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Tuesday, July 28, 2026
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SDM ने क़ायम की मिसाल, सरकारी विद्यालय में पढ़ेगी अफ़सर की बिटिया

अनुज हनुमत | navpravah.com 

चित्रकूट | आम जनमानस की शिक्षा से जुड़ी एक बड़ी शिकायत यह रहती है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती और प्राइवेट स्कूलों में फीस बहुत महंगी होती है। इसके पीछे का बड़ा कारण शिक्षा के निजीकरण यानी प्राइवेटाइजेशन को माना जाता है। लोगों की शिकायत यह भी रहती है कि नेता और अधिकारी तो अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाते हैं और जिन सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था सुधारने की उनकी जिम्मेदारी है, उसमें वो घोर लापरवाही करते हैं। ऐसे लोगों के बीच उत्तर प्रदेश के चित्रकूट में तैनात एक पीसीएस अधिकारी ने बेहतरीन मिसाल कायम की है।

चित्रकूट जिले के मऊ तहसील के SDM सौरभ यादव ने अपनी बेटी का दाखिला प्राइवेट और महंगे स्कूल में कराने की जगह एक सरकारी स्कूल में कराया है। एसडीएम सौरभ यादव ने अपनी बेटी का एडमिशन मऊ तहसील के इंग्लिश मीडियम प्राथमिक विद्यालय छिवलहा में करवाया है। बेटी का एडमिशन सरकारी स्कूल में कराकर यह साफ कर दिया कि शिक्षा का लेवल स्कूल की बिल्डिंग या फीस से तय नहीं होता। शिक्षा शिक्षक, विद्यार्थी और व्यवस्था पर निर्भर करती है। उनकी बेटी अब मऊ के एक सामान्य सरकारी स्कूल में सभी सामान्य बच्चों के साथ बैठकर पढ़ाई करती हैं।

मऊ एसडीएम सौरभ यादव ने नवप्रवाह न्यूज़ नेटवर्क से ऑफ कैमरा बताया कि हम अगर चाहते हैं कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का स्तर बेहतर हो तो सबसे पहले हमें खुद उस व्यवस्था का हिस्सा बनना होगा। जब अफसरों और आम जनता के बच्चे एक साथ पढ़ेंगे तभी असली समानता आएगी। उनका ये भी कहना है कि सरकारी स्कूलों में भी पढ़ाई अच्छी होती है।

मऊ एसडीएम की ये सोच समाज को आइना दिखाती है। आमतौर पर अधिकारी अपने बच्चों को महंगे अंग्रेज़ी मीडियम स्कूलों में पढ़ाना अपनी प्रतिष्ठा मानते हैं। सौरभ यादव जैसे अफसर इस तरह की मानसिकता को चुनौती दे रहे हैं। उनका यह कदम यह भी साबित करता है कि सरकारी स्कूलों में योग्यता की कोई कमी नहीं है। जरूरत है तो बस समाज के भरोसे और सहयोग की।

स्कूल के अध्यापक ने नवप्रवाह न्यूज़ नेटवर्क को जानकारी देते हुए कहा कि तहसील मऊ के एसडीएम की बच्ची का एडमिशन हमारे यहां क्लास एक में हुआ है। उनकी बच्ची सामान्य बच्चों की तरह एक साथ क्लासरूम में बैठकर सभी बच्चों के साथ पढ़ाई करती है। उनकी बच्ची के एडमिशन होने के बाद लोग अब और जागरूक हो रहे हैं और अपने बच्चों का एडमिशन करवाने के लिए हमारे विद्यालय में आ रहे हैं।

आखिर क्यों पारित किया गया वक्फ संशोधन विधेयक? जानिए पूरी बात।

अनुज हनुमत | navpravah.com 

लखनऊ| वक्फ संशोधन बिल 2024 (Waqf Amendment Bill 2024) भारत सरकार द्वारा प्रस्तावित एक विधेयक है, जो वक्फ अधिनियम, 1995 में संशोधन करने के लिए लाया गया है। इसका उद्देश्य वक्फ बोर्ड के कामकाज, वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन और पारदर्शिता को बेहतर बनाना है।

मुख्य बिंदु:

वक्फ संपत्तियों का सर्वेक्षण: गैर-मुस्लिम संपत्तियों को वक्फ के दायरे से बाहर करने और अवैध कब्जे को रोकने के लिए नए प्रावधान।

पारदर्शिता और जवाबदेही: वक्फ बोर्ड के वित्तीय और प्रशासनिक कार्यों में अधिक पारदर्शिता लाने के लिए ऑडिट और रिकॉर्ड-कीपिंग को मजबूत करना।

महिला और अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व: बोर्ड में महिलाओं और अन्य समुदायों के प्रतिनिधित्व को बढ़ावा देना।

कानूनी विवादों का समाधान: 

वक्फ संपत्तियों से संबंधित विवादों को तेजी से निपटाने के लिए बेहतर तंत्र।

कलेक्टर की भूमिका: 

वक्फ संपत्तियों के सर्वे और विवादों के निपटारे में जिला कलेक्टर को अधिकृत करना।

यह बिल अगस्त 2024 में लोकसभा में पेश किया गया था, लेकिन इसे संसद की संयुक्त समिति (JPC) को भेजा गया है, जो इस पर चर्चा और सुझाव दे रही है। कुछ समुदायों और संगठनों ने इस बिल पर चिंता जताई है, जबकि सरकार का कहना है कि यह वक्फ प्रणाली को और मजबूत करेगा।

मोदी सरकार वक्फ संशोधन बिल 2024 को क्यों लाई?

मोदी सरकार का दावा है कि वक्फ संशोधन बिल 2024 का उद्देश्य वक्फ बोर्ड के कामकाज को और पारदर्शी, कुशल और समावेशी बनाना है।

 इसके पीछे निम्नलिखित कारण बताए गए हैं:

पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना: 

सरकार का कहना है कि वक्फ बोर्ड की संपत्तियों के प्रबंधन में अनियमितताएं और भ्रष्टाचार की शिकायतें रही हैं। बिल के माध्यम से डिजिटल पोर्टल और ऑडिट जैसे उपायों से संपत्तियों का रिकॉर्ड व्यवस्थित करना और गलत इस्तेमाल रोकना चाहती है।

संपत्तियों का दुरुपयोग रोकना: 

कुछ मामलों में वक्फ बोर्ड ने निजी या सरकारी संपत्तियों को वक्फ संपत्ति घोषित करने की शक्ति का दुरुपयोग किया है। बिल में सेक्शन 40 को हटाकर और जिला कलेक्टर को सर्वे का अधिकार देकर सरकार इसे नियंत्रित करना चाहती है।

समावेशिता को बढ़ावा: बिल में वक्फ बोर्ड और केंद्रीय वक्फ परिषद में गैर-मुस्लिम और महिला सदस्यों को शामिल करने का प्रावधान है, ताकि बोर्ड की संरचना को और व्यापक बनाया जा सके। सरकार का कहना है कि इससे पिछड़े और गरीब मुस्लिम समुदायों, जैसे पसमांदा मुस्लिमों, को फायदा होगा।

कानूनी सुधार: सरकार के अनुसार, यह बिल सच्चर समिति और अन्य समितियों की सिफारिशों पर आधारित है, जो वक्फ संपत्तियों के बेहतर प्रबंधन और आय बढ़ाने की बात कहती हैं। इससे सामाजिक कल्याण, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार होगा।

सामाजिक न्याय: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि यह बिल गरीब मुस्लिमों, महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की रक्षा करेगा और वक्फ की मूल भावना को बनाए रखेगा।

वक्फ संशोधन बिल का विरोध क्यों हो रहा है?

वक्फ संशोधन बिल का कई विपक्षी दलों, मुस्लिम संगठनों और नेताओं ने विरोध किया है। इसके पीछे निम्नलिखित कारण हैं:

धर्म में हस्तक्षेप का आरोप: विपक्ष का कहना है कि यह बिल संविधान के अनुच्छेद 26 का उल्लंघन करता है, जो धार्मिक समुदायों को अपनी धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन का अधिकार देता है। गैर-मुस्लिमों को बोर्ड में शामिल करने को धार्मिक स्वतंत्रता में दखल माना जा रहा है।

वक्फ बोर्ड की स्वायत्तता पर खतरा: बिल में जिला कलेक्टर को वक्फ संपत्तियों के विवादों का निर्णय लेने का अधिकार देने से वक्फ बोर्ड की स्वायत्तता कम होने की आशंका है। इसे बोर्ड को “निष्प्रभावी” बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

सामुदायिक ध्रुवीकरण का डर: विपक्षी नेता, जैसे असदुद्दीन ओवैसी और कांग्रेस के सांसद, का कहना है कि यह बिल मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाता है और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा दे सकता है। उनका दावा है कि यह बिल बीजेपी की वोट बैंक राजनीति का हिस्सा है।

संवैधानिकता पर सवाल: कुछ आलोचकों का कहना है कि बिल में वक्फ बनाने के लिए “पांच साल तक इस्लाम का पालन” जैसी शर्तें संविधान के समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) का उल्लंघन करती हैं।

पर्याप्त विचार-विमर्श की कमी: विपक्ष और कुछ संगठनों का आरोप है कि बिल को जल्दबाजी में पेश किया गया और संयुक्त संसदीय समिति (JPC) में सभी हितधारकों की राय को पूरी तरह शामिल नहीं किया गया।

संपत्तियों पर सरकारी नियंत्रण का डर: आलोचकों को डर है कि बिल के प्रावधानों से सरकार वक्फ संपत्तियों पर अधिक नियंत्रण हासिल कर सकती है, जिससे मुस्लिम समुदाय की धार्मिक और सामाजिक संस्थाएं प्रभावित हो सकती हैं।

सरकार का कहना है कि यह बिल वक्फ प्रणाली को आधुनिक और पारदर्शी बनाएगा, जिससे गरीब मुस्लिमों को लाभ होगा। वहीं, विपक्ष और आलोचक इसे मुस्लिम समुदाय के अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला मानते हैं। यह मुद्दा संवेदनशील है और इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी याचिकाएं दायर की गई हैं।

मुस्लिम समुदाय और संगठनों द्वारा वक्फ संशोधन बिल 2024 का विरोध निम्नलिखित कारणों से हो रहा है:

धार्मिक स्वायत्तता में हस्तक्षेप का डर:

बिल में गैर-मुस्लिमों को वक्फ बोर्ड और केंद्रीय वक्फ परिषद में शामिल करने का प्रावधान है। कई मुस्लिम संगठनों का मानना है कि यह इस्लामी धार्मिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप को बढ़ावा देगा, जो संविधान के अनुच्छेद 26 (धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन का अधिकार) का उल्लंघन करता है।

वक्फ बोर्ड की स्वतंत्रता पर खतरा:

बिल के तहत जिला कलेक्टर को वक्फ संपत्तियों के सर्वे और विवादों के निपटारे का अधिकार दिया गया है। आलोचकों का कहना है कि इससे वक्फ बोर्ड की स्वायत्तता कम होगी और सरकारी नियंत्रण बढ़ेगा, जिससे बोर्ड निष्प्रभावी हो सकता है।

वक्फ संपत्तियों पर सरकारी कब्जे की आशंका:

कुछ मुस्लिम नेताओं और संगठनों को डर है कि बिल के प्रावधानों का इस्तेमाल वक्फ संपत्तियों को सरकारी नियंत्रण में लेने या गैर-वक्फ उद्देश्यों के लिए उपयोग करने के लिए किया जा सकता है। खासकर, सेक्शन 40 को हटाने से बोर्ड की संपत्ति घोषित करने की शक्ति सीमित हो जाएगी।

इस्लामी नियमों के खिलाफ प्रावधान:

बिल में वक्फ बनाने के लिए “पांच साल तक इस्लाम का पालन” जैसी शर्तें और वक्फ संपत्ति को केवल मुस्लिम व्यक्ति द्वारा ही दान करने की बाध्यता को इस्लामी कानून (शरिया) के खिलाफ माना जा रहा है। आलोचकों का कहना है कि वक्फ की परंपरागत परिभाषा और उद्देश्य को बदला जा रहा है।

सामुदायिक भावनाओं को ठेस:

कई मुस्लिम संगठन, जैसे ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और जमीयत उलेमा-ए-हिंद, मानते हैं कि यह बिल समुदाय को निशाना बनाता है और मुस्लिमों की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान पर हमला है। इसे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

पर्याप्त परामर्श की कमी:

समुदाय के कई नेताओं का आरोप है कि बिल को तैयार करने और पेश करने से पहले मुस्लिम समुदाय के हितधारकों, जैसे वक्फ बोर्ड और धार्मिक संगठनों, के साथ पर्याप्त विचार-विमर्श नहीं किया गया। इससे समुदाय में असंतोष बढ़ा है।

विवादों को बढ़ावा देने का डर:

बिल के कुछ प्रावधान, जैसे पुरानी संपत्तियों का पुनः सर्वेक्षण, को लेकर आशंका है कि इससे नए कानूनी विवाद पैदा हो सकते हैं, जिससे मुस्लिम समुदाय को लंबी कानूनी लड़ाई का सामना करना पड़ सकता है।

मुस्लिम समुदाय का एक बड़ा वर्ग इस बिल को अपनी धार्मिक स्वतंत्रता, वक्फ संपत्तियों की सुरक्षा और बोर्ड की स्वायत्तता के लिए खतरे के रूप में देखता है। उनका मानना है कि यह बिल वक्फ की मूल भावना और इस्लामी सिद्धांतों के खिलाफ है। हालांकि, सरकार का कहना है कि यह सुधार समुदाय के हित में हैं, लेकिन इन चिंताओं ने व्यापक विरोध को जन्म दिया है।

पश्चिम बंगाल में वक्फ संशोधन बिल 2024 (जो अब 2025 में कानून बन चुका है) का विरोध कई कारणों से हो रहा है:

धार्मिक स्वतंत्रता पर हमले का डर:

मुस्लिम समुदाय और स्थानीय संगठनों का मानना है कि बिल में गैर-मुस्लिमों को वक्फ बोर्ड में शामिल करने और जिला कलेक्टर को संपत्ति विवादों का अधिकार देने जैसे प्रावधान धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप हैं। इसे संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 का उल्लंघन माना जा रहा है, जो धार्मिक स्वतंत्रता और संस्थाओं के प्रबंधन का अधिकार देता है।

राजनीतिक विरोध:

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने इस बिल का कड़ा विरोध किया है। ममता बनर्जी ने इसे “मुस्लिम विरोधी” और “देश को बांटने वाला” करार दिया है। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार इसे राज्य में लागू नहीं होने देगी। यह विरोध TMC की मुस्लिम वोट बैंक को मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा भी माना जा रहा है, क्योंकि पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी लगभग 27% है।

हिंसक प्रदर्शन और सामुदायिक तनाव:

मुर्शिदाबाद, मालदा और अन्य जिलों में बिल के खिलाफ प्रदर्शन हिंसक हो गए, जिसमें पुलिस वाहनों में आग लगाई गई और पथराव हुआ। प्रदर्शनकारियों का मानना है कि यह बिल वक्फ संपत्तियों को कमजोर करेगा और समुदाय की धार्मिक विरासत को खतरे में डालेगा। ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि यह केंद्र का कानून है, न कि राज्य का।

वक्फ संपत्तियों पर कब्जे की आशंका:

स्थानीय मुस्लिम संगठनों और नेताओं को डर है कि बिल के प्रावधान, जैसे संपत्तियों का पुनः सर्वेक्षण और लिमिटेशन एक्ट का लागू होना, वक्फ संपत्तियों को गैर-मुस्लिमों या कॉरपोरेट्स के हवाले करने की साजिश है। खासकर, पश्चिम बंगाल में वक्फ संपत्तियां (जो देश में 9% हैं) आर्थिक और धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण हैं।

बांग्लादेश में वक्फ संशोधन बिल 2024 का विरोध क्यों हो रहा है?

बांग्लादेश में भारत के इस कानून को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखी जा रही हैं, और विरोध के निम्नलिखित कारण हैं:

मुस्लिम भावनाओं को ठेस का दावा:

बांग्लादेश में इस्लामी संगठन, जैसे इस्लामी छात्रशिबिर, इसे भारत में मुस्लिमों के खिलाफ कानून मानते हैं। उनका कहना है कि वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिमों को शामिल करना और सरकारी हस्तक्षेप बढ़ाना वक्फ की धार्मिक पवित्रता को नुकसान पहुंचाता है। ढाका में मानव शृंखला बनाकर इसका विरोध किया गया।

क्षेत्रीय धार्मिक एकजुटता:

बांग्लादेश में कुछ समूह इसे भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न के प्रतीक के रूप में देखते हैं। इसे लेकर सोशल मीडिया और स्थानीय प्रेस में भारत सरकार की आलोचना की जा रही है, जिससे वहां के धार्मिक संगठनों ने विरोध को हवा दी है।

राजनीतिक और कूटनीतिक संदर्भ:

बांग्लादेश में भारत के आंतरिक कानूनों पर प्रतिक्रिया असामान्य है, लेकिन वक्फ जैसे संवेदनशील धार्मिक मुद्दे पर चर्चा को कुछ संगठन भारत-बांग्लादेश संबंधों में तनाव बढ़ाने के अवसर के रूप में देखते हैं। यह विरोध वहां की इस्लामी पार्टियों और संगठनों द्वारा भारत के खिलाफ भावनाएं भड़काने का प्रयास भी हो सकता है।

गलत सूचना और प्रचार:

बांग्लादेश में कुछ समूहों ने बिल को गलत तरीके से पेश किया है, जैसे कि यह मस्जिदों और वक्फ संपत्तियों को खत्म करने वाला कानून है। इससे वहां के लोगों में भ्रामक धारणा बनी, जिसने विरोध को बढ़ावा दिया।

पश्चिम बंगाल में विरोध मुख्य रूप से स्थानीय राजनीति, मुस्लिम वोट बैंक और वक्फ संपत्तियों पर संभावित प्रभाव के डर से जुड़ा है, जिसे ममता बनर्जी ने और तेज किया है। बांग्लादेश में यह विरोध धार्मिक भावनाओं, क्षेत्रीय एकजुटता और भारत विरोधी प्रचार से प्रेरित है। दोनों जगह इसे मुस्लिम अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता पर हमले के रूप में देखा जा रहा है, हालांकि भारत सरकार का कहना है कि यह सुधार पारदर्शिता और समावेशिता के लिए हैं।

लेखक नवप्रवाह उत्तर प्रदेश के ब्यूरो चीफ हैं।

योगी और मोदी सरकार के ड्रीम प्रोजेक्ट की उड़ी धज्जियां

अनुज हनुमत | navpravah.com 

उत्तर प्रदेश | बुंदेलखंड में हर घर को पानीयुक्त बनाने के लिए शुरू किया गया जल जीवन मिशन फिलहाल पाठा क्षेत्र में फेल होता नजर आ रहा है। चित्रकूट में ‘हर घर नल से जल’ देने की योजना में सरकार ने करोड़ों रुपये खर्च किए, लेकिन लोगों को पानी नहीं मिल पा रहा। यह समस्या किसी एक गांव की नहीं है, अधिकतर गांवों की है। चित्रकूट जिले के कई गांवों में पाइपलाइन का काम अधूरा है। अधिकारी अपनी कमी छुपाने के लिए कागजों में काम पूरा कर दिए हैं, लेकिन अभी कई गांवों में सड़क मरम्मत का काम और टोंटी लगाना बाकी है। अधिकांश गांवों में जहां टोंटियां लगी हैं वहां पानी नहीं आ रहा है। सबसे ज्यादा समस्या ऊंचाई वाले इलाकों में सामने आ रही है।

चित्रकूट में जल जीवन मिशन का हाल:

करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद लोग एक किमी दूर हैंडपंप और कुओं से पानी ला रहे हैं। चित्रकूट जिले में लोगों को पानी आसानी से मिल सके, इसके लिए करोड़ों रुपये खर्च कर दिए लेकिन लोगों को पानी नहीं मिल रहा है।

संकट से जूझ रहे लोग:

चित्रकूट जिले के मानिकपुर तहसील क्षेत्र के निही गांव पहुंचकर नवप्रवाह न्यूज़ नेटवर्क की टीम ने ग्राउंड रियल्टी जानी, जिसमें चौंकाने वाले परिणाम सामने आए। निही पंचायत के आदिवासी मजरे सहित औदर पुरवा सहित कई मजरों में पाइपलाइन तो महीनों पहले बिछा दी गई है, लेकिन पानी का इंतजार ग्रामीणों को आज तक है। कई पंचायतों में काम आधा-अधूरा हुआ है। पाठा क्षेत्र का तापमान 40° के पास पहुंच गया है। लोग जल संकट से जूझ रहे हैं। ग्रामीण साइकिल पर कंटेनर लादकर पानी के लिए दौड़ लगाते दिख जाते हैं। हैंडपंपों एवं कुओं से ग्रामीण अभी भी पानी लाने को मजबूर हैं। ग्रामीणों का कहना है कि पानी की टंकी बनाने और पाइप लाइन बिछाने के काम में करोड़ों रुपये खर्च कर दिए गए, बावजूद इसके जल संकट से छुटकारा नहीं मिल रहा है। हम गरीब हैं क्या इसीलिए अब तक पानी की सप्लाई नहीं शुरू की गई है, जबकि आस पास के कई गांवों में पानी सप्लाई जारी है।

पानी की तरह बहाया पैसा:

कुछ ऐसा ही हाल निहि पंचायत के औदर पुरवा की है। सरकार ने यहां पानी की तरह पैसा बहाया, फिर भी लोगों की प्यास नहीं बुझ पाई। हजारों लोगों की आबादी वाले इस गांव में सरकारी पाइपलाइन महीनों पहले बिछाई गई है, टंकियां बनाई गईं, लेकिन गांव में पानी की एक बूंद तक नहीं आई। गांव में कुछ जगहों पर हैंडपंप हैं, जिसका पानी खारा आ रहा है और कुछ हैंडपंपों में जुगाड से पानी निकाला जा रहा ।

गांव के ग्रामीण ने बताया कि पानी की स्थित फिलहाल खराब है। पाइपलाइन बिछा दी गई है, लेकिन अब तक पानी नहीं आया । कई घरों में अभी कनेक्शन भी नहीं हुआ है।

 

(अनुज हनुमत, उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ एवं स्वभाव से क्रांतिकारी पत्रकार हैं।) 

योग: आत्मबोध से समाधि तक की यात्रा – भारतीय योग संस्थान का प्रेरणादायक प्रयास

नई दिल्ली | navpravah.com 

नृपेंद्र कुमार मौर्य| 10 अप्रैल को दिल्ली में मुखर्जीनगर के सेंट्रल पार्क में भारतीय योग संस्थान द्वारा आयोजित योग स्थापना दिवस समारोह में मनाया गया। यह केवल एक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि योग के गूढ़ रहस्यों को जानने और अनुभव करने का एक सजीव अवसर था। मुख्य वक्ता श्री शर्मा के विचार, उनका आत्मसात किया गया ज्ञान, और मंच पर उनके शब्दों में बहती हुई साधना ने मन को भीतर तक स्पर्श किया।

श्री शर्मा ने अपने वक्तव्य में एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात कही – “योग का अंतिम चरण समाधि है, जिसे पाना अत्यंत कठिन है।” यह कथन केवल ज्ञान का बोध नहीं कराता, बल्कि यह भी इंगित करता है कि योग केवल शारीरिक मुद्राओं या प्राणायाम तक सीमित नहीं है; यह एक संपूर्ण जीवन पद्धति है, जो आत्मा को परमात्मा से जोड़ने की प्रक्रिया है।

योग: केवल व्यायाम नहीं, बल्कि जीवन का विज्ञान

आज योग को अक्सर फिटनेस से जोड़ा जाता है – शरीर को लचीला बनाना, वजन घटाना या मानसिक तनाव को कम करना। ये सब योग के लाभ हैं, परंतु योग का वास्तविक उद्देश्य कहीं गहरा है। पतंजलि के अष्टांग योग में वर्णित आठ अंग – यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि – जीवन के प्रत्येक स्तर को संतुलित करने के लिए बनाए गए हैं।

यम और नियम – हमें आचरण और अनुशासन का पाठ पढ़ाते हैं। ये सामाजिक और व्यक्तिगत मर्यादाओं की स्थापना करते हैं।

आसन – शरीर को स्वस्थ और स्थिर रखने का माध्यम हैं ताकि मन एकाग्र रह सके।

प्राणायाम – श्वास के माध्यम से जीवन ऊर्जा को संतुलित करना सिखाता है।

प्रत्याहार – इंद्रियों को बाहरी विषयों से हटाकर भीतर की ओर मोड़ता है।

धारणा और ध्यान – मन को एक बिंदु पर केंद्रित करना सिखाते हैं, जो अंततः समाधि की ओर ले जाते हैं।

समाधि: आत्मा की परम शांति

शर्मा जी के अनुसार, समाधि की अवस्था वह बिंदु है जहाँ साधक अपने ‘स्व’ से विलीन हो जाता है – जहाँ न कोई विचार रहता है, न कोई इच्छा। यह अवस्था केवल निरंतर साधना, संयम और समर्पण से प्राप्त होती है। आज के व्यस्त और तनावग्रस्त जीवन में यह मार्ग कठिन अवश्य है, पर असंभव नहीं।

भारतीय योग संस्थान का योगदान

इस आयोजन ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय योग संस्थान केवल एक संस्था नहीं, बल्कि एक जन-आंदोलन है। देशभर में 4700 से अधिक केंद्रों के माध्यम से यह संस्था योग की प्राचीन परंपरा को जन-जन तक पहुँचा रही है। कार्यक्रम के दौरान आयुर्वेदिक दवाओं और योग मंजूरी का वितरण यह दर्शाता है कि यह प्रयास केवल शारीरिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन के सम्पूर्ण कल्याण की ओर अग्रसर है।

योग: समय की पुकार

आज के यांत्रिक युग में जब व्यक्ति भागदौड़ और तनाव की दुनिया में जी रहा है, योग जीवन की दिशा और दशा दोनों को परिवर्तित करने का सामर्थ्य रखता है। यह हमें हमारे मूल स्वभाव – शांति, सहिष्णुता और आत्मबोध – की ओर लौटने का मार्ग दिखाता है।

योग केवल 21 जून या किसी विशेष दिवस तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसे जीवन की दैनिक साधना बनाना होगा – तभी हम व्यक्तिगत और सामाजिक रूप से एक समरस, सशक्त और संतुलित समाज की स्थापना कर सकेंगे।

योग कोई ‘ट्रेंड’ नहीं, यह भारत की आत्मा है। यह एक ऐसा विज्ञान है जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना सहस्रों वर्ष पूर्व था। भारतीय योग संस्थान और अन्य संस्थाएं इस चेतना को जागृत रखने में जो कार्य कर रही हैं, वह निस्संदेह प्रशंसनीय है। आइए, हम भी इस ज्ञान को अपनाएँ – न केवल अपने लिए, बल्कि एक बेहतर समाज और संतुलित विश्व के लिए।

बिहार: सहरसा के जिस मंदिर में कन्हैया ने दिया भाषण, उसके परिसर को गाँव वालों ने गंगाजल से धोया

नीतीश मिश्र | navpravah.com

नई दिल्ली | “पलायन रोको, नौकरी दो” को लेकर कांग्रेस नेता एवं जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार बिहार में पदयात्रा कर रहे हैं। बीते मंगलवार (25 मार्च, 2025) की देर रात वे सहरसा के बनगांव पहुंचे थे। बनगांव स्थित भगवती स्थान दुर्गा मंदिर के प्रांगण में उन्होंने एक सभा को संबोधित किया, जहां स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने पारंपरिक पाग, चादर और माला पहनाकर कन्हैया कुमार का स्वागत किया। जब गांव के कुछ युवकों को यह पता चला तो अगले दिन (बुधवार) उन्होंने न सिर्फ भाषण स्थल को बल्कि पूरे मंदिर प्रांगण को गंगाजल से धोया।

नगर पंचायत बनगांव वार्ड पार्षद प्रतिनिधि अमित चौधरी की अगुआई में विष्णु, माखन, आनंद, सूरज, सरोज और बादल नाम के युवकों ने कांग्रेस नेता कन्हैया कुमार द्वारा देश के खिलाफ की गई विवादित टिप्पणी के चलते ऐसा किया। इन युवाओं ने कहा कि कन्हैया कुमार पर देशद्रोह का आरोप लग चुका है। वे लगातार देश और धार्मिक मुद्दों को लेकर विवादित बयान देते रहते हैं।

वहीं वार्ड पार्षद अमित चौधरी ने कहा कि जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष एवं कांग्रेस नेता कन्हैया कुमार ने देश विरोधी नारे लगाकर भारत के संप्रभुता और संस्कृति का अपमान किया। उनके द्वारा मंगलवार की रात बनगांव में भगवती स्थान परिसर में सभा को संबोधित किया गया। जबकि भगवती स्थान बनगांव धार्मिक आस्था का प्रतीक है, हम सभी इसे पवित्र बनाए रखना चाहते हैं। इस घटनाक्रम के बाद चुनावी हलचल काफी तेज हो गई हैं और यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गया है।

कन्हैया कुमार ने कोसी प्राधिकार, मखाना किसानों, मधुबनी पेंटिंग कलाकारों एवं शिक्षा के अभाव का मुद्दा कन्हैया ने कहा कि मंडन मिश्र की गौरवशाली धरती का वर्तमान इतना विकट क्यों है। इस पर विचार करने की आवश्यकता है।कन्हैया कुमार ने कहा कि एकतरफ लोग बाढ़ से परेशान हैं, दूसरी तरफ बाढ़ के कारण आधारभूत संरचनाओं का विकास नहीं हो रहा है। खासकर शिक्षा की सुविधा का बेहद अभाव है। प्राधिकार के प्रावधान के अनुसार पीड़ित लोगों को कोई सुविधा नहीं मिल रही है।

कन्हैया ने कहा कि दुनिया का 90 प्रतिशत मखाना उत्पादन करने वाले इस क्षेत्र के मखाना किसानों को कोई लाभ नहीं मिल रहा है। फलस्वरूप यह सुपर फूड तो बना, परंतु इसका लाभ किसान के बदले बिचौलिया ले रहे हैं। यही हाल मधुबनी पेंटिग्स का है। उन्होंने कहा कि हमारी कोशिश है कि यात्रा के क्रम में बिहार के इन मुद्दों को उठा सकें।

कन्हैया कुमार ने कहा कि सहरसा शहर के बीच में ही रेलवे फाटक है, जिसके कारण दिनभर जाम की समस्या रहती है। पता चला कि आरओबी के लिए कई बार शिलान्यास भी हुआ, लेकिन दरभंगा एम्स की तरह बनने से पहले वाहवाही की होड़ लगी हुई है।

राजनीति में जो नाकारात्मक विमर्श की प्रवृति बढ़ रही है, उसे साकारात्मक बनाने की जरूरत है। हमारा प्रयास है कि हर दल, गठबंधन के लोग पलायन की समस्या रोकने के लिए एजेंडा बनाए।

कुछ स्थानीय ग्रामीणों का यह भी कहना हैं कि जिस जेएनयू में इसके वामी भाई बंधु “ब्राह्मणवाद से आजादी” के नारे लगाते नहीं थकते हैं, वह ब्राह्मणों का हितैषी कैसे हो सकता हैं ?

पिता सैफ को लेकर सारा अली ख़ान ने दिया चौंकाने वाला बयान

न्यूज़ डेस्क | navpravah.com

नई दिल्ली | बॉलीवुड अभिनेत्री सारा अली खान ने हाल ही में अपने पिता सैफ अली खान पर हुए हमले को लेकर अपनी पहली प्रतिक्रिया साझा की। टाइम्स नाउ समिट 2025 में, जहां वे ‘बॉलीवुड की सीमाओं को पार करने’ पर चर्चा कर रही थीं, वहीं उन्होंने इस चौंकाने वाली घटना पर खुलकर बात की।

सारा ने कहा, “मैं पूरी तरह से सुन्न हो गई थी। मुझे ज्यादा कुछ याद नहीं, बस बिलकुल थम सी गई मानो। समझ नहीं आ रहा था कि हो क्या रहा है। शुक्र है कि स्थिति गंभीर नहीं थी। अस्पताल पहुंचने से लेकर अपडेट मिलने तक के 15-20 मिनट बहुत कठिन थे, लेकिन राहत जल्दी ही मिल गई।”

जब सैफ के अस्पताल से मुस्कुराते हुए बाहर आने और उनके दर्द छिपाने के बारे में पूछा गया, तो सारा ने कहा, “यह उनके स्वभाव और एक पिता की भूमिका का हिस्सा है। चार बच्चों के पिता होने के नाते, खासकर छोटे बच्चों के लिए, उन्हें यह दिखाना था कि वे ठीक हैं। वे हमेशा से लड़ाकू स्वभाव के रहे हैं और कभी हार नहीं मानते। हमारे काम की भी यही सच्चाई है—कई बार हमें हिम्मत दिखाकर कहना पड़ता है, ‘मैं ठीक हूं।’”

अपने पिता की शांत स्वभाव की सराहना करते हुए सारा ने स्वीकार किया, “वह तनावपूर्ण परिस्थितियों में मुझसे कहीं बेहतर हैं। मैं पहले घबराती हूं, फिर स्तब्ध रह जाती हूं और फिर रो पड़ती हूं, लेकिन पापा हमेशा शांत रहते हैं और यही चीज़ मुझे उनसे सीखनी है।”

पंजाब के भूले-बिसरे पहलुओं को सामने लाने की कोशिश है यह फ़िल्म – करन सिंह मान

नृपेंद्र कुमार मौर्य | navpravah.com 

चंडीगढ़: पंजाब की धरती, अपनी संस्कृति और लोकजीवन के लिए प्रसिद्ध रही है, लेकिन इसके कुछ गांव समय के साथ अंधकार में खो गए हैं। उन्हीं में से एक गांव को केंद्र में रखकर निर्देशक करन सिंह मान अपनी आगामी फिल्म ‘इक पिंड पंजाब दा’ लेकर आ रहे हैं। यह फिल्म पंजाब की ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधारित होगी, जिसमें हास्य और सामाजिक संदेश का अनूठा संगम देखने को मिलेगा।

यह फिल्म एक ऐसे गांव की कहानी है, जो विकास की दौड़ में पिछड़ चुका है। लेकिन पंजाब की संस्कृति और परंपराएं इसे विशिष्ट बनाती हैं। करन सिंह मान ने फिल्म की पटकथा खुद लिखी है और इसे बड़े ही मनोरंजक अंदाज में प्रस्तुत किया जाएगा, जिससे दर्शक हंसते-हंसते गहरे सामाजिक मुद्दों से रूबरू होंगे।

मार्च से शुरू हुई शूटिंग, सितंबर में होगी रिलीज-

फिल्म की शूटिंग मार्च 2025 के अंत में शुरू होगी और इसे इस साल सितंबर तक सिनेमा घरों में रिलीज करने की योजना है। करन सिंह मान ने बताया कि यह फिल्म उनके करियर के लिए एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगी। उन्हें इस प्रोजेक्ट से बहुत उम्मीदें हैं और वे मानते हैं कि यह फिल्म पंजाबी सिनेमा को नई ऊंचाइयों तक ले जाने में मदद करेगी।

फिल्म का बजट लगभग 3.5 करोड़ रुपये रखा गया है, जो कि पंजाबी फिल्म इंडस्ट्री के लिए एक अच्छी-खासी रकम मानी जाती है। इस प्रोजेक्ट में तीन प्रमुख निर्माता राजेश मँजानियाँ, माणिक बब्बर और गुरविंदर सिंह शामिल हैं, जो इसे भव्य रूप देने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।

दूरदर्शन पंजाब के पुराने सितारे लगाएंगे चार चांद-

फिल्म की एक खास बात यह भी है कि इसमें पंजाब के पुराने दूरदर्शन कलाकारों को फिर से बड़े पर्दे पर लाने की कोशिश की गई है। करन सिंह मान ने बताया कि उन्होंने एक ऐसा कलाकारों का गुलदस्ता तैयार किया है, जो इस फिल्म में अपने अभिनय से दर्शकों को बांधकर रखेगा।

पंजाबी फिल्म इंडस्ट्री में कॉमेडी का हमेशा से एक अलग स्थान रहा है, और ‘इक पिंड पंजाब दा’ भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाएगी। हालांकि, यह केवल हास्य तक सीमित नहीं होगी, बल्कि इसमें पंजाब की संस्कृति, जीवनशैली, और ग्रामीण समाज के जमीनी हकीकत को भी दिखाया जाएगा।

क्रिएटिव प्रोड्यूसर अमित द्विवेदी देंगे फिल्म को नया दृष्टिकोण-

इस फिल्म को एक अलग आयाम देने के लिए क्रिएटिव प्रोड्यूसर के रूप में अमित द्विवेदी को शामिल किया गया है। उनके अनुभव और दृष्टिकोण से यह फिल्म सिर्फ मनोरंजन तक सीमित न रहकर दर्शकों को सोचने पर मजबूर करेगी।

करन सिंह मान ने ‘नवप्रवाह’ से बातचीत में बताया, “मुझे हमेशा से पंजाब की मिट्टी से जुड़ी कहानियां कहने का शौक रहा है। ‘एक पिंड पंजाब दा’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि पंजाब के भूले-बिसरे पहलुओं को सामने लाने का एक जरिया है। हमने इस फिल्म को पूरी शिद्दत से बनाया है और हमें उम्मीद है कि दर्शकों को यह बेहद पसंद आएगी।”

पंजाबी फिल्म इंडस्ट्री के लिए एक नई उम्मीद-

पंजाबी सिनेमा में पिछले कुछ वर्षों में कई उल्लेखनीय फिल्में बनी हैं, लेकिन अधिकतर फिल्में शहरी पृष्ठभूमि या संगीत-प्रधान कहानियों पर केंद्रित रही हैं। ‘इक पिंड पंजाब दा’ एक नई दिशा में कदम रख रही है, जहां गांव की अनकही दास्तानों को एक रोचक तरीके से पेश किया जाएगा।

फिल्म में गांव के पात्रों को उनकी वास्तविकता के साथ दिखाने का प्रयास किया गया है, जिससे दर्शक खुद को इस कहानी से जोड़ सकें। यह फिल्म एक तरफ दर्शकों को हंसी का तगड़ा डोज देगी, तो दूसरी ओर ग्रामीण समाज की कुछ गहरी समस्याओं को भी उजागर करेगी।

सितंबर में देखिए एक अनूठी कहानी-

फिल्म से जुड़े सभी कलाकार और निर्माता इसे लेकर बेहद उत्साहित हैं। अगर आप पंजाब की संस्कृति और हास्य से भरपूर एक शानदार कहानी देखना चाहते हैं, तो यह फिल्म आपके लिए बेहतरीन साबित हो सकती है।

फिल्म ‘इक पिंड पंजाब दा’ सितंबर 2025 में सिनेमाघरों में दस्तक देगी। यह फिल्म पंजाबी सिनेमा में एक नए बदलाव की बयार लाने का वादा कर रही है। अब देखना यह होगा कि क्या यह फिल्म समाज में कितना बदलाव ला पाती है।

UP: प्रदेश के इतिहास का सबसे बड़ा बजट, जानिए, किसको क्या मिला

अनुज हनुमत | navpravah.com
लखनऊ | यूपी विधानसभा में योगी सरकार के वित्त मंत्री सुरेश खन्ना बजट पेश कर रहे हैं। बजट पढ़ने से पहले उन्होंने एक मशहूर शेर सुनाया और फिर सरकार के दौरान अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में हुए विकास का उन्होंने जिक्र किया। सुरेश खन्ना ने कहा कि यूपी देश का ग्रोथ इंजन बन रहा है। यूपी के प्रोडक्ट विदेश पहुंच रहे हैं। इसके अलावा सुरेश खन्ना ने रामचरितमानस की चौपाई भी सुनाई।
बजट पेश करने से पहले वित्त मंत्री सुरेश खन्ना ने पूजा-अर्चना की और फिर मीडिया से बातचीत की। सुरेश खन्ना ने बताया कि यह बजट महिलाओं, किसानों और युवाओं का बजट है। बता दें कि इस बार 8 लाख करोड़ रुपये का बजट पेश हो सकता है।
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार गुरुवार को विधानसभा में बजट पेश करेगी। एक अनुमान के मुताबिक इस बार का बजट आठ लाख करोड़ रुपये का हो सकता है। जानकारों के अनुसार इस बार बजट में लोक-लुभावन घोषणाएं हो सकती हैं। वित्तमंत्री सुरेश खन्ना बजट पेश करेंगे। इस बजट में विकास के योगी मॉडल की छाप दिखेगी। मध्यवर्ग, युवा, किसान और महिलाएं बजट के फोकस में होंगी। ऐसा माना जा रहा है कि 2027 के चुनावों की छाप इस बजट में दिख सकती है। इस बजट में कृषि, उद्योग और बुनियादी विकास के साथ इस बजट में तकनीकी पर जोर रहेगा। स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए नई घोषणाएं हो सकती हैं।
सुरेश खन्ना ने कहा कि इस वर्ष परम पावन तीर्थनगरी प्रयागराज में महाकुम्भ-2025 का भव्य आयोजन हो रहा है। हम सभी जानते हैं कि महाकुम्भ 144 वर्षों में आता है। यह हम सभी के लिये ही नहीं अपितु सम्पूर्ण भारत देश और पूरे विश्व के लिये परम सौभाग्य का विषय है कि हम अपने जीवनकाल में आस्था, संस्कृति और मानवता के समागम के इस महापर्व के भागी बन सके। कुम्भ का वर्णन ऋग्वेद एवं अथर्ववेद में मिलता है। यह भारत की प्राचीन सांस्कृतिक एवं धार्मिक अक्षुण्णता का परिचायक है। कुम्भ मात्र एक धार्मिक, सांस्कृतिक मेला ही नही है, यह एक दुर्लभ खगोलीय घटना भी है। प्रयागराज में आयोजित होने वाले कुम्भ के विषय में पुराणों का यह श्लोक मैं पढ़ना चाहूँगाः
“मेष राशिगते जीवे मकरे चन्द्रभास्करौ।
अमावस्या तदा योगः कुम्भख्यस्तीर्थ नायके ।।”
अर्थात बृहस्पति मेष राशि में तथा चन्द्र और सूर्य मकर राशि में जब आते हैं और अमावस्या तिथि हो तो तीर्थो के नायक प्रयाग में कुम्भयोग होता है।
वित्त मंत्री ने बताया कि केन्द्र सरकार द्वारा वर्ष 2025-2026 में यूजी, पीजी हेतु कुल 10,000 सीटें जोड़े जाने की घोषणा की गई है, जिसमें से 1500 सीटें उत्तर प्रदेश को प्राप्त होंगी। इस हेतु लगभग 2066 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है। वर्ष 2017 में सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सुपर स्पेशियलिटी की कुल सीटों की संख्या 120 थीं। शैक्षणिक सत्र 2024-2025 में सीटों की संख्या को बढ़ाकर 250 किया गया। बलिया तथा बलरामपुर में स्वशासी राज्य चिकित्सा महाविद्यालय की स्थापना हेतु क्रमशः 27 करोड़ रुपये तथा 25 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है।
वहीं आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजनान्तर्गत 5.13 करोड़ लोगों के आयुष्मान कार्ड बनाये गये हैं। आयुष्मान कार्ड बनाने में पूरे देश में उत्तर प्रदेश प्रथम स्थान पर है। प्राथमिक स्वास्थ्य इकाईयों को आयुष्मान आरोग्य मन्दिर के रूप में उच्चीकृत किया जा रहा है। वर्तमान में कुल 22,681 आयुष्मान आरोग्य मन्दिर स्थापित है। उप केन्द्रों से टेलीकन्सलटेशन प्रारम्भ कर ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधायें उपलब्ध कराने का आरम्भ जुलाई, 2020 से किया गया है। प्रदेश में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन द्वारा पोषित पीपीपी मोड पर निःशुल्क डायलिसिस सेवाएं उपलब्ध करायी जा रही हैं। प्रदेश में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन द्वारा पीपीपी मोड पर जनपदीय चिकित्सालयों में सीटी स्कैन की निःशुल्क सेवा उपलब्ध करायी जा रही है।
वित्त मंत्री सुरेश खन्ना ने कहा कि आठ वर्ष पहले प्रत्येक वर्ष प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में संक्रामक रोगों से बड़े पैमाने पर मौतें हुआ करती थीं। उस दौरान प्रदेश में रोगों की पहचान, रोकथाम और इलाज की व्यवस्थाएं जनमामान्य को उपलबध नहीं थीं। वहीं योगी सरकार ने कोविड वैश्विक बीमारी के दौरान प्रदेश में जिस कुशलता के साथ इस विभीषिका का सामना किया गया, उसकी प्रशंसा विश्व स्तर पर की गई। आज प्रदेश में चिकित्सा सुविधाओं का प्रसार जिस प्रकार हुआ है और लगातार हो रहा है, वह अदभुत है।
उन्होंने बताया कि वर्तमान में प्रदेश में 80 मेडिकल कॉलेज हैं, जिनमें 44 राज्य सरकार द्वारा संचालित हैं एवं 36 निजी क्षेत्र में हैं। प्रदेश में 2 एम्स एवं आईएमएस, बीएचयू, वाराणसी तथा जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज, अलीगढ़ संचालित हैं। वर्ष 2024-2025 में 13 स्वाशासी चिकित्सा महाविद्यालय एवं पीपीपी मोड पर 3 जनपदों-महाराजगंज, सम्भल तथा शामली में नवीन मेडिकल कॉलेज स्थापित किये गये हैं। वर्तमान में प्रदेश में राजकीय एवं निजी क्षेत्र के मेडिकल महाविद्यालयों/चिकित्सा संस्थानों/ विश्वविद्यालयों में एमबीबीएस की 11,800 सीटें तथा पीजी की 3971 सीटें उपलब्ध हैं।
समाज कल्याण में क्या है खास? 
समाज कल्याण-
● वृद्धावस्था/किसान पेंशन योजना के अन्तर्गत प्रति लाभार्थी 1000 रुपये प्रतिमाह पेंशन दी जा रही है। इस हेतु लगभग 8105 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है।
● सभी वर्गों की पुत्रियों के विवाह हेतु अनुदान की मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना हेतु 550 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है।
● अनुसूचित जाति के निर्धन व्यक्तियों की पुत्रियों की शादी अनुदान योजना हेतु 100 करोड़ रूपये तथा सामान्य वर्ग के निर्धन व्यक्तियों की पुत्रियों की शादी योजना हेतु 50 करोड़ रूपये की व्यवस्था प्रस्तावित है।
● वृद्ध एवं अशक्त व्यक्तियों के लिये आवासीय गृह संचालित करने हेतु स्वैच्छिक संस्थाओं को सहायता प्रदान किये जाने हेतु 60 करोड़ रुपये की धनराशि प्रस्तावित है।
● अनुसूचित जाति पूर्वदशम एवं दशमोत्तर छात्रवृत्ति योजना हेतु लगभग 968 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है।
● सामान्य वर्ग पूर्वदशम एवं दशमोत्तर छात्रवृत्ति योजनान्तर्गत 900 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है।
जनजाति विकास-
● अनुसूचित जनजाति के छात्र/छात्राओं को पूर्वदशम एवं दशमोत्तर छात्रवृत्ति योजना हेतु लगभग 6 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है।
● प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय महाअभियान “पीएम- जनमन” के अन्तर्गत विशेष रूप से कमजोर जन जातीय समूहों का समग्र विकास किया जाना है।
● धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान का शुभारम्भ माननीय प्रधानमंत्री जी द्वारा दिनाँक 02 अक्टूबर, 2024 को किया गया है।
● योजना का उद्देश्य देशभर में 63,000 से अधिक जनजातीय बाहुल्य ग्रामों तथा आकांक्षी जनपदों के जनजातीय ग्रामों को 18 विभागों के कार्यक्रमों से संतृप्त किया जाना है।
प्रधानमंत्री आवास योजना के लिए 4882 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित-
महात्मा गाँधी नरेगा योजनान्तर्गत वित्तीय वर्ष 2025-2026 हेतु 34 करोड़ मानव दिवस का सृजन किये जाने का लक्ष्य अनुमानित है, जिसके सापेक्ष 5372 करोड रूपये की व्यवस्था प्रस्तावित है। प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के अन्तर्गत 36 लाख से अधिक आवासों का निर्माण कराया जा चुका है। योजना हेतु लगभग 4882 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है। मुख्यमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) हेतु 1200 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अन्तर्गत निर्मित सड़कों के अनुरक्षण कार्य हेतु 1088 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है। दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना हेतु 427 करोड़ रुपये का व्यय अनुमान प्रस्तावित है। उक्त योजनान्तर्गत युवाओं को प्रशिक्षण प्रदान करने के उपरान्त नियोजित किया जा सकेगा।
बजट का आकार 08 लाख 08 हजार 736 करोड़ 06 लाख रुपए-
सुरेश खन्ना ने कहा कि वित्तीय वर्ष 2025-2026 के बजट में सम्मिलित प्रमुख योजनाओं का ब्यौरा प्रस्तुत करने के पूर्व में, बजट की संक्षिप्त रूपरेखा इस सम्मानित सदन के समक्ष रखना चाहूंगा। प्रस्तुत बजट का आकार 08 लाख 08 हजार 736 करोड़ 06 लाख रुपये है, जो वर्ष 2024-2025 के बजट से 9.8 प्रतिशत अधिक है। बजट में पूँजीगत परिव्यय कुल बजट का लगभग 20.5 प्रतिशत है। पूंजीगत परिव्यय के अन्तर्गत अवसंरचना निर्माण, विस्तार और निवेश संबंधी व्यय आते हैं। उद्योग, आवागमन, उत्पादों की बाजार तक पहुंच तथा प्रदेश में पूँजी निवेश को आकर्षित करने जैसे महत्वपूर्ण गतिविधियों में पूंजीगत व्यय की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण होती है। इस बजट में अवस्थापना विकास हेतु 22 प्रतिशत, शिक्षा हेतु 13 प्रतिशत, कृषि और सम्बद्ध सेवाओं हेतु 11 प्रतिशत, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में 6 प्रतिशत, सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों हेतु 4 प्रतिशत एवं संसाधन आवंटित किये गये हैं। हमने बजट में शोध एवं विकास तथा सूचना प्रौद्योगिकी पर भी ध्यान दिया है। विधान सभा को आधुनिक आई०टी० सिस्टम्स से लैस करने के लिये बजट में विशेष रूप से व्यवस्था प्रस्तावित की गई है। यह प्रक्रिया आगे भी चलती रहेगी।

यूपी में चार नए एक्सप्रेस-वे का निर्माण-

राज्य सरकार ने यूपी में चार नए एक्सप्रेस-वे के निर्माण का फैसला लिया है।
आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे से गंगा एक्सप्रेस-वे कौसिया, जनपद हरदोई वाया फर्रुखाबाद तक प्रवेश नियंत्रित ग्रीन फील्ड एक्सप्रेस-वे का निर्माण कराया जाएगा, जिसके लिये 900 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है।
गंगा एक्सप्रेस-वे को प्रयागराज, मिर्जापुर, वाराणसी, चंदौली होते हुए सोनभद्र से जोड़ने के लिए विन्ध्य एक्सप्रेस-वे के निर्माण के लिएं 50 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है।
मेरठ को हरिद्वार से जोड़ने हेतु गंगा एक्सप्रेस-वे विस्तारीकरण एक्सप्रेस-वे का निर्माण प्रस्तावित है जिसके लिए 50 करोड़ रुपये की व्यवस्था कराई जा रही है।
बुन्देलखण्ड रीवा एक्सप्रेस-वे का निर्माण निर्माण प्रस्तावित है जिसके लिए 50 करोड़ रुपये की व्यवस्था कराई जा रही है।

बुंदेलखंड एक्सप्रेस-वे के साथ डिफेंस इण्डस्ट्रियल कॉरीडोर परियोजना हेतु लगभग 461 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है। इसके अन्तर्गत लगभग साढ़े नौ हजार करोड़ रुपये का निवेश अनुमानित है।

बजट मे शिक्षा पर जोर-

हायर एजुकेशन से छात्राओं को लाभ मिलेगा

शिक्षा के लिए 13 प्रतिशत बजट

बलिया, बलरामपुर को बड़ा तोहफा- राजकीय मेडिकल कॉलेज बनाने का ऐलान

साइबर सिक्यॉरिटी में नई पहल-

AI सिटी की स्थापना का ऐलान

टेक्नो रिसर्च ट्रांसलेशन पार्क की स्थापना का ऐलान

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का आह्वान: ‘भव्य भवन के अनुरूप संघ कार्य को बनाना होगा भव्य’

नृपेन्द्र कुमार मौर्य| Navpravah.com

नई दिल्ली|  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने झंडेवालान में पुनर्निर्मित ‘केशव कुंज’ के प्रवेशोत्सव कार्यक्रम में संघ कार्य के विस्तार और उसकी भव्यता को और भी व्यापक बनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि जैसे यह भवन भव्य है, वैसे ही संघ के कार्यों की भव्यता भी दिखनी चाहिए और इससे भारत को विश्वगुरु बनाने का लक्ष्य पूरा होगा।

संघ कार्य को सतत विस्तार देने की अपील

सरसंघचालक भागवत ने उपस्थित स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए कहा, “देश में संघ कार्य गति पकड़ रहा है और इसका विस्तार भी हो रहा है। हमें इसे और भी भव्य बनाना होगा ताकि हमारे कार्यों से इसकी अनुभूति हो सके। संघ का कार्य पूरे विश्व में फैलेगा और भारत को विश्वगुरु के पद पर आसीन करेगा, इसमें हमें पूर्ण विश्वास है। लेकिन इसके लिए संघ के स्वयंसेवकों को सतत पुरुषार्थ करना होगा।”

उन्होंने आगे कहा कि संघ के विभिन्न आयामों के माध्यम से कार्य विस्तृत हो रहा है, इसलिए प्रत्येक स्वयंसेवक के व्यवहार में सामर्थ्य और शुचिता का होना अनिवार्य है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ की दशा बदली है, लेकिन उसकी दिशा नहीं बदलनी चाहिए। भागवत ने कहा, “समृद्धि आवश्यक है, लेकिन उसे मर्यादा में रहकर अर्जित करना चाहिए। इस पुनर्निर्मित भवन की भव्यता के अनुरूप ही कार्य को भव्य बनाना होगा।”

संघ के इतिहास का उल्लेख

डॉ. भागवत ने आरएसएस के शुरुआती दौर की कठिनाइयों का भी उल्लेख किया और नागपुर के पहले कार्यालय ‘महाल’ की शुरुआत के बारे में बताया। उन्होंने कहा, “दिल्ली देश की राजधानी है और यहां से ही सूत्रों का संचालन होता है, इसलिए यहां कार्यालय की आवश्यकता महसूस हुई। यह भव्य भवन तैयार हो गया है, लेकिन मात्र इसका निर्माण ही कार्य की समाप्ति नहीं है। हमें अनुकूलता के वातावरण में भी सतर्क रहने की आवश्यकता है।”

कार्यालय के वातावरण की चिंता करना हर स्वयंसेवक का कर्तव्य

सरसंघचालक ने कहा, “कार्यालय हमें कार्य की प्रेरणा देता है, लेकिन उसके वातावरण की पवित्रता और शुचिता बनाए रखना हर स्वयंसेवक का कर्तव्य है।” उन्होंने संघ की मूल विचारधारा और अनुशासन पर जोर देते हुए कहा कि भव्य भवन में भव्य कार्य तभी संभव होंगे जब संघ के स्वयंसेवक नैतिकता और अनुशासन को सर्वोच्च प्राथमिकता देंगे।

गोविंददेव गिरी जी और अन्य संतों के आशीर्वचन

श्रीराम जन्मभूमि न्यास के कोषाध्यक्ष पूज्य गोविंददेव गिरी जी महाराज ने इस अवसर पर कहा कि यह दिन विशेष है क्योंकि यह श्री गुरुजी और छत्रपति शिवाजी की जयंती का भी दिन है। उन्होंने कहा, “शिवाजी संघ की विचार शक्ति हैं। छत्रपति शिवाजी ने ऐसे मावले तैयार किए जो थकते नहीं, रुकते नहीं, झुकते नहीं और बिकते नहीं। संघ के स्वयंसेवक भी शिवाजी के तपोनिष्ठ मावलों के समान हैं।”

उदासीन आश्रम दिल्ली के प्रमुख संत राघावानंद जी महाराज ने कहा कि संघ ने समाज के प्रति समर्पण भाव से कार्य किया है और हर वर्ग के उत्थान के लिए काम किया है। उन्होंने कहा, “संघ 100 वर्ष पूरे कर चुका है और यह डॉ. हेडगेवार के प्रखर संकल्प का परिणाम है।”

केशव कुंज का पुनर्निर्माण और उसकी विशेषताएं

श्री केशव स्मारक समिति के अध्यक्ष आलोक कुमार ने केशव कुंज के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया और इसके विभिन्न चरणों की जानकारी दी। उल्लेखनीय है कि 1939 में दिल्ली में इसी स्थान पर एक छोटा सा भवन बनाया गया था, जिसे समय-समय पर विस्तारित किया गया। 2016 में वर्तमान भवन का शिलान्यास किया गया और अब यह तीन भव्य टॉवरों के साथ तैयार है – 1. साधना, 2. प्रेरणा, और 3. अर्चना।

इसके अलावा, इसमें एक आधुनिक अशोक सिंहल सभागार, केशव पुस्तकालय, ओपीडी चिकित्सालय, साहित्य भंडार, सुरुचि प्रकाशन, 150 किलोवाट का सोलर प्लांट और 140 केएलडी क्षमता का एसटीपी प्लांट भी है। भवन में एक दिव्य हनुमान मंदिर भी स्थापित है, जो पहले की तरह ही अपनी सुंदरता और आध्यात्मिकता को संजोए हुए है।

उपस्थित गणमान्य व्यक्ति और स्वयंसेवकों का उत्साह

प्रवेशोत्सव में केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा, संघ के वरिष्ठ अधिकारी दत्तात्रेय होसबाले, डा. कृष्ण गोपाल, अरुण कुमार, सुरेश सोनी, रामलाल, नरेन्द्र ठाकुर, इंद्रेश कुमार, प्रेम गोयल, और रामेश्वर सहित अनेक वरिष्ठ स्वयंसेवक उपस्थित थे।

दिल्ली प्रांत संघचालक डॉ. अनिल अग्रवाल ने कहा, “केशव कुंज का पुनर्निर्माण केवल एक भवन का निर्माण नहीं है, बल्कि यह संघ के कार्य और विचारधारा को एक नई ऊंचाई देने का प्रयास है।” उन्होंने बताया कि इस भवन का निर्माण इस तरह किया गया है कि यह आधुनिक आवश्यकताओं को पूरा करने के साथ-साथ संघ के सांस्कृतिक और राष्ट्रवादी मूल्यों को भी प्रतिबिंबित करता है।

संघ कार्य के प्रति समर्पण का संदेश

डॉ. मोहन भागवत ने अपने संबोधन के अंत में स्वयंसेवकों को संदेश दिया कि संघ कार्य के प्रति समर्पण और पुरुषार्थ ही संघ को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा। उन्होंने कहा, “हमें अनुकूलता के वातावरण में भी जागरूक रहना होगा, क्योंकि यह समय स्वयंसेवकों के लिए और भी अधिक सतर्कता का है।”

संघ की भव्यता का प्रतीक – केशव कुंज

केशव कुंज का यह नवनिर्मित भवन संघ के विस्तार और उसकी भव्यता का प्रतीक है। यह केवल एक भवन नहीं, बल्कि संघ की विचारधारा, उसकी भव्यता और उसके विस्तार का प्रतीक है। सरसंघचालक मोहन भागवत के नेतृत्व में संघ ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि यह संगठन न केवल भारत में बल्कि विश्वभर में भारतीय संस्कृति और विचारधारा को स्थापित करने के लिए कृतसंकल्पित है।

संघ की दिशा और दशा पर विशेष जोर

डॉ. भागवत ने अपने वक्तव्य में स्पष्ट किया कि संघ की दशा बदल रही है, लेकिन दिशा नहीं बदलनी चाहिए। उन्होंने संघ कार्य को मर्यादा में रहकर करने की नसीहत दी और कहा, “हमें अपनी आखों से भारत को विश्वगुरु बनते देखना है, इसके लिए सतत पुरुषार्थ की आवश्यकता है।”

इस भव्य प्रवेशोत्सव ने संघ के भविष्य की भव्यता और इसके वैश्विक विस्तार की दिशा को और भी स्पष्ट किया है।

“दिल्ली के तख्त की जंग: 3PM फॉर्मूले में छिपा नया मुख्यमंत्री, किसके सिर सजेगा ताज?”

नृपेंद्र कुमार मौर्य| navpravah.com 

नई दिल्ली | यह एक दिलचस्प और हाई-वोल्टेज राजनीतिक ड्रामा है! दिल्ली की राजनीति में जब भी कोई बड़ा बदलाव होता है, तो पूरे देश की नजरें इस पर टिक जाती हैं। इस बार भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। मुख्यमंत्री पद के चेहरे को लेकर अटकलों का बाजार गर्म है। बीजेपी ने दिल्ली में बड़ी जीत दर्ज की है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर राजधानी की कमान किसे सौंपी जाएगी?

इस बीच एक रहस्यमय ‘3PM’ फॉर्मूला चर्चा में है। कहा जा रहा है कि नए मुख्यमंत्री का नाम इसी कोड में छिपा हुआ है। लेकिन यह 3PM फॉर्मूला आखिर है क्या? क्या वाकई इसमें सीएम के नाम का कोई इशारा छिपा है या फिर यह सिर्फ एक अफवाह है? आइए इस कोड को डिकोड करते हैं और जानते हैं कि दिल्ली की सत्ता की चाबी किसके हाथ में आ सकती है।

3PM फॉर्मूला: दिल्ली के नए मुख्यमंत्री की गूढ़ पहेली!

दिल्ली में इस बार बीजेपी ने चमत्कारिक जीत हासिल की है। आम आदमी पार्टी (AAP) के गढ़ में सेंध लगाकर उसने यह साबित कर दिया कि मोदी लहर अभी भी कायम है। लेकिन अब जब बीजेपी सत्ता में आ रही है, तो बड़ा सवाल यह है कि मुख्यमंत्री कौन बनेगा? इस बीच एक रहस्यमय ‘3PM’ फॉर्मूला सामने आया है। कहा जा रहा है कि इसी कोड में सीएम का नाम छिपा हो सकता है।

तो आखिर क्या है यह 3PM?

इस कोड में तीन ‘P’ शामिल हैं और कहा जा रहा है कि इन्हीं में से कोई एक दिल्ली का अगला मुख्यमंत्री बन सकता है। इन तीन P के पीछे तीन अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक समीकरण काम कर रहे हैं। चलिए, इस पहेली को एक-एक करके खोलते हैं।

पहला P: प्रवेश वर्मा – जाट शक्ति का परचम?

‘3PM’ के पहले ‘P’ का मतलब प्रवेश वर्मा हो सकते हैं। प्रवेश वर्मा वही शख्स हैं, जिन्होंने दिल्ली में आम आदमी पार्टी (AAP) के सबसे बड़े चेहरे अरविंद केजरीवाल को शिकस्त दी है। जाट समुदाय से ताल्लुक रखने वाले प्रवेश वर्मा को मुख्यमंत्री पद का सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा है।

प्रवेश वर्मा क्यों हो सकते हैं CM?

  1. जाट वोट बैंक – इस चुनाव में जाट समुदाय ने बीजेपी को दिल खोलकर समर्थन दिया है। जाट बहुल इलाकों में बीजेपी ने शानदार प्रदर्शन किया है।
  2. केजरीवाल को हराने का क्रेडिट – दिल्ली की राजनीति में अगर किसी ने सबसे बड़ी सेंधमारी की है, तो वह प्रवेश वर्मा ही हैं।
  3. युवाओं में लोकप्रियता – युवा नेताओं में प्रवेश वर्मा की छवि मजबूत रही है और बीजेपी इस फैक्टर को भुनाना चाहती है।

लेकिन प्रवेश वर्मा को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है?

  1. अनुभव की कमी – प्रवेश वर्मा अपेक्षाकृत युवा नेता हैं और प्रशासनिक अनुभव बहुत ज्यादा नहीं है।
  2. दिल्ली की सियासत में नई एंट्री – जाट समुदाय की मजबूत पकड़ के बावजूद प्रवेश वर्मा दिल्ली की राजनीति में ज्यादा समय से सक्रिय नहीं रहे हैं।

दूसरा P: पूर्वांचली – बिहार चुनाव की बिसात?

‘3PM’ के दूसरे P का मतलब है – पूर्वांचली समुदाय। दिल्ली में पूर्वांचलियों की आबादी काफी बड़ी है और राजनीतिक दलों के लिए यह वोट बैंक बेहद महत्वपूर्ण है। बीजेपी इस समुदाय को साधने के लिए मुख्यमंत्री पद किसी पूर्वांचली नेता को देने पर विचार कर सकती है।

पूर्वांचली चेहरे के रूप में सबसे आगे कौन है?

अभय वर्मा – पूर्वांचली समुदाय से आने वाले अभय वर्मा का नाम इस रेस में सबसे आगे चल रहा है।

अभय वर्मा क्यों हो सकते हैं CM?

  1. पूर्वांचली वोट बैंक को साधने का मौका – दिल्ली में 30-35% आबादी पूर्वांचली है, जो किसी भी चुनाव को प्रभावित कर सकती है।
  2. बिहार चुनाव की रणनीति – अगले साल बिहार में विधानसभा चुनाव हैं। अगर दिल्ली में कोई पूर्वांचली सीएम बनता है, तो इसका असर बिहार के चुनावों पर भी पड़ेगा।
  3. आप और कांग्रेस को झटका – आम आदमी पार्टी और कांग्रेस ने पूर्वांचली वोटर्स को लुभाने के लिए कई वादे किए थे, लेकिन बीजेपी ने इस बार इन वोटर्स को अपनी ओर खींच लिया।

तीसरा P: पंजाबी – AAP के दूसरे गढ़ पर हमला?

तीसरे P का मतलब पंजाबी समुदाय हो सकता है। दिल्ली में पंजाबी मूल के वोटर्स की अच्छी-खासी संख्या है। बीजेपी अगर पंजाबी नेता को सीएम बनाती है, तो इससे उसे दो बड़े फायदे हो सकते हैं –

  1. दिल्ली में पंजाबी वोटर्स को मजबूत करना
  2. पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए रणनीतिक बढ़त

इस लिस्ट में कौन सबसे आगे है?

  1. आशीष सूद – बीजेपी के मजबूत पंजाबी चेहरे के रूप में उभरे हैं।
  2. मनजिंदर सिंह सिरसा – अकाली दल से बीजेपी में आए मनजिंदर सिंह सिरसा को भी सीएम की रेस में देखा जा रहा है।

अगर बीजेपी किसी पंजाबी को सीएम नहीं भी बनाती, तो भी मंत्री पद पर पंजाबी चेहरा देना लगभग तय माना जा रहा है।

महिला कार्ड: रेखा गुप्ता की एंट्री?

इस बार महिला वोटर्स ने बीजेपी को जबरदस्त समर्थन दिया है। महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों से अधिक थी, और इस फैक्टर को देखते हुए बीजेपी महिला मुख्यमंत्री का कार्ड भी खेल सकती है।

महिला चेहरे के रूप में कौन आगे?

रेखा गुप्ता – वैश्य समाज से आने वाली रेखा गुप्ता का नाम इस दौड़ में सबसे आगे चल रहा है।

क्यों बन सकती हैं रेखा गुप्ता CM?

  1. महिला वोटर्स को साधने का बड़ा दांव – बीजेपी महिला सीएम बनाकर अपने प्रति महिलाओं के विश्वास को और मजबूत कर सकती है।
  2. व्यापारी समुदाय का समर्थन – वैश्य समाज बीजेपी का मजबूत वोट बैंक रहा है।
  3. ‘मोदी की गारंटी’ को और मजबूत करना – महिलाओं के लिए मोदी सरकार ने कई योजनाएं चलाई हैं, और महिला सीएम इस दिशा में एक और कदम हो सकता है।

तो कौन बनेगा दिल्ली का अगला मुख्यमंत्री?

बीजेपी के लिए यह फैसला आसान नहीं है। दिल्ली की राजनीति में सामाजिक समीकरणों का बड़ा असर होता है, और बीजेपी कोई भी फैसला सोच-समझकर ही लेगी। 20 फरवरी को रामलीला मैदान में शाम 4:30 बजे शपथ ग्रहण समारोह होने वाला है, लेकिन उससे पहले सस्पेंस बना हुआ है।

तो क्या 3PM फॉर्मूला से ही निकलेगा नया मुख्यमंत्री? या फिर बीजेपी कोई चौकाने वाला नाम लेकर आएगी?

अब सबकी नजरें 20 फरवरी पर टिकी हैं!