पीएम नरेन्द्र मोदी जीएसटी बिल को लेकर तेज़ी से पहले करते नज़र आने लगे हैं. सोनिया गाँधी और मनमोहन सिंह को चाय पर बुलाकर उन्होंने काफी हद तक यह सन्देश दे दिया है कि जीएसटी बिल पर सबको साथ आना चाहिए. इस सिलसिले में उन्होंने संसद में स्पष्ट कहा भी कि सभी के साथ की आवश्यकता है, जिससे बिल पास हो सके.
प्रधानमंत्री आवास पर हुई बैठक में नरेन्द्र मोदी, सोनिया गाँधी और मनमोहन सिंह के अलावा संसदीय कार्यमंत्री वेंकैया नायडू और वित्त मंत्रि अरुण जेटली भी शामिल थे. लगभग 45 मिनट तक चली बैठक के बाद अरुण जेटली ने बताया कि अपनी तीन प्रमुख मांगों को लेकर दोनों नेताओं ने प्रधानमंत्री मोदी से चर्चा की. और प्रधानमंत्री ने भी अपना पक्ष रखा है. अब इसकी चर्चा पार्टी स्तर पर होगी जिसके बाद चर्चा सरकार के साथ की जाएगी.
दरअसल जीएसटी को लेकर कांग्रेस को सबसे बड़ी समस्या इसके दर को लेकर है. मौजूदा सरकार इसका दर 20-22 प्रतिशत रखना चाहती है जबकि कांग्रेस का कहना है कि जीएसटी की दर 16 से 18 प्रतिशत ही होनी चाहिए. साथ ही उत्पादक राज्यों के लिए 1 प्रतिशत के कर का प्रावधान और जीएसटी काउन्सिल में राज्यों के मत प्रतिशत बढ़ाने की मांग कांग्रेस ने की है. कांग्रेस की इस मांग पर प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी और पार्टी की राय भी स्पष्ट कर दी है.
हालाँकि याह भी स्पष्ट है कि बगैर कांग्रेस के सहयोग के बीजेपी राज्यसभा में जीएसटी बिल नहीं पारित कर सकती.
किसी भी कहानी की शुरुआत अगर बोझिल हो और मिज़ाज दर्शन से लबरेज़, तो कम लोग ही होंगे जो उसकी गहराई में उतरना चाहेंगे. कम से कम कहानी की शुरुआत रोमांचक या अलग होनी ही चाहिए, जिससे सुनने-देखने वाले श्रोता या दर्शक तल्लीन हो सकें. यहीं चूक गए इम्तियाज़. ‘तमाशा’ की शुरुआत में ही कहानी सुनाते हुए पियूष मिश्र और रणबीर कपूर के बचपन का किरदार प्यारा लगता है और दर्शकों को खींचता भी है, लेकिन इम्तियाज़ ने जो तमाशा क्रिएट किया है, वह पूरी तरह से उबाऊ बन पड़ा है. फिल्म की स्टोरी तो अच्छी है लेकिन स्क्रीनप्ले काफी बहका सा नज़र आता है. कुछ सीन तो ऐसे भी हैं, जिसे देखकर लगता ही नहीं कि इम्तियाज़ अली इसके निर्देशक हो सकते हैं. जब वी मेट, लव आज कल, और रॉकस्टार जैसी फिल्म के अलावा यह भी एक बेहतरीन फिल्मों में शामिल हो सकती थी.
फिल्म के ज़रिए इम्तियाज़ कहना चाहते हैं कि हर इंसान है कुछ और लेकिन दिखता कुछ और है. इंटरवल के बाद काफी हद तक कहने में कामयाब भी हुए हैं, लेकिन उन्होंने भूमिका बनाने में काफी समय ले लिया.
कहानी-
फ्रांस में वेद (रणबीर) और तारा (दीपिका) की मुलाक़ात होती है. तारा का बैग चोरी हो जाता है जिसकी वजह से वह काफी परेशान होती है. रेस्टोरेंट में काफी रिक्वेस्ट करने के बाद जब वहाँ का मैनेजर उसे कॉल नहीं करने देती तो वह मैनेजर को हिंदी में गाली देती है, यह सुनकर वेद तारा के पास आकर उसकी परेशानी पूछता है और उसे अपना फोन देता है कॉल करने के लिए. उनकी दोस्ती होती है. वेद पहली ही मुलाक़ात में काफी प्रैक्टिकल नज़र आता है. दोनों वादा करते हैं कि एक हफ्ते में जो कुछ भी होगा वह सब वे भूल जाएंगे और कभी दोबारा एक दूसरे से बात करने की कोशिश भी नहीं करेगे. तारा का पासपोर्ट आ जाता है और वह हिन्दुस्तान लौट जाती है, लेकिन वेद का बिंदास स्वभाव तारा के मन में गहराई तक उतर जाता है. जिसे वह चाहकर भी नहीं भुला पाती. और प्यार करने लगती है वेद से. वह हर उस जगह वेद को ढूँढती है, जहां उसके मिलने की संभावना होती है. अंततः एक रेस्टोरेंट में लगभग ४ साल बाद उसकी मुलाक़ात वेद से हो ही जाती है. दोनों खुश होते हैं लेकिन कुछ समय बाद ही तारा को आभास होता है कि यह वही वेद नहीं है जो फ्रांस में मिला था. इसका मिज़ाज बिल्कुल अलग है, उस बेपरवाह, बिंदास वेद से. बस यहीं से कहानी का पूरा ट्रैक चेंज हो जाता है. इंटरवल के बाद बड़ी खूबसूरती से इम्तियाज़ ने कहानी को दिशा दी है.
फिल्म के डायलाग मजेदार हैं. लेकिन कई जगह ऐसा लगता है कि निर्देशक ने ज़बरदस्ती इसका इस्तेमाल किया है. यही संवाद फिल्म की रीढ़ को कमज़ोर करते हैं. हर किरदार निर्देशक की डिमांड पर खरा उतरता है. दीपिका और रणबीर ने कमाल की एक्टिंग की है. बाकी सभी सपोर्टिंग एक्टर्स ने भी अच्छा काम किया है. इरशाद के बोल पर रहमान की धुन अच्छी लगती है. लेकिन जो अपेक्षा ए.आर. रहमान से होती है वह नहीं. संगीत औसत है. हमेशा की तरह इम्तियाज़ के फिल्म की फोटोग्राफी और सिनेमैटोग्राफी कमाल की है.
कुल मिलाकर यह कहना गलत न होगा कि यह फिल्म और भी अच्छी बन सकती थी.
क्यों देखें- रणबीर और दीपिका के लिए. फ्रांस की खूबसूरती भी देख सकते हैं.
क्यों न देखें- इम्तियाज़ का वह अंदाज़ आप को नज़र नहीं आएगा, जो हाइवे, जब वी मेट, रॉकस्टार और लव आज कल में नज़र आया है. शुरुआत ही बोझिल है.
अपना अहम् चुनावी वायदा पूरा करते हुए बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार ने गुरूवार को ऐलान किया कि 1 अप्रैल 2016 से बिहार में शराब बंद कर दी जायेगी।
एक कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने कहा कि “चुनाव प्रचार के दौरान हमने महिलाओं से जो वादा किया था उसे पूरा करने के लिए हमारी सरकार प्रतिबद्ध है।अधिकतर महिलाओं द्वारा शिकायतों की एक लहर सी थी कि परिवार के पुरुष सदस्य शराब पीकर घर में हंगामा खड़ा करते हैं जिसके कारण बच्चों की शिक्षा भी प्रभावित होती है। हालाँकि शराब उत्पादन तथा बिक्री से 4 हज़ार करोड़ रुपयों का सालाना मुनाफा होता है परंतु जनता के हितों के विषय में सोचना हमारे लिए ज़्यादा ज़रूरी है।”
मुख्यमंत्री ने कहा कि इससे सबसे ज़्यादा हानि गरीब परिवारों को होती थी परंतु अब वे शराब पर खर्च होने वाले पैसे अपने बच्चों की शिक्षा और पालन पोषण पर लगा सकेंगे। उत्पादन मंत्री अब्दुल जलील मस्तान ने कहा है कि नितीश कुमार ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान बिहार की महिलाओं से ये वादा किया था ।इसीलिए हम उस वादे को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।शराब पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए हम लोग एक नई नीति बना रहे हैं।
मुख्य सचिव अंजनी कुमार सिंह को शराब प्रतिबन्ध के विषय में नई नीति बनाने का निर्देश दिया जा चुका है। शराब प्रतिबंधित करने से होने वाले नुकसान की भरपाई के विषय में पूछने पर मस्तान ने कहा कि सरकार का काम है जनता की भलाई के विषय में विचार करना।पिछड़े इलाकों व महिलाओं की ओर से लगातार बढ़ती मांग की वजह से ये निर्णय लिया गया है।इस क्षतिपूर्ति के लिए हम एथेनॉल उत्पाद जैसे कुछ अन्य विकल्प अपनायेंगे।
क्रिकेट को अनिश्चितताओं का खेल कहा जाता है. आज 27 नवम्बर को क्रिकेट के इतिहास में पहली बार ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बीच दिवस-रात्रि का टेस्ट मैच एडीलेड ओवल पर खेला जाएगा.
15 मार्च 1877 मेलबर्न के मैदान पर जब ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच पहला आधिकारिक टेस्ट मैच खेला गया, तब किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि एक दिन दूधिया रोशनी में कभी कोई टेस्ट मैच खेला जाएगा. 1877 से लेकर अब तक क्रिकेट के खेल में काफी सारे परिवर्तन आए हैं. 6 दिन का टेस्ट 5 दिन का हो गया. 1970 के आस-पास 60 ओवर के एक दिवसीय मैच होने लगे. 1977 के आस-पास केरी पैकर ने एक दिवसीय मैचों में रंगीन कपडे और सफ़ेद गेंद के इस्तेमाल की व्यवस्था बनाई. 1987 तब इंग्लैंड के बाहर पहली बार एक दिवसीय मैचों का पहला विश्वकप खेला गया. सन 2003 से टी-20 मुकाबलों ने क्रिकेट की इस भूख को और बढ़ा दिया.
अब क्रिकेट सिर्फ मैदानों में ही नहीं, बल्कि टीवी के जारी पूरे विश्व में देखा जाता है. हालाँकि विश्व के कुछ चुनिन्दा देशं में ही क्रिकेट प्रचलित है. नए ज़माने के श्रोता अब फ़ास्ट फूट के जैसे फ़ास्ट क्रिकेट का आनंद लेना चाहते हैं. वक़्त का तकाजा ही है कि टी-20 के आने से पारंपरिक क्रिकेट पर अच्छा और बुरा असर पडा है. कई लोगों का यह मानना है कि टी 20 जैसे ताबड़तोड़ और मनोरंजक फॉर्मेट के आने से अब टेस्ट मैचों के खेलने और देखने में उतना मज़ा नहीं आता है. हालाँकि, आज भी टेस्ट क्रिकेट को ही असली क्रिकेट माना जाता है.
आर्थिक समझ-बूझ और कुछ नया करने की आवश्यकता सभी को होती है. और क्रिकेट इससे परे नहीं है. इस वजह से पिछले 7 सालों से क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया दिवस-रात्रि के टेस्ट मैचों की संकल्पना लिए सभी टीमों को आकर्षित करने की कोशिश में जुटा रहा. हालाँकि कल्पना तो बेहद लुभावनी थी ज़रूर लेकिन लखनवी अंदाज़ में सारे क्रिकेट टीमों ने पहले आप-पहले आप की भूमिका निभाई. क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया का मानना था कि टी 20 के ज़माने में अगर टेस्ट क्रिकेट को ज़िंदा रखना हो तो कुछ नया करना ही पडेगा.
इसमे आईसीसी को एक और सवाल से जूझा था कि टेस्ट मैचों के नियमों में तो कोई बदलाव नहीं करना था लेकिन सफ़ेद गेंद या लाल गेंद से टेस्ट में खेल कैसे खेला जाए. तब क्रिकेट की ज्गेंद बनाने वाली कंपनियों ने कुछ नया करने का बीड़ा उठाया. और नतीअज़ा निकला कुछ अजब गुलाबी गेंद. ज़ूरत थी एक ऐसी गेंद की जोकि दूधिया रोशनी में भी साफ़ दिखाई दे और 80 ओवर तक टिके. कूकाबूरा नामक कंपनी ने काफी मशक्कत और परीक्षणों के बाद यह गुलाबी गेंद बनाई. अब जब पूरा कैनवास ही तैयार हो गया तब खिलाड़ियों ने इस कल्पना पर सवाल उठाया. लाज़मी भी था क्योंकि दुनिया में कहीं पर भी दूधिया रोशनी में गुलाबी गेंद के साथ 5 दिनों का मैच खेला जाता हो. साथ ही 50 ओवर की इनिंग और 5 दिन दूधिया रोशनी में खेलना, इसमें बहुत अंतर है.
काफी खिलाड़ियों ने इस पर ऐतराज़ जताया, सवाल उठाया और मजाक भी उड़ाया लेकिन कुछ खिलाड़ियों ने इस कल्पना का स्वागत किया. 7 साल की यात्रा और उतार चढ़ाव के बबाद आखिर न्यूजीलैंड ने ऐसा टेस्ट खेलने का न्योता स्वीकार किया और 27 नवम्बर को यह ऐतिहासिक मैच खेला जाएगा. फिलहाल ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर न्यूजीलैंड की टीम ने दूधिया रोशनी में 2 अभ्यास मैच भी खेल लिए हैं, जिनमे से एक में बल्लेबाज़ मार्टिन गुप्टिल ने शतक भी लगाया. दूसरी तरफ, ऑस्ट्रेलिया इस लम्हे का सालों से इंतज़ार और तैयारी भी कर रहा है. उनके पास स्टीव ओ’कीफ जैसा गुलाबी गेंद घुमाने वाला स्पिनर भी तैयार हो गया है. और इस टेस्ट मैच के लिए ओ’कीफ को ख़ास तौर पर टीम में शामिल किया गया है.
15 मार्च 1887, 5 जनवरी 1971, 17 फरवरी 2005 इन तारीखों को क्रिकेट के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा गया है. क्योंकि ये तारीखें हैं, पहले एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय और पहले टी-20 अंतर्राष्ट्रीय मैचों की.
अब 27 नवम्बर 2015 की तारीख भी सुनहरे अक्षरों में लिखी जाएगी.
क्या होगा 27 नवम्बर को?
50 हज़ार लोग एडीलेड ओवल मैदान में हाज़िर रहेंगे?
क्या यह फॉर्मेट, क्रिकेट प्रेमियों और खिलाड़ियों को पसंद आएगा?
क्या गुलाबी गेंद इस परीक्षा में पास हो पाएगी?
क्या बल्लेबाज़ दूधिया रोशनी में 5 दिन तक टिक पाएंगे और क्या टेस्ट क्रिकेट को इस परिकल्पना का फायदा होगा?
जो भी हो, एक बात तो तय है कि क्रिकेट का खेल और भी रोचक और अनिश्चितताओं से लबरेज़ रहेगा. उम्मीद करते हैं कि विश्व में सबसे ज्यादा टीवी दर्शकों वाले भारत में, भारतीय टीम कोई ऐसा टेस्ट मैच ज़रूर खेलेगी.
संविधान दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी देशवासियों से अनुरोध किया कि वे संविधान के मूल्यों का आदर व पालन करें जिससे हमारे पूर्वज,हमारे देश निर्माता हम पर गर्व का अनुभव करें। संविधान के शीतकालीन सत्र की शुरुवात करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि वाद विवाद,चर्चा और विचार अभिव्यक्ति तो संसद की आत्मा हैं। संसद को वार्ता का सबसे बड़ा केंद्र बताते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि संसद में जब उत्तम वाद विवाद ,उत्तम चर्चा और नए नए विचार प्रस्तुत होंगे तभी संसद में चमक आएगी।
गौरतलब है कि गुरुवार से शुरू होने वाले संसद के शीतकालीन सत्र में विपक्ष असहिष्णुता के मामले पर सरकार को पूरी तरह से घेरने की तैयारी में है। जबकि सत्ता पक्ष भाजपा के कई महानुभावों का ऐसा मानना है की बेवजह इस विषय को ज़रूरत से ज़्यादा तूल दिया जा रहा है जिससे देश की छवि ख़राब हो रही है।हालाँकि सरकार ने सूचित किआ है कि वह इस विषय पर चर्चा के लिए पूरी तरह तैयार है।
संसदीय सत्र की शुरुवात से पूर्व संसद के बाहर प्रधानमंत्री बोले कि हमारा संविधान उम्मीद(HOPE)की किरण है जहाँ H से तात्पर्य है harmony,O से opportunity,P से people’s participation और E से equality।
सभी पार्टियों के साथ हुई बैठक का ज़िक्र करते हुए वे बोले कि सभी दाल सदन की शांतिपूर्ण कार्यवाही के लिए सहमत हैं तथा विपक्ष का भी मत है की सदन उत्तम तरीके से चले। संसद के शीतकालीन सत्र की शुरुवात में जहाँ असहिष्णुता मामले पर विवाद गर्माने की उम्मीद है वहीं जी एस टी विधेयक पर नरमी के आसार नज़र आ रहे हैं।
रणबीर कपूर ने अपनी आगामी फिल्म ‘तमाशा’ के लिए नवप्रवाह.कॉम से लम्बी बातचीत की। जिसमे उन्होंने तमाशा के अलावा अपने फ़िल्मी सफ़र के बारे में भी कई बातें बताई। रणबीर की तमाशा शुक्रवार 27 नवम्बर को रिलीज़ हो रही है, उन्हें उम्मीद है कि यह फिल्म दर्शकों को ज़रूर भाएगी। प्रस्तुत है रणबीर से हुई लम्बी बातचीत के प्रमुख अंश-
प्रश्न: ऐसे किरदार जो आम आदमी के जीवन से काफी हद तक जुड़े हैं, उनका चुनाव करना क्या एक सही निर्णय है?
रणबीर: हिंदी फ़िल्म जगत के अभिनेता के तौर पर मुझे हमेशा लगता है कि मेरे किरदार की खासियत कहीं न कहीं अन्तर्निहित है। मैंने कहीं पढ़ा है कि खासियत हमेशा कोशिश करने में होती है और मैं खुद को या अपने किरदार को, हमेशा इससे जोड़ कर देखता हूँ। मुझे श्री 420 जैसी फिल्में बहुत पसंद हैं और मैं हमेशा ऐसे किरदार आज़माना चाहता हूँ।
प्रश्न: इम्तियाज़ जिस तरह की फिल्में बनाते हैं, आपके अनुसार उनकी संकल्पना के विषय में उनके दिमाग में क्या होता है?
रणबीर: इम्तियाज़ के साथ मेरा बहुत करीबी और खास रिश्ता है। इस फ़िल्म को उन्होंने एक बहुत छोटी सी बात को ध्यान में रख कर बनाया है। वे ऐसे डायरेक्टर हैं जो वेस्टर्न कांसेप्ट से बिलकुल परे हैं । उनकी कहानियाँ बहुत ही मौलिक होती हैं और भारतीय संकल्पना पर आधारित होती हैं। सबसे महात्त्वपूर्ण बात यह है कि जीवन और संबंधों पर उनकी पकड़ बहुत अच्छी है।
प्रश्न: फ़िल्म तमाशा में आप अपने आपको अपने किरदार से किस प्रकार जोड़ कर देखते हैं?
रणबीर: जब मैंने फ़िल्म रॉकस्टार में काम किया, मैं खुद को उस किरदार के साथ नहीं जोड़ पा रहा था। इसलिए मैंने निर्देशक और अपने आस पास के लोगों की मदद ली। लेकिन फ़िल्म तमाशा में मैं खुद को उस किरदार से जोड़ कर देख सकता हूँ। फ़िल्म क्षेत्र से जुड़े एक परिवार से होने के कारण मुझे एक कलाकार बनने की पूर्ण स्वतंत्रता थी लेकिन एक आम इंसान के तौर पर हर कोई उस दौर से गुज़रता है, जिसे वेद के किरदार द्वारा फ़िल्म में दर्शाया गया है।
प्रश्न: आप ऐसी फिल्मों में किस प्रकार की चुनौती महसूस करते हैं जहां आपका अपने करैक्टर से बिलकुल सम्बन्ध नहीं होता?
रणबीर: ‘तमाशा’ और ‘वेक अप सिड’,सिर्फ ये दो फिल्में हैं जिनमें मैंने खुद को अपने किरदार के साथ संबंधित महसूस किया है।’रॉकस्टार’ एक सुविस्तृत फ़िल्म है और ऐसे किरदार निभाना मुझे पसंद है क्योंकि ऐसी फिल्मों में आप खुद को अपने किरदार के अंदर समेट सकते हैं।
प्रश्न: शूटिंग के दौरान फ़िल्म से जुड़े ख़ास पल कौनसे थे?
रणबीर: ऐसे किसी एक खास पल का ज़िक्र संभव नहीं है क्योंकि कई ऐसे मौके थे जो बहुत खास थे।
प्रश्न: एक कलाकार होने के नाते आपके लिए ज़्यादा महत्वपूर्ण क्या है,कहानी या निर्देशक?
रणबीर: दोनों ही अपनी जगह महत्त्वपूर्ण हैं लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि एक अच्छा निर्देशक फ़िल्म के लिए बहुत ज़रूरी है। अगर निर्देशक हर चीज़ के बीच सामंजस्य नहीं बिठा पायेगा और उनका सही उपयोग नहीं कर पायेगा तो फ़िल्म की असफलता निश्चित है। एक अच्छा निर्देशक ही कलाकारों और कहानी का सही उपयोग कर सकता है।
प्रश्न: एक कलाकार के तौर पर अपने जीवन के इस मुकाम पर आप सफलता को किस दृष्टि से देखते हैं?
रणबीर: एक कलाकार के तौर पर मेरे लिए सबसे बड़ी सफलता यही है कि मैं जिन कलाकारों और निर्देशकों के साथ काम करना चाहता हूँ, उनके साथ मुझे काम करने का मौका मिल रहा है।
बॉलीवुड की सबसे बेहतरीन ऑन स्क्रीन जोड़ी, दीपिका पादुकोण और रणबीर कपूर जल्द ही सुनहरे परदे पर इम्तियाज़ अली द्वारा निर्देशित फ़िल्म “तमाशा” में अपना जादू बिखेरने आ रहे हैं। यह फ़िल्म 27 नवम्बर 2015 को रिलीज़ हो रही है। नवप्रवाह.कॉम के साथ एक खास बातचीत में दीपिका ने फ़िल्म से जुड़ी कई खास बातें साझा कीं। प्रस्तुत हैं कुछ प्रमुख अंश-
प्रश्न: दर्शकों को आपसे और आपकी फ़िल्म तमाशा से बहुत ज़्यादा उम्मीदें हैं, इस बारे में आपका क्या कहना है?
दीपिका: ये तो बहुत ख़ुशी की बात है कि दर्शकों को मुझसे और मेरी फ़िल्म से ढेरों उम्मीदें हैं। इस फ़िल्म की सबसे खास बात है इसकी कहानी जो आज की युवा पीढ़ी से मिलती है। यह कहानी वेद नाम के एक नौजवान की है जो समझ नहीं पा रहा कि वह अपने जज्बे (पैशन) को पूरा करे या पारिवारिक दबाव के अनुसार चले और इसी असमंजस में वह उलझा हुआ है। फिर उसके जीवन में मोना नाम की लड़की आती है जो उसे उसकी अपनी वास्तविकता का अनुभव कराती है।
प्रश्न:इम्तियाज़ अली के साथ दोबारा काम कर के आपको कैसा लगा?
दीपिका: जिस डायरेक्टर के साथ आप पहले काम कर चुके हों उनके साथ दोबारा काम करना और ज़्यादा रोमांचक होता है। इम्तियाज़ एक ऐसे निर्देशक हैं जो एक कलाकार के तौर पर मुझे बहुत प्रोत्साहित करते हैं और उस कला को बाहर लाते हैं जिसकी फ़िल्म में ज़रूरत है। रॉकस्टार में उन्होंने जिस प्रकार से रणबीर को डायरेक्ट किया था,तमाशा में रणबीर को बिलकुल उससे अलग डायरेक्ट किया है। ऐसे डायरेक्टर के साथ दोबारा काम करना एक बहुत अच्छा अनुभव रहा।
प्रश्न: पीकू और बाजीराव मस्तानी जैसी फिल्मों में अलग-अलग किरदारों के साथ किस प्रकार ताल मेल बिठाती हैं?
दीपिका: अगर आप भंसाली जी के फ़िल्म सेट पर जाएँ तो वहाँ आपको बिलकुल अलग माहौल मिलेगा। कहानी के अनुसार हम अपने हिसाब से गतिविधि करते हैं और कैमरा हमे उस दिशा में फॉलो करता है। एक कलाकार के तौर पर मुझे बार बार रिहर्सल करना पसंद नहीं। इसीलिए जब मैं अपने सेट पर होती हूँ तो सब कुछ नेचुरल और सहज होता है।
प्रश्न: आपकी दो फिल्में, तमाशा और बाजीराव मस्तानी बहुत कम समय के अंतराल में एक के बाद एक रिलीज़ हो रही हैं। आपको दोनों फ़िल्मों की शूटिंग में दिक्कत आई?
दीपिका: बिलकुल।मैंने दोनों फ़िल्मों की शूटिंग साथ साथ की। प्रायः कोई कलाकार ऐसा नहीं करता। वह एक फ़िल्म ख़त्म करने के बाद ही दूसरी फ़िल्म पर ध्यान केंद्रित कर पाता है, पर मुझे एक साथ दोनों की शूटिंग में तालमेल बिठाना पड़ा।
प्रश्न: आपकी दो आगामी फिल्में तमाशा और बाजीराव मस्तानी क्रमशः इम्तियाज़ अली और संजय लीला भंसाली के साथ हैं, और दोनों के साथ आप दूसरी बार काम कर रही हैं। दोनों में से आप किसके साथ काम करने में ज़्यादा सहज थीं?
दीपिका: संजय और इम्तियाज़ दोनों एक दूसरे से बिलकुल अलग तरह के निर्देशक हैं। दोनों की फिल्में भी एक दूसरे से बिल्कुल अलग हैं। एक कलाकार के तौर पर मैं दोनों के साथ काम करने में सहज थी क्योंकि मैं दोनों के साथ दूसरी बार काम कर रही हूँ।
प्रश्न: फ़िल्म तमाशा में अपने किरदार के साथ आप खुद को कैसे जोड़ती हैं?
दीपिका: मैं और रणबीर दोनों बहुत ही भाग्यशाली हैं कि हम दोनों को अपने मनपसन्द करियर का चुनाव करने का मौका मिला और हमारे परिवार ने हमारा पूरा साथ दिया। मेरे कई ऐसे दोस्त हैं जो अब भी अपने आस-पास के दबाव के कारण जीवन में आगे नहीं बढ़ पाये हैं। फ़िल्म के रिलीज़ होने का मुझे बेसब्री से इंतज़ार है क्योंकि ये फ़िल्म कई लोगों के जीवन को एक नयी दिशा देगी।
देश छोड़ने का तात्पर्य क्या होता है? देश छोड़ने का सीधा तात्पर्य यह है कि देश में अब रहने लायक माहौल नहीं, बस चारो तरफ आतंक और भय का माहौल है। आमिर खान जैसे संजीदा कलाकार ने, जिस प्रकार से कल एक समारोह में अपनी पत्नी किरण राव के कंधे से अपने शब्दों से भरी बन्दूक चलाई, उसे नकारा नहीं जा सकता।
जिस प्रकार आमिर ने अपनी पत्नी की बात को सार्वजनिक मंच पर रखा उससे एक बात तो स्पष्ट है कि वह भी यह मानते हैं कि देश के हालात अच्छे नही है और वो परिवार सहित देश छोड़ने की बात पर विमर्श कर रहे हैं। तो अब प्रश्न यह उठता है की क्या हमारे देश के हालात सीरिया जैसे हो गए हैं, जहाँ के लोग आई.एस. के डर से अपने देश को छोड़ने पर मजबूर हैं? देश छोड़ना वाकई में ऐसे माहौल का परिचायक है, जब वास्तव में आपके हर मानवीय मूल्य को कुचला जाए और ऐसा सीरिया जैसे देश में लगातार हो रहा है। आमिर खान का बयान ऐसे वक्त आया है जब पूरे देश में इस बात को लेकर माहौल शांत था, पर अचानक मानो आमिर की इन बातों ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या अब वाकई हमारा अतुल्य भारत ‘असहिष्णु भारत’ की शक्ल ले रहा है?
अभी कुछ ही दिन पहले एक निजी न्यूज चैनल के कार्यक्रम में आमिर ने माना था कि भारत एक सहिष्णु देश है और मोदी जी के नेतृत्व में देश सही दिशा में बढ़ रहा है। अब अचानक आमिर और उनकी पत्नी के साथ ऐसा क्या घटित हो गया कि उनकी पत्नी के एक डर ने उन्हें अपनी बात से ‘यु टर्न’ लेने पर मजबूर कर दिया।
कुछ भी हो पर उन जैसे संजीदा कलाकार से यह उम्मीद की जाती है कि यदि समाज में किसी तरह का अविश्वास बढ़ रहा हो, तो वह उसे दूर करने में सक्रिय भूमिका निभाएं। इसलिए वह जब कोई फ़िल्म बनाते हैं या टीवी पर कोई कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं या ‘अतिथि देवो भव’ जैसे सरकारी प्रचार से जुडते हैं तो लोग उन्हें बहुत गंभीरता से लेते हैं। इसलिए उनकी यह अतिरिक्त जिम्मेदारी भी बनती है कि वह इसका ख्याल रखें कि उनकी किसी बात से जन सामान्य के विश्वास को धक्का न लगे।
क्या असहिष्णुता, हिंसा और डर की एकाधिक घटना के आधार पर भारत जैसे विशाल देश के बारें में कोई प्रतिकूल राय बनाना सही होगा? अभी हाल के कुछ दिनों में साहित्यकारों ,कलाकारों और बुद्धिजीवियों के साथ कुछ आहत करने वाली घटनाएं सामने आईं, पर अवधारणात्मक रूप से भारत जैसे विशाल सांस्कृतिक देश को असहिष्णु बताना ठीक नहीं। हमारे देश में हमेशा से ही रचनात्मक और वैचारिक स्वतंत्रता का भलीभांति सम्मान किया गया है, इसका एक ज्वलन्त उदाहरण तो खुद आमिर खान ही हैं। इस बयान से पूर्व कभी आमिर खान ने यह शिकायत नही की कि उन्हें उनके किसी रचनात्मक कार्यों या उनके व्यावसायिक हितों की पूर्ति करने में कभी कोई बाधा आई हो या फिर उनके व्यक्तित्व को कोई ठेस पहुँची हो! अपनी पत्नी से उन्होंने क्या कहा यह तो हमें पता नहीं, पर उन्हें देश के लोकतान्त्रिक मूल्यों पर 125 कऱोड देशवासियों की तरह ही विश्वास व उसका सम्मान करना चाहिए।
हमें आमिर खान के बयान पर ज्यादा ध्यान नही देना चाहिए क्योकि हमारा भारत आमिर खान से कहीं परे, उन असंख्य मुश्लिम कर्मयोगियों के तप पर टिका है, जिन्होंने एक भारत-श्रेष्ठ भारत के सपने को साकार करने के लिए अपने प्राणों को न्योछावर कर दिया।
आमिर खान के इस बयान से सत्तारूढ़ दल की आलोचना नहीं हुई, बल्कि भारत की आत्मा पर चोंट लगी है, जिसके लिए उन्हें सार्वजनिक तौर पर माफी मांगनी चाहिये। इस कठिन समय में जब हमें आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होना चाहिए तब आमिर खान देश छोड़ने की बात कर रहे हैं, इससे उनकी हीरो की छवि को दाग लगा है क्योकि हीरो कभी भागता नही है।
आमिर खान के असहिष्णुता मामले पर दिए गए बयान के दूसरे दिन केंद्रीय मंत्री मुख़्तार अब्बास नक़वी ने कहा कि सहिष्णुता तो भारत और भारतीयों के DNA में है और आमिर खान को ना तो देश छोड़ने की आवश्यकता है और ना ही भारत देश आमिर को कहीं जाने देगा।
रामनाथ गोयनका पत्रकारिता सम्मान समारोह में असहिष्णुता के मुद्दे पर आमिर के दिए गए विवादित बयान के जवाब में नक़वी ने कहा कि असहिष्णुता मामले को राजनीतिक तूल दिए जाने से शायद आमिर व उनका परिवार विचलित हुआ हो लेकिन मैं उनसे इतना ही कहना चाहता हूँ कि इसमें देश छोड़ने पर विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं और ना ही देशवासी उन्हें कहीं और जाने की अनुमति देंगे। नकवी ने कहा कि इस देश के खून में ही हमेशा से सहिष्णुता रही है।इसीलिए उन्हें इस विषय में चिंता करने की या ऐसा विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं। हमारे देश में असहिष्णुता के लिए कोई स्थान ही नहीं है। इसीलिए उन्हें अलग थलग करने वाली घटनाओं व ऐसे बनावटी अभियानों पर ध्यान नहीं देना चाहिए।
गौरतलब है कि सोमवार को आमिर खान ने एक सम्मान समारोह में देश में बढ़ती असहिष्णुता के डर से, असुरक्षा की भावना से अपनी पत्नी के देश छोड़ कर जाने पर विचार करने की बात कही थी।
आमिर खान के इस विवाद पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा की केंद्र सरकार को अपने आलोचकों को देशद्रोही कहने की बजाय आम जनता तक जा कर उनकी भी राय जाननी चाहिए कि उन्हें किस बात का भय सता रहा है और उसके लिए सरकार को कौन से कदम उठाने चाहिए। इसके जवाब में बीजेपी नेता शाहनवाज़ हुसैन ने इस मुद्दे को प्रधानमंत्री के खिलाफ कांग्रेस की साजिश करार देते हुए आमिर खान को असहिष्णुता के मुद्दे पर खुले वाद-विवाद की चुनौती दे डाली।
इस विषय पर गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजु ने कहा कि इस प्रकार के बयान दुनिया भर में हमारे देश और प्रधानमंत्री की छवि को नीचा दर्शाते हैं। एन.डी.ए के सत्ता में आने के बाद से जातिवाद के मुद्दों को ज़्यादा बढ़ावा दिया जा रहा है।
केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने इस विषय में कहा कि “आमिर ‘अतुल्य भारत’ के पर्यटन के ब्रांड एम्बेसडर हैं और यह बात खुद में अतुल्य है कि वे इस सरकार के भी ब्रांड एम्बेसडर हैं। वे एक खुले मंच पर सूचना एवं प्रसारण मंत्री अरुण जेटली के सामने अपने मन की बात बिना किसी अवरोध के रख रहे हैं, जो कि विचारों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति को दर्शाता है।”
पेरिस में हुआ हमला मुम्बई में हुए हमले जैसा था। अंतर सिर्फ यह है की पेरिस हमले के तुरंत बाद फ्रांस ने आईएस के खिलाफ अभियान शुरू कर दिया और विश्व बिरादरी ने इसका समर्थन किया और एक हम हैं, जिसे यह पता है कि मुंबई पर हमला (अन्य आतंकी हमला भी) किसने किया, किसकी शह पर किया, कौन कौन शामिल था लेकिन हम सबूतों को भेजने में जुटे हैं और हाथ में हाथ धरे बैठे हैं। आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक मुहीम की यही सबसे बड़ी विसंगति है।
शांति किसे नहीं सुहाती लेकिन मौत के कुछ सौदागरों को दुनिया का अमन चैन रास नही आता है। ये आतंक का दानव जब किसी देश को अपना निशाना बनाता है तो उसकी निर्माता महाशक्तियां उसे धैर्य और शांति रखने का उपदेश देती नजर आती हैं लेकिन जब बात अपने पर आती है,तो ये एकजुट होकर पूरी दुनिया आतंक के रक्तबीज के संहार का आह्वान करते हैं। वैश्विक आतंकवाद के खिलाफ दुनिया की महाशक्तियों द्वारा चलाये जा रहे अभियान का यह विरोधाभास, बड़ी विडम्बना है।
इंस्टिट्यूट फॉर इकोनोमिकल एण्ड पीस द्वारा जारी वैश्विक आतंकवाद सूचकांक में आतंकवाद से प्रभावित शीर्ष दस देशों में भारत छठे स्थान पर है। आतंकी घटनाओं में होने वाली मौतों में 1.2 फीसद इजाफे के साथ यह आंकड़ा 416 तक पहुँच गया है। 2010 के बाद आतंकी हमलों और मौतों की यह सर्वाधिक संख्या है। दुनियाभर में 2014 के दौरान कुल 32,658 लोग मारे गए। अगर हम इन आतंकी हमलों से दुनिया भर में होने वाले नुकसान की बात करें तो 2014 में आतंकी घटनाओं के चलते 52.9 अरब डॉलर की चपत दुनिया को लगी जो पिछले साल के नुकसान 32.9 अर्ब डॉलर से 61 फीसदी अधिक है।
पिछले 15 सालों में दुनिया भर में मारे जाने वाले लोगो की संख्या में 15 गुना की बढ़ोत्तरी हुई है। कोई भी आतंकी घटना लम्बे समय के लिए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में अपना व्यापक असर छोड़ती है। तात्कालिक नुकसान के इतर, इस दीर्घकालिक प्रभाव के तहत लोगों में अवसाद घर कर जाता है। सामजिक वैमनस्यता बढ़ती है।
राजनीतिक असर के रूप में नियम कानून कठोर किये जाने से विभिन्न देशों के बीच रिश्तों पर असर पड़ते हैं। आतंकवाद से सर्वाधिक प्रभावित 11 में से 10 देशों में शरणार्थी और आंतरिक विस्थापन की दर सर्वाधिक है। पेरिस हमले के बाद से यही सवाल चारों ओर उठ रहा है कि कहीं हम अनायास ही ‘सभ्यताओं के संघर्ष’ की ओर तो नही बढ़ रहे ? इस सवाल का जवाब टटोलने के लिए जब मैंने आतंकवाद के विभिन्न पहलुओं पर नजर डाली तो तमाम आश्चर्यजनक आंकड़े सामने आये ।
ग्लोबल टेररिज्म इंडेक्स 2015 के मुताबिक़ साल 2014 में दुनिया में 13,463 आतंकवादी वारदातें हुयी। यह पिछले वर्ष से 35 फीसदी अधिक थी। इन दुर्भाग्यपूर्ण हमलों में जो लोग मारे गए उनमे 78 फीसदी ईराक, नाइजीरिया, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और सीरिया के थे। यह जानकर आपको आश्चर्य होगा कि इन शीर्षस्थ बदनसीब देशों में बाद भारत का स्थान आता है, जहाँ 2014 में 416 लोग मारे गए। यहीं एक जानलेवा विरोधाभास का दीदार होता है । पेरिस 13/11 को लेकर इतना बवाल मचा हुआ है! मुम्बई में भी तो 26/11 हुआ था ? तब किसी पश्चिमी देश ने हवाई हमलों की बात नही की और न ही पाकिस्तान पर प्रतिबन्ध लगाने की कोशिश की। आज भी दाऊद और हाफिज जैसे आतंकवादी पकिस्तान में खुले आम घूम रहे है। उधर फ्रांस के जंगी जहाज़ों ने रूस के साथ मिलकर सीरिया को तहस-नहस करना शुरू कर दिया है। क्या इस समस्या का यही इलाज है ? अगर यही समाधान होता, तो अफगानिस्तान से आतंकवाद कब का विदा हो गया होता। इसी तरह ईराक में भी सद्दाम हुसैन के खात्मे के बाद सब सामान्य हो जाना चाहिए था, या दुनिया के सबसे बड़े आतंकी रहे ओसामा के मारे जाने के बाद भी आतंकवाद को पूरे विश्व से खत्म हो जाना चाहिए। ऐसा कुछ भी नही हुआ।
आईएस को सबसे खतरनाक संगठन बताया जा रहा है, जो अर्धसत्य है। उसके खात्मे की आड़ में सीरिया के शहरों और गाँवों पर बम बरसाए जा रहे हैं मिसाइलें दागी जा रही हैं। यह आतंकवाद की नही, बल्कि अपने दुश्मन के खात्में की जुगत है। यहाँ जान बूझकर इस सच को अनदेखा किया जा रहा है कि बोको हराम आईएस से भी बड़ा दहश्तगरत संगठन बन गया है। नाइजीरिया के इस कट्टरवादी संगठन ने 2014 में 6,644 लोगो को मौत के घाट उतारा, जबकि आइएस ने इस दौरान 6,073 लोग मारे। बोको हराम सिर्फ अफ्रीका के एक भूभाग पर कहर ढा रहा है। उसके शिकार लोग गरीब देशों के तंगहाल गाँवों और शहरों में रहते हैं, इसलिए उसको नजरअंदाज कर देना आसान है । अगर इसके हत्यारे अमेरिका या यूरोप के लोगों को मारने लग जाएँ, तो हालात बदल जाएंगे। अर्थात अमेरिका जैसे विकसित देशो को यह समझना होगा कि आतंकवाद सबके लिए जहर है इसलिए इसके खिलाफ सबको एकजुटता से आगे आना चाहिए चाहे यह आफत किसी भी देश में आये। पेरिस हमले के तत्काल बाद आयोजित जी-20 देशों की बैठक में प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने कहा, “दुनिया को एक सुर में बोलते हुए बिना राजनीतिक विचार किये आतंकवाद के खिलाफ एकजुट कार्यवाही करनी चाहिए” साथ ही उन्होंने जोडा, “हमें उनको अलग करना चाहिए जो आतंकवाद को समर्थन और प्रायोजित करते हैं और उनके साथ खड़े होना चाहिए जो हमारे मानवता के मूल्यों को साझा करते हैं ।