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Friday, July 31, 2026
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श्रद्धा हत्याकांड: जज के सामने आफताब ने कबूला गुस्से में आकर किया कत्ल

दिल्ली में हुए श्रद्धा हत्याकांड ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया है. प्रकरण लव जिहाद के संग-संग जघन्य हत्याकांड का भी है जहां प्रेमी आफताब अमीन पूनावाला ने श्रद्धा वाडकर की पहले गला घोंट कर हत्या की उसके बाद उसके शव को 36 टुकड़े में काट दिया फिर दिल्ली के अलग – अलग इलाकों में फेंक दिया।

कोर्ट ने पालीग्राफ टेस्ट की इजाजत दी।

श्रद्धा हत्याकांड में कोर्ट ने आरोपी आफताब पूनावाला की सहमति के बाद पालीग्राफी टेस्ट की इजाजत दे दी हैं साथ ही आरोपी की रिमांड चार दिन के लिए और बढ़ा दी गई है। पालीग्राफी के लिए आरोपी से भी कंसेंट लिया जाता है।

“जो किया वह गुस्से में आकर किया”

आरोपी की पेशी वीडियो कॉन्फेंसिंग के जरिए दिल्ली की साकेट कोर्ट में की गई पेशी के दौरान आफताब ने जज के सामने बोला, ‘मैंने जो किया, गुस्से में किया।’ गौर करने वाली बात यह है कि आफताब ने यह नहीं कबूल किया कि उसने श्रद्धा का मर्डर किया इसके बाद जज ने पुलिस की याचिका पर उसकी रिमांड 4 दिन और बढ़ा दी हैं साथ ही पालीग्राफी के लिए उसकी सहमति मांगीं आफताब के वकील ने कहा कि “मेरे मुवक्किल जांच में सहयोग कर रहे हैं”

नियमों के अनुसार कुल मिलाकर 14 दिन की कस्टडी ली जा सकती है, जिसमें 5-5 दिन की दो बार कस्टडी ली जा चुकी है। आज 4 दिन की कस्टडी और मिली है। अब इसी दौरान पालीग्राफी टेस्ट होगा और उसके बाद नार्को टेस्ट होगा। इस दौरान पुलिस के सामने चुनौती यह होगी कि इसी चार दिन में उससे सारे राज उगलवाने हैं और सबूतों को जुटाना होगा।

कोर्ट ने पुलिस को आदेश दिया है कि जल्द से जल्द सबूतों को जुटाएं एवं कोर्ट के समक्ष पेश करे पुलिस ने 14 अलग-अलग टीमें तैनात की हैं। आफताब ने कहा है कि 6 महीने होने के कारण कई बातें याद नहीं हैं। उसने मैप बनाकर बताया कि उसने सबूत (हथियार आदि) कहां-कहां फेंके हैं। उसने मैप में ही तालाब के बारे में बताया है। आज कोर्ट में आफताब ने बयान दिया कि तालाब के पास उसने श्रद्धा की खोपड़ी फेंकी थी। जबड़े का हिस्सा भी बरामद हुआ है, उसे लैब में भेजा गया है ताकि पता लगाया जा सके कि यह श्रद्धा का है या किसी और का।

आफताब ने किया “Heat of Moment” का जिक्र

आफताब ने कोर्ट में कहा कि जो भी किया गुस्से में किया “Heat of the moment” था हालांकि विशेषज्ञ के अनुसार उसका यह बयान उसकी तरफ से बचने की कोशिश हो सकती है। दरअसल, इसका मतलब यह होता है कि आपने कुछ ऐसा किया जो बिना सोचे-समझे हुआ क्योंकि आप काफी ज्यादा गुस्से में आ गए थे। वह इसे गैर-इरादतन हत्या का रूप दे रहा है। सूत्रों के अनुसार शुरू से ही कहा जा रहा है कि 18 मई की रात को आफताब और श्रद्धा के बीच किसी बात को लेकर झगड़ा हुआ था। आफताब के मुताबिक श्रद्धा ने उसकी तरफ कुछ फेंका और वह गुस्से में लाल उसकी तरफ दौड़ा और उसने तब तक उसका गला दबाए रखा जब तक तङपती हुई श्रद्धा का शरीर शांत नहीं पड़ गया।

“वित्तीय प्रशासन व दिव्य नेतृत्व का अद्भुत उदाहरण प्रमुख स्वामी जी महाराज” -साधु अमृतवदन दास जी

11 सितंबर 2022 को पापुआ न्यू गिनी में 7.6 तीव्रता का भीषण भूकंप आया। इससे पूरा देश हिल गया था।

वहां अब थोड़ा अच्छा वातावरण है । लेकिन उससे पहले श्रीलंका में आर्थिक भूकंप आया और पूरा देश तबाह हो गया। आज तक वहां कुछ ठीक नहीं हुआ।

श्रीलंका की जारी तबाही उसकी आर्थिक नीतियों में निहित है। कई आर्थिक विशेषज्ञ इसके लिए राष्ट्रपति राजपक्षे की खराब आर्थिक शैली को जिम्मेदार ठहराते हैं। 2019 में उन्होंने लोगों को टैक्स में भारी रियायतें दीं. इस लिए वहां सरकारी राजस्व में भारी नुकसान हुआ और देश को सालाना 1.4 अरब डॉलर का नुकसान हुआ। इसके अलावा अपने वोट बैंक को खुश रखने और नए वोट हासिल कर सत्ता प्राप्त करने के उनके तरीकों से देश की आर्थिक स्थिति खराब हो गई। इस प्रकार एक प्रमुख व्यक्ति के खराब आर्थिक व्यवहार के कारण पूरा देश दिवालिया और असहाय हो गया है। यह एक लापरवाह नेतृत्व द्वारा बनाई गई आपदा है। अर्थशास्त्रियों और आंकड़ों के मुताबिक भारत के कुछ राज्यों में एक नया आर्थिक संकट भी सामने आ रहा है. दिल्ली का कर्ज सात फीसदी बढ़ गया है. एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2022-2023 में पंजाब का कर्ज 2.83 लाख से बढ़कर 3.05 लाख करोड़ हो जाएगा। एक दिन या एक महीने या एक साल में कुछ भी नहीं होगा लेकिन अगर वित्तीय व्यवस्था ठीक से प्रबंधित नहीं हुई है, तो आज नहीं तो कल मुश्किलें होंगी। अर्थ दृष्टि अलग है और वित्तीय कौशल दोनों अलग-अलग भूमिकाएं हैं। एक के पास ऐसी व्यवस्था है जो केवल खुद को और दूसरों को लाभान्वित करती है और दूसरे की दूरदर्शिता है जो सभी को लाभान्वित करती है।

कॉन्सेरो ग्लोबल नामक कंपनी के शोध के अनुसार, The importance of good leadership may seem obvious, but what is less obvious is what makes a good leader. अच्छे नेतृत्व का महत्व स्पष्ट लग सकता है, लेकिन जो कम स्पष्ट है उससे एक अच्छा नेता बनाता है। फिर उन्होंने कहा कि सबसे प्रभावी नेताओं को अपने संगठन के वित्तीय स्वास्थ्य की एक परिष्कृत और गहन समझ है, और वे वित्तीय वास्तविकताओं के आधार पर निर्णय लेते हैं। प्रमुख स्वामी महाराज भी एक आर्थिक समज वाले नेता थे जो अर्थशास्त्र की मूल बातों के बारे में बहुत स्पष्ट थे।

Swaminarayan Mandir, Indore

वे 1200 मंदिरों के व्यवहार को देखते थे। इसमे इन सभी मंदिरों और संस्था के अस्पतालों, स्कूलों और अन्य स्थानों की आय और व्यय विवरण, बैंक विवरण आदि को अच्छी तरह से जानना भी आता है । उन्हें इस बात की पूरी जानकारी थी कि कहां कितना इस्तेमाल करना है, कहां खर्च में कटौती करनी है और कैसे पूरे संगठन को सही तरीके से चलाना है। उन्होंने अर्थ का संतुलन सावधानी से किया। कोई आर्थिक विवरण ऐसा नहीं होगा जिसके बारे में वे अच्छी तरह से अवगत नहीं हैं। उनके पास एक-एक पैसे की जानकारी हुआ करती थी। संगठन के लेखा विभाग में सेवारत भक्त सभी खातों को शत-प्रतिशत साफ रखते थे । आज भी सभी आंकड़े बहुत स्पष्ट और व्यवस्थित हैं। साथ ही विभाग के प्रभारी अनुभवी सेवकों को समय-समय पर बैंक स्टेटमेंट और बैलेंस आदि के कागजात स्वामीजी को भेजते थे। स्वामी जी इसका अध्ययन पूरी लगन से अपनी पैनी निगाहों से करते थे । कुछ नया हो तो तुरंत संबंधित व्यक्ति को फोन करके या मिल कर अधिक जानकारी मांगते थे । साथ ही साथ संस्था की 162 सामाजिक सेवा की गतिविधियों का लेखाजोखा भी रखते थे । कानून के अलावा वे अर्थशास्त्र और अर्थव्यवस्था के सभी मामलों को दिल से जानते थे। कोई भी उन्हें कभी भी उलझा सकता नहीं था।

एक बार एक मंदिर का हिसाब-किताब के पेपर्स स्वामी जी के पास आए । उन्होंने शांति से सभी कागज़ देखे और जांचा। यहां तक ​​कि छोटे से छोटे विवरण को भी पढ़ा गया और सभी आंकड़े दर्ज किए गए। उन्होंने इसमें कुछ अंतर देखकर वह मंदिर के प्रबंधक को फोन कर पूछा कि इस बार यात्री निवास के संख्या में इतना बदलाव क्यों है? पिछले साल की तुलना में इतना अंतर क्यों है? व्यवस्थापक ने कहा कि आप पिछले साल यहां नहीं आए थे। तो उनके आंकड़े इस प्रकार हैं। इस साल आप हमारे मंदिर में विद्यमान थे तो देश-विदेश से भक्त मंदिर में रुके थे । इस वजह से, संख्या और आंकड़े बदल गए हैं।

इस घटना को देखने वाले सभी स्वामीजी के प्रशासनिक कौशल से चकित थे! क्योंकि स्वामीजी को कई विभागों से आंकड़े मिलते थे। यह तथ्य कि मंदिर के एक छोटे से हिस्से की आंकड़ों में अंतर था, तो स्वामीजी को भी वह पता आ गया ।

दुनिया भर में फैले BAPS संगठन के कई स्थान हैं। प्रत्येक देश में धार्मिक संस्थानों से संबंधित दान और उसकी प्रथाओं के संबंध में अलग-अलग कानून हैं। स्वामीजी इस देश के सभी कानूनों से अवगत थे। शायद नहीं पता होता तो जानकारों से पूछकर उसकी पूरी जानकारी प्राप्त कर लेते थे और वित्त का प्रबंधन भी बहुत अच्छे से करते थे । स्वामीजी जानते हैं कि कहां और कितनी मदद की जरूरत है और कितनी मदद मांगी गई है और कहां और कितनी मदद दी जानी है। हरिभक्त सभी स्वामीजी की इस विशेषता को जानते थे, इसलिए जब उनको यदि व्यवसाय संबंधित कोई प्रश्न होता, तो वे तुरंत स्वामीजी के पास दौड़ते चले आते थे. वे शांति से उनके वित्तीय लेनदेन से संबंधित कठिन प्रश्नों को सुनते और उनका सटीक समाधान करते थे । इससे भक्तों का व्यवहार बहुत अच्छा रहता था। उनकों कभी भी देवाला निकालने का समय देखना पड़ता था । मूल रूप से यह कहना कि स्वामीजी वित्तीय प्रशासन में बहुत कुशल थे जो उनके दिव्य नेतृत्व का एक महत्वपूर्ण पहलू था।

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“एक सक्षम निडर नेता थे प्रमुख स्वामी जी महाराज” -साधु अमृतवदनदास जी

कुछ साल पहले मुंबई में एक अंतरराष्ट्रीय व्यक्तित्व विकास कंपनी ने अपने एक सत्र में एक नया प्रयोग किया था।

वहां के ट्रेनर ने मौजूद सभी छात्रों से कहा कि आज तुम क्लासरूम से बाहर जाओ और किसी दुकान या किसी व्यक्ति से मुफ्त में कुछ ले आओ। ये सभी लोग संपन्न और सुखी परिवार के थे। उन्हें शिक्षित भी माना जाता था। नौकरीपेशा भी थे। इसके अलावा वह दूसरों को मुफ्त में बहुत कुछ देता था। इन सभी ने कभी किसी से फ्री में कुछ नहीं मांगा। इस लिए वे सब शर्मिंदगी महसूस कर रहे थे। उसे नहीं पता था कि कैसे माँगा जाए । लेकिन यह प्रशिक्षण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था। ट्रेनर कहते थे कि दुनिया में सच्चे दिल और सच्चे मन से मांगोगे तो मिल जाएगा।

नकारात्मकता को त्यागकर सकारात्मक बनने से आपको लाभ होगा। विशेष रूप से यह समझ लेना चाहिए कि मांगने से कोई भिखारी या गरीब नहीं हो जाता। सब वर्ग से बाहर निकले । सभी ने अलग-अलग जगहों पर जाकर अपने-अपने तरीके से ट्रेनर की सीख को अमल में लाने की कोशिश की। कुछ समय बाद जब वह वापस आए तो अपनी शक्ति के अनुसार कुछ बड़ी या छोटी चीज़ लेकर थे । एक युवक उसमें दो जोड़ी चप्पल लाया था। वे चप्पलें भी थोड़ी महंगी थीं। प्रशिक्षक उसके उत्साह और मांग कौशल से प्रसन्न था. ट्रेनिंग सेशन में उसका सम्मान भी किया गया । बाद में वह लड़का भी इस ट्रेडिंग सेंटर में ग्रुप लीडर बन गया। प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद, उन्होंने अपना खुद का व्यवसाय शुरू किया और बहुत प्रगति की। आज मुंबई में उनका बिजनेस बहुत अच्छा चल रहा है और वह लाखों रुपए कमाते हैं।

यहाँ बात यह भी है कि प्रशिक्षक या नेता अपनी टीम के सदस्यों को निडर और आत्मविश्वासी बनाने के लिए शर्म और संकोच की बाधाओं को तोड़ने की कोशिश करता है। अगर कोई इस मुद्दे की सच्चाई को समझता है, तो उसका आंतरिक विकास भी होता है।ऐसी छोटी-छोटी बातें ही इंसान को संपूर्ण बनाती हैं।

प्रमुख स्वामी महाराज एक सक्षम निडर नेता थे। उन्होंने व्यक्ति की सीमाओं को चूर-चूर कर दिया था । बात साल 1974 की है। स्वामी जी अथक विचरण कर गुजरात के बामणगाम नामक गांव में आए। यहाँ मकरसंक्रांति का पर्व आया. सनातन हिंदू धर्म की एक मान्यता के अनुसार, इसे दान के त्योहार के रूप में भी जाना जाता है। साम्प्रदायिक भाषा में इसे झोली पर्व के नाम से मशहूर हैं । स्वामीजी सुबह कार्यकर्ताओं की योजना के अनुसार तैयार हो गए। साथ में कुछ और साधु-संत भी तैयार थे। उस समय नारायण भगत (पू . विवेकसागर स्वामी) वहां मौजूद थे। स्वामी जी ने उनसे भी कहा, ‘नारायण भगत! आप भी हमारे साथ झोली से मांगने आएं। आज पूरे गांव में घूमना है।’ नारायण भगत पूर्वाश्रम में एक बहुत अमीर, सुखी और उच्च परिवार से आए थे। उनके घर में कोई चीज की कमी नहीं थी। इसलिए उन्होंने अपने जीवन में कभी किसी से कुछ मांगा नहीं था ।

BAPS Swaminarayan Mandir Pune

इस वजह से, वह दान माँगने में थोड़ी शर्म का अनुभव कर रहे थे । जब उन्होंने दान पर्व में गांव में मांगने जाने के लिए जाना तो इसे टाल दिया और कहा, ‘स्वामी जी ! मैं यहाँ सभा में बैठकर सभी हरिभक्तों को कथा सुनाता हूँ। तुम इस घनश्याम स्वामी को अपने साथ ले जाओ। ‘ स्वामीजी आसानी से अपनी बात छोड़ने को तैयार नहीं थे। साथ ही आज उन्होंने नारायण भगत को अच्छा व्यावहारिक पाठ पढ़ाने की तैयारी की थी। उन्होंने आग्रहपूर्वक कहा, ‘नहीं। घनश्याम स्वामी यहां सत्संग के लिए रुकेंगे और आप आकर हमारे साथ झोली मांगेंगे।’ नारायण भगत स्वामीजी के साथ एक झोली मांगने के लिए पहुंचे। गली-गली और घर-घर में स्वामी जी ने अपना मधुर ‘नारायण हरे सच्चिदानंद प्रभु’ की आहलेक लगाई । उनके साथ नारायण भगत ने भी बड़े जोरों से आहलेक लगाई और उनका भरपूर साथ दिया। हरिभक्त और कार्यकर्ता भी आहलेक बोलकर गांव में बहुत जोर-जोर से जाप करने लगे। झोली में उदार ग्रामवासी स्वामी जी को बड़े प्रेम और भक्ति से दान देते थे। स्वामीजी ने रास्ते के खडे आदि कुछ भी नहीं देखा और घंटों पूरे गांव में घूमते रहे। पूरा गांव पवित्र और धन्य हो गया। इसके बाद स्वामीजी अपने निवास पधारे । वह बहुत श्रमित दिखाई देते थे । लेकिन उनके चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान थी जो छुपी नहीं थी। उनका रहस्य यह था कि उन्होंने आज एक अच्छा कप्तान बनकर नारायण भगत को झोली मांगनी सीख दी थी।

उस दिन के बाद पू. विवेकसागर स्वामी ने कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा । आज वे पूरी दुनिया में यात्रा करते हैं और कथा सुनाकर भगवान की अथक सेवा करते हैं। स्वामीजी ने उनके जीवन को आकार दिया है और वे सभी के लिए एक उत्कृष्ट आदर्श बन गए हैं। इस तरह के कई व्यावहारिक सबक स्वामीजी के जीवन में आसानी से बुने हैं।

इस प्रकार सर्वश्रेष्ठ कप्तान मन की नकारात्मकता को दूर करके और विभिन्न आयामों और विधियों के माध्यम से जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हुए सभी को शिक्षित करता है।

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गिरिडीह के प्रेम कुमार को मिली अहम जिम्मेदारी बने महाराष्ट्र में भाजपा झारखंड प्रकोष्ठ के प्रदेश संयोजक

महाराष्ट्र में जब से भाजपा ने एकनाथ शिंदे और देवेन्द्र फडणवीस की अगुवाई में अपनी सरकार बनाई है वह अलग अलग तरीकों से स्थानीय वोटरों को लुभाने में जुटी हुई हैं. इसी क्रम में अब महाराष्ट्र बीजेपी ने हिंदी भाषियों को जोड़ने के लिए प्रेम कुमार को महाराष्ट्र प्रदेश संयोजक झारखंड प्रकोष्ठ पद पर नियुक्त किया है.

प्रेम कुमार मूल रूप से झारखंड के गिरीडीह के रहने वाले हैं लेकिन उनकी पकड़ मुंबई और आसपास के जिलों में रहने वाले झारखंडी एवं हिंदी भाषी मतदाताओं पर अच्छी खासी हैं। उत्तर भारतीय मोर्चा, भाजपा महाराष्ट्र के अध्यक्ष डॉ. संजय पाण्डेय व उपाध्यक्ष कपिल राज वर्मा ने प्रेम कुमार को नियुक्ति पत्र दिया.उत्तर भारतीय मोर्चा, भाजपा महाराष्ट्र के अध्यक्ष डॉ. संजय पाण्डेय ने नियुक्ति पत्र देकर उनसे पार्टी की विचारधारा और नीति के अनुसार पार्टी की प्रगति के लिए हर संभव प्रयास करने की प्रेरणा दी।

गौरतलब है कि मुंबई की 227 सीटों में से 50 से ज्यादा सीटें ऐसी हैं, जहां हिंदी भाषियों का वर्चस्व है। मुंबई से सटे मीरा-भायंदर, वसई-विरार-नालासोपारा, ठाणे, नवी मुंबई, उल्हासनगर को भी जोड़ दिया जाए, तो यह संख्या 100 सीटों के पार चली जाती है। इन सभी महानगरपालिकाओ में चुनाव होने हैं। यही कारण है कि बीजेपी पूरी तरह से सक्रिय हो गई है। इसी कड़ी में झारखंड में अपना खासा प्रभाव रखने वाले प्रेम कुमार को उत्तर भारतीय मोर्चा, महाराष्ट्र प्रदेश संयोजक झारखंड प्रकोष्ठ पद पर नियुक्त किया गया है।

प्रेम कुमार मूल रूप से झारखंड के गिरीडीह जिले के रहने वाले हैं साथ ही झारखंड में भी काफी लोकप्रिय है

बीजेपी का ये फैसला एक तीर से दो निशाने नहीं बल्कि एक तीर से कई निशाने लगाने जैसा है.
प्रेम कुमार मूल रूप से झारखंड के गिरीडीह जिले के रहने वाले हैं लेकिन उनकी पकड़ मुंबई और आसपास के जिलों में रहने वाले झारखंडी एवं हिंदी भाषी मतदाताओं पर अच्छी खासी हैं। इसके साथ ही उनके पास जमीनी स्तर पर काम करने का गहरा राजनीतिक अनुभव है। ऐसे में इनको झारखंड प्रकोष्ठ पद की कमान मिलने से कार्यकर्ताओं में सीधा-सीधा संदेश ये भी गया है कि पार्टी में जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं और परिश्रम का सम्मान होता है, जो कार्यकर्ताओं के मनोबल और ऊर्जा को सातवें आसमान पर पहुंचाने में कारगर साबित होगा।

बीएमसी चुनाव के परिणाम में भी बदलाव के संकेत साफ नजर आ रहे हैं, हिंदी भाषी वोटरों पर अच्छी पकड़ है प्रेम कुमार की

यह भी माना जा रहा है कि बीजेपी का यह फैसला आगामी बीएमसी चुनाव पर भी अपना प्रभाव अवश्य डालेगी ।पिछले बीएमसी चुनाव में शिवसेना-बीजेपी ने आमने-सामने चुनाव लड़ा था। तब शिवसेना के 84 और बीजेपी के 82 नगरसेवक चुन कर आए थे। वहीं कांग्रेस के 31, एनसीपी के 9, मनसे के 7, सपा के 6, एमआईएम के 2 नगरसेवक चुन कर आए थे। लेकिन इस बार शिंदे गुट के बीजेपी संग आने के कारण चुनावी परिणाम में बदलाव के संकेत साफ नजर आ रहे हैं।मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की मदद से और उप मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में बीजेपी ने देश की सबसे समृद्धशाली मुंबई महानगर पालिका (बीएमसी) सहित अन्य 14 महानगर पालिकाओं को जीतने का लक्ष्य रखा है। राज्य में सत्ता परिवर्तन होते ही मुंबई बीजेपी ने ट्वीट कर अपने इरादे जाहिर कर दिए। बीजेपी ने अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं को सक्रिय कर दिया है।

“सदैव परहितार्थ चिंतन करने वाले प्रमुख स्वामी जी महाराज” -साधु अमृतवदनदास जी

हमने एक ऐसी दुनिया बनाई है जिसमें सब कुछ बाइनरी नंबर यानी एक शून्य एक शून्य में बांटा गया है।

हमने एक ऐसा कार्यस्थल बनाया है जहां लोग भी नंबर में गिने जाते हैं। हम ऐसे जीते हैं जैसे हमें ही जीने का अधिकार है। लेकिन हम याद रखें कि जो हम आत्मा में है, वह सामने वाले व्यक्ति में भी है। हमारी रगों में जो खून बहता है वही खून सभी इंसान की नसों में बहता है। हमारे लिए काम करने वाले कर्मचारियों की भी वही भावनाएँ होती हैं जो हमारे पास होती हैं। अगर हम इसे समझ लें तो हम अभ्यास के साथ-साथ निजी जीवन में भी काफी सफल हो सकते हैं। मसला है इंसानियत का। किसी भी व्यक्ति के व्यावहारिक रूप से स्वच्छ होने के लिए मानवता एक मूलभूत कारक है।

व्यक्ति और सामूहिक के बीच एक विशेष संबंध है।

यह लेन-देन तीन प्रकार का होता है:

(1) चार्ल्स डार्विन प्रबोधित- Survival of the fittest, मजबूत का बचाव ।
(2) live and let live – जियो और जीने दो। यह विचारधारा प्रथम विचारधारा से अच्छी है. इसमें किसी को रौंदने की प्रवृत्ति नहीं है, लेकिन मनुष्य के प्रति उदासीनता है। जैसे एक माँ अपने बच्चे के लिए सोचती है, ‘मैं जीऊँ और अपने बच्चे को जीने दूँ’, लेकिन बच्चा इस तरह बड़ा नहीं होता।
(3) live to let live। किसी को जीने के लिए जियो – यानी निस्वार्थ भाव से जीवन व्यतित करो । इसे कहते हैं इंसानियत। जो दूसरों के लिए जीता है, उसके लिए हज़ारों लोग समर्पण करने के लिए तैयार होते हैं।

भगवान स्वामीनारायण ने वचनामृत में इसे स्पष्ट किया है और कहा है कि जिस संत के पास चार साधु रहते हैं, अगर वह उन्हें मन और दिमाग से रखना जानता है, तो साधु उसके साथ रहेंगे और जो साधुओं को रखना नहीं जानता है तो उसके साथ साधु नहीं रहेंगे । प्रमुखस्वामी महाराज ऐसे संत थे कि संत और सांसारिक लोग उनके साथ बहुत खुशी से रहते थे। मानवता स्वामीजी की अपनी विशेषता थी। वे सबकी परवाह करते थे । सबका ख्याल रखते थे और रखवाते. बड़ा हो या छोटा उनके लिए सब समान थे ।

एकबार स्वामी विचरण करते करते एक स्थान पर आये । यहां एक रात जब स्वामी जी विश्राम करने जा रहे थे तो उन्होंने संतों से बातचीत कर रहे थे। आज वातावरण में ठंड थी तो कृष्णवल्लभ स्वामी ने कहा, ‘स्वामीजी! आज दोपहर विश्राम के लिए जाते समय ठंड बहुत लगाती थी । स्वामीजी ने सस्मित कहा , ‘हां, आज ठंड कुछ ज्यादा ही है । मेरा तकिया, बिस्तर और रजाई सब ठंडा हो गए थे । रजाई भी ऐसी हो गई थी कि वह शरीर से चिपकती नहीं थी। घंटों तक मैं ऐसे ही लेटा रहा।

सेवक तुरंत बोले ,’ स्वामी जी जब ऐसा ही था तो घंटी बजाकर हमें जागना था ना?’ स्वामीश्री कहते हैं, ‘इसमें आप सभी को कहां जगाऊं? आपकी नींद भंग हो जाएगी। यदि हम इतना सह चुके हैं, तो थोड़ा और सह इसमे क्या ।’ सेवक स्वामी जी की सेवा के लिए सदैव तत्पर रहते थे। स्वामीजी सभी आवश्यकताओं, रुचियों और सुविधाओं की परवाह करते हैं। हालांकि ऐसे कई मौकों पर ऐसा लगता है कि समय आने पर स्वामी जी खुद तकलीफ सहन कर लेते थे और भक्तों को इसकी खबर तक नहीं देते। वे सोचते थे कि कोई मेरे लिए क्यों परेशान या आहत हो? स्वामीजी में हमेशा से ऐसी ही मानवता की भावना थी। वे सदा यही सोचते रहते हैं कि दूसरे को वही दर्द क्यों दें। यह मानवता का एक महान गुण है। किसी के दर्द की कल्पना करना और उसे उस दर्द से छुटकारा दिलाना एक तरह की इंसानियत है।

APJ Abdul Kalam and Pramukh Swami ji

वर्ष 2010 में स्वामीजी बोचासन मंदिर में विराजमान थे। वलसाड से यहां आए अखंडमंगल स्वामी ने कहा , ‘स्वामी जी! वलसाड शहर से करीब 300 किशोर किशोरी यात्रा कर आज यहां आए हैं. हमें आज यहां से जाना था , लेकिन जब लड़के-लड़कियों को पता चला कि आप यहाँ है , तो सबने जिद की कि हम यहाँ रात को रुकें और कल सुबह स्वामी जी के दर्शन आशीर्वाद लेकर ही निकलें। इसलिए आज सभी को मेहलाव मंदिर दर्शन के लिए भेज दिया गया है और उसके बाद वे रात में यहां वापस आ जाएंगे। साथ ही भंडारी स्वामी का भी यहां कुछ काम है इसलिए सभी किशोरों स्वेच्छा से सेवा में शामिल होंगे।’

यह सुन स्वामीजी कहते हैं, ‘ये सभी लड़के-लड़कियां यहां दो दिन से यात्रा कर रहे हैं। तो वे सभी बहुत थक गए रहेंगे। तो भंडारी से कहो कि अब सेवा करवाने की कोई जरूरत नहीं है। जैसे वे महल से आए तुरंत उन सब को सुला दो । कल जल्दी वापस जाना है।’

उन्हें यह निर्देश देने के बाद जब सभी संत भोजन के बाद बाहर चले गए, तब स्वामी जी ने सेवक से कहा, ‘भंडारी से कहो कि इन किशोरों को दूसरी सेवा में न लगाएं। यह सोचना चाहिए कि सब थक गए हैं और कल जल्दी उठकर जाना है।’ स्वामीश्री हमेशा दूसरों के बारे में पहले सोचते हैं।

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“प्रमुख स्वामी जी महाराज जिनके शब्दों से अंधकार मिट जाता था” -साधु अमृतवदनदास जी

“मेरी बात सुनो, दोस्तों, रोमन और देशवासियों …” मार्क एंटनी ने अपनी प्रसिद्ध श्रद्धांजलि इस प्रकार शुरू की ।

लोगों की एक बड़ी सभा के सामने उन्होंने घोषणा की, “मैं यहां सीज़र को दफनाने के लिए हूं किन्तु उसकी प्रशंसा करने के लिए नहीं। आदरणीय ब्रूटस ने कहा कि सीज़र महत्वाकांक्षी था। और यदि ऐसा है, तो यह एक भयानक दोष होगा। मैं यहां हूं जो ब्रूटस ने जो सीजर के लिए जो कहा है उसे मैं गलत करने नहीं आया, लेकिन…” यह कहकर, मार्क एंटनी, जो सीज़र के करीबी दोस्त थे, उन्होंने एक ऐसा अद्भुत उद्बोधन किया कि जिसके प्रभाव से जो रोमन जो सीज़र के खिलाफ थे, अंततः ब्रूटस और सीज़र को मारने वाले अन्य षड्यंत्रकारियों के दुश्मन बन गए। अंत में मार्क एंटनी कहते हैं कि Here was a Ceaser, when come such another? यहाँ एक सीज़र था, ऐसा दूसरा कब आएगा ? मार्क एंटनी ने समाज के बारे में जो सच है उसका वर्णन करने के लिए अपनी शब्द शक्ति का इस्तेमाल किया। यदि उनका एक-एक शब्द सच्चा था, तो वह श्रोता के मन की शंकाओं में प्रवेश कर गया और उन्हें सत्य समझाता गया । वाक्पटुता एक शक्तिशाली कप्तान का एक अमोघ हथियार है। यह अपेक्षा के अनुरूप काम करता है।

प्रमुख स्वामी महाराज की वाणी सदैव प्रभावशाली रही। उसकी बातें संजीवनी की तरह थीं। स्वामी जी जब बोलते तो उनकी भावना ऐसी थी कि सुनने वाले को ज्ञान होता था । श्रोता को शांति होती थी । उनको जीवन की दिशा मिलती थी । उनके मन में आए शुभ संकल्पों की पूर्ति होती थी । कुछ साल पहले अक्षरधाम गांधीनगर का काम जोर-शोर से चल रहा था। समय बहुत कम था और काम बहुत ज्यादा। शिल्पियों वहां पत्थर की नक्काशी का काम करते थे। उनको वहा सेवा करते करते बहुत समय हो गया था इसलिए यह स्वाभाविक ही था कि सभी को घर की याद आती थी । उन सभी ने फैसला किया कि अब हमें कुछ देर के लिए घर आ जाना चाहिए. परिवार को मिलना चाहिए । उन्होंने इस बारे में जिम्मेदार लोगों से भी बात की। बहुत काम बाकी था इसलिए किसी एक के चले जाने पर भी काम पे बड़ा गहरा असर होने वाला था । ऐसे में स्वामी जी अपने विचारण के दौरान वहां आते है । सभी संतों भक्तों को मिलते है । अक्षरधाम परिसर भी पूरा देखा. उन्हें अंदाजा हो गया कि कितना काम बाकी है। व्यवस्थापकों ने स्वामी जी साथ शिल्पी बंधुओं की एक विशिष्ट सभा थी रखी । उन्हें यह भी बताया गया कि मजदूर घर जाने की बात कर रहे हैं, अगर ऐसा हुआ तो काम रुक जाएगा और कुछ भी पूरा नहीं होगा. स्वामी जी सबका भला करना चाहते थे।

Guru Darshan

सभा में उन्होंने बहुत आदर और प्रेम के साथ सभी की सेवा की प्रशंसा की । बाद में उन्हों ने जो कहा इसका सार था: ‘आप सब यह भगवान की सेवा कर रहे हो। बहुत समय बीत चुका है। काम अभी भी बाकी है। लेकिन अगर आप सेवा करने के इच्छुक हैं तो सब कुछ पूर्ण हो जाएगा । सबको पुण्य मिलेगा। शांति भी होगी। अक्षरधाम का काम पूरा होने के बाद यहां लाखों दर्शनार्थियों आयेंगे और वे सभी आपको याद करेंगे। घर तो सभी को जाना है किन्तु कुछ समय के बाद में जाना । स्वामी जी के वचन दिव्य थे। उनकी भावना भी भव्य थी।अंत में स्वामीजी ने सब का आभार माना । उन सभी को कार्य का महत्व समझाया और समय पर पूरा करने का भी अनुरोध किया। इस प्रकार उनकी अमृतमय वाणी ने कारीगरों के मन को बदल दिया। उन्होंने यह भी महसूस किया कि यह अक्षरधाम निर्माण कार्य हमारा है। किसी को भी घर जाकर काम में देरी नहीं करनी चाहिए। सभी को जोरों से काम करना चाहिए। घर तो बाद में भी जा सकते है । लेकिन यह सेवा दोबारा उपलब्ध नहीं होगी। ऐसे स्वामीजी के भावपूर्ण सरल शब्दों का जादुई प्रभाव पड़ा और वे घर जाने के अपने इरादे को टालते रहे।

स्वामीजी जो कहते थे उसे सुनने वाले को सुनना अच्छा लगता है। उनका एक एक शब्द हृदय परिवर्तन कराता था. ऐसा ही एक प्रसंग अटलादरा वडोदरा में हुआ। एक बार स्वामीजी अटलादरा मंदिर में आशीर्वाद दे रहे थे. उन्होंने कहा, ‘… आत्मा के साथ भक्ति करने से आपको कितना भी सम्मान या अपमान मिले, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अवसर आने पर मन खट्टा नहीं होना चाहिए। जो ज्ञानी है वह अपने मन से ही समाधान पाकर खुश होगा। उसे हमेशा आनंद और केवल आनंद ही मिलता है…’ आशीर्वाद के बाद स्वामी जी अपने निवास की ओर जा रहे थे। वहाँ भीड़ में से एक भक्त स्वामी जी के पास पहुँचा और उनके चरणों में गिर कर रोने लगा। यह देख संत और भक्त वहीं खड़े हो गए। किसी ने धीरे से उसका हाथ पकड़ और खड़ा किया । स्वामीजी करुणा से उसकी ओर देख रहे थे। भक्त की आंखों में आंसू थे. उन्होंने स्वामी जी की ओर देखा और कहा: ‘ स्वामी जी ! यदि आज की सभा में आपने यह आत्मा की बात नहीं बताई होती तो आज मैं सत्संग को बुरा समज कर और उसका अभाव लेकर में सदा के लिए विमुख हो जाता। यहां के कार्यकर्ता की लापरवाही के कारण मुझे सत्संग का अभाव आ गया था । आपने मेरे दिल की बात कही और मेरे संदेह को दूर किया।’

स्वामीजी मंद-मंद मुस्कराए। उन्होंने हरिभक्त के सिर पर हाथ रखकर उन्हें आशीर्वाद दिया। प्रसिद्ध भागवत रसज्ञ माननीय कृष्ण शंकर शास्त्रीजी ने स्वामीजी के व्यक्तित्व की विशेषताओं का वर्णन करते हुए कहा, ‘प्रमुखस्वामी बोलते हैं तब मुझे लगता है कि जैसे गंदे कपड़े धोने के लिए पानी की आवश्यकता होती है, वैसे ही गंदे विचारों को धोने के लिए उनकी वाणी की आवश्यकता है।’ स्वामी जी का बोलना ऐसा था। . उनके शब्दों के प्रकाश से अंतर का अँधेरा मिट जाता था और उजाला होता था।

जब सबसे श्रेष्ठ कर्णधार बोलते है तो उसे सुननेवालों का दिल, दिमाग और व्यवहार अवश्य बदलता है । स्वामीजी इतने शब्दपति संत थे..When comes such another? उनके जैसा दूसरा तो कहा से आएगा ?

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“परमेश्वर को प्रधान रखने वाले अद्भुत भक्त प्रमुख स्वामी जी महाराज” -साधु अमृतवदनदास जी

जो लोग जीवन में सफल होते हैं वे किसी व्यक्ति को रोल मॉडल मानकर आगे बढ़ते हैं.

कुछ लोग सिद्धांत का पालन करके लक्ष्य प्राप्त करते हैं. कुछ लोग सफलता मंत्र को ध्यान में रखकर सफल होते हैं।

इस समय दुनिया के सफल लोगों में स्पेस एक्स और टेस्ला कार के मालिक एलन मस्क का नाम सबसे आगे है। उनके रोल मॉडल कान्ये वेस्ट, सर्गेई कोरोलेव और रिचर्ड फेमैन हैं। तो टेनिस स्टार राफेल नडाल की सफलता का मंत्र है मेहनत करो, लोगों के साथ काम करो। रतन टाटा का एक सिद्धांत है कि हर व्यक्ति दुनिया में बदलाव ला सकता है।

इस तरह हर कोई किसी को अपने से आगे रखकर सफल होने की कोशिश करता है चाहे वह व्यक्ति हो या सिद्धांत या हो कोई सक्सेस मंत्र।

प्रमुखस्वामी महाराज एक बहुत ही सफल व्यावहारिक संत थे। उनका प्रबंधन करने का तरीका, काम करने का तरीका, काम करवाने का तरीका, किसी भी योजना को पूरी तरह सफल बनाने का तरीका वास्तव में अनोखा था। उनकी कार्यशैली दुनिया के सबसे सफल लोगों से भी ईर्ष्या करती थी। ऐसी थी उनकी सफलता। NDDB के अध्यक्ष और पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित और भारत की श्वेत क्रांति के जनक और रेमन मैग्सेसे सामुदायिक नेतृत्व डॉ. वर्गीस कुरियन साहिब ने न केवल गुजरात राज्य के लिए बल्कि पूरे भारत के लिए बहुत काम किया। उन्होंने अपने जीवन में कई उपलब्धियां हासिल कीं। पूरी दुनिया ने उसे नोटिस किया है। समाज के कई लोग उन्हें अपना आदर्श मानते थे। इतने उच्च कोटि के सफल संगठनकर्ता डॉ. कुरियन साहब स्वामी जी से बहुत प्रभावित थे। स्वामी जी के प्रति उनके मन में गहरा आदर था। जब उन्हें स्वामी जी के कार्यों का अवलोकन मिला तो उन्होंने बड़े आदर के साथ कहा कि स्वामी जी की उपलब्धियों को देखकर मुझे अपनी उपलब्धियों के छोटी दिखाई पड़ती है।

स्वामीजी की अद्वितीय चमत्कारी उपलब्धियों का रहस्य क्या है? इसका रहस्य यह है कि वे ईश्वर को कभी नहीं भूलते। वे हमेशा भगवान की पूजा करते थे। वे भगवान को हमेशा आगे रखते हैं। दिल्ली में निर्माणाधीन अक्षरधाम परियोजना हो या रॉबिंसविल मंदिर (न्यू जर्सी) या हो भुज भूकंप के दौरान किए गए विश्व स्तरीय राहत कार्य, या नर्मदा बांध पर सफल राहत कार्य.. वह पहले भगवान स्वामीनारायण से प्रार्थना करेंगे और स्वयं इसमे जुड़ते और सभी को इसमें जुड़ने की प्रेरणा देते। सेवक और सेवक के रूप में गतिविधियाँ। संत भक्तों को इससे जोड़ते थे।

1988 में अटलांटा एक स्वामी जी सत्संग सभा में जाने के लिए कुछ जल्दी में थे। ऐसे में एक भक्तजन उनको मिलने आए। वे एक मोटल बनाने जा रहे थे। जहां पर मोटल बननेवाली थी उस जमीन की मिट्टी को एक कपड़े में बांधकर उसे स्वामी जी समक्ष लाया गया था। उनकी इच्छा थी कि जब स्वामीजी इस मिट्टी पर अपने पैर रखें, तो मिट्टी प्रसादीभूत हो जाएगी और फिर निर्माण कार्य शुरू करेंगे। उन्होंने कपड़ा फैलाया और मिट्टी फैलाकर प्रतीक्षा करने बैठ गए। स्वामीजी को उन्होंने मिट्टी पर कदम रखने का अनुरोध किया गया। तुरंत स्वामीजी ने ब्रह्मतीर्थ स्वामी से ठाकोरजी को लाने के लिए कहा। वे ठाकुरजी हरिकृष्ण महाराज को लेकर आए। लालजी के पास आए तो स्वामीजी बिना किसी का इंतजार किए बगैर और बिना किसी का समर्थन लिए जल्दी से बैठ गए। हरिकृष्ण ने प्यार से महाराज को गोद में लिया और धीरे-धीरे उन्हें मिट्टी पर ले गए। उन्होंने अपने कदम उठाए। बाद में चरनारविंद ने पृथ्वी को जमीन से स्पर्श कराया। घंटों मिट्टी में दबे रहे। फूल की पंखुड़ियां डालकर पूजा अर्चना की। धुन बनाई। उन्होंने मुमुक्षु को कार्य की सफलता के लिए आशीर्वाद दिया। वह भाई बहुत खुश हुआ। इस प्रकार यदि स्वामीजी किसी स्थान या भूमि की पूजा करना चाहते थे, तो वे निश्चित रूप से पहले ठाकोरजी की पूजा करेंगे।

स्वामी जी द्वारा निर्मित 1100 से अधिक मंदिरों, हरि मन्दिरों का कार्य इसी प्रकार प्रारम्भ किया गया। वे पूरा मंदिर भगवान को समर्पित करते थे। जब भी ठाकोरजी के आने का समय होता, वे चुपचाप उनका इंतजार करते थे। वे भगवान के जल्दी आए इसके लिए प्रभु नाम का जाप किया करते थे। यदि समय थोड़ा अधिक होता तो प्रार्थना या छोटे कीर्तन का गान भी करवाते थे । सभी को प्रभु मे जोड़ देते थे । उनके मन ठाकुर जी आए वहीं शुभ कार्य की शुभ शुरुआत । ठाकुरजी आएं तो लाभ । ठाकुर जी आए वही शुभ । वही श्रेष्ठ मुहूर्त और वही शगुन ।

जनवरी 2007 में स्वामीजी गोंडल विराजमान थे। मंदिर की परिक्रमा की और फिर स्वामीजी नवनिर्मित लिफ्ट में आए। यह लिफ्ट वृद्धि और बीमार भक्तों के लिए बनाई है. उन्होंने संतों से कहा कि यह नया है, तो आप प्रारंभ करें । तुरंत स्वामीजी ने कहा : ‘ठाकोरजी हरिकृष्ण महाराज कहाँ हैं?’ भक्त ज़न ने उनके कहने का अर्थ समझ गए और तर्क दिया, ‘ स्वामी जी ! आपके आने से पहले बहुत लोग बैठ चुके हैं।’ ‘फिर अगर हम जाएं तो पहले हरिकृष्ण महाराज को लेकर आएं।’ स्वामीजी दृढ़ रहे और आग्रह रखा तो संत कहते हैं, ‘हरिकृष्ण महाराज भोजन के लिए पधारे हैं।’ ‘भगवान कब गए?’ ‘अभी गए है ।’ संतों को उत्तर दिया। ‘तो कोई बात नहीं। जल्दी जाओ..उन्हें अभी यहाँ लाओ।’ संत दौड़े। स्वामीजी लिफ्ट में बहुत शांति से खड़े रहे। थाल अभी शुरू नहीं हुआ था, इसलिए संत हरिकृष्ण महाराज के साथ आए। ठाकोरजी के आते ही स्वामी जी ने पूजन किया और उसके बाद ही लिफ्ट को चालू किया और उसका उपयोग किया।

परमेश्वर को सभी कार्य मे आगे अर्थात्‌ प्रधान रखने से और काम करने और सफल होने की उनकी उत्कृष्ट नेतृत्व शक्ति को कोई नहीं समझेगा।

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“सम्पूर्ण सृष्टि की प्रभुमय अनुभूति करते थे प्रमुख स्वामीजी महाराज” -साधु अमृतवदनदास जी

ईश्वर में आस्था आस्तिकता में निहित है। आस्तिकता का अर्थ है ईश्वर, आत्मा, वेद, पुनर्जन्म आदि के अस्तित्व को स्वीकार करना। अस्ति का अर्थ है विद्यमान।

आस्तिक का अर्थ है भगवान सदैव इस ब्रह्मांड मे विद्यमान हैं। कण कण में मौजूद है। तो ईशावस्या उपनिषद में कहा गया है कि इशावस्या मिदं सर्वं यद किनचित्त जगत्यम. त्रिलोकी में यह संसार है जो ब्रह्म परब्रह्म द्वारा व्याप्त है जो निर्देशक, समर्थन है। कठोपनिषद हमें सिखाता है कि:

अणोरणीयान् महतो महीयान् आत्मा, अस्य जन्तोः निहितो गुहायाम्।

वह (परब्रह्म) महान चीजों से बहुत बड़ा और सूक्ष्म चीजों से ज्यादा सूक्ष्म है। यह रुक-रुक कर आत्मा के हृदय गुहा में स्थित होता है।

गीता में, भगवान कृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं कि:

वासुदेव: सर्वमति स महात्मा सुदुर्लभ।
महात्मा जो मानते हैं कि सब कुछ दिव्य है, दुर्लभ हैं।

तुलसीदास हर उस व्यक्ति को देखते हैं जो दुनिया में सीताराम के रूप में सोचता है।

सीयाराममय सब जग जानि करहुँ प्रनाम जोरी जुग पानि ।

प्रमुख स्वामी महाराज एक पवित्र और उत्कृष्ट संत थे जिन्होंने सभी में ईश्वर को देखा, सभी में ईश्वर के दर्शन किए और उनकी महिमा को समझा। जैसे नरसिंह मेहता ने गाया है स्वामीजी का मन..

हवा तू , पानी तू , पृथ्वी तू , आकाश में एक पेड़ जैसे खिल रहा है;

आप ब्रह्मांड में केवल एक ही हैं, श्रीहरि! किन्तु भिन्न भिन्न स्वरुप है तुम्हारे.. ।

स्वामीजी दिनांक 19 फ़रवरी 1985 के दिन बड़ी बेज नामक गांव में विचरण कर रहे थे। यहां आदिवासियों की विशाल जनसभा हुई. उसमे चार हजार से अधिक आदिवासी भाई-बहन बैठे थे. सत्संग कार्यक्रम चल रहा था। सब बहुत खुश थे। सभा में अनुशासन भी गजब का रहा। अन्य व्याख्यानों और कीर्तनों के बाद आखिरकार प्रमुखस्वामी महाराज को आशीर्वाद देने की बारी आई। सभी पर आशीर्वाद बरसाते हुए स्वामीजी कहते हैं, ‘भले ही दूसरे हमें पिछड़ा हुआ कहे, लेकिन आज मैं आप में ईश्वर को देखता हूं।’ उनसे ऐसे उत्तम वाक्य सुनकर सब अत्यंत प्रसन्न हो गए ! सभी को धन्यता का अनुभव हुआ । स्वामी जी ने सारे संसार में ईश्वर को देखते थे.

दिनाँक 8 फरवरी 2004 में स्वामीजी गांधीनगर में थे। यहाँ BAPS अंतरराष्ट्रीय बाल प्रवृतियों का सुवर्ण महोत्सव चल रहा था । इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए माननीय राष्ट्रपति श्री अब्दुल कलाम साहब भी दिल्ली से विशेष रूप से आए थे। कार्यक्रम के अंत में प्रमुख स्वामी महाराज अब्दुल कलाम ने पूछा, ‘साहब! क्या आप भी भगवान की आरती सम्मिलित होंगे ?’ कलाम जी ने खुशी से हां कही । स्वामीजी प्रसन्न हुए। आरती के समय उनके सामने एक साथ हजारों दीपक झिलमिलाने लगे । सभी ने एक साथ आरती उतारी। स्वामी जी ने कलाम साहब से कहा, ‘ वैसे तो भगवान की मूर्ति की आरती होती है, लेकिन ये सभी बच्चे हमारे सामने ईश्वर की मूर्ति के समान हैं। बच्चे मासूम होते हैं और उनके दिलों में भगवान का वास होता है। यानी उनके द्वारा की गई आरती वास्तव में भगवान की आरती है।’ कलाम साहब कण कण में करताल को दिखाने की स्वामी जी की प्रभुमय एवं आस्तिक दृष्टि को देखकर बहुत प्रसन्न हुए ।

भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम के साथ प्रमुख स्वामी जी महाराज

सन 1999 में गुजरात के तीथल शहर में स्वामी जी 79वीं जयंती धूमधाम और दिव्यता के साथ मनाई गई। इस मौके पर डेढ़ लाख श्रद्धालुओं ने गुरुहरि और इष्टदेव की सामूहिक आरती करनी शुरू कर दी. उस समय स्वामी जी ने प्रबंधन संत से अपने लिए भी आरती लाने को कहा। उन्हों ने स्वामी जी को आरती दी. सब सोचने लगे कि
हम सभी भक्त सहजानंद स्वामी और गुणातीत गुरुओ की
आरती करेंगे, लेकिन स्वामी जी किसकी आरती उतरना चाहते हैं? तब स्वामी जी ने हरिकृष्ण महाराज सहित सभी भक्तों की आरती उतारी । आरती के बाद आशीर्वाद देते हुए उन्होंने कहा, ‘आप सब में भी श्रीजी महाराज, गुणातीतानंद स्वामी, भगतजी महाराज, शास्त्रीजी महाराज और योगीजी महाराज रहे हैं। तो मुझे आपकी भी आरती उतारनी चाहिए और आपको भी वंदन करने चाहिए । यह मेरी भक्ति है ।’ स्वामी जी की ऐसी भावना को देखकर सभी दंग रह गए।

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि:
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥

जो मुमुक्षु सर्व भूतों में सब के आत्मारूप में केवल मुझे ही व्याप्त देखता है और अनुभव करता है कि मैं ही समस्त सृष्टि का कारण, आधार हूँ ऐसा मानता है उससे मैं तनिक भी दूर नहीं हूं । इस प्रकार स्वामीजी की आस्था सर्वोपरि थी। उन्होंने पूरी दुनिया को प्रभुमय देखा। उनके पास अणु अणु में ईश्वर देखने की और अनुभूति करने की और जीने की दृष्टि थी। इसलिए, उनको पास सर्व कर्ता, सर्व हर्ता सदा साकार सर्वोपरि परम कृपालु परमात्मा का साक्षात्कार था. वे स्वयं प्रभु स्वरूप बन गए थे।

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“ईश्वर में दृढ़ आस्था के प्रतीक प्रमुख स्वामी जी महाराज” -साधु अमृतवदनदास जी

रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा है कि आस्था वह पक्षी है जो उजाले को तब महसूस करता है जब आकाश में भोर का अंधेरा छाया हुआ होता है।

विश्वास एक ऐसा पंछी है जो सुबह के अँधेरे में भी उजाले को महसूस कर सकता है। विश्वास प्रकाश है। विश्वास का अर्थ है आशा। विश्वास ही जीवन है। जो काम कोई दूसरा नहीं कर सकता है वह काम विश्वास से होता है। लिंग पुराण में श्वेतमुनि की कथा आती है। उनका दृढ़ विश्वास था कि मैंने मृत्युंजय शंकर की शरण ली है तो मौत मेरा कुछ बिगाड़ नहीं सकती।

एकबार भयंकर यम उनको लेने के लिए आए। श्वेतमुनि ने उससे डरे नहीं और पूछा, ‘तुमने आश्रम में प्रवेश करने का साहस क्यों किया?’ यम ने कहा, ‘आपको लेने के लिए।’ यह सुनकर श्वेतमुनि ने शिवलिंग को गोद में लेकर निर्भयता की सांस ली। उनकी यह चेष्टा देखकर यम ने मुस्कुराते हुए कहा , ‘यह लिंग सुन्न, निष्क्रिय और शक्तिहीन है।’ श्वेतमुनि कहते हैं, ‘भगवान उमापति घुरघुराहट में लीन हैं। वह विश्वासपूर्वक सवारी करके भक्त की रक्षा करता है।’ उनकी महान आस्था को देखकर, शंकर ने लिंग से प्रकट हुए और यम से उनकी रक्षा की।

ऐसा आपसी विश्वास हो तो हमारा काम हो जाता है। प्रमुख स्वामी महाराज आस्था के प्रतीक थे। जब किसी को कोई दिशा नहीं मिल रही थी तो स्वामीजी उनमें आस्था का जीवन भर देते थे, सभी थके और उदास रहते थे।

सन 1981 में भगवान स्वामीनारायण द्विशताब्दी उत्सव की शुरुआत से पहले अहमदाबाद शहर में आरक्षण आंदोलन शुरू हुआ। चारों तरफ हलचल हलचल मची हुई थी। दोनों पक्ष मे से कोई किसी के आगे झुकता नहीं था । कोई किसी पर विश्वास नहीं करता । कोई किसी की सुनता नहीं था । शहर में भयानक युद्ध जैसे हालात हो गए थे। और दिन-ब-दिन आंदोलन उग्र होता जा रहा था। स्थिति कुछ ज्यादा ही विस्फोटक होती जा रही थी। खासकर साबरमती आश्रम के पास जहां इतना बड़ा त्योहार मनाया जाना था वह विस्तार तो आंदोलन के तूफान घिरा हुआ था। ऐसे हालात में उत्सव कैसे सम्भव हो ? इस सवाल ने सब को परेशान कर दिया था । तैयारी जोर-शोर से शुरू हो गई थी। लेकिन संकेत ऐसे थे कि अगर इस तरह से आंदोलन चालू रहे और उत्सव मे कुछ बढ़ा आए को तो देश-विदेश से आने वाले लाखों लोगों को बड़ी परेशानी होगी। सभी स्वामीजी के पास दौड़े। वे सभी त्योहार को स्थगित करने के निर्णय में थे। उन्होंने स्वामीजी के सामने भी स्थिति को नकारात्मक रूप से प्रस्तुत किया क्योंकि उनके अनुसार और कोई अच्छी संभावना नहीं थी। हर कोई घोर निराशा और लाचारी में स्वामीजी से समाधान ढूंढ रहा था। इस तूफ़ान में एक झटके में सभी के आस्था के दीप बुझ गए थे। उनमें से कुछ तो दीप ही नष्ट हो गए थे। लेकिन स्वामी जी स्थिर एवं अडिग थे।

Swaminarayan Temple Mumbai

इनकी खासियत थी कि ऐसी आपात स्थिति में भी वे तुरंत कोई निर्णय न लेते थे । पहले सभी से पूछो। सबके वोट लेते थे। सभी के हृदय मे क्या चाल रहा है उसकी जाँच करते थे । उन सभी ने सर्वसम्मति से कहा कि उत्सव को स्थगित करने के अलावा और कोई उपाय नहीं है। फिर स्वामी जी ने बहुत ही शांति और बर्फ की ठंडक से कहा कि हमें तय तारीखों के अनुसार ही उत्सव मनाना है. भगवान स्वामीनारायण सब कुछ अच्छा कर देंगे। बुरा समय टल जाएगा। स्वामी जी ने सबके दिलों में आस्था विश्वास की एक ही चिंगारी दी और सबके दिलों में फिर से एक आग लग गई। उनमे हिम्मत आई । साहस आया। नई सोच आई।वास्तव में ऐसा ही हुआ।

जब उत्सव शुरू हुआ तब तक आंदोलन क्षीण हो गया और माहौल भी दिव्य हो गया । द्विशताब्दी समारोह अद्भुत हुआ । जिसकी सबको दहशत थी ऐसी कोई गड़बड़ी नहीं हुई। सम्पूर्ण आयोजन अत्यंत सफल रहा। देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु आ पहुंचे थे । हजारों संत और गणमान्य व्यक्ति भी आए। न जाने कितने मेहमान आए। हजारों नशेड़ी जो रोज नशा करते थे उन्होंने अपने व्यसन छोड़ दिए । उत्सव ने सैकड़ों लोगों को पवित्र जीवन जीने के लिए प्रेरित किया। ऐसे अवसर पर स्वामीजी की श्रीहरि में अटूट आस्था से हमें यह विश्वास हुआ कि इस अलौकिक व्यक्ति की आस्था वास्तव में अनंत और अथाह है।

स्वामीजी वर्ष 2009 में मुंबई में थे। एक बार कुछ श्रद्धालु ज़न वहा बैठकर लोकसभा चुनाव परिणाम हारने की बात कह रहे थे। एक भक्त दूसरे की ओर इशारा करके कहा , ‘स्वामी जी ! यह कह रहा है कि हमें प्रार्थना करने की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं है। अगर हम प्रार्थना भी करें, तो भगवान नहीं सुनते और उल्टा हो जाता है. इससे अच्छा यह है कि प्रार्थना ही नहीं करनी चाहिए ।’ स्वामीश्री कहते हैं, ‘क्यों? क्या ऐसी समज और विचारधारा अब तक सत्संग करने का परिणाम है?’

वह बुजुर्ग भक्त ने कहा , ‘लेकिन हमारी प्रार्थना नहीं सुनी जाती है तो हम क्या करें?’ स्वामीश्री शांति स्वस्थता से कहते हैं, ‘शायद हम प्रार्थना करे और हम जो मांगे वैसा न भी हो तो समझो की भगवान की ऐसी ही मर्जी होगी। भगवान जो करते है वह अच्छा ही करेंगे । कोशिश करने के बाद भी अगर कोई नतीजा नहीं निकलता है, तो भगवान की इच्छा पर विश्वास करें।’ स्वामीजी की ईश्वर में दृढ़ आस्था देखकर सभी शांत हो गए। वह सभी स्वामीजी के पवित्र तर्क के प्रति अनुत्तरदायी हो गए ।

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“भगवद आस्था और प्रमुख स्वामी जी महाराज के सुविचार” -साधु अमृतवदनदास जी

न्यूयॉर्क टाइम्स के बेस्टसेलिंग लेखक स्टीवन फर्निक ने अपनी किताब ‘क्रैश द चैटर बॉक्स’ में कहा है कि हमारा दिमाग पूरे दिन नकारात्मक विचार पैदा करता है।

वे विचार हमारे जीवन को बनाते हैं। इन सब विचारों के बीच आस्था और विश्वास की एक किरण हमें आशा देती है।

दुनिया भर में हर दिन सड़कों पर हजारों दुर्घटनाएं होती हैं। हालांकि, हमें विश्वास है कि जिस बस या कार में मैं बैठा हूं, उसे कोई नुकसान नहीं होगा। भले ही हर दिन हजारों विमान आसमान में उड़ते हैं, लेकिन कुछ दुर्घटनाएं होती हैं। फिर भी हमें विश्वास है कि हमारी उड़ान को कुछ नहीं होगा। जैसे हमें ड्राइवर और पायलट पर भरोसा है, वैसे ही भगवान और संत पर विश्वास है तो हमारी गाड़ी सुचारू रूप से चलेगी।

जब हम काम या व्यापार के लिए घर से निकलते हैं तो हमारे मन में कई सवाल होते हैं। नौकरी और व्यवसाय में कई जटिलताएँ हैं। हालांकि, कभी-कभी हम इससे बाहर निकल जाएंगे और हम ठीक हो जाएंगे। हम कामयाब होंगे। ऐसा विश्वास हमे होता है.

इस प्रकार यदि कंपनी के बॉस में अधिक विश्वास और आत्मविश्वास होता है, तो वह पूरी टीम को उस ऊर्जा से भर देता है।
प्रमुख स्वामी महाराज में करोड़ों लोगों की अनूठी आस्था और विश्वास था । इसके मूल में स्वामी जी की ईश्वर में अटूट आस्था है। स्थिति कितनी भी भयानक और भयंकर और कष्टदायक क्यों न हो, वे कभी भी भयभीत या हिलते या भ्रमित या उदास नहीं होते हैं।

10 जुलाई 1985 को स्वामीश्री एयर इंडिया के विमान से लंदन जाने वाले थे। उसी वर्ष जून के तीसरे हफ्ते में कनाडा से भारत आ रहे एयर इंडिया के एक विमान को आतंकियों बम से उड़ा दिया था . सभी मुसाफिर की मृत्यु हो गई थी । आतंकियों ने धमकी दी है कि एयर इंडिया का हर विमान खतरे में है। लोगों ने भविष्य की बुकिंग रद्द करनी शुरू कर दी। लंदन के चिंतित हरि भक्तों ने एयर इंडिया की बुकिंग रद्द करने और अन्य एयरलाइनों के साथ उड़ान भरने के लिए स्वामी जी को बिनती की । बाद मे बहुत अनुरोध भी किया। स्वामीश्री कहते हैं: “भगवान में विश्वास नहीं करते? भगवान पर भरोसा रखो। किसी बारे में चिन्ता की जरूरत नहीं।”

BAPS Shri Swaminarayan Mandir, London
BAPS Shri Swaminarayan Mandir, London

स्वामीजी एयर इंडिया के विमान में बैठे और विदेश यात्रा की। उन्होंने मुस्कुराते हुए खतरनाक से खतरनाक यात्रा को भी पार किया और पूरे देश और दुनिया को अपने जीवन में निर्भयता का पाठ पढ़ाया।

ईश्वर में आस्था रखने वाला ही करोड़ों का योग क्षेम ले जा सकता है।

2007 के वर्ष में स्वामीजी मुंबई में थे। डॉ के एन पटेल उनकी जांच करने पहुंचे. उन्हों ने स्वामीजी से कहा, ” विख्यात कार्डियोलॉजिस्टि डॉ अश्विनभाई मेहता मुझे बताते रहते हैं कि आप यहां इतनी सेवा क्यों कर रहे हैं? लेकिन आज वह आपके परीक्षण के बाद वह जा रहे थे तब उन्होंने मुझसे कहा कि प्रमुखस्वामी अद्भुत हैं! परीक्षण के लिए गए और उससे पहले भी मैंने उनके चेहरों को देखा। उनके चेहरों पर कोई चिंता नहीं थी। मैंने कई बड़ों का इलाज किया है। मैंने देखा है कि जब हृदय रोग का संकट आता है तो यह बड़े बड़े महानुभावों के चेहरे बदल जाते है। मैंने उनके अंदर ही अंदर अवसाद देखा है। जबकि प्रमुख स्वामी महाराज के चेहरे पे कोई परिवर्तन नहीं हुआ था ।”

स्वामीश्री कहते हैं, ‘हम जब स्वास्थ्य जांच के लिए जाते हैं तब भगवान की मूर्ति को साथ लेकर जाते है । इस लिए उनको हमारी चिता है । उनकी ईच्छा के अनुसार होता है । भगवान ही कर्ता है।’ डॉ। किरणभाई ने कहा कि ‘आपको तो मेडिकल रिपोर्ट का परिणाम पता ही होगा ना ? आप स्वयं भगवान ने स्वयं से पूछिये की आपका रिपोर्ट कैसा आएगा. ‘

स्वामीश्री ने बताया , सभी डॉक्टर मुझसे स्नेह करते हैं । और संतों और भक्तों की प्रार्थना है तो रिपोर्ट अच्छा ही आएगा. भगवान अच्छा ही करेंगे। रिपोर्ट तो अब तक अच्छे ही रहे हैं और भविष्य मे अच्छे ही आएंगे।’ यह सुनकर सभी ने स्वामी जी की ईश्वर में असीम आस्था विश्वास को देखा। जब स्वास्थ्य की बात आती है, तो अच्छे अच्छे भी कांपने लगते हैं। कोरोना के समय एक बड़ा आदमी इसकी चपेट में आ गया। एक संत को पता चला तो उनको फोन किया । वह प्रतिष्ठित व्यक्ति उसी समय अस्पताल जा रही थी। उन्होंने बहुत भयभीत और उदास स्वर में कहा, ‘स्वामीजी! मुजे कोरोना हो गया है। कृपया आप मेरी रक्षा करे..’

दूसरे किस्से में एक रोग से पीड़ित एक व्यक्ति को एक छोटा सा इंजेक्शन दिया जाना था। उन्हों ने इंजेक्शन देखा और उसमें से बारीक पिचकारी निकलती देख उसकी आंखों में अंधेरा छा गया और अंत में वह चक्कर खा के गिर पड़े । कभी-कभी इंजेक्शन देखकर ही लोग बच्चे की तरह रो पड़ते हैं।

स्वामीजी को तो कई अति गंभीर शारीरिक कष्ट हुए थे । फिर भी उन्होंने हर समय ईश्वर में विश्वास रखते हुए सभी को बीमारी से लड़ने का एक नया तरीका दिखाया था ।

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