्तव, एक ऐसे ही हरफनमौला और कलंदर क़िस्म के इंसान का नाम था|

आशा भोसले, किशोर कुमार के साथ चित्रगुप्त (PC- Hamara photos)

चित्रगुप्त, बिहार के सारण ज़िले (अब ज़िला के विभाजन के बाद गोपालगंज) में, एक सुशिक्षित कायस्थ परिवार में  पैदा हुए| ये बेहद ज़हीन थे बचपन से ही| इन्हें हिन्दी के अलावा, उर्दू, फ़ारसी, संस्कृत और अंग्रेज़ी का भी ज्ञान था| इन्होंने, अर्थशास्त्र और पत्रकारिता, दोनों में MA किया और पटना कॉलेज में लेक्चरर भी बहाल हुए| ज़िंदगी एक ख़ूबसूरत शक्ल ले रही थी, लेकिन चित्रगुप्त को मौसिक़ी का ऐसा शौक़ था कि 1946 में, सब छोड़ कर ये मुंबई चले गए| म्यूज़िक डायरेक्टर या गायक बनने|

मुंबई में अपने दोस्त मदन सिन्हा की मदद से, कई लोगों से मिले और बतौर असिस्टेंट मशहूर संगीतकार एस०एन० त्रिपाठी की शागिर्दी में चले गए| इसके पहले वे मन्ना डे के साथ, हरिप्रसन्न दास की शागिर्दी में भी रहे|

गीता दत्त, मो०रफ़ी, और चित्रगुप्त एक रिकॉर्डिंग के दौरान (PC- Pinterest)

मौसिक़ी की समझ बेमिसाल थी, सो 1946 से ही काम मिलना शुरू हो गया| 1946 में आई “लेडी रॉबिनहुड” में दो गाने चित्रगुप्त ने गाए| चित्रगुप्त को शोहरत मिली, 1952 में आई “सिन्दबाद द सेलर” से, जिसमें मो० रफ़ी ने इनके निर्देशन में गाया| इस फ़िल्म का गाना, “अदा से झूमते हुए”, बहुत मशहूर हुआ|

” 1952-54 के बीच, चित्रगुप्त ने सिर्फ़ छोटे बजट की स्टंट या धार्मिक फ़िल्मों में संगीत दिया. ये भी कहा जा सकता है कि, उन्हें यही फ़िल्में मिलीं. इस दौरान इन्होंने 15 धार्मिक फ़िल्मों में संगीत दिया. ये दौर काल्पनिक धर्मनिरपेक्षता को प्रदर्शित करने का दौर था और ज़िम्मेदारी, बहुसंख्यक आबादी पर थी. ऐसे समय में धार्मिक गाने बनाना अच्छा नहीं लगा कुछ लोगों को, जिन्होंने हिन्दी सिनेमा जगत को एक क्षेत्र विशेष का हक़ समझ रखा था. लेकिन प्रतिभा कहाँ छिपती है. “

1957 में आई फ़िल्म, “भाभी” में, मो०रफ़ी का गाया, “चल उड़ जा रे पंछी”, 1959 में “लागी छूटे ना, अब तो सनम” और 1961 में आई फ़िल्म, “ज़बक” में “तेरी दुनिया से दूर, हो के चले मजबूर” ने जता दिया कि चित्रगुप्त अपने दौर के किसी भी अज़ीम मौसिक़ार से कम नहीं|

चित्रगुप्त के साथ किशोर कुमार, आशा भोसले व अन्य (PC-Scroll)

इसके बाद भी ये काम करते रहे, लेकिन कोई बहुत बड़ी फ़िल्म इन्हें नहीं मिली| चित्रगुप्त हमेशा कहते थे कि, “फ़िल्म छोटी हो या बड़ी, संगीत हमेशा बेहतरीन होना चाहिए|” इन्होंने कुछ पंजाबी और गुजराती फ़िल्मों में भी संगीत दिया|

हिन्दी सिनेमा की दुनिया में अपने शर्तों पर रहने वाले, किसी के संरक्षण में न रहने वाले और औसत से बहुत ऊपर के स्तर पर काम करने वाले लोगों के शोहरत की उम्र लंबी नहीं होती| चित्रगुप्त भी अब अपने कुछ बेहतरीन गीतों के ज़रिए ही कभी कभी याद किए जाते हैं|

उनके बेटों, आनंद और मिलिंद ने 1988 में “क़यामत से क़यामत तक” में अपना संगीत देकर, हिन्दी फ़िल्मों में मधुर गीतों का एक नया दौर शुरू किया| इसी साल चित्रगुप्त ने, “शिव गंगा” के रूप में, अपनी आख़िरी फ़िल्म की|

1991 में चित्रगुप्त ने ये दुनिया छोड़ दी| वे अपने दौर के सबसे शिक्षित म्यूज़िक डायरेक्टर थे| उन्हें जो सम्मान मिलना चाहिए था, वो देने में, हमेशा की तरह फ़िल्म जगत चूक गया|

बिहार, विशेषकर सारण की, कला के मामले में बेहद उर्वर ज़मीन से भिखारी ठाकुर के बाद और अखिलेन्द्र मिश्रा से पहले, इसी महान कलाकार ने अपनी छाप, पूरे देश पर छोड़ी थी|

फ़िल्म जगत और उससे पहले राज्य सरकार को, चित्रगुप्त के नाम से किसी पुरस्कार को देने का चलन शुरू करना चाहिए|

(लेखक जाने-माने साहित्यकार, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)

प्रशांत भूषण को सुप्रीम कोर्ट ने लगाई फ़टकार, रामायण को कहा था अफ़ीम

न्यूज़ अपडेट | Navpravah Desk

दूरदर्शन पर प्रसारित रामायण-महाभारत को लेकर विवादित टिप्पणी करना वक़ील प्रशान्त भूषण को महँगा पड़ता नज़र आ रहा है। दूरदर्शन के इन कार्यक्रमों को अफ़ीम की संज्ञा देने वाले वक़ील को सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी फटकार लगाई है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है, “जिसको टीवी पर जो देखना है, देख सकता है।” प्रशांत भूषण गुजरात में दर्ज एफआईआर के खिलाफ SC पहुँचे थे। कोर्ट ने फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है। इस मामले की सुनवाई जस्टिस अशोक भूषण जस्टिस संजीव खन्ना ने विडियो काँफरेंसिंग के ज़रिए की। जस्टिस अशोक भूषण ने प्रशांत भूषण की ओर से पेश वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे से कहा, “कोई भी व्यक्ति टीवी पर कुछ भी देख सकता है। उन्होंने आगे कहा कि आप कौन होते हैं कि लोग इसे नहीं देख सकते। जवाब देते हुए वक़ील दवे ने कहा कि हम टीवी पर कुछ देखने वाले लोगों पर नहीं हैं, बल्कि हम एफआईआर पर हैं।

हालाँकि न्यायालय ने भूषण की कार्यवाही एवं गिरफ़्तारी पर रोक लगाते हुए गुजरात पुलिस को दो सप्ताह के भीतर जवाब देने का निर्देश भी दिया। प्रशांत भूषण को अपने इस वक्तव्य की वजह से चौतरफ़ा आलोचना झेलनी पड़ रही है।

इसी संदर्भ में वरिष्ठ पत्रकार दीपक चौरसिया ने ट्वीट कर कहा, “प्रशांत भूषण जी, आपको देश से जुड़ी विरासत और संस्कृति से इतनी दिक़्क़त क्यों होती है। आज फिर कोर्ट ने आपकी बचकानी हरकतों के चलते फटकार लगाई है। रामायण और महाभारत हमारी संस्कृति का आधार है।”

दरअसल, पिछले महीने गुजरात की राजकोट पुलिस ने वकील और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण द्वारा रामायण-महाभारत को लेकर किए गए विवादास्पद ट्वीट मामले में मुकदमा दर्ज किया था। साथ ही प्रशांत भूषण के ट्वीट का समर्थन करने और लोगों को भड़काने के आरोप में पुलिस ने एश्लीन मैथ्यू और कन्नन गोपीनाथन के खिलाफ भी मामला दर्ज किया था।

ग़ौरतलब है कि प्रशांत भूषण ने 28 मार्च को ट्वीट करते हुए लिखा था, “लॉकडाउन के कारण करोड़ों भूखे और सैकड़ों घर जाने के लिए मीलों चल रहे हैं, हमारे हृदयहीन मंत्री लोगों को रामायण और महाभारत की अफीम का सेवन करने और खिलाने के लिए मना रहे हैं!”

‘मुल्क’ की यादों में हमेशा रहेंगे सेल्युलॉईड की दुनिया के ‘ऋषि’

डॉ०चितरंजन कुमार | Navpravah Desk

न जाने किसने उन्हें इतना प्यारा नाम दिया था ‘ऋषि’। आगे चल कर इस ‘ऋषि’ ने ही लाखों युवाओं को प्रेम के मंत्र और ‘प्रेमरोग’ दिए। निःसंदेह ऋषि कपूर एक योग्य पिता की योग्य संतान थे। वे सच में मुँह में चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुए थे। मात्र तीन साल की उम्र में ही वे फिल्मी पर्दे पर ठुमकते हुए नजर आए थे। गाने के बोल थे ‘प्यार हुआ ,इकरार हुआ है, फिर क्यों प्यार से डरता है दिल ‘। फ़िल्म श्री 420 के इस गाने में स्वयं उनके पिता राजकपूर साहब थे। नन्हें ऋषि को शायद यहीं से प्यार का गुरुमंत्र मिला जो उन्हें ‘प्रेम ग्रंथ’ तक ले गया। वे रंग रूप में यूरोपीय देवताओं की तरह लगने वाले अपने पिता राजकपूर से किसी भी तरह कमतर नहीं थे। बस उन्हें राजकपूर साहब की तरह भूरी भूरी जादुई आँखें नहीं मिली थी। कल इरफान और आज ऋषि कपूर। ऊपरवाले, तारें कम हो गए हैं क्या आसमां में, जो जमीन से सितारे उठा रहे हो।

70 और 80 के दशक में जहां राजेश खन्ना, देव आनंद साहब और अमिताभ बच्चन जैसे दिग्गज कलाकार हों वहाँ किसी के लिए अपनी मुकम्मल पहचान बनाना पहाड़ के सीने पर हथौड़ा मारने जैसा रहा होगा। इन त्रिदेवों की छाया से निकलकर ऋषि कपूर ने अपना एक अलग मुकाम बनाया। ऋषि कपूर ने मुंबईया फिल्म यानी बॉलीवुड को विक्टोरियन युग की नैतिकता से बाहर निकाल दिया। उनसे पहले देवानंद और राजेश खन्ना नायिकाओं के साथ इशारे इशारे में प्यार करते थे। पर्दे पर दो फूलों को टकराकर चुंबन का दृश्य फिल्मा लिया जाता था। रोटी दाल में फंसे हुए आम आदमी की बात तो छोड़िए यहाँ तक की ‘मुगले आज़म’ का शाहजादा सलीम भी अनारकली से लुक छिप कर ही प्यार कर रहा था। तब के दौर में ‘तीसरी कसम’ का हिरामन गाड़ीवान अपने साथ बैठी नौटंकी वाली बाई की गुदगुदी पीठ पर महसूस तो कर रहा था, पर खुल कर बोल नहीं पा रहा था। प्रेम की अभिव्यक्ति उसके लिए गूंगे का गुड़ ही था। बहुत बोल्ड समझे जाने वाले शम्मी कपूर भी फ़िल्म ‘कश्मीर की कली’ में शर्मिला टैगोर से बस इतना ही पूछ सके थे ‘इशारों इशारों में दिल लेने वाले, बता ये हुनर तूने सीखा कहाँ से’। तब राजेश खन्ना की नायिका डर के मारे बस यही कह पाती थी कि ‘शायद मेरी शादी का ख्याल दिल में आया है, इसीलिए मम्मी ने मेरी तुझे चाय पर बुलाया है।’ ‘लव’ को ‘अरेंज मैरिज’ में बदलने वाली यह नई तकनीक राजेश खन्ना ले तो आये थे, पर खुल कर कहने की हिम्मत अभी भी बॉलीवुड में उतनी नहीं थी। बॉलीवुड अभी भी ‘इंसान के लिए इशारा काफी होता है’ जैसे मुहावरों की धुंध में लिपटा था। बहुत बाद में भी नायिका के पूछने पर जैकी श्रॉफ शर्म से इतना ही कह सके थे ‘तेरा नाम लिया, तुझे याद किया’। पर साल 1973 में आई फ़िल्म बॉबी ने सारे मयार बदल दिए। इस बार पर्दे पर थे ऋषि कपूर, और पर्दे के पीछे थे राजकपूर साहब। आज शोमैन नेपथ्य में था और ‘प्यार से फिर क्यों डरता है दिल’ की बोल पर ठुमकने वाला बच्चा युवा होकर परदे पर था। लाइट और कैमरे पर पिता के सधे हाथ, एक्शन में पुत्र का बेफ़िक्र बाँकपन। परदे पर यह पिता पुत्र की अद्भुत जुगलबंदी थी। फ़िल्म में संगीत था लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का, फिर राग मालकौश से कम क्या ही होता। बॉबी में ऋषि कपूर ने नायिका का हाथ पकड़कर पहली बार साफ-साफ कहा “हम तुम एक कमरे में बंद हों और चाभी खो जाए’ यह नायक का स्पष्ट प्रेम निवेदन था। नायिका ने भी पलट कर जबाब दिया “तेरे नैनों की भूल भुलैया में बॉबी खो जाए”। इस बार हिरामन गाड़ीवान ने जैसे साफ साफ कहने का मन बना लिया था। कई बार मुझे लगता है राजकपूर साहब असल जीवन में नर्गिस से जो न कह सकें, उसे ऋषि कपूर और डिंपल कपाड़िया से कहलवा दिया।

“निर्देशक क्या नहीं कर सकता ? फिर अवचेतन मन की गुत्थी कौन सुलझा सका है? 1973 की ‘बॉबी’ बता रही थी कि अब माता-पिता के संयम भरे उपदेश और निगरानी वाले घेरे से युवक-युवती निकलना चाहते हैं और अब वे अपने जीवन साथी का फैसला खुद करेंगे। इस दौर में पर्दे पर वैसे बाप भी आ चुके थे जो नायक के मुंह पर 10 लाख का चेक फेंक कर मारते थे और चिल्लाते थे ‘दफा हो जा मेरी बेटी की जिंदगी से’। ‘बॉबी’ फ़िल्म से तो इंदिरा गाँधी, आपातकाल, जय प्रकाश नारायण तक के किस्से जुड़े हैं। रामचंद्र गुहा ने अपनी किताब ‘इंडिया: आफ़्टर गाँधी’ में इसपर विस्तार से लिखा है। वह किस्सा फिर कभी।”

ऋषि कपूर ने न सिर्फ फिल्मों में बल्कि असल जीवन में भी अपनी प्रेमिका का हाथ थामे रखा। उन्होंने ‘रील लाइफ’ में नीतू सिंह के साथ रोमांस तो किया ही, ‘रियल लाइफ’ में उन्हें ही जीवनसाथी बनाया। ऋषि कपूर अपने प्यार भरे अफसाने को किसी खूबसूरत मोड़ पर छोड़ कर अलग नहीं हुए बल्कि उसे अंजाम तक ले कर गए । उन्होंने सफर में अपने हमसफर को नहीं छोड़ा। ऋषि कपूर ने जब यह कहा कि ‘खुल्लमखुल्ला प्यार करेंगे हम दोनों, इस दुनिया से नहीं डरेंगे हम दोनों’ तो जैसे उन्होंने लाखों युवा कंठों को स्वर दे दिया। इस गाने में युवाओं के लिए जैसे एक मंत्र भी छिपा था ‘जो होगा देखा जाएगा’।

फ़िल्म “बॉबी” में ऋषि कपूर (PC-Shemaroo)

जब गंगा किनारे वाले अमिताभ बच्चन मुंह में बनारसी पान घुलाकर कई मुल्कों की पुलिस को चकमा दे रहे थे येन उसी वक्त ऋषि कपूर नायिका की जुल्फों में खोए हुए थे। वे हौले हौले नायिकाओं से पूछ रहे थे ‘सागर जैसी आंखों वाली ये तो बता तेरा नाम है क्या ‘। ऋषि कपूर और मिथुन चक्रवर्ती ने बॉलीवुड को पहली बार खुलकर नाचना और गाना सिखाया। दिलीप कुमार, संजीव कुमार, राजेश खन्ना जैसे नायक बहुत हुआ तो दो चार ठुमके लगा लेते थे। मिथुन चक्रवर्ती ने ही पहली बार ऐलान किया ‘आई एम ए डिस्को डांसर’। ठीक ऐसे ही ऋषि कपूर शाहरुख खान की ‘मोहब्बतें’ से 25 साल पहले पर्दे पर वायलिन लेकर आ चुके थे और अपनी महबूबा से साफ लफ्जों में कह रहे थे ‘पहले तो मैं शायर था आशिक बनाया आपने’। कई लोग कहते हैं कि ऋषि कपूर बस एक लोकप्रिय सितारा थे। इस देश में लोकप्रिय होना और लोकप्रियता बनाए रखना भी कम कठिन नहीं है। ‘कभी कभी’, ‘अमर अकबर एंथनी’ और ‘चाँदनी’ जैसी फिल्मों ने ऋषि को कुछ साल तक बॉलीवुड का देवता बना दिया ।

मुझे ऋषि कपूर की साफगोई भी बेहद पसंद थी। वे बेपरवाह थे और खुल कर बोलते थे। मुझे याद आता है कि जनवरी 2017 में उनकी ऑटोबायोग्राफी ‘खुल्लम खुल्ला- ऋषि कपूर अनसेंसर्ड’ को दिल्ली के ताज होटल में लांच किया गया था। तब मैं दिल्ली में ही था और जेएनयू से पीएचडी कर रहा था। अगले दिन सारे अखबारों के पन्ने इस खबर से भरे पड़े थे। इस मौके पर ऋषि कपूर ने कई बड़े खुलासे किए थे। ऋषि ने अपनी ऑटोबायोग्राफी मीना अय्यर के साथ मिल कर लिखी थी । जिसके नाम से ही यह पता चलता है कि इस किताब में ऐसे कई सारें खुलासे हैं जो पहले किसी को पता नहीं होंगे। एक ऐसा ही खुलासा कर उन्होंने बताया था कि ‘बॉबी’ फिल्म में बेस्ट एक्टर का अवॉर्ड पाने के लिए उन्होंने 30 हजार रुपये रिश्वत दिए थे। इस क़िताब में ऋषि कपूर ने अंडरवर्ल्ड के डॉन दाऊद इब्राहिम से अपनी मुलाकात को लेकर भी कई रोचक बातें साझा की हैं। वे चाहते तो इन प्रसंगों से बच सकते थे।वे न बताते तो किसी को क्या पता चलता। पर शायद वे अपनी आत्मा पर कोई बोझ लेकर विदा होना नहीं चाहते थे। या शायद उन्होंने रूसो की कालजयी आत्मकथा पढ़ रखी थी। यह ‘मुल्क’ आपको याद रखेगा।

अलविदा ऋषि कपूर साहब….

“बला की चमक उसके चेहरे पे थी,
मुझे क्या ख़बर थी कि मर जाएगा। “

(लेखक, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर, कार्यरत हैं।)

“जापान में याद रखे जाने वाले भारतीय जज, इरफ़ान ने किया जिनके किरदार को जीवंत”

अमित द्विवेदी | Editorial Desk

एक कहावत है, “दूर के ढोल सुहावने होते हैं।” हम औरों की तो जी भर के तारीफ करते हैं, लेकिन जब बात अपनों के क़द्र की आती है, तब अक्सर हम उन्हें नज़रअंदाज़ कर देते हैं। ऐसे अनेकों भारतीय हैं, जिन्हें विदेशों में ख़ूब प्यार-सम्मान मिला, लेकिन भारत ने उन्हें कभी वह स्थान नहीं दिया, जिसके वे हक़दार थे। ऐसे ही एक विभूति थे, विधिवेत्ता डॉ. राधाविनोद पाल।

जस्टिस राधाविनोद पाल (PC- Kingendai Photo Library/AFLO)

डॉ. राधाविनोद पाल एक साहसी विधिवेत्ता एवं न्यायाधीश थे। 27 जनवरी, 1886 को जन्मे डॉ. राधाविनोद पाल एक ऐसे न्यायाधीश थे, जिन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जापान के ख़िलाफ़ चलाये गये, अन्तरराष्ट्रीय मुकदमे में मित्र राष्ट्रों के विरुद्ध निर्णय देने का साहस किया था। उस समय विजयी होने के कारण मित्र राष्ट्रों का गुमान सर चढ़ कर बोल रहा था।

मित्र राष्ट्र (अमरीका, ब्रिटेन, फ्रान्स आदि देश) जापान को दण्ड देना चाहते थे, इसलिए उन्होंने युद्ध की समाप्ति के बाद ‘क्लास अ वार क्राइम्स’ नामक एक नया कानून बनाया, जिसके अन्तर्गत आक्रमण करने वाले को मानवता तथा शान्ति के ख़िलाफ़ अपराधी माना गया था। इसके आधार पर जापान के तत्कालीन प्रधानमन्त्री हिदेकी तोजो तथा दो दर्जन अन्य नेता व सैनिक अधिकारियों को युद्ध अपराधी बनाकर कटघरे में खड़ा कर दिया। 11 विजेता देशों द्वारा 1946 में निर्मित इस अन्तरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण (इण्टरनेशनल मिलट्री ट्रिब्यूनल फार दि ईस्ट) में डॉ. राधाविनोद पाल को ब्रिटिश सरकार ने भारत का प्रतिनिधि बनाया था।

टोक्यो ट्रायल के सभी 11 जज

इस मुकदमे में दस न्यायाधीशों ने तोजो को मृत्युदंड दिया, लेकिन डॉ. राधाविनोद पाल ने न केवल इसका विरोध किया, बल्कि इस न्यायाधिकरण को ही अवैध क़रार दिया। इस घटना की वजह से जापान में आज भी उन्हें एक महान व्यक्ति की तरह सम्मान दिया जाता है। द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान के लगभग 20 लाख सैनिक तथा नागरिक मारे गये थे। राजधानी टोक्यो में उनका स्मारक बना है। इसे जापान के लोग मंदिर की तरह पूजते हैं। यासुकूनी नामक इस समाधि स्थल पर डॉ. राधाविनोद का स्मारक भी बना है।

जस्टिस पाल की स्मृति में जापान स्थित यासुकुनी समाधि स्थल

डॉ. राधाविनोद के सम्मान का अन्दाज़ा आप जापान के सर्वोच्च धर्मपुरोहित नानबू तोशियाकी द्वारा लिखित प्रशस्ति से लगा सकते हैं। उन्होंने लिखा है कि हम यहां डॉ. पाल के जोश और साहस का सम्मान करते हैं, जिन्होंने वैधानिक व्यवस्था और ऐतिहासिक औचित्य की रक्षा की। हम इस स्मारक में उनके महान कृत्यों को अंकित करते हैं, जिससे उनके सत्कार्यों को सदा के लिए जापान की जनता के लिए धरोहर बना सकें।

“आज जब मित्र राष्ट्रों की बदला लेने की तीव्र लालसा और ऐतिहासिक पूर्वाग्रह ठंडे हो रहे हैं, सभ्य संसार में डॉ. राधाविनोद पाल के निर्णय को सामान्य रूप से अन्तरराष्ट्रीय कानून का आधार मान लिया गया है।”

डॉ. पाल का जन्म 27 जनवरी, 1886 को ग्राम सलीमपुर (जिला कुश्तिया, बंगलादेश) में हुआ था। कोलकाता के प्रेसिडेन्सी महाविद्यालय तथा कोलकाता विश्वविद्यालय से कानून की पढ़ाई करने के बाद वे इसी विश्वविद्यालय में 1923 से 1936 तक अध्यापक रहे। 1941 में वे कलकत्ता उच्च न्यायालय में न्यायाधीश पद पर आसीन हुए। इसके अलावा वे तत्कालीन अंग्रेज शासन के सलाहकार भी रहे। यद्यपि उन्होंने अन्तरराष्ट्रीय कानून का औपचारिक प्रशिक्षण नहीं लिया था, फिर भी द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब जापान के विरुद्ध ‘टोक्यो ट्रायल्ज’ नामक मुकदमा शुरू किया गया, तो उन्हें इसमें न्यायाधीश बनाया गया।

डॉ. पाल ने अपने निर्णय में लिखा कि किसी भी घटना के बाद उसके बारे में क़ानून बना दिया जाना सर्वथा अनुचित है। उनके इस निर्णय की सभी ने ख़ूब तारीफ़ की। भारत के इस महान विभूति की हुई उपेक्षा का अन्दाज़ा हम इसी बात से लगा सकते हैं कि डॉ. पाल ने अपने जीवन के अन्तिम दिनों में ग़रीबी के कारण अत्यन्त कष्ट भोगते हुए 10 जनवरी, 1967 को परलोक सिधार गए।

मिनीसीरीज़ ‘टोक्यो ट्रायल’ के एक दृश्य में बतौर जस्टिस पाल अभिनेता इरफ़ान

दिसम्बर 2016 में आई मिनीसीरीज़ “टोक्यो ट्रायल” इस ऐतिहासिक घटना पर आधारित है। गौरतलब है कि भारतीय सिनेमा के अभिनय पुरोधा माने जाने वाले इरफ़ान खान ने इसमें जस्टिस राधाविनोद पाल की भूमिका निभाई है। बतौर जस्टिस पाल, इरफ़ान ने इस चरित्र को एकदम जीवंत कर दिया है। नेटफ्लिक्स पर उपलब्ध यह मिनीसीरीज़ जापान-नीदरलैंड-कनाडा का संयुक्त निर्माण है जिसको बेहद खूबसूरती से निर्देशित किया है पीटर वेरहोफ और रॉब डब्ल्यू किंग ने।

इरफ़ान स्क्रीन पर पूरी तरह छा जाने वाले मंझे कलाकार हैं। मिनीसीरीज़ देखने पर ऐसा महसूस होता है कि जस्टिस पाल की भूमिका के लिए विदेशी फिल्मकारों का चयन इरफ़ान खान, बिल्कुल सही सिद्ध हुआ।

(लेखक, नवप्रवाह मीडिया नेटवर्क्स प्रा.लि. के एडिटर इन चीफ़ हैं)

भूली हुई यादें- “मनोहर सिंह”

डॉ० कुमार विमलेन्दु सिंह | Navpravah Desk

कुछ लोग और कुछ चीज़े, इतनी सहल होती हैं कि लगातार हमारी ज़िंदगी का हिस्सा बनी रहती हैं| जब तक ये हमारे साथ, हर रोज़ होते हैं, न इनके खो जाने का डर होता है, न इनके होने की कोई ख़ास ख़ुशी| ये लोग, ये चीज़े, बिना कोई शोर मचाए, चुपचाप चले भी जाते हैं और अचानक याद आते हैं हमें, जब हमारे अंदर कोई ख़ालीपन महसूस होता है| ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इनका होना एक अदद ज़िंदगी बनाती है| मनोहर सिंह, एक आदत थे, हर उस इंसान के लिए, जिसने ज़रा सा भी ध्यान दिया हो गुज़रते हुए वक़्त पर|

मनोहर सिंह

इनका जन्म 1938 में, शिमला से कुछ दूर, क्वारा नाम के गांव में हुआ| वहीं इन्होंने पढ़ाई की और वहीं नौकरी भी की| 1968 में ये NSD, दिल्ली पहुंचे और 1971 में  ग्रेजुएट होने के बाद वहीं दिल्ली में, नाटकों का निर्देशन और अभिनय शुरू कर दिया| NSD की रिपर्टरी कंपनी के लिए, ये लगातार निर्देशन करते रहे| 1971 में आई, “क़त्ल की हवस”, इनके द्वारा निर्देशित, पहला नाटक था| इन्होंने नाटकों के लिए ख़ूब काम किया| “तुग़लक”, “नागमंडलम”, “हिम्मत माई” जैसे नाटकों में इन्होंने अपने अभिनय की अमिट छाप छोड़ी|

“NSD की रिपर्टरी कंपनी के प्रमुख भी रहे मनोहर सिंह, 1976 से 1988 तक. इस बीच और इसके बाद भी, कई फ़िल्मों में इन्होंने यादगार किरदार निभाए. इनकी पहली फ़िल्म, इमरजेंसी की कहानी दर्शाती, “क़िस्सा कुर्सी का”, थी. इसके बाद गोविंद निहलानी के निर्देशन में आई, “पार्टी”, 1984 में आई. इसे NFDC ने प्रोड्यूस किया था.  इसके बाद तो मनोहर सिंह, हर तरह की फ़िल्मों में नज़र आने लगे.”

“दामुल”, “तमस”, “मैं आज़ाद हूं”, “डैडी”, “एक दिन अचानक” से लेकर, “चांदनी”, “लेकिन”, “लम्हे”, “सड़क”, “रूदाली” जैसी तमाम बड़ी फ़िल्मों में, अपने अभिनय का लोहा मनवाया| “तिरंगा” में, “जीवन लाल तंडेल” की भूमिका में भी, ये बड़े बड़े अभिनेताओं के बीच, अपना रंग जमाते नज़र आए| इसके अलावा भी कई फ़िल्में, इन्होंने की|

टीवी पर भी, मनोहर सिंह, ख़ूब नज़र आए| “मुल्ला नसरुद्दीन” और “पल छिन” जैसे धारावाहिकों में भी इनका अलग अंदाज़ दिखा| 1990 में, उर्दू शायरों पर आधारित “कहकशां” में, इनके द्वारा निभाया गया, फ़िराक़ गोरखपुरी का किरदार आज भी याद आता है|

‘तुगलक़’ नाटक की मुख्य भूमिका में मनोहर सिंह (PC-StarsUnfolded)

मनोहर सिंह, 80 और 90 के दशक में बढ़ रही पीढ़ी के लिए भी एक परिचित चेहरा हैं| राष्ट्रीय साक्षरता मिशन को प्रचारित करने के लिए एक छोटी सी फ़िल्म में, जब ये अपने ब्रश से एक निर्धन बच्चे के गाल पर शेविंग क्रीम लगाते थे और बैकग्राउंड में “पूरब से सूर्य उगा”, गाना बजता था, तो मुस्कुराते हुए मनोहर सिंह, अपने ही दादा, नाना से लगते थे और उस प्रचार वाले बच्चे के साथ हमें भी पढ़ने की प्रेरणा मिलती थी|

1982 में इन्हें, “संगीत नाटक अकादमी” अवार्ड दिया गया था| 2002 में इनकी मृत्यु हो गई| NSD में 2003 से इनकी स्मृति में, वार्षिक पुरस्कार दिए जाते हैं|

इनको ख़ूब सम्मान मिला और काम भी, लेकिन बस लंबा वक़्त बिताने की वजह से लाइफ़टाइम अचीवमेंट अवार्ड देने की परंपरा वाले, कुछ परिवारों के बीच सीमित रहने वाले, हिन्दी सिनेमा की दुनिया में, मनोहर सिंह से और भी बहुत कुछ सीखा जा सकता था|

(लेखक जाने-माने साहित्यकार, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)

एमबीए स्टूडेंट ने बनाया नर्सिंग रोबोट, कोरोना से लड़ाई में साबित होगा कारगर

न्यूज़ अपडेट | Navpravah Desk

देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है, इस बात को सार्थक सिद्ध करते हुए ग्वालियर में एमबीए की पढ़ाई कर रहे अपर्णेश शुक्ल ने स्क्रैप मैटीरियल से एक नर्सिंग रोबॉट बनाया है। ये रोबॉट कोरोना संक्रमण से पीड़ित मरीजों की सेवा में कार्यरत मेडिकल स्टाफ के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

यह नर्सिंग रोबोट सामाजिक तथा शारीरिक दूरी बनाते हुए मरीजों को आवश्यकता की लगभग समस्त सामग्री पहुँचा सकता है। इस रोबॉट को एक सामान्य समारोह में उपजिलाधिकारी सुनील कोरडे, अस्पताल के जिला शल्य चिकित्सक डॉ. पुरुषोत्तम मड़ावी, जिला स्वास्थ्य अधिकारी डा.अजय डवले, डॉ. अनुपम हिवलेकर, विश्वविद्यालय के जनसंपर्क अधिकारी बी एस मिरगे, सहायक कुलसचिव डॉ. राजेश्वर सिंह की प्रमुख उपस्थिति में जिला सामान्य अस्पताल को नि:शुल्क उपलब्ध कराया गया जिससे मरीजों के इलाज में आसानी हो सके।

लगभग 13 किलो वजन का यह यंत्र 25 किलो वजन की सामग्री रोगी तक पहुँचा सकता है। अपर्णेश ने इसे लॉकडाउन के दौरान विश्वविद्यालय के भीतर मौजूद स्क्रैप सामग्री का इस्तेमाल करते हुए इसे बनाया है। केवल 8500₹ की लागत से बना यह रोबॉट कोरोना महामारी के संकट में बड़ी और महत्वपूर्ण राहत देने वाला साबित होगा।

अपर्णेश ग्वालियर में एमबीए कर रहे हैं तथा होली के अवकाश में अपने परिवार के बीच त्यौहार मनाने आये हैं। इसी बीच लॉकडाउन हो जाने के कारण उन्हें रुकना पड़ा। इस कार्य में विश्वविद्यालय के अन्य सदस्यों का सहयोग भी उन्हें प्राप्त हुआ।

बुधवार को सामान्य अस्पताल में इस यंत्र का परिचालन किया गया। उपजिलाधिकारी श्री कोरडे ने इसे एक बड़ी उपलब्धि करार देते हुए कहा कि इस प्रकार का यंत्र प्राप्त होने वाला वर्धा पहला जिला बना है। कोरोना के रोगियों का इलाज करने में यह यंत्र बहुत ही उपयोगी साबित होगा। रोगी के पास न जाकर उसका इलाज करने और उसे आवश्यक सामग्री देने के लिए यह यंत्र सचमुच में स्वास्थ्य दूत साबित होगा।

इस मौके पर अस्पताल के जनसंपर्क अधिकारी प्रवीण गावंडे और अस्पताल के स्वास्थ्य कर्मी मौजूद थे। इस यंत्र के संदर्भ में अपर्णेश शुक्ल ने बताया कि भविष्य में इसे 360 डिग्री कैमरा, सेंसर तथा अन्य इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं का इस्तेमाल करते हुए और अत्याधुनिक बनाया जाएगा।

“इरफ़ान हों या ऋषि सबका एकमात्र सत्य है, मृत्यु”

डॉ. प्रवीण कुमार अंशुमान | Navpravah Desk

इरफ़ान खान के लिए अभी कल ही एक कविता समर्पित की थी, ‘इरफ़ान, तुम चोट सदा पहुँचाओगे’, जिसमें एक पद इस प्रकार था –

जाकर तुमने इस धरती से
सबको याद दिलाई है
मौत यहीं बस खड़ी हुई
देखो, अब किसकी बारी आई है।

और देखो, तब तक बारी आ गयी। एक और अभिनेता चल पड़ा। क्यू में खड़ें लोगों की संख्या में एक और नम्बर कम हो गया। अंग्रेजी के एक महान लेखक जॉन डन की एक कविता है – For Whom the Bell Tolls, जिसकी अंतिम पंक्ति कहती है – For Whom the bell tolls, It rolls for thee. किसी की भी मृत्यु पर बजने वाली चर्च की घण्टी सदा तुम्हारे लिए बजती है। यह कभी मत सोचना कि वह किसी और के लिए बजती है। वह सदा तुम्हारे, और सिर्फ तुम्हारे लिए ही बजती है।

लेकिन एक आश्चर्यजनक घटना मनुष्य के जीवन में घटती है। लाख समझाये जाने के बावज़ूद कोई भी मनुष्य इस बात का इल्म नहीं कर पाता कि उसे भी एक दिन मरना है; एक दिन मिटना है। प्रत्येक व्यक्ति के लिए मौत की घंटी सदा दूसरे के लिए बजती है। उसे तो समझ भी नहीं आ सकता कि वह उसके लिए बज भी कैसे सकती है। क्योंकि वह तो अभी मरा नहीं; उसे तो अपनी मृत्यु का कोई अभी अनुभव नहीं। वह उसका भान करे भी तो करे कैसे।

मनुष्य यदि सिर्फ़ हाड़-मांस का शरीर होता, तब तो वह मानता कि हां, चर्च की घण्टी मेरे लिए ही बजती है। मरना तो सत्य है ही। एक ऐसा सत्य जिसे चाह कर भी झुठलाया नहीं जा सकता। तो फिर ऐसा क्यूँ होता है कि मृत्यु के इतने क़रीब और निश्चित होने के बावज़ूद हर कोई कहीं न कहीं इससे अस्पर्शित छूट जाता है। वह स्वयं के बारे में नहीं सोचता कि वह भी एक दिन मर जाएगा। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हांड-मांस के शरीर में कोई अशरीरी भी मौज़ूद है। इसी तत्व का अवचेतन में एहसास हर मानव को इसके प्रति उदासीन बनाये रखता है। क्योंकि कहीं न कहीं प्रत्येक मनुष्य के भीतर अंतरतम में यह एहसास जिंदा है, कि उसकी कोई मृत्यु नहीं है।

” मौत के तांडव के बीच मनुष्य का स्वयं की मृत्यु के बाबत इतना उदासीन रहना कहीं न कहीं उसी अमृत्वता का आभास है, जो उसमें सदा विद्यमान रहता है। भले ही यह विश्वास अवचेतनरूप में ही उसमें उपस्थित क्यूँ न हो। मगर यह ग़ैरध्यान की स्थिति उसके भीतर इस बात का प्रमाण है कि आत्यंतिक रूप में हर कोई अजर और अमर है। “

मगर मृत्यु का फिर शोक क्यूँ? इसका दुःख क्यूँ मनाएं? असल में दुःख और शोक किसी और के लिए नहीं होता है। किसी की भी मृत्यु की ख़बर अंततः अपनी मृत्यु की ख़बर होती है। मूलतः प्रत्येक व्यक्ति किसी की मृत्यु देख आतंकित होता, भय खाता है। और तदुपरांत दुःख और शोक मनाता है। इसी संदर्भ को लिए कविता में अगला एक पद आता है –

जो याद करेगा तुमको
उसे भी मिट तो जाना है
बस याद स्वयं की आ जाए
सीख यही बस जाना है।

दुःख यह नहीं कि वह चला गया; दुःख यह भी नहीं कि मैं चला जाऊँगा; और दुःख यह भी नहीं कि क्या उसे ख़ुद का पता था, जो चला गया। क्योंकि इसे जानने का तो कोई उपाय भी नहीं है। दुःख तो असल में इस बात का है कि मैं भी स्वयं को अभी तक शरीर से ऊपर न मानता हूँ, और न ही जानने की तैयारी है। जब भी यह शरीर जाएगा, तो इसके जाने का, इसके मिटने का बोध होगा। और इस बोध के कारण मनुष्य कष्ट के सागर में डूब जाएगा। इससे बचने का कोई उपाय भी नहीं है। तो एक आदमी फिर करे क्या? बस एक काम है, जिसे वह कर सकता है – उसे जान ले जो इस मृत शरीर के भीतर अमृत है। बस।

इसलिए गौर से देखें तो पता चलेगा कि हर व्यक्ति असल में शोक स्वयं के लिए मनाता है। दूसरे की मृत्यु बस एक बहाना भर होती है, जिसमें वह परोक्ष रूप में स्वयं के लिए ही अपनी भावनाएं प्रकट करता है। प्रत्येक मृत्यु एक चोट करती है सबके भीतर। कविता की अंतिम पंक्तियां कहती हैं :

पंच तत्व में मिलकर आज़
तुम याद सभी को आओगे
नश्वर शरीर की सीमा कितनी
तुम चोट सदा पहुँचाओगे।
हां इरफ़ान, तुम चोट सदा पहुचाओगे।

पंच तत्व में तो सबको मिल जाना है। सुपुर्द-ए-ख़ाक होना सबकी नियती है। किसी व्यक्ति का मरना प्रत्येक के लिए एक चोट है, एक घाव है। एक ऐसी चोट, एक ऐसा घाव, जिसे न तो ठीक किया जा सकता है और न ही भरा जा सकता है। जब भी कोई याद किया जाता है, तो वह मिट चुका होता है; और जो याद करता है, उसका भी एक दिन अनंत में विलीन हो जाना तय है। इसलिए याद करना और याद किया जाना, सब निर्मूल्य है। सब निरर्थक है।

कल इरफ़ान, आज़ ऋषि कपूर, कल फ़िर कोई और। यह सिलसिला तो चलता रहेगा। शायद कल फिर मैं और परसों फिर आप। मगर इन सबके बीच की सिखावन ओशो रजनीश एक छोटे से वाक्य में समाहित होता है – ‘स्वयं को जाने बिना पूरी पृथ्वी को भी जान लेना व्यर्थ है। आत्मज्ञान ही सिर्फ़ एक मात्र सार्थक क़दम है।’

(लेखक, किरोड़ीमल कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर कार्यरत  हैं। )

ट्विटर विवाद: व्हाइट हाउस ने इसलिए किया पीएम मोदी को Unfollow

सौम्या केसरवानी | Navpravah.com

वर्तमान में दुनिया कोरोना वायरस नामक महामारी से जूझ रही है, लेकिन अमेरिका और भारत के बीच ट्विटर ही एक मुद्दा बन गया है। व्हाइट हाउस के ट्विटर हैंडल से पीएम मोदी, राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद समेत अन्य भारतीय ट्विटर हैंडल को अनफॉलो कर दिया गया है।

इस घटना के बाद व्हाइट हाउस ने इस पूरे मामले पर जवाब देते हुए कहा है कि जब भी अमेरिकी राष्ट्रपति किसी देश की यात्रा पर जाते हैं, उस वक्त व्हाइट हाउस की ओर से उन देशों के आधिकारिक ट्विटर अकाउंट को फॉलो किया जाता है। इससे पहले जब डोनाल्ड ट्रंप भारत आए थे, तभी व्हाइट हाउस ने पीएम मोदी समेत अन्य ट्विटर हैंडल को फॉलो किया था।

एक अधिकारी के मुताबिक, व्हाइट हाउस सिर्फ अमेरिकी सरकार से जुड़े ट्विटर हैंडल को फॉलो करता है, लेकिन राष्ट्रपति की किसी देश में विजिट के दौरान उस देश के प्रमुख को फॉलो किया जाता है, ताकि संदेश लगातार रिट्वीट हो सके।

इससे पहले व्हाइट हाउस ने पीएम मोदी, राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, प्रधानमंत्री कार्यालय, भारतीय दूतावास, भारत में अमेरिकी दूतावास जैसे ट्विटर हैंडल को फॉलो किया था। लेकिन, बुधवार को जब व्हाइट हाउस ने सभी को अनफॉलो कर दिया गया, तो भारत में इस बात को लेकर आपस में बहस छिड़ गई। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी अपने ट्विटर अकाउंट पर इसको लेकर तंज कसा था और विदेश मंत्रालय से अपील की थी कि वह इस मामले को अमेरिका के सामने उठाए।

भारतीय मूल के व्यापारी ने दुबई में की आत्महत्या

नवप्रवाह न्यूज़ |News Desk

पुलिस ने बताया कि वे बिल्डिंग से गलती से नहीं गिरे थे बल्कि उन्होंने बीती 23 अप्रैल को 14वीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली थी।भारतीय मूल के गल्फ़ कारोबारी ने दुबई में आत्महत्या कर ली। दुबई पुलिस ने बताया है कि उनकी मौत सामान्य नहीं है बल्कि जॉय अरक्कल (Joy Arakkal) ने आत्महत्या की थी।

पुलिस ने बताया कि वे बिल्डिंग से गलती से नहीं गिरे थे बल्कि उन्होंने बीती 23 अप्रैल को 14वीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली थी।

54 वर्षीय अरक्कल दुबई में ‘इनोवा रिफाइनिंग एन्ड ट्रेडिंग एफजेडी’ में बतौर एमडी कार्यरत थे। व्यापार में कर्ज से परेशान अरककल ने खुदकुशी कर ली और अपने पीछे रोता बिलखता परिवार छोड़ गए जिसमें उनकी पत्नी सेलीन जॉय समेत दो बच्चे हैं।

“नहीं रहा रुपहले पर्दे का सबसे चमकदार सितारा, ऋषि कपूर”

डॉ० कुमार विमलेन्दु सिंह | Navpravah Desk

नादीदा थी वो दुनिया उनके लिए, नामालूम था फ़रीक़ेसानी उस जहाँ में कौन होगा और ऐसे अनजान जगह पर, बिना बताए चले जाना, परेशान न कर देगा? वो ख़ूबरू चेहरा, वो ख़़सूसियत, कयोंकर न चाहेगा कोई क़रीब होना? लेकिन आसमानों के उस तरफ़? ऐसी भी क्या जल्दी थी? अभी तो पहला वक़्फ़ा भी न मिला था उस क़रार , उस मुसलसल राबता से, जो हम में, आप में था| ऋषि जी! आप चले गए|

वो रूमानियत, जो पिछली नस्लों से लेकर अब तक तारी रही, वो तबस्सुम, जो कई बार यकीन दिलाता था, कि दुनिया में बहुत मोहब्बत है, अब नावाकिफ़ ही रहेंगी, आने वाली नस्लें, उससे|

ज़िन्दगी के दो किरदारों में अभिनेता ऋषि कपूर

पहली दफ़ा, हाथों में गिटार लिए, बेबाक अंदाज़ में, किसी के आंखों की तारीफ़ करते, एक नग़्मा लुटाते, आपको देखा था| दौर बदले, लोग बदले, नहीं बदला तो आपका अंदाज़, जो पलक झपकते ही दिलों पर काबिज़ हो जाता था|

कपूर ख़ानदान की तहज़ीब और मौजूदगी को आपसे मज़बूती थी, आप याद दिलाते थे उस ज़माने की, जब हम में से कई थे ही नहीं| आपकी वजह से हमने जाना कि उस ज़माने में अंदाज़-ए-मोहब्बत क्या था?

एक आशिक़ मिज़ाज सा कोई चाहिए होगा उस जहाँ में भी, नाज़ुकमिज़ाजी से लुत्फ़-ए-इश्क़ बयां करने को, सो आप चले गए|
जता गए आप ऋषि कपूर साहब कि:

” सितारों के आगे, जहाँ और भी है…”