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Wednesday, September 9, 2026
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चेन्नई बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए अमेरिका ने बढाया हाथ

AmitDwivedi@Navpravah.com

चेन्नई बाढ़ पीड़ितों के लिए अमेरिका ने सहायता की पेशकश की है. अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता मार्क टोनर ने वाशिंगटन से बयान जारी कर कहा है कि चेन्नई और भारत वालों की दुख की इस घड़ी में अमेरिका उनके साथ खड़ा है.

अमेरिकी विदेश विभाग ने चेन्नई बाढ़ पीड़ितों की हर संभव मदद करने की पेशकश की. विदेश विभाग ने स्पष्ट किया कि भारत को जिस तरह की सहायता चाहिए, वह हम प्रदान करने के लिए तैयार है. बाढ़ की वजह से चेन्नई का जन जीवन अस्त-व्यस्त है. बाढ़ प्रभावितों को किसी भी तरह की दिक्कत न हो, इसलिए केन्द्रीय मंत्री अरुण जेटली समेत अन्य भी नज़र बनाए हुए हैं. हालाँकि बाढ़ की वजह से जनसामान्य भारी समस्याओं का सामना कर रहा है. इस बीच अमेरिका दूतावास ने स्पष्ट किया है कि किसी भी तरह की दिक्कत न हो इसलिए दो दिन के लिए वाणिज्यिक दूतावास को बंद रखा जाएगा.

अमेरिकी विदेश विभाग ने भारत में रहने वाले अमेरिकियों से अपील किया है कि वे बाढ़ प्रभावित इलाकों से दूर रहे, जिससे उन्हें किसी भी तरह की सास्या का सामना नहीं करना पड़े.

‘कोटा’ एजुकेशन हब या कालकोठरी?

AnujHanumat@Navpravah.com

वर्ष २०१५ में अच्छे संस्थानों में प्रवेश के भारी दबाव के चलते कोटा में कुल २४ छात्रों ने आत्महत्या की। हालिया दिनों में आई रिपोर्ट की मानें तो पिछले पांच सालों में कुल ७२ छात्रो ने केवल इसलिए आत्महत्याएं की, क्योकि वो अच्छे संस्थानों में दाखिले को लेकर बहुत ज्यादा दबाव और अपने अभिभावकों की आशाओं पर खरे नही उतर पा रहे थे, जिसकी वजह से उन्हें इतना बड़ा कदम उठाना पड़ा।

अभी कुछ दिनों पहले एक वरिष्ठ पत्रकार ने जब इसकी तह तक जाने का प्रयास किया तो बेहद चौंकाने वाले तथ्य सामने आये। रिपोर्ट की मानें तो कोटा के एक कोचिंग सेंटर में पढ़ने वाले १७ साल के छात्र ने हेल्‍पलाइन पर कॉल करके कहा कि वो सो नहीं पाता। उसे सपनों में दिखता है कि उसकी बायोलॉजी की किताबों से सांप और दूसरे जानवर बा‍हर निकलकर उस पर हमला कर रहे हैं। एक दूसरा स्‍टूडेंट हेल्‍पलाइन पर कॉल करने के मिनट भर बाद ही फूट-फूटकर रोने लगा।

हेल्‍पलाइन की लाइन एक्‍टिव होने के छह घंटे के भीतर २६ कॉल्‍स आ चुकी हैं। एक दिन में अंदाजन १०० कॉल्‍स आए। सभी एक ही कहानी कहती हैं। कोटा की कोचिंग फैक्‍टरी के स्‍टूडेंट्स अब टूट रहे हैं। कोटा में चल रहे ४० से ज्‍यादा कोचिंग संस्‍थानों के एक सामूहिक निकाय ने यह हेल्‍पलाइन शुरू की है। इस हेल्‍पलाइन में तनाव से निपटने में मदद करने वाले तीन एक्‍सपर्ट, शिक्षा क्षेत्र से जुड़े १० एक्‍सपर्ट और दो डॉक्‍टर शामिल हैं। हालांकि, यहां मेडिकल और इंजीनियर की तैयारी कर रहे लगभग १.५ लाख स्‍टूडेंट्स के लिए यह नाकाफी है। बता दें कि पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक इस साल अब तक २४ स्‍टूडेंट्स आत्‍महत्‍या कर चुके हैं। इनमें से १७ एलन करियर इंस्‍ट‍िट्यूट के हैं। हेल्‍पलाइन इसी संस्‍था में स्‍थ‍ित है।

देश का एक ऐसा शहर जिसने पिछले कुछ वर्षों में ‘कोचिंग हब’ के रूप में सबके बीच मजबूती से अपनी पहचान बनाई। यहाँ के कोचिंग संस्थानों में प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में छात्र-छात्रायें प्रवेश लेते हैं, जिनका एक मात्र यही उद्देश्य होता है कि वह मेडिकल या इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षाओं में सफल हो सकें। आलम यह है कि यहाँ आने वाले लाखों छात्रों में से २०-२५% छात्र ही सफल हो पाते हैं। कोटा में कोचिंग करने के लिए ६ राज्यों से कुल ८५% छात्र आते हैं। कोचिंग सेंटरों द्वारा एक छात्र से ५० हजार से १ लाख तक की मोटी रकम जमा कराई जाती है और रहने के लिए हॉस्टल में ७ से १५ हजार रूपये वसूले जाते हैं। आंकड़ों की मानें तो प्रतिवर्ष कोचिंग संस्थानों द्वारा हजारो करोड़ की कमाई की जाती है।

सारे कोचिंग संस्‍थानों का पूरा फोकस पढ़ाई पर होता है। यहां बच्‍चों पर अच्‍छा प्रदर्शन करने का जबरदस्‍त दबाव होता है। यहां पढ़ाई के अलावा ऐसे किसी दूसरे क्र‍ियाकलापों के लिए कोई जगह नहीं है, जिससे बच्‍चों पर से दबाव कुछ कम हो। असफल होने वाले स्‍टूडेंट्स के लिए शर्मिंदगी के हालात। कम रैंक वाले बच्‍चों को पीछे की सीटों पर बैठने कहा जाता है। आरोप है कि टीचर टॉपर्स को ज्‍यादा तरजीह देते हैं। जो बच्‍चे लाख कोशिशों के बावजूद अच्‍छे नंबर नहीं ला पाते, इस अपराध बोध से ग्रसित हैं कि वे अपने घरवालों और अध्‍यापकों की उम्‍मीदों पर खरे नहीं उतर पा रहे। बहुत सारे बच्‍चों को कोचिंग कोर्स ढेरों किताबों और बिना छुट्टी की वजह से बहुत कठिन महसूस होता है। पूरे साल में दीवाली के वक्‍त एक हफ्ते की छुट्टी ही मिलती है। यहां संडे को भी टेस्‍ट होते हैं। इतना कुछ है कि अगर बच्‍चे से एक क्‍लास भी छूट जाए तो वो पिछड़ जाता है।

एक अंग्रेज़ी अखबार को दिए साक्षात्कार में बंसल क्‍लासेज के सीईओ प्रमोद बंसल मानते हैं कि, “माता-पिता को भी बच्‍चों का ख्‍याल रखना होगा। अगर कोई बच्‍चा स्‍कूली पढ़ाई में कमजोर था तो वह कोटा के कठिन शैक्षिक माहौल को कैसे झेल पाएगा?” वहीं, करियर प्‍वॉइंट के डायरेक्‍टर प्रमोद माहेश्‍वरी का मानना है कि, “आत्‍महत्‍या करने वाले बच्‍चे भावनात्‍मक तौर पर कमजोर होते हैं। जब वे अपने घरवालों और अध्‍यापकों के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाते तो उन्‍हें अपराध बोध होता है। आत्‍महत्‍या की वजह प्रेशर नहीं बल्‍क‍ि यह अपराध बोध है।”

कोचिंग हब के रूप में देश भर में मशहूर कोटा अब फैक्‍ट्री का रूप ले चुका है। जहां छात्रों को कच्‍चा माल समझा जाता है और चौबीसों घंटे बहुमंजिली इमारतों में उनके साथ ‘माल तैयार करने’ की कवायद चलती रहती है। यहां 300 से भी ज्‍यादा कोचिंग इंस्‍टीट्यूट्स हैं। इनमें एलेन, रेजोनेंस, बंसल, वाइब्रैंट और कॅरिअर प्‍वाइंट पांच बड़े इंस्‍टीट्यूट्स हैं। इनके पास डेढ़ लाख से भी ज्‍यादा स्‍टूडेंट्स हैं। इन्‍होंने छात्रों को एक ऐसे सिस्‍टम में ढाल दिया है, जहां नाकामी का मतलब शर्म, डर और अंतिम अंजाम मौत होती है।

‘काशीबाई’ के दर्द को भी महसूस करेंगे दर्शक -प्रियंका चोपड़ा

AmitDwivedi@Navpravah.com 

संजय लीला भंसाली द्वारा निर्देशित फ़िल्म बाजीराव मस्तानी में प्रियंका चोपड़ा काशीबाई की सशक्त भूमिका में नज़र आएंगी। सह कलाकार दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह के साथ प्रियंका इस फ़िल्म में एक अलग अंदाज़ में ही नज़र आ रही हैं। प्रियंका कहती हैं कि दर्शकों को यह फिल्म ज़रूर भाएगी। भंसाली प्रोडक्शन व इरोज़ इंटरनेशनल द्वारा निर्देशित फ़िल्म बाजीराव मस्तानी सिनेमाघरों में 18 दिसम्बर 2015 को रिलीज़ होने जा रही है। नवप्रवाह.कॉम के साथ एक खास बात चीत में प्रियंका ने इस फ़िल्म व अपने अमेरिकी टीवी शो ‘क्वांटिको’ के बारे में कई दिलचस्प बातें साझा कीं। प्रस्तुत हैं कुछ खास बातें-

 

प्रश्न: संजय लीला भंसाली के साथ काम कर के आपको कैसा लगा?

प्रियंका: मैं संजय सर की बहुत बड़ी फैन (मुरीद) हूँ। मेरा मानना है कि यदि आप सही मायने में संजय लीला भंसाली का चरित्र चित्रित करेंगे, तो वह आपकी एक अमूल्य धरोहर होगी। राम लीला में एक गीत करने के बाद मैंने मेरीकॉम में काम किया, जिस फ़िल्म में वे निर्देशक तो नहीं थे पर निर्माता के रूप में फ़िल्म से गहराई से जुड़े थे। उनके साथ फिर काम करना एक बेहतरीन अनुभव था।

प्रश्न: दोबारा एक मराठी लड़की का किरदार निभाकर आपको कैसा लगा?

प्रियंका: काशीबाई का किरदार मेरे द्वारा निभाए अन्य किरदारों से बिलकुल अलग है। मैंने यह किरदार निभाने की हामी इसलिए भरी क्योंकि इतिहास ने इस किरदार को कभी बयाँ नहीं किया है। हालांकि हमारे पास बाजीराव और मस्तानी से जुड़ी कई जानकारियाँ हैं, काशीबाई के विषय में बहुत कम उल्लेख मिलता है। वह बहुत खास और अति संवेदनशील किरदार है। यह किरदार 500 वर्ष पुराना है और आप महसूस कर सकेंगे कि एक नारी के रूप में किस तरह से उसका दिल दुखा है।

प्रश्न: दीपिका के साथ अपने ताल मेल के विषय में कुछ बताइये।

प्रियंका: दीपिका और मैं एक दूसरे के साथ बहुत सहज हैं और हम दोनों जब भी मिलते हैं तब बहुत मज़ा करते हैं। कलाकारों के पास बहुत ज़्यादा समय नहीं होता लेकिन मैं अपनी महिला सह कलाकारों के साथ बहुत अच्छा ताल मेल बिठाती हूँ। मैं अपने पेशे से बहुत संतुष्ट हूँ और हमेशा अपने काम को और ज़्यादा बेहतर बनाना चाहती हूँ। अगर मैं अपने पेशे से संतुष्ट नहीं हूँ, तो मेरा भविष्य असुरक्षित है। इस फ़िल्म में दीपिका और मैं केवल 2 दृश्यों और एक गाने में साथ हैं क्योंकि मस्तानी और काशीबाई को हमेशा दूर रखा गया था मगर दोनों की कहानियाँ जुड़ी हुई थीं।

प्रश्न: इस क्षेत्र में आप एक सेल्फ मेड महिला हैं ,क्या आपको लगता है कि आपकी यात्रा बहुत कठिन रही है?

प्रियंका: मेरा मानना है कि आग में तपकर मिली हुई चमक ही नारी की असली शक्ति है और आप ‘कठिन’ कह कह कर अपने जीवन को और ज़्यादा कठिन बनाते हैं। इसीलिए मेरे लिए यह सफ़र बिलकुल कठिन नहीं था।

प्रश्न: पिंगा गीत के विषय में हमें कुछ बताइये।

प्रियंका: दीपिका से बेहतर कोई सह कलाकार हो ही नहीं सकता था इस गीत के लिए। हम दोनों ने एक दूसरे को बहुत प्रोत्साहित किया। इस गीत को कई हिस्सों में शूट किया गया और संजय सर लंबे शॉट्स लेते थे। हम लोगों को अंतरा और मुखड़ा अलग अलग फिल्माना था जो शारीरिक रूप से बहुत थकाने वाला था। हम लोगों के पैरों में कुछ जख्म भी हुए क्योंकि कोरियोग्राफी बहुत कठिन थी।

प्रश्न: यू एस (अमेरिका) में, खासकर आपके शो क्वांटिको की टीम की ओर से इस फ़िल्म को कैसी प्रतिक्रिया मिली?

प्रियंका: वे सभी बहुत उत्सुक हैं। साथ ही मुझे उन लोगों को समझाना पड़ता है कि यह एक पीरियड (प्राचीन कालावधि) की फ़िल्म है। वे लोग पूछते हैं कि क्या भारतीय लोग अब भी वैसे ही कपडे पहनते हैं, जैसा फिल्म में दिखाया गया है? और मैं कहती हूँ “नहीं”।

प्रश्न: कई लोगों का कहना है कि पिंगा गीत फ़िल्म में सही तरह से चित्रित नहीं किया गया है। इस विषय में आपका क्या कहना है?

प्रियंका: पहली बात, पिंगा एक लावणी गीत नहीं है। यह एक लोकगीत है। जीवनी पर आधारित हर फ़िल्म में कहानी का कुछ हिस्सा नाटकीय होता है। यह फ़िल्म “राव” नामक एक किताब पर आधारित है, जिसका उल्लेख निर्माताओं द्वारा साफ़ तौर पर किया गया है। दूसरी बात यह कि ये संजय लीला भंसाली द्वारा निर्देशित फ़िल्म है, इसलिए आपको खुद जा कर देखना चाहिए, उसका अनादर क्यों? यह एक प्रेम कहानी है जो समाज द्वारा वर्जित थी।

प्रश्न: भारत में काम करने और विदेश में अपने शो ‘क्वांटिको’ में काम करने में आप क्या अंतर महसूस करती हैं?

प्रियंका: दोनों जगहों पर काम करने में मात्र एक अंतर यही है कि यहाँ भारत में हम एक सीन 2 दिनों में शूट करते हैं जबकि वे लोग 10 सीन्स एक दिन में । इसके अतिरिक्त भाषा का भी अंतर है। यहाँ हम हिंदी बोलते हैं और वहां वे लोग फ्रेंच में बातें करते हैं।”

जलवायु परिवर्तन का वैश्विक सन्दर्भ

Dr.JitendraPandey@Navpravah.com 

 

यजुर्वेद में वरुण देवता की उपासना करते हुए लिखा गया है – “शन्नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये।” अर्थात् हे परमेश्वर!  हमारे जल पवित्र हों जिससे हम पर सुखों की वर्षा हो । ऋषियों द्वारा पर्यावरण पर इस प्रकार का चिंतन उनके दूरदृष्टि का परिचायक है। दुनिया पर गहराते संकटों में से “पर्यावरण की समस्या” प्रमुख है। इससे जीवन-चक्र में एक असन्तुलन सा पैदा हो गया है। इसकी चपेट में मानवजाति के साथ-साथ अन्य प्रजातियां भी हैं। इस पर नियंत्रण पाने के लिए विश्व के तमाम राष्ट्र अपनी चिंता समय-समय पर व्यक्त करते आए हैं। पर्यावरणविद् विश्व समुदाय को इसके भयंकर परिणाम भुगतने की चेतावनी वर्षों पहले कड़े शब्दों में जारी कर चुके हैं।

इन दिनों प्राकृतिक आपदाओं के साथ-साथ हमारा स्वास्थ्य भी प्रभावित हो रहा है। अनेक नई बीमारियों का जन्म इसी बात का द्योतक है कि प्रदूषण में बेतहासा वृद्धि हो रही है। देश की राजधानी दिल्ली में श्वास सम्बन्धी बीमारी का कारण वायु-प्रदूषण को ठहराया गया। कल-कारखानों के साथ-साथ आराम मुहैया कराने वाले वस्तुओं में भारी बढ़ोत्तरी हो रही है।

ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन अनियंत्रित हो चुका है। स्थिति गम्भीर बनी हुई है। इसे एक उदाहरण द्वारा आसानी से समझा जा सकता है, “अगर मेंढक को उबलते पानी में डाल दें तो वह छलांग लगा कर बाहर आ जाएगा और उसी मेंढक को अगर सामान्य तापमान पर धीरे -धीरे गरम करने लगें तो क्या होगा ? मेंढक फौरन मर जाएगा? जी नहीं।ऐसा बहुत देर के बाद होगा। दरअसल होता यह है कि जैसे-जैसे पानी का तापमान बढ़ता है, मेढक अपने शरीर का अनुकूलन उस तापमान के अनुसार करने लगता है। पानी खौलने तक ऐसा ही करता रहता है। अपनी पूरी उर्जा पानी के तापमान से तालमेल बिठाने में खर्च करता रहता है। जब पानी खौलने लगता है, मेढक अपने शरीर को उसके अनुसार समायोजित नहीं कर पाता है, क्योंकि उसने अपनी सारी ऊर्जा वातावरण के साथ खुद को अनुकूलित करने में खर्च कर दी है। परिणामतः मर जाता है। मेढक क्यों मरता है? कौन मारता है उसको? पानी का तापमान? गरमी या उसका स्वभाव? इसका उत्तर होगा, मेढक की असमर्थता। सही वक्त पर फैसला न लेने की अयोग्यता। इसी तरह हम भी अपने वातावरण के साथ सामंजस्य बनाए रखने की तब तक कोशिश करते हैं, जब तक कि छलांग लगा सकने की हमारी सारी ताकत खत्म नहीं हो जाती। तय हमें करना होता है कि हम मेंढक की तरह मरें या समय रहते चेतें।” यह धरतीवासियों का सौभाग्य है, समय ने करवट ली।

अब तक यूरोपीय देश “जलवायु परिवर्तन सम्बन्धी” सभी जिम्मेदारियों को एशियाई देशों के मत्थे मढ़ते आए हैं। स्थिति की भयावहता उन्हें पुनर्विचार के लिए बाध्य कर रही है। मात्र अपने वर्तमान को देखने वाले इन देशों को आगामी पीढ़ियों की चिंता सताने लगी है। परिणामतः वैश्विक मंच पर उनका सहयोग और सहकारिता देखने को मिल रही है। भारत में स्वच्छ ऊर्जा के उत्पादन के लिए अमेरिका द्वारा 2.5 अरब डॉलर की मदद इसी श्रृंखला की एक कड़ी है। इसी तरह अन्य यूरोपीय देश भी प्रगतिशील राष्ट्रों को वित्तीय मदद प्रदान कर स्वच्छ ऊर्जा से सम्बंधित प्रौद्योगिकी का वहां विकास करना चाहते हैं। इससे जलवायु परिवर्तन की जटिलताओं से मुक्त होने में अवश्य मदद मिलेगी।

जलवायु-परिवर्तन सम्बन्धी बारीकियों का विश्लेषण करते हुए रिचर्ड वर्मा ने लिखा है, ” अभी विश्व का 85 प्रतिशत से अधिक उत्सर्जन करने वाले 150 से अधिक देशों ने ग्रीनहॉउस गैसों का उत्सर्जन कम करने का संकल्प लिया है। इस वचनवद्धता को ‘इंटेंडेड नेशनली डिटरमाइंड कंट्रीब्यूशन्स’ या आईएनडीसी कहा गया है। अमेरिका वर्तमान अकार्बनीकरण की दर को दोगुना करके अगले 10 सालों में इसमें 26 से 28 प्रतिशत और कटौती का प्रयास कर रहा है।इसे 2005 के स्तर से भी नीचे लाने का लक्ष्य है।

भारत की आईएनडीसी में गैर-जीवाश्म इंधन से विद्युत उत्पादन क्षमता बढ़ाना शामिल है। इसके अलावा कार्बन सोखने वाले वनों के विस्तार का लक्ष्य भी लिया गया है। “इस प्रकार दुनिया में होने वाली इस प्रकार की सकारात्मक पहल प्रशंसनीय है। यह गर्व का विषय है कि इस मुद्दे पर भारत सरकार की अहम् भूमिका है। दुनिया की नज़रें भारत पर टिकी है। यह कोई भावुक राष्ट्र-प्रेम नहीं किन्तु हवा के रुख से साफ है कि भविष्य में भारत काल के कपाल पर पुनः लिखेगा, ” सहनाववतु सहनौभुनक्तु “अर्थात् एक साथ चलें, एक साथ भोग करें, एक साथ पुरुषार्थी बनें तथा किसी को किसी के प्रति विद्वेष न हो।

लोकपाल बिल से अन्ना भी नाराज़!

Bureau@Navpravah.com

दिल्ली विधानसभा में पेश किए गए जनलोकपाल बिल को लेकर आम आदमी पार्टी को एक और झटका तब मिला, जब अन्ना हजारे ने भी इसमें 3 कमियाँ गिना दी. अन्ना ने बिल देखने के बाद स्पष्ट किया कि उन्हें जो बिल दिखाया गया है, उसमे तीन प्रमुख सुधारों की आवश्यकता है. अन्ना के मुताबिक लोकपाल चुनाव समिति के लिए 7 लोगों के नाम तय किए गए थे, जबकि इस बिल में सिर्फ पाँच लोगों को ही जगह दी गई है.

बिल की 3 कमियों में से दूसरी कमी लोकपाल को निकालने की प्रक्रिया में है. फिलहाल जो कानून बनाया जा रहा है, उसमें जांच के बाद महाअभियोग चलाने के बाद दो तिहाई बहुमत से हटाने की बात हैं. अन्ना ने सुझाव दिया है कि दो तिहाई बहुमत से लोकपाल को निकालने की प्रक्रिया की जांच हाई कोर्ट की ओर से हो. उन्होंने कहा कि सज़ा को लेकर बनाया गया विधान इसकी तीसरी सबसे बड़ी कमियों में से एक है.

अन्ना ने कहा कि करप्शन पर ब्रेक लगाकर ही देश का विकास किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि इन कमियों को समाप्त करके ही लोकपाल के उद्देश्य को सफल बनाया जा सकेगा. दिल्ली में आम आदमी को आम आदमी पार्टी से बड़ी उम्मीदें हैं, ऐसे में इन्हें अपनी कही बातों पर खरा उतरने की हर सभव कोशिश करनी चाहिए.

अन्ना हजारे ने कहा, हालाँकि आज भी अरविंद और उसकी टीम करप्शन के खिलाफ लड़ रही है. लेकिन इन बड़े बदलावों के बगैर यह प्रयास सफल नहीं हो सकता. बीच-बीच में कुछ न कुछ अडचने आती रहेंगी. अन्ना ने कहा कि देश को भ्रष्टाचार से मुक्त करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को सहयोग करना होगा, तभी यह प्रयास अपना मूर्त रूप ले सकेगी. उन्होंने यह भी कहा कि इस प्रयास में यदि केंद्र सरकार सहयोग नहीं करती और विरोध करती है तो उन्हें दुःख होगा.

‘एड्स’ बीमारी या कलंक?

AnujHanumat@Navpravah.com

आज पूरा विश्व एड्स दिवस मना रहा है। एक दौर में जन स्वास्थ्य के लिए सबसे खतरनाक माने जाने वाले हयूमन इम्यूनोडिफिसिएंसी वायरस (एचआईवी)/एड्स के मामलों में यूनिसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक़ वैश्विक स्तर पर गिरावट देखने को मिली है। 29 साल की जंग के बाद भारत में भी एचाआईबी/एड्स के मामलों में कमी दर्ज की गई है। देश में इस तरह का पहला मामला मामला 1996 में दर्ज किया गया था। इसके खिलाफ सफलता से उत्साहित सयुंक्त राष्ट्र ने वैश्विक रूप से इस वाइरस और एड्स बीमारी से पूरी तरह से निजात पाने के संकल्प के साथ इस साल की थींम ‘एचआईबी पीड़ितों की संख्या शून्य तक ले जाना’ निर्धारित की है।

साल 2014 की रिपोर्ट के अनुसार 3.99 करोड़ लोग पूरे विश्व में एड्स से पीड़ित हैं और वर्ष 2014 तक 12 लाख लोगों की एड्स से मौतें हो चुकी हैं।  पिछले 15 वर्षों में एड्स के मामलों में 35% कमी आई है और पिछले एक दशक में एड्स से हुई मौतों के मामलों में 42% कमी आई है। अगर हम भारत की स्थिति की बात करें तो पूरे विश्व में एचआईवी पीड़ितों की आबादी के मामलें में हमारा देश पूरे विश्व में तीसरा स्थान रखता है। यहाँ 15-20 लाख लोग एड्स से पीड़ित हैं और 1.50 लाख लोग वर्ष 2011-2014 के बीच इसकी वजह से मर चुके हैं। हमारे देश में कुल एड्स पीड़ितों में 40% महिलाएं शामिल हैं।
पीड़ितों में किशोरों की सर्वाधिक संख्या चिंताजनक-
विश्व में एचआईबी से सबसे अधिक किशोर 10-19 वर्ष से पीड़ित है। यह संख्या 20 लाख से अधिक है। वर्ष 2000 से अब तक किशोरों के एड्स से पीड़ित होने के मामलों में तीन गुना इजाफा हुआ है। यह दावा यूनीसेफ की ताजा रिपोर्ट में किया गया है जो कि चिंता का विषय है। एड्स से पीड़ित दस लाख से अधिक किशोर सिर्फ छह देशों में ही रह रहे हैं, इनमे दक्षिण अफ्रीका, नाइजीरिया, केन्या, भारत, मोंजाबिक और तंजानिया हैं। माँ से नवजात को होने वाले एचआईबी संक्रमण से मुक्त पहला देश क्यूबा बन गया है।

एड्स के प्रति जागरूक करने के मकसद से 1988 से हर वर्ष एक दिसम्बर को विश्व एड्स मनाया जाता है । एड्स को तमाम जागरूकता, अभियानों के बावजूद अब भी एक संक्रमण नहीं, बल्कि सामाजिक कलंक के रूप में देखा जाता है। घर-परिवार और समाज से लेकर कामकाज की जगहों तक में एचआईवी/एड्‌स से ग्रस्त लोग अपमान, प्रताड़ना और भेदभाव के शिकार हो रहे हैं।

हैरत और दुख की बात तो यह है कि ऐसा बर्ताव केवल नादान और अज्ञानी लोग ही नहीं कर रहे, बल्कि डॉक्टरी पेशे से जुड़े वे व्यक्ति भी कर रहे हैं, जिन पर एचआईवी से पीड़ित लोगों की देखभाल और सहायता की जिम्मेदारी है। आए दिन ऐसे अस्पतालों या डॉक्टरों की खबरें आती रहती हैं, जो एचआईवी से पीड़ित व्यक्तियों के इलाज या देखभाल के लिए साफ इनकार कर देते हैं। भारत सरकार के राष्ट्रीय एड्‌स नियंत्रण संगठन (नाको) के मुताबिक लगभग 18 प्रतिशत एचआईवी पॉजिटिव लोग अपने पड़ोसियों से भेदभाव के शिकार होते हैं, जबकि नौ प्रतिशत को समुदाय या शिक्षण संस्थान के स्तर पर अपमान व प्रताड़ना का शिकार होना पड़ता है। यही वजह है कि 74 प्रतिशत एचआईवी पॉजिटिव व्यक्ति अपने कामकाज की जगह पर अपनी बीमारी की बात छिपाकर रखते हैं। इस भेदभाव में लिंग का भी खास दखल दिखाई देता है। पुरुषों की तुलना में महिलाओं को ज्यादा कहर झेलना पड़ता है। एचआईवी का संक्रमण होने पर उन्हें घर छोड़ने के लिए कह दिया जाता है। पत्नियां अपने एचआईवी पॉजिटिव पति की देखभाल करने में संकोच नहीं दिखातीं, जबकि पति कम ही मामलों में सहायक साबित होते है।

जानकारी पर गलतफहमियां हावी-

इन सारे भेदभाव की जड़ है एचआईवी/एड्‌स के बारे में फैली तरह-तरह की गलतफहमियां। हमारे देश में एड्‌स का पहला मामला लगभग 21 साल पहले चेन्नई में पाया गया था। आज एचआईवी/एड्‌स के साथ जिंदगी गुजार रहे लोगों की तादाद 25 लाख से ऊपर बताई जाती है। इस बीच विभिन्न संचार माध्यमों का इस्तेमाल करके लोग एचआईवी/एड्‌स को छुआछूत का रोग मानते हैं। ऐसी गलतफहमी के बने रहने की वजह क्या है? दरअसल समस्या यह है कि आज भी हमारे समाज में एचआईवी/एड्‌स का जिक्र आते ही लोग सशंकित हो जाते हैं और बात पर रुख पलट देते हैं।

कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें लगता है कि एचआईवी पॉजिटिव व्यक्‍ति को देखने से ही उन्हें संक्रमण हो जाएगा। इस डर को भगाने के लिए हमें इसके बारे में जागरूकता फैलानी होगी। पश्चिमी देशों में एचआईवी पीड़ितों के प्रति किसी के मन में कोई द्वेष नहीं होता, क्योंकि वहां के लोगों को इसके बारे में भरपूर जानकारी है। ऐसे कई रोग हैं, जो इंसान को प्रभावित करते हैं और उसे पीड़ित करते हैं। ऐसा नहीं है कि कोई पीड़ित इसीलिए होता है क्योंकि उसे एचआईवी संक्रमण है। अगर आप देखें तो एचआईवी अपने आप में कोई रोग नहीं है। यह एक ऐसी स्थिति है, जिसमें हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी आ जाती है। इससे शरीर कमजोर होता है और रोगों से लडऩे की उसकी क्षमता क्षीण हो जाती है।

एचआईवी एड्स महज एक मेडिकल समस्या नहीं है, यह सामाजिक संकट बनती जा रही है। एक समय लोग सोचते थे कि भारत जैसे देश में यह रोग तेजी से नहीं फैलेगा, क्योंकि यहां सामाजिक नियम बड़े कड़े हैं। जाहिर है कि यह बात गलत साबित हुई। आज अगर ग्रामीण इलाकों के लोग भी इस रोग की चपेट में आ रहे हैं तो उसका मतलब यह है कि समाज के ऐसे कई पहलू हैं जिनको हमने नहीं समझा है।

अगर एचआईवी से पीड़ित लोग अपनी जीवन ऊर्जाओं को तीव्र अवस्था में कायम रखें तो भले ही उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को पूरी तरह वापस न लाया जा सके, लेकिन उसे काफी हद तक बढ़ाया जरूर जा सकता है।
अंततः समझदारी से रहना ही इस समस्या का एकमात्र हल है। यह भी महत्वपूर्ण है कि जो लोग एचआईवी से संक्रमित हैं, वे अपनी जिम्‍मेदारी समझें और सावधानी से चलें। अगर एचआईवी से पीड़ित लोग अपनी जीवन ऊर्जाओं को तीव्र अवस्था में कायम रखें तो भले ही उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को पूरी तरह वापस न लाया जा सके, लेकिन उसे काफी हद तक बढ़ाया जरूर जा सकता है। अगर रोगी अपने खानपान के अलावा काम करने के तरीके और जीवन के दूसरे पहलुओं का भी ख्‍याल रखे, तो वह रोगों से लडऩे की अपनी क्षमता को बढ़ा सकता है। अगर कोई कष्ट में है तो यह महत्वपूर्ण नहीं होता कि उसकी वजह क्या है। आप ऐसा नहीं कह सकते कि एक पीड़ा बड़ी है और दूसरी छोटी। यह सोचना सही नहीं है कि अगर कोई कैंसर से पीड़ित है तो उसे प्यार देना चाहिए और अगर किसी को एड्स है तो उसे प्यार नहीं देना चाहिए। जब सुनामी आई तो हर कोई मदद के लिए आगे आ रहा था। मुझे समझ में नहीं आता कि एचआईवी की समस्या का सामना करने के लिए भी लोग उसी तरह से सामने क्यों नहीं आ रहे हैं। जाहिर सी बात है कि करुणा सोच – समझकर या चुनाव करके नही दिखाई जाती। याद रखिए एड्स का सरकारी विज्ञापन इस बीमारी की भयावहता बिलकुल सही तरीके से बयां करता है। ‘एड्स की जानकारी ही बचाव है’। एक बार यह बीमारी हो जाए, तो फिर उसका कोई इलाज नहीं। इसलिए बेहतर है कि इस बीमारी से दूर ही रहा जाए। एड्स संक्रमित सुई, असुरक्षित यौन संबंधों, संक्रमित खून चढ़ाने और गर्भवती मां से होने वाले बच्चे को होता है। इनमें से काफी को हम रोक सकते हैं ।

अखिलेश सरकार (उत्तर प्रदेश ) में किसानों का बुरा हाल !

AnujHanumat@Navpravah.com

 

“पोखर को मैदान बनाया, मरता हुआ किसान बनाया, शहर बनाए, गाँव मिटाए, जंगल और पहाड़ हटाए, जहर मिले दुकानों में मरना कितना आसान बनाया, ये कैसा हिन्दुस्तान ?” 

पिछले डेढ़ दशक से भी ज्यादा समय से यहाँ के किसान आत्महत्या और सर्वाधिक जल संकट से जूझ रहे हैं। अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो अप्रैल वर्ष 2003 से मार्च 2015 तक 3280 (करीब चार हजार) किसान आत्महत्या कर चुके हैं। सूखे की भीषण मार झेल रही बुन्देलखण्ड की बंजर धरती के किसान इस बार भी पहले सूखे और फिर हाड़तोड़ मेहनत के बाद तैयार फसल पर ओलों की बारिश से आत्महत्या करने पर मजबूर हैं। पिछले 2 महीनों में शायद ही कोई ऐसा दिन गया हो जब गाँव से निकलती खबर में किसी किसान के आत्महत्या का मामला न आया हो। लाशो पर आंदोलन और सियासत का माहौल गर्म है, मगर उन गाँव का हाल जस का तस है, जहाँ सन्नाटे को चीरती किसान परिवारों की चींखे सिसकियों के साथ हमदर्दी जताने वालों की होड़ में बार बार शर्मसार होती है। सूखे का आलम इतना विकराल है कि अब यहाँ के किसान उसी छाते का प्रयोग अपने दो वक्त की रोजी रोटी के लिए कर रहे हैं, जिसका प्रयोग प्रायः लोग पानी बरसने पर अपनी शरीर ढंकने के लिए करते हैं।

कुछ सालों पहले विश्वविख्यात जबांजों की इस धरती के लोग भी बरसात में अपने शरीर को ढंकने के लिए छाते का प्रयोग करते थे, पर पिछले कई सालों से भगवान इंद्र जिस बेरुखी से रूठे हैं यहाँ के अधिकतर लोगो को अपना जीवनयापन इसी छाते को उल्टा करके करना पड रहा है। यहाँ का निवासी होना मेरे लिए गर्व की बात है पर इस वक्त यहाँ के किसान जिस प्रकार मौसम की मार झेल रहे हैं उसे देखकर बहुत दुःख होता है। ये नजारा जो आप चित्र में देख रहे है, ये महज एक चित्र नही बल्कि बुंदेलियों का जिंदगी से जूझने का वर्तमान उपाय है। मैं इसे ‘अम्ब्रेला शॉप’ का नाम इसलिए दे रहा हूँ, क्योकि इस अम्ब्रेला को उलटा करके इसी पे बिकवाली के लिए छोटी छोटी वस्तुएं रखी जाती हैं फिर इससे जो भी धन मिलता है, ससे ये लोग अपना परिवार पालते हैं।

बुन्देलखन्ड के आम जनजीवन पर आई ताजा रिपोर्ट से सरकार को उलझन मससूस हो सकती है,पर यहाँ के हालात बहुत चिंताजनक है, इसमें कोई दोराय नही। बुंदेलों की धरती पिछले तीन साल से बंजर पडी है, जलस्रोत लगभग सूख चुके हैं। पीने का पानी खत्म होता जा रहा है, यहाँ से लगभग ज्यादातर युवाओं का पलायन हो चुका है। फूल पत्ती, अनाज के पौधे तो क्या बड़े पेड़ पौधे, जीव-जंतुओं और इंसान तक के अस्तित्व पर खतरा उत्पन्न हो गया है। यहाँ के अधिकतर लोगो ने अपने पालतू पशुओं को हमेशा के लिए खूंटे से छोड़ दिया है, जिससे अन्ना प्रथा में अचानक बहुत तेजी आ गयी है। यहाँ के किसानो ने पिछले तीन सालों से ठीक प्रकार से बाजरा ,मूंग,सोयबीन की फसल नही देखी, ये फसलें पानी के अभाव में लगातार चौपट हो रही हैं, इन्हें उगाने वाले अधिकांश किसान बर्बादी की कगार पर हैं। 104 गाँवों के एक हजार से ज्यादा लोगो के सर्वे से तैयार रिपोर्ट में तो यहाँ तक कहा गया है कि हर पांचवा आदमी घास की रोटी खाने को मजबूर हैं। करीब इतनी ही आबादी भूखे रहने पर मजबूर हैं। गरीबी की रेखा के नीचे आने वाले करीब आधे लोग ऐसे हैं, जिन्हें आठ महीने से दाल नसीब नही हुयी है। फल-फूल, हरी सब्जिया नसीब होती नही ,दुधारू पशु घर पर हैं नही ! ऐसे में भुखमरी और कुपोषण फैलना स्वाभाविक है। कृषि प्रधान देश में जहाँ साठ फीसदी आबादी अभी भी रोजगार के लिए कृषि पर आधारित है वहीं मानसून से किसानों की बहुत सी उम्मीदें जुडी हुई है। अनाज उगाने वाले अन्नदाता अर्थात किसान आज भुखमरी और बेरोजगारी के शिकार हैं। कृषि व् कृषक सदियों से लोगो का पेट भरते आए हैं। गिरता हुआ जलस्तर,बढ़ती महंगाई ,सूखते कुँए व् तालाब तथा आत्महत्या करते हुए किसान बडे ही मार्मिक अंदाज में सरकारों से ये सवाल पूछ रहे हैं कि अभी भी यदि इन समस्यायों से निपटने का कुशल प्रबन्धन नही किया गया तो निश्चित ही एक दिन भारत की अधिकतर आबादी भूख से मर रही होगी ।

इस समस्या से निपटने के लिए सरकार के सामने दो तरह के उपाय दिखाई देते हैं । एक तात्कालिक और दुसरे दीर्घकालिक। तात्कालिक उपायों में पेयजल संकट ,भुखमरी,बेरोजगारी दूर करने के साथ ही जानवरों के लिए चारा और इंसानों के लिए रोजगार के अविलम्ब इंतजाम की आवश्यकता है। दूसरा इस क्षेत्र की भौगोलिक और जलवायिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर दीर्घकालिक उपायों को खोजा जाना चाहिए। इसके तहत लगातार तीन चार साल तक कम बारिश के बावजूद पीने और सिंचाई  के लिए पानी के भण्डारण की व्यवस्था,कम पानी में लहलहाने वाली स्थानीय प्रजातियों की पैदावार क्षमता बढ़ाना । स्थानीय उपज पर आधारित कुटीर उद्योगों को पल्लवित करने के लिए रेल, रोड और हवाई यातायात को सुगम बनाना। बिना विजन के पॅकेज जारी करने से इस क्षेत्र के भले की उम्मीद रखना दिन में सपने देखने जैसा ही साबित होगा ।

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में विभाजित बुन्देलखण्ड इलाका पिछले कई वर्षो से प्राकृतिक आपदाओँ का दंश झेल रहा है ।भुखमरी और सूखे की त्रासदी से अब तक 62 लाख से अधिक किसान ‘वीरों की धरती’ से पलायन कर चुके हैं। यहाँ के किसानों को उम्मीद थी की अब की बार के लोकसभा चुनाव में राजनीतिक दल सूखा और पलायन को अपना मुद्दा बनाएंगे ,लेकिन ऐसा हुआ नही और एक बार फिर यह मुद्दा जातीय बयार में दब सा गया है। यहाँ का किसान ‘कर्ज’ और ‘मर्ज’ के मकड़जाल में जकड़ा है ।तकरीबन सभी राजनीतिक दल किसानों के लिए झूठी हमदर्दी जताते रहे हैं,लेकिन यहाँ से पलायन कर रहे किसानों के मुद्दे को चुनावी मुद्दा नही बनाया गया। समूचे बुन्देलखण्ड में स्थानीय मुद्दे गायब हैं और जातीय बयार बह रही है। दो वर्ष पहले केंद्रीय मंत्रिमण्डल की आंतरिक समिति ने प्रधानमन्त्री कार्यालय को एक चौकाने वाली रिपोर्ट पेश की थी ।  रिपोर्ट पर अध्ययन करके जो आंकड़ें जारी किये गए हैं उनके मुताबिक बुन्देलखण्ड में पलायन सुरसा की तरह विकराल है।

उत्तर प्रदेश के हिस्से वालें बुन्देलखण्ड के जिलों में बांदा से 7 लाख 37 हजार 920 ,चित्रकूट से 3 लाख 44 हजार 801,महोबा से 2 लाख 97 हजार 547,हमीरपुर से 4 लाख 17 हजार 489 ,उरई(जालौन) से 5 लाख 38 हजार 147 ,झांसी से 5 लाख 58 हजार 377 व् ललितपुर से 3 लाख 81 हजार 316 और मध्य प्रदेश के हिस्से वाले जनपदों में टीकमगढ़ से 5 लाख 89 हजार 371 ,छतरपुर से 7 लाख 66 हजार 809,सागर से 8 लाख 49 हजार 148 ,दतिया से 2 लाख 901,पन्ना से 2 लाख 56 हजार 270 और दतिया से 2 लाख 70 हजार 277 किसान और कामगार आर्थिक तंगी की वजह से महानगरों की ओर पलायन कर चुके हैं ।इस समिति ने बुन्देलखण्ड की दशा सुधारने के लिए बुन्देलखण्ड विकास प्राधिकरण के गठन के आलावा उत्तर प्रदेश के सात जिलों के लिए 3,866 करोड़ रूपये और मध्य प्रदेश के छह जिलों के लिये 4,310 कऱोड रूपये का पैकेज देने की भी अनुशंसा की थी,एमजीआर अब तक केंद्र सरकार ने इस पर अमल नही किया ।रिपोर्ट यह भी बताती है की सिर्फ उत्तर प्रदेश के हिस्से वालें बुन्देली किसान करीब 6 अरब रूपये किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) के जरिये सरकारी कर्ज लिए हैं। 

किसानो के पलायन पर दिए गए तर्क से कुछ किसान मानते हैं की नदियों को आपस में जोड़ने के बजाए यहाँ परम्परागत सिंचाई संसाधनों को बढ़ावा देने की जरूरत है तभी पलायन और दैवीय आपदायों से छुटकारा मिल सकता है यहाँ ग्राम और कृषि आधारित आजीविका की आवश्यकता है ताकि पलायन रोका जा सके, छोटे किसान मनरेगा पर भी सवाल खड़ा करते हैं। अवरोध दूर करना है और हर चेहरे को खुशी लौटानी है तो उद्योग और खेती में संतुलन बनाइये । प्रकृति और मानव निर्मित ढाँचों में संतुलन बनाइये। आर्थिक विकास को समग्र विकास के करीब ले आईये यही समाधान है। यह मैं नही कह रहा, उन विकसित देशों की अगुवाई वाला संयुक्त राष्ट्र संघ जैसा संगठन कह रहा है,जिनका उदाहरण सामने रख भारत सरकार,भारत में भूमि अधिग्रहण संशोधनों की तरफदारी कर रही है। अपनी मंजिल ,अपनी जरूरत,चाहत,सामर्थ्य और परिस्थितियों को सामने रखकर ही तय करनी चाहिए। अन्य उद्योगों को आगे ले जाने हेतु सरकार तत्पर दिखाई दे रही है तो फिर अन्नदाता ही उपेक्षित क्यों ?

पेरिस रवाना हुए मोदी

Bureau@Navpravah.com

जलवायु परिवर्तन पर 21वें शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रविवार को पेरिस रवाना हो गए. सोमवार से शुरू होने वाले इस कांफ्रेंस में शामिल होने को लेकर प्रधानमंत्री मोदी ने अपने ट्वीट में लिखा कि ‘ सीओपी 21 में भाग लेने के लिए पेरिस रवाना हो रहा हूँ. शिखर सम्मेलन में हम पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन से संबंधित महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा करेंगे.’

पेरिस जाने से पहले प्रधानमंत्री मोदी ने अपने रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में जलवायु को लेकर वैश्विक चिंता ज़ाहिर की. उन्होंने कहा कि ‘पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन को लेकर चिंतित है. पूरे विश्व के लोग इस बात को लेकर काफी चिंतित हैं. प्रधानमंत्री मोदी ने आगे कहा कि पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है. हम सभी की ज़िम्मेदारी है कि यह अब और आगे न बढ़ने पाए. पीएम मोदी ‘मिशन इनोवशन’ में भी शामिल होंगे, जिसका आयोजन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा द्वारा किया जा रहा है. प्रधानमंत्री मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन की एक बैठक की संयुक्त रूप से मेजबानी करेंगे.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने दूसरे ट्वीट में लिखते हैं, ‘सीओपी 21 में भारत मंडप का उद्घाटन करुंगा. यह प्रकृति, पर्यावरण के साथ भारत के लगाव और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने के लिए हमारी कटिबद्धता को दर्शाएगा.’

गौरतलब है कि भारत इस बात पर हमेशा जोर देता रहा है कि, विकसित देश सदियों से बड़े प्रदूषक रहे हैं और उन्हें विकासशील देशों को धन मुहैया कराकर तथा कम कीमत पर प्रौद्योगिकी देकर ग्लोबल वॉर्मिंग से लड़ने में बड़ी भूमिका निभानी चाहिए.

असहिष्णुता पर बोलने से बच रहे ये सितारे

AmitDwivedi@Navpravah.com

असहिष्णुता मामले पर फिल्म इंडस्ट्री से ही हर दूसरे व्यक्ति का अलग नज़रिया है. लेकिन आमिर खान के बयान के बाद देश भर से हुए भारी विरोध के चलते अब कोई इस विषय पर स्पष्ट रूप से कुछ भी बोलने से बचता नज़र आ रहा है. शनिवार शाम पुणे में एक कार्यक्रम के दौरान जब गीतकार जावेद अख्तर से पूछा गया कि वे असहिष्णुता मामले पर क्या कहना चाहेंगे तो उन्होंने भी खुद को बचाते हुए कहा कि देश के कुछ स्थानों पर ऐसी स्थिति हो सकती है लेकिन पूरे देश में ऐसा ही माहौल नहीं है. कुल मिलाकर फ़िल्मी सितारे अब इस मसले पर कुछ भी बोलने से कन्नी काटते नज़र आ रहे हैं.

अतुल्य भारत का प्रचार करने वाले आमिर खान सबको भारत दर्शन के लिए आमंत्रित करते हैं लेकिन कुछ दिन पहले ही भारत छोड़ने की अपनी पत्नी की राय ज़ाहिर कर फंसे आमिर खान का पूरे देश से भारी विरोध हुआ. सोशल मीडिया से लेकर लगभग हर जगह आमिर को लोगों ने निशाना बनाया. फिल्म इंडस्ट्री से ही उनके कभी साथी कलाकार रह चुके अभिनेताओं ने भी उनसे पूछ लिया कि वे सपरिवार कहाँ रहना पसंद करेंगे. शनिवार को बाजीराव मस्तानी फिल्म के लिए साक्षात्कार दे रही प्रियंका चोपड़ा से असहिष्णुता के मामले में सवाल पूछा गया तो उन्होंने बड़ी चतुराई से बात को गोल-गोल घुमा दिया और बच निकली.

असहिष्णुता को लेकर अब फिल्म इंडस्ट्री के लोग बयान देने से बचते नज़र आ रहे हैं. प्रियका हर एक सवाल का अकसर बड़ी बेबाकी से जवाब देती हैं. लेकिन इस बार उन्होए खुद को सुरक्षित रखते हुए बात को आज़ादी की लड़ाई से जोड़ते हुए बच निकलीं. शिवसेना के उस नेता के बयान, जिसमे कहा गया था कि जो भी आमिर खान को एक झापड़ मारेगा उसे एक लाख रूपए इनाम दिया जाएगा, हमारे पुरखों ने देश को खुशहाल बनाने के लिए हर कोशिश की है. किसी भी वजह से देश का माहौल खराब नहीं करना चाहिए.

अन्ना आन्दोलन, जनलोकपाल और सरकारी नीयत

AnandDwivedi@Navpravah.com

अन्ना आन्दोलन के सेनापति अब दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं. राजनीति, प्राथमिकताओं पर गहरा असर छोड़ती है इसका उदाहरण दिल्ली का जनलोकपाल विधेयक है. मशहूर वकील शान्ति भूषण जिन्होंने प्रसिद्द ‘राजनारायण केस’ में कभी इंदिरा गांधी जैसी शख्सियत को भी कानूनी शिकंजे में दबोच लिया, आज केजरीवाल सरकार के जनलोकपाल पर संशय व्यक्त कर रहे हैं. मुहल्लों-नुक्कड़ों पर जनसंपर्क के माध्यम से लोकपाल पर आम राय जानने वाली “आप” अब “खाप” सा रवैया अख्तियार किये हुए है. कानून बना देना, और पिण्ड छुड़ाना ही यदि ध्येय था तो इसे हम सत्ता प्राप्ति का स्वार्थ ही कह सकते हैं.

प्रशांत भूषण जोकि स्वयं एक नामचीन वकील हैं, के अनुसार, “मैंने बिल देखा तो मेरी हवाइयाँ उड़ गईं. मुझे आशंका थी कि बिल ऐसा ही बनाया जाएगा. इससे तो लोकपाल सरकार के कब्ज़े में ही रहेगा. लोकपाल की नियुक्ति सरकार करेगी, क्योंकि चार में से दो लोग सरकार के रहेंगे और नियुक्ति में कुल तीन राजनेता शामिल होंगे. एसेम्बली में दो-तिहाई बहुमत से लोकपाल को हटाया जायेगा,जबकि जनलोकपाल में ये वादा था की सुप्रीम कोर्ट से गलत साबित होने पर ही लोकपाल को हटा सकते हैं. अरविन्द केजरीवाल सरकारी लोकपाल का सदा विरोध करते थे जबकि अब उन्होंने 2013 के लोकपाल मसौदे से भी बदतर बिल तैयार करवाया है.”

देखा जाए तो कथनी-करनी का अंतर स्पष्ट होना भी सुनिश्चित था, क्योंकि मौजूदा मसौदा दिल्ली सरकार ने तैयार किया है न कि अन्ना आन्दोलन की टीम ने. सरकार तटस्थ रहने का दिखावा तो कर सकती है लेकिन असल तस्वीर कुछ और ही दास्ताँ बयां करती है. एक युग था, जब जन-आन्दोलन का अर्थ समाज के हित में ही होता था, न कि राजनीतिक लालसाओं से प्रेरित होना. राजनीति अक्सर संबंधों को भी ताक़ पर रख देती है. केजरीवाल और भूषण परिवार का भाईचारा भी इसी राजनीति की बलि चढ़ गया. हालांकि दोनों पक्षों में वैचारिक मतभेद जगजाहिर हैं, फिर भी केजरीवाल सरकार की नीयत “दिल्ली जनलोकपाल विधेयक 2015” से साफ़ होती नजर आ रही है.

स्वयं अन्ना आन्दोलन का ख़ास हिस्सा रहे प्रशांत भूषण की यह बात दिल्ली की आम जनता को सोचने पर मजबूर भी कर सकती है कि, “मोदी की आलोचना इसलिए होती है कि आज तक लोकपाल नियुक्त नहीं किया गया. गुजरात में लोकायुक्त बनने नहीं दिया गया. अब केजरीवाल का जनलोकपाल जिसे धोखापाल-जोकपाल कहें, ऐसा ही है.” उन्होंने दिल्ली सरकार की नीयत पर भी प्रहार करते हुए कहा कि, “इनके 7 में से 2 मंत्री फर्जी अकादमिक डिग्रियों के और भ्रष्टाचार के मामलों में जेल भी गए. लेकिन कोई जवाबदेही नहीं चाहता है. दिल्ली और देश के लोगों के साथ इतना बड़ा धोखा कभी नहीं हुआ.”

व्यक्तिगत तौर पे यदि कहूं तो जेपी, जिनके नाम से ही सत्तारूढ़ों की आत्मा काँप उठती थी ही सभ्य–स्वच्छ जनांदोलन का अंत था. अन्ना हजारे में भी वो बात नहीं. भीड़ इकठ्ठा कर गाने बजाने को हम आन्दोलन नहीं मान सकते. व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर उसी व्यवस्था का हिस्सा बन बैठना किसी भी रूप में आन्दोलन नहीं | पहले राजनीतिक मतभेद उतने व्यक्तिगत नहीं होते थे जितने की आज हैं. सुप्रसिद्ध पत्रकार और जेपी आन्दोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने वाले राम बहादुर राय कहते हैं कि, “जयप्रकाश नारायण और इंदिरा गांधी का सम्बन्ध तो चाचा –भतीजी का था, लेकिन जब भ्रष्टाचार के मुद्दे को जेपी ने उठाना शुरू किया तो इंदिरा की एक प्रतिक्रिया से वो सम्बन्ध बिगड़ गया.”

दिल्ली की जनता ने अरविन्द केजरीवाल और उनकी फ़ौज को ये मौका दोबारा इसलिए नहीं दिया कि वो एक अहंकारी शासक की तरह बस विपश्यना में व्यस्त रहें ,बल्कि राजनीति में शामिल होने का ध्येय सदैव याद रखें. अपने साथियों की बात यदि वो आन्दोलन के उस दौर में सुनते थे तो आज क्या परहेज? नेताओं की कमी इस देश में न थी और न रहेगी क्योंकि हर घर, गली, मोहल्ला नेताओं से अटा पड़ा है. अहंकार ने घनानंद जैसे वृहद् राज्य के शासक को भी धूल चटा दिया था. यदि केजरीवाल सरकार एक सशक्त जनलोकपाल दिल्ली में पारित करने की नीयत रखते हैं तो उन्हें प्रशांत और शान्ति भूषन को भी इस मसौदे का हिस्सा बनाने से कोई परहेज़ नहीं होना चाहिए. अंततोगत्वा जनहितार्थ खाई गई लाठियों का कुछ परिणाम तो निकले