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Tuesday, August 4, 2026
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केजरीवाल का तुग़लक़ी फ़रमान, “दिल्ली के बाहर वालों का यहाँ नहीं होगा इलाज”

न्यूज़ डेस्क | navpravah.com
कोरोना संकट में नेताओं ने बढ़-चढ़कर राजनीतिक बयानबाज़ी की है। दिल्ली के मुख्यमंत्री भी इससे अछूते नहीं हैं। दिल्ली में रोज़ाना बढ़ रहे कोरोना के मामले चिंताजनक हैं। दिल्ली सरकार गठित चिकित्सकों की टीम ने सरकार को रिपोर्ट सौंपा है, जिसके बाद मुख्यमंत्री ने विडियो कॉन्फ़्रेन्स के ज़रिए सरकार के फ़ैसले की जानकारी दी।
दिल्ली में लगातार कोरोना के बढ़ते मामले के बीच राज्य सरकार ने सोमवार से तमाम छूट देने की घोषणा की है। कुछ छूट मिले हैं, तो कुछ निर्णय स्थानीय लोगों की समस्या को बढ़ाते नज़र आ रहे हैं। अपने एक निर्णय की घोषणा करते हुए केजरीवाल ने स्पष्ट कहा कि दिल्ली के सरकारी और निजी अस्पतालों में अब सिर्फ दिल्ली के निवासियों का ही इलाज होगा।
यह फ़ैसला अपने राज्य की जनता को तरजीह देते हुए केजरीवाल ने यह निर्णय लिया, लेकिन ऐसे में उन लोगों को भारी परेशानी होने वाली है, जिनके पास दिल्ली के होने का प्रमाण नहीं है या जो किसी भी वजह से दिल्ली में हैं। पिछले ८०-९० दिनों के लॉकडाउन की वजह से लोग आर्थिक रूप से विपन्न हो चुके हैं, ऐसे में यदि स्थानीय सरकार उनकी मदद नहीं करती, तो उन्हें भारी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।
इसके अलावा भी दिल्ली के मंत्रिमंडल ने कुछ निर्णय लिए हैं। निम्न बिंदुओं में पढ़िए कि दिल्ली में कल से सामाजिक जीवन कैसा नज़र आएगा।
• राजधानी में कल से रेस्त्रां, मॉल और धार्मिक स्थल खोले जाएंगे। इस दौरान केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों का पालन किया जाएगा।
• होटल और बैंक्वेट हॉल को अभी नहीं खोला जाएगा। हो सकता है आने वाले समय में होटलों को अस्पतालों के साथ अटैच करना पड़े, इसलिए उन्हें नहीं खोले जाने का निर्णय लिया गया है।
• केजरीवाल ने बुजुर्गों से बाहर न जाने और घर में भी किसी से न मिलने की अपील की है।
• कल यानि सोमवार से दिल्ली के बॉर्डर को सभी की आवाजाही के लिए खोल दिया जाएगा।
• कैबिनेट की बैठक में यह फैसला लिया गया है कि फिलहाल दिल्ली में केंद्र सरकार के जो अस्पताल हैं, उनमें पहले की तरह ही सभी मरीजों का इलाज हो सकेगा। दिल्ली में कुछ निजी अस्पताल ऐसे हैं जो विशेष तरह की सर्जरी करते हैं। यहां देश भर से लोग आकर सर्जरी करवाते हैं। इन अस्पतालों में सभी का इलाज हो सकेगा।
• केजरीवाल ने बताया कि दिल्ली में स्वास्थ्य व्यवस्था की समीक्षा के लिए हमने पांच वरिष्ठ डॉक्टरों की समिति बनाई थी। उनका भी यही सुझाव है कि जब तक कोरोना संकट है, तब तक दिल्ली के अस्पतालों को दिल्लीवासियों के लिए आरक्षित कर दिया जाए।
उन्होंने कहा कि समिति ने स्पष्ट बताया कि अगर दिल्ली के अस्पतालों को सभी के इलाज के लिए खोल दिया जाएगा, तो तीन दिन में सारे बेड भर जाएंगे।

25 विद्यालयों को झाँसा देने वाली अनामिका गिरफ़्तार

सौम्या केसरवानी | navpravah.com

उत्तर प्रदेश के 25 स्कूलों में फर्जी तरीके से नौकरी करने के मामले में कासगंज पुलिस ने शिक्षिका अनामिका शुक्ला को आज गिरफ्तार कर लिया है। यह शिक्षिका कासगंज के कस्तूरबा विद्यालय फरीदपुर में नौकरी कर रही थी।

अनामिका को बीते 13 महीने में 25 कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में करीब एक करोड़ रुपये के मानदेय का भुगतान किया गया है। सभी भुगतान 25 केजीबीवी से मानदेय एक ही बैंक खाते में गया या अलग-अलग खातों में किया गया है, इसकी जांच पुलिस अभी कर रही है।

सूत्रों के मुताबिक, चर्चा में आने पर अनामिका शुक्ला नाम की शिक्षिका की तलाश की गई, तो जिले के कस्तूरबा विद्यालय में यह शिक्षिका पाई गई। इस पर शुक्रवार को बीएसए ने शिक्षिका के वेतन आहरण पर रोक लगाते हुए नोटिस जारी किया था।

शिक्षिका ने इस नोटिस को देखकर बचाव के लिये नौकरी से इस्तीफा देने का निर्णय लिया, अनामिका शुक्ला को अपनी गलती का अंदेशा था इसलिये कार्रवाई के डर से वह स्वयं इस्तीफा देने बीएसए ऑफ़िस नहीं गई, उसने अपने साथ आए एक युवक के द्वारा अपना इस्तीफा बीएसए को भेजा।

बीएसए ऑफ़िस में जब युवक से अनामिका शुक्ला के बारे में पूछा तो उसने बताया कि वह बाहर सड़क पर खड़ी हैं, इस पर बीएसए अंजली अग्रवाल ने पुलिस को मामले की जानकारी दी और कार्यालय के स्टाफ के माध्यम से अनामिका शुक्ला की घेराबंदी की गयी और पुलिस के पहुंचते ही उसे गिरफ्तार कर लिया गया।

बोलती तस्वीरें- “शम्मी नारंग”

डॉ० कुमार विमलेन्दु सिंह | Navpravah Desk

दस्त- ब- दस्त ली जाती हैं ख़बरें, जिन्हें ख़य्याम नहीं बताते , कुछ शख्स, किसी तरफ़ से नहीं , बस आवाम के लिए कहते हैं , और जब से दूरदर्शन पर ये खबरें सुनाई जाने लगीं , तब से इस के साथ कुछ चेहरे जुड़ गए और आदत  की तरह जुड़ गए, उन लोगों के साथ जो उस दौर में ज़िन्दगी को बदलते हुए देख रहे थे। ये अंदाज़ा तक न था कि  एक ऐसा भी वक़्त आएगा जब खबरें कही और बताई नहीं जायेंगी, चीख़ चीख़ कर मनवाई जाएंगी। शोर शराबे से बिलकुल दूर, ख़बर बताने वाले,  पूरे अदब और तहज़ीब के साथ ख़बरें सुनाते थे। न कोई हड़बड़ी, न कोई बेचैनी, बस ज़िम्मेदारी से ख़बरें बता देना इनका काम होता था। इतनी ख़ूबसूरती से ख़बरें सुनाना, एक अदायगी के जैसा ही था और जब इन आवाज़ों की याद आती है, तो एक चेहरा ज़रूर ज़हन में आता है, शम्मी नारंग का चेहरा।

‘शम्मी नारंग’

बात 1982 की है, जब हज़ारों की भीड़ का हिस्सा एक नौजवान भी था, मौक़ा था दूरदर्शन पर न्यूज़ रीडर बनने के लिए इंटरव्यू का। शम्मी नारंग ही वो नौजवान थे, जो भीड़ का हिस्सा थे, और बस अपने वालिद के कहने के कारण यहाँ तक आ गए थे। इसके कुछ दिन पहले ही ये Voice of America के लिए काम कर चुके थे। United States Information Service के तकनीकी निर्देशक, फ़्लैनेगर ने माइक टेस्टिंग के दौरान इनकी आवाज़ सुनी और इन्हें मौक़ा दिया।

एक रिकॉर्डिंग स्टूडियो में ‘शम्मी नारंग’

इंटरव्यू का दिन आसान न था और सभी लोग जो वहाँ इसके लिए आए थे, उनको बस एक लाइन पढ़ने के बाद रोक दिया जाता था और बाहर जाने का रास्ता दिखा दिया जाता था। जब शम्मी नारंग की बारी आई, तो ये भी एक लाइन पढ़ कर रुक गए, लेकिन उन्हें आगे पढ़ने को कहा गया, ये कुछ दूर पढ़ कर फिर रुके, और फिर आगे पढ़ने को कहा गया। ऐसा करते इन्होंने पूरा पृष्ठ पढ़ दिया।

“उस ज़माने में टेलीप्रॉम्पटर नहीं होते थे और पृष्ठों को ही पढ़ना पड़ता था। जब शम्मी नारंग पढ़ रहे थे, दूसरे लोगों की तरह पृष्ठों से ज़्यादा कैमरे में देख रहे थे, ये कमाल की बात थी। जब इन्होंने पढ़ लिया और बाहर खड़े हो गए तो अंदर से एक बुज़ुर्ग आए और उन्होंने पूछा, ” ये अभी तुमने ही पढ़ा था क्या”, शम्मी बोले , “जी हां”, बुज़ुर्ग ने कहा, ” बहुत अच्छा पढ़ा”, और चले गए। उनके जाते ही, एक नौजवान दौड़ता हुआ, इनके पास आया और पूछा कि क्या शम्मी उन्हें पहचानते हैं? जब शम्मी ने कहा “नहीं”, तब उन्हें बताया गया कि वे देवकीनंदन पांडेय थे, जिनकी आवाज़, पूरे हिन्दुस्तान का ख़ैर-ओ-ख़बर बताती आ रही थी।”

इसके बाद कुछ और इम्तिहान पार कर, शम्मी नारंग, दूरदर्शन समाचार का हिस्सा बन गए। इनकी आवाज़, इतनी साफ़ और तल्लफ़ुज़ इतना बेहतरीन था कि बहुत जल्दी ये तय कर दिया गया कि स्व० श्रीमती इंदिरा गांधी के विदेशी दौरे की सारी रिपोर्ट, शम्मी से ही पढ़वाया जाए।

ई०श्रीधरन जब दिल्ली मेट्रो के लिए काम कर रहे थे, तब उनकी ही गुज़ारिश पर शम्मी नारंग से बात की गई, अपनी आवाज़ देने को, दिल्ली मेट्रो के लिए। इसके अलावा कई शहरों में कई ख़्वाब और हसरतें, इन्हीं की आवाज़ के साथ रोज़ एक तवील सफ़र तय करती है।

एक लंबा वक़्त गुज़र चुका है और जब तक वक़्त के साथ मेट्रो की पटरियों पर ज़िन्दगी, रफ़्तार को ज़रिया बना कर ख़ूबसूरत बनती रहेगी, शम्मी नारंग की आवाज़ हमारे साथ, हमसफ़र की तरह चलती रहेगी।

(लेखक जाने-माने साहित्यकार, फ़िल्म समालोचक, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)

Choked Review: ई का बवासीर बना दिये हो अनुराग बाबू !

अमित द्विवेदी | Cinema Desk

नवप्रवाह रेटिंग : ⭐⭐

निर्देशक अनुराग कश्यप की फ़िल्म चोक्ड नेटफ़्लिक्स पर रीलीज़ हो गई है। इस फ़िल्म से ऐसी उम्मीद की जा रही थी, कि इसमें पहले वाले अनुराग कश्यप की बारीकी नज़र आएगी। अनुराग के निर्देशन के अलावा उनकी ख़ासियत उनकी कहानी का आधार और पटकथा होती है। सिनेमा की समझ रखने वाले उनकी कुछ फ़िल्मों के क़ायल हैं, लगा कि इसमें कुछ बेहतर मिलेगा। लेकिन चोक्ड में भी वे कहानी और पटकथा की नक़्क़ाशी में चूक गए।

सय्यामी खेर का पदार्पण गुलज़ार की फ़िल्म मिर्ज़्या से हुई थी। उस फ़िल्म में उनके अभिनय को समीक्षकों ने सराहा था, उम्मीद जताई थी ये अभिनेत्री ज़रूर बेहतर करेगी। इस फ़िल्म में उनके किरदार के चयन को देखकर समझ आता है कि सिनेमाई चुनौती को स्वीकार करने वाली अभिनेत्री हैं। नहीं तो हीरोईन वाली उम्र में वज़न बढ़ाकर, इस तरह के मध्यमवर्गीय चरित्र का चुनाव शायद न करतीं।
ख़ैर, बढ़ते हैं कहानी की ओर-

कहानी-

सय्यामी खेर बैंक में बतौर कैशियर काम करती हैं। पैसे तो दिन भर गिनती हैं, लेकिन उनका होता कुछ नहीं। लोअर मिडिल क्लास की वो सारी पंचायतें फ़िल्म में हैं, जिनसे चाह कर भी निकला नहीं जा सकता। रोशन मैथ्यू ने फ़िल्म में सय्यामी के पति का किरदार निभाया है, ये कमाता तो नहीं लेकिन उधार ले-लेकर बवाल ज़रूर करता रहता है। इन दोनों का एक बच्चा तो है, लेकिन ज़िंदगी में रोमांस नहीं नज़र आता। फ़िल्म ऑक्टोबर-नवम्बर 2016 के नोटबंदी की घटना के इर्द-गिर्द घूमती नज़र आती है।

सय्यामी के किचेन के बेसिन की पाइप बार-बार चोक हो जाती है। इस बात से वो बहुत चिढ़ती है। एक दिन इसी वजह से किचेन में पानी बहने लगता है। वो किचेन पहुँचती है, तो देखती है एक प्लास्टिक की थैली निकल रही है। वो उसे खोलकर देखती है, तो पता चलता है उसमें पाँच सौ रुपए की पूरी गड्डी होती है, वो उसे बैंक में जाकर चेक करती है तो पता चलता है नोट तो असली हैं। उसे लगता है ग़लती से ऐसा हुआ होगा, लेकिन ऐसा जारी रहता है। उसकी ज़िंदगी में रोमांच बढ़ जाता है, लेकिन कुछ ही दिन बाद नोटबंदी हो जाती है।

उसके बाद भी ये सिलसिला चलता रहता है। अब ये नोट किसका है, कौन कर रहा है ये सब? ये अंत के दस मिनट में पता चलेगा। जिसके लिए आपको फ़िल्म देखना होगा।

अनुराग की लेखन शैली की जो बारीकी लोगों को पसंद है, वो इस फ़िल्म में क़तई नज़र नहीं आती। ऐसा माना जाता है कि अनुभव के साथ काम चोखा होता है, लेकिन अनुराग लगातार पीछे की तरफ़ खिंचते नज़र आ रहे हैं। निर्देशन ठीक है, लेकिन पटकथा बेहद निराश करता है। कुछ सीन बेहद सुस्त और बेवजह के हैं। जो अनुराग जैसे स्तरीय निर्देशक से अपेक्षित नहीं होता।

अभिनय-
सय्यामी ने बेहतरीन काम किया है। इनके अलावा रोशन मैथ्यू और अमृता सुभाष ने बढ़िया अभिनय किया है। निर्देशक ने कलाकारों से अभिनय अच्छा कराया है।

देखें या नहीं-
कुल मिलाकर यह फ़िल्म ऐसी नहीं है कि इसे न देखी जाए, तो पश्चाताप होगा। यह बेहद औसत दर्ज़े की फ़िल्म है, जो नोटबंदी जैसे संवेदनशील मुद्दे के बावजूद रोमांचित नहीं करती। सब देख चुके हों, तो देख सकते हैं। निराश करती है अनुराग की फ़िल्म ‘चोक्ड’।

(अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के आधार पर की गई समीक्षा एक जटिल काम है, जिसके अंतर्गत केवल पॉजिटिव कमेंट्स की उम्मीद रखना अनुचित है। हमारे यहाँ पेड रिव्यू जैसी भी कोई व्यवस्था उपलब्ध नहीं है।)

इंदौर में एकता कपूर समेत तीन अन्य के खिलाफ़ FIR दर्ज

न्यूज़ अपडेट | Navpravah.com

फ़िल्म मेकर एकता कपूर और उनके अन्य तीन एसोसिएट्स के विरुद्ध इंदौर स्थित थाने में FIR दर्ज करवाई गई है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ एकता पर यह मामला अश्लीलता फैलाने व राष्ट्रीय प्रतीक चिन्हों के अपमान के आरोपों के तहत दर्ज करवाई गई है.

गौरतलब है कि, आल्ट बालाजी ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म में प्रसारित एक वेब सीरीज “ट्रिपल एक्स सीजन-2” पर कथित तौर पर भारतीय सेना के प्रति अपमानजनक फिल्मांकन को लेकर लगातार विवाद खड़े हो रहे हैं.

जिसके चलते इंदौर के अन्नपूर्णा पुलिस थाने में स्थानीय नागरिकों वाल्मीक सकर्गाये व नीरज याग्निक द्वारा FIR दर्ज करवाई गई है.

रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह FIR आईपीसी की धाराओं 294, 298 के तहत दर्ज़ करवाई गई हैं.

Chintu Ka Birthday Review: छोटी कहानी में गहरी सम्वेदनाओं का ख़ूबसूरत कैनवास है ‘चिंटू का बर्थडे’

अमित द्विवेदी | Cinema Desk

नवप्रवाह रेटिंग : ⭐⭐⭐⭐

विनय पाठक, तिलोत्तमा और सीमा पाहवा अभिनीत वेब फ़िल्म ‘चिंटू का बर्थ डे’ Zee5 पर स्ट्रीम हो रही है। चिंटू का बर्थडे इन दिनों आ रही तमाम फ़िल्मों से अलग है। यह एक ऐसी फ़िल्म है, जिसे पूरे परिवार के साथ बैठकर देखा जा सकता है।

फ़िल्म में सिचुएशनल कॉमेडी, इमोशन, ड्रामा सब कुछ है। लगभग एक घंटे बीस मिनट की फ़िल्म आप को उबाती नहीं। बस फ़िल्म में अरबी भाषा के सबटाइटल हार्डकोडेड नहीं हैं, जोकि निराशाजनक है।

कहानी-
बिहार के मदन तिवारी अपने परिवार के साथ बग़दाद (इराक़) में रहते हैं। सेल्स मैनेजर हैं, एक पानी फ़िल्टर बनाने वाली कम्पनी के। तरक़्क़ी कर के बिहार से बग़दाद आए हैं। सद्दाम हुसैन और अमेरिका के बीच संघर्ष के चलते ईराक तबाही की कगार पर खड़ा हो जाता है, और मदन तिवारी सपरिवार फँस जाते हैं। बग़दाद में रहना नहीं चाहते।

फ़िल्म का एक दृश्य

इसी बीच एक दिन अमेरिकी सेना के जवान तिवारी के घर में आ धमकते हैं। उन्हें इनपुट मिला होता है कि मदन के घर में इराकी विद्रोही छुपा है। जिसे पकड़ने के लिए अमेरिकी जवान घर की तलाशी लेने अंदर घुसते हैं। इनके घुसते ही घर का माहौल बदल जाता है। पूरे घर की तलाशी लेने के बाद उसी घर का मालिक मिलता है, उसी को सेना के जवान विद्रोही समझते हैं, जिसके बाद की स्थित एकदम उलट हो जाती है। सेना के जवानों को लगता है, तिवारी विद्रोहियों के लिए काम करता है। इन सबके बीच चिंटू इस बात को लेकर बड़ा दुःखी होता है कि इस साल भी वो अपना जन्मदिन नहीं मना पाएगा। अब घर वाले चिंटू का बर्थ डे मना पाते हैं या नहीं, क्या मदन तिवारी सेना के जवानों को कनविंस कर पाते हैं? ये सब जानने के लिए फ़िल्म देखनी पड़ेगी।

अभिनय-
एक भी कलाकार ऐसा नहीं है, जिसकी अदाकारी पर ऊँगली उठाई जा सके। बहुत ही संतुलित कलाकार हैं इस फ़िल्म में।

“विनय पाठक, तिलोत्तमा शोम, सीमा पाहवा और सभी बाल कलाकार मंजे हुए हैं। एक सीन मिस नहीं कर सकते हैं आप। संवाद, उसकी अदायगी, पटकथा सब बेहतरीन। विनय एक बार फिर आपको उनसे मुहब्बत करने पर मजबूर करते हैं। हिंदी में भोजपुरी का फ़्लेवर मन मोह लेगा।”

देखें या नहीं-
न देखने की कोई वजह नहीं नज़र आती। ‘दुनिया की चंद सबसे उम्दा’ वाली फ़ेहरिस्त में शुमार रखने लायक फ़िल्म है। ऐसी फ़िल्में कम बनती हैं, जिन्हें परिवार के साथ देखा जा सके। तो फ़ैमिली टाइम का सही इस्तेमाल तो बनता है। सिर्फ़ एक घंटे बीस मिनट की फ़िल्म है, इतना समय निकाला जा सकता है। यकीन मानिए अग़र आपका टेस्ट अच्छा है तो यह फ़िल्म आपके दिल में हमेशा के लिए अपनी जगह बनाने वाली है।

एक बात और, अगली बार ऑस्कर बंटे, और “चिंटू का बर्थडे” नदारद हो तो आँख मूंद कर मान लीजिएगा कि ऑस्कर वाले निरा गँवार हैं। बहरहाल, आप ज़रूर देखें ‘चिंटू का बर्थडे’।

(अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के आधार पर की गई समीक्षा एक जटिल काम है, जिसके अंतर्गत केवल पॉजिटिव कमेंट्स की उम्मीद रखना अनुचित है। हमारे यहाँ पेड रिव्यू जैसी भी कोई व्यवस्था उपलब्ध नहीं है।)

IIT प्रोफ़ेसर की चेतावनी, “भूकम्प के झटकों से दहल सकती है राजधानी”

न्यूज़ डेस्क | navpravah.com
दिल्ली-एनसीआर इलाक़े में रहने वालों के लिए एक और ख़तरा सामने आता दिख रहा है। दरअसल हल्के भूकम्प के झटकों को लेकर आईआईटी के एक प्रोफ़ेसर ने डराने वाला ख़ुलासा किया है। आईआईटी धनबाद के एक एक्सपर्ट का कहना है कि बार-बार हल्के झटके आना एक बड़े भूकम्प का संकेत है। उन्होंने कहा कि दिल्ली और आस पास के इलाक़े में हाई इंटेन्सिटी का भूकम्प आ सकता है। 
आईआईटी धनबाद के डिपार्टमेंट्स ऑफ अप्‍लाइड जियोफिजिक्‍स और सीस्‍मोलॉजी ने लंबी रिसर्च के बाद यह चेतावनी दी कि निकट भविष्य में ज़्यादा तीव्रता वाला भूकम्प का झटका आ सकता है। 
आईआईटी धनबाद में सीस्‍मोलॉजी डिपार्टमेंट के प्रमुख पी.के. खान कहते हैं, “कम तीव्रता के झटके बार-बार लगना एक बड़े भूकंप का संकेत है।”
ख़ान कहते हैं कि पिछले दो साल में दिल्‍ली-एनसीआर ने रिक्‍टर स्‍केल पर 4 से 4.9 तीव्रता वाले 64 भूकंप देखे हैं। वहीं पांच से ज्‍यादा तीव्रता वाले भूकंप 8 बार आए। खान के मुताबिक, “यह दिखाता है कि इलाके में स्‍ट्रेन एनर्जी बढ़ रही है, खासतौर से नई दिल्‍ली और कांगड़ा के नजदीक।” 

“ये तो बस शुरुआत है,आगे और भी चौंकाने वाले खुलासे होंगे!” -आलिया सिद्दीकी

न्यूज़ अपडेट |Navpravah Desk

एक्टर नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी और उनकी पत्नी आलिया सिद्दीकी के बीच का विवाद अब गहराता ही जा रहा है। लीगल नोटिस के अलावा अब ट्विटर पर भी इसके निशान मिल रहे हैं।

हाल ही में एक्टर की भतीजी ने अपने चाचा (नवाज़ के छोटे भाई) पर सेक्सुअल हरासमेंट का मामला उजागर किया है, जिसपर ट्वीट के माध्यम से प्रतिक्रिया देते हुए आलिया सिद्दीकी (अंजना आनंद किशोर पाण्डेय) ने ऐसी बात कही जिससे लग रहा है कि आगे नवाज़ की मुश्किलें और बढ़ने वाली हैं।

आलिया सिद्दीकी ने ट्वीट में लिखा, ‘यह सिर्फ शुरुआत है। पहले से ही इतना समर्थन भेजने के लिए भगवान का धन्यवाद। आगे और भी ऐसे बहुत से खुलासे किये जाएंगे, जो दुनिया को हैरान कर देगा क्योंकि मैं अकेली नहीं हूं जिसने सबकुछ चुपचाप बर्दाश्त किया है। देखते हैं कि पैसा कितनी सच्चाई ख़रीद सकता है, और कितने लोगों को रिश्वत दी जाती रहेगी।”

सीमा विवाद तो बहाना है, कोरोना जो छिपाना है!

न्यूज़ अपडेट | Navpravah Desk

चीन सीमा विवाद बढ़ा कर नया दांव चल रहा है, ऐसा करके चीन कोरोना वायरस से सभी का ध्यान खींचना चाहता है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की लोकप्रियता भी खतरे में पड़ गयी है।

जिनपिंग ने चीनी आर्मी को जंग के लिए तैयार रहने का आदेश दिया है। चीन में इंच-इंच जमीन की रक्षा करने का संकल्प लिया गया है, लेकिन चीन का कोई भी पड़ोसी मुल्क इस तरह की मानसिकता नहीं रखता है।

कोरोना वायरस के कारण चीन के ठप उद्योग धंधे दोबारा शुरू तो हो गए हैं, लेकिन डिमांड ही नहीं है, तो फैक्ट्रियां खोल कर भी कोई फायदा नहीं हो रहा है। चीन के लाखों युवा बेरोजगार हो चुके हैं। चीन में बेरोजगारी की दर बढ़ कर 6 परसेंट हो चुकी है, ये जिनपिंग के लिए खतरे की घंटी है।

चीन की इकॉनमी 13.7 ट्रिलियन डॉलर की है, 1976 के बाद पहली बार चीनी इकॉनमी में 6.8 परसेंट की गिरावट आई है, ये जनवरी से मार्च 2020 के आंकड़े हैं।

जानकारों के मुताबिक चीन अब भयानक मंदी की तरफ बढ़ रहा है। कोरोना काल में सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि कई देशों से चीन के रिश्ते खराब हो चुके हैं, इसकी कीमत भी चीन चुकाएगा। चीन स्टील का सबसे बड़ा आयातक है। ये स्टील ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया से मंगाता है। ऑस्ट्रेलिया ने जब से वुहान वायरस की जांच की मांग की है, दोनों के रिश्ते बेहद खराब हो चुके हैं।

“मेरे अपने (1971)” -जीवन आदर्श और युवा मन के वैपरीत्य का रेखांकन

डॉ० कुमार विमलेन्दु सिंह | Cinema Desk

मानव हृदय, भावनाओं और संभावनाओं का महासागर होता है और अपने वेग के चरम पर होता है, युवावस्था में। कुछ व्यक्ति इस वेग को अपने अनुसार कृतित्व और रचनात्मकता के लिए प्रयोग में लाते हैं, तो कुछ के मन में भावनाएँ, संभावनाओं पर भारी पड़ जाती है और युवावस्था, एक नकारात्मक और खीझ से भरे हुए कालखंड की भांति प्रतीत होने लगता है। 1956 में जॉन ऑसबॉर्न का नाटक, “लुक बैक इन ऐंगर” ऐसे खीझ से भरे हुए युवा को दर्शकों के मन में स्थापित कर चुका था। लेकिन इस नाटक के मुख्य पात्र, जिमी पोर्टर की खीझ का बहुत बड़ा हिस्सा, वैवाहिक संबंध के कारण था और इससे अलग, 1971 में आई, गुलज़ार की फ़िल्म, “मेरे अपने” के युवकों का खीझ, व्यवस्था और थोड़ा बहुत परिवार के कारण था।

“मेरे अपने”, गुलज़ार द्वारा निर्देशित, पहली फ़िल्म थी। यह तपन सिन्हा की बांग्ला फ़िल्म, “अपनजन” का रीमेक थी। 70 का दशक, भारत के लिए, एक ऐसा समय था, जब पूरा देश , स्वर्णिम भविष्य के लिए आश्वस्त था, लेकिन इस प्रयोजन के सिद्ध होने में, युवा अपनी जगह नहीं पा रहे थे, या उन्हें जगह नहीं दी जा रही थी, यही खीझ का कारण बनता जा रहा था और इस खीझ ने ही “ऐंग्री यंग मैन” के अवतरित होने की स्थितियां बनाईं थीं।”

लेकिन इसके पहले कि अमिताभ बच्चन जैसे महान अभिनेता, इस खीझ को अकेले दिखाते, गुलज़ार ने सामूहिक क्षोभ का चित्रण इस फ़िल्म में अति प्रशंसनीय रूप में किया।

‘मीना कुमारी’ को एक सीन समझाते हुए ‘गुलज़ार’

इस फ़िल्म में विनोद खन्ना (श्याम) और शत्रुघ्न सिन्हा (छेनू) दो युवक होते हैं, दोनों अलग-अलग युवा दल का नेतृत्व करते थे और इन दोनों दलों के बीच तनाव बना रहता है। मीना कुमारी (आनंदी देवी), एक विधवा होती हैं, जो उसी मोहल्ले में, परिस्थितिवश रहने आ जाती हैं। विनोद खन्ना (श्याम) और शत्रुघ्न सिन्हा (छेनू) के अलावा डैनी डेंग्ज़ोंग्पा (संजू), पेंटल (बंसी), दिनेश ठाकुर (बिल्लू), देवेन वर्मा (निरंजन) और असरानी (रघुनाथ) का भी बहुत अच्छा अभिनय था। इन सभी किरदारों की अपनी छोटी कहानियां होती हैं, जो एक साथ मिलकर, तत्कालीन समाज की बड़ी कहानी दिखाते हैं। दोनों युवा दलों में बार बार वर्चस्व की लड़ाई होती रहती है और मीना कुमारी (आनंदी देवी) को, ऐसी ही एक लड़ाई में गोली लग जाती है। दोनों दलों को मीना कुमारी से सहानुभूति रहती है और सारे युवा, अपने बड़ों का प्रतिरूप, उस अकेली महिला में देखते हैं। युवा मन जब जीवन के आदर्शों को प्राप्त और उपलब्ध पारिवारिक संरचना में नहीं जी पाता या अपनी भावनाएँ वैसी व्यवस्था में व्यक्त नहीं कर पाता, तब वह उस संरचना के बाहर एक स्थल, एक प्रसार, एक व्यक्ति खोजता है, जहां उसकी अभिव्यक्ति का आकलन न हो, बस सहर्ष स्वीकृति हो। यही कारण है कि युवावस्था में कई संबंध, बनते बिगड़ते हैं।

श्याम (विनोद खन्ना) व छेनू (शत्रुघ्न सिन्हा)

फ़िल्म के लिए लेखन (पटकथा, संवाद,गीत) गुलज़ार और इन्द्रा मित्रा ने किया और इसके निर्माता, एन०सी० सिप्पी, राज सिप्पी और रोमू सिप्पी थे। सिनेमैटोग्राफ़ी, के० वैकुण्ठ ने किया और संपादन, वामन भोंसले और गुरूदत्त शिराली ने किया था। इस फ़िल्म का संगीत, कभी न भूलने वाला था। संगीत निर्देशक, सलिल चौधरी थे और महान किशोर कुमार की मधुर आवाज़ में गुलज़ार के जादूई शब्द, युवाओं के मन के उस ख़ालीपन और कुंठा को अभूतपूर्व तरीके से प्रस्तुत करने में आज भी पूर्णतः सफल हैं। “कोई होता, जिसको अपना, हम अपना कह लेते”, भारतीय सिनेमा के सबसे अच्छे गानों में से एक है।

भारतीय सिनेमा के इतिहास में, “मेरे अपने” पहली फ़िल्म थी, जिसमें, क्षोभ से भरे हुए और दिग्भ्रमित युवा, अपने प्रतीकों और अवधारणाओं को मनवाना चाहते हैं और दलों में बंटकर एक दूसरे से लड़ते हैं। इसके बाद, “शिवा” से लेकर “3 इडियट्स” तक युवाओं के मानसिक स्थिति और भावनाओं पर फ़िल्में बनती रहीं , लेकिन जीवन के आदर्शों और युवा मन के वैपरीत्य को, अब तक कोई फ़िल्म, ऐसा नहीं दिखा पाई।

(लेखक जाने-माने साहित्यकार, फ़िल्म समालोचक, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)