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Thursday, August 6, 2026
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भूली हुई यादें- “शारदा राजन आयंगर ”

डॉ० कुमार विमलेन्दु सिंह | Navpravah Desk

आवाज़, रफ़ीक़ा होती है रूह की और रह जाती है, ठहर जाती है, हमेशा के लिए, उसी की तरह, उसी के साथ| कभी लम्हात का बयान बन कर तो कभी यादों का तरन्नुम बन कर, आवाज़ ही पहचान बनती है और यही पहचान याद रहती है ज़माने को| भूलना भी चाहे दुनिया उस अंदाज़ और आवाज़ को, तो रोशनाई, इस क़दर रवां होकर अल्फ़ाज़ों का ठिकाना बनाती है पन्नों को कि याद आ ही जाते हैं वो नाम और शारदा राजन आयंगर या शारदा, एक ऐसा ही नाम है|

प्लेबैक सिंगर ‘शारदा राजन आयंगर’ (PC-Doordarshan)

शारदा, 1937 में, तमिलनाडु में पैदा हुईं और बचपन से ही मौसिक़ी में उनकी दिलचस्पी रही| उन्होंने कर्नाटक शैली में संगीत सीखा भी|  वे तेहरान किसी वजह से गई हुई थीं और एक परिचित, श्रीचंद आहूजा के यहाँ किसी पार्टी में थीं, वहाँ उन्होंने एक गाना गाया, जो राज कपूर को बहुत पसंद आया, जो इत्तेफ़ाकन वहीं मौजूद थे| तुरंत ही उन्हें भारत में, उनसे मिलने को कहा राज कपूर ने|

संगीतकार शंकर-जयकिशन के मध्य शारदा (PC-MyviewsonBollywood)

1966 में उन्हें शंकर-जयकिशन ने, फ़िल्म “सूरज” में गाने का मौक़ा दिया| इस फ़िल्म में इनका गाया हुआ गाना, “तितली उड़ी, उड़ के चली”, इतना मशहूर हुआ कि उस साल का फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड देने में मुश्किल हो गई, क्योंकि उस वक़्त तक गाने के लिए एक ही अवार्ड दिया जाता था, या तो गायक या गायिका| एक तरफ़ शारदा का ये गीत था, और दूसरी तरफ़, मो० रफ़ी का गाया, “बहारों फूल बरसाओ”, आख़िरकार अवार्ड तो रफ़ी साहब को ही मिला, लेकिन शारदा की वजह से, 1966 ही वो साल बना जब ये फ़ैसला लिया गया कि अब दो अलग अवार्ड गाने के लिए, दिए जाएंगे, एक गायक को और एक गायिका को|

“अगले ही साल, राज कपूर ने, अपने वादे के मुताबिक़, “अराउण्ड द वर्ल्ड” में उन्हें मौक़ा दिया और , “दुनिया की सैर कर लो”, ” ये मंज़र देख कर जाना”, जैसे गीत गा कर, शारदा, भारी पड़ने लगीं, लता मंगेशकर और आशा भोंसले पर. हालांकि शारदा की आवाज़ थोड़ी अलग थी और दक्षिण भारतीय होने की वजह से तलफ़्फ़ुज़ का भी कुछ मसला था, लेकिन ये ही पसंद आया सुनने वालों को.”

शारदा ने हलचल पैदा कर दी थी| 1968-71 तक लगातार चार साल इन्हें, सबसे अच्छी गायिका के लिए, फ़िल्मफ़ेयर में नामित किया गया और दो बार इन्हें ये अवार्ड मिला भी| सब कुछ मुश्किल हो रहा था शीर्ष पर बने हुए लोगों के लिए|

शारदा और मो०रफ़ी (PC- mohdrafi.com)

सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था| 1971 में, “सिज़्लर्स” नाम से एक पॉप ऐल्बम रिलीज़ कर के, शारदा, भारत की पहली निजी ऐल्बम रिलीज़ करने वाली महिला बनीं| अब शारदा, हर अंदाज़ में गा रही थीं| शास्त्रीय के साथ पॉप को भी आसानी से गा लेना अद्भुत था| इतने रंग और अलग अंदाज़ नहीं थे उस दौर की, किसी भी और गायिका में| अचानक से शारदा को काम मिलना कम हो गया| उनके गाने रिकॉर्ड तो कराए जाते थे, लेकिन जब फ़िल्म आती थी, तो वे गाने निकाल दिए जाते थे| ये क्यों हो रहा था, मासूम शारदा समझ ही नहीं पाईं, और जब तक समझीं, लोग उन्हें भूलने लगे थे| इन्होंने बहैसियत म्यूज़िक डायरेक्टर भी काम करना चाहा| रफ़ी और लता ने भी इनके निर्देशन में गाया, लेकिन कामयाबी नहीं मिली| 1986 में शंकर के निर्देशन में अपना आख़िरी फ़िल्मी गीत इन्होंने गाया|

अब भी ये गाती हुई नज़र आती हैं कहीं कहीं, किसी मंच पर गाती हुई| इन्होंने कभी शिकायत नहीं की, लेकिन ये जान गईं, कि दुनिया में दो ही तरीक़े हैं महान बनने के, या तो अपनी क़ाबिलियत से आप सबसे आगे चलें या रोक दें किसी आगे जा रहे क़ाबिल को, और फ़िल्मी दुनिया में, दूसरा रास्ता ही चुना जाता है, शालीनता के लिबास में अपनी शख़्सियत को ढक कर|

(लेखक जाने-माने साहित्यकार, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)

“इरफ़ान खान: हज़ारों कहानियों का इकलौता चेहरा”

डॉ० कुमार विमलेन्दु सिंह | Editorial Desk

कभी ज़हानत पर शक़ न था उनके, कभी ख़य्याम न रहे, किसी जानिब जाने की बेक़रारी न थी, बस एक रोज़ जाना मुकर्रर था, सो चल दिए, न गुज़ारिश की, न इजाज़त मांगी, न इत्तला किया, बस चल दिए| इरफ़ान ऐसे ही फिर से फ़ानी बताकर इस दुनिया को, गुज़र गए|

दूरदर्शन पर एक टेलीफ़िल्म आई थी, “लाल घास पर नीले घोड़े”, उसी में पहली बार देखा था इरफ़ान को| लेनिन बने थे इरफ़ान| तब इतनी समझ नहीं थी कि अदाकारी पर कोई बात हो सके, पर वो किरदार, चस्पा हो गया दिल पर कहीं| इसी दौर में फिर से एक बार, “भारत एक खोज” में इरफ़ान दिखे और इस बार अलग लिबास और अंदाज़ में| सब फिर भी इन्हें, लेनिन ही कहते रहे| 1990 में आई फ़िल्म, “एक डॉक्टर की मौत” से इन्हें “अमूल्या” नाम से जानते रहे लोग| जब, जिस रूप में दिखे इरफ़ान, तब उसी नाम से जुड़ गए और ये कमाल था उनकी अदाकारी का| किसी के गुज़र चुके बचपन की कहानियों का अय्यार, किसी की ज़िदगी में रूहदार, किसी के लिए शायर मख़दूम तो किसी के लिए बीहड़ का बाग़ी| इन सब चेहरों का एक ही नाम था और रहेगा, इरफ़ान|

“हाल के ही एक इंटरव्यू में जब तिग्मांशु धूलिया से पूछा गया कि उनकी नज़र में सबसे बेहतरीन ऐक्टर कौन है, तो बिना झिझक, एक ही बार में, उन्होंने, इरफ़ान का नाम लिया|”

ऐसे ही जब एक पत्रकार ने वास्तविक पान सिंह तोमर के बेटे से पूछा कि उनके पिता और इरफ़ान द्वारा निभाए गए उनके पिता के किरदार में, कितनी समानता या असमानता है, तो उन्होंने बहुत दिलचस्प बात कही, “लंबाई और शक्ल छोड़कर, सब कुछ समान था”|

जब अंग्रेज़ी पढ़ने और पढ़ाने वाले लोगों ने इरफ़ान को “मक़बूल” और “हैदर” में “रूहदार” के किरदार में देखा तब उन्हें “मैकबेथ़” और “हैमलेट” का “ऐपेरिशन” बेहतर समझ आया| इरफ़ान ने हर किरदार को जी कर दिखाया और शामिल रहे सब की ज़िंदगी में|

मनोज वाजपेयी, पंकज त्रिपाठी और नवाज़ुद्दीन के ज़्यादातर किरदार, बिहार और उत्तर प्रदेश के कथानकों पर आधारित फ़िल्मों में हैं और ये सारे अदाकार उसी क्षेत्र विशेष के ही रहने वाले भी हैं| इरफ़ान का कोई वास्ता इन जगहों से नहीं रहा था, लेकिन जब वे किरदार निभाते थे तो कोई ये कह नहीं सकता था|

माह-ए-रमज़ान है और इरफ़ान! हम यही कह सकते हैं:

“इन्ना लिल्लाही वा इन्ना इलायही रजी’उन”

बहुत याद आओगे रूहदार|

नहीं रहा कलाजगत का सबसे माहिर ‘मदारी’

Irfan Khan
Irfan Khan

आनंद आर. द्विवेदी | Editorial Desk

दुनिया के कुछ बेहतरीन अदाकारों में शुमार रखने वाले इरफ़ान खान अब हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनकी कालजयी अभिनीत फ़िल्मों में और हमारे ज़हन में हमेशा जिंदा रहेंगे।

राजस्थान के टोंक जिले के टायर व्यवसायी जागीरदार खान और बेग़म खान के घर 7 जनवरी 1967 को ‘साहबज़ादे इरफ़ान अली खान’ का जन्म हुआ। बचपन से क्रिकेट के शौकीन इरफ़ान इस खेल में भी महारत हासिल कर चुके थे। लेकिन एमए की पढ़ाई करते हुए उन्हें नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में स्कॉलरशिप मिल गई। तमाम विषम परिस्थितियों के बावजूद बड़ी, गहरी आंखों व मखमली आवाज़ वाले इरफ़ान दिल्ली अपने गंतव्य की ओर निकल पड़े।

1988 में आई “सलाम बॉम्बे” से फ़िल्मी कैरियर शुरू करने वाले इरफ़ान “चाणक्य” और “चंद्रकांता” जैसे टीवी सीरियल्स में भी काम कर चुके हैं। “रोड टू लद्दाख” जैसी शॉर्ट फ़िल्म में इरफ़ान ने बेहतरीन अदाकारी का नमूना पेश किया। “मकबूल”, “हासिल” “पीकू”,”मदारी” जैसी फिल्मों के अभिनेता इरफ़ान का सफ़र चंद शब्दों में तय कर पाना असंभव है।

“इरफ़ान खान ऐसे कलाकार थे जिन्होंने बॉलीवुड समेत हॉलीवुड में भी अपने अभिनय का लोहा मनवाया। “लाइफ़ ऑफ पाई”,”इन्फर्नो”,’जुरासिक वर्ल्ड” जैसी फिल्मों में इरफ़ान का अभिनय विशेष तौर पर सराहा गया।”

इरफ़ान खतरनाक हाई ग्रेड न्यूरोएंडोक्राइन कैंसर से जूझ रहे थे। उन्होंने लंबे समय लंदन स्थित एक अस्पताल में इसका इलाज भी करवाया। हालात में सुधार होने पर वह भारत अपने घर आ गए। इरफ़ान ने कैंसर से जंग जीतने की इच्छा जाहिर करते हुए एक इंटरव्यू में कहा था कि वो अपनी पत्नी के लिए जिंदा रहना चाहते हैं। इसी बीच उनकी माँ चल बसीं। इरफ़ान की हालत भी बिगड़ने लगी जिसके चलते उन्हें मुम्बई के कोकिलाबेन अस्पताल में भर्ती करना पड़ा।

इरफ़ान खान का गुज़र जाना हर किसी को तकलीफ़ दे गया है। आज आनंद फ़िल्म का वह संवाद याद आरहा है, जिसमें राजेश खन्ना कहते हैं, ‘ ‘बाबू मोशाय, हम सब तो रंगमंच की कठपुतलियां हैं जिसकी डोर ऊपर वाले के हाथ में है, कौन कब कहां उठेगा, कोई नहीं जानता।’

नहीं रहे अभिनेता इरफ़ान ख़ान, 54 वर्ष की उम्र में ली अंतिम साँस

इरफान खान
नहीं रहे अभिनेता इरफ़ान ख़ान

एंटरटेनमेंट डेस्क | Navpravah.com

फिल्म अभिनेता इरफान खान का बुधवार को निधन हो गया। मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल में इरफान खान ने 54 साल की उम्र में अंतिम सांस ली। इरफान लंबे वक्त से बीमार थे और पिछले दिनों उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाया गया था। दिग्गज कलाकार के जाने से पूरे देश में शोक का माहौल है।

इस बारे में अस्पताल ने एक बयान जारी कर स्पष्ट किया कि , इरफान खान पेट की समस्या से जूझ रहे थे, उन्हें कोलन इन्फेक्शन हुआ था। अभिनेता के निधन की खबर सबसे पहले निर्देशक शूजीत सरकार ने दी। उसके बाद अस्पताल की ओर से बयान जारी किया गया।

शूजीत सरकार ने ट्वीट कर लिखा- “मेरा प्यारा दोस्त इरफान। तुम लड़े और लड़े और लड़े। मुझे तुम पर हमेशा गर्व रहेगा। हम दोबारा मिलेंगे। सुतापा और बाबिल को मेरी संवेदनाएं। तुमने भी लड़ाई लड़ी। सुतापा इस लड़ाई में जो तुम दे सकती थीं तुमने सब दिया। ओम शांति। इरफान खान को सलाम।”

कुछ दिन पहले ही इरफान खान की मां का निधन हुआ था, लेकिन खुद की खराब तबीयत और लॉकडाउन के कारण वो उनके अंतिम संस्कार में नहीं जा पाए थे। मां के निधन के कुछ दिन बाद ही इरफान खान को अस्पताल में भर्ती करा दिया गया था।

इरफान खान के निधन के बाद अमिताभ बच्चन, अक्षय कुमार, परेश रावल समेत बॉलीवुड के दिग्गजों ने श्रद्धांजलि दी। वहीं, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत समेत अन्य नेताओं ने भी उन्हें नमन किया।

बॉलीवुड के टैलेंटेड अभिनाताओं में शामिल इरफान खान के यूं अचानक चले जाने से उनके फैंस और बॉलीवुड सेलेब्स सदमे में हैं। दो साल पहले मार्च 2018 में इरफान को न्यूरो इंडोक्राइन ट्यूमर नामक बीमारी का पता चला था। विदेश में इस बीमारी का इलाज कराकर इरफान खान ठीक हो गए थे। भारत लौटने के बाद इरफान खान ने अंग्रेजी मीडियम में काम किया था। किसे पता था ये फिल्म इरफान की जिंदगी की आखिरी फिल्म साबित होगी।

भूली हुई यादें- “रतन कुमार”

डॉ० कुमार विमलेन्दु सिंह | Navpravah Desk

1947 हमारे मुल्क की आज़ादी के साथ, उसके तक़सीम होने का भी साल है| कुछ नया बना पाने की उम्मीदों के साथ, कुछ पुराना खो जाने का भी साल है, दिलों के अंदर तूफ़ान भरने का भी साल है, सरहदों और सियासत के आगे, मोहब्बत के हार जाने का भी साल है| ये साल है नफ़रतों की पैदाइश का और मीज़ान भी है हौसले और ख़्वाब तौलने का, ये साल| वे जो उस तरफ़ चले गए, उनमें से कुछ की परछाइयां यहीं रह गईं| उनका अंदाज़ यहीं रह गया, उनका तबस्सुम यहीं छूट गया| 1956 में, रतन कुमार, यहाँ से पाकिस्तान चले गए|

फ़िल्म ‘जागृति’ के एक दृश्य में रतन कुमार (PC-Upperstall)

रतन कुमार का जन्म 1941 में, अजमेर में हुआ था| इनका असली नाम, सैयद नज़ीर अली रिज़वी था और इनके वालिद, सैयद अब्बास अली रिज़वी, उर्दू के मशहूर अदीब और फ़िल्मकार, कृशन चन्दर के दोस्त थे| कृशन चन्दर 1946 में एक फ़िल्म बना रहे थे, जिसका नाम था “राख़”, इसके लिए उन्हें चाइल्ड आर्टिस्ट की ज़रूरत थी| रतन कुमार को देखते ही उन्होंने मन बना लिया और रोल दे दिया|

१९५४ की फ़िल्म ‘बूट पॉलिश ‘ के एक दृश्य में रतन कुमार

ये सफ़र की शुरूआत थी और सिलसिला ऐसा चला कि बहैसियत चाइल्ड आर्टिस्ट, रतन कुमार के पास ख़ूब काम आने लगा| उस दौर की लगभग, हर मशहूर फ़िल्म में, रतन कुमार, छोटे लड़के के किरदार में नज़र आए|

“1952 में आई “बैजू बांवरा” में ये छोटे बैजू के किरदार में नज़र आए. 1953 में आई “दो बीघा ज़मीन” और 1954 में तो इनकी शोहरत पूरे हिन्दुस्तान में फैल गई. 1954 में इनकी दो फ़िल्में आईं, राज कपूर निर्मित “बूट पॉलिश” और “जागृति”. फ़िल्म “जागृति” में बैसाखी लिए, “दे दी हमें आज़ादी, बिना खड्ग, बिना ढाल” गाता हुआ इनका चेहरा कोई नहीं भूला.”

फ़िल्म, “बूट पॉलिश” में, इन्होंने, डेविड और चंदा बर्क के साथ काम किया था| चंदा बर्क, नए और मशहूर सितारे, रणवीर सिंह की दादी थीं|

रतन कुमार (PC-Amar Ujala)

1947 में इनके लगभग सभी रिश्तेदार उस तरफ़ चले गए, लेकिन रतन कुमार, उस वक़्त बहुत सी फ़िल्में कर रहे थे, सो ये यहीं रुके| सारा काम कर लेने के बाद, 1956 में ये भी पाकिस्तान चले गए| वहां इन्होंने कई फ़िल्में बनाईं| “जागृति” का रीमेक, “बेदारी” नाम से वहां बनाया और मशहूर गीत, “आओ बच्चों तुम्हे दिखाएं, झांकी हिन्दुस्तान की” का पाकिस्तानी रूप ” आओ बच्चों सैर कराएं, तुमको पाकिस्तान की”, भी फ़िल्म में रखा| बतौर निर्माता, निर्देशक और नायक, वे पाकिस्तान में भी बहुत कामयाब न हुए| एक दुर्घटना में, उनकी 4 साल की बेटी भी गुज़र गई|

रतन कुमार, इतने बेज़ार हुए कि कभी न लौटकर आने के लिए कैलिफ़ोर्निया चले गए. वहीं उनका इंतक़ाल भी हुआ, 2016 में.

सियासत ने जो ज़मीन, नदी और पहाड़ हमसे ले लिए बंटवारे के वक़्त, उन्हें तो फिर भी किसी और नक़्शे में या तस्वीर में देखकर अपना माज़ी महसूस किया जा सकता है, लेकिन जो फ़नकार, जो अदीब, जो नग़्मापरदाज़, जो मौसिक़ार, जो मुसव्विर, एक बेहतर ज़िंदगी के लिए, एक अजीब से सफ़र पर, दिल के दूसरे जानिब चले, वे कहीं भी न पहुंचे, कहीं के न हुए.

(लेखक जाने-माने साहित्यकार, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)

“भारतीय संस्कृति: कर्मों पर आधारित है मानवता का उत्थान” : प्रो. रजनीश शुक्ल

प्रो. रजनीश शुक्ल | Editorial Desk

भारतीय संस्कृति इस त्रिआयमी संसार में चौथे आयाम की खोज करने का प्रयास मात्र है। ऐन्द्रिक अनुभवों पर आधारित इस भौतिक संसार में चौथे आयाम की खोज करने वाली भारतीय परंपरा पुरुषार्थ पर आधारित है। पश्चिमी सभ्यताओं की तरह भारतीय संस्कृति पुरुषार्थ के विषय में बहुत अलग स्थान पर पाई जाती है। पश्चिम में पुरुषार्थ का अर्थ प्रकृति और संसाधनों का उपभोग मात्र है जबकि भारतीय संस्कृति में पुरुषार्थ पशु से मनुष्य बनने की प्रक्रिया मानी गई है।

‌भारतीय संस्कृति में ईश्वर की मात्र आराधना करना ही अंतिम आदेश नहीं रहा बल्कि, ‘मनुर्भव’अर्थात ‘मनुष्य बनो’ का सिद्धांत निष्पादित किया गया है। केवल मनुष्य बनने की प्रक्रिया ही भारतीय संस्कृति का मूल आधार रही है। हमारी संस्कृति में मनुष्य के लिए केवल भौतिक कर्मों का अनुपालन व उपभोगवादी स्वभाव का ही प्रावधान नहीं रहा जिसके चलते विवेकहीन प्राणी अर्थात पशु और विवेक सम्मत प्राणी मनुष्य में अंतर भी बना रहा। धर्म निहित काम और धर्म नियामित अर्थोपार्जन की प्रवृत्ति ही मनुष्य की मुक्ति का माध्यम है।

“भारतीय संस्कृति को लेकर एक भ्रम है कि यह मोक्षवादी, पलायनवादी व वर्तमान समस्याओं से आँख मूंद लेने वाली संस्कृति है, जबकि वस्तुतः यह निराधार असत्य है। भारतीय संस्कृति सदैव कर्म प्रधान ही रही है जिसके माध्यम से ही मनुष्य का उत्थान सम्भव है।”

हमारी संस्कृति का यह मूलभूत सिद्धांत रहा है कि मनुष्य का जन्म ही इसलोक में ऋण के साथ होता है जोकि परलोक में सम्भव नहीं है। इन्हें ऋणत्रयं अर्थात देवऋण,पितृऋण, आचार्यऋण कहा गया है, जहाँ देवऋण से तात्पर्य है प्रकृति का ऋण, पितृऋण से तात्पर्य है पिता और पूर्वजों का ऋण, तथा तीसरा व अंतिम ऋण है आचार्य का ऋण जिसका अर्थ है कि जिस ज्ञान का अर्जन मनुष्य ने अपने शिक्षकों व आचार्यों से किया है उसे आगे वितरित व प्रसारित करेंगे यह आचार्य ऋण की पूर्ति है। इन तीनों ऋणों की पूर्ति करने वाला ही मोक्ष की प्राप्ति कर लेता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति के लिए अलग से प्रयास नहीं करना पड़ता है।

भारतीय संस्कृति में ज्ञान की पवित्रता का सिद्धांत सर्वोपरि माना गया है जिसमें ज्ञान को सम्यक माना गया है न कि उपदिष्ट अर्थात किसी के उपदेशों पर आधारित ज्ञान। अन्य किसी संस्कृति में ज्ञान की यह अवधारणा दीख नहीं पड़ती है। हालांकि अरस्तू के सिद्धांत में इसकी एक झलक प्राप्त होती है जहाँ वह कहते हैं कि, “Knowledge is virtue”. तर्क के बारे में यह माना जाता रहा है कि तर्क की ज्ञान है जबकि भारतीय संस्कृति में ज्ञान को तर्क का उपकारक अवयव माना गया है। ज्ञान सार्वभौमिक हो सकता है किंतु तर्क नहीं।

(यह आलेख प्रोफेसर रजनीश शुक्ल, कुलपति, महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, के व्याख्यान का प्रमुख अंश है। )

भूली हुई यादें- “जावेद ख़ान अमरोही”

डॉ० कुमार विमलेन्दु सिंह | Navpravah Desk

अपना मुस्तक़बिल नामालूम हो, कुछ फ़ासले के बाद वक़्फ़ा हो और हर वक़्फ़े में थोड़ा सुकून और थोड़े मुश्क़िलात हों, कुछ शजर के साए भी मिलें, कुछ धूप भी, तब सफ़र यादगार बन जाता है और मुड़ कर देखने पर लगता है, ख़ूब चलें हम बेहतरी की तरफ़, कुछ इबारतें लिखते, कुछ अफ़सोस मिटाते| सफ़र कुछ ऐसा ही रहा, जावेद ख़ान अमरोही का|

जावेद ख़ान अमरोही

जावेद की पैदाइश, 1953 में, मुंबई में ही हुई और इनके वालिद, पेशे से डॉक्टर थे| ये बचपन से ही खेल कूद के शौक़ीन थे और क्रिकेट में इनकी ख़ास दिलचस्पी थी| खेल-कूद में अच्छा होने के कारण, ख़ालसा कॉलेज में इनका दाख़िला भी हुआ और फ़ीस भी माफ़ कर दी गई| भारतीय क्रिकेट टीम के लिए 36 संभावित खिलाड़ियों की फ़ेहरिस्त बनी, उसमें सुनील गावस्कर का नाम तो पहला था, लेकिन थोड़ा नीचे, जावेद ख़ान का भी नाम था| क़िस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था लेकिन| उसी दौरान इनके वालिद भी गुज़र गए थे और इन्हें भी किडनी में कुछ समस्या आ गई थी| ये आगे खेल न सकें और मायूस रहने लगे| इसी कॉलेज की ड्रामैटिक सोसायटी भी बहुत अच्छी थी और जावेद के उर्दू बोल पाने के कारण, उन्हें एक नाटक में, पाक़िस्तानी सिपाही का रोल करने का मौक़ा मिला| जावेद को बहुत मज़ा आया|

“लगातार नाटक करते हुए, जावेद IPTA से जुड़े और ख़ूब मेहनत करते रहे| 1976-77 का दौर था और रामानंद सागर जी ने एक कॉन्टेस्ट रखा था और कुछ निर्माताओं के साथ मिलकर. वहां भी जावेद की ऐक्टिंग से, सब बहुत प्रभावित हुए. वहाँ इनकी मुलाक़ात, रज़ा मुराद और किरन कुमार से हुई और उन दोनों ने जावेद को पेशेवर ऐक्टर बनने की सलाह दी और इनकी ख़ूब तारीफ़ की. जावेद को इससे हौसला मिला.”

जावेद ख़ान ने रंगमंच पर ख़ूब काम किया था और सभी उनकी अदाकारी के मुरीद थे| जल्दी ही इनपर, फ़िल्मी दुनिया के लोगों की नज़र पड़ने लगी| वैसे तो छोटे किरदार मिलने इन्हें,1977 से ही शुरू हो गए थे, लेकिन 1979 में आई फ़िल्म, “नूरी”, में इन्हें बड़ा रोल मिला| फ़िल्म, यश चोपड़ा ने बनाई थी और निर्देशक मनमोहन कृष्णा थे| यहाँ से जावेद को लोग पहचानने लगे| अब ये रुकने वाले नहीं थे| साल दर साल ये कई छोटी बड़ी फ़िल्मों और रोल में नज़र आने लगे और थोड़ी ही देर में दर्शकों का एक राबता सा बन जाता था इनके किरदारों से|

फ़िल्म ‘लगान’ में बतौर रामसिंह, जावेद ख़ान अमरोही (PC-Youtube)

80 का दशक टीवी के नाम था| जावेद ने टीवी पर भी ख़ूब काम किया| 1984 में, “ये जो है ज़िंदगी”, “नुक्कड़”, 1986 में और 1988 में, “मिर्ज़ा ग़ालिब” में ये नज़र आए| “नुक्कड़”, के क़रीम नाई को आज भी कोई नहीं भूला|

फ़िल्मों में भी ये लगातार दिखते रहे| “प्रेम रोग” से लेकर “त्रिदेव” तक, और “लगान” से लेकर “चक दे इंडिया” तक, ये हमेशा हमारी नज़रों के सामने से होकर गुज़रते रहे|

आज भी ये मुंबई के ZIMA में ऐक्टिंग सिखाते हैं| इन्होंने जो भी पाया, मेहनत से पाया और ये क्या खाते हैं, कितना सोते हैं, कब टहलते हैं और आज इनका बच्चा हंसा या नहीं, आज तक कभी किसी ख़बर का हिस्सा नहीं बना|

“लगान”, में जब आख़िर में  ये चिल्ला कर कहते हैं, “हम जीत गए”, ऐसा लगता है कि पूरी क़ायनात भी उनके साथ यही दोहरा रही है और अगर उस चिल्लाने में, इनके चेहरे के भाव पर ग़ौर किया जाए तो नतमस्तक होते हुए, ये पता चल जाएगा कि ऐक्टिंग के लिए जिम जाने के अलावा, कितनी ज़्यादा चीज़े करनी पड़ती हैं और करनी चाहिए भी|

जावेद को उनकी शानदार अदाकारी के लिए मुबारकबाद|

(लेखक जाने-माने साहित्यकार, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)

प्लाज़्मा डोनेट करना चाहती हैं सिंगर कनिका कपूर, लापरवाही को लेकर थीं विवादों में

कनिका कपूर
प्लाज़्मा डोनेट करना चाहती हैं सिंगर कनिका कपूर

एंटरटेन्मेंट डेस्क । navpravah.com

कोरोना वाइरस से जीत चुकी पार्श्व गायिका कनिका कपूर ने अन्य मरीज़ों के लिए अपना प्लाज़्मा डोनेट करना चाहती हैं। लखनऊ के केजीएमयू अस्पताल के अधिकारियों ने ये जानकारी दी कि कनिका ने अपना प्लाज्मा डोनेट करने की पेशकश की है। कनिका हाल ही में अस्पताल से डिस्चार्ज हुई हैं।

पिछले महीने कनिका कपूर का कोरोना टेस्ट पॉज़िटिव आने के बाद बवाल मच गया था। उन पर लापरवाही के कई आरोप लगे थे और कई धाराओं में मामला भी दर्ज किया गया था। हालांकि कनिका ने अस्पताल से डिस्चार्च होने के बाद खुद पर लगे आरोपों पर इंस्टाग्राम पोस्ट के ज़रिए सफाई भी पेश की।

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प्राप्त जानकारी के मुताबिक़ आज कनिका कपूर को 30 अप्रैल सुबह 11 बजे सरोजनी नगर पुलिस स्टेशन पर पेश होने का नोटिस दिया गया। लखनऊ के महानगर इलाके में मौजूद शालीमार गैलन्ट अपार्टमेंट में मौजूद कनिका ने ख़ुद नोटिस रिसीव किया। सरोजिनी नगर थाने से चौकी इंचार्ज जग प्रसाद नोटिस लेकर पहुंचे थे। बता दें कि कनिका फिलहाल एसजीपीजीआई से डिस्चार्ज होने के बाद होम क्वॉरन्टीन में है।

बता दें कि कनिका बीते 9 मार्च को लंदन से मुंबई लौटी थीं, इसके दो दिन बाद वह लखनऊ गईं और वहां कई पार्टियों में उन्होंने शिरकत की थी। कनिका कपूर की लापरवाही को लेकर यूपी में उन पर कई FIR भी दर्ज की गई। कनिका पर कोरोना वायरस को लेकर लापरवाही बरतने के लिए उत्तर प्रदेश में तीन एफआईआर दर्ज करवाई गई हैं।

लॉकडाउन खोलने को लेकर नीति तैयार करें राज्य सरकारें -पीएम मोदी 

लॉकडाउन खोलने को लेकर नीति तैयार करें राज्य सरकारें -पीएम मोदी
लॉकडाउन खोलने को लेकर नीति तैयार करें राज्य सरकारें -पीएम मोदी
अमित द्विवेदी | navpravah.com
कोरोना संकट को लेकर सोमवार को प्रधानमंत्री मोदी ने देश के विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों से बात की। इस बैठक में पीएम मोदी ने स्पष्ट किया कि लॉकडाउन को खोलने को लेकर एक नीति तैयार करनी होगी और इस पर राज्य की सरकारों को मुस्तैदी से काम करना होगा।
सोमवार को प्रधानमंत्री और तमाम मुख्यमंत्रियों की इस बैठक में पीएम मोदी ने कहा कि राज्य की सरकारें अपनी नीति तैयार करें कि लॉकडाउन को कैसे खोला जाए। उन्होंने कहा कि ख़तरे के आधार पर हम इलाक़ों को क्रमशः तीन ज़ोन (ग्रीन, ऑरेंज और रेड) में बाँटेंगे। जिन राज्यों में मामले ज़्यादा हैं, वहाँ लॉकडाउन जारी रहेगा और जहाँ मामले कम हैं, वहाँ ज़िले के हिसाब से छूट दी जाएगी, ताकि मामले धीरे-धीरे एकदम समाप्त हो जाएँ।
अर्थव्यवस्था को लेकर न लें टेंशन-
प्रधानमंत्री मोदी ने अर्थव्यवस्था को लेकर भी लोगों का तनाव कम करने वाली बात कही। उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था को लेकर टेंशन न लें, हमारी अर्थव्यवस्था अच्छी है। बता दें कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने देश के अलग-अलग जिलों को जोन के हिसाब से बांटा है, अभी करीब 170 से अधिक जिले रेड जोन में शामिल हैं।
गौरतलब है कि कोरोना वायरस संकट की वजह से देश में 3 मई तक का लॉकडाउन लागू है। इस बीच आगे की रणनीति को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ चर्चा की। इसमें कई राज्यों की ओर से लॉकडाउन को आगे बढ़ाने और फेज़ वाइज़ लॉकडाउन हटाने का प्रस्ताव रखा गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्रियों के बीच ये बैठक करीब तीन घंटे तक चली। पीएम मोदी ने इस दौरान कहा कि राज्य सरकारों ने अच्छा काम किया है, लॉकडाउन की वजह से हमें लाभ मिला है।

नितीश ने उठाया अन्य राज्यों में फंसे छात्रों का मुद्दा-

 
इस बैठक में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कोटा में फंसे हुए बच्चों का मुद्दा उठाया। नीतीश कुमार ने मांग करते हुए कहा कि बच्चों को लाने के लिए एक नीति बननी चाहिए, कई राज्य लगातार बच्चों को वापस बुला रहे हैं। गौरतलब है कि बैठक से पहले भी कई राज्य सरकारें इस बात को कह चुकी हैं कि एक दम से लॉकडाउन को हटाना खतरनाक साबित हो सकता है, ऐसे में केंद्र सरकार को लॉकडाउन को लेकर अलग-अलग नीति बनानी चाहिए।

भूली हुई यादें- “वीरेन्द्र सक्सेना”

डॉ० कुमार विमलेन्दु सिंह | Navpravah Desk

छोटे शहर बहुत प्यारे होते हैं, उनमें रहना चाहिए, लेकिन एक वक़्त आने पर, उन्हें छोड़ भी देना चाहिए| छोटे शहर, इंसान को छोटी बातों का मतलब समझाते हैं और हर छोटी चीज़ के लिए, शुक्रगुज़ार होना भी सिखाते हैं| छोड़ इसलिए देना चाहिए इन शहरों को, क्योंकि, ये अपनी सरहदों में बांध लेते हैं, एक शख़्स को, और कई बार उनके सपनों को भी| ऐसे ही मथुरा में जब सपनों की लड़ाई, सरहदों से होने लगी, तो वीरेन्द्र सक्सेना, दिल्ली आ गए|

वीरेन्द्र सक्सेना (PC-RSTV)

वीरेन्द्र का जन्म 1960 में, मथुरा में हुआ था और वहीं, इनके पिता की नौकरी थी| मथुरा में, वीरेन्द्र, बहुत मशहूर थे, नौजवानों में, क्योंकि, वे बहुत अच्छा गाते थे, चित्रकारी करते थे और एक्टिंग भी करते थे| ये बड़े बेबाक़ से थे, सो इनके दोस्त पूरे शहर में थे|

“एक दौर आया जब इन्हें मथुरा में, अपने सपनों के लिए, जगह कम पड़ने लगी. इन्होंने, मथुरा के ही, एक राजा महेन्द्र प्रताप के सेक्रेटरी के तौर पर नौकरी कर ली और दिल्ली चले आए, उनके साथ. वीरेन्द्र की लिखावट बड़ी अच्छी थी, इसलिए वे राजा के ख़त भी लिखा करते थे.”

ज़िंदगी गुज़र ही रही थी, कि इनकी मुलाक़ात, अनिल चौधरी से हुई| अनिल ने कहा कि असग़र वजाहत का एक नाटक, “इन्ना की आवाज़”, IIC में होने वाला है, वीरेन्द्र चाहें, तो उसमें काम कर लें| वीरेन्द्र ने ऐसा ही किया और इतना अच्छा किया कि अगले दिन कविता नागपाल जैसी पत्रकार ने अपने रिपोर्ट में, नाम के साथ, वीरेन्द्र का ज़िक़्र किया| ये बहुत बड़ी हौसलाअफ़ज़ाई थी इनके लिए और राजा साहब को इन्होंने अलविदा कह दिया|

फ़िल्म ‘द मैकेनिक’ के एक दृश्य में वीरेन्द्र सक्सेना (PC-IMDB)

फिर इन्होंने, एम०के०रैना के साथ मिल कर, प्रयोग ग्रुप के अंतर्गत ख़ूब नाटक किए और 1979 में NSD में दाख़िल हुए| इसके बाद 1985 में आई, “मैसी साहब” में ये नज़र आए| लेकिन इनको शोहरत मिली, 1988 में आई, “तमस” से| इसके बाद तो कई किरदारों के रूप में ये दिखे| “आशिक़ी”, “दामिनी”, “कभी हां, कभी ना” से लेकर “भेजा फ़्राय 2”, “कमांडो 3” और इसी साल आई, “बाग़ी 3” तक में ये दिखे हैं|

टीवी पर भी इनका काम बहुत सराहा गया है| “भारत एक खोज”, “व्योमकेश बख़्शी”, “वागले की दुनिया” वाले टीवी के सुनहरे दौर से लेकर, लगभग मूक और सजे धजे किरदारों वाले सास बहु सीरियल्स के गिरे हुए दौर तक, इन्होंने काम किया है| “जस्सी जैसी कोई नहीं”, जिसे टीवी का अंतिम सीरियल कहा जा सकता है, एक निश्चित कहानी के साथ, उसमें भी वीरेन्द्र ने काम किया है| इन्होंने “White Rainbow”, “Cotton Mary”, “City of Joy” और “In Custody” जैसी बेहतरीन अंग्रेज़ी फ़िल्मों में भी काम किया है|

वीरेन्द्र सक्सेना फ़िल्म ‘सुपर 30’ में आनंद कुमार (ह्रितिक रोशन) के पिता के किरदार में (PC-Twitter)

वीरेन्द्र सक्सेना बताते हैं कि, इन्होंने हमेशा, अपनी शर्तों पर काम किया है और जब भी उन्हें सही लगा, छोटे किरदार भी निभाए और जब समझौता करने की बात आई, बड़े रोल भी ठुकरा दिए| शायद इसलिए ये कभी भी झूठी रोशनियों वाली पार्टियों या जलसों में नज़र नहीं आते| इनमें और इनके जैसे कई दिग्गज कलाकारों में अभिनय का अभूतपूर्व ज्ञान है, फ़िल्म फ़ेस्टिवल या अन्य आयोजनों में इन्हें आमंत्रित कर के नए अदाकारों को इनसे सीखना चाहिए, तभी वे समझ पाएंगे कि दोहरे अर्थ वाले चुटकुले के प्रदर्शन को अभिनय नहीं कहते और मोटे से पतले हो जाने को संघर्ष भी नहीं माना जाता|

(लेखक जाने-माने साहित्यकार, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)