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Thursday, September 10, 2026
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स्टिंग ऑपरेशन से हरीश रावत की बढ़ती मुश्किलें, हरक ने लगाया धमकाने का आरोप

Bureau@navpravah.com

दिन-ब-दिन उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत की मुश्किलें बढ़ती ही जा रही हैं. उत्तराखंड कांग्रेस के बागी विधायक हरक सिंह ने शनिवार को एक प्रेस कांफ्रेंस में रावत पर कई गम्भीर आरोप लगाए. एक स्टिंग ऑपरेशन का साक्ष्य देते हुए सिंह ने कहा कि इस सीडी में रावत को विधायकों को लालच देते देखा जा सकता है.

शनिवार को उत्तराखंड में एक पत्रकार परिषद में हरक सिंह ने हरीश रावत पर खतरनाक माहौल बनाने का आरोप लगाया. सिंह ने कहा कि राज्य में माहौल खतरनाक हो गया है. उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की कि उन्हें आवश्यक सुरक्षा दी जाए, क्योंकि उनकी जान को खतरा है. उन्होंने कहा कि विधायकों को लगातार धमकाया जा रहा है, जिससे माहौल बिगड़ता जा रहा है.

यही नहीं, सिंह ने यह भी कहा कि कांग्रेस की 9 बागी विधायकों के अलावा कई अन्य भाजपा विधायकों को भी खरीदने की कोशिश की जा रही है. उन्होंने मांग किया है कि राज्य के भले के लिए रावत सरकार को बर्खास्त कर के राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया जाना चाहिए.

अब इस पूरे मामले में स्थिति लगातार बिगड़ती नज़र आ रही है. सूत्रों से प्राप्त जानकारी के मुताबिक़ रावत पर लगाए जा रहे आरोपों पर प्रतिक्रिया स्वरुप जल्द ही एक और प्रेस कांफ्रेंस आयोजित किया जा सकता है.

क्या आज की पत्रकारिता से खुश होते ‘गणेश शंकर विद्यार्थी’?

अनुज हनुमत
स्वातंत्रयोत्तर हिंदी पत्रकारिता को आजादी के दीवानों को ताकत देने के साथ ही साथ उसे निष्पक्ष और समाजोपयोगी तेवर देने वाले पत्रकारों में सबसे अग्रणी गणेश शंकर विद्यार्थी को माना जाता है। किसी के लिए भी अपनी बेबाकी और अलग अंदाज से दूसरों के मुंह पर ताला लगाना, एक बेहद मुश्किल काम होता है। कलम की ताकत हमेशा से ही तलवार से अधिक रही है और ऐसे कई पत्रकार हैं, जिन्होंने अपनी कलम से सत्ता तक की राह बदल दी। गणेश शंकर विद्यार्थी का नाम ऐसे ही पत्रकारों में गिना जाता है।

 

गणेश शंकर विद्यार्थी का जन्म प्रयाग में 26 अक्टूबर 1890 को हुआ था। अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ गणेश शंकर विद्यार्थी की कलम खूब चली, जिससे उस समय नौजवानों को उनसे प्रेरणा मिली। वे अपने नाम के आगे विद्यार्थी इसलिए जोड़ते थे क्योंकि उनका मानना था कि मनुष्य जिंदगी भर सीखता रहता है।

 

एक निडर और निष्पक्ष पत्रकार तो थे ही, साथ ही वे एक समाज-सेवी, स्वतंत्रता सेनानी और कुशल राजनीतिज्ञ भी थे। भारत के ‘स्वाधीनता संग्राम’ में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान था।

 

गणेशशंकर विद्यार्थी एक ऐसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, जो कलम और वाणी के साथ-साथ महात्मा गांधी के अहिंसक समर्थकों और क्रांतिकारियों को समान रूप से देश की आज़ादी में सक्रिय सहयोग प्रदान करते रहे। गणेश शंकर विद्यार्थी की मृत्यु कानपुर के हिन्दू-मुस्लिम दंगे में निस्सहायों को बचाते हुए 25 मार्च सन् 1931 ई. में हो गई। विद्यार्थी जी साम्प्रदायिकता की भेंट चढ़ गए थे। उनका शव अस्पताल की लाशों के मध्य पड़ा मिला। वह इतना फूल गया था कि, उसे पहचानना तक मुश्किल था। नम आँखों से 29 मार्च को विद्यार्थी जी का अंतिम संस्कार कर दिया गया।

 

भारत में पत्रकारिता का उद्भव परतंत्रता के दौर में हुआ। अंग्रेजों द्वारा किए जा रहे अन्याय और शोषण के दौर में पत्रकारिता का रुख स्वाभाविक रूप से प्रतिष्ठान विरोधी हो गया। भारतीय पत्रकारिता ने अपने इस रुख की एक बड़ी कीमत भी अदा की। बाल गंगाधर तिलक से शुरू होने वाली जुझारू और साहसी पत्रकारिता को गणेश शंकर विद्यार्थी ने अपने समाचार पत्र ‘प्रताप’ के जरिए एक नई ऊंचाई प्रदान की। उनके नाम के साथ विद्यार्थी शब्द जुड़ा है लेकिन निश्चित रूप से वह कांतिकारी और आत्मोत्सर्गी पत्रकारिता के गुरु हैं।

 

विद्यार्थी जी का बचपन विदिशा और मुंगावली में बीता। किशोर अवस्था में उन्होंने समाचार पत्रों के प्रति अपनी रुचि को जाहिर कर दिया था। वे उन दिनों प्रकाशित होने वाले भारत मित्र, बंगवासी जैसे अन्य समाचार पत्रों का गंभीरतापूर्वक अध्ययन करते थे। इसका असर यह हुआ कि पठन-पाठन के प्रति उनकी रुचि दिनों-दिन बढ़ती गई। उन्होंने अपने समय के विख्यात विचारकों वाल्टेयर, थोरो, इमर्सन, जॉन स्टुअर्ट मिल, शेख सादी सहित अन्य रचनाकारों की कृतियों का अध्ययन किया। वे लोकमान्य तिलक के राष्ट्रीय दर्शन से बेहद प्रभावित थे। महात्मा गांधी ने उन दिनों अंग्रेजों के खिलाफ अहिंसात्मक आंदोलन की शुरूआत की थी, जिससे विद्यार्थी जी सहमत नहीं थे, क्योंकि वे स्वभाव से उग्रवादी विचारों के थे।

 

विद्यार्थी जी ने मात्र 16 वर्ष की अल्प आयु में ‘हमारी आत्मोसर्गता’ नामक एक किताब लिख डाली थी। वर्ष 1911 में भारत के चर्चित समाचार पत्र सरस्वती में उनका पहला लेख आत्मोसर्ग शीर्षक से प्रकाशित हुआ था, जिसका संपादन हिंदी के उद्भूत विद्धान आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा किया जाता था। वे द्विवेदी के व्यक्तित्व एवं विचारों से प्रभावित होकर पत्रकारिता के क्षेत्र में आए। श्री द्विवेदी के सानिध्य में सरस्वती में काम करते हुए उन्होंने साहित्यिक, सांस्कृतिक सरोकारों के प्रति अपना रुझान बढ़ाया। इसके साथ ही वे महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के पत्र ‘अभ्युदय’ से भी जुड़ गए।

 

उनके निधन पर गाँधी जी ने ‘यंग’ में लिखा था – ‘गणेश का निधन हम सब की ईर्ष्या का परिणाम है। उनका रक्त दो समुदायों को जोड़ने के लिए सीमेंट का कार्य करेगा। कोई भी संधि हमारे हृदयों को नहीं बाँध सकती है।’ उनकी मृत्यु से सब पिघल गए और जब वे होश में आये तो एक ही आकार में थे – वह था मानव। लेकिन एक महामानव अपनी बलि देकर उन्हें मानव होने का पाठ पढ़ा गया था।

 

कानपुर में उनकी स्मृति में “गणेश शंकर विद्यार्थी स्मारक चिकित्सा महाविद्यालय और गणेश उद्यान” बनाया गया है।
आज गणेश शंकर विद्यार्थी तो हमारे बीच नही हैं पर उनके बताये गए आदर्श व सिद्धांत आज भी हमें मजबूती प्रदान करते हैं। वे अक्सर कहा करते थे कि समाज का हर नागरिक एक पत्रकार है, इसलिए उसे अपने नैतिक दायित्वों का निर्वाहन सदैव करना चाहिए। गणेश शंकर विद्यार्थी पत्रकारिता को एक मिशन मानते थे, पर आज के समय में पत्रकारिता मिशन नही बल्कि इसमें बाजार हावी हो गया है। जिसके कारण इसकी मौजूदा प्रासंगिकता खतरे में है।

महबूबा होंगी जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री, जल्द होगी ताजपोशी

Bureau@Navpravah.com
जम्मू कश्मीर में लगभग ढाई महीने की राज्यपाल सरकार के बाद अब पीडीपी और भाजपा की सरकार बनने जा रही है। पीडीपी विधायक दल की नेता महबूबा मुफ्ती आज राज्यपाल से मिलकर सरकार बनाने का प्रस्ताव रखेंगी। महबूबा राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री बनेंगी।

 

जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल से मिलने के बाद ही यह तय हो जाएगा कि नई सरकार कब बनेगी। हालाँकि पार्टी सूत्र बताते हैं कि 29 तारीख को सरकार का गठन किया जा सकता है। इस तरह महबूबा मुफ्ती को 29 तारीख़ को राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री का ताज पहनाया जा सकता है। महबूबा को मुख्यमंत्री बनाए जाने को लेकर उन्ही के घर में पार्टी नेताओं और विधायकों की बैठक हुई, जिसमें महबूबा को सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया।

 

हालाँकि सरकार के गठन को लेकर कोई भी फैसला दोनों पार्टियां, भाजपा और पीडीपी मिलकर करेंगी। महबूबा मुफ्ती का मुख्यमंत्री पद लगभग तय तभी हो गया था, जब वे पिछले हफ्ते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनके आवास पर मिलीं।

 

गौरतलब है कि पिछले 2 महीने से भी अधिक समय से जम्मू- कश्मीर में मुख्यमंत्री के चयन की वजह से सरकार का गठन नहीं हो पा रहा था। अंततः अब यह मामला सुलझता नज़र आ रहा है।

प्रेम तो गीत है, मधुर आत्मा से गाये जाओ- मीराबाई

AnujHanumat@Navpravah.com
कहते हैं प्रेम की न तो कोई परिभाषा होती है न ही इसे किसी प्रकार के बन्धन में बांधा जा सकता है। प्रेम तो वो एहसास जो दो दिलों को आपस में जोड़ता है। इसमें आकर्षण नहीं होता बल्कि समर्पण का ऐसा भाव होता है, जिसमें डूबकर प्रेम करने वाला सबकुछ अर्पण कर देता है। प्रेम का कोई आकार नहीं होता न तो प्रेम दोनों हाथों से समेटा जा सकता है। हाँ प्रेम में एक स्वार्थ होता है, जिसके द्वारा प्रेम करने वाला अपने प्रिय को अपने पास सहेज कर रखना चाहता है।

 

ऐसी ही एक प्रेमिका थी कृष्णभक्त मीराबाई जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन कृष्ण भक्ति में लगा दिया। आज उन्हीं मीरा बाई का जन्मदिवस है। मीरा का जन्म राव रत्न सिंह के घर 23 मार्च 1498 ई को हुआ था।

 

बचपन में एक विवाह समारोह के दौरान मीरा ने अपनी माँ से पूछा की मेरा पति कौन होगा ? उनके द्वारा बार-बार पूछे जा रहे इस सवाल से परेशान माँ ने भगवान् श्रीकृष्ण का नाम ले लिया। इसके बाद मीरा ने उन्हें दिल से पति रूप में स्वीकार कर लिया। माता पिता की मृत्यु के पश्चात् उनका विवाह चित्तौड़ के प्रतापी राजा राणा सांगा के भाई भोजराज से कर दिया। विवाह के कुछ समय पश्चात् ही उनके पति का देहांत हो गया, जिसके बाद उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन कृष्ण भक्ति में लगा दिया।

 

साधुओं के साथ कृष्ण भक्ति के गीत गाना और उसके बीच में प्रभु भक्ति में मस्त होकर झूमना उन्होंने अपनी दिनचर्या में शामिल कर लिया था। मीरा की इस प्रकार की भक्ति देखकर राणा सांगा क्रोधित हो उठे। उन्होंने उन्हें रोकने की बहुत कोशिश की किन्तु हर बार नाकामी ही हाथ लगी। अंत में उसने मीरा को मारने के उद्देश्य से विष का प्याला यह कहकर भिजवाया की यह भगवान कृष्ण का प्रसाद है। अपने प्रभु का नाम सुनकर उन्होंने उसे माथे से लगाया और पी लिया। आश्चर्य, भगवान् श्रीकृष्ण की इस भक्त पर विष का भी कोई प्रभाव नही पड़ा।

 

दिन प्रतिदिन विपरीत परिस्थितियों के चलते मीरा ने घर छोड़ दिया और वृन्दावन होते हुए द्वारिका आ गई। इनके हटते ही मानों चित्तौड़ पर दुःखों का पहाड़ टूट पड़ा। युद्ध के दौरा राणा सांगा मारे गए और राज्य के बिगड़ते हालात को देखकर कुछ लोग उन्हें वापस चित्तौड़ ले आए। यहीं उन्होंने अपना अंतिम व्यतीत किया और अंत में श्रीकृष्ण में ही विलीन हो गई।

 

कृष्णभक्त और श्रद्धा से भरे रचना के लिए आज भी मीराबाई का नाम आदर से लिया जाता है। मीराबाई बहोत बड़ी कृष्ण भक्त संत कवियित्री थी। मीराबाई ने स्वयं के जीवन में बहोत दुख सहा था। राजघराने में जन्म और विवाह होकर भी मीराबाई को बहुत दुख झेलना पड़ा। इस वजह से उनमें विरक्तवृत्ति बढ़ती गयी और वो कृष्णभक्ति की तरफ खिची चली गयी।

 

मीराबाई पर अनेक भक्ति संप्रदाय का प्रभाव था। इसका चित्रण उनकी रचनाओं में दिखता है। ‘पदावली’ ये मीराबाई की एकमात्र, प्रमाणभूत काव्यकृती है। ‘पायो जी मैंने रामरतन धन पायो’ ये मीराबाई की प्रसिद्ध रचना है, ‘मीरा के प्रभु गिरिधर नागर’ ऐसा वो खुद का उल्लेख करती है।

 

मीराबाई की भाषाशैली में राजस्थानी, ब्रज और गुजराती का मिश्रण है। पंजाबी, खड़ीबोली, पुरबी इन भाषा का भी मिश्रण दिखता है। मीराबाई की रचनाएँ बेहद भावपूर्ण हैं। उनके दुखों का प्रतिबिंब कुछ पदों में उभरके दीखता है। गुरु का गौरव, भगवान की तारीफ, आत्मसर्मपण ऐसे विषय भी पदों में हैं। पूरे भारत में मीराबाई और उनके पद ज्ञात है। मराठी में भी उनके पदों का अनुवाद हुआ है। उनके जन्म काल के बारे में ठीक से जानकारी नहीं है फिर भी मध्यकालीन में जन्मी भारत की श्रेष्ठ संत कवियित्री आज भी आदर की पात्र हैं।

 

किसी लेखक ने सच ही लिखा है कि –
‘ मीरा …जब भी सोचने लगता हूँ बेहद भटकने लगता हूँ …मीरा प्रेम की व्याख्या है प्रेम से शुरू और प्रेम पर ही ख़त्म …प्रेम के सिवा और कहीं जाती ही नहीं। वह कृष्ण से प्यार करती है तो करती है। ऐलानिया …औरों की तरह छिपाती नहीं, घोषणा करती है …चीख चीख कर …गा -गा कर …उस पर देने को कुछ भी नहीं है सिवा निष्ठा के और पाना कुछ चाहती ही नहीं। उसके लिए प्यार अर्पण है, प्यार तर्पण है, प्यार समर्पण है, प्यार संकल्प है, विकल्प नहीं।

 

मीरा कृष्ण की समकालीन नहीं हैं, वह कृष्ण से कुछ नहीं चाहती न स्नेह, न सुविधा, न वैभव, न देह, न वासना केवल उपासना। उसे राजा कृष्ण नहीं चाहिए, उसे महाभारत का प्रणेता विजेता कृष्ण नहीं चाहिए, उसे जननायक कृष्ण नहीं चाहिए, उसे अधिनायक कृष्ण नहीं चाहिए। मीरा को किसी भी प्रकार की भौतिकता नहीं चाहिए। मीरा को शत प्रतिशत भौतिकता से परहेज है। मीरा को चाहिए शत प्रतिशत भावना का रिश्ता, वह भी मीरा की भावना।

 

मीरा के प्यार में न अभिलाषा है न अतिक्रमण। मीरा प्यार में न अशिष्ट होती है न विशिष्ठ होती है। मीरा का प्यार विशुद्ध प्यार है कोई व्यापार नहीं। जो लोग प्यार देह के स्तर पर करते हैं मीरा को नहीं समझ पायेंगे’
मीरा ने सच जी कहा था कि-
” प्रेम तो गीत है
मधुर आत्मा से गाये जाओ.!”

आओ सब मिल खेलें होली

कविता श्रीवास्तव
आओ सब मिल खेलें होली
कोई पकड़े कोई भागे
रंग ही सबके अंग लागे
चहुँ ओर शोर करे टोली
आओ सब मिल खेलें होली
आओ सब मिल खेलें होली।।

 

सब गली मुहल्ले हुए साथ
सब एक राग में गायें फाग
सबकी बोली में है होली
आओ सब मिल खेलें होली
आओ सब मिल खेलें होली।।

 

हर रंग के संग तैयारी है
और भरी हुई पिचकारी है
कोई ढोलक धम-धम बजा रहा
कोई नाचत दै दै तारी है
चेहरें हैं सबके रंगोली
आओ सब मिल खेलें होली।।

 

रंग न जाने कोई भेद भाव
ये रंगे शहर यही रेंज गाँव
होली की न कोई ज़ात पात
कोई चेहरा रंग दे कोई हाथ
रंग बने हैं सबके हमजोली
आओ सब मिल खेलें होली।।

 

मथुरा से ले बरसाने तक
काशी से ले हरियाणे तक
अब सराबोर सब लोग युहीं
हैं छोटे बड़े घराने तक
खूब स्वांग बना कर नाचेंगे
सुखराम चचा कलुआ ढोली
आओ सब मिल खेलें होली
आओ सब मिल खेलें होली।।

 

सब बंद दरवाज़े खोलेंगे
और ऐसा एक रंग घोलेंगे
कुछ दूर जो सूखे बैठे हैं
उनको भी संग भिगो लेंगे
हम रंग डालें वो रंग डालें
अब परे धरो बम और गोली
आओ सब मिल खेलें होली
आओ सब मिल खेलें होली।।

 

दो हाथ गुलाल उछालें अब
और सबको गले लगा लें अब
न हरा हो न नारंगी हो
एक अपना रंग बना लें अब
सब शिकवे ग़िले जला देंगे
इस बार जलेगी जब होली
आओ न अब खेलें होली
आओ सब मिल खेलें होली।।

बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स एअरपोर्ट पर बम धमाके, अब तक 17 की मौत कई घायल, हाई अलर्ट जारी

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बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स के जावेंटम एयरपोर्ट पर मंगलवार सुबह हुए दो बम धमाके में अब तक 17 लोगों के मारे जाने और कईयों के घायल होने की खबर है। हवाई अड्डे पर हुए धमाके के कुछ समय बाद ही स्थानीय मेट्रो स्टेशन पर भी धमाके की बात सामने आई है। हालाँकि मेट्रो में हुए धमाकों में कितने हताहत हैं, अब तक इसकी पुष्टि नहीं हो सकी है।

 

बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स में बम धमाके की वजह से अफरा-तफरी का माहौल बना हुआ है। गौरतलब है कि अगले हफ्ते 30 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ब्रसेल्स की यात्रा पर जाने वाले हैं। प्राप्त जानकारी के मुताबिक़ यहीं से चार दिन पहले पेरिस हमले का मुख्य संदिग्ध सालाह अब्देस्लाम गिरफ्तार हुआ था।

 

ब्रसेल्स में हुए बम धमाकों में अस्पताल के सूत्रों ने बताया कि अब तक 10 लोगों की जान गई है, जबकि स्थानीय मीडिया के अनुसार मरने वालों की संख्या 17 तक पहुँच गई है। फिलहाल सभी उड़ाने रद्द कर दी गई हैं और एअरपोर्ट खाली करा दिया गया है।

 

इस दुर्घटना के बाद बेल्जियम सरकार ने अपील किया है कि सभी अपने घरों में ही रहे, जिससे किसी भी तरह की असुविधा का सामना न करना पड़े। धमाकों के बाद रेलगाड़ियों का आवागमन रोक दिया गया है।

 

प्राप्त जानकारी के मुताबिक़ पेरिस हमले के मुख्य संदिग्ध के पकड़े जाने के बाद से ही शहर हाई अलर्ट पर था। जानकारी के मुताबिक़ धमाकों के पहले एक शख़्स अरबी में कुछ चिल्लाया, उसके बाद फ़्रॉक्सी फायरिंग भी की। हालाँकि इस घटना के बाद भारत के भी सभी हवाई अड्डों पर अलर्ट जारी कर दिया गया है।

अमिताभ बच्चन पर गलत राष्ट्रगान गाने का आरोप, शिकायत दर्ज़

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महानायक अमिताभ बच्चन पर राष्ट्रगान गलत गाने के आरोप में दिल्ली के न्यू अशोक नगर थाने में मामला दर्ज़ कराया गया है। शिकायतकर्ता ने अभिनेता पर आरोप लगाया है कि उन्होंने गृह मंत्रालय द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया था।

गत 19 मार्च को भारत-पकिस्तान मैच के पहले अमिताभ बच्चन ने कोलकाता के ईडन गार्डन मैदान में राष्ट्रगान गया था। शिकायतकर्ता उल्हास ने अपनी शिकायत में कहा है कि अभिनेता ने राष्ट्रगान गाने के लिए निर्धारित 52 सेकंड की जगह 1 मिनट 10 सेकंड का समय लिया। हालाँकि पुलिस ने एफआईआर तो दर्ज़ नहीं किया है लेकिन शिकायत दर्ज़ कर मामले की छानबीन शुरू कर दी है।

सामाजिक कार्यकर्ता और फ़िल्म निर्माता उल्लहास पीआर ने कहा कि बच्चन देश के आइकॉन हैं, ऐसे में यदि उनसे गलती होगी तो युवाओं पर इसका गलत असर पड़ सकता है। क्योंकि बच्चन को भाषा का जानकार भी माना जाता है।

उत्तराखंड : बागी विधायकों की वजह से कांग्रेस में हड़कंप, विजय बहुगुणा के दोनों बेटे पार्टी से निष्कासित

ब्यूरो, उत्तराखंड
उत्तराखंड में बागी विधायकों को लेकर कांग्रेस में खलबली मच गई है। बिगड़ती स्थिति को नियंत्रित करने के किए कांग्रेस ने बड़ा कदम उठाया है। कांग्रेस ने बागी विधायक विजय बहुगुणा के दोनों बेटों सौरभ और साकेत को पार्टी से 6 साल के लिए निष्कासित कर दिया।
कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने उत्तराखंड में शुरू हुई बगावत को नियंत्रित करने का काम शुरू कर दिया है। इसी कड़ी में बागी विधायक विजय बहुगुणा के दोनों बेटों को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया है और साथ ही 9 ज़िलों की कमिटी को भी भंग कर दिया है। उत्तराखंड में पार्टी पर आने वाले बड़े संकट के मद्देनज़र यह कार्रवाई की गई है।
खबरों के मुताबिक़ आज सभी बागी विधायक भाजपा नेताओं के साथ राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मुलाक़ात भी करेंगे। उत्तराखंड में अचानक आई इस स्थिति पर हरीश रावत ने राहुल गांधी से फोन पर बातकर मामले की जानकारी दी। रावत ने राहुल को आश्वासन दिया कि वे विधानसभा में बहुमत सिद्ध कर लेंगे।
प्राप्त जानकारी के मुताबिक़ हरीश रावत अभी उन पदाधिकारियों का सफाया करने में लगे हैं जो बागी विधायकाओं के करीबी हैं।

उत्तर प्रदेश : संगठनात्मक फेरबदल को लेकर बीजेपी कन्फ्यूज़, बीजेपी से युवाओं का हो रहा मोहभंग

AnujHanumat@Navpravah.com
पिछले कुछ दिनों से यूपी में भाजपा अपने संगठनात्मक फेरबदल को लेकर काफी व्यस्त नज़र आई। मंडल स्तर से लेकर प्रदेश स्तर तक, बड़ी मात्रा में युवाओं की दावेदारी ने पार्टी आलाकमान की मुश्किलें और भी बढ़ा दी हैं। क्योंकि पार्टी के सामने सबसे बड़ी समस्या ये है कि किसको ज्यादा तवज्जो दे, पार्टी के पुराने सिपाहियों को या पार्टी के नये सिपाहियों को।
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव को लेकर बीजेपी काफी माथापच्ची कर रही है। इस बीच पार्टी के सामने संगठनात्मक फेरबदल को लेकर मुश्किलें बढ़ती ही जा रही हैं। पार्टी इस बात को लेकर परेशान है कि पार्टी युवा नेतृत्व को ज़्यादा तवज्जो दे या बुज़ुर्गों को। पार्टी दो धड़े में बंटी दिख रही है, एक धड़ा वह जिसका नेतृत्व पार्टी के बुजुर्ग नेता कर रहे हैं जिन्होंने पार्टी की नींव को अपने खून-पसीने से सींचा है, जो किसी भी हालत में अपनी जगह नही गवाना चाहते। और दूसरा धड़ा उन नौजवानों का है जिसका नेतृत्व पिछले लोकसभा चुनावो में अपनी चमक बिखेरने वाले ‘युवा’ कर रहे हैं। वो इसी दरवाजे से अब सक्रिय राजनीति में मजबूती से दाखिल होना चाहते हैं।
यूपी में  चल रहे भाजपा के संगठनात्मक चुनावो की स्थिति यही नही ठहरती, बल्कि अभी और भी पेंच सामने आ रहे हैं जिसमें मंडल स्तर और जिले स्तर में ‘जातिवाद’ का जहर भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। जिसमें कार्यकर्त्ता अपने पारस्परिक व्यवहार को भी सूली पर चढाने से नही कतरा रहे, क्योंकि उनका मानना है कि हमारे लिए ऐसे समय में राजनीतिक प्रतिष्ठा बरक़रार रखना सबसे बड़ी बात है जो पार्टी में ‘पद’ मिलने पर ही सम्भव है।
एक दृश्य इस समय अमूमन देखने को मिल रहा है कि पार्टी के अधिकतर सिपाही अपनी दावेदारी पेश करने के लिए खुद पार्टी कार्यालय में देखे जा रहे हैं। मंडल स्तर से लेकर प्रदेश स्तर तक पार्टी द्वारा नियुक्त किये गए चुनाव अधिकारी भी भारी दबाव में हैं क्योंकि उनके एक गलत निर्णय से खुद उनकी भविष्य की राजनीति साख पर भी बट्टा लग सकता है।
कुलमिलाकर अगले विधानसभा चुनावों से ठीक पहले पार्टी द्वारा जब नए रणबांकुरों की लिस्ट घोषित की जायेगी, तो काफी कुछ नए संकेत मिलेंगे। एक बात और कि मोदी जिस ‘यंगिस्तान’ का जिक्र हमेशा अपने भाषण में करते हैं अगर उन्हे पार्टी अपने संगठनात्मक चुनावो में दरकिनार करती है तो यूपी के विधानसभा चुनावों के परिणाम पंचायत चुनावो के परिणाम जैसे हो सकते हैं।
अभी कुछ दिनों पूर्व एक निजी न्यूज चैनल द्वारा कराये गए सर्वे की रिपोर्ट जारी हुई, जिसमें यूपी के अगले विधानसभा चुनावों में बसपा को पूर्ण बहुमत प्राप्त होने की प्रबल संभावना बताई गई। इस सर्वे के अनुसार भाजपा तीसरे नम्बर की पार्टी रहेगी । ऐसे में चुनावो की प्रचण्ड तपिश में इस सर्वे ने भाजपा आलाकमान की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। अब ऐसे में भाजपा को अपनी रणनीति में बदलाव करने की आवश्यकता है तभी सफलता प्राप्त हो सकेगी।
पिछले लोकसभा चुनावों के दौरान समूचे देश में मोदी लहर से लबरेज लाखों युवाओं ने राजनीति में कदम रखा और देश के इस सबसे बड़े त्यौहार में भी खूब बढ़-चढ़कर भाग लिया। सबसे अहम बात यह है कि जिन युवाओं का राजनीति से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं था उन्होंने मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए मात्र अपना पसीना ही नहीं खून भी बहाया। लेकिन चुनाव के बाद जब बधाई और पुरस्कार वितरण का समय आया तो उन युवाओं के हाथ सिवाय निराशा के कुछ नही लगा। किसी भी बड़े नेता ने उनकी पीठ नही थपथपाई ।
इसका सबसे बड़ा दृश्य यूपी में देखने को मिला जहाँ इतनी बड़ी अप्रत्याशित जीत का पार्टी सही से प्रयोग नही कर पाई। जीत का श्रेय फिर से उन्ही पुराने कन्धों को दिया गया जो पार्टी के सबसे पुराने खम्बों में से एक थे। अधिकांश युवाओं को इस सम्मान से कोसों दूर रखा गया जिसके कारण पार्टी ने सदस्यता के समय ज्यादातर नये जोशीले युवा नेतृत्व को खो दिया।
बहुत से युवाओं ने इसके बाद से राजनीति में कदम न रखने की कसमें तक खा ली। ये सभी पार्टी के ऐसे कार्यकर्ता बन सकते थे, जो यूपी के इस आगामी चुनावी रण में पार्टी के लिए ब्रह्मास्त्र साबित हो सकते हैं। पर अभी तक पार्टी आलाकमान ने ऐसा कोई भी चिंतन नही किया कि आखिर उन युवाओं के साथ क्या होगा ? इन्ही में जीत का रहस्य जुड़ा है पार्टी का ! ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि आखिर उन युवाओं को पार्टी कैसे जोड़ पायेगी ?
अगर पार्टी को सच में यूपी का किला फतह करना है तो फिर ऐसे सभी युवाओं को मुख्य धारा में लाकर उनको योग्यतानुसार दायित्व सौंपनें होंगे।

देश का विकास नहीं देख पा रहा विपक्ष – नरेंद्र मोदी

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जेएनयू से लेकर अन्य विवादित मामलों पर प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में अपने विचार व्यक्त किए। मोदी ने कार्यकारिणी की बैठक के दौरान कहा कि हमने 22 महीने साफ़ सुथरी सेवा की है और हमारा फोकस मात्र देश का विकास रहा है। हालाँकि इस बीच विपक्ष ने हमें लक्ष्य से भटकाने का कोई अवसर नहीं छोड़ा लेकिन हमें मज़बूत इरादे के साथ आगे बढ़ते रहना है।
प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी के दूसरे दिन मार्गदर्शन भाषण में कार्यकर्ताओं को रचनात्मक सोच के साथ काम करते रहने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि विपक्ष के बहकावे में न आएं। उन्होंने कहा कि हमने अपने 22 माह के कार्यकाल में देश के विकास को लेकर अहम कार्य किया है। उन्होंने कार्यकर्ताओं को स्वच्छ भारत अभियान और बेटी पढ़ाओ-बेटी बढ़ाओ जैसे अभियान से जुड़ने की बात कही।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि विपक्ष इसलिए परेशान है क्योंकि हम 22 महीने में अपने वादों पर खरे उतरे। उन्होंने कहा कि विपक्ष हमें बेवजह उलझाए रहने की कोशिश कर रही है लेकिन हमे खुद को बिना उल्झार देश को विकास मार्ग पर लेकर जाना है। पीएम ने आह्वान किया कि व्यर्थ के मुद्दों में न उलझें।