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Monday, September 7, 2026
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उपराष्ट्रपति चुनाव: संजय राउत के बयान से एक बार फिर मची खलबली

न्यूज़ डेस्क | navpravah.com

नई दिल्ली | शिवसेना उद्धव गुट के सांसद संजय राउत ने बड़ा दावा किया है। उन्होंने कहा कि राजग चुनाव जीतने के लिए आंकड़े को लेकर आश्वस्त नहीं है, इसलिए वे विपक्षी दलों से संपर्क कर रहे हैं। राउत ने सवाल उठाया कि जब आपके पास बहुमत है, तो आपको विपक्ष के समर्थन की जरूरत क्यों पड़ रही है।

चार अगस्त को भारत के उपराष्ट्रपति पद के लिए चुनाव होना है। राजग की तरफ से सी पी राधाकृष्णन को उम्मीदवार बनाया गया है जबकि इंडिया गठबंधन की ओर से बी सदर्शन रेड्डी को उम्मीदवार हैं। आंकड़ों को देखें तो राजग का पलड़ा भारी नजर आ रहा है। राजग के पास दोनों सदनों की संख्या को मिलाकर उपराष्ट्रपति पद के लिए बहुमत नजर आ रहा है, लेकिन राउत के इस बयान ने चुनाव को रोचक बना दिया है।

अगर बहुमत है तो विपक्ष से क्यों मांग रहे वोट?

दिल्ली में पत्रकारों से बात करते हुए संजय राउत ने कहा कि विपक्ष के पास संख्याबल कम नहीं है। उन्होंने दावा किया कि भाजपा के नेताओं ने कई विपक्षी दलों से आधिकारिक तौर पर संपर्क किया और वोट की अपील की। राउत ने कहा कि अगर राजग को लगता है कि उनके पास पर्याप्त संख्याबल है तो वो विपक्षी दलों से वोट की अपील क्यों कर रहे हैं? उन्होंने कहा कि राजग की स्थिति उतनी भी मजबूत नहीं है जितनी दिखाई जा रही है। उन्होंने कहा कि इस बार भी सत्ताधारी गठबंधन अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने से पहले विपक्ष से संवाद करने में असफल रहा।

राउत ने सी पी राधाकृष्णन की उम्मीदवारी पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जब प्रवर्तन निदेशालय ने झारखण्ड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी की थी, तब सोरेन राजभवन मे ही थे। राउत के अनुसार यह पूरी कारवाई संवैधानिक परंपराओं के खिलाफ थी। उन्होंने आरोप लगाया कि उस वक्त राधाकृष्णन ने न तो ईडी अधिकारियों को रोका और न ही संवैधानिक दायरे में अपनी भूमिका निभाई।

संजय राउत ने आगे कहा कि विपक्ष की यह लड़ाई केवल एक पद के लिए नहीं है बल्कि यह लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई है। उन्होंने साफ कहा कि विपक्ष तानाशाही प्रवृति और उसे समर्थन देने वाले ताकतों के खिलाफ खड़ा है।

बिहार चुनाव: भाजपा पिछड़ रही है या अंदरखाने कुछ चल रहा है ? जानिए दस बड़ी बातें

अमित द्विवेदी | navpravah.com 

नई दिल्ली | देश में कहीं भी चुनाव हो भारतीय जनता पार्टी अपने अ​भियान को महीनों पहले ही शुरू कर देती है, लेकिन बिहार चुनाव में पार्टी की ओर से तैयारियां थोड़ी धीमी लग रहीं हैं। नंवबर में राज्य में चुनाव होने हैं, बिहार के ज्यादातर पार्टियों ने अपनी कमर कस ली है। इंडिया ब्लॉक की ओर से तेजस्वी और राहुल मतदाता अ​धि​कार रैली निकाल रहे हैं। 17 अगस्त को सासाराम से शुरू हुए इस रैली का समापन एक सितंबर को पटना के गांधी मैदान में होगा। राहुल की यह रैली उनके पुराने भारत जोड़ो यात्रा और भारत न्याय यात्रा की ही तरह है। कुछ राजनीतिक विश्लेषक इस यात्रा को सफल बोलते हैं और कुछ असफल। हालांकि राहुल का कहना है कि वो इस यात्रा के माध्यम से देश में हुए क​थित वोटचोरी और विशेष गहन पुनरीक्षण में हुए धांधली को जनता के सामने पेश करेंगे। उन्होंने कहा है कि वो बिहार में एक भी वोट चोरी नहीं होने देंगे।

भाजपा इस चुनावी अभियान में पीछे लग रही है, इसके कई कारण हैं
1. नए चेहरे, सीमित असर-
बिहार में हर पार्टी ने अपने चेहरे का एलान कर दिया है, भाजपा नीतीश कुमार के चेहरे पर चुनाव लड़ रही है। हालांकि पार्टी ने पिछले कई महीनों में नए चेहरों को प्रवेश दिया है। आनन्द मिश्रा, नागमणि जैसे नए चेहरों को पार्टी में जोड़ा तो गया है, लेकिन उनका जनाधार काफी कम है। भाजपा के पास अपना खुद का कोई नेता ना होना चिंता का विषय है, इसलिए भाजपा अन्य राज्यों की तरह इस चुनाव में अपना दमखम नहीं दिखा पा रही है।
2. सहयोगी दलों से टिकट बंटवारा तय नहीं-
राजग गठबंधन में अभी सीटों को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। सूत्रों की मानें तो चिराग पासवान भी इस बार विधानसभा चुनाव लड़ना चाहते हैं। वो पिछले साल के मुकाबले इस वर्ष ज्यादा सीटों पर अपने उम्मीदवारों को उतारना चाहते हैं। गठबंधन में शामिल ‘हम’ पार्टी भी पहले से ज्यादा सीटों पर अपना दावा ठोंकने की कोशिश में है। वहीं मुख्य पार्टी जनता दल और भाजपा में भी अनबन की स्थिति बनी हुई है। इस कारण से भी भाजपा अपना जोर नहीं लगा पा रही है।

3. विपक्ष की एकजुटता-

बिहार के चुनाव में इस बार राजग के मुकाबले इंडिया ब्लॉक ज्यादा मजबूत लग रही है। तेजस्वी और राहुल के नेतृत्व में बिहार की यह जोड़ी और उनके द्वारा निकाली जा रही मतदाता अधिकार रैली विपक्ष एकजुट दिख रहा है और यही एकजुटता भाजपा के लिए चुनौती बनते जा रहा है।

4. जनसुराज की चुनौती-

कभी प्रधानमंत्री मोदी के चुनावी रणनीतिकार रहे प्रशांत किशोर, आज उन्हीं की प्रार्टी के लिए मुसीबत बनते जा रहे हैं। बिहार में जनसुराज पार्टी की घोषणा करते हुए ही उन्होंने कहा था कि या तो वो पूरी तरह से चुनाव पलट देंगे या तो पिछड़ जाएंगे। अभी जिस तरह से वो चुनावी अभियान में जुटे हैं, उन्हें देखकर लग रहा है कि अभी चुनाव प्रचार में भाजपा उनकी पार्टी से काफी दूर है। राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो प्रशांत किशोर बिहार के युवाओं की पहली पसंद माने जा रहे हैं, उन्होंने युवाओं को रोजगार देने की बड़ी बात कही है, जिससे युवा जुड़े हुए भी लग रहे हैं। इस तरह से प्रशांत किशोर का उभरकर आना भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती माना जा रहा है। माना जा रहा है कि भाजपा के पास अभी प्रशांत के बराबर के नेता नहीं है, जिसके कारण वो चुनावी अभियान में पिछड़ते नजर आ रही है।

5. सीमांचल की चुनौती-

बिहार की जीत की लिए सीमांचल के बिना भाजपा की सरकार बननी मुश्किल है। पिछले चुनावों में अमित शाह ने बड़ी ही सूक्ष्म अंदाज में बांग्लादेशी घुसपैठ का मसला उठाया। आतंकवाद का मसला उठाया। इस क्रम में सीमांचल का दौरा भी कई बार किया। उनका सीमांचल मिशन 2015 में मिली शिकस्त के बाद ही शुरू हुआ। सितम्बर 2022 में तो किशनगंज और पूर्णिया में जनसभा भी की, लेकिन उन्हें उस तरह के परिणाम नहीं मिले। इस बार भाजपा इस क्षेत्र के लिए एक अलग योजना बना सकती है। भाजपा चाहती है कि सीमांचल क्षेत्र की सीटों पर जदयू चुनाव लड़े, ताकि मुस्लिम सीटों पर राजग की सरकार बन सके, इन्हीं सब योजनाओं को लेकर भाजपा में मंथन जारी है।

6. नीतीश कुमार की स्थिति-

नीतीश कुमार की साख अब पहले जैसे नहीं रही। उनकी राजनीतिक निष्ठा पासे की तरह पलटती रही, जिससे नुकसान हुआ है। वहीं उनके खराब स्वास्थ्य और सरकार की कार्यशैली के कारण उनके प्रति विश्वास में कमी आई है, लेकिन यह भी स्थिति नहीं आई कि भाजपा उनसे पल्ला झाड़कर अकेले चुनाव लड़ ले। फिलहाल भाजपा अभी आश्वस्त नहीं कि वह अकेले चुनाव लड़कर चुनाव जीत सकती है। इस हिसाब से लगता है कि भाजपा अगर अकेले चुनाव लड़ेगी, तो शायद भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी, लेकिन इतनी हैसियत नहीं है कि अकेले सरकार बना लें। ऐसे में नीतीश कुमार को चुनाव तक साथ रखना लाजमी है। इस कारण से भी भाजपा चुनाव प्रचार में पिछड़ती दिख रही है।

7. भाजपा का अपना चेहरा ना होना-
बिहार में हर दल का एक नेता राज्य स्तर पर है। कांग्रेस के पास कन्हैया कुमार जैसा नेता है, जो युवा होकर नेतृत्व कर सकता है। वहीं राजद के पास तेजस्वी यादव हैं, जो पूर्व में उपमुख्यमंत्री की कुर्सी भी संभाल चुके हैं। वहीं भाजपा इस मामले में शून्य दिखती है। उनके पास उस स्तर का नेता नहीं है, जो तेजस्वी यादव को टक्कर दे सके। उपमुख्यमंत्री के रूप में सम्राट चौधरी तो हैं लेकिन उनके पास वह क्षमता नहीं है , जो तेजस्वी के जनाधार को मात दे सके।
8. जदयू को खत्म करना चाहती है भाजपा-
भाजपा में हमेशा महत्वाकांक्षा रही है कि अपने दम पर उनकी सरकार बनें। बिहार में नीतीश कुमार भाजपा की जरूरत हैं, उनके बिना भाजपा चुनाव नहीं जीत सकती है। इस चुनाव में भी उनकी जरूरत पड़ेगी। दोनों ही इस रिश्ते से खुश नहीं हैं लेकिन इसे निभाया जा रहा है। साल 2010 में भी भाजपा की कार्यकारिणी के समय नरेंद्र मोदी को लेकर एक विवाद भी हो गया था। इसके कारण दोनों नेताओं का डिनर भी रद्द हो गया था। भाजपा का काडर अभी बिहार में उतना मजबूत नहीं है और न ही कोई ऐसा जन नेता उभरा जो पार्टी का संपूर्ण नेतृत्व संभाल सके। यही वजह है कि साल 2013 में जब नीतीश कुमार ने गठबंधन बदल राजद में गए और फिर भाजपा में आए तो भी भाजपा ने उनका स्वागत किया।
भाजपा के अभी दो उप मुख्यमंत्री और 21 मंत्री हैं, वहीं जेडीयू के 13 मंत्री हैं। पिछली बार जेडीयू की 43 सीट आई थी और भाजपा 74 सीट आई थी। यह अंतर बढ़ता जा रहा है और निश्चित रूप से भाजपा जदयू के स्पेस को कम करने की कोशिश कर रही है। भाजपा चाहती है कि उसका कोई नेता बिहार में बड़ा बनकर उभरे। इसको भी एक कारण भाजपा के प्रचार में पीछे रहने का माना जा रहा है।

9. एसआईआर और वोटचोरी का मुद्दा-

राहुल गांधी अपने यात्रा में भाजपा पर इन दोनों मुद्दे पर आरोप लगा रहे हैं। जब से उन्होंने आरोप लगाया तब से  भाजपा के अभियान पर फर्क पड़ा है। इस बार बिहार चुनाव से पहले सबसे ज़्यादा चर्चा एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर हो रही है। विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया के तहत लाखों वोटरों के नाम सूची से हटाए जा सकते हैं। कांग्रेस और आरजेडी का कहना है कि यह साजिश विशेष वर्गों—दलित, महादलित, आदिवासी और पिछड़े समुदायों- को चुनाव से दूर करने की है। भाजपा और चुनाव आयोग इस आरोप को सिरे से खारिज करते हैं। उनका कहना है कि एसआईआर प्रक्रिया हर राज्य में होती है और इसका मकसद केवल फर्जी वोटर हटाना और सूची को पारदर्शी बनाना है। आयोग ने यह भी कहा कि सभी दलों को समय रहते ड्राफ्ट वोटर लिस्ट देखने और सुधार करने का मौका दिया गया था, लेकिन कई दलों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। हालांकि इस विवाद ने विपक्ष को भाजपा पर सीधा हमला करने का मौका दे दिया है। राहुल गांधी ने इसे लोकतंत्र पर हमला बताते हुए अभियान को और धार दे दी है।

10. राहुल की मतदाता अधिकार रैली के मुकाबले कमजोर अभियान करना-

इंडिया गठबंधन ने राहुल गांधी की अगुवाई में 1300 किमी लंबी ‘वोटर अधिकार यात्रा’ शुरू की है। इस यात्रा का मकसद केवल संगठन मज़बूत करना नहीं है, बल्कि यह संदेश देना है कि लोकतंत्र को बचाना ज़रूरी है और किसी भी हाल में वोटर लिस्ट से छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इस यात्रा ने विपक्ष को एक साझा मंच दिया है। तेजस्वी यादव खुले तौर पर राहुल गांधी को प्रधानमंत्री का चेहरा बताते हुए जनता को यह संकेत दे रहे हैं कि बिहार में महागठबंधन केंद्र की राजनीति को प्रभावित करने का दम रखता है। कन्हैया कुमार जैसे युवा नेता भी खुलकर सामने आए हैं और चुनाव आयोग की प्रक्रियाओं पर सवाल उठा रहे हैं। यात्रा में जुट रही भीड़ और सोशल मीडिया पर इसकी गूँज ने भाजपा को बैकफुट पर ला दिया है। विपक्ष यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि वह न केवल सत्ता विरोधी लहर को भुनाना चाहता है, बल्कि एक नया राजनीतिक एजेंडा भी स्थापित करना चाहता है। भाजपा के पास फिलहाल इस यात्रा का कोई विकल्प नहीं है इसलिए वह चुनाव प्रचार में पिछड़ती दिख रही है।

बिहार विधानसभा चुनावों की तैयारी में सभी दल अपनी पूरी ताकत झोंक रहे हैं। विपक्ष ने राहुल गांधी की यात्रा और एसआईआर विवाद को चुनावी हथियार बना लिया है। राजग भी पीछे नहीं है, लेकिन सीट बंटवारे की गुत्थी, नए चेहरों का सीमित असर और विपक्ष की एकजुटता ने भाजपा को “थोड़ा पीछे” खड़ा कर दिया है।  हालांकि राजनीति का खेल अंतिम हफ्तों में बदलता है। अगर भाजपा और राजग सही समय पर अपनी रणनीतियों को तेज कर दें और केंद्र की योजनाओं का प्रचार कर गाँव-गाँव तक पहुँचा दें, तो स्थिति पलट भी सकती है। लेकिन फिलहाल के हालात में यह कहना गलत नहीं होगा कि बिहार का चुनाव इस बार बेहद रोचक, अप्रत्याशित और बहुस्तरीय होने जा रहा है।

आइजोल को मिली रेल कनेक्टिविटी की ऐतिहासिक सौगात

न्यूज डेस्क | navpravah.com

आइजोल | मिज़ोरम के लिए आज का दिन इतिहास के पन्नों में दर्ज होने वाला है। आज़ादी के पूरे 77 वर्ष बीत जाने के बाद पहली बार राज्य की राजधानी आइजोल देश के विस्तृत रेल नेटवर्क से जुड़ने जा रही है। यह न केवल मिज़ोरम के विकास की दृष्टि से एक बड़ा कदम है, बल्कि पूर्वोत्तर भारत की कनेक्टिविटी की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

बैराबी से आइजोल तक पहली ट्रेन-

नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर रेलवे से मुख्य जनसम्पर्क अधिकारी कपिंजल किशोर शर्मा ने नवप्रवाह मीडिया नेटवर्क से बात की। उन्होंने बताया कि अब तक मिज़ोरम के लोग केवल बैराबी रेलवे स्टेशन तक ही रेल सुविधा का लाभ उठा पाते थे, जो असम-मिज़ोरम सीमा पर स्थित है। लेकिन अब बैराबी-साईरंग रेल लाइन पूरी हो जाने के बाद राजधानी आइजोल तक ट्रेनों का संचालन संभव हो पाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जल्द ही इस ऐतिहासिक परियोजना का उद्घाटन करने वाले हैं, जिसके बाद दिल्ली से सीधे आइजोल तक रेल यात्रा संभव होगी।

दुर्गम इलाकों में इंजीनियरिंग का चमत्कार-

बैराबी-सैरांग रेल लाइन मात्र 51.38 किलोमीटर लंबी है, किंतु इस छोटे से सफर में रेल को 50 सुरंगों और 150 से अधिक पुलों से गुजरना होगा। कल्पना कीजिए, हर एक किलोमीटर पर एक सुरंग और हर तिहाई किलोमीटर पर एक पुल! यह अपने आप में इंजीनियरिंग का चमत्कार है।

मुख्य अभियंता विनोद कुमार के अनुसार, इस परियोजना की सबसे बड़ी चुनौती थी – भौगोलिक परिस्थितियां। घने जंगल, लगातार बारिश, और भूस्खलन इस परियोजना के लिए बाधा बने रहे। समुद्र तल से 81 मीटर ऊंचाई पर पुलों का निर्माण करना किसी परीक्षा से कम नहीं था।

मौसम और भूगोल बने चुनौती-

मिज़ोरम में साल के लगभग 8 महीने बारिश रहती है। ऐसे में रेलवे इंजीनियरों को मुश्किल से चार-पाँच महीनों का ही समय कार्य के लिए मिल पाता था। वह भी तब, जब मौसम साथ दे। कई बार बारिश या भूस्खलन के कारण कार्य हफ्तों तक ठप रहा।

करीब दो वर्षों तक तो निर्माण सामग्री पहुँचाने तक में अड़चनें आईं, क्योंकि संकरी सड़कों पर अक्सर भूस्खलन हो जाता था। बाद में कार्ययोजना बदली गई और राज्य सरकार व एजेंसियों के सहयोग से परियोजना को गति मिली।

मिज़ोरम के लिए नए विकास के द्वार-

इस रेल लाइन का बनना मिज़ोरम की अर्थव्यवस्था, पर्यटन और सामरिक दृष्टिकोण से बेहद अहम है।

अर्थव्यवस्था: अब माल परिवहन सस्ता और आसान होगा। स्थानीय उत्पाद—बांस, फल, हस्तशिल्प—देशभर में तेज़ी से पहुँच पाएंगे।

पर्यटन: मिज़ोरम की नैसर्गिक सुंदरता अब सीधे रेलमार्ग से जुड़ जाएगी। इससे पूर्वोत्तर को देखने आने वाले पर्यटकों की संख्या बढ़ेगी।

रणनीतिक महत्व: मिज़ोरम अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से घिरा है। रेल कनेक्टिविटी से सीमाई इलाकों की सुरक्षा और रसद व्यवस्था और भी मज़बूत होगी।

एक प्रतीकात्मक बदलाव-

यह परियोजना केवल रेल लाइन का निर्माण नहीं है, बल्कि यह पूर्वोत्तर भारत को “मेन्स्ट्रीम इंडिया” से जोड़ने का एक प्रतीक है। लंबे समय से यह इलाका बुनियादी ढांचे की कमी और दूरी की वजह से बाकी देश से कटा-कटा महसूस करता था। लेकिन अब यह रेलवे लाइन न सिर्फ यात्रियों के लिए सुविधाजनक होगी, बल्कि मिज़ोरम को राष्ट्रीय आर्थिक परिदृश्य में और सशक्त स्थान दिलाएगी।

CBSE ने जारी किया 12 वीं कक्षा का परिणाम, लड़कियों ने एक बार फिर मारी बाज़ी

न्यूज़ डेस्क | navpravah.com 

नई दिल्ली | केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने आज 13 मई को कक्षा 12वीं बोर्ड परीक्षा 2025 का परिणाम आधिकारिक रूप से घोषित कर दिया है। इसके साथ ही लाखों छात्रों एवं उनके माता पिता का भी इंतजार आखिरकार खत्म हो गया। इस साल 88.39% बच्चे उत्तीर्ण हुए, जो पिछले साल की तुलना में बेहतर है।

इस साल कुल 17,04,367 छात्रों ने परीक्षा के लिए पंजीकरण कराया था, जिनमें से 16,92,794 छात्र परीक्षा में शामिल हुए। इनमें से 14,96,307 छात्र सफल घोषित किए गए हैं। 2024 में पास प्रतिशत 87.98% रहा था, जबकि इस साल 88.39% छात्रों ने सफलता हासिल की है, यानी इस बार 0.41% की बढ़त देखने को मिली। पास प्रतिशत देखें तो 91.64 प्रतिशत छात्राएं पास हुई हैं और 87.50 छात्र पास हुए हैं यानी कि बाजी फिर एक बार लड़कियों ने ही मारी है।

CBSE ने इस साल भी टॉपर्स की कोई मेरिट लिस्ट जारी नहीं की है। बोर्ड का मानना है कि इससे बच्चों पर बेवजह का तनाव बढ़ेगा और ऐसा नहीं करने से अनावश्यक प्रतियोगिता से बचा जा सकता है। हालांकि, जिन छात्रों ने 90% या उससे अधिक अंक प्राप्त किए हैं, उन्हें ‘डिस्टिंक्शन’ के रूप में सराहा जाएगा।

ऐसे चेक करें CBSE 12वीं रिजल्ट 2025

सबसे पहले छात्र आधिकारिक वेबसाइट cbseresults.nic.in पर जाएं।

अब छात्र “Senior School Certificate Examination (Class XII) 2025” लिंक पर क्लिक करें
इसके बाद छात्र रोल नंबर, स्कूल नंबर और एडमिट कार्ड ID डालें
फिर छात्र सबमिट बटन पर क्लिक करें
अब छात्र की स्क्रीन पर रिजल्ट दिखाई देगा, जिसे डाउनलोड और प्रिंट कर सकते हैं

Digilocker से डाउनलोड करने के लिए

digilocker.gov.in पर जाएं या मोबाइल ऐप खोलें
CBSE के सेक्शन में जाएं
रोल नंबर डालकर लॉगिन करें
डिजिटल मार्कशीट, पासिंग सर्टिफिकेट और माइग्रेशन सर्टिफिकेट डाउनलोड करें।

भारत-पाक तनाव के बीच रात में हो रहे हवाई हमले: जानिए क्यों चुनी जाती है रात की घड़ी

नृपेंद्र कुमार मौर्या| navpravah.com

नई दिल्ली| भारत और पाकिस्तान के बीच एक बार फिर हालात बेहद तनावपूर्ण हो गए हैं। दोनों देशों की सेनाएं हाई अलर्ट पर हैं। पाकिस्तान द्वारा जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में पर्यटकों पर किए गए हमले के बाद भारत ने जवाबी कार्रवाई करते हुए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के तहत पाकिस्तान में स्थित 9 आतंकी ठिकानों को नष्ट कर दिया। इसके बाद से ही पाकिस्तान बौखलाया हुआ है और उसने भारत पर हवाई हमले की नाकाम कोशिशें की हैं। दिलचस्प बात यह है कि भारत और पाकिस्तान—दोनों ही देशों की सेनाएं रात में ही हवाई हमले कर रही हैं। आखिर रात का समय ही क्यों चुना जा रहा है? इस सवाल का जवाब जानना जरूरी है।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ा तनाव

भारत ने 7-8 मई की दरम्यानी रात पाकिस्तान में मौजूद आतंकी ठिकानों पर हवाई हमला किया। इस हमले में भारत ने मिसाइल, ड्रोन और फाइटर जेट्स की मदद से आतंकियों के अड्डों को निशाना बनाया। इसके बाद 8-9 मई और फिर 9 मई की रात को पाकिस्तान की ओर से भारत में घुसपैठ और जवाबी हवाई हमले की कोशिश की गई, लेकिन भारतीय सेना ने इन सभी प्रयासों को नाकाम कर दिया।

रात को किए गए इन हमलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि दोनों देशों की सेनाएं दिन की बजाय रात को ही ऐसे ऑपरेशन अंजाम देना अधिक सुरक्षित और कारगर मान रही हैं। इसके पीछे कई रणनीतिक, तकनीकी और कूटनीतिक कारण हैं।

क्यों होते हैं रात में हवाई हमले? जानिए चार प्रमुख वजहें

1. अंधेरे में छिपने की आसानी

रात के अंधेरे का फायदा यह है कि मिसाइलें, ड्रोन और फाइटर जेट्स दुश्मन की नजरों से बच सकते हैं। खासकर ड्रोन जैसे छोटे उपकरणों को अंधेरे में देखना मुश्किल होता है और कई बार वे रडार की पकड़ से भी बाहर रह जाते हैं। आम लोग भी रात के समय अपने घरों में होते हैं, जिससे ऑपरेशन गुप्त और कम जोखिम वाला होता है।

2. जवाबी कार्रवाई का खतरा कम

रात के समय हमला करने से दुश्मन देश के पास तुरंत प्रतिक्रिया देने का समय नहीं होता। अंधेरे में फौरन जवाबी हमले की रणनीति बनाना मुश्किल होता है, क्योंकि रात में सीमित संसाधन, कम विजिबिलिटी और कम मैनपावर के चलते जवाब देना चुनौतीपूर्ण होता है।

3. आधुनिक तकनीक की ताकत

आज की सेनाएं तकनीकी रूप से अत्यधिक उन्नत हो चुकी हैं। फाइटर जेट्स में नाइट विजन, थर्मल इमेजिंग और GPS गाइडेड मिसाइल जैसी तकनीकें होती हैं, जो रात में भी सटीक निशाना लगाने की क्षमता रखती हैं। भारतीय सेना ने भी ऑपरेशन सिंदूर में इन आधुनिक तकनीकों का भरपूर इस्तेमाल किया, जिससे दुश्मन के ठिकाने सटीकता से नष्ट किए जा सके।

4. सिविलियन कैजुअल्टी से बचाव

किसी भी सैन्य हमले के दौरान नागरिकों की मौत एक गंभीर मुद्दा होती है। यदि दिन में हमला होता है, तो आम नागरिकों के खुले में रहने की संभावना अधिक होती है। इससे जान-माल का नुकसान ज्यादा हो सकता है, जिससे हमलावर देश की अंतरराष्ट्रीय छवि को नुकसान पहुंचता है। रात को जब अधिकांश लोग अपने घरों में होते हैं, तब हवाई हमले से सिविलियन कैजुअल्टी की आशंका कम हो जाती है|

तुर्की का ड्रोन , ३६ ठिकाने , पाक के हर पाप का किया सेना ने पर्दाफाश

नृपेंद्र कुमार मौर्य|navpravah.com

नई दिल्ली। भारत के सैन्य ऑपरेशन ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की सफलता से बौखलाए पाकिस्तान ने गुरुवार रात भारतीय वायुसीमा में घुसपैठ की बड़ी कोशिश की, लेकिन भारतीय सैन्यबलों ने उसकी इस गुस्ताखी को करारा जवाब देते हुए न सिर्फ हमलों को नाकाम किया, बल्कि दुश्मन को भारी नुकसान भी पहुंचाया। भारतीय सेना और विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसका विस्तृत खुलासा किया।

भारतीय अधिकारियों ने बताया कि पाकिस्तान ने 8-9 मई की रात को लेह से लेकर सर क्रीक तक 36 से अधिक स्थानों पर तुर्की से प्राप्त 300 से 400 ड्रोनों की मदद से वायुसीमा का उल्लंघन किया। इन ड्रोनों के जरिए पाकिस्तान भारत की वायु रक्षा प्रणालियों और सैन्य ठिकानों की टोह लेना चाहता था। हालांकि, भारतीय वायु रक्षा प्रणाली और यूनिफाइड काउंटर यूएएस ग्रिड ने समय रहते इन हमलों को भांप लिया और अधिकतर ड्रोनों को मार गिराया गया।

भारतीय सेना की प्रवक्ता कर्नल सोफिया कुरैशी ने प्रेस ब्रीफिंग में बताया कि ये सभी हमले भारतीय सैन्य इन्फ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाने की कोशिश थे। “300 से अधिक ड्रोनों के जरिए हमारी सीमाओं की टोह लेने की कोशिश की गई। इनमें तुर्की के UAVs शामिल थे, जिनकी प्रारंभिक जांच की जा रही है,” उन्होंने कहा।

विंग कमांडर व्योमिका सिंह ने बताया कि पाकिस्तान ने 7 मई की रात करीब साढ़े आठ बजे भारत के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाते हुए मिसाइल और ड्रोन हमले किए। लेकिन हैरानी की बात यह रही कि उस दौरान पाकिस्तान ने अपने वायुक्षेत्र को नागरिक विमानों के लिए बंद नहीं किया। इसका उद्देश्य स्पष्ट था – नागरिक विमानों को ढाल बनाकर हमले करना। उन्होंने कहा कि भारत ने संयम का परिचय देते हुए केवल सैन्य ठिकानों पर जवाबी कार्रवाई की, जिससे नागरिकों की जान को कोई खतरा न हो।

विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने पाकिस्तान की एक और साजिश का पर्दाफाश करते हुए बताया कि पाक सेना धार्मिक स्थलों को निशाना बना रही है और इसके लिए भारत को दोषी ठहरा रही है। उन्होंने कहा, “पाकिस्तान कहता है कि उसने किसी धार्मिक स्थल पर हमला नहीं किया, लेकिन हमारे पास सबूत हैं कि पुंछ में गुरुद्वारे को निशाना बनाया गया, जिसमें कुछ सिख श्रद्धालुओं की मृत्यु हुई।” मिसरी ने यह भी कहा कि पाकिस्तान ननकाना साहिब पर हुए कथित हमले के लिए भारत को जिम्मेदार ठहरा रहा है, जबकि यह पूरी तरह से फर्जी और मनगढंत दावा है।

प्रेस ब्रीफिंग के दौरान यह भी बताया गया कि भारत ने लाहौर में स्थित पाकिस्तान की एक वायु रक्षा प्रणाली को सटीक हमले से नष्ट किया। इसके अलावा, भारतीय वायुसेना ने जवाबी कार्रवाई करते हुए पाकिस्तानी वायु रडारों और एयर डिफेंस ठिकानों को भी भारी नुकसान पहुंचाया।

पाकिस्तान की इन कार्रवाइयों का मकसद केवल सैन्य तनाव बढ़ाना नहीं, बल्कि धार्मिक और साम्प्रदायिक रंग देकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि को धूमिल करना भी था। विदेश मंत्रालय की यह लगातार तीसरी प्रेस कॉन्फ्रेंस थी, जिससे साफ है कि भारत सरकार इस मसले पर गंभीरता से काम कर रही है और हर झूठ का माकूल जवाब तथ्यों के साथ दे रही है।

सेना ने यह भी बताया कि पाकिस्तान लगातार नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर गोलीबारी कर रहा है, जिसमें भारत के कुछ जवान घायल भी हुए हैं, लेकिन जवाबी कार्रवाई में पाकिस्तान को कहीं ज्यादा नुकसान झेलना पड़ा है।

कुल मिलाकर, ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान की नापाक हरकतें एक बार फिर नाकाम साबित हुई हैं। भारत की सशक्त सैन्य तैयारी, जिम्मेदार कूटनीति और त्वरित कार्रवाई ने यह स्पष्ट कर दिया है कि देश की सुरक्षा और संप्रभुता से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं किया जाएगा।

ऑपरेशन सिन्दूर के बदला लेने की फिराक में था पाक, भारत ने किया पस्त

नृपेंद्र कुमार मौर्य | navpravah.com

नई दिल्ली | भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव के बीच भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन सिंदूर 2.0’ के तहत पाकिस्तान के कई सैन्य ठिकानों पर सटीक हमले किए हैं। इन हमलों में पाकिस्तान के एयर डिफेंस सिस्टम को भारी नुकसान पहुंचा है, जिससे उसकी सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर असर पड़ा है।

ड्रोन हमलों में पाकिस्तानी रक्षा प्रणाली को भारी क्षति

भारतीय सेना द्वारा किए गए ड्रोन हमलों में पाकिस्तान के सियालकोट, लाहौर, कराची, रावलपिंडी, बहावलपुर, मियांवाली, चकवाल, गुजरांवाला, अटक और चोर जैसे शहरों में स्थित एयर डिफेंस यूनिट्स को निशाना बनाया गया। इन हमलों में पाकिस्तान की आधुनिक HQ-9 मिसाइल डिफेंस सिस्टम को गंभीर नुकसान हुआ है। लाहौर के वाल्टन एयरपोर्ट के पास जोरदार धमाकों की आवाज सुनाई दी, जिससे इलाके में अफरा-तफरी मच गई और सायरन बजने लगे। स्थानीय नागरिकों ने आसमान में धुएं के बड़े-बड़े बादल देखे।

पाकिस्तानी हमले नाकाम, भारतीय एयर डिफेंस रहा मुस्तैद

पाकिस्तान ने 7 और 8 मई की दरमियानी रात को ड्रोन और मिसाइलों के ज़रिए जम्मू, श्रीनगर, अमृतसर, पठानकोट, भटिंडा, चंडीगढ़ और गुजरात के भुज जैसे शहरों पर हमलों की कोशिश की। लेकिन भारतीय काउंटर यूएएस ग्रिड और एयर डिफेंस सिस्टम की तैनाती ने इन सभी हमलों को नाकाम कर दिया। भारतीय एजेंसियों ने कई स्थानों से हमलों के मलबे बरामद किए हैं, जिससे पाकिस्तानी साजिशों की पुष्टि होती है।

एलओसी पर भी फायरिंग तेज, नागरिकों की मौत

पाकिस्तानी सेना ने एलओसी के पुंछ, राजौरी, उरी, कुपवाड़ा और बारामुल्ला सेक्टरों में मोर्टार और भारी आर्टिलरी से फायरिंग बढ़ा दी है। भारतीय गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, इन हमलों में अब तक 16 निर्दोष नागरिकों की मौत हो चुकी है, जिनमें तीन महिलाएं और पांच मासूम बच्चे शामिल हैं।

भारत की चेतावनी: शांति चाहते हैं, लेकिन कमजोरी नहीं

भारत सरकार की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि भारतीय सेना शांति बनाए रखने के पक्ष में है, लेकिन यदि पाकिस्तान उकसावे वाली कार्रवाई करता है, तो उसे उसी की भाषा में जवाब दिया जाएगा। “हम तनाव नहीं चाहते, लेकिन अपनी संप्रभुता और नागरिकों की सुरक्षा से समझौता नहीं करेंगे,” यह संदेश स्पष्ट रूप से दिया गया है।

अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और कूटनीतिक गतिविधियां

रॉयटर्स और अन्य अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों की रिपोर्ट में लाहौर और अन्य शहरों में हुए हमलों की पुष्टि की गई है। अमेरिका, रूस और संयुक्त राष्ट्र की ओर से दोनों देशों से संयम बरतने की अपील की जा रही है। हालांकि, भारत ने स्पष्ट किया है कि यह कार्रवाई आत्मरक्षा और जवाबी हमला है

आईपीसी का वृक्षारोपण अभियान: हरित भारत की दिशा में बड़ा कदम

न्यूज़ डेस्क | navpravah.com 

नई दिल्ली | पर्यावरण संरक्षण को लेकर इंटरनेशनल प्रेस कम्युनिटी ने पूरे देश में व्यापक वृक्षारोपण अभियान चलाने का निर्णय लिया है। 1 जून से शुरू होने वाला यह अभियान चरणबद्ध तरीके से देश के विभिन्न राज्यों में संचालित किया जाएगा।

संस्था के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्रीप्रकाश तिवारी द्वारा प्रस्तुत इस प्रस्ताव पर विचार-विमर्श किया गया, जिसमें वृक्षारोपण को केवल एक प्रयास तक सीमित न रखकर, इसके संरक्षण और देखभाल पर विशेष ध्यान देने पर बल दिया गया। इस प्रस्ताव को सर्वसम्मति से स्वीकृति दी गई। इस योजना के तहत विद्यालयों, सार्वजनिक स्थलों और ग्रामीण क्षेत्रों में पौधारोपण किया जाएगा।

संस्था ने राज्य इकाइयों, स्वयंसेवी संगठनों, पर्यावरण विशेषज्ञों और स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर इस अभियान को सफल बनाने की योजना बनाई है। इस पहल का उद्देश्य न केवल हरित आवरण बढ़ाना है, बल्कि आम जनता को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करना भी है।

इस अभियान को सफल बनाने के लिए संस्था ने देशवासियों से सक्रिय भागीदारी की अपील की है। संस्था के सह सचिव उमाशंकर सिंह, कोषाध्यक्ष बिपिन पाणिग्रही, सचिव दिनेश दुबे, सलाहकार, दिनेश तिवारी और वरिष्ठ सदस्य सुशील मिश्रा ने इस प्रस्ताव को अनुमोदित किया।

पढ़िए, जातीय जनगणना से भाजपा को होने वाले फायदे और नुकसान की पड़ताल करती रिपोर्ट

अनुज हनुमत | navpravah.com 

लखनऊ | जातीय जनगणना से भाजपा को राजनीतिक लाभ मिलने की संभावना है। खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में, जहां पिछड़ा वर्ग और दलित वोट बैंक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भाजपा की रणनीति ओबीसी और एससी समुदायों को साधने की है, जो पारंपरिक रूप से पार्टी के मजबूत वोट बैंक नहीं रहे हैं।

भाजपा के लिए संभावित लाभ:

– ओबीसी वोट बैंक : भाजपा ओबीसी समुदाय के नेताओं को बढ़ावा दे रही है, जैसे कि सम्राट चौधरी को उपमुख्यमंत्री बनाया गया और ओबीसी, महादलित और अति पिछड़ा वर्ग के नेताओं को तरजीह दी गई। इससे पार्टी को ओबीसी वोटों में सेंध लगाने में मदद मिल सकती है।
– बिहार में बढ़त : बिहार में जातीय जनगणना के बाद होने वाले पहले विधानसभा चुनाव में भाजपा को फायदा हो सकता है, क्योंकि पार्टी का मानना है कि ओबीसी वोटर पहले भी उसे समर्थन देते रहे हैं।

– उत्तर प्रदेश में वापसी : उत्तर प्रदेश में भाजपा को ओबीसी और दलित वोटों की वापसी में मदद मिल सकती है। जातीय जनगणना से भाजपा को राजनीतिक लाभ मिलने की संभावना है, खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में जहां पिछड़ा वर्ग और दलित वोट बैंक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भाजपा की रणनीति ओबीसी और एससी समुदायों को साधने की है, जो पारंपरिक रूप से पार्टी के मजबूत वोट बैंक नहीं रहे हैं।

कुल मिलाकर, जातीय जनगणना से भाजपा को राजनीतिक लाभ मिलने की संभावना है, लेकिन इसके लिए पार्टी को अपनी रणनीति को प्रभावी ढंग से लागू करना होगा

भाजपा ने जातीय जनगणना को लागू करने के लिए यही समय चुनने के पीछे कई कारण हो सकते हैं:

राजनीतिक लाभ
1. लोकसभा चुनाव 2029 : जातीय जनगणना को लागू करने से भाजपा को लोकसभा चुनाव 2029 में पूरा लाभ मिल सकता है, खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में जहां पिछड़ा वर्ग और दलित वोट बैंक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

2. वोट बैंक की राजनीति : भाजपा जातीय जनगणना के माध्यम से अपने वोट बैंक को मजबूत करने और नए वोट बैंक को आकर्षित करने की कोशिश कर सकती है।

सामाजिक और आर्थिक कारण-

1. सामाजिक न्याय : जातीय जनगणना से सामाजिक न्याय को बढ़ावा मिल सकता है, खासकर पिछड़ा वर्ग और दलित समुदायों के लिए।
2. आर्थिक विकास : जातीय जनगणना से आर्थिक विकास को बढ़ावा मिल सकता है, खासकर उन समुदायों के लिए जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं।

अन्य कारण-

1. विपक्षी दलों का दबाव : विपक्षी दल जातीय जनगणना की मांग कर रहे थे, और भाजपा ने इसे लागू करने का फैसला करके विपक्षी दलों को जवाब देने की कोशिश की होगी।
2. भाजपा की रणनीति : भाजपा ने जातीय जनगणना को लागू करने का फैसला करके अपनी राजनीतिक रणनीति को बदलने की कोशिश की होगी, खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में।

जातीय जनगणना के निर्णय के बाद सवर्ण समाज की नाराजगी से कई प्रभाव पड़ सकते हैं:

राजनीतिक प्रभाव-

1. वोट बैंक की नाराजगी : सवर्ण समाज की नाराजगी से भाजपा के वोट बैंक में दरार पड़ सकती है, खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में।
2. चुनावी परिणाम : सवर्ण समाज की नाराजगी से चुनावी परिणामों पर असर पड़ सकता है, और भाजपा को नुकसान हो सकता है।

सामाजिक प्रभाव-

1. सामाजिक तनाव : सवर्ण समाज की नाराजगी से सामाजिक तनाव बढ़ सकता है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां सवर्ण और पिछड़ा वर्ग के बीच तनाव पहले से ही है।
2. जातिगत विभाजन : जातीय जनगणना के निर्णय से जातिगत विभाजन बढ़ सकता है, और सामाजिक सौहार्द पर असर पड़ सकता है।

अन्य प्रभाव-

1. राजनीतिक अस्थिरता : सवर्ण समाज की नाराजगी से राजनीतिक अस्थिरता बढ़ सकती है, खासकर उन राज्यों में जहां भाजपा की सरकार है।
2. विपक्षी दलों का फायदा : सवर्ण समाज की नाराजगी से विपक्षी दलों को फायदा हो सकता है, खासकर उन राज्यों में जहां भाजपा की सरकार है।

कुल मिलाकर, जातीय जनगणना के निर्णय के बाद सवर्ण समाज की नाराजगी से कई प्रभाव पड़ सकते हैं, जिनमें राजनीतिक, सामाजिक, और अन्य प्रभाव शामिल हैं।

UP: क्राइम पर सर्जिकल स्ट्राइक से शिक्षा को मिला नया आसमान

अनुज हनुमत | Navpravah.com 

उत्तर प्रदेश | प्रयागराज अब सिर्फ कुंभ, संगम या इलाहाबाद विश्वविद्यालय के नाम से नहीं जाना जा रहा, बल्कि ‘माफिया मुक्त, शिक्षा युक्त’ नए मॉडल के रूप में उभर रहा है। यह बदलाव एक दिन में नहीं आया, बल्कि यह सशक्त राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक पारदर्शिता और जन सहयोग का परिणाम है।

प्रयागराज, जो कभी देश के सर्वश्रेष्ठ शैक्षिक और सांस्कृतिक केंद्रों में शुमार होता था, बीते कुछ दशकों में अपराध, माफियागीरी और असुरक्षा की चपेट में आ गया था। शहर का वह गौरवशाली अतीत, जिसमें यहाँ से निकलने वाले छात्र UPSC, PCS, JEE और NEET जैसे परीक्षाओं में टॉप करते थे, माफिया के बढ़ते दबदबे के चलते कहीं दब सा गया था। लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। माफिया के खिलाफ सीएम योगी के मार्गदर्शन में जो कदम उठाए गए उसके परिणाम आज सबके सामने हैं।

शक्ति दुबे और महक जायसवाल : नए प्रयागराज की पहचान-

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने यूपी और प्रयागराज को नई पहचान दी है। प्रयागराज जो कभी आईएएस की फैक्ट्री कहा जाता था लेकिन कुछ दशकों में उसकी यह पहचान धूमिल हो चुकी थी। हाल ही में UPSC में टॉपर बनीं शक्ति दुबे ने प्रयागराज की प्रतिभा को राष्ट्रीय मंच पर फिर से स्थापित किया। शक्ति दुबे कहती हैं कि शिक्षा के लिए वातावरण का भी योगदान रहता है। पहले भी सिविल सर्विसेज के लिए अभ्यर्थी तैयारी करते थे लेकिन इसके लिए उपयुक्त वातावरण की जरूरत थी। अच्छे वातावरण में प्रतिभाएं आगे आ रही हैं। वहीं, इंटरमीडिएट बोर्ड परीक्षा में महक जायसवाल की सफलता ने यह सिद्ध किया कि सुरक्षित वातावरण में बेटियाँ भी सपने पूरे कर सकती हैं। प्रयागराज के बच्चा राम यादव इंटर कालेज की छात्रा महक जायसवाल ने 97.20 फीसदी अंक के साथ इंटर में पहला स्थान हासिल किया है। महक के पिता शिव प्रसाद जायसवाल कौशाम्बी में एक छोटी सी चाय की दुकान चलाते हैं। महक का कहना है कि पहले लड़कियों को अपने गांव से दूर पढ़ने जाने में डर लगता था। मां बाप भी तैयार नहीं होते थे लेकिन सुरक्षित वातावरण होने की वजह से मेरे माता पिता ने मुझे मेरे गांव कनैती से गांव से दूर मेरे विद्यालय भेजा। सुरक्षित माहौल में पढ़ाई की और अब कामयाब भी हो गए।

माफिया पर सर्जिकल स्ट्राइक से शिक्षा को मिला नया आसमान-

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में प्रयागराज में माफिया राज पर करारी चोट की गई। कुख्यात माफिया की अवैध संपत्तियों पर बुलडोज़र चला, अपराधियों को जेल भेजा गया और जनता को यह भरोसा दिलाया गया कि अब कानून का राज चलेगा, किसी बाहुबल का नहीं। इस बदले हुए माहौल ने प्रयागराज की शैक्षिक पहचान को फिर से जीवित कर दिया। शिक्षा के जानकार भी इस बात को स्वीकार करते हैं। यूपीएससी टॉपर शक्ति दुबे की दसवीं और बारहवीं की पढ़ाई प्रयागराज के एसएमसी घूरपुर से हुई। शक्ति के कॉलेज के प्रिंसिपल आशीष रंजन कहते हैं कामयाबी के लिए मानसिक तौर पर छात्राओं को तैयार करने के लिए उनके मन में बिना दबाव के निर्णय लेने की क्षमता भी जरूरी है। यह तभी आती है जब उन्हें और उनके परिजनों को सपने देखने में डर न लगे। बदले हालात ने सपने देखने की छूट दी है, कामयाबी आपके सामने है।

महक जायसवाल प्रयागराज के फूलपुर के भुलई का पूरा गांव के बच्चा राम यादव इंटर कॉलेज की छात्रा है। कॉलेज की प्रिंसिपल मनोरमा यादव कहती हैं कि कम से कम संसाधनों में अनुशासन और बच्चे भय मुक्त समाज में खुद को सुरक्षित महसूस कर रहे हैं तो उनकी प्रतिभा निखरकर सामने आती है। महक में कामयाबी की ललक थी । आर्थिक तंगी के बावजूद लगन और सुरक्षित वातावरण से उसने अपनी काबिलियत साबित कर दी।