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Saturday, August 8, 2026
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जो बोलेगा मारा जाएगा: निशाने पर आरटीआई कार्यकर्ता और समाजसेवी

अनिल गलगली,

महाराष्ट्र की प्रगतिशील राज्य की छवि को बार-बार कुचलने की कोशिश जारी है। मुंबई के उम्र दराज आरटीआई कार्यकर्ता भूपेंद्र वीरा की दिनदहाड़े हत्या से फिर एक बार आरटीआई और सामाजिक कार्यकर्ताओं पर होने वाले हमलों का विषय गंभीर हुआ है। महाराष्ट्र को और कितनी मौत चाहिए, यह सवाल आम जनमानस से लेकर सोशल मीडिया तक में चर्चा का विषय बना हुआ है। ‘जो बोलेगा मारा जाएगा’,ऐसा ही कुछ महाराष्ट्र में हो रहा है, क्योंकि पूरे भारत में जितने भी आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हमले हुए और रास्ते से हटाया गया, उनमें महाराष्ट्र सबसे आगे है।

महाराष्ट्र में आरटीआई कानून लागू होने के बाद से ले कर आज तक कई कार्यकर्ताओं पर जानलेवा हमले हुए हैं। इनमें सामजिक कार्यकर्ता डा. नरेंद्र दाभोलकर और गोविंद पनसरे के नाम भी जुड़ गए हैं। भले ही ये दोनों किसी की सूचना नहीं इकट्ठी करते थे, लेकिन गलत कुरीतियों के खिलाफ जम कर अपनी बात रख कर उस के कार्यान्वयन से पीछे नहीं हटते थे।

दाभोलकर और पनसरे की हत्या से पहले पुणे के सतीश शेट्टी की हत्या हुई थी। प्रसिद्ध समाजसेवी अण्णा हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान से जुड़े सतीश ने वहां के जमीन घोटाले की जानकारी निकाली थी। मौर्निंग वाक के दौरान उनकी हत्या हुई, जिस का सुराग आज तक नहीं लग पाया है। सीबीआई ने अप्रैल 2014 में क्लोजर रिपोर्ट सौंप कर मामला बंद किया था, जबकि उनके हत्यारों तक सीबीआई पहुंची थी,पर राजनीतिक दबाव के कारण मामला आगे बढ़ नहीं पाया। इस हत्या को मुंबई हाईकोर्ट ने संज्ञान में लेकर उसे जनहित में परावर्तित किया। सीबीआई ने शेट्टी मामले में एक रिटायर्ड पुलिस अधिकारी की गिरफ्तारी हुई है, लेकिन जो इसके मास्टर माइंड थे उनके गिरेबान पर हाथ डालने की हिम्मत सीबीआई ने नहीं की है।

पिछले 12 सालों में कितने लोगों ने आरटीआई कानून का इस्तेमाल करने और सामाजिक मामलों को उठाने के कारण अपनी जान गंवाई और कितने लोगों पर जानलेवा हमले हुए, इस का जवाब न केंद्र के पास है, न राज्य सरकार के पास। महाराष्ट्र में सामाजिक आंदोलन की अगुआई करने वालों पर हमला होना नई बात नहीं है।

महाराष्ट्र हमेशा सामाजिक कार्यकर्ताओं पर जानलेवा हमले की घटनाएं से चर्चा में रहा है। प्रसिद्ध अभिनेता और सामाजिक कार्यकर्ता श्रीराम लागू पर वर्ष 1991 में सांगली में एक गुट ने लाठियां बरसाई थीं। उसी वर्ष डा. नरेंद्र दाभोलकर पर हथियारों से लैस एक गुट ने हमला किया था लेकिन दाभोलकर ने पुलिस में शिकायत करने से इनकार कर दिया था। 16 मार्च, 2010 को रेत माफिया ने सामाजिक कार्यकर्ता सुमेरिया अब्दुल अली, नसीर जलाल और एक पत्रकार पर महाड में जानलेवा हमला किया था। महाड पुलिस ने एक विधायक के पुत्र पर मामला भी दर्ज किया। चर्चगेट स्थित ओवल बिल्डिंग में नयना कथपलिया पर 8 जनवरी, 2010 को फायरिंग हुई थी। वे एसआरए योजना, हौकर्स और अतिक्रमित जमीन कब्जेदारों के खिलाफ आंदोलन करती थीं।

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13 जनवरी, 2010 को सतीश शेट्टी (38) की तलेगांव दाभाड़े में हत्या की गई। 20 अप्रैल, 2010 को विठ्ठल गीते की मौत हुई, उनपर बीड के वाघबेट गांव में जानलेवा हमला हुआ। उन्होंने साईनाथ विद्यालय में चल रही अनियमितता का भंडाफोड़ किया था। 22 दिसंबर, 2010 को ही कोल्हापुर में दत्तात्रय पाटील की हत्या हुई थी। पाटील ने नगरसेवकों की हौर्सट्रेडिंग बाबत जनहित याचिका दायर की थी तथा पावरलूम कारखानों की पोल खोली थी।कौमनवैल्थ ह्यूमन राइट्स इनीशिएटिव (सीएचआरआई) द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज के अनुसार, केंद्र सरकार के पास सामाजिक और आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हमले की आधिकारिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। कार्मिक, लोकशिकायत एवं पैंशन मंत्रालय ने हाल के वर्षों के मामलों से यह कह कर पल्ला झाड़ लिया कि केंद्र सरकार ऐसे मामलों के आंकड़े एकत्र नहीं करती। केंद्र का हमेशा तर्क होता है कि सामाजिक और आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हुआ हमला कानूनव्यवस्था की बहाली का मामला है,जो उन राज्यों के अधीन है। हाल ही में केंद्रीय सूचना आयोग ने जारी किए रिपोर्ट में लिखा गया है कि सूचना का अधिकार कार्यान्वित होने से आज तक 1.75 करोड़ भारतीयों ने इसका इस्तेमाल किया है।

बीते 12 वर्षों के रुझान इस बात का संकेत करते हैं कि उपेक्षा, अन्याय और भ्रष्टाचार का शिकार हुआ तबका आरटीआई और सामाजिक कार्यकर्ताओं की हिम्मत को पस्त करने के लिए उनके ऊपर बड़ी तादाद में हमले कर रहा है। मिसाल के लिए, बीते 12 वर्षों में महाराष्ट्र में सामाजिक और आरटीआई कार्यकर्ताओं पर 57 बार हमले हुए हैं और इन में 12 मामलों में कार्यकर्ताओं की हत्या हुई है। अगर सही बात कही जाए तो जल, जंगल और जमीन के अलावा सामाजिक कुरीतियों तथा भ्रष्टाचार को उजागर करने का मामला हो तो सामाजिक और आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या या उन के उत्पीड़न की आशंका सबसे अधिक है।

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 महाराष्ट्र के हर एक आरटीआई कार्यकर्ता को पुलिस की सुरक्षा देना संभव नहीं है, लेकिन जो शिकायत करते हैं या जिन्हें धमकाया जाता हैं, उन्हें पुलिस की सुरक्षा देने में कोई हर्ज नहीं है। लेकिन ऐसे मामलो में स्थानीय पुलिस, राजनेता और अपराधियों की साठगांठ होने से इनकी शिकायतों को नजरअंदाज किया जाता है। कमसे कम पुलिस उपायुक्त या उसके स्तर के वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी में ऐसी शिकायतों का निपटारा होना चाहिए।
महाराष्ट्र के हर एक आरटीआई कार्यकर्ता को पुलिस की सुरक्षा देना संभव नहीं है, लेकिन जो शिकायत करते हैं या जिन्हें धमकाया जाता हैं, उन्हें पुलिस की सुरक्षा देने में कोई हर्ज नहीं है। लेकिन ऐसे मामलो में स्थानीय पुलिस, राजनेता और अपराधियों की साठगांठ होने से इनकी शिकायतों को नजरअंदाज किया जाता है। कमसे कम पुलिस उपायुक्त या उसके स्तर के वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी में ऐसी शिकायतों का निपटारा होना चाहिए।
महाराष्ट्र के हर एक आरटीआई कार्यकर्ता को पुलिस की सुरक्षा देना संभव नहीं है, लेकिन जो शिकायत करते हैं या जिन्हें धमकाया जाता हैं, उन्हें पुलिस की सुरक्षा देने में कोई हर्ज नहीं है। लेकिन ऐसे मामलो में स्थानीय पुलिस, राजनेता और अपराधियों की साठगांठ होने से इनकी शिकायतों को नजरअंदाज किया जाता है। कमसे कम पुलिस उपायुक्त या उसके स्तर के वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी में ऐसी शिकायतों का निपटारा होना चाहिए।
महाराष्ट्र में सामाजिक और आरटीआई कार्यकर्ताओं पर जानलेवा हमले होने की घटनाओं की बढ़ती तादाद के बावजूद राज्य सरकार की तरफ से कोई व्यवस्था नहीं की गई है कि कार्यकर्ता बेखौफ हो कर काम कर सकें। इनकी सुरक्षा को लेकर कानून को अंतिम मंजूरी नहीं मिल पा रही है, जो सबसे अधिक चिंता का विषय है। महाराष्ट्र सरकार के पास आरटीआई कार्यकर्ताओं पर होनेवाले हमले और उनकी हत्या के ठोस आकंड़े नहीं हैं , ना इसे रोकनेे का कोई प्लान नहीं है। जब तक प्रशासन आरटीआई कार्यकर्ताओं की सामाजिकता और संघर्ष को तवज्जो नहीं देता, तब तक ऐसे कितने ही शेट्टी, दाभोलकर, वीरा और पानसरे बेमौत मारे जाते रहेंगे।

दंगल की कमाई हो सकती है बाॅक्स आफिस पर 500 करोड़ के पार

एंटरटेनमेंट डेस्क
आमिर खान की फिल्म दंगल का ट्रेलर जारी हो गया है। बेहद शांत दिखता यह ट्रेलर ऐसा अहसास दे रहा है, जैसे तूफान आने से पहले होता है। पिछले कुछ समय से सलमान खान की ‘सुल्तान’ और आमिर खान की ‘दंगल’ को लेकर सोशल मीडिया पर बहुत चर्चा हो रही थी, वजह साफ थी,एक जैसा विषय। फिल्म ‘सुल्तान’ एक रेसलर पर आधारित थी और आमिर खान की ‘दंगल’ भी रेसलर पर आधारित है। लेकिन आपको बता दें कि दोनों में रात-दिन का अंतर है। आमिर की दंगल कहीं भी ‘सुल्तान’ से नहीं मिलती है।

सुल्तान जहां एक प्रेम कहानी थी, वहीं दंगल महिला सशक्तिकरण को तवज्जो देती है। आमिर खान ने पूरी फिल्म को महिला केन्द्रित रखा है। यह ट्रेलर से स्पष्ट है। उनका पूरा फोकस फिल्म में उनकी बेटियां बनी गीता और बबीता पर रहा है। हालांकि वे हर दृश्य में स्वयं मौजूद हैं लेकिन उन्होंने अपने से ज्यादा महत्त्व अपनी बेटियों को दिया है। यही इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबी और यूएसपी है।

फिल्म के ट्रेलर को बार-बार देखने की इच्छा जागृत होती है। अंदाजा लगाना आसान नहीं है, लेकिन फिर भी यह निश्चित है कि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर वो कमाल करेगी जिसकी अपेक्षा किसी ने नहीं की है। उम्मीदें तो बहुत हैं लेकिन फिर भी अनाधिकृत तौर पर बॉक्स ऑफिस की गणित पर नजर रखने वालों का कहना है कि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर 500 करोड़ से ज्यादा का कारोबार भारतीय बाजार से करेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने उठाया प्रश्न,”क्या राष्ट्रीय प्रतीक या राष्ट्रीय चिन्ह के आधार पर वोट मांगना जायज़ है?”

अनुज हनुमत
आज एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि क्या कोई व्यक्ति सीमा पर मौतों का मुद्दा उठाकर एक विशेष दल के लिए वोट मांग सकता है! दरअसल कोर्ट का यह सवाल उन कई सवालों में शामिल था, जो दो दशक पुराने ‘हिंदुत्व’ संबंधी फैसले पर फिर से गौर करने के लिए सुनवाई के दौरान उठाया गया।

आज जनप्रतिनिधि कानून की धारा 123 (3) में ‘राष्ट्रीय प्रतीक’ और ‘राष्ट्रीय चिन्ह’ शब्दों का जिक्र करते हुए चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा कि किसी को भी चुनावों में वोट हासिल करने के लिए उनके प्रयोग की अनुमति नहीं हो सकती। सुनवाई के दौरान पीठ ने सवाल भी किया है कि क्या कोई भी व्यक्ति राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीय चिन्ह के आधार पर वोट मांग सकता है और कह सकता है कि लोग सीमा पर मर रहे हैं और इसलिए किसी खास पार्टी के लिए वोट कीजिए। क्या इसे अनुमति दी जा सकती है? वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने कहा है कि यह इस प्रावधान में विशेष रूप से वर्जित है।

आपको बता दें कि सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि संसद ‘अलगाववादी और सांप्रदायिक’ प्रवृत्तियों पर काबू पाने के लिए चुनाव संबंधी कानून में ‘भ्रष्ट क्रियाकलाप’ शब्द के दायरे को जानबूझकर ‘बढ़ाया’ है। पीठ के अनुसार, जन प्रतिनिधित्व कानून के वर्तमान उपबंध में सबसे महत्वपूर्ण यह है कि संसद ने चुनावों के दौरान अलगाववादी और सांप्रदायिक प्रवृत्तियों को काबू पाने के लिए ‘भ्रष्ट क्रियाकलाप’ शब्द के दायरे को बढ़ाने के बारे में सोचा।

इस पीठ में जस्टिस मदन बी लोकुर, जस्टिस एसए सोब्दे, जस्टिस एके गोयल, जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एल नागेश्वर राव शामिल थे। इसके बाद पीठ ने एक काल्पनिक सवाल उठाया और पूछा कि क्या एक ‘सिख ग्रंथी’ किसी खास हिंदू उम्मीदवार के लिए वोट मांग सकता है, क्या यह कहा जा सकता है कि यह अपील संबंधित प्रावधान से उलझती है।

वरिष्ठ अधिवक्ता दीवान ने जवाब दिया कि कानून के इस प्रावधान के तहत संभवत: यह ‘भ्रष्ट क्रियाकलाप’ नहीं होगा। उन्होंने कहा कि प्रावधान में प्रयुक्त ‘उनका धर्म’ शब्द से मतलब उम्मीदवार के धर्म से है, वोट मांगने वाले धार्मिक नेता के धर्म से नहीं।

सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि इस बीच, तीन सामाजिक कार्यकर्ताओं तीस्ता सीतलवाड़, शामसुल इस्लाम और दिलीप मंडल ने ‘राजनीति से धर्म को अलग करने’ की मांग को लेकर वर्तमान सुनवाई में हस्तक्षेप के लिए आवेदन दायर किया। कोर्ट की सुनवाई के दौरान दी गई ये प्रतिक्रिया काफी अहम मानी जा रही है।

वड़ोदरा में प्रधानमंत्री मोदी के स्वागत की भव्य तैयारियां, दिव्यांग सभा को करेंगे संबोधित

कल यानी 22 अक्टूबर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वडोदरा के नवलखी मैदान में दिव्यांगों के लिए आयोजित एक कार्यक्रम का हिस्सा बनेंगे। कार्यक्रम में प्रधानमंत्री के भव्य स्वागत के लिए अप्रतिम तैयारियां की जा रही हैं। तमाम तैयारियों के बीच सबसे आकर्षित कर लेने वाला होगा विशाल मंच, जो 80 फीट लम्बा, 60 फीट चौड़ा और 7 फीट ऊंचा बनाया गया है।

कार्यक्रम को सुविधापूर्ण और आकर्षक बनाने के लिए 400 कारीगर रात-दिन लगातार काम कर रहे हैं।
चूंकि कार्यक्रम दिव्यांगों के लिए है, इसलिए उनमे अनुरूप सुविधाओं का भी बंदोबस्त किया गया है। कार्यक्रम में शामिल होने वाले 50 हजार दिव्यांगों के लिए 1000 फीट लंबे और 332 फीट चौड़े वॉटर प्रूफ 3 भव्य डोम बनाए गए हैं।

मंच पर 27 दिव्यांगों के जाने के लिए रेम्प भी बनाया गया है। नवरात्रि के दूसरे दिन से डोम बनाने का काम शुरू हो गया था। 1000 सिलिंग फेन, 300 लाइट्स के साथ-साथ कूलर की भी व्यवस्था। कार्यक्रम में उपस्थित होने वाले दिव्यांगों के लिए 2500 ट्राइसिकल, मोटर राइज ट्राइसिकल भी तैयार की गई हैं।

सीएम अखिलेश ने दी उत्तर प्रदेश को सौगात

आनंद द्विवेदी,

यूपी के सीएम अखिलेश ने आज प्रदेशवासियों को बड़ा तोहफा दिया। अखिलेश ने कानपुर जिले के घाटमपुर, सजेती में यमुना किनारे 1980 मेगावाट के पावर प्लांट का उद्घाटन शिलान्यास किया है। इस प्लांट में 660 मेगावाट की 3 यूनिट्स का निर्माण किया जाना है, जिसकी कुल लागत तकरीबन 17237.80 करोड़ रूपये तय की गई है।

इस अवसर पर कैबिनेट मंत्री पीयूष गोयल, साध्वी निरंजन ज्योति समेत मुरली मनोहर जोशी ने दीप प्रज्जवलित किये। पावर प्लांट का भूमि पूजन कार्यक्रम भी हुआ। इस पावर प्लांट में मिनिमम पॉल्यूशन और लेटेस्ट टेक्नोलाँजी के साथ पर्यावरण को देखते हुए संयंत्र लगाये जाने हैं।

इसे नैवेली उत्तर प्रदेश पावर लिमिटेड नाम दिया गया है जिसे नैवेली, एलएनसी, और यूपी विद्युत् निगम लिमिटेड के तत्वावधान में निर्मित किया जा रहा है।

रीता बहुगुणा हुईं भाजपा में शामिल, कांग्रेस की बढ़ सकती है मुश्किल

अमित द्विवेदी,

आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। उत्तर प्रदेश की कांग्रेस की कद्दावर नेता रीता बहुगुणा जोशी भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गई हैं। रीता ने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की मौजूदगी में भाजपा की सदस्यता हासिल की।

किसान रैली के जरिए एक तरफ राहुल गांधी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का माहौल बनाने में लगे थे, लेकिन रीता राहुल सहित कांग्रेस को बड़ा झटका देते हुए बीजेपी में शामिल हो गईं। सदस्यता हासिल करने के बाद रीता ने कहा, ‘मैंने राष्ट्रहित और प्रदेश हित में यह फैसला लिया है। मैंने बहुत ही सोच समझकर यह फैसला लिया है।’

फिलहाल रीता बहुगुणा लखनऊ कैंट से विधायक हैं। भाजपा में शामिल होने को लेकर कई दिनों से चर्चा चल रही थी। लेकिन ऐसा किसी को अंदाज़ा नहीं था कि कांग्रेस को इतना बड़ा झटका लग सकता है। हालाँकि अटकलें ऐसी भी थी कि रीता सपा में भी शामिल होने की फिराक में थी, लेकिन बात नहीं बनी।

गौरतलब है कि उत्‍तर प्रदेश के पूर्व मुख्‍यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा की बेटी रीता 2007 से 2012 के बीच यूपी कांग्रेस कमेटी की अध्‍यक्ष रही हैं। माना जाता है कि बहुगुणा की पैठ ब्राह्मणों में काफी अच्छी है।

वोडाफोन ने अपने नाम दर्ज किया ये अनोखा वर्ल्ड रिकॉर्ड!

शिखा पाण्डेय
आज की प्रतियोगिता से लैस दुनिया में हर कोई इस फिराक में है कि वह क्या ऐसा करे, कि सामान्य भीड़ से अलग हो। ऐसी ही कवायद करने में आज कल दूरसंचार कंपनियाँ भी जोर शोर से लगी हुई हैं। इसी कड़ी में दूरसंचार कंपनी ‘वोडाफोन इंडिया’ ने 62 फुट 5.5 इंच चौड़ा और 40 फुट एक इंच लंबा पेपर रीचार्ज वाउचर बनाकर दुनिया के सबसे बड़े पेपर वाउचर का गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड अपने नाम दर्ज किया है।

कंपनी ने इस रिकॉर्ड आकार के रिचार्ज कूपन को कल आगरा में प्रदर्शित किया। कंपनी के उत्तर प्रदेश पश्चिम के कारोबार प्रमुख दिलीप कुमार गंटा ने कहा, “इस वाउचर को बनाकर हमने पेपर रीचार्ज वाउचर के माध्यम से उपलब्ध कराए जाने वाले ऑफरों का जश्न मनाया है। दुनिया का सबसे बड़ा वाउचर बनाना हमारे हितधारकों और उपभोक्ताओं को सर्वश्रेष्ठ सेवा मुहैया कराने की हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।”

इस मौके पर उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिरीक्षक सुजीत पाण्डेय मुख्य अतिथि के तौर पर मौजूद रहे। कंपनी ने एक विज्ञप्ति के ज़रिये बताया कि उसके उत्तर प्रदेश-पश्चिम सर्कल द्वारा बनाए गए इस रिकॉर्ड को गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड के निर्णायक अधिकारी स्वप्निल डेंगरीकर ने प्रमाणित किया है।

‘ऐ दिल…’ की मुश्किल बढ़ाने वाले 12 मनसे कार्यकर्ता गिरफ़्तार

अमित द्विवेदी,

फिल्म ‘ऐ दिल है मुश्किल’ को रिलीज़ करने के सन्दर्भ में निर्माता करण जौहर की ओर से वीडियो जारी कर सफाई देने के बावजूद राज ठाकरे की पार्टी एमएनएस फिल्म की रिलीज का लगातार विरोध कर रही है। इसे लेकर बुधवार को एमएनएस कार्यकर्ताओं ने मुंबई के मेट्रो सिनेमा हॉल में जमकर हंगामा किया। विवाद न बढ़े, इसलिए महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के इन 12 कार्यकर्ताओं को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है।

आजाद मैदान थाने के प्रभारी विजय कदम ने बताया, ‘हमने मनसे के 12 कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया और उनके खिलाफ महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम और दंड प्रक्रिया संहिता की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया।’

करण द्वारा भविष्य में पाकिस्तानी कलाकारों के साथ काम न करने का विश्वास दिलाने के बाद भी मनसे विश्वास करने को तैयार नहीं। इसी के चलते महाराष्ट्र नवनिर्माण चित्रपट कर्मचारी सेना के कार्यकर्ताओं ने दक्षिणी मुंबई के मेट्रो सिनेमा के बाहर प्रदर्शन किया और कहा कि ‘ऐ दिल है मुश्किल’ फिल्म दिखाने नहीं देंगे। पार्टी ने सिनेमाघर प्रबंधन से पाकिस्तानी कलाकार फ़वाद खान अभिनीत इस फिल्म का कोई भी शो नहीं चलाने को कहा। इसलिए मुम्बई पुलिस को यह कड़ा कदम उठाना पड़ा।

राज ठाकरे की पार्टी का अब भी यही मानना है कि जौहर को वास्तविकता देर से समझ आई है। मनसे की सिनेमा शाखा के प्रमुख अमेय खोपकर ने राज ठाकरे और अन्य वरिष्ठ नेताओं से मिलने के बाद कहा कि वे रिलीज के विरोध को लेकर अब भी दृढ हैं।खोपकर ने कहा, “हम सिंगल स्क्रीन्स और मल्टीप्लेक्स में फिल्म दिखाने नहीं देंगे। निर्माता को वास्तविकता देर से समझ आई है।”

गौरतलब है कि करण जौहर ने कल उनकी फिल्म की रिलीज रोकने की मांग करने वालों से अपील की थी और कहा था कि वह अब पाकिस्तान की प्रतिभाओं के साथ काम नहीं करेंगे। यह फिल्म दिवाली से पहले 28 अक्टूबर को रिलीज होने वाली है।

बुंदेलखंड के किसानों को राहत की साँस देना पीएम मोदी के लिए सबसे बड़ी चुनौती

अनुज हनुमत,

वैसे तो लखनऊ में दशहरे के विशेष कार्यक्रम में शामिल होकर प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने चंद महीनों बाद होने वाले यूपी विधानसभा चुनाव के लिए अपना चुनाव अभियान शुरू कर दिया था, इसी कड़ी में यूपी में उनका अगला पड़ाव आगामी 24 तारीख को बुन्देलखन्ड होगा। वहाँ वे महोबा में एक विशाल महारैली को संबोधित करेंगे। लेकिन इस बार उनके सामने चुनौतियाँ कम नही होंगी क्योंकि इस बार उनके सामने  ‘सूखे और बाढ़ से तबाह हुआ किसान’ होगा, जो अभी भी सरकारी सहायता की आस लगाये बैठा है ।

दरअसल, अगर उनकी पार्टी के नेताओं, खासकर बुन्देलखण्ड के चारों सांसदों की बात करें, तो पिछले ढाई साल के कार्यकाल में किसानों के दुःख दर्द के सामने सभी का आत्मविश्वास बौना ही नजर आया है। लोकसभा में सभी ने किसानों के एकाध मुद्दे तो मजबूती से उठाये, पर दिल्ली से ऐसी कोई योजना नहीं ला सके जो किसानों का दर्द कम कर सके और न ही इनके द्वारा ऐसे कोई भी ठोस प्रयास किये गए जो सूखे और बाढ़ के समय किसानों के आंसू पोछने के काम आ सकें।

आपको बता दें की कुछ ही महीनों में यूपी में विधानसभा चुनाव होने हैं और ऐसे में सभी पार्टियों की नजर बुंदेलखंड के क्षेत्र पर है जहाँ अभी भी समस्यायों का अम्बार लगा है। कुछ किसानों से हमने बात की तो उन्होंने कहा , “बाबूजी ! अब चुनाव का समय आवत है तौ सबै का हमार याद आई, लेकिन कौनों हमार सहायता नाहीं करत।”

हमने जब बुन्देलखण्ड के कुछ समाज सेवियों से बात की, तो उन्होंने भी हमें बताया कि हर पांच साल बाद यूँ ही सभी को चुनावी बयार के समय बुन्देलखण्ड की याद आती है। कहीं न कहीं वोट का मामला होता है ।कुछ ने कहा कि हम चाहते हैं कि अपने घण्टे भर के भाषण में प्रधानमंत्री जी ज्यादातर समय किसानों के नाम दें। साथ में ये भी बतायें कि क्या उनकी सरकार के पास बुन्देलखण्ड के विकास के लिए कोई ठोस मॉडल है या यहाँ की जनता को सिर्फ गरीबी और भुखमरी में ही अव्वल दर्जा प्राप्त होता रहेगा।

बुन्देलखण्ड की सबसे ख़ास बात यह है कि वहां बेइंतहा खनिज सम्पदा है, लेकिन सब खनन माफियों द्वारा लूटा जा रहा है जिसमें ज्यादातर सफेदपोशों का हाथ है। गौरतलब है कि  पिछले तीन दशकों से बुन्देलखण्ड में भयंकर सूखा पड़ रहा है और इस बार तो बाढ़ ने सब बर्बाद कर दिया है। बुन्देलखण्ड के अधिकांश किसानों को आशा है कि प्रधानमन्त्री जरूर उनकी मदद करेंगे और उनके दर्द को समझेंगे ।

अभी हाल ही में राहुल गांधी अपनी ‘देवरिया से दिल्ली तक किसान यात्रा’ के दौरान बुन्देलखण्ड आये थे और उन्होंने कहा था कि अगर यूपी में कांग्रेस की सरकार आई तो किसानों का कर्ज माफ़ होगा। राहुल गांधी ने अपनी यात्रा के दौरान लगभग हर जगह कहा कि प्रधानमन्त्री जी के पास बड़े बड़े उद्योगपतियों के कर्ज माफ़ करने के लिए रूपये हैं, लेकिन बस किसानों के लिए नहीं हैं । ऐसे में केन्द्र की मोदी सरकार के सामने किसानों की कर्जमाफी को लेकर जबरदस्त दबाव है ।

सपा में आपसी घमासान जारी, अखिलेश अकेले ही निकालेंगे समाजवादी विकास रथ यात्रा!

शिखा पाण्डेय,
समाजवादी परिवार की आपसी रंजिश कुछ अलग ही मोड़ लेती नज़र आ रही है। एक ओर 5 नवंबर को समाजवादी पार्टी अपनी स्थापना का रजत जयंती महोत्सव मनाने की धूम धाम से तैयारियां कर रही है , तो दूसरी ओर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने ‘एकला चलो’ की नीति अपना कर अकेले रथ यात्रा का फैसला लिया है। अखिलेश 3 नवंबर को ही विकास रथ यात्रा ले कर निकलने की तैयारी में हैं। इसका साफ़ साफ़ मतलब यह है कि संभवतः अखिलेश रजत जयंती महोत्सव का हिस्सा नहीं होंगे।

आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारी में सपा की तरफ से निकाली जा रही इस यात्रा को ”समाजवादी विकास रथ यात्रा” का नाम दिया गया है, जो राजधानी लखनऊ से 3 नवंबर को सीएम अखिलेश यादव की अगुवाई में निकलेगी। इस रथयात्रा के माध्यम से पार्टी यूपी सरकार द्वारा पिछले 4 सालों में किए गए कामों का प्रचार प्रसार लोगों के बीच जाकर करेगी सूत्रों के अनुसार अखिलेश के इस मेगा इवेंट से बहार रहने का कारण सपा से निष्कासित युवा नेता हैं।

चूंकि निष्कासित नेता रजत जयंती महोत्सव में शामिल नहीं होंगे, अखिलेश की नाराज़गी की भी वजह यही मानी जा रही है। इसका अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि 3 नवम्बर को निकलने वाली विकास रथ यात्रा में सीएम के साथ निष्कासित युवा नेता भी शामिल होंगे। आपको बता दें कि मंगलवार को ही समाजवादी पार्टी के यूथ ब्रिगेड ने पार्टी के रजत जयंती कार्यक्रम के बहिष्कार का ऐलान किया था।

अखिलेश यादव ने सपा अध्यक्ष व अपने पिता मुलायम सिंह यादव को एक पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने कहा है, ” माननीय राष्ट्रीय अध्यक्ष महोदय। 3 अक्टूबर से जो विकास यात्रा शुरू होनी थी, वह कई कारणों से नहीं हो पाई। अब 3 नवंबर से यह विकास यात्रा प्रारंभ की जायेगी। समय समय पर इसकी गतिविधियों के विषय में आपको सूचित किया जायेगा।”

दूसरी ओर यूपी चुनावों में विजय बिगुल बजाने की होड़ में लगी सपा ने भाजपा से आगे निकलने के चक्कर में ‘रामलीला थीम पार्क’ बनाने का जो निर्णय लिया है, उसे शाही इमाम बुखारी ने सपा के लिए खतरनाक बताया है। शाही इमाम के साथ अखिलेश व मुलायम ने इस सन्दर्भ में बैठक की। बुखारी ने सपा को साफ़ चेतावनी दी है कि यदि ‘रामलीला थीम पार्क’ बना तो सारे के सारे मुस्लिम वोट कट जायेंगे।

अब चारों ओर से दलदल में फंसी समाजवादी पार्टी की नैया को भगवान श्री राम पार लगाते हैं  या ‘समाजवादी विकास रथ यात्रा’, यह तो समय ही बताएगा।