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Sunday, August 9, 2026
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हिमाचल में वतन के रखवालों से मिले पीएम मोदी, गाँव वालों को भी दी शुभकामनाएं

शिखा पाण्डेय,

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज हिमाचल प्रदेश के किन्नौर के सुमडो और छांगो गए और वहां आईटीबीपी, सेना और डोगरा स्काउट के जवानों के साथ दिवाली मनाई। दीपावली के इस पावन पर्व पर सेना के जवानों और पीएम मोदी ने एक-दूसरे को मिठाइयाँ खिलाईं। प्रधानमंत्री ने यहां पर गांववालों से भी भेंट की और उन्हें दीवाली की शुभाकामनाएं दीं। प्रधानमंत्री के साथ सेना प्रमुख दलबीर सिंह सुहाग भी मौजूद थे।

पीएम ने गांव जाने की बात का जिक्र करते हुए ट्विटर पर लिखा, “प्लान में चेंज करके सुमडो के पास चांगो गांव गया। वहां के लोगों को दिवाली की शुभकामनाएं दीं। उन लोगों की खुशी देखकर काफी अच्छा लगा।” पीएम ने वहाँ जवानों के साथ काफी वक्त बिताया और जमकर उनका हौसला बढ़ाया।

प्रधानमंत्री ने एक अन्य ट्वीट द्वारा देश की जनता से भी अपील की कि वह इस बार अपनी दीवाली पर कुछ समय देश की सरहद पर मौजूद जवानों को भी दें और उन्हें दीवाली पर अपने बधाई संदेश भेजें। आपको बता दें कि पीएम मोदी ने पहले ही अपने घरों से दूर देश की हिफाजत में जुटे जवानों की खुशियों को कई गुना बढ़ाने के लिए ‘संदेश टू सोल्जर्स’ अभियान का नेतृत्व भी किया था, जिसके तहत उन्होंने देशवासियों से अपील की थी कि वो जवानों को दिवाली पर शुभकामनाएं और संदेश भेजें और जनता ने भी इस अभियान में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया और अनेकों माध्यमों से अपनी शुभकामनाएं हमारे जवानों तक पहुंचाईं।

गौरतलब है कि पहले ऐसी खबर आई थी कि वह चीनी सीमा सेे सटे भारत के आखिरी गांव मांडा जाएंगे और जवानों संग दीवाली मनाएंगे। सर्जिकल स्ट्राइक के बाद फिलहाल भारत-पाकिस्तान सरहद पर तीनों सेनाएं और तमाम सुरक्षा बल ऑपरेशनल रेडिनेस मोड में हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री कार्यालय ने फिलहाल सेना से किसी तरह के खास इंतजाम नहीं करने के लिए कहा था।

सिकंदराबाद में यूपी सीएम अखिलेश यादव के काफ़िले पर पथराव

आनंद रूप द्विवेदी,

तेलंगाना के सिकंदराबाद से खबर आ रही है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के काफिले पर पथराव हुआ है। पथराव करने वाले सिकंदराबाद से कांग्रेस के सांसद अंजन कुमार यादव के समर्थक बताये जा रहे हैं। फिलहाल किसी के हताहत होने की कोई खबर नहीं है।

ख़बरों के अनुसार, सीएम अखिलेश एक दिन पहले ही हैदराबाद पहुंचे थे। वहां उन्हें यादव महासभा सम्मलेन में शिरकत करनी थी, लेकिन सिकंदराबाद के रास्ते में ही कुछ लोगों ने उनके काफ़िले पर पथराव किया। हालांकि ये किस कारण से किया गया, इसकी पुष्टि अभी तक नहीं की जा सकी है।

पथराव करने वाले सांसद अंजन कुमार यादव के समर्थक बताये जा रहे हैं। आश्चर्यजनक बात ये है कि अंजन कांग्रेस से सांसद हैं फिर समाजवादी सरकार के नेता पर पथराव किस भावावेश में किया गया है। अटकलें ये भी लगाईं जा रही हैं कि उत्तर प्रदेश की मौजूदा जूतमपैजार वाली राजनीति के चलते ये किया गया है।

हाल ही में अखिलेश यादव ने आक्रामक रूप से चाचा शिवपाल और सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के चहेते अमर सिंह पर गंभीर आरोप लगाए थे। अमर सिंह को अखिलेश ने दलाल शब्द से नवाज़ा था, जिसकी प्रतिक्रिया स्वरुप अमर सिंह ने अखिलेश कि शादी का फोटो अलबम उन्हें याद दिला दिया था। बकौल अमर सिंह, “जब डिम्पल से अखिलेश कि शादी के खिलाफ स्वयं मुलायम सिंह खड़े थे, तब इसी दलाल ने उनका सपोर्ट किया था!”

मिश्रा के आगे ढेर हुए किवी, भारत के नाम सिरीज

अनुज हनुमत,

पांचवे और अंतिम एकदिवसीय मैच में टीम इंडिया ने न्यूजीलैंड को 190 रन से हराकर वनडे सीरीज 3-2 से अपने नाम कर लिया। भारत की तरफ से रोहित शर्मा और विराट कोहली की फिफ्टी के बाद अमित मिश्रा ने 5 विकेट लेकर कीवी टीम की हालत खराब कर दी।

भारत ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 50 ओवर में 6 विकेट पर 269 रन बनाए। जवाब में किवी टीम 23.1 ओवर में सभी विकेट खोकर 79 रन ही बना सकी। बता दें कि 270 रन के टारगेट का पीछा करने उतरी न्यूजीलैंड टीम की शुरुआत अच्छी नहीं रही और उसे पहले ही ओवर में उमेश यादव ने पहला झटका दिया। उमेश ने ओपनर मार्टिन गुप्टिल को खाता खोलने से पहले ही बोल्ड कर दिया। इसके कुछ ही देर बार लाथम (19) को बुमराह ने जयंत यादव के हाथों कैच आउट कराया। किवी टीम संभलती इससे पहले ही कप्तान केन विलियम्सन (27) को अक्षर पटेल ने आउट कर स्कोर 63/3 रन कर दिया।

अमित मिश्रा ने कहर बरपाते हुए न्यूजीलैंड की पूरी टीम में खलबली मचा दी। रॉस टेलर के 19 रन के निजी स्कोर पर आउट होने के बाद कोई भी किवी बैट्समैन दहाई का आंकड़ा पार नहीं कर सका। अमित मिश्रा ने रॉस टेलर, जिमी नीशाम (3), वॉटलिंग (0), कोरी एंडरसन (0), टिम साउदी (0) को आसानी से पेवलियन भेजकर टीम इंडिया को जीत के ट्रैक पर ला दिया। इसके बाद सेंटनर को 4 रन के निजी स्कोर पर अक्षर पटेल ने बोल्ड कर किवी टीम को समेट दिया।

भारत की तरफ से बल्लेबाजों में सबसे अधिक सलामी बल्लेबाज रोहित शर्मा (70), विराट कोहली (65) और कप्तान धोनी (41) की पारियों की बदौलत टीम इंडिया ने निर्धारित 50 ओवर्स में 6 विकेट के नुकसान पर 269 रन बनाए। स्लॉग ओवर्स में अक्षर पटेल (24) और केदार जाधव (39*) ने जोरदार बैटिंग की। इन दोनों ने छठे विकेट के लिए 6.3 ओवर्स में 46 रन जोड़ते हुए भारत को सम्मानित स्कोर तक पहुंचाया।

न्यूजीलैंड के लिए ईश सोढ़ी ने 3 विकेट लिए, जबकि ट्रेंट बोल्ट, जिमी नीशाम और सेंटनर को एक-एक विकेट मिला। अभी तक के इतिहास में न्यूजीलैंड ने भारतीय सरजमीं पर कोई भी एकदिवसीय सीरीज नही जीती है। फिलहाल न्यूजीलैंड को अभी और इन्तजार करना पड़ेगा।

यात्रावृत्त: “स्वप्नलोक -महाबलेश्वर, पंचगनी और वाई”

डॉ. जितेन्द्र पाण्डेय,

महाराष्ट्र के पर्वतीय स्थलों में महाबलेश्वर अपनी खूबसूरती के लिए जाना जाता है । मराठी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार ‘बालकवि’ ने महाबलेश्वर को प्रकृति-देवता का साकार स्वप्न माना है। इसीलिए इस हिल स्टेशन को “भारत का स्वप्नलोक” भी कहा जाता है। समुद्र तल से इसकी ऊंचाई 1372 मीटर है । महाराष्ट्र के सबसे ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में महाबलेश्वर का नाम शुमार है। यह सह्याद्री रेंज के पश्चिमी भाग में स्थित है।

इस पर्वतखंड की उत्पत्ति और महात्म्य का उल्लेख प्राचीन महाबलेश्वर मंदिर के शिलालेख पर इस प्रकार किया गया है – “स्कंद पुराण में सह्याद्री खंड के पहले व दूसरे अध्याय में प्रकृति के उत्पत्ति की कथा दी गयी है। इन अध्यायों में महाबलेश्वर किबउत्पत्ति के बारे में भी लिखा गया है। पद्मयुग में महाबल और अतिबल, इन दो असुर भाईयों ने त्राहि त्राहि मचा रखी थी । उनसे छुटकारा पाने के लिए ब्रह्मा , विष्णु और महेश इन देवताओं को उनसे लोहा लेना पड़ा । युद्ध में श्री विष्णु ने अतिबल को मौत के घाट उतार दिया । लेकिन इच्छा मरण का वरदान पाने वाले महाबल के सामने किसी की भी एक न चली । यह देखकर इन देवताओं ने मिलकर देवी आदिमाया की शरण ली।

आदिमाया ने वास्तविक स्थिति समझकर महाबल को मोहित किया। इस कारण महाबल ने देवताओं से वरदान मांगा कि मेरी मृत्यु आपके हाथों हो, लेकिन यह शर्त रखी कि हमारे नाम से देवताओं का निवास यहां पर हो। इस तरह श्री शिवजी महाबल के नाम से, श्री विष्णुजी अतिबल के नाम से और श्री ब्रह्माजी कोटि असुर सेना के नाम से इसी स्थान पर अंशरूप में स्थित हैं। तबसे यह स्थान महाबलेश्वर, अतिबलेश्वर तथा काटेश्वर ऐसे त्रिगुणायक रूप में प्रसिद्ध है। श्री महाबलेश्वर शिवस्वरूप, रुद्राक्ष के आकार में स्वयंभू स्थान परम पवित्र बन गया।” महाबलेश्वर के इस शिव मंदिर का निर्माण पांच-छह सौ वर्ष पहले हुआ है, जबकि गर्भगृह में स्थापित स्वयंभू लिंग हज़ारों वर्ष पुराना है। छत्रपति शिवाजी महाराज ने अफ़जल खान के कैम्प का स्वर्ण कलश और अपनी माँ जीजामाता की स्वर्णतुला भी यहीं रखवाई थी।

शिवमंदिर से लगभग 100 मीटर दूर पंचगंगा मंदिर है। यह वही मंदिर है जहाँ से पांच नदियां निकलती हैं। गोमुख से निकली इन नदियों के नाम कोयना, वेन्ना, सावित्री, गायत्री और कृष्णा हैं। इन नदियों के बारे में दंतकथा है कि सावित्री के शाप के कारण भगवान विष्णु कृष्णा नदी , महेश्वर शिव वेन्ना और सृष्टि-सर्जक ब्रह्मा कोयना नदी के रूप में प्रवाहित होने के लिए मजबूर हो गए। इनमें से कृष्णा , कोयना और वेन्ना एक दिशा में प्रवाहित होती हैं। कृष्णा और वेन्ना का संगम सतारा के माहुली क्षेत्र में होता है। यहां वेन्ना का अस्तित्त्व कृष्णा में समा जाता है। अस्तित्त्व-समाप्ति की प्रक्रिया यहीं खत्म नहीं होती। आगे चलकर कराड में कोयना नदी भी अपने को कृष्णा में विलय कर लेती है। विलय का यह स्थान “प्रीति संगम” के नाम से जाना जाता है। महाराष्ट्र के कद्दावर नेता यशवन्त राव चव्हाण की समाधि इसी पवित्र स्थान पर है। आगे का रास्ता कृष्णा नदी अकेले तय करती है। कर्नाटक तथा आंध्र प्रदेश होते हुए यह बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। दूसरी तरफ सावित्री नदी कोंकण से होते हुए अरब सागर में मिलती है। गायत्री नदी का प्रवाह लुप्त है। कहा जाता है कि प्रत्येक 12 वर्ष पर भागीरथी और प्रत्येक 60 वर्ष पर सरस्वती नदी इनसे मिलने महाबलेश्वर क्षेत्र में आती है। पौराणिक अथवा भौगोलिक जो भी कारण हो किंतु यह पक्का है कि इन नदियों के कारण महाबलेश्वर और पंचगनी की शोभा पल-पल अंगड़ाई लेती है। घुमावदार सड़कों के दोनों ओर घने पेड़ों की चटक हरियाली नंदनवन का एहसास कराती है। यहां की हरीतिमा में पीलापन नहीं बल्कि श्यामलता है। ऊंची-ऊंची फुनगियों से खेलते बादल अचानक आँखों के सामने धमाल चौकड़ी करते तेजी से गुज़र जाते हैं। कभी घने धुंध का आपातकाल लागू हो जाता है, तो दूसरे क्षण छिटका सौंदर्य निखर उठता है। यहां की रमणीयता प्रहरों में बँटी होती है । इनका आस्वाद यहां के विभिन्न पॉइंट्स से किया जा सकता है।

ब्रिटिशकाल में महाबलेश्वर ‘बॉम्बे प्रेसीडेंसी’ की ग्रीष्मकालीन राजधानी हुआ करती थी। ईस्ट इंडिया के गवर्नर सर जॉन मैलकम ने इस जगह को दुनिया की नज़र में सन् 1828 में लाया था। सर एल. फिस्टन, सर लॉडविक, डुके कनॉट, सर ऑर्थर, विल्सन आदि अंग्रेज अधिकारियों की यह पसंदीदा जगह रही है। यहां के ज्यादातर पॉइंट्स का आधुनिक नामकरण इन्हीं के द्वारा अथवा इन्हीं के नाम से हुआ। मसलन एलफिस्टन पॉइंट, आर्थर पॉइंट, विल्सन पॉइंट, हेलन पॉइंट, लाकविग पॉइंट आदि। इसके अलावा मजोरी पॉइंट, सावित्री पॉइंट, नाथकोट, बॉम्बे पार्लर, कर्निक पॉइंट, फाकलेक पॉइंट से भी महाबलेश्वर की खूबसूरत वादियों के दर्शन किए जा सकते हैं। कुछ पॉइंट्स के नाम तो यहां की भौगोलिक स्थिति को ध्यान में रखकर सुनिश्चित किए गए हैं मंकी पॉइंट, हाथी माथा या निडिल पॉइंट, टेबल लैंड आदि ऐसी ही पहाड़ी टेकड़ियां हैं। वेन्ना लेक तो महाबलेश्वर का प्रवेश द्वार है। आकाश की नीलिमा पारदर्शी झील को अपने रंग में रंग लेती है। कभी- कभी इसका सौंदर्य डल झील को भी फीका कर देता है। झील के किनारे की हरियाली और उसके ऊपर नीला आकाश, ऐसे में नौका विहार करना असीम आनंददायक होता है। लगता है झील और आकाश के बीच मात्र सैलानी और उनकी नावें तिर रही हों। यहीं से डेढ़ किलोमीटर दूर लिंगमाला जलप्रपात है। 600 फीट की ऊंचाई से गिरते इस झरने का पानी वेन्ना लेक में मिल जाता है। जुलाई से लेकर दिसंबर तक यह पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बना रहता है। निसर्ग के इस खूबसूरत तोहफे का जादू सैलानियों के सिर चढ़कर बोलता है। इसके अलावा भिलार वॉटरफाल जैसे दर्ज़नों झरने अपनी मस्ती में गुनगुनाते रहते हैं।

सूर्यास्त और सूर्योदय का मनमोहक दर्शन विल्सन पॉइंट से किया जा सकता है। समुद्रतल से 1439 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस टीले से महाबलेश्वर के चारों ओर का सौंदर्य जी भर कर निहार सकते हैं। पॉइंट के तीनों बुर्ज़ महाबलेश्वर का अधिकाधिक दर्शन कराने में सक्षम हैं। शहर से यहां तक की दूरी डेढ़ किलोमीटर है। ऑर्थर सीट और विडो पॉइंट एक दूसरे से सटे हैं जो सैलानियों के कौतूहल बढ़ाते रहते हैं। ऑर्थर पॉइंट्स के संदर्भ में मेरे एक साथी ने बताया कि इसका नामकरण सर ऑर्थर की याद में किया गया है। श्री मंगेश ने इस अंग्रेज अधिकारी के जीवन की अंतिम त्रासदी सुनाई। उन्होंने बताया कि ऑर्थर महोदय ने इस पॉइंट से एक कागज का टुकड़ा नीचे फेंका। दबाव के कारण कागज का टुकड़ा हवा में तैरने लगा। मिस्टर ऑर्थर की उत्सुकता बढ़ी। उन्होंने एक सिक्का उछाला । यही हाल सिक्के का भी हुआ। इसके बाद उत्तेजित हो वे स्वयं नीचे कूद गए । इससे उनकी आकस्मिक मृत्यु हो गई। एक तरफ जहाँ ऑर्थर सीट के पास सावित्री नदी का गुप्त प्रवाह देखा जा सकता है, वहीं प्रकृति प्रेमियों के लिए विडो पॉइंट निसर्ग की खिड़की है। दोनों पॉइंट्स 200 फीट के अंतर पर स्थित हैं। यहां से तोरण, रायगढ़ और कांगारी के किले स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं।

महाबलेश्वर की जलवायु समशीतोष्ण है। यही कारण है कि पूरे भारत की स्ट्रॉबेरी का 85 प्रतिशत उत्पादन अकेले महाबलेश्वर-पंचगनी में होता है। जैम, क्रश, जेली, सिरप, चॉकलेट, फलेरो, चिक्की, फ़ज आदि अनेक प्रकार के प्रोडक्शन स्ट्रॉबेरी से होते हैं। अभी तो इसकी वाइन भी बनाई जा रही है। बाज़ार में इसकी अच्छी-खासी खपत है। मधुसागर प्रोडक्ट्स की होलसेल विक्रेता मानसी गाडेकर ने यहां के “मधुमक्खी पालन” एवं शहद के बारे में चौंकाने वाली जानकारी दी। उन्होंने बताया, “महाबलेश्वर के जंगलों में शहद की कई किस्मों की पैदावार होती है। मसलन पीसा शहद, जाम्भुल शहद, हिरडा शहद, गेला शहद, अखारा शहद, कार्वी शहद और व्हायटी शहद। इनमें से अखारा शहद प्रत्येक चार साल बाद और कार्वी तथा व्हायटी शहद की पैदावार प्रत्येक सात साल में होती है क्योंकि इन पौधों पर फूल इसी समय आते हैं। गेला एक औषधीय गुणों से युक्त पौधा है। आंख और ब्रेन के टॉनिक के रूप में इस शहद का सेवन किया जाता है। कफ, कोल्ड, डायबिटीज़, गैस, अस्थमा जैसी 118 बीमारियों को दूर भगाने में शहद की ये किस्में गुणकारी हैं।” मानसी की इस जानकारी से मेरी कई शंकाओं का समाधान स्वतः हो गया। मधुसागर, मैप्रो, मालाज़ और कैडबरी उद्योग तो स्ट्रॉबेरी के साथ-साथ अमला, आम, संतरा, टमाटर, नींबू, कोकम, अदरक, जामुन, पाइनएपल आदि फलों से कई प्रकार के उत्पाद बाजार में मुहैया करा रहे हैं। पर्यटक अपने परिजनों के लिए यहां से इन खाने-पीने की चीजों को ले जाना नहीं भूलते। लोनावला की चिक्की की तरह यहां की भी चिक्की और चने की अपनी ख़ासियत है। रोजमर्रा की चीजें मंगलवार की साप्ताहिक बाज़ार में मिल जाती हैं।

भारतीय इतिहास में अमर प्रतापगढ़ का किला महाबलेश्वर से मात्र 23 किलोमीटर दूर है। छत्रपति शिवाजी ने इस किले के निर्माण की जिम्मेदारी अपने प्रधान मंत्री मोरोपन्त को सौंपी थी। यह किला तल भाग और अपर भाग में विभाजित है। भवानी माँ का मंदिर निचले भाग के पूर्वी छोर पर बनाया गया है। किले के उत्तर पश्चिम दिशा में शिव का मंदिर स्थापित है। 10 नवंबर ,1659 को प्रतापगढ़ की प्राचीर के नीचे शिवाजी ने अफ़ज़ल खान का धोखे में वध कर दिया था। अफ़ज़ल खान की दरगाह और टॉवर दोनों किले के विभिन्न हिस्सों में मौजूद हैं। तबसे इन क्षेत्रों में “अफ़ज़ल खां वध आनंदोत्सव” बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है । इस किले में गेस्ट हॉउस और राष्ट्रीय उद्यान के साथ-साथ 17 फीट ऊंची शिवाजी की अश्वारोही कांस्य प्रतिमा भी है। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इस भव्य प्रतिमा का अनावरण 30 नवंबर , 1957 को किया था। मौजूदा समय में प्रतापगढ़ किला सतारा के वर्तमान सांसद और वीर शिवाजी के वंशज उदयराज भोसले की देखरेख में है। यहां आकर हम अतीत की इस अनमोल धरोहर पर गर्व कर सकते हैं।

महाबलेश्वर से मुम्बई लौटते समय 18 किलोमीटर की दूरी पर पंचगनी है। पंचगनी का अर्थ है – “पांच पहाड़ियों का समूह”। इसकी ऊंचाई समुद्र सतह से लगभग 1350 मीटर है। यहां की रमणीयता का अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि इन्हीं पहाड़ियों के मध्य कृष्णा नदी का फैलाव है। जिस कोण से देखें, नदी का जल ऊंची-ऊंची नीली पहाड़ियों की गोंद में मचलता दिखाई देगा। सिलवर ओक और क्रिसमस ट्री इस छोटे से टाउन की अपनी पहचान है। 1860 में एक ब्रिटिश अधिकारी जॉन चेसन ने पंचगनी हिल स्टेशन में खासी दिलचस्पी दिखाई। उसने यहां के सौंदर्यीकरण में मानवीय हस्तक्षेप की पहल की थी। 1863 में जॉन चेसन को पंचगनी का प्रथम सुपरिटेंडेंट और मजिस्ट्रेट नियुक्त किया गया। उन्होंने देशी-विदेशी अनेक फूलों एवं फलों की प्रजातियां यहां विकसित कीं। चेसन ने अपने पहले , दूसरे और तीसरे ब्रोशर में पंचगनी के क्रमिक प्रगति की चर्चा की है। सन् 1913 में प्रकाशित व्हिटनी वी. लिन ने अपनी पुस्तक “गाइड टू पंचगनी” में तत्कालीन परिवेश की चर्चा करते हुए जनजीवन की रोजमर्रा की ज़रूरतों के बारे में विस्तार से लिखा है। उसने इस पुस्तक में बंगलों के नाम गिनाने से लेकर यूरोपीय छात्रों की शिक्षा आदि में काफी दिलचस्पी दिखाई है। क्रिश्चियन, पारसी, मुस्लिम और हिन्दू समुदाय के प्रारंभिक विकास की सचित्र व तलस्पर्शी व्याख्या लिन द्वारा उनकी पुस्तक में की गई है।

महाबलेश्वर की ही तरह यहां भी कई छोटे-बड़े पॉइंट्स हैं। 95 एकड़ में फैले टेबल लैंड की खूबसूरती देखकर लगता है मानो प्रकृति-देवता के जलपान के लिए विधाता ने मनोरम मेज की व्यवस्था कर दी है। बरसात में तो हरी कारपेट पर पीले और सफेद फूलों की डिज़ाइन बन जाती है। यहां पर दो गुफाएं और पांडव चूल्हा है। टूरिस्ट गाइड कहते हैं कि पांडव इन गुफाओं में कुछ दिनों तक ठहरे थे, जबकि स्थानीय लोगों का मानना है कि ये मानव निर्मित हैं। टेबल लैंड पर जुड़वीं खूबसूरत झीलें सैलानियों को अपनी ओर खींचती हैं। घुड़सवारी करवाने के लिए घुड़सवार चारों ओर तब तक मंडराते रहते हैं जब तक कि उन्हें सैलानियों की मंशा का पता न चल जाय। सैलानी घुड़सवारी कम, किन्तु घोड़ों के अज़ीबोगरीब नाम पढ़कर लोटपोट होने लगते हैं। जैसे – व्हाट्सएप्प, फेसबुक, शाहरुख़, सलमान, अक्षय कुमार आदि। इस पॉइंट का दुःखद पहलू यह है कि मुख्य द्वार पर खोमचे वालों ने कब्जा कर रखा है। मनमोहक जगह पर बदनुमा धब्बा। सम्भवतः यहां के नगर परिषद की इनसे आय होती हो।

पंचगनी शैक्षणिक संस्थानों का हब है। यहां के आवासीय विद्यालय देश के गिने-चुने विद्यालयों में शुमार हैं। सेंट पीटर्स विद्यालय, सेंट जोसेफ कॉन्वेंट, किमिन्स विद्यालय, अंजुमन इस्लाम तथा बिलिमोरिया जैसी संस्थाएं ब्रिटिश काल से अपनी सेवाएं दे रही हैं। इनके अलावा दर्ज़नों आवासीय विद्यालय पंचगनी में चल रहे हैं। हलांकि इन दिनों यहां शिक्षा की गुणवत्ता में तेजी से गिरावट आयी है। शायद संस्थान-संचालकों की व्यावसायिक सोच और नीति का असर हो। कमोबेश यही हश्र पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था का है। प्रोडक्शन तो है, लेकिन “जिय बिनु देह नदी बिनु बारी” (प्राण के बिना शरीर और पानी के बिना नदी) की तरह। संवेदनाएं सूख रही हैं और मूल्य मर रहे हैं। बस उत्पादन हो रहा है।

अन्य पर्यटन स्थलों की तरह यहां का भी लोकजीवन कठिन है। छोटे से नगर की सीमित सुविधाएं। घाटियों में बसे जनजीवन की हलचल बुधवार के साप्ताहिक बाज़ार में देखने को मिलती है। बाकी दिनों में आसमान छूती वस्तुओं की कीमतें इनकी पहुंच से बाहर होती हैं। यहां एक वर्ग ऐसा भी है जो अपने को अंग्रेजी दा समझता है। अपने में सीमित और तंग। महानगरों वाली व्यस्तता और आपाधापी का स्वांग रचते ये लोग असली जीवन से कोसों दूर हैं। न भारतीयता की ललक और न ही पश्चिम की समझ। त्रिशंकु की तरह अधर में झूल रहे हैं। ऐसे लोग प्रकृति की सुरम्य वादियों में रहकर भी अपनी प्रकृति (स्वभाव) से तालमेल नहीं बिठा पाते। शहरी लोगों पर निशाना साधने वाले रचनाकार अगर इनसे मिलते तो उनका भ्रम दूर हो जाता।

पारसी समाज यहां दशकों से बसा है। परम्परागत रूप से बने इनके बंगलों में लकड़ियों का प्रयोग अधिक है। सीमेंट और लाल टिन से बनीं छतें ढलावदार किंतु आकर्षक होती हैं। इन्होंने बेकरी सहित कई उद्योगों को अपने पेशे के रूप में चुना है। मालाबार और लकी बेकरी काफी लोकप्रिय हैं। पंचगनी का “पारसी पॉइंट” पारसियों के नाम और उनके सहयोग से बना है। यहां से खड़ा होकर घाटियों का विहंगम दृश्य खुली आँखों और टेलिस्कोप दोनों से देखा जा सकता है। नीचे कृष्णा नदी के किनारे बसे गांव ऊंघते से प्रतीत होते हैं। यहीं से कुछ दूरी पर “सिडनी पॉइंट” है। मदहोश कर देने वाली ठंडी हवाओं का झोंका सारी थकान दूर कर देता है। जिधर नज़र उठे , ठहर जाए। यहां का मंत्रमुग्ध कर देने वाला वातावरण सदाबहार है। सम्भवतः इसी नाते फ़िल्म अभिनेता अमीर खान और मशहूर सिने गायिका आशा भोसले का पंचगनी में अपना बंगला है। पुराने और नये कई फ़िल्मी गीतों की शूटिंग यहां हुई है। बदलते मौसम के साथ आज भी प्रेम गीतों की शूटिंग होती रहती है।

पूरे साल पर्यटकों की सरगर्मी पंचगनी में बनी रहती है। त्योहारों की चहल-पहल का पता ही नहीं चलता। हाँ , गणेशोत्सव की धूम में महाराष्ट्रीयन संस्कृति की झलक अवश्य दिखाई देती है। मूर्ति विसर्जन के समय अद्भुत नज़ारा होता है। प्रशिक्षण प्राप्त सैकड़ों नवयुवक और नवयुवतियां सड़क के किनारे अलग-अलग वाद्य यंत्रों के साथ खड़े रहते हैं। निर्देशक का इशारा पाते ही दर्ज़नों नगाड़े झांझ , तुरही , मृदंग , ढोल और तिनगोड़िया से लटके एक बड़े घण्टाल के साथ बज उठते हैं। विशेष परिधान पहने ये वादक लय और ताल में माहिर होते हैं। यातायात में बिना व्यवधान पहुंचाए इनका कारवां आगे बढ़ता रहता है। उत्सवधर्मिता का शानदार प्रदर्शन। मुझे बताया गया कि पुणे के आई. टी. प्रोफेशन में कार्यरत दर्ज़नों एम्प्लॉयी इस उत्सव के लिए बकायदे प्रशिक्षण लेते हैं। पिछले कई वर्षों से स्वामी समर्थ मंडल द्वारा बेबी पॉइंट पर गरबा और डंडिया का भी आयोजन हो रहा है।

पंचगनी से 14 किलोमीटर घाट के मार्ग से होकर उतरना होता है। प्रकृति की कारीगरी को कम देख पाने की कसक जिन पर्यटकों को रह जाती है, यहां पूरी होती है। इसी रास्ते में पैराग्लाइडिंग का भी मज़ा लिया जा सकता है, हलांकि कुछ दुर्घटनाओं के कारण अब इस पर रोक लगा दी गई है। 20 मिनट की ड्राइविंग के बाद निसर्ग के निर्दोष विस्तार में बसा है – “वाई” । “वैराज” नाम का यह प्राचीन नगर ऋषियों और मनीषियों की तपस्थली रहा है। कहा जाता है “रामडीह” नामक स्थान पर प्रभु राम ने कृष्णा नदी में स्नान किया था। पांडव भी यहां कुछ दिनों तक रहे थे। सत्रहवीं शताब्दी में संत समर्थ रामदास ने इस भूमि को अपनी कर्मस्थली के रूप में चुना था। कृष्णा नदी के समानांतर इस प्रज्ञा चक्षु ने ज्ञान की पावन गंगा बहाई। यहां आकर हरिद्वार और वाराणसी का स्मरण हो आता है। नदी के किनारे सुशोभित सैकड़ों मंदिर वाई के वृहद् इतिहास की कहानी बया करते हैं। सम्भवतः इन्हीं कारणों से इस क्षेत्र को “दक्षिण काशी” की उपाधि मिली होगी। वैदिक शिक्षा देने के लिए 1901 में प्रज्ञा पाठशाला की शुरुआत हुई। प्रसिद्ध तर्कतीर्थ लक्ष्मण शास्त्री जोशी ने वाई के गौरवमय इतिहास का उल्लेख कई स्थानों पर किया है। उपासना-स्थलों की दृष्टि से पेशवा काल में काफी प्रगति हुई। मैसूर के शासक टीपू सुल्तान से लोहा लेने वाले चतुर और दूरदर्शी मराठा नाना फड़नवीस का वाड़ा यहीं से कुछ दूर मेडवली में है। नाना फड़नवीस आजीवन मराठा संघ को एक सूत्र में बांधे रहे। मराठी विश्वकोश मंडल के मुख्यालय के कारण यह शहर महाराष्ट्र का सिरमौर है।

आजकल इस प्राचीन नगरी में विकास की नई बयार बहने लगी है। भवन निर्माताओं और राजनेताओं के गठजोड़ से यहां प्रगति की नई परिभाषा गढ़ी जा रही है। व्यावसायिक लाभ की भेंट चढ़ रही यह सांस्कृतिक नगरी आंसू बहा रही है। गरवारे और भारत पेट्रोलियम जैसे व्यावसायिक घराने यहां अपने कारखाने स्थापित कर रहे हैं। साफ-सुथरी सड़कें, आधुनिक तकनीकी से सुसज्जित अस्पताल, आधा दर्जन पेट्रोल पंप और उच्च शिक्षा देते कई संस्थान वाई की अहमियत को रेखांकित करते हैं। यहां के असली सौंदर्य को चखने के लिए दूर-दराज गांवों में धंसना ज़रूरी है। वहां किसानों के पसीने की गंध घ्राणेन्दियों को तृप्त कर देगी। प्रकृति-साहचर्य में अपनापन महसूस होगा। इक्कीसवीं सदी के दौर में ऐसा स्थान दुर्लभ है। दुःखद यह कि आने वाले कुछेक दशकों में यह स्थान आधुनिक विकास की भेंट चढ़ जाएगा। मशीनों की गड़गड़ाहट से पक्षी और पशु सहमे-सहमे होंगे। धरती-पुत्र किसान किसी कारखाने में मज़दूर बना होगा।

महाबलेश्वर , पंचगनी और वाई के सुदीर्घ व विस्तृत इतिहास में सदियां बोलती हैं। पर्यटन के इस महातीर्थ की कई परतें हैं। कुरेदने पर हर्ष और विस्मय से आंखें फैलती जाती हैं। यहां आकर सैलानी निर्वाण प्राप्त करते हैं – अकथनीय व शब्दातीत!

उत्तर प्रदेश: विधानसभा चुनाव में सबको परास्त करने के लिए ‘अपने पीके’ की तलाश में जुटीं मायावती

अनुज हनुमत,

पिछले लोकसभा चुनाव (2014) में प्रशांत किशोर के नेतृत्व में भाजपा ने प्रचण्ड बहुमत प्राप्त किया। इसके बाद बिहार में नीतीश-लालू की जोड़ी ने भी पीके के नेतृत्व में विरोधियों को परास्त करते हुए बहुमत प्राप्त किया। बहरहाल इस बार पीके कांग्रेस की डूबती नैय्या के खेवनहार हैं।

असल में प्रशांत किशोर का ज्यादातर दखल सोशल मीडिया द्वारा प्रभावित होने वाले वोटर्स पर होता है, जिसकी मौजूदा समय में सबसे अधिक संख्या है। इसीलिए अब अन्य पार्टियां भी ऐसे ही किसी यूनिक पर्सनालिटी की तलाश में हैं, जो उन्हें आगामी चुनाव में सफल बना सके।

सूत्रों की माने तो ऐसा ही प्रयास अब बहुजन समाज पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व भी कर रहा है। सूत्रों के मुताबिक़,  बसपा सुप्रीमों मायावती भी अपनी पार्टी के लिए एक प्रशांत किशोर की तलाश कर रही हैं। सूत्रों के अनुसार, आने वाले विधानसभा चुनाव में बसपा भी ठीक वही रणनीति अपनाना चाहती है, जैसा भाजपा और कांग्रेस ने अपनाई है। बसपा का दलित वोट बैंक तो कहीं खिसकने वाला नहीं, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ इसी वोट बैंक के बल पर बसपा यूपी की सत्ता का स्वाद चख पाये।

जानकारों की मानें तो बसपा की नजर उन बौद्धिक तबके के वोटर्स पर है, जो बाबा साहब अम्बेडकर और कांशीराम के प्रशंसक हैं। सूत्रों के अनुसार, बसपा का थिंक टैंक एक ऐसी टीम की तलाश में है, जो इलेक्ट्रानिक, प्रिंट मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक  विरोधियो के आरोपों का जवाब दे सके।

आपको बता दें कि भारत में इस समय इंटरनेट यूजर की संख्या लगभग 30 करोड़ है और सोशल मीडिया पर लगभग 15 करोड़ लोग हैं। बहुजनों की ज्यादातर आबादी सोशल मीडिया से अभी बाहर है। लेकिन जल्द ही ट्विटर और फेसबुक पर बहुतायत मात्रा में बसपा के फालोअर दिखने वाले हैं।

दरअसल, बसपा के थिंकटैंक माने जाने वाले एक ब्राह्मण नेता का कहना कि इस बार बसपा का बदला हुआ रूप विरोधी पार्टियों और जनता को सोचने पर मजबूर कर देगा। उनके अनुसार बसपा ही एकमात्र पार्टी है, जो जनता को हर मामले में राहत दिला सकती है। बसपा को लेकर विरोधी पार्टियों ने खूब अफवाह फैला रखी है जिसका पार्टी उन्ही की भाषा में जवाब देगी।

अगर 2017 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारी की बात करें तो इस मामले में बीजेपी सबसे आगे चलती दिखाई दे रही है और उसके पीछे कांग्रेस और सपा में नजदीकी लड़ाई है। 2014 के लोकसभा चुनाव में केंद्र की सत्ता से बाहर जाने वाली कांग्रेस को भी धीरे-धीरे इसकी ताकत का अंदाजा लगने लगा है, जिससे वो पीके के नेतृत्व में सक्रिय तो हुई है, लेकिन अभी भी कम है।

देखना दिलचस्प होगा कि बसपा की इस नई चाल का विरोधियों के कांफिडेंस पर क्या असर पड़ता है। क्योंकि सभी अपनी जीत जीत के प्रति लगभग आश्वस्त हैं। लेकिन एक बात तो तय है कि यूपी में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव में सोशल मीडिया का प्रभाव जबरदस्त तरीके से दिखाई देने वाला है।

अखिलेश ने मुलायम को दी धोबी पछाड़ पटखनी!

शिखा पाण्डेय,

भोजपुरी में कहावत है, “कौवा से कवेलवा (कौवे का बच्चा) चंलाक”। समाजवादी पार्टी की राजनीति में भी फ़िलहाल यही कहावत सार्थक होती नज़र आ रही है। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उत्तरप्रदेश की जनता के दिल दिमाग पर अपनी ऐसी छवि अंकित कर दी है कि सपा के मुखिया मुलायम सिंह यादव की छवि धूमिल पड़ गई है। अखिलेश ने अपने पिता मुलायम सिंह यादव को लोकप्रियता के मामले में काफी पीछे छोड़ दिया है।

एक सर्वेक्षण एजेंसी ने उत्तर प्रदेश में एक महीने में दो सर्वे किए। सर्वे के मुताबिक मतदाताओं के बीच अखिलेश की लोकप्रियता अच्छी खासी बढ़ी है। इस सर्वे में वोटरों ने ‘पुत्र’ अखिलेश यादव को ‘पिता’ मुलायम सिंह यादव से मुख्यमंत्री पद का बेहतर उम्मीदवार करार दिया है। खास बात यह है कि इन सर्वेक्षणों के दौरान सपा के आधार वोट बैंक ‘यादव’ और ‘मुसलमान’ का भी खास तौर पर ध्यान रखा गया है, जिसके बाद ऐसे नतीजे सामने आये हैं।

आपको बता दें कि न्यूज वेबसाइट हफिंग्टन पोस्ट के लिए सी वोटर द्वारा सितंबर और अक्टूबर महीने में सभी 403 विधानसभा क्षेत्रों में कुल 12,221 लोगों के बीच यह सर्वेक्षण कराया गया था।

इस एक्सक्लूसिव सर्वे के अनुसार पिता-पुत्र की लोकप्रियता की तुलना वाले सवाल में अखिलेश को अक्टूबर में 76 जबकि सितंबर में 67 प्रतिशत लोगों ने पसंद किया। मुलायम को पिछले महीने 19 जबकि इस महीने मात्र 15 प्रतिशत लोगों ने पसंद किया।

सर्वेक्षण में जब अखिलेश व शिवपाल के बीच की लोकप्रियता जांची गई, तो इस बार 83 फीसद लोगों ने अखिलेश का नाम लिया। पिछली बार 77 फीसद लोगों ने उन्हें पसंद किया था। शिवपाल का नाम पिछली बार 6.9 जबकि इस बार 6.1 फीसद लोगों ने चुना।

यदि उम्र की बात करें, तब भी मात्र युवाओं में ही नहीं, बुज़ुर्गों में भी अखिलेश ने अपनी धाक जमा ली है। सर्वे के अनुसार 55 साल से ज्यादा उम्र वाले 70 फीसद लोग अखिलेश ही को पसंद करते हैं। सर्वे में शामिल 68 प्रतिशत लोगों का यह मानना है कि अखिलेश यादव पार्टी को गुंडा छवि से बाहर निकालने की कोशिश कर रहे हैं। इस प्रकार समाजवादी पार्टी की अंदरूनी कलह ने देखते ही देखते अखिलेश को हीरो और बाकि सभी पार्टी दिग्गजों को जीरो साबित कर दिया है।

पाकिस्तान के लिए जासूसी करने वाला जांगिड़ लड़ चुका है विधानसभा चुनाव

आनंद रूप द्विवेदी,

दिल्ली पुलिस ने गुरुवार को पकिस्तान के लिए जासूसी करने के आरोप में जिस सुभाष जांगिड़ को गिरफ्तार किया है, वो राजस्थान में 2013 में विधानसभा का चुनाव प्रत्याशी भी रह चुका है। सुभाष राजस्थान के नागौर जिले की खिंस्वर विधानसभा सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ चुका है। इलेक्शन कमीशन को जमा किये एफिडेविट में जांगिड़ की कुल संपत्ति 3.12 लाख बताई गई है।

सुभाष ने 2006 में 9वीं पास करने के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी, लेकिन कॉलेज स्तर कि राजनीति में उसे हमेशा से रूचि थी। फेसबुक में देशभक्ति के पोस्ट शेयर करने वाले सुभाष जांगिड़ को दिल्ली पुलिस ने पाकिस्तान के लिए जासूसी के आरोप में गिरफ्तार किया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ये पता चला है कि सुभाष को उसके अन्य आरोपी साथियों ने बहलाया फुसलाया था, क्योंकि वो भारी कर्ज में डूबा हुआ था।

दैनिक अखबार इन्डियन एक्सप्रेस को मिली जानकारी के अनुसार, पुलिस ने एक जासूसी रैकेट पर छापामारी कर पर्दाफ़ाश किया। जिसके पीछे पुलिस 6 महीनों से लगी हुई थी। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस गिरोह पर BSF से जुड़ी सीक्रेट जानकारियों को पाकिस्तानी एजेंसी ISI तक पहुंचाने का आरोप है। पुलिस ने दिल्ली चिड़ियाघर के पास महमूद अख्तर, रमजान खान और सुभाष जांगिड़ को धर दबोचा, जिनमें से महमूद अख्तर पकिस्तान उच्चायोग के वीसा डिपार्टमेंट में कार्यरत था।

शिवाय… न आदि सही, न अंत!

अमित द्विवेदी

रेटिंग- **/5*

समीक्षा- फिल्म ‘शिवाय’
स्टार कास्ट- अजय देवगन, एरिका कार, एबीगेल ईम्स, साएशा सहगल, वीर दास, गिरीश करनाड, सौरभ शुक्ल
डायरेक्टर- अजय देवगन
संगीत- मिथुन शर्मा
लेखक- संदीप श्रीवास्तव, रॉबिन भट्ट

जैसे किसी परिवार में सबकुछ ठीक हो लेकिन तालमेल न हो तो व्यवस्था बिगड़ जाती है, कुछ वैसा ही हाल है फिल्म ‘शिवाय’ का। हिमालय के खूबसूरत नज़ारे, बेहतरीन फोटोग्राफी और ज़बरदस्त एक्शन के बावजूद भावहीन संवाद, ढीली स्क्रिप्ट और कलाकारों के कमज़ोर प्रदर्शन ने फिल्म को दिशाहीन बना दिया। दरअसल फिल्म का ताना बाना बुनने में ही निर्देशक अजय ने काफी समय ले लिया, जिसकी वजह से फिल्म की शुरुआत ही बोझिल हो जाती है। आइए जानते हैं क्या है ‘शिवाय’।

कहानी-

फिल्म की शुरुआत में अजय देवगन यानि शिवाय इंडियन आर्मी की मदद करता है, शिवाय की प्रतिभा से कर्नल खुश हो जाता है और कहता है कि वो शिवाय की नौकरी के लिए आर्मी में बात करेगा। लेकिन शिवाय कहता है कि वो बस हिमालय आने वाले लोगों की मदद करना चाहता है। इसी दौरान बुल्गारिया से आए कुछ यात्रियों को लेकर शिवाय हिमालय की चढ़ाई पर निकल जाता है। जब ये हिमालय पर ज़्यादा ऊंचाई पर चढ़ते हैं, तो बर्फ टूटने लगती है। बचाने का यत्न शुरू होता है और सबको बचाने के बाद शिवाय और बुल्गारिया से आई लड़की (एरिका कार), दोनों फंस जाते हैं। यहीं से दोनों को एक दूसरे से प्रेम हो जाता है और जब वे सकुशल घर लौटते हैं, तो पता चलता है कि वो एरिका माँ बनने वाली है। अपने करियर को लेकर गंभीर एरिका माँ नहीं बनना चाहती, जबकि शिवाय पिता बनने के लिए उत्सुक है। दोनों समझौता करते हैं कि एरिका शिवाय के बच्चे को जन्म तो देगी लेकिन वापस अपने वतन लौट जाएगी, अपना करियर बनाने के लिए। शिवाय की बिटिया गौरा धीरे धीरे बड़ी होने लगती है। एक दिन भूकंप आने के बाद घर को संवारते हुए गौरा को एक चिट्ठी और कुछ तस्वीर मिलती है, जिससे उसे पता चलता है कि उसकी माँ अभी ज़िंदा है। शिवाय गौरा की माँ से मिलने की इच्छा को दबा नहीं पाता और दोनों बुल्गारिया जाते हैं, यहीं से शुरू होती है असली कहानी। नाटकीय अंदाज़ में गौरा किडनैप हो जाती है। इसके बाद फिल्म धीरे धीरे कसती जाती है। गौरा के साथ क्या क्या होता है, वहाँ की सरकार, पुलिस और किडनैपर्स से किस तरह लड़ता है शिवाय, यह दर्शनीय है। जिसके लिए आपको सिनेमाघर की ओर रुख करना होगा।

पटकथा-संवाद-

बिखरी हुई पटकथा है। शुरुआत के 20 मिनट बेहद बोझिल हैं। यदि पटकथा कसी हुई होती तो फिल्म बेहतरीन होती। संवाद औसत हैं लेकिन अजय के अलावा बाकी कलाकार उसके साथ न्याय नहीं कर सके।

संगीत-

संगीतकार मिथुन का कमाल कुछ खास नज़र नहीं आया। संगीत औसत है लेकिन ‘हर हर हर महादेव’ काफी प्रभावी है। फिल्म का टाइटल ट्रैक मोहित की आवाज़ में काफी प्रभावी लगता है।

अभिनय-निर्देशन-

सायेशा सहगल और एरिका कार ने निराश किया। अजय देवगन लगभग हर फ्रेम में नज़र आए हैं, जिन्होंने अपने अभिनय से पटकथा की कमज़ोरी की भरपाई करने की कोशिश की है। सौरभ को जितना स्पेस दिया गया है, उन्होंने प्रभावित किया। गिरीश कर्नाड, वीर दास ने काफी निराश किया।

आजकल अभिनय के साथ निर्देशन भी करने वाले कलाकारों को इस बात पर विचार करना होगा कि निर्देशन के लिए निर्देशकों पर ही विश्वास किया जाना चाहिए। कलाकारी के साथ निर्देशन करने की जबदस्ती से बट्टा लग ही जाता है।

अखिलेश की शादी के सब खिलाफ थे, इसी दलाल ने साथ दिया था, शादी की हर तस्वीर में भी मौजूद है यह दलाल-अमर सिंह

ब्यूरो,
राज्यसभा सांसद व समाजवादी पार्टी के शीर्ष नेता अमर सिंह ने आज अखिलेश के ‘दलाल’ वाले बयान पर और सपा में मचे घमासान पर अपना दुःख खुलकर व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि मैं आजीवन मुलायम सिंह के साथ रहूँगा, पर ‘मुख्यमंत्री’ अखिलेश के साथ नहीं। उन्होंने रामगोपाल यादव और भी संगीन आरोप लगाया और कहा कि अगर मुझे भविष्य में कुछ होगा तो इसके ज़िम्मेदार रामगोपाल होंगे।

अमर सिंह ने कहा,” मैं मुलायम सिंह का समर्थन करता हूं और अखिलेश के साथ इसलिए हूं, क्योंकि वह मुलायम सिंह के बेटे हैं। इस नाते वह मुझे गाली भी देंगे तो मैं उसके साथ रहूंगा, लेकिन मैं मुख्यमंत्री अखिलेश के साथ नहीं हूं।”

अमर सिंह ने कहा कि जब शिवपाल यादव को हटाकर अखिलेश यादव को यूपी सपा का अध्यक्ष बनाया गया था, तब भी दोषी मुझे ठहराया गया था, लेकिन फिर भी शिवपाल यादव ने पार्टी कार्यालय में नये अध्यक्ष का सहर्ष स्वागत किया था।

अखिलेश के दलाल कहे जाने पर दुखी होकर अमर सिंह ने कहा कि आज भी मैं उनके शादी के एलबम को देखकर रो पड़ता हूं। उन्होंने कहा,” क्या अखिलेश इस बात को झुठला सकते हैं कि जब पूरा परिवार उनकी शादी के खिलाफ था तो मैंने उसकी शादी करायी थी? उनकी शादी के एलबम की कोई ऐसी तसवीर नहीं है, जिसमें यह दलाल नहीं है।” उन्होंने कहा कि आज जो जमात अखिलेश के साथ है, वह उनकी कुर्सी के कारण है।

उन्होंने कहा कि मैं आशु मलिक को नहीं जानता हूं। उन्होंने कहा कि अखिलेश यादव द्वारा औरंगज़ेब कहे जाने वाले बयान से भी उनका कोई सरोकार नहीं है।
उन्होंने भावुक होकर कहा,” मेरी दो जवान बेटियां हैं, लेकिन रामगोपाल यादव की धमकी के बाद मैं डरा हुआ महसूस कर रहा हूं। अगर मुझे कुछ होता है, तो इसके लिए रामगोपाल ज़िम्मेदार होंगे।”

गौरतलब है कि अखिलेश यादव ने सपा में मचे घमासान के लिए अमर सिंह को जिम्मेदार ठहराया था और उन पर दलाली करने का आरोप लगाते हुए उन्हें औरंगजेब तक कह डाला था। वहीं रामगोपाल ने अमर सिंह को खोटा सिक्का करार दिया था और यह कहा था कि उनके आने से मुझे (असली सिक्के) को बाजार से बाहर होना पड़ा है।

मोदी सरकार की मुश्किलें, पीएम के ‘डेवेलपमेन्ट’ के दावे की खुली पोल!

अनुज हनुमत

प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी के सामने डब्ल्यूजेपी की ताजा रिपोर्ट एक और मुश्किल खड़ी कर सकती है। डब्ल्यूजेपी की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, कानून के शासन मामलें में 0.51 स्कोर के साथ भारत इस बार 66वें पायदान पर है।

गौरतलब हो कि अमेरिकी शोध संगठन वर्ल्ड जस्टिस प्रोजेक्ट (डब्ल्यूजेपी) ने अपने रूल ऑफ इंडेक्स-2016 में दुनिया के 113 देशों की आठ कारकों के आधार पर रैंकिंग की है। पहले पायदान पर 0.89 रैंकिंग के साथ डेनमार्क देश है। इनमें प्रत्येक कारक के आधार पर भी देशों की रैंकिंग हुई है। अधिकांश कारकों में भारत, चीन और पाकिस्तान से आगे है। वहीं सबसे ख़राब कानून का शासन वेनेजुएला में है। यदि पिछले वर्ष की बात करें तो 102 देशों की लिस्ट में भारत 59वें पायदान पर था। भारत के लिए राहत की बात यह कि रैंकिंग में वह चीन और पाकिस्तान से आगे है। चीन और पाकिस्तान की रैंकिंग क्रमशः 80 और 106 है। वहीं दक्षिण एशिया क्षेत्र की रैंकिंग में भारत दूसरे स्थान पर है।

रैंकिंग के आधार -आठ कारक

1. कानून के दायरे में सरकार
2. भ्रष्टाचार मुक्त सरकारी महकमे
3. सरकार की पारदर्शिता
4. मूलाधिकारों की रक्षा
5. नागरिक सुरक्षा
6. सरकारी नीतियों का क्रियान्वयन
7. नागरिक न्याय प्रणाली
8. आपराधिक न्याय प्रणाली

आपको बता दें कि डब्ल्यूजेपी का गठन वर्ष 2006 में हुआ था। यह इसका छठा रूल ऑफ लॉ इंडेक्स (कानून का संशोधन सूचकांक) है। यह संगठन विश्व में बेहतर कानून व्यवस्था स्थापित करने के लिए काम करता है।

सबसे अहम बात यह है कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है और यहाँ कानून का अहम योगदान है। लेकिन जब से भारत स्वतन्त्र हुआ है, तब से हालत जस की तस है। अभी भी एक गरीब व्यक्ति थाने में जाने से घबराता है। जहाँ पर उसे न्यायिक सुरक्षा का अनुभव होना चाहिए वहां असुरक्षा महसूस होती है। केंद्र की मोदी सरकार के सामने एक सबसे बड़ी चुनौती है कि वह कानून के शासन को भलीभांति लागू करें, जिसमे प्रत्येक राज्यों को भी केंद्र का साथ देना चाहिए।

खासकर उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली, पंजाब और मध्य प्रदेश की सरकारों को जहाँ कानून की स्थिति बहुत खराब है। सबसे ज्यादा दयनीय स्थिति तो यूपी और बिहार की है, जहाँ दिनदहाड़े कहीं भी कभी कानून की धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं। ये आंकड़ें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जारी होते हैं, इसलिए भारत का पायदान ठीक ठाक नजर आता है। लेकिन अगर यही आंकड़े केवल भारत के लिए पेश किये जाये तो तस्वीर और भी भयावह देखने को मिल सकती है।