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Thursday, August 6, 2026
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देश भर में कोरोना वाइरस फैलाने वाला साद है ‘कोरोना निगेटिव’, कल क्राइम ब्रांच के सामने होगा पेश!

साद है 'कोरोना निगेटिव'
साद है 'कोरोना निगेटिव

अमित द्विवेदी | Navpravah.com

कोरोना वाइरस के संक्रमण की वजह से देश में भय का माहौल बना हुआ है। देश में संक्रमण को हवा देने की एक बड़ी वजह बने तबलीगी जमात के लोग, जिनकी वजह से स्थिति बदतर हो गई। ताज़ा खबर के मुताबिक़ तबलीगी जमात के मुखिया मोहम्मद साद की रिपोर्ट निगेटिव आई है। अंदेशा है कि मोहम्मद साद कल दिल्ली क्राइम ब्रांच के सामने पेश भी सकता है।

मौलाना साद के वकील ने स्पष्ट किया कि कोरोना वाइरस कि जाँच में साद की रिपोर्ट निगेटिव है। साद के वकील ने बताया कि दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच के कहने पर मौलाना साद का कोरोना टेस्ट करवाया गया था। अब ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं कि मौलाना साद कल क्राइम ब्रांच के सामने पेश हो सकता है।

दरअसल, दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच लगातार तबलीगी जमात के मुखिया मौलाना साद की तलाश कर रही है। हालांकि अभी तक क्राइम ब्रांच को सफलता नहीं मिली है। हाल ही में एक निजी चैनल से बातचीत में मौलाना साद ने कहा, ‘दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच को यह पता है कि मैं कहां पर हूं।’ क्राइम ब्रांच दो नोटिस भी भेज चुकी है, जिनका हम जवाब भी दे चुके हैं।

इसी बातचीत के दौरान मौलाना ने कहा, ‘दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने मेरे बेटे की मौजूदगी में घर की तलाशी भी ली है। साथ ही मुझे कोरोना जांच कराने को कहा है। हम कोरोना वायरस की जांच करा चुके हैं। जांच रिपोर्ट की जानकारी दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच को दी जाएगी। दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच जो कह रही है, हम उन सबका पालन कर रहे हैं।’

गौरतलब है कि मौलाना साद को लेकर कई खुलासे होने के बाद सुरक्षा एजेंसियां उसकी तलाश में हैं। प्रवर्तन निदेशालय, क्राइम ब्रांच, दिल्ली पुलिस तलाश में जुटी हैं। लेकिन मौलाना साद सामने नहीं आ रहा है। लगातार अपना ऑडियो संदेश जारी करता है, जिसमें उसने क्वारनटीन होने का दावा किया है।

भूली हुई यादें- “योगेश गौड़”

डॉ. कुमार विमलेन्दु सिंह | Navpravah Desk

गुज़रने के बाद भी अगर हयात में ठहरना हो, किसी के दिल तक जाना हो, कोई बात भूलनी हो या किसी को हर रोज़ याद आना हो, ज़रिया एक है, एक ही सूरत निकलती है, किसी पन्ने पर अश’आर बन के ठहर जाना, जज़्बातों के निशान किसी दीवान में छोड़ जाना, किसी ग़ज़ल का मक़्ता हो जाना या किसी आवाज़ का मतलब बन जाना, मतलब कुछ लिख जाना| ये वही ज़मीन है, जहाँ रोज़ ग़ालिब ज़िंदा होते हैं, जहाँ कालिदास कभी नहीं मरते हैं| यहाँ, अदब की इज़्ज़त रही है और अदीब की क़द्र| अगर किसी दौर में ऐसा न भी हुआ हो, तो वक़्त ने करवाया है| योगेश गौड़, एक ऐसे ही शायर का नाम है|

योगेश गौड़ (PC- Excelsior)

1943 में, लखनऊ में पैदा हुए, योगेश के पिता, PWD में काम करते थे, अच्छी आमदनी थी, परिवार बड़ा था और ईमानदार भी थे| ईमानदारी और अमीरी एक साथ बसर करते नहीं, सो इनके घर भी न किया| योगेश जब इंटरमीडिएट की परीक्षा देने वाले थे, इनके पिता गुज़र गए| इनके ऊपर ज़िम्मेदारी आ गई और इनके रिश्तेदारों ने मुह मोड़ लिया|

दुनिया के असली रंगों को देखकर हैरान, ये अपने दोस्त सत्यप्रकाश तिवारी के साथ मुंबई चले गए, कुछ बेहतर करने की उम्मीद में| इनकी बुआ के लड़के, व्रजेन्द्र गौड़, बड़े लेखक थे फ़िल्मों के| उस वक़्त तक वे, “परिणीता” जैसी फ़िल्मों के डायलॉग और पटकथा लिख चुके थे और आगे जा कर “कटी पतंग” जैसी फ़िल्में भी इन्होंने लिखी| लेकिन यहाँ भी कोई मदद न मिली|

एक टीवी इंटरव्यू में गीतकार योगेश गौड़ (PC-RajyaSabha TV)

इनके दोस्त सत्यप्रकाश ने इनके लिए चपरासी की नौकरी तक की और इन्हें संघर्ष जारी रखने को कहा| ऐसा ही हुआ और एक दिन रॉबिन मुखर्जी, जो कि एक मशहूर म्यूज़िक डायरेक्टर थे उनके निर्देशन में, “सखी रॉबिन”, फ़िल्म में, इनके लिखे 6 गाने चुन लिए गए और 25रुपये/गाना, 150 रुपये मिले| ये 1962 की बात थी| इसके बाद भी इन्हें B-ग्रेड फ़िल्मों में काम मिलता रहा| चूंकि इनके पास, न गुलज़ार की तरह, मुंबई में बसे अमीर बंगाली फ़िल्मकारों का साया था, न ये मजरूह जैसा शायराना मिज़ाज, तो इनको वक़्त तो लगना था|

“1971 में आई हृषिकेश मुखर्जी की फ़िल्म, “आनंद” में वैसे तो सारे गाने, बंगालियों के चहेते, गुलज़ार साहब ने लिख दिए थे, बस दो गानों की जगह थी. वहां योगेश को मौक़ा मिला और उनके लिखे गीत, “कहीं दूर जब दिन ढल जाए” और “ज़िंदगी कैसी है पहेली”, गुलज़ार साहब के गीतों पर भारी पड़ गए.”

ये गीत सीधे और सच्चे से थे| न तो इनमें उर्दू शायरी की ज़बरदस्त शब्द प्रदर्शनी थी, न गुलज़ार के अजीब से बोल जो कई बार समझ में न आने के कारण अच्छे मान लिए गए| ये दिल की बात थी और सीधी वहां पहुंच रही थी|

इसके बाद इन्हें ख़ूब मौक़े मिले| “मिली”, “छोटी सी बात”, “बातों बातों में”, “रजनीगंधा” और भी बहुत सी फ़िल्मों में इनके गीतों ने धूम मचाई| “बड़ी सूनी सूनी है”, “रिमझिम गिरे सावन”, “न जाने क्यों होता है ये ज़िंदगी के साथ”, “नबोले तुम, न मैने कुछ कहा”, ये गाने आज भी अपने सहल अंदाज़ से ज़िंदगी में रंग भर देते हैं|

फ़िल्मी दुनिया के अलग दस्तूर हैं, यहाँ शोहरत के लिए साज़िशें तक की जाती हैं| योगेश को न तो शायर कहा गया न उन्होंने सफ़ेद लिबास के ज़रिए ये साबित करना चाहा, नाम भी सीधा सा, “योगेश” ही रहने दिया तो दुनिया, बेहतरीन नग़्मों के पीछे के चेहरे को शायद भूल सी गई| इन्हें याद करना, करवाना, करते रहना, बहुत ज़रूरी है, ताकि उदास होकर, ये शायर ये न कह बैठे,

              “तुम्हे याद हो कि न याद हो”

(लेखक जाने-माने साहित्यकार, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.

भूली हुई यादें- “गेविन पैकार्ड”

डॉ. कुमार विमलेन्दु सिंह | Navpravah Desk

शमा का काम ही होता है नूर बांटना और सहर होते ही ग़ैब में शरीक़ हो जाना|जो टिमटिमाते हैं रात भर जो सितारों की तरह, महफ़िल में, वो बताते भी नहीं कि रोशनी किसने दी उन्हें, न ही ख़ैरियत पूछते हैं, उस ग़ायब शमा की| फिर रिवाज़ चलता है और हर शबकी सहर होती है और धीरे-धीरे, कोई आवाज़ नहीं बुलाती उन्हें, जो लुटा गए, महफ़िल में अपना नूर| गेविन पैकार्ड नाम था उस शमा का|

गेविन पैकार्ड (PC-BCCL)

गेविन, 1964 में, कल्याण, महाराष्ट्र में पैदा हुए| इनके पिता कंप्यूटर के जानकार थे और उस ज़माने में, ये बहुत बड़ी बात थी| गेविन के दादा जो कि अमरीकी सेना में आधिकारी थे, एक बार भारत आए और यहीं के हो कर रह गए|

गेविन का परिवार संपन्न था और उन्हें स्वतंत्रता थी, अपना करियर चुनने की| उन्होंने बॉडी बिल्डिंग को चुना और जल्दी ही राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर प्रतियोगिताएं जीतने लगे| ऐसी ही किसी प्रतियोगिता में, केरल के कुछ फ़िल्म निर्माताओं ने इन्हें देखा और एक मलयालम फ़िल्म, “आर्यन” में उन्हें एक रोल दिया|

गेविन पैकार्ड अपने परिवार के साथ (PC- Filmibeat Malyalam)

ये 1988 की बात है| उन दिनों, बॉब क्रिस्टो और टॉम आल्टर के अलावा कोई विदेशी सा दिखने वाला और अच्छी हिंदी बोलने वाला नहीं था और ऐसे किरदारों की ज़रूरत बनी रहती थी उन दिनों, तो बहुत दिन तक गेविन, हिन्दी फ़िल्म की दुनिया से छिपे न रह सके| अगले ही साल, राजू मवानी की फ़िल्म ,”इलाका” आई| उसमें भी इनको काम मिला और इसके बाद लगातार छोटे-छोटे रोल इन्हें मिलते रहे|

“इलाका”, 1989 में आई थी और इसमें संजय दत्त थे जो कि नशे की लत से बाहर आए थे और बाहर लाने वाले थे गेविन| इन्होंने संजय दत्त को जिम में इतना मसरूफ़ कर दिया कि संजय दत्त जब “इलाका” में दिखे तो उनके बॉडी की ख़ूब तारीफ़ हुई और वो नशे से दूर होने लगे| अब जब संजय दत्त पर बायोपिक बनी, गेविन का कोई ज़िक़्र भी नहीं उस फ़िल्म में|

संजय दत्त और गेविन पैकार्ड (PC- Social Momus)

1989 में ही, दूरदर्शन पर “इन्द्रधनुष” एक साइंस फ़िक्शन पर आधारित धारावाहिक दिखाया गया और इसमें, करन जौहर, उर्मिला मतोंडकर और आशुतोष गोवारिकर ने भी काम किया था| गेविन भी इसमें थे| इसके बाद 90 के दशक में ये बहुत सारी फ़िल्मों में, कभी गुंडे तो कभी फ़ाईटर के रूप में नज़र आए| इसी दौर में इन्होंने सुनील शेट्टी औ सलमान खान के बॉडीगार्ड, शेरा को भी ट्रेनिंग दी|

“गेविन की दो बेटियाँ हैं, एरिका और कैमिले. इनकी पत्नी से इनका तलाक़ हो चुका था और ये अपने भाई डैरिल के पास वापस कल्याण आ गए| गेविन रोज़ शाम अपने भाई से फ़िल्मों की बातें करते और अपने दोस्तों को याद करते. उनकी तबीयत, ख़राब होती जा रही थी और सांस लेने में तकलीफ़ बढ़ती जा रही थी”

2002 में डेविड धवन की फ़िल्म,”ये है जलवा” के बाद ख़राब तबीयत की वजह से वे एकदम ग़ायब हो गए, फ़िल्मी दुनिया से| वे संजय दत्त और सुनील शेट्टी को अच्छा करता देख बहुत ख़ुश होते थे|

2012 में मई के महीने में एक दिन गेविन सोए और फिर कभी न उठे| बांद्रा के सेंट एंड्रयूज़ कब्रिस्तान में उन्हें दफ़ना दिया गया| उनका कोई फ़िल्मी दोस्त उस दिन वहां मौजूद न था|

नोट: बहुत बार फ़िल्मों की कास्टिंग लिस्ट में इनका नाम, “केविन” भी लिख दिया जाता था जो कि सही नहीं है|

(लेखक जाने-माने साहित्यकार, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)

प्लाज़्मा थेरेपी के शुरूआती नतीजे अच्छे, जानिए इस थेरेपी की ख़ासियत

प्लाज़्मा थेरेपी के शुरूआती नतीजे अच्छे
प्लाज़्मा थेरेपी के शुरूआती नतीजे अच्छे

अमित द्विवेदी | navpravah.com 

देश में एक ओर जहां कोरोना संक्रमितों की संख्या बढ़ रही है, वहीं कई खबरें ऐसी भी आ रही हैं जो राहत देने वाली हैं। दिल्ली में आज चार मरीजों पर प्लाज्मा थेरेपी का ट्रायल किया गया। राज्य के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने इस मामले की जानकारी देते हुए स्पष्ट किया कि इस प्रयोग के शुरूआती नतीजे काफी अच्छे आए हैं।

प्लाज़्मा थेरेपी को लेकर अरविंद केजरीवाल ने कहा, ”केंद्र सरकार की इजाजत के बाद हमने प्लाज्मा थेरेपी का ट्रायल किया था, हमने 4 मरीजों पर इसका ट्रायल किया था, उसके नतीजे काफी अच्छे आये हैं।” उन्होंने कहा कि ”हमने LNJP अस्पताल के 4 मरीज़ों पर प्लाज्मा का ट्रायल करके देखा, उसके अब तक के नतीजे उत्साहवर्धक हैं।”

केजरीवाल ने कहा कि चिकित्सकों ने स्पष्ट किया है कि हमें ज़्यादा से ज़्यादा प्लाज़्मा की आवश्यक्ता है, इसलिए जो लोग भी ठीक हो रहे हैं वे प्लाज़्मा डोनेट करने में कतराएं न। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में जब हमें जल्दी इस पर विजय प्राप्त करनी है, तो हम सबको मिलकर इससे लड़ना होगा।

कैसे कारगर है ‘प्लाज़्मा थेरेपी’-

ये एक तकनीक है, जिसमें कोरोना से ठीक हुए मरीज का प्लाज़्मा कोरोना संक्रमित में चढ़ाया जाता है और इसके जरिए कोरोना वायरस का इलाज किया जाता है। उदाहरण के तौर पर, जैसे एक मरीज है, जिसने कोरोना को मात दी है। वो ठीक इसलिए हो पाया क्योंकि उसके शरीर की प्रतिरोधक क्षमता ने कोरोना को हरा दिया। अब कोरोना से ठीक हुए मरीज का खून इकट्ठा किया जाता है। उसके खून से प्लाज्मा निकाला जाता है और इस प्लाज्मा को नए कोरोना मरीज में चढ़ाया जाता है। ऐसा करने से कोरोना संक्रमित मरीज में एंटीबॉडीज़ बनाता है। उसके शरीर में कोरोना से लड़ने के लिए प्रतिरोधक क्षमता मजूबत होती है। उम्मीद की जाती है कि कोरोना के खिलाफ तैयार हुए इस प्रतिरोधक क्षमता से कोरोना के विषाणु को खत्म किया जा सकता है। ब्लड प्लाज्मा थेरेपी में बीमारी से स्वस्थ्य हुए मरीज के शरीर से प्लाज्मा निकाला जाता है।

क्या होता है ‘प्लाज़्मा’?

ब्लड प्लाज्मा शरीर में मौजूद पीले रंग का तरल होता है,जो खून में 55 फीसदी तक मौजूद रहता है। जबकि शरीर में 41 फीसदी के आसपास रेड ब्लड सेल और 4 परसेंट वाइट ब्लड सेल होते हैं। खून में मौजूद ब्लड प्लाज्मा की वजह से ही पूरे शरीर में रक्त का संचार होता है। ब्लड प्लाज्मा में 91 परसेंट पानी होता है, जबकि 9 फीसदी हिस्से में शरीर के लिए जरूरी पोषक तत्व जैसे विटमिन, मिनरल और प्रोटीन होता है।

प्रयागराज में मिले 3 कोरोना पॉज़िटिव, ज़िले में मचा हड़कम्प, बढ़ी चौकसी

प्रयागराज में कोरोना के तीन नए मामले, मचा हड़कंप
प्रयागराज में कोरोना के तीन नए मामले, मचा हड़कंप
प्रयागराज से सौम्या केसरवानी की रिपोर्ट:
कोरोना वायरस का प्रकोप हर जगह धीरे-धीरे फैलता ही जा रहा है। केस कम होने का नाम ही नहीं ले रहा है। इसी बीच आज प्रयागराज जिले में तीन नए कोरोना संक्रमित युवक मिले हैं।
ख़बर के मुताबिक़, इनमें से एक शिवकुटी का रहने वाला है, जबकि दो अन्‍य युवक यमुनापार में शंकरगढ के रहने वाले हैं। बीमारी के लक्षण पाए जाने के बाद तीनों के सैंपल को जांच के लिए भेजा गया था।
आज जब जांच रिपोर्ट आई, तो शहर में हड़कंप मचा गया। तीनों संक्रमितों को अब कोविड 19 के लिए बने एल वन अस्पताल कोटवा सीएचसी में भर्ती किया गया है। वहीं अब तीन मरीजों के पॉजिटिव मिलने से पुलिस प्रशासन और सक्रिय हो गया है। हर इलाके में पहले से ज्यादा चौकसी बढा दी गई है।
तीनों संक्रमितों में दो युवक शंकरगढ़ इलाके के रहने वाले हैं, ये दोनों 21 अप्रैल को मुंबई से लौटकर आए थे, सर्वे टीम ने उन्हें क्वारंटीन स्थल कालिंदीपुरम स्थित अपार्टमेंट में रखा था, इसके अलावा एक युवक शिवकुटी इलाके का रहने वाला है। हाल ही में वह ई पास बनवाकर बनारस गया था, वहीं किसी संक्रमित युवक के संपर्क में आया था।

भूली हुई यादें- “चन्द्रशेखर दुबे”

डॉ. कुमार विमलेन्दु सिंह | Navpravah Desk

1942 का साल था, दूसरी जंग-ए-अज़ीम के शोलों से, दुनिया जल रही थी और हिन्दुस्तान में क्रिप्स मिशन नाकामयाब हो चुका था, लगभग सभी बड़े नेता जेलों में बंद कर दिए गए थे और “भारत छोड़ो” के नारे से हर गली गूंज रही थी| ऐसा कहा जा सकता है कि तारीख़ के हर पन्ने पर कभी न मिटने वाले अफ़साने लिखे जा रहे थे| कुछ लोग इन अफ़साना बन चुकी बातों को अपने सामने देख रहे थे| ऐसे ही एक शख़्स थे, चन्द्रशेखर दूबे, जो मध्य प्रदेश के देवास ज़िले में, न केवल ये सब होता देख रहे थे बल्कि भारत छोड़ो आंदोलन में अपनी हाज़िरी भी दर्ज़ करा रहे थे| नतीजतन, इन्हें भी गिरफ़तार कर लिया गया|

चंद्रशेखर दुबे (PC-Youtube)

1924 में पैदा हुए चन्द्रशेखर दूबे, 18 साल की उम्र में देश के लिए, जेल गए| वहाँ से रिहा होते ही, ये सीधा मुंबई चले गए और वहाँ एक्टिंग के काम की खोज के साथ समाज सेवा भी करने लगे|

“ये पढ़ाई लिखाई का महत्व जानते थे इसलिए पढ़ाई करने वाले नौजवानों की मदद भी करते थे| मुंबई में कुछ ही सालों बाद इन्होंने अमीय चक्रवर्ती के यहाँ, बतौर असिस्टेंट नौकरी कर ली| अमीय चक्रवर्ती बहुत बड़े निर्माता, निर्देशक थे| दूबे इनके साथ ही फ़िल्में बनाने के काम को सीखने लगे.”

1953 में आई फ़िल्म, “पतिता” में अमीय चक्रवर्ती ने इन्हें एक छोटा सा रोल दिया और यहीं से इनका सफ़र शुरू हो गया| इस फ़िल्म में इनका रोल बहुत छोटा था, लेकिन इन्होंने अपनी पहचान बना ली थी| 1955 में आई “मि०&मिसेज़ 55” में इन्हें महान गुरुदत्त ने मौक़ा दिया और इसके बाद इन्होंने लगातार काम करते हुए, लगभग 200 फ़िल्मों में काम किया|

एक फ़िल्म के दृश्य में संजीव कुमार और अन्य कलाकारों के साथ बतौर मुनीम, चंद्रशेखर दुबे

इनके किरदार ज़्यादातर मुनीम, साहुकार जैसे लालच से भरे इंसान के हुआ करते थे और निगेटिव शेड्स के होते थे| देश के तमाम बड़े अभिनेताओं और निर्देशकों के साथ इन्होंने काम किया और इनके द्वारा की गई फ़िल्मों की फ़ेहरिस्त बहुत लंबी है|

चन्द्रशेखर दूबे जी ने अभी फ़िल्मों के लिए काम शुरू ही किया था कि हमारे देश में, 1957 में, “विविध भारती सेवा” की शुरूआत हुई और इसका मोटो रखा गया, “देश की सुरीली धड़कन”, जो आगे के सालों में सच भी साबित हुआ| इसी विविध भारती पर एक कार्यक्रम बहुत मशहूर हुआ, “हवा महल”, जिसमें नाटककारों के नाटकों को डायलॉग के माध्यम से रेडियो पर ही प्रस्तुत किया जाता था| इसमें कई सालों तक, कई नाटकों में इनकी आवाज़ गूंजती रही| एक और मशहूर रेडियो कार्यक्रम, “फ़ौजी भाईयों” में भी इनकी आवाज़ का जादू बहुत दिनों तक चला|

चन्द्रशेखर दूबे हमेशा ही एक चरित्र अभिनेता रहे और इनका स्क्रीन प्रेज़ेस भी इतना असरदार होता था कि ये दर्शकों को याद रह जाते थे| इनके ज़िंदा रहते इनकी आख़िरी फ़िल्म थी, 1993 में आई, “दलाल”, इसी साल सितंबर के महीने में, 69 साल की उम्र में वे गुज़र गए|

चन्द्रशेखर दूबे को मुनीम या साहुकार के अलावा, उनके अपने नाम से भी जाना जाए और याद किया जाता रहे, यही दुआ है|

(लेखक जाने-माने साहित्यकार, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)

जहांगीरपुरी: एक ही गली में 46 लोग कोरोना पॉजिटिव, इलाका सील

46 लोग कोरोना पॉजिटिव
46 लोग कोरोना पॉजिटिव

सौम्या केसरवानी | navpravah desk

कोरोना वायरस ने दिल्ली में हाहाकार मचा दिया है। इसी क्रम में आज उत्तर पश्चिमी दिल्ली के जहांगीरपुरी इलाके में 46 और लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं, यह सभी लोग एचसी ब्लॉक में रहते हैं।

दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच में तैनात एक एएसआई भी भी इन लोगों में शामिल है। महरौली इलाके में रहने वाले एक स्वास्थ्यकर्मी और उनके ससुर कोरोनो पॉजिटिव पाए गए हैं, वे लेक व्यू अपार्टमेंट में रहते हैं। इससे पहले यहां के सी ब्लॉक की तीन गलियों को सील किया गया था, वहां 31 लोग कोरोनो पॉजिटिव पाए गए थे। इनमें 26 एक ही परिवार के हैं, इसके बाद आसपास के इलाके के लोगों की स्क्रीनिंग हुई थी।

कल भी दिल्ली के जामा मस्जिद इलाके में एक ही परिवार के 11 लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए थे। इस परिवार का एक सदस्य विदेश से लौटा था, उसके बाद परिवार के सदस्यों में यह संक्रमण फैला, टेस्ट के बाद परिवार के 18 में से 11 सदस्य पॉजिटिव पाए गए।

इसके अलावा दिल्ली के शाहदरा जिले के मान सरोवर पार्क में एक ही परिवार के 6 लोगों को कोरोना पॉजिटिव हुआ है, जिसमें एक बच्चा भी शामिल है। 11 अप्रैल को इस परिवार में एक बुजुर्ग की मौत हुई थी, जिन्हें कोरोनावायरस संक्रमण हुआ था। फिर टेस्ट के बाद परिवार के 6 लोग कोरोनावायरस पॉजिटिव मिले।

भारत में कोरोनावायरस पॉजिटिव लोगों की संख्या 21 हजार के पार पहुंची चुकी है, जबकि 675 से ज्यादा लोग देश में इस महामारी के कारण मर चुके हैं। वहीं दिल्ली की बात की जाए तो यहां कोरोनावायरस से संक्रमित मरीजों का आंकड़ा 2 हजार क्रॉस कर चुका है।

वरिष्ठ पत्रकार अर्णब गोस्वामी पर हमला, आरोपी गिरफ़्तार, पूछताछ जारी

अर्नब गोस्‍वामी और उनकी पत्‍नी कल रात 2 बजे अंजान व्‍यक्तियों ने हमला कर दिया
अर्नब गोस्‍वामी और उनकी पत्‍नी कल रात 2 बजे अंजान व्‍यक्तियों ने हमला कर दिया

सौम्या केसरवानी | Navpravah.com

टीवी पत्रकार अर्नब गोस्‍वामी और उनकी पत्‍नी पर कल रात 2 बजे अंजान व्‍यक्तियों ने हमला कर दिया, ये हमला उस समय हुआ जब दोनों स्‍टूडियों से घर जा रहे थे। हमले के बाद आईपीसी की धारा 341, 504 के तहत एफआईआर दर्ज हुई और दोनों आरोपियों को पकड़ लिया गया है और उनसे पूछताछ जारी है।

इस संबंध में अधिकारी ने बताया कि घटना गणपतराव कदम मार्ग पर हुई, जब गोस्वामी लोअर परेल में बॉम्बे डाइंग कॉम्प्लेक्स स्थित एक स्टूडियो से लौट रहे थे। अधिकारी ने बताया कि हमलावरों ने गोस्वामी की कार से आगे निकलकर इसे रुकवा दिया और गाड़ी का शीशा तोड़ने की कोशिश की और स्याही फेंक दी, तभी पीछे वाली कार में चल रहे उनके सुरक्षाकर्मियों ने दोनों लोगों को पकड़ लिया और पुलिस को सौंप दिया।

इस हमले के बाद एक वीडियो में गोस्वामी ने कहा कि उनके सुरक्षाकर्मियों ने बताया कि हमलावर युवा कांग्रेस के कार्यकर्ता हैं। वहीं सूचना और प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने टीवी पत्रकार अर्नब गोस्‍वामी पर हुए जानलेवा हमले की निंदा की और कहा कि यह लोकतंत्र के खिलाफ है।

टीवी डिबेट के दौरान कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी पर कथित अपमानजनक टिप्पणी करने को लेकर महाराष्ट्र सरकार में मंत्री नितिन राउत और बालासाहेब थोराट अर्णब गोस्वामी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाने की बात कही है। इस बीच नागपुर में दंगे भड़काने के आरोप में अर्नब के खिलाफ आईपीसी की धारा 153, 153A, 153B, 295A, 208, 500, 504, 505(2), 506, 120B और 117 में केस दर्ज किया गया है।

भूली हुई यादें- “वनराज भाटिया”

डॉ. कुमार विमलेन्दु सिंह | Navpravah Desk

बीत चुका ज़माना अपनी ख़ूबियों को, अगले ज़माने में ज़ाहिर कर सकने का ज़रिया बना कर ही गुज़रता है और अगली नस्लें, अगर ज़हीन होती हैं, तो समेट लेती हैं नेअमत को और जो भूल जाती हैं अपने जड़ों को और बेख़बर होती हैं, आने वाले वक़्त की करवटों से, उनसे बहुत कुछ छूट जाता है|

साल दर साल, लगातार मौसिक़ी की दुनिया को सजाते रहने वाले, वनराज भाटिया, एक कभी न भूलने वाला अज़ीम नाम है| इन्होंने अपनी शानदार मौसिक़ी से, हिन्दुस्तान की कई पीढ़ियों के सपनों को तरन्नुम में ढाल कर, उनकी ज़िंदगी का हिस्सा बना दिया|

राष्ट्रीय पुरुस्कार विजेता वनराज भाटिया (PC-The Hindu)

1927 में जन्मे, भाटिया, न केवल हिंदुस्तानी क्लासिकल म्यूज़िक बल्कि मग़रिबी मौसिक़ी के भी जानकार हैं| इनकी पढ़ाई बंबई (अब मुंबई) में ही हुई और इन्होंने, अंग्रेज़ी अदब से MA किया, एलफ़िंस्टन कॉलेज मुंबई से| इस दौरान ये हिन्दुस्तानी मौसिक़ी सीखते रहे और इसके बाद ये 1954 तक लंदन और फिर 1958 तक फ़्रांस में भी मौसिक़ी सीखते रहे|

1959 में जब वनराज अपने देश लौटे, तो उन्होंने “शक्ति साड़ी मिल्स” के इश्तिहार के लिए म्यूज़िक दिया| यह पहला भारतीय इश्तिहार था, जिसमें म्यूज़िक का इस्तेमाल हुआ था| इसके बाद वनराज जी ने लगभग, 7000 इश्तिहारों में म्यूज़िक दिया| जिसमें लिरिल, गार्डेन वरेलिया, दिनेश और बहुत सारे ब्राण्ड रहे हैं| इन इश्तिहारों की म्यूज़िक, इतनी असरदार थी कि अब तक हमारे ज़हन में है|

एक टीवी इंटरव्यू में वनराज भाटिया (PC- Rajya Sabha TV)

New Wave Cinema के दौर में इन्होंने फ़िल्मों में भी म्यूज़िक देना शुरू किया| बतौर म्यूज़िक डायरेक्टर, 1974 में आई, श्याम बेनेगल की “अंकुर”, इनकी पहली फ़िल्म थी| इसके पहले 60 के दशक के आख़िरी सालों में, ये दिल्ली यूनिवर्सिटी में म्यूज़िक भी पढ़ा चुके थे| “अंकुर” के बाद इन्होंने “निशांत”, “मंथन”, “जाने भी दो यारों”, “मंडी”, “मैसे साहब” और न जाने कितने ही मशहूर फ़िल्मों में म्यूज़िक दिया| सिनेमा के बदलते दौर में भी, इन्होंने, “घातक”, “दामिनी”, “परदेस” और “चाईना गेट”, जैसी फ़िल्मों में बैकग्राउंड स्कोर भी दिया|

“वनराज भाटिया ने टीवी सीरियल और टेलीफ़िल्मों में भी अपना संगीत दिया. 1987 में आई टेलीफ़िल्म, “तमस” के लिए इन्हें नैशनल अवार्ड भी मिला. 1988 में आई, “वागले की दुनिया” टीवी पर ख़ूब मशहूर हुई. इसके बाद 1993 में आई, “बाइबिल की कहानियां” में भी एकदम सटीक और उचित संगीत दिया, लेकिन 1988 में ही “भारत एक खोज” का गीत, “सृष्टि का कौन है कर्ता”, आज भी कानों में गूंजता है और आज भी अपने साथ बचपन की कई यादें लिए आ जाता है. एक ऐसा ही गीत इन्होंने फ़िल्म “मंथन” में भी दिया था, “मेरो गाम काथा पारे…सुनो सुनो रे”, यही गीत बाद में बहुत दिनों तक AMUL दूध के इश्तिहार में भी इस्तेमाल होता रहा.”

मौसिक़ी सुन कर अपने माज़ी में पहुंच जाना, बेशक धुनों की ख़ूबी बताता है, लेकिन जब बीते हुए ज़माने की किसी ड्योढ़ी पर ठिठक कर, रुक कर, अगर किसी ख़ास राग, धुन या तरन्नुम के आने का, सुनाए जाने का इंतज़ार करते हैं, तो ये हमेशा ज़िंदा रहने का हुनर रखने वाले मौसिक़ार की ख़ूबी है|

93 साल के वनराज, आज भी मुंबई में रहते हैं, और इनके किए गए कामों की फ़ेहरिस्त भी इनके उम्र जितनी, या उससे ज़्यादा ही लंबी है| इन्हें और लंबी उम्र और सेहत नसीब हो|

नोट: वनराज भाटिया ने बहुत सारे विदेशी मौसिक़ारों के साथ भी काम किया है और कई तरीके से म्यूज़िक देते रहे हैं| इस लेख में, सिर्फ टीवी और फ़िल्मों में दिए गए म्यूज़िक की बात की गई है|

(लेखक जाने-माने साहित्यकार, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)

पत्थरबाज़ों की ख़ैर नहीं, सरकार सख़्त, होगी सात साल तक की सज़ा 

पत्थरबाज़ों की ख़ैर नहीं
पत्थरबाज़ों की ख़ैर नहीं
अमित द्विवेदी | Navpravah.com 
स्वास्थ्यकर्मियों पर लगातार हो रहे हमले को लेकर अब केंद्र सरकार ने कड़ा रूख किया है। केंद्रीय कैबिनेट में यह निर्णय किया गया है कि कोविड वॉरीअर्स पर जो भी हमला करेगा, उसको बख़्शा नहीं जाएगा। प्रधानमंत्री की अगुवाई में एक अध्यादेश पास किया गया है, जिसमें ३ महीने से सात साल तक की सज़ा का प्रावधान है। 
केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कैबिनेट बैठक में लिए गए फैसलों की जानकारी दी। जावड़ेकर ने कहा कि कई जगह डॉक्टरों के खिलाफ हमले की जानकारी आ रही हैं, सरकार इन्हें बर्दाश्त नहीं करेगी। सरकार इसके लिए एक अध्यादेश लाई है, जिसके तहत कड़ी सजा का प्रावधान किया गया है।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि मेडिकलकर्मियों पर हमला करने वालों को जमानत नहीं मिलेगी, 30 दिन के अंदर इसकी जांच पूरी होगी। 1 साल के अंदर फैसला किया जाएगा, जबकि 3 महीने से पाँच साल तक की सजा हो सकती है। उन्होंने कहा कि इसके अलावा गंभीर मामलों में 6 महीने से 7 साल तक की सजा का प्रावधान है। यही नहीं, गंभीर मामलों में 50 हजार से 2 लाख तक का जुर्माना भी लगाया जाएगा। अध्यादेश के अनुसार, अगर किसी ने स्वास्थ्यकर्मी की गाड़ी पर हमला किया, तो मार्केट वैल्यू का दोगुना ज्यादा भरपाई की जाएगी।
प्रकाश जावड़ेकर ने बताया कि देश में अब 723 कोविड अस्पताल हैं, जिसमें लगभग 2 लाख बैड तैयार हैं। इनमें 24 हजार आईसीयू बेड हैं और 12 हजार 190 वेंटिलेटर हैं, जबकि 25 लाख से अधिक N95 मास्क भी हैं। सरकार से प्राप्त जानकारी के मुताबिक़, 2.5 करोड़ N95 मास्क के ऑर्डर दिए जा चुके हैं।