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Wednesday, August 5, 2026
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Betaal Review: अब पता चला इसका नाम ‘बे-ताल’ क्यों रखा!

अमित द्विवेदी | Cinema Desk

नवप्रवाह रेटिंग : ⭐⭐

“बेताल पचीसी” वाले हिंदी प्रेत से प्रेरित इस वेब सीरीज़ में आपको अंग्रेजी भूत बवाल काटते नज़र आएंगे। लेकिन पूरी सीरीज़ देखने के बाद पता लगता है कि इसका नाम “बे-ताल” क्यों रखा गया होगा। सीरीज़ तो हॉरर है, लेकिन किसी भी सीन में डर नहीं लगता। प्रेत आत्माओं को गोली और ग्रेनेड से मारकर गिराने वाले कलाकारों के चेहरे का लेस-एक्सप्रेशन देखने लायक नहीं है।

इस वेब सीरीज़ के रीलीज़ होने के पहले ही मेकर्स पर कहानी के चोरी हो जाने का आरोप लग चुका है और मराठी लेखक समीर न्यायालय तक पहुंच चुके हैं। रीलीज़ होने के पहले ऐसा लगा था कि सीरीज़ कुछ कमाल होगी, लेकिन देखकर लगता है कि ऐसी सीरीज़ में कहानी चोरी करने की क्या आवश्यकता थी?
खैर, कहानी की तरफ मुड़ते हैं।

कहानी-
एक आदिवासी गाँव में कंस्ट्रक्शन का काम शुरू होता है। गाँव के एक टनल को तोड़कर कंस्ट्रक्शन कंपनी उसे हाइवे में मिलाना चाहती है। क्योंकि आने वाले कुछ दिनों में ही उसका उद्घाटन मुख्यमंत्री को करना है। कंपनी पर ये काम जल्दी करने का दबाव होता है, जिसके लिए वह कुछ भी करने के लिए तैयार होती है। लेकिन टनल तोड़ने की बात का गाँव के लोग विरोध करते हैं। बात जब बनती नहीं दिखती, तो प्रोजेक्ट डायरेक्टर स्पेशल फ़ोर्स की मदद लेता है। सीरीज़ में स्पेशल फ़ोर्स को भ्रष्ट दिखाया गया है। ये पूरा ऑपरेशन चीफ कमांडेंट त्यागी पैसे लेकर करती हैं। स्पेशल फ़ोर्स गाँव पहुँचती है और गाँव वालों को दूर शिफ्ट करवाने का आश्वासन देती है, लेकिन वे मानने को तैयार नहीं होते। पहले तो फ़ोर्स गाँव वालों पर लाठी चार्ज करती है, उसके बाद उन पर गोलियां भी चलाती है।

गाँव के लोग फ़ोर्स वालों को बताते हैं कि टनल में घुसने की कोशिश न करें क्योंकि वहाँ प्रेत आत्माएं हैं, जो सब को मार डालेंगी। लेकिन फ़ोर्स यानि बाज़ स्क्वाड को ये बातें दकियानूसी लगती हैं। बाज़ स्क्वाड गाँव वालों की बात नहीं मानता और टनल में घुस जाता है, उसके बाद शुरू होता है प्रेत आत्माओं का ताण्डव। बाज़ स्क्वाड और प्रेत आत्माओं के बीच होने वाले इसी ख़ूनी संघर्ष में बाज़ स्क्वाड कैसे बाहर आता है और उसे किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, यही कहानी है सीरीज़ ‘बेताल’ की।

“एक बात तो माननी पड़ेगी, सीरीज़ में मैसेज की कमी तो नहीं है। नक्सलियों के नामपर कैसे सुरक्षाबल राजनीतिक और उद्योगपतियों के दबाव व लालच में गलत काम करने लगती है, ये एक सीरियस सब्जेक्ट है।”

बहरहाल, जब बनानी ही थी तो सीरीज़ के भूत थोड़े मंहगे वाले बनवाने चाहिए। प्रोड्यूसर के पास कौन सा पैसों की कमी है। “रेसिडेंट ईविल”,”ट्रेन टू बुसान”,”आई एम लेजेंड” जैसी फिल्मों के दर्शकों को आप ये ज़ीरो वाट बल्ब सरीखी लाल आंखों वाले प्लास्टिक के भूत दिखाकर महफ़िल लूटना चाहते हैं, तो सब बे-ताल ही होगा।

एक सीन जहाँ भूत और जीतेन्द्र जोशी की दोस्ती दिखाई गई है

भूत भी ऐसा नकारा जो पूरी आर्मी तो खड़ी कर सकता है, लेकिन एक दरवाज़े के बाहर उसको नानी याद आ जाती है। महज़, माँ-बहन की भद्दी गलियों के मत्थे फिल्में चलतीं तो आज का ओटीटी ऐसी फूहड़ सीरीजों/फिल्मों से भरा पड़ा है।

देखें या नहीं-
सीरीज़ अगर हॉरर की वजह से देखना चाहते हैं, तो आप को निराशा होगी। क्योंकि यह आपको डरा पाने में सफल नहीं होगी। अभिनय भी कुछ खास नहीं है। विनीत सिंह जैसे मंझे हुए कलाकार से जो अभिनय करवाया जा सकता था, उसकी भी कमी दिखी। किसी भी अभिनेता के चेहरे पर डर नहीं नज़र आता।

(अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के आधार पर की गई समीक्षा एक जटिल काम है, जिसके अंतर्गत केवल पॉजिटिव कमेंट्स की उम्मीद रखना अनुचित है। हमारे यहाँ पेड रिव्यू जैसी भी कोई व्यवस्था उपलब्ध नहीं है।)

कोरोना: प्रशासन ने दिल्ली-ग़ाज़ियाबाद बॉर्डर किया सील

ब्यूरो | navpravah.com

यूपी के ग़ाज़ियाबाद में कोरोना के बढ़ते मामले की वजह से जिला प्रशासन एक बार फिर सख्त हो गया है। प्रशासन ने सख्ती बरतते हुए एक बार फिर दिल्ली-ग़ाज़ियाबाद सीमा को सील कर दिया है। प्रशासन ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि सिर्फ पास वालों को ही प्रवेश की अनुमति दी जायेगी। इस आदेश के बाद गाजियाबाद से दिल्ली काम करने जाने वालों के बीच हड़कंप मच गया है।

ग़ाज़ियाबाद के जिलाधिकारी की ओर से जारी आदेश में कहा गया है कि सिर्फ पास वालों को ही बॉर्डर पार करने की अनुमति दी जीएगी। माल ढुलाई, बैंकिंग सेवाओं और आवश्यक वस्तुएं लाने-ले जाने वाले वाहनों को पास लेकर चलना जरूरी होगा। बॉर्डर पर तैनात पुलिस पूछताछ करेगी और जब पुलिस आश्वस्त हो जाएगी, तभी किसी को गाजियाबाद में प्रवेश दिया जाएगा।

इस मामले में जिलाधिकारी ने कहा कि डॉक्टर, पैरामेडिकल स्टाफ, पुलिस और बैंक कर्मियों की आवश्यक्ता नहीं होगी। इन कर्मचारियों को मात्र अपना परिचय पत्र दिखाना होगा। हालांकि डीएम ने कहा कि डॉक्टर, पैरामेडिकल स्टाफ, पुलिस, बैंक कर्मियों को पास की जरूरत नहीं होगी। इन लोगों को अपना परिचय पत्र ही दिखाना काफी होगा। उनके परिचय पत्र को देखकर उन्हें बॉर्डर पार करने दिया जाएगा। वहीं ऐंबुलेंस बिना किसी रोक-टोक के आ-जा सकेंगीं।

भारत सरकार में काम करने वाले उप सचिव और उसके ऊपर के अधिकारियों को भी परिचय पत्र के आधार पर ही आने-जाने की अनुमति होगी।

पाकिस्तानी टिड्डे बने सिरदर्द, किसान बेहाल

सौम्या केसरवानी | Navpravah.com

कोरोना के मामले देश में लगातार बढ़ रहे हैं और इसी बीच खड़ी फसलों पर टिड्डियों का हमला भी बढ़ता जा रहा है।राजस्थान और मध्य प्रदेश में कहर ढाने के बाद अब ये कीड़े उत्तर प्रदेश का रुख़ कर चुके हैं।
टिड्डियों का झुंड अप्रैल के दूसरे हफ्ते पाकिस्तान से राजस्थान पहुंचा था। राजस्थान के 18 और मध्य प्रदेश के करीब 12 जिलों में फसलों को चौपट करने के बाद अब यह उत्तर प्रदेश के झांसी और आगरा तक पहुंच चुका है।
यह समस्या इतनी बड़ी है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने पूरे राज्य में अलर्ट घोषित कर दिया है। टिड्डियों ने उत्तर प्रदेश में 17 जिलों को अपनी चपेट में ले लिया है, इनमें आगरा, अलीगढ़, मथुरा, बुलंदशहर, हाथरस, एटा, फिरोजाबाद, मैनपुरी, इटावा, फरुर्खाबाद, औरेया, जालौन, कानपुर, झांसी, महोबा, हमीरपुर और ललितपुर शामिल हैं।
इस स्थिति से निपटने के लिए उत्तर प्रदेश के कृषि विभाग ने किसानों को जागरूक बनाने के लिए एक व्यापक अभियान शुरू किया है। आगरा में जिला प्रशासन ने केमिकल स्प्रे के साथ 204 ट्रैक्टरों को मोर्चे पर लगा दिया है।
पिछले एक दशक में टिड्डियों का यह सबसे बड़ा हमला है। राज्य में टिड्डियों का दल 17 मई को सबसे पहले मंदसौर और नीमच पहुंचा और फिर देखते ही देखते अब तक इसने 10 और जिलों को अपनी चपेट में ले लिया है।

भारत के इस ऐक्शन से बिलबिलाया ड्रैगन

नई दिल्ली | navpravah.com
लद्दाख व सिक्किम में भारत द्वारा की जा रही रणनीतिक तैयारियों की वजह से चीन तिलमिलाया हुआ है। वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास चीनियों के आक्रामक रवैए और झड़प के पीछे की वजह भारत की तैयरियाँ बताई जा रही हैं। बीते कुछ दिनों से चीनी सेना भारतीय जवानों से उलझने की कोशिश करती रही है।
दरअसल भारत की ओर से युद्ध स्तर पर हो रहे आधारभूत ढाँचे के निर्माण की वजह से चीन टेंशन में है। बीआरओ ने 2018 में 5 वर्षों में करीब 3323 किलोमीटर लंबी 272 सड़कों के निर्माण की योजना बनाई है। इनमें रणनीतिक दृष्टि से अहम 61 सड़क योजनाएं भी हैं। बीते करीब ढाई साल में बीआरओ ने इस योजना के तहत 2304 किलोमीटर सड़क का निर्माण किया।
सरकारी सूत्र बताते हैं कि चीन के रुख में अचानक आक्रामकता तब आई, जब निर्माण कार्य रणनीतिक दृष्टि से बेहद अहम जगहों पर पहुंचा। खासतौर से दारबुक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी रोड पर चीन ने बार-बार आपत्ति जताई। फिलहाल पूर्वी लद्दाख के गलवां नाला और पैंगोंग झील के पास फिंगर चार इलाके में निर्माण को लेकर विवाद है।
डोकलाम में भारत ने चीन का जवाब सधी कूटनीति से दिया था, इस बार भी वैसी ही योजना है। चीनी सैनिकों ने दबाव बनाने की मंशा से टेण्ट लगा दिया था, इस पर भारत ने सीमा पर सैनिकों की संख्या बढ़ाकर चीनियों को खुला संदेश दे दिया कि वे किसी तरह के दबाव में नहीं आने वाले हैं।

“ईद नहीं ईद सा कुछ होगा”-न्यूज़ एंकर रुबिका लियाक़त ने शेयर की अपनी ईद वाली खूबसूरत कविता

न्यूज़ अपडेट | Navpravah Desk

आज देश भर में मुस्लिम समुदाय ईद का त्योहार मना रहा है। मुबारकबाद का दौर चल रहा है। लोग लॉकडाउन का पालन करते हुए नमाज़ें पढ़ रहे हैं, त्योहार में शरीक हो रहे हैं।

ऐसे में न्यूज़ एंकर रुबिका लियाक़त ने अपने ट्विटर हैंडल पर एक बेहद खूबसूरत कविता शेयर की है:

मुस्लिम समुदाय रमज़ान उल-मुबारक के एक महीने के बाद एक मज़हबी ख़ुशी का त्यौहार मनाते हैं, जिसे ईद उल-फ़ित्र कहा जाता है।

ईद के मौके पर खास रौनक होती है। इस दिन मस्जिदों को सजाया जाता है, नए कपड़े पहने जाते हैं और एक-दूसरे से गले मिलकर ईद की मुबारकबाद दी जाती है। हालांकि इस बार लॉकडाउन के चलते ये रौनक थोड़ी फीकी पड़ गई है। कोरोना वायरस के संक्रमण की वजह से ना तो लोग गले मिल सकेंगे और ना ही मस्जिद जाकर नमाज अदा कर पाएंगे। इस बार की ईद ज्यादातर लोग अपने घरों में ही मना रहे हैं।

बोलती तस्वीरें- “सिंहासन बत्तीसी (1985)”

डॉ० कुमार विमलेन्दु सिंह | Navpravah Desk

बचपन में दादा- दादी या नाना-नानी की कहानियां हम बड़ी आसानी से बिना कोई ज़्यादा सवाल जवाब किये सुन भी लेते हैं, मान भी लेते हैं और ये हमें दिन भर की थकान से दूर, एक ऐसी दुनिया में ले जाती हैं, जहां फुर्सत है ,आराम है और मीठी नींद है।

इसके बाद जैसे-जैसे हम उम्र की सीढ़ियां चढ़ते जाते हैं हमें अक़्ल आती जाती है, हम ये मानना भूल जाते हैं कि चाँद भी हमें  देखता है, जानवर भी हमसे प्यार करते हैं, हमारे बारे में सोचते हैं। हमें ऐतबार नहीं होता कि कई चीज़ें और रिश्ते, बिना मतलब और ग़रज़ के होते हैं। हम समझदार बन जाते हैं, लेकिन हमारी ख़ुशी खो जाती है।  ऐसा हर दौर में होता है और जब यही सब बढ़ रहे बच्चों के साथ हो रहा था 80 के दशक में , दूरदर्शन एक बार फिर हाज़िर था अपने ख़ज़ाने में से एक और हीरा लेकर और नाम था उस हीरे का, “सिंहासन बत्तीसी”। ये 1985 की बात है।

धारावाहिक में राजा विक्रमादित्य

“सिंहासन बत्तीसी”, विद्या मूवीज प्राइवेट लिमिटेड के द्वारा बनाया गया था और ये राजा विक्रमादित्य के सिंहासन पर आधारित था जो राजा भोज को मिला था। इस सिंहासन में बत्तीस पुतलियाँ थीं और जब भी राजा भोज उसपर बैठने की कोशिश करते थे, इनमे से एक पुतली में जान आ जाती थी और वो राजा को विक्रमादित्य की महानता की कहानी सुनकर ये बताती थी की अभी वो इस सिंहासन पर बैठने लायक नहीं है।

विजयेंद्र घाटगे (pc-wikipedia)

इस धारावाहिक में राजा विक्रमादित्य का किरदार, विजयेंद्र घाटगे निभा रहे थे और राजा भोज , सुभाष कपूर बने थे।  ये  वो दौर था जब टेलीविज़न नया नया भारत में इतने सारे कार्यक्रम और धारावाहिक लेकर आया था और पहली बार ये हो रहा था कि , बिना बाहर गए, घर बैठे , मनोरंजन  का  पूरा इंतज़ाम हो चुका था।

“फिल्मों और टेलीविज़न में इस वक़्त, टेलीविज़न का पलड़ा थोड़ा भारी था। यही वजह थी कि फिल्मों में काम करने वाले लोग भी टेलीविज़न से आसानी से जुड़ जाते थे और छोटे परदे से भी बड़े परदे की ओर कलाकार जा रहे थे।  इसलिए बड़े बड़े गायकों को धारावाहिकों का गाना गाते हुए इस दौर में सुना जा सकता था।”

इस धारावाहिक का शीर्षक गीत शब्बीर कुमार ने गाया था और संगीत, अरुण पौडवाल ने दिया था।  विद्या सिन्हा इसकी निर्मात्री थीं और चंद्रकांत इसके  निर्देशक थे।

सुनें शीर्षक गीत-

इस धारावाहिक का हर एपिसोड २२-२३ मिनट का था। जादू और तिलिस्म से भरे , कल्पना की  दुनिया में , willing suspension  of  disbelief के साथ सब कुछ मानते हुए , दिल-ओ -दिमाग़ पर बिना कोई बोझ लिए मीठी  सी नींद, अब भी कभी आ ही जाती है जब कभी विक्रमादित्य बने विजयेंद्र घाटगे , किसी कहानी में लोगों का दुःख दर्द मिटाते  नज़र आते है।

(लेखक जाने-माने साहित्यकार, फ़िल्म समालोचक, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)

भाजपा नेता तजिंदरपाल सिंह बग्गा पर FIR, राजीव गाँधी को कहा था सिखों का हत्यारा

न्यूज़ अपडेट | Navpravah Desk

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को 1984 के सिख नरसंहारों के लिए जिम्मेदार मानते हुए, सिखों का हत्यारा कहने वाले भाजपा प्रवक्ता व नेता तजिंदर पाल सिंह बग्गा के विरुद्ध छत्तीसगढ़ में प्राथमिकी दर्ज करवाई गई है।

यह FIR छत्तीसगढ़ के कांकेर में यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने दर्ज करवाई है। उन्होंने अपने ऑफिशियल ट्विटर हैंडल से इस FIR के दर्ज करवाये जाने की पुष्टि भी की।

बदले में तजिंदर पाल बग्गा ने और भी कड़क अंदाज़ में इसका जवाब ट्वीट कर दिया।

उन्होंने लिखा कि, “ना डरा था, ना डरूंगा, ना झुका था, ना झुकूंगा, पहले भी बोला था, फिर से बोलूंगा, राजीव गांधी सिखों का हत्यारा है । और अगर 1984 नरसंहार सिख पीड़ित परिवारों की आवाज उठाने की कीमत मुझे जेल में डाल के चुकानी पड़ती है तो मैं वो कीमत चुकाने को भी तैयार हूं ।”

बग्गा के बचाव में कई भाजपा नेता मैदान में उतर आए हैं। भाजपा आईटी सेल के नेशनल इंचार्ज अमित मालवीय ने ट्वीट कर राजीव गांधी का वह वीडियो शेयर किया है जिसमें राजीव गांधी “बड़ा पेड़ गिरता…” वाला बयान देते पाए जाते हैं।

आग बबूला हुए शिवसेना नेता, मोदी को लेकर कर दी ये टिप्पणी

पॉलिटिकल डेस्क | navpravah.com

शिवसेना नेता संजय राउत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर कटाक्ष किया है। सांसद संजय राउत ने कहा कि प्रधानमंत्री ने प्रयाग में सफाईकर्मियों का पैर धुलकर मानवता दिखाई थी, लेकिन लगता है वो मानवता अब उनमें नहीं रही। संजय ने शिवसेना के मुखपत्र सामना में अपने एक साप्ताहिक लेख के ज़रिये प्रधानमंत्री को घेरने की कोशिश की।

सांसद संजय राउत ने कहा कि प्रधानमंत्री ने प्रयागराज के कुम्भ मेले में सफाईकर्मियों का पैर धुलकर सबको मानवता का सन्देश दिया, लेकिन पिछले तीन महीने में इस मानवता का कोई नमूना नज़र नहीं आ रहा है। राउत ने कहा कि कश्मीरी पंडितों को उनके घर छोड़कर जाने और अपने ही देश में शरणार्थियों की तरह रहने के लिए मजबूर करने के मामले का कई बार राजनीतिकरण किया गया। आज करीब छह करोड़ प्रवासी श्रमिक उन्हीं की तरह रहने के लिए मजबूर हैं।

उन्होंने सत्तारूढ़ सरकार पर हमला बोलते हुए लिखा कि यदि सरकार प्रवासी श्रमिकों के दुःख से विचलित नहीं हुई, तो यह कहना गलत नहीं होगा कि कोरोना ने मानवता को समाप्त कर दिया है। राउत ने कहा कि भाजपा के वरिष्ठ नेता कोरोना मामले में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री से बात करने की बजाय राज्यपाल बी एस कोश्यारी से बार बार मुलाक़ात कर रहे हैं।

संजय राउत ने कहा कि महाराष्ट्र में विपक्ष का कहना है कि ठाकरे की नीति नाकाम रही है, लेकिन वे उत्तर प्रदेश और गुजरात की स्थिति पर गौर नहीं करते। उन्होंने कहा कि ये दोनों राज्य भी कोरोना को रोक पाने में असफल रही हैं। उन्होंने गृह मंत्री अमित शाह पर भी हमला बोला, उन्होंने कहा कि गुजरात अमित शाह का गृह राज्य है और वे इस ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकते।

उत्तर भारत में बजी खतरे की घण्टी

न्यूज़ डेस्क | navpravah.com 

उत्तर भारत में बढ़ती गर्मी की वजह से मौसम विभाग ने रविवार को दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के लिए रेड अलर्ट जारी कर दिया है। मौसम विभाग के क्षेत्रीय मौसम विज्ञान केंद्र ने पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए लू के संबंध में ऑरेंज अलर्ट भी जारी की है। विभाग ने कहा है कि अगले कुछ दिनों में तापमान बढ़कर 47 डिग्री तक पहुंच जाएगा।

मौसम विभाग ने यह स्पष्ट किया कि यह इस गर्मी के मौसम में पहली बार है, जब लू की वजह से रेड अलर्ट जारी किया गया है। इस मौसम में तापमान उस तरह से नहीं बढ़ा जैसा कि यह आमतौर पर उत्तरी और मध्य भारत में बढ़ता है। ऐसा अप्रैल माह में काफी बारिश होने की वजह से हुआ। इसकी एक बड़ी वजह ये भी थी कि बारिश लगातार जारी रही।

शनिवार को राजस्थान के पिलानी में 46.7 डिग्री सेल्सियस तापमान दर्ज किया गया। मौसम विभाग ने कहा कि अगले पांच दिनों में पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़, दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, विदर्भ और तेलंगाना के कुछ हिस्सों में लू की स्थिति के साथ ही छिटपुट इलाकों में भीषण लू की स्थिति बनी रहेगी।

“अंतर्द्वंद (2008)” -बिहार की सबसे जटिल कुप्रथा और पिता, विवाह, अहंकार के त्रिकोण पर केन्द्रित फ़िल्म

डॉ० कुमार विमलेन्दु सिंह | Cinema Desk

भारतीय समाज में, “विवाह” एक ऐसा मुद्दा है, जो उत्सव भी है, चिंता भी, सहयोग भी है, प्रतिस्पर्धा भी। हमारे समाज में कई ऐसे युवक हैं, जो दहेज प्रथा पर निबंध लिखकर, इससे जुड़ी कानूनी धाराएं रट कर, अधिकारी बनते हैं और फिर ख़ूब दहेज मांगते हैं। लड़की का पिता बहुत कष्ट सहकर उसे दहेज देता है और फिर अपने इस दुख से उबरने के लिए, किसी और लड़की के पिता से प्रतिशोध लेता है, अपने पुत्र के लिए दहेज मांग कर।

निर्देशक ‘सुशील राजपाल’

ये दहेज लेने, देने का चलन, हमारे समाज को एक जाल की तरह, जकड़ चुका है और इससे तंग आ चुके कई परिवारों ने, इससे बचने के लिए, ज़बरदस्ती विवाह करवाना शुरू कर दिया। बिहार के कुछ ज़िलों में ये ख़ूब हुआ, “पकड़ुआ बियाह” के नाम से। इससे विवाह तो करा दिए गए, कुछ पिताओं के अहंकार का हनन हुआ तो कुछ पिताओं ने प्रतिशोध की संतुष्टि पाई, लेकिन इनके बीच बरबाद हुई, उन युवकों और युवतियों की ज़िंदगी, जिन्हें ज़बरदस्ती, एक दूसरे से बांध दिया गया।

2010 में आई फ़िल्म, “अंतर्द्वन्द”, ऐसे ही एक विवाह की कहानी कहती है। अखिलेन्द्र मिश्रा (महेन्द्र बाबू), अपनी बेटी जानकी (स्वाति सेन) की शादी, विनय पाठक (मधुकर शाही) के बेटे रघुवीर (राज सिंह चौधरी) से करना चाहते हैं और फ़िल्म के पहले ही दृश्य में, अखिलेन्द्र मिश्रा ने लड़की के पिता होने का अर्थहीन अपराध बोध, और विनय पाठक ने लड़के का पिता होने का अनावश्यक अहंकार, अपने शानदार अभिनय से, इस तरह प्रस्तुत किया है कि बिना किसी प्रयास के, दर्शक, कथानक में प्रवेश पा जाते हैं।

फ़िल्म के एक दृश्य में ‘राज सिंह चौधरी’

विनय पाठक (मधुकर शाही), मना कर देते हैं और आहत होकर अखिलेन्द्र मिश्रा (महेन्द्र बाबू), उनके बेटे रघुवीर (राज सिंह चौधरी) का अपहरण करवा लेते हैं और फिर ज़बरदस्ती शादी करवाते हैं, जिसके फलस्वरूप उनकी बेटी का जीवन बहुत बुरे तरीक़े से प्रभावित होता है और यही लड़के के भी साथ होता है। अहंकार और प्रतिशोध, एक पिता का, सब कुछ तबाह कर देता है। इसी के परिणाम और कारणों के बीच फ़िल्म बढ़ती रहती है।

फ़िल्म के एक दृश्य में ‘अखिलेन्द्र मिश्र’

फ़िल्म की कहानी, मशहूर सिनेमैटोग्राफ़र,व निर्देशक सुशील राजपाल ने लिखी है, जिन्हें सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के राष्ट्रीय फ़िल्म पुरुस्कार से भी नवाज़ा गया। ये फ़िल्म एक सत्य घटना से प्रभावित है और इतने सुन्दर और प्रभावी तरीक़े से इसे दर्शाया है कि इस फ़िल्म को सामाजिक मुद्दे से जुडी़ सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, 2009 में। लेकिन ये फ़िल्म दर्शकों तक पहुंच नहीं पाई ठीक तरह से और भद्दे मज़ाक और द्विअर्थी संवादों से गुदगुदी पैदा करने वाली फ़िल्मों की भीड़ में खो गई। तत्कालीन राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने पुरस्कार वितरण समारोह में, अपने भाषण में 5 बार “अंतर्द्वन्द” का ज़िक़्र किया, लेकिन आज तक किसी सैटेलाइट टीवी चैनल पर भी ये फ़िल्म नहीं दिखाई गई है।

फ़िल्म के एक दृश्य में ‘विनय पाठक’

इस फ़िल्म ने कला के सामाजिक सेवा के लक्ष्य के प्रति, कलाकारों के समर्पण को भी परिभाषित किया है और यह इस बात से शब्दशः प्रमाणित होता है कि किसी कलाकार ने इस फ़िल्म के लिए, एक भी पैसा नहीं लिया है।

सुशील राजपाल, जिन्होंने अपनी कलात्मक दक्षता, “लागा चुनरी में दाग” जैसी फ़िल्मों में  दिखाई है, इस फ़िल्म में अपने चरम पर दिखे हैं और पर्दे पर दिखने वाली भोर और रात, दर्शकों के मन में उजाला और अंधेरा बुन सकने में पूरे तरीके से समर्थ है।

“पितृसत्तात्मक समाज में अधिकतर महिलाओं को ही दुख का भागी होना पड़ता है, लेकिन फ़िल्म के अंतिम दृश्य में, शांति से, गांभीर्य से, अपने स्वाभिमान का प्रदर्शन और धैर्य की उद्घोषणा करती स्वाति सेन (जानकी), फ़िल्म के दुखांत होते हुए भी, एक आशा बिखेरती है। अखिलेन्द्र मिश्रा, हमेशा की तरह अपने किरदार के खाल में पूरी तरह ढके हुए दिखे हैं। विनय पाठक की संवाद शैली में बिहारी जैसा सुनाई पड़ने का प्रयास दिखा है। फ़िल्म में संगीत बापी तुतुल का है, जो प्रशंसनीय है।”

पिता की चिंता, विवाह के असंख्य पेंच और अहंकार के तीन अलग कोण प्रस्तुत करती और एक कथानक से आपस में जुड़ती ये फ़िल्म, सामाजिक मुद्दों के शाश्वत त्रिकोण को दिखाने में पूर्णतया सफल है लेकिन हमारे यहाँ की व्यवस्था/अव्यवस्था ने इसे दर्शकों तक, बहुत प्रभावकारी ढंग से नहीं पहुंचाया है।

देखें फ़िल्म का ट्रेलर:

मैं इस लेख के माध्यम से आग्रह करता हूँ कि इसे और ऐसी फ़िल्मों को कम से कम टेलीविज़न के माध्यम से ही, ज़्यादा से ज़्यादा दर्शकों तक पहुंचाया जाए।

(लेखक जाने-माने साहित्यकार, फ़िल्म समालोचक, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)