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Tuesday, September 8, 2026
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IIJS Signature Show 2023 : नेचुरल डायमंड्स ज्वेलरी की बड़ी रेंज के साथ Dhanji Jewels ने की शिरकत

Dhanji Jewels : मुंबई | IIJS Signature Show 2023 में इस वर्ष 50 देशों की 600 कंपनियों के 800 विदेशी आगंतुकों की रिकॉर्ड संख्या बताई जा रही है।

गत दिनों 5 जनवरी से 9 जनवरी तक भारत के सबसे बड़े ज्वेलरी शो IIJS Signature Show का आयोजन हुआ। जिसमें देशभर से ज्वेलरी ब्रांड्स व ज्वेलर्स ने अपने बूथ लगाए।

रत्न एवं आभूषण निर्यात संवर्धन परिषद ( GJEPC) ने 5-9 जनवरी 2023 तक मुंबई के बांबे प्रदर्शनी केंद्र में कैलेंडर वर्ष 2023-भारत अंतर्राष्ट्रीय आभूषण प्रदर्शनी (आईआईजेएस सिग्नेचर) और भारत रत्न एवं आभूषण मशीनरी एक्सपो ( IGJME ) के पहले डिजाइन केंद्रित आभूषण प्रदर्शनी का आयोजन किया ।

आईआईजेएस सिग्नेचर 2023 के उद्घाटन में केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग राज्य मंत्री श्रीमती अनुप्रिया पटेल और सांसद श्रीमती पूनम महाजन एवं अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने भाग लिया।

आईआईजेएस सिग्नेचर का 15वां संस्करण 65,000 वर्गफुट में फैला था। IIJS Signature 2,400 से अधिक बूथों में फैले 1,300 से अधिक प्रर्दशकों को समायोजित किया गया। 10,000 घरेलू कंपनियों के 32,000 आगंतुकों ने शो में भाग लिया। जीजेईपीसी ने प्रयोगशाला में उगाए गए हीरों (Lab Grown Diamonds) के लिए भी एक नया खंड प्रस्तुत किया । आईजीजेएमई 90 से अधिक कंपनियों, 115 से अधिक बूथों / हॉल 7 के साथ समवर्ती शो था।

इस वर्ष आईआईजेएस सिग्नेचर में 50 देशों की 600 कंपनियों के 800 विदेशी आगंतुकों की रिकॉर्ड संख्या बताई जा रही है। 10 देशों : अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, मलेशिया, श्रीलंका, ईरान, बांग्ला देश, नेपाल, यूएई, बहरीन और रूस से प्रतिनिधिमंडल आये। पहली बार, 18 प्रमुख खरीदारों के साथ सऊदी अरब से भी एक प्रतिनिधिमंडल आया।

IIJS Signature 2023 में उत्पाद वर्गों में शामिल रहे: सोना एवं सोना सीजेड जड़ित आभूषण, हीरा, रत्न एवं अन्य जड़ित आभूषण, चांदी के आभूषण, कलाकृतियां और उपहार दी जाने वाली वस्तुएं, ढीले पत्थर, प्रयोगशाला एवं शिक्षा और प्रयोगशाला में उगाए गए हीरे ( ढीले एवं आभूषण )।

देश भर के ज्वेलरी मार्केट में तेजी से अपनी पकड़ बनाते हुए ब्रांड Dhanji Jewels ने भी नेचुरल हीरे जड़ित स्वर्ण आभूषणों के साथ इस शो में शानदार शिरकत की। जिसमें राउंड डायमंड, फैंसी डायमंड जड़े हुए शानदार स्वर्ण आभूषणों को विशाल रेंज प्रदर्शन के लिए रखी गई।

Dhanji Jewels Pvt Ltd के CEO अमित द्विवेदी ने संवाददाता को बताया कि, “हम पहली बार इतने बड़े शो का हिस्सा बन रहे थे तो हमें अपने यूनीक कॉन्सेप्ट पर विशेष काम करना था। Dhanji Jewels की पूरी टीम ने ज्वेलरी सिलेक्शन से लेकर बूथ डेकोर पर जबरदस्त टीम वर्क किया। इस शो को लेकर हम काफ़ी एक्साइटेड रहे। न केवल भारत बल्कि दुनिया भर के लोगों ने हमारे काम को देखा और तारीफ़ भी की। जो कि एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।”

“वसुधैव कुटुंबकम् विचार के दृढ़ अनुगामी प्रमुख स्वामी जी महाराज” – साधु अमृतवदन दास जी

कई कंपनियां अपने कर्मचारियों को मुफ्त में नौकरी पर रखती हैं। कई कंपनियां अपने कर्मचारियों को ब्याज मुक्त कर्ज मुहैया कराती हैं।

कितनी ही कंपनियां अपने आदमियों को घर, कार, गहने आदि उपहार में देती हैं। कई कंपनियां तो कंपनी के खर्चे पर अपने कर्मचारियों के बच्चों को भी पढ़ाती हैं। साथ ही कई कंपनियां कर्मचारियों को मुफ्त चिकित्सा, बीमा आदि की सुविधा देती हैं। क्‍योंकि ये सभी कंपनियां अपने कर्मचारियों के माध्‍यम से हर साल अच्‍छी खासी कमाई करती हैं। इसलिए कंपनियां उन्हें सुविधा सहायता प्रदान करती हैं। कई कंपनियां अन्य गरीबों, पिछड़ों आदि की मदद भी करती हैं।

कई कंपनियां भीतरी इलाकों में कौशल विकास के लिए अन्य संगठनों को बड़ी रकम या आवश्यक वस्तुएं देती हैं। क्योंकि उन्हें यह काम सरकार की सीएसआर गतिविधियों के तहत करना है। यदि वे करते हैं, तो एक सरकारी जांच शुरू होती है। कुछ महीने पहले मुंबई के एक बहुत बड़े बिजनेसमैन ने ऐलान किया कि मैं अपनी सारी संपत्ति दान कर दूंगा। हुआ यूँ कि इस अरबपति सट्टेबाज़ जैसे व्यवसायिक को शराब और सिगरेट आदि की भयानक लत लग गई थी। इससे उनकी दोनों किडनियां फेल हो गईं। जीवित रहने के लिए डायलिसिस के लिए वह लगातार अस्पताल में थे।

इन सभी बीमारियों से उनकी मृत्यु हो गई। लोगों के मन में आया कि इस भाई की दौलत से कई सामाजिक काम होंगे। लेकिन जब उसकी वसीयत का पता चला तो भाई ने बड़ी चालाकी से अपनी सारी संपत्ति, शेयर सर्टिफिकेट अपने परिवार वालों में बांट दिए। उन्हों ने बहुत कम रकम अपने पास रखी थी । लोग ऐसे भी सबकी मदद करते हैं।

लाओत्से ने कहा है कि Great square has no corner. महान आत्माओं का मन भेदभाव से परे होता है। छोटे-छोटे जीवों में यह भाव होता है कि यह मेरा है और यह तेरा है। लेकिन वास्तव में महान व्यक्ति को तुम्हारा और मेरा ऐसा का कोई भाव नहीं होता। इनका दिल बहुत बड़ा होता है। प्रमुख स्वामी महाराज एक संत व्यक्ति थे जिनके हृदय में अपने और पराये जैसी कोई बात नहीं थी। वसुधैव कुटुम्बकम् का आदर्श वाक्य उनके मन और जीवन में बुना हुआ था। जीवन की ऐसी भावना एक महान नेता का एक महान गुण है। जब उन्होंने समाज के किसी भी कोने से मदद के लिए पुकार सुनी तो उन्होंने भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने बहुत मदद की है। हद से ज्यादा मदद की। मोरबी में मच्छू बांध आपदा से लेकर मोरबी के झूला फूल तोड़ने की घटना तक, उनकी प्रेरणा से संतों और संगठन के स्वयंसेवकों ने दृढ़ और निरंतर सेवा की है। साथ ही उनका स्वभाव ऐसा था कि कभी मदद मांगने वाले की जाति, जाति, गांव, काम का नाम आदि नहीं पूछते थे।

Pramukh Swami Maharaj Shatabdi Samaroh, New Delhi

एक बार स्वामी जी मुम्बई में निवास कर रहे थे। एक हरिभक्त ने एक दुकानदार से कहा कि वह ठाकोरजी के लिए आम भेजना चाहता है। उस दुकानदार ने आम का बॉक्स एक आदमी के द्वारा मंदिर भिजवा दिया। वह आदमी मंदिर में आया और संयोग से स्वामी जी से भी मिला । उसका पसीने से लथपथ बदन, दुर्गंधयुक्त फटे-पुराने कपड़े और लाचार चेहरा उसकी मजबूरी दिखा रहे थे । स्वामी जी ने उनसे बड़े स्नेह से भेंट की। उसका नाम पूछा। इस पूछताछ में पता चला कि यह मजदूर भाई होम्योपैथी में डॉक्टर की तरह पढ़ा-लिखा है. लेकिन विकट स्थिति के चलते मेडिकल लाइन की जगह ऐसी फेरी का काम करता है। उनकी कहानी सुनकर स्वामीजी थोड़े दुःखी हो गए और उन्होंने वहां मौजूद रामचरण स्वामी से कहा कि अच्छा होगा कि इसकी वहां किसी अच्छे डॉक्टर से उनकी व्यवस्था करा दी जाए। कोई संबंध या कोई परिचय नहीं, लेकिन उस मजदूर की मदद करके स्वामीजी का मन शांत हो गया। मजदूर भाई आम की एक पेटी तो छोड़ गया लेकिन स्वामीजी की मदद से मीठे आमों की कई पेटियां ले गया। आया तो देने के लिए और जब गया तो मन भर कर चला गया। जो भी स्वामीजी के पास आता वह हमेशा उनसे कुछ ना कुछ ले जाता था ।

यदि स्वामीजी के पास कोई न आ पाता तो भी स्वामीजी उनके पास पहुँच जाते और बहुत कुछ दे देते। स्वामीजी देने में समता रखते थे लेकिन देखने में भी समता रखते थे। उन सबका मन एक जैसा था, इसलिए वे सबके साथ समान व्यवहार करते थे। उन्होंने कभी ऊँच-नीच का भेद नहीं किया। एक साधु और एक सांसारिक आश्रम अलग हैं। उनका दृढ़ विश्वास था कि उनके रास्ते अलग हैं लेकिन मंजिल एक है, इसलिए वे दोनों का सम्मान करते थे। इस प्रकार, स्वामीश्री के मन में सभी अपने है। कोई अजनबी नहीं हैं। एक बार ऐसा हुआ कि स्वामीजी बैठे थे। वहां साधु-संत आए। संत स्वामीश्री के चारों ओर बैठे थे। हरिभक्त थोड़े पीछे रह गए।

यह देखकर स्वामीश्री ने संतों को प्रणाम किया और कहा, “आप यहाँ क्यों बैठे हैं?जरा इस तरफ से आओ। यह भक्त थोड़े दूर बैठें है तो जरा उनको भी नजदीक आने दो । क्या आप अकेले इंसान हैं? क्या ये हरिभक्त मानव नहीं हैं?” स्वामीजी के भाव को देखकर संत तुरंत हठ गए और हरिभक्तों को उनकी इच्छा के अनुसार बैठने की अनुमति दी। संतों की समझ देखकर स्वामीजी प्रसन्न हुए। स्वामीजी के मन में तो जैसे संत वैसे ही गृहस्थ। छोटा बड़ा एक समान । वास्तव में, उनके विशाल हृदय में छोटे – बड़े, संत – गृहस्थ, एवं अपने – पराये सभी खुशी से रहते थे।

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“सामंजस्य की श्रेष्ठ प्रतिमूर्ति थे प्रमुख स्वामी जी महाराज” – साधु अमृतवदन दास जी

दुनिया का सबसे महान फुटबॉल खिलाड़ी पेले सबसे पहले अपने देश ब्राजील के सैंटोस क्लब के लिए खेलते थे।

एक बार 1969 में वे अपने क्लब की ओर से नाइजीरिया फुटबॉल खेलने जा रहे थे। यहां उन्हें बेनिन क्लब के साथ दोस्ताना मैच खेलना था। लेकिन उस समय नाइजीरिया घोर संकट के दौर से गुजर रहा था।

देश में भयानक गृहयुद्ध चल रहा था। यह गृहयुद्ध 1967 से 1970 तक नाइजीरिया देश और बियाफ्रा गणराज्य के बीच चला। इसलिए दोनों पक्षों ने स्वेच्छा से उस क्षेत्र में गृहयुद्ध को रोक दिया जहां यह मैच 48 घंटे तक खेला जाना था। कारण यह था कि सभी जुझारू न केवल फुटबॉल के प्रशंसक थे, बल्कि विशेष रूप से वे पेले के लिए बहुत सम्मान करते थे और उनके बड़े प्रशंसक थे। उन्होंने जीवन में एक बार पेले को खेलते हुए देखने के लिए अपनी बदले की भावना और आक्रामकता को एक तरफ रख दिया। ऐसा था पेले का प्रभाव। हमारे शास्त्रों में लोमश ऋषि का उल्लेख मिलता है। बताया गया है कि उनकी मौजूदगी में हिंसक वृत्ति का शमन हो जाता था । उनके आश्रम और आसपास के तालाब, सरोवर या नदी में बाघ, शेर, तेंदुआ जैसे जंगली जानवर और हिरण, खरगोश आदि सौम्य जानवर भी एक साथ पानी पीते थे। ऐसी होती है साधु की महिमा।

प्रमुख स्वामी महाराज एक गौरवशाली संत थे जिनकी दिव्य और पवित्र उपस्थिति में व्यक्तियों और व्यक्तियों के समूहों ने वैरवृत्ति, आक्रामकवृत्ति और हिंसकवृत्ति को त्याग दिया। उनके पावन सान्निध्य में ऐसी अनेकानेक किस्म की वैर वृत्तियों का भाव मिट जाता था ।

एक गाँव का एक क्षत्रिय अपने भतीजे की हत्या का बदला लेने की इच्छा से बेचैन था। दि. 11-3-1995 को गुजरात के गढ़डा गांव में, उन्होंने स्वामीश्री के सामने विरोध किया और कहा: ‘मैं इसे मार दूंगा। गांव में हम लोगों से लोग कहते हैं- ये सब कायर हैं।..’ तब स्वामीश्री ने उन्हें समझाया और कहा: “हम खुद को मारने की ज़िम्मेदारी नहीं लेते हैं। जो चला गया है वह वापस नहीं आएगा । फिर फालतू का बदला लेकर क्या करें? शांत रहें. भगवान सब अच्छा करेंगे । उसे मारने से जायदाद मिलनेवाली नहीं है ! हम शांत होंगे तो उसी हिसाब से सर्वत्र शांति होगी। आपको तो ऐसे बहोत मिल जाएंगे, लेकिन हमें कुछ नहीं करना है । लोग आपको बर्बाद कर छोड़ेंगे । पत्नी -लड़के तुम्हारे हैं। आपको चढ़ाने वाले को क्या कुछ है? इसलिए भांजे की मौत को केवल एक निमित्त समझें। इसे ईश्वर की इच्छा ही समझना। एक और झगड़ा खड़ा मत करो । शांति से भजन करो ।’ और स्वामीश्री की इस अनुभवपूर्ण वाणी से उनका क्रोध शान्त हो गया !

एक बार किसी गांव में किसी युवक ने गांव के एक सज्जन की हत्या कर दी। इस मामले ने पूरे गांव को खूनी गृहयुद्ध में झोंक दिया। खुन का बदला खून..आंख के बदले आंख निकालने की प्रवृत्ति से पूरा गांव जलने लगा। ऐसे ही गरमाते माहौल में स्वामीजी ने मृतक के बेटे से कहा, ‘तुम शांत रहो। हमें कोई शिकायत करनी नहीं है। कोर्ट से केस हटाओ। अपनी मां से कहो कि उस खूनी को भी माफ कर दे ।’ स्वामीश्री के इस वचन पर भावनगर की अदालत में जज के सामने महिला ने अपने पति के हत्यारे को अपनी आंखों के सामने माफ कर दिया! हर कोई चकित था। स्वामीश्री तब स्वयं गाँव में आए और गाँव के दोनों पक्षों को लगातार दो दिनों तक समझा-बुझाकर शांत किया, आपसी क्षमा की भावना पैदा की और जलते हुए गाँव को प्रतिशोध की ज्वाला से बचा लिया । उस घटना के चश्मदीद आज भी कहते हैं: ‘अगर प्रमुखस्वामी महाराज न होते तो न जाने कितनी लाशें गांव के रास्ते पर आ जातीं!’

BAPS Swaminarayan Mandir, Mahelav

सौराष्ट्र में कुकड़ और ओदारका आदि 45 गाँवों के क्षत्रियों में, डेढ़ सौ वर्ष पूर्व चराई भूमि विवाद से प्रतिशोध की ज्वाला भड़क उठी थी। लगातार डेढ़ सौ वर्षों से हिंसा और जबरन वसूली की आग पीढ़ी दर पीढ़ी को जोर पकड़ रही थी। भावनगर के महाराजा कृष्णकुमार सिंहजी से लेकर ब्रिटिश नौकरशाहों और यहां तक ​​कि स्वतंत्र भारत के अधिकारियों तक ने इस वैर को कुचलने के कई प्रयास किए। लेकिन असफलता ने पीछा नहीं छोड़ा। 1980 के दशक में स्वामी जी ने इन क्षत्रियों में वरिष्ठ ऐसे सूत्रधार रामसंग बापू का जीवन परिवर्तित किया तबसे डेढ़ सौ साल पुराने प्रतिशोध से मुक्ति का सिलसिला शुरू हुआ।

स्वामी जी ने सभी को क्षमा का अमृत पिलाने का निरंतर प्रयास किया। दि. 12-4-1990 का दिन इतिहास में एक प्रेरणादायी दिन बन गया । डेढ़ सौ साल बाद पहली बार दोनों दलों के क्षत्रिय स्वामीश्री की छत्रछाया में एकत्रित हुए, आपसी प्रतिशोध को त्यागा, डेढ़ सौ साल बाद स्वामीश्री के हाथों एक दूसरे के गाँव का पानी पिया। उस समय क्षत्रिय नेता बोल उठे, ‘जो ब्रिटिश सरकार या भारत सरकार डेढ़ सौ साल में नहीं कर पाई, वह इस साधु ने कर दिखाया। यह काम केवल प्रमुख स्वामी महाराज ही कर सकते हैं।’

संत वो है जो मेल-मिलाप करता है। संत वो है जो सामंजस्य बनाता है। एक संत जो आपको सुखी करता है। प्रमुख स्वामी महाराज ऐसे ही एक संत श्रेष्ठ थे।

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“प्रमुख स्वामी जी महाराज का अद्भुत प्रबंधन सिद्धांत” -साधु अमृतवदन दास जी

एक महान कप्तान की एक पहचान यह है कि वह कभी भी संख्या के हिसाब से नहीं चलता।

वह कभी शिकायत नहीं करेगा कि जनशक्ति की कमी है। वह सीमित संसाधनों में भी कुशलता से काम करेगा। मैक्स फाइनेंशियल सर्विसेज (MFSL) नाम की एक कंपनी की कीमत 24,000 करोड़ रुपये है। दिसंबर 2022 में एक्सिस बैंक द्वारा प्रकाशित बरगंडी प्राइवेट हुनूर इंडिया 500 सूची में MFSL को 166वां स्थान मिला था। नवंबर 2022 के अंतिम सप्ताह में इसके शेयर की कीमत में आठ प्रतिशत की वृद्धि हुई। MFSL बीएसई और एनएसई दोनों में पंजीकृत है। हैरानी की बात है कि MFSL जितनी बड़ी कंपनी में केवल बारह पंजीकृत कर्मचारी हैं। श्री अनलजीत सिंह जो मैक्स कंपनी के संस्थापक और अध्यक्ष हैं, कम लोगों के साथ कंपनी चलाने में अच्छे लगते हैं। इस उदाहरण से, यह देखा जा सकता है कि किसी कंपनी या संगठन की सफलता आवश्यक रूप से संख्याओं के कारण या संबंधित चीजों पर संख्याओं की शुद्ध शक्ति के प्रभाव के कारण नहीं है। उच्च प्रदर्शन वाले नेता संख्या के खेल में नहीं पड़ते। वे एक के सिद्धांत पर काम करते हैं।

कामा होल्डिंग्स एक छोटी मिड कैप कंपनी है। उनकी रुचि का क्षेत्र शिक्षा, रियल एस्टेट और निवेश है। एक रिपोर्ट के मुताबिक इसकी कीमत 8,388 करोड़ रुपए है। आश्चर्यजनक रूप से, कंपनी केवल तीन कर्मचारियों और छह बोर्ड सदस्यों द्वारा चलाई जाती है!

प्रमुख स्वामी महाराज एक कुशल नेता थे जिन्होंने कभी संख्या पर जोर नहीं दिया। जब उन्हें बीएपीएस के प्रमुख के रूप में नियुक्त किया गया था, तब संतों की संख्या बहुत कम थी, वास्तव में उन्हें उंगलियों पर गिना जा सकता था और यहां तक ​​कि संगठन में भक्त भी बहुत कम थे, केवल कुछ हजारों। लेकिन स्वामीश्री ने कभी अंकों की ओर नहीं देखा। वह लोगों की संख्या पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय इस बात पर ध्यान केंद्रित करेगा कि लोग कितने कुशल हैं। तब वह उन्हें प्रदर्शन करने के लिए असंख्य अवसर और अवसर प्रदान करेगा। लोग नई चीजों पर काम करते रहे और नई चीजें सीखते रहे।

BAPS Sri Swaminarayan Mandir, Sarangpur

बरसों पहले लंदन के भक्तों के अनुरोध पर एक बड़े मंदिर का निर्माण शुरू किया गया था। यह एक बहुत ही दिव्य, भव्य और अलौकिक मंदिर होना था। साथ ही साथ लकड़ी में वास्तुकला की हवेली भी निर्माण की गई , जो यूरोप में पहले कभी नहीं देखी गई थी । पूरी परियोजना एक विशाल पैमाने की थी और इसलिए यह अनिवार्य था कि संत वहाँ मंदिर निर्माण गतिविधि की देखरेख करें, सत्संग को आगे बढ़ाएँ और सत्संगियों को शक्ति का स्रोत को सेवा में लगाए । भक्तों ने बार-बार स्वामीजी से इस संबंध में संतों को नियुक्त करने का अनुरोध किया था। परियोजना की विशालता को देख के लिए लगभग दस से पंद्रह संतों की आवश्यकता थी । लेकिन स्वामीजी ने 1994 में सिर्फ दो संतों को भेजा। आत्मस्वरूप स्वामी एक अन्य संत के साथ मंदिर के काम की निगरानी और आध्यात्मिक गतिविधियों के संचालन के लिए गए। ये दोनों संत वहीं रुके और अपनी सेवाएं दीं। आगे आत्मस्वरूप स्वामी को अस्थमा था, इसलिए लंदन की ठंडी उन्हें किसी भी तरह से अनुकूल नहीं थी। फिर से कड़ाके की ठंड के साथ-साथ बर्फ गिरने से दमा की स्थिति और बढ़ाती थी । ऐसी परिस्थितियों में समस्याएँ बढ़ती गईं, परन्तु स्वामी जी ने संतों की संख्या में वृद्धि नहीं की और केवल दो संतों के साथ इस विशाल कार्य को पूरा किया।

ऐसा ही कुछ अमेरिका में हुआ, जो भारत से तीन गुना बड़ा और काफी बड़ा सत्संग वाला देश है। वर्षों से कई भक्त वहाँ बस गए हैं। इसके अलावा, शिकागो, ह्यूस्टन, अटलांटा, लॉस एंजिल्स, सैन जोस, डलास, आदि जैसे बड़े शहरों में विशाल मंदिरों का निर्माण करना काफी संभव था। फिर, अमेरिका के अलावा, कनाडा में भी सत्संग काफी व्यापक है। इसलिए टोरंटो में मंदिर बनाने के लिए परिस्थितियाँ अच्छी थीं। अमेरिका और कनाडा के भक्तों की इच्छा थी कि मंदिर निर्माण और अन्य सत्संग गतिविधियों की देखरेख के लिए संतों को उनके संबंधित देशों में पूरे समय रखा जाए। इस संबंध में स्वामीजी से एक अनुरोध भी किया गया था। उनके उचित अनुरोध को ध्यान में रखते हुए, स्वामीजी ने यज्ञवल्लभ स्वामी को एक संत के साथ वहाँ रहने का निर्देश दिया। इतने बड़े-बड़े देशों को एक-दो साधुओं की दृष्टि से देखना भले ही अचंभित करने वाला लगे, लेकिन स्वामी जी ने इतना बड़ा कार्य इन्हीं दो संतों को सौंप दिया।

इस प्रकार, ये संत उत्तरी अमेरिका में बस गए और समय के साथ, शिकागो, ह्यूस्टन, अटलांटा, लॉस एंजिल्स और टोरंटो में सुंदर पूर्ण पैमाने के मंदिरों का निर्माण किया गया और पूरे उत्तरी अमेरिका में 100 से अधिक छोटे हरि मंदिर स्थापित किए गए। प्रमुख स्वामी महाराज के लिए भी यह एक तरह का रिकॉर्ड है। वर्तमान में अक्षरधाम न्यू जर्सी राज्य के एक शहर रॉबिन्सविले में 260 एकड़ के परिसर में बनाया जा रहा है। सारा सार यह है कि स्वामी जी ने कभी भी अनेक संतों या भक्तों को कार्य पर लगाकर कोई कार्य नहीं किया। संस्था की स्थापना के समय से ही, स्वामीजी ने किसी भी कार्य के लिए कम से कम संतों और भक्तों की सेवा ली है। बेशक, जहां भी जरूरत पड़ी है, बहुत सोच-समझकर संख्या बढ़ाई गई है। यह एक ऐसी आंखें खोलने वाला प्रबंधन सिद्धांत है। लेकिन स्वामीजी ने हमेशा इसके द्वारा काम किया था।

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दिल्ली के आदर्श नगर में दोस्ती तोङने से नाराज़ युवक ने लङकी पर चाकुओं से किए ताबड़तोड़ कई वार

जब से अंग्रेजी नववर्ष 2023 की शुरुआत हुई हैं, जुर्म की दुनिया में देश की राजधानी दिल्ली अपनी नई गाथा गढ़ने में जोर शोर से जुटा हुआ है. कंझावला केस से शुरू हुई कहानी थमने का नाम नहीं ले रही हैं.जहां एक ओर अपराध का ग्राफ बढ़ता जा रहा है वहीं दिल्ली पुलिस की नाकामी एवं खोखले दावे भी प्रतियां भी परत दर परत खुलती दिखाई दे रही हैं, स्थानीय लोगों में गुस्सा और चिंता भी लाजमी हैं. कंझावला के शोर के बीच अब जुर्म की नई दस्तक दिल्ली के आदर्श नगर से सुनाई दे रही हैं जहां एक प्रेमी ने प्रेमिका से दोस्ती तोङने पर उस पर ताबड़तोड़ चाकुओं से 6 वार किए, घटना की पूरी विडियो घटनास्थल से कुछ दूर लगे CCTV में कैद हो गई हालांकि पीङिता को घायल अवस्था में बाबू जगजीवन राम अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां उसकी हालत स्थिर बताई जा रही हैं वहीं युवक की भी गिरफ्तारी हरियाणा के अंबाला से कर ली गई है।

जानिए क्या हैं पूरा मामला

आदर्श नगर कांड का CCTV फुटेज, विडियो: नवप्रवाह.कांम

यह घटना सोमवार 2 जनवरी की बताई जा रही हैं और मामला प्रेम प्रसंग से जुड़े होने की भी बात दिख रही हैं. यह भी कहा जा रहा है कि पीड़ित युवती एवं हमलावर युवक एक दूसरे को लगभग 5 वर्षों से जानते थे लेकिन लङकी के परिवार वालों को युवती से युवक की दोस्ती नहीं पसंद थी इसलिए परिजनों के कहने पर युवती ने धीरे धीरे युवक से किनारा करना शुरू कर दिया और आपस में बातचीत भी बंद कर इस बात से कथित तौर पर गुस्साऐं युवक ने युवती पर सरेआम चाकू से लगभग आधा दर्जन से अधिक वार किए इस हमलें में युवती बुरी तरह से घायल हो गई है और उसे अस्पताल में एडमिट कराया गया है, युवती की उम्र 21 वर्ष हैं वहीं हमला करने वाले शख्स का नाम सुखविंदर है तथा उसकी उम्र 22 वर्षीय हैं.यह पूरी घटना गली में लगे सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई एवं सीसीटीवी फुटेज सामने आने के बाद पुलिस ने मामले की छानबीन की और आरोपी सुखविंदर को गिरफ्तार कर लिया हैं पूरी वारदात के बाद आरोपी दिल्ली से अंबाला भाग गया था। पुलिस टीम अंबाला पहुंची और उसे अंबाला से तीन जनवरी को पकड़ लिया हैं वहीं पीङित लङकी जहांगीरपुरी के बाबू जगजीवन राम अस्पताल में भर्ती हैं जहां उसकी हालत स्थिर है और पुलिस मामले की आगे की जांच कर रही है।

पीङित लङकी ने पुलिस को दिया बयान

पीड़िता ने पुलिस को दिए बयान में कहा कि वह सोमवार दोपहर को कार ड्राइविंग सीखने के लिए घर से निकली थी। इसी दौरान आरोपी ने उसे बात करने के बहाने से बुलाया। दोनों बात करते हुए गली से गुजर रहे थे। इस दौरान आरोपी ने उससे दोस्ती तोड़ने की वजह पूछी और काफी गुस्से में आ गया तथा देखते ही देखते आरोपी ने युवती के गले, पेट और हाथ पर करीब आधा दर्जन ताबड़तोड़ वार कर दिए,21 वर्षीय पीड़िता परिवार के साथ केवल पार्क एक्सटेंशन क्षेत्र में रहती है तथा डीयू के एसओएल से बीए की पढ़ाई कर रही है। पीड़िता और आरोपी सुखविंदर के बीच दोस्ती पांच साल पुरानी हैं।

गुजरात के वङोदरा में चाइनीज मांझा बनी 30 वर्षीय युवक की मौत की वजह

नये साल के प्रथम दिन ही में गुजरात के वङोदरा शहर में हुई एक ह्दरविदारक घटना जिसमें पतंग उङाने वाली डोर बनी एक 30 वर्षीय युवक के मौत की वजह.मृतक का नाम राहुल बाथम हैं एवं वह वङोदरा के दंतेश्वर इलाके का रहने वाला था। अपने घर के किसी काम को संपन्न करके वह वापस अपनी बाइक पर घर की ओर जा रहा था जब वह  नवापुरा क्षेत्र के खंडोबा मंदिर के पास से गुजर रहा था, इसी बीच पतंग की डोर उसके गले से आरपार हो गई और गहरा घाव हो गया। सूत्रों के अनुसार पतंग की डोर से युवक का गला कट गया। और उसमें से बड़ी मात्रा में खुन बह रहा था। ऐसी हालत में युवक को तत्काल इलाज के लिए एसएसजी अस्पताल लाया गया। एसएसजी अस्पताल में कुछ देर इलाज के बाद युवक की मौत हो गई।
फिलहाल अंदाजा लगाया जा रहा है कि युवक की मौत चाइनीज धागे की वजह से हुई है

Benedict XVI Death: सबसे बड़े ईसाई धर्मगुरु रहे पूर्व पोप बेनेडिक्ट 16वें का 95 वर्ष की आयु में निधन,वैकिटन सिटी में ली अंतिम सांस

पोप बेनेडिक्ट 16वें

पूर्व कैथोलिक पोप बेनेडिक्ट 16वें का शनिवार को वेटिकन सिटी में निधन हो गया। उन्होंने 95 वर्ष की उम्र में अंतिम सांस ली, बढ़ती उम्र एवं निरंतर सेहत में गिरावट मृत्यु का कारण रही, वेटिकन चर्च के प्रवक्ता ने एक बयान में कहा कि हमें दुख के साथ सूचित करना पड़ रहा है कि पूर्व पोप बेनेडिक्ट 16वें का आज सुबह 9:34 बजे वेटिकन के मैटर एक्लेसिया मठ में निधन हो गया।

बेनेडिक्ट 16वें का जन्म जर्मनी में हुआ था और उनका बचपन का नाम जोसेफ रैत्जिंगर (Joseph Ratzinger) थी। बेनेडिक्ट को 2005 में वेटिकन सिटी का पोप चुना गया था। उस समय उनकी उम्र 78 वर्ष की थी और वह सबसे उम्रदराज पोप में से एक थे साथ ही बेनेडिक्ट 1,000 वर्षों में पहले जर्मन पोप थे। उन्होंने करीब आठ साल तक रोमन कैथोलिक चर्च के पोप भी रहे उन्होंने निजी कारणों से 2013 में पद छोड़ दिया था और सन 1415 में ग्रेगरी XII के बाद इस्तीफा देने वाले पहले पोप बने थे।उनके उत्तराधिकारी पोप फ्रांसिस के साथ उनके संबंध मधुर रहे थे।

“जन उत्थान के गेम चेंजर थे प्रमुख स्वामी जी महाराज” — साधु अमृतवदन दास जी

पृथ्वी के पूरे इतिहास में, कुछ व्यक्तियों और विचारों ने मानव जीवन, समाज की संरचना और समय के प्रवाह को बदल दिया है।

उदाहरण के लिए जोहान्स गुटेनबर्ग और उनका प्रिंटिंग प्रेस। एडिसन और बिजली की रोशनी। एंड्रयू फ्लेमिंग और एंटीबायोटिक पेनिसिलियम या दुनिया का पहला आधुनिक कंप्यूटर। इस लिस्ट में इंटरनेट भी शामिल है। लोग ऐसे महान लोगों और विचारों को गेम चेंजर कहते हैं। क्योंकि उनकी दूरदर्शिता, इच्छा शक्ति और करिश्माई व्यक्तित्व ने समाज की मुख्य विचारधारा को बदल कर रख दिया है. उनकी वजह से दुनिया में कई चमत्कार होते हैं और दुनिया को एक नई दिशा मिलती है। लोगों के आवास में सकारात्मक बदलाव आया है। जीवन आसान हो गया है। Amazon के फाउंडर और अरबपति जेफ बेजोस को गेम चेंजर कहा जाता है। 1990 में उन्होंने अमेजॉन कंपनी की शुरुआत की। 1990 के दशक में यह ई-कॉमर्स कंपनी वेबसाइट किताबें बेच रही थी। जिसमें उन्हें काफी फायदा हुआ। फिर इससे एक बड़ी रिटेल कंपनी बनाई गई और इसने दुनिया के काम करने के तरीके को बदल दिया। अब कहा जाता है अमेजॉन एक भरोसेमंद नाम हो गया है । उन्हें केंद्र में रखकर हजारों कंपनियों ने अपना धंधा शुरू किया है।

प्रमुख स्वामी महाराज ऐसे ही एक गेम चेंजर व्यक्ति थे। उन्होंने पूरी दुनिया में करीब 1200 मंदिर बनाए। वैसे तो प्राचीन काल से ही भारत में मंदिरों की कमी नहीं रही है। यहां तो लाखों मंदिर हैं। उनमें से कुछ बहुत विशाल हैं और अद्भुत कलाकृति से सजाए गए हैं। उदाहरण के लिए बेलूर, हालीबेड , गुरुर वायुर, मीनाक्षी मंदिर, खजुराहो आदि के मंदिर वास्तव में दर्शनीय हैं। आश्चर्य होता है कि यह उस समय बहुत कम उपकरणों के साथ कारीगरों ने ऐसे अलंकृत मंदिर कैसे बनाएं !? अक्षरधाम का निर्माण प्रमुख स्वामी महाराज ने किया, यह अकल्पनीय है, लेकिन परिष्कृत उपकरणों के सटीक उपयोग के साथ इसमें प्रस्तुत सांस्कृतिक-आध्यात्मिक प्रदर्शन दुनिया में अद्वितीय है। यही इसकी विशेषता है। इसने पूरी दुनिया में निर्माणाधीन धार्मिक परिसरों में आमूल परिवर्तन किया है। सदियों तक किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि एक मंदिर परिसर में आधुनिक तकनीक के भव्य उपयोग से भारतीय संस्कृति और मूल्यों को इतने मूर्त रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। सब कुछ बहुत सुंदर और प्रेरक है। इस आर्ष दृष्टि का उपयोग करके स्वामीजी ने बहुत लंबे समय तक एक विचार को मूर्त रूप दिया। उन्होंने दुनिया को यह भी दिखाया कि उपलब्ध तकनीक का अगर अच्छे और शुभ तरीके से उपयोग किया जाए तो वह वरदान है। इस प्रकार वे और अक्षरधाम गांधीनगर दोनों गेम चेंजर बन गए।

अब पूरी दुनिया उनके पीछे चल रही है। दिल्ली या न्यूजर्सी के रॉबिन्सविल में निर्माणाधीन अक्षरधाम, या सूरत में बननेवाला अक्षरधाम आदि एक अति सूक्ष्म विचार के बड़े रूप हैं। किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि ऐसा कुछ हो सकता है। अब पूरे भारत में ऐसा है कि कोई भी मेहमान बाहर से आए तो उसे अक्षरधाम के दर्शन जरूर कराएं।

हमारे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्रभाई मोदी ने भी इस अक्षरधाम की महिमा को महसूस किया है। 10 अप्रैल 2017 को, उन्होंने अक्षरधाम के बारे में ऑस्ट्रेलियाई प्रधान मंत्री मैल्कम टर्नबुल से बात की। मोदी जी ने श्री टर्नबुल को बताया कि यह जगह देखने लायक है। मोदी साहब न केवल बात करते हैं बल्कि वे टर्नबुल साहब के साथ अक्षरधाम के विशेष दर्शन के लिए आते हैं।

यह वास्तव में प्रशंसनीय है कि एक धार्मिक स्थल लोगों की मानसिकता में इतना बड़ा बदलाव ला सकता है। दिल्ली में और दिल्ली के बाहर कई लोग हैं जो यह कहते हैं कि हम हमेशा अपने मेहमान या दोस्त को अक्षरधाम दिखाने के लिए लाते हैं। कुछ साल पहले आम जनता कहा करती थी कि दिल्ली में और उसके आसपास कोई ऐसी खूबसूरत जगह नहीं है जो हिंदू संस्कृति, मानवीय संस्कृति और सद्भावना को प्रदर्शित करे और मनाए।

Akshardham Mandir

अक्षरधाम का निर्माण कर प्रमुख स्वामी महाराज ने स्थानीय लोगों, पर्यटकों और तीर्थयात्रियों की यात्रा योजना में बदलाव किया है। उनकी यात्रा योजना में अक्षरधाम सबसे आगे आ गया है। स्वामी जी द्वारा बनवाया गया ऐसा ही एक गेम चेंजर स्थान है लंदन का बेहद खूबसूरत और अनोखा बेप्स स्वामीनारायण मंदिर । यह मंदिर ने विदेशों में सभी धार्मिक परिसरों के निर्माण में सबसे श्रेष्ठ काम किया है। यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि भारतीय वास्तुकला और शिल्पकला में इतना सुंदर और समृद्ध कोई दूसरा स्थान नहीं है। कई लोग कहते हैं कि पूरे यूरोप में ऐसी कोई जगह नहीं है। निस्डन क्षेत्र एक ऐतिहासिक स्थल नहीं है। कहा जाता है कि लंदन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल एक बार यहां से गुजरे थे और उन्होंने अपनी कार की खिड़की खोलकर अपने सिगार की राख को यहीं कहीं फेंक दिया था।

निस्डन क्षेत्र में मंदिर पर बसने से पहले पूरे लंदन में संगठन द्वारा लगभग 40 स्थलों को देखा गया था। लेकिन वहां किसी कारणवश मंदिर के लिए उपयुक्त स्थान नहीं मिला। वर्षों के इंतजार के बाद इस अलोकप्रिय स्थान पर यहां जगह मिली और स्वामीजी ने बहुत ही कम समय में अजीबोगरीब मंदिर का निर्माण करवाया। इससे यह क्षेत्र रातोंरात बहुत प्रसिद्ध हो गया और हजारों-लाखों लोग मंदिर को देखने के लिए कतार में लग गए। बड़ी-बड़ी हस्तियां भी सामने से आने लगीं। इंग्लैंड के कोने-कोने में बेप्स स्वामीनारायण मंदिर का नाम गूंजने लगा। यह स्थापित किया गया है और विदेशी धरती पर सबसे अच्छे स्थानों में से एक साबित हुआ है। इससे दूसरों को भी ऐसे कई स्थान बनाने की प्रेरणा मिली है। लंदन के मंदिर के लिए कहा जाता है कि ऐसा स्थान सदियों में एक बार आता है। यानी लंदन बेप्स स्वामीनारायण मंदिर एक ऐसा अनोखा मंदिर है जो हजारों सालों में सिर्फ एक बार बना है। ऐसे थे गेम चेंजर प्रमुख स्वामी महाराज और जन उत्थान के उनके असंख्य कार्य।

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“सफलता व असफलता, दोनों पर सहज भाव अभिव्यक्ति रखने वाले प्रमुख स्वामी जी महाराज” – साधु अमृतवदन दास जी

गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई ने हाल ही में स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के एमबीए छात्रों को नेतृत्व की महत्वपूर्ण सलाह दी।

उनकी एक सलाह बहुत छोटी चार शब्दों की सलाह थी। उन्होंने कहा कि प्रयासों को पुरस्कृत करें, परिणाम नहीं। प्रयास की प्रशंसा करें परिणाम की नहीं। उन्होंने इसमें यह भी जोड़ा कि कोई कंपनी या कोई संस्था आपके रिजल्ट देखकर ही किसी शख्स को अवॉर्ड देती है। ऐसा करने से इस बात की बहुत अधिक संभावना है कि कंपनी आगे चलकर रूढ़िवादी हो जाएगी और बेहद स्वार्थी और अवसरवादी भी हो जाएगी। आज के ऑफिस कल्चर में कॉरपोरेट कल्चर में यह देखा जाता है कि अच्छा प्रदर्शन करने वालों को कैश, ट्रॉफी या सर्टिफिकेट देकर पुरस्कृत किया जाता है। यह एक अच्छी बात है क्योंकि यह एक व्यक्ति को बेहतर प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करती है।

लेकिन यह भी होता है कि जिस कर्मचारी ने थोड़ा कम प्रदर्शन किया है वह अक्सर उपेक्षित हो जाता है। यह व्यक्ति को दिल टूटने का एहसास कराता है। कई बार ऑफिस पॉलिटिक्स के कारण सही मायने में योग्य व्यक्ति को पुरस्कार नहीं मिल पाता है और योग्य व्यक्ति ताज ले लेता है। गैलप के एक सर्वेक्षण के अनुसार, एक तिहाई से भी कम अमेरिकी कर्मचारियों की उनके बॉस द्वारा प्रशंसा की जाती है। काम की तारीफ न करना कर्मचारी और कंपनी दोनों के लिए बुरा है। यदि किसी व्यक्ति को उसके प्रयासों के लिए पीठ थपथपाई जाए, तो उसकी उत्पादकता में 10% से भी कम की वृद्धि होती है। यदि उसकी सराहना नहीं की जाती है तो वह चुपके से दूसरी कंपनी में जाने की तैयारी भी करता है।
व्यक्तिगत प्रशंसा देकर..
1) व्यक्ति में उन्नति की भावना बढ़ती है।
2) यह उसकी सकारात्मकता को बढ़ाता है।
3) यह उनमें डोपामाइन भी बढ़ाता है जिससे वे गर्व और खुशी महसूस करते हैं।
4) कार्यकर्ता में ऑक्सीटोसिन बढ़ जाता है जिसके परिणामस्वरूप उसके काम पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
सच्ची प्रशंसा के इतने फायदे होते हैं जो एक अच्छा भावुक नेता जानता है।

प्रमुखस्वामी महाराज स्तुति की परिभाषा अच्छी तरह जानते थे। वह उन लोगों की सराहना करते हैं और उन्हें बधाई देते हैं जो बड़े प्यार से उनके रिश्ते में आते हैं। साथ ही ये व्यक्ति को बहुत अच्छे से आगे बढ़ने का कोमल संदेश भी देते थे। इस संबंध में प. चिन्मयस्वामी स्वयं एक बहुत ही प्रेरक प्रसंग बताते है। स्वामीजी को संतों का संस्कृत पढ़ना अच्छा लगता था। वे संतों को पत्र या व्यक्तिगत रूप से संस्कृत सीखने के लिए प्रोत्साहित करते थे। उस समय मुंबई के मंदिर में एक संस्कृत विद्यालय शुरू किया गया था। साथ ही, पंडितों को उच्च वेतन पर रखा जाता था ताकि संत सीख सकें।

Pramukh Swami ji Maharaj at inauguration ceremony of BAPS Swaminarayan Mandir in Atlanta USA

संस्कृत का अध्ययन करने वाले संतों को अध्ययन करने की छूट देने के लिए, कुछ समय के लिए गाँव की उनकी तीर्थ यात्रा को रोक दिया गया था। भवन की पूरी चौथी मंजिल वाचनालय, पुस्तकालय और विद्यालय के लिए आवंटित की गई थी ताकि अक्षर भवन में पढ़ने वाले संत पूरी तरह से अपनी पढ़ाई में लग सकें। इन सब सुविधाओं के होते हुए भी कुछ अत्यंत सामान्य परिस्थितियों के कारण 1984 में हुई व्याकरण शास्त्री प्रथम श्रेणी की परीक्षा में वे अनुत्तीर्ण हुए । वे सोचने लगे कि यह बात स्वामी जी को कैसे बताई जाए । फिर उन्होंने पत्र लिखकर स्वामी जी से क्षमा माँगी। स्वामीजी उस समय अमेरिका की धर्मयात्रा पर थे। पत्र मिलने के बाद उन्होंने मैसाचुसेट्स सिटी से जवाब लिखा। इधर मुंबई में चिन्मय स्वामी के हाथों में कवर मिलते ही उनके हाथ थोड़े काँपने लगे। स्वामीजी ने पत्र में क्या लिखा होगा? स्वामी जी दुःखी तो नहीं हैं ? उन्होने घबरा कर पत्र पढ़ने की शुरुआत की ।

स्वामीजी ने लिखा था ..
‘शा. नारायणस्वरुपदास के जय स्वामीनारायण।
आप बाई और से उत्तीर्ण हुए हैं तो आशीर्वाद है। अब मजबूत रहो और फिर से कोशिश करो। शांति रहे ऐसा आशीर्वाद है। (दिनांक 21.7.84)’

स्वामीजी के ऐसे अकल्पनीय, अद्वितीय और आनंदमयी पत्र से चिन्मय स्वामी मुग्ध हो गए। तब उन्होंने निश्चय किया कि वे बड़ी मेहनत से संस्कृत का अध्ययन करेंगे और विद्वान बनकर संस्था और समाज की सेवा करेंगे । वे चतुर तो थे ही, और अब स्वामी जी के इतने अंतरंग पत्र से उनकी मेहनत करने की भावना तेज हो गई थी। यह स्वामी जी की विशेषता थी कि उन्होंने हमेशा एक सफल प्रयास को पुरस्कृत किया और इतने छोटे से असफल प्रयास को भी सहजता से लिया और इसके लिए बहुत अच्छे मजाकिया शब्दों के साथ व्यक्ति की सराहना की और आगे बढ़ने के लिए मीठी प्रेरणा भी दी। ऐसे थे प्रमुखस्वामी महाराज। अगर हम भी उनसे सीख लें तो हम किसी के छोटे या असफल प्रयासों को कम नहीं आंकेंगे। बच्चों को विशेष रूप से बेहतर करने के लिए धमकाए जाने या डराने के बजाय इस उपाय को आजमाना चाहिए।

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“सानिध्य में आए प्रत्येक व्यक्ति का नाम स्मरण रखने वाले विलक्षण संत प्रमुख स्वामी जी महाराज” -साधु अमृतवदन दास जी

किसी भी भाषा में व्यक्ति का नाम सबसे मधुर और सबसे महत्वपूर्ण ध्वनि है।

जैसा कि प्रसिद्ध मोटिवेशनल लेखक और वक्ता डेल कार्नेगी ने कहा है, “किसी भी भाषा में बोला जाने वाला अपना नाम सबसे प्यारा और सबसे महत्वपूर्ण होता है।”

पैम सोलबर्ग-टेपर, जो कंपनी कोच फॉर सक्सेस चलाती हैं, अपने व्यापक अनुभव के आधार पर कहती हैं कि जब आप किसी को नाम से बुलाते हैं, तो यह दर्शाता है कि आप उनमें रुचि रखते हैं। उन्हें भी लगता है कि यहां उनकी इज्जत बरकरार है और यहां उनकी कद्र है । यह रिश्तों को मजबूत करता है और एक नया विश्वास लाता है। कहा जाता है कि सिकंदर महान अपने सैनिकों को नाम से बुलाता थे । उसके पास 20,000 सैनिक थे। वह अपने देश मैसेडोनिया से अनेक देशों को जीतकर भारत आए थे । यहां इतिहास दर्ज है कि उसकी सेना में सैनिकों की अदला-बदली हुई थी। जब भी वह कोई देश एवं क्षेत्र में विजय प्राप्त करते थे , तो वहां के सैनिक उसकी वीरता की प्रशंसा करते थे और उसकी सेना में शामिल हो जाते थे। अतः स्वाभाविक है कि उन सभी के नाम स्थानीय भाषा में होते थे । फिर भी सिकंदर ने उनके नाम याद रखते थे , या याद रखने की कोशिश अवश्य करते थे । उसकी इस विशेषता से उसकी विशाल सेना उन्हें वशीभूत हो गई थी।

यह कोई सामान्य बात नहीं है। अद्वितीय व्यक्तित्व वाले व्यक्ति में ही ऐसी विशेषता होती है। हम तो किसी से पांच मिनट बात करने में दस बार नाम पूछ पूछते हैं, लेकिन दूसरी बार मिलने पर नाम याद करने के लिए सिर खुजला लेते हैं। नाम में कुछ नहीं ऐसा नहीं । किंतु अब तो सब कुछ नाम ही में है।

प्रमुख स्वामी महाराज प्रतिदिन अनेक लोगों से मिलते थे। यह मिलनेवाली का नाम, गांव और काम आदि पूछना उनका स्वभाव था। क्योंकि वे जिससे भी मिलते थे, उनसे उनका विशेष लगाव होता था। वर्षों तक वे अपने संपर्क में आने वालों का मानसिक रूप से स्मरण रखते थे। फिर जब वे लंबे समय के बाद उनसे मिलते हैं, तब भी उन्हें नाम गांव का नाम याद रहता था । हमारे यहां उन्हें 25,000 या 50,000 नाम याद थे ऐसा कोई दावा नहीं करते है लेकिन एक बात तय है कि उन्हें करीब-करीब कोई भी शख्स और उसकी डिटेल याद रहती है। स्वामी जी अपने विचरण के दौरान मिलने वाले प्रत्येक व्यक्ति को याद रखते थे। स्वामीजी चाहे स्थिर हो या विचरण में हो उन्हें हमेशा याद रहता था ।

baps swaminarayan temple london
BAPS स्वामीनारायण मन्दिर, लंदन

एक बार स्वामीजी लंदन में थे। सत्संग का लाभ लेने के लिए दक्षिण अफ्रीका के डरबन से कुछ श्रद्धालु यहां आए थे। उनमें से दो छोटे भाई विजय और देवेश प्रतिदिन सत्संग में आकर स्वामीजी से मिलते थे। एक बार एक अकेला विजय उनसे मिलने आया। स्वामीजी ने उन्हें प्रेमपूर्वक आशिष दिए और उन्हें अकेला देखकर पूछा, ‘विजय! देवेश आज क्यों नहीं आया?’ विजय ने कहा ‘ स्वामी जी ! आज वह अपने दोस्त से मिलने गया है।’ स्वामीजी ने उन्हें आशीर्वाद दिया। वहाँ से जाते समय छोटे किन्तु बुद्धिमान विजय ने सोचा कि स्वामीजी प्रतिदिन अनेक हरिभक्तों से मिलते हैं। उनमें से कुछ तो बहुत बड़े लोग होते है । इन सब में हम डरबन से आए हैं और बहुत छोटे हैं, लेकिन स्वामीजी को हमारे दोनों भाइयों के नाम याद हैं। उसने यह बात अपने छोटे भाई देवेश को बताई। देवेश भी बहुत प्रभावित हुआ कि स्वामीजी ने मुझे नाम से याद किया। यह बात उसे मनमें लग गई कि स्वामी जी मुझे याद करते है । फिर वह प्रतिदिन स्वामीजी के दर्शन के लिए पहुंच जाता और उनका आशीर्वाद भी अवश्य लेने लगा । इस प्रकार स्वामीजी उनसे मिलने आने वालों के नाम याद किया करते थे।

स्वामीजी 31.12.2010 को मुंबई में थे। यहां भी वे प्रतिदिन आगंतुकों से मिलते थे। एक वृद्ध हरिभक्त दर्शन के लिए कतार में आए। वह अमेरिका के रहने वाले थे । स्वामीजी को देखकर उन्होंने प्रणाम किया और कहा, ‘अटलांटिक सिटी से जय स्वामीनारायण।’ स्वामीजी ने तुरंत उन्हें पहचान लिया और कहा, ‘तुम्हारा नाम अरविंद है?’
‘हाँ।’
‘क्या आप भादरण गांव से हैं?’
‘हाँ।’
‘क्या आपके पिता का नाम गोरधनभाई हैं?’
‘हाँ।’
स्वामीजी के मुख से अपना नाम, गाँव और पिता का नाम सुनते ही अरविन्दभाई की आँखों से आँसू गिरने लगे।

23.2.2006 को स्वामीजी विद्यानगर में थे। यहां एक बार वेदपुरुष स्वामी सभी छात्रों का स्वामी जी से परिचय करा रहे थे। उसमें एक छात्र मितेश खड़ा हो गया। वेदपुरुष स्वामी ने उनका परिचय दिया और कहा, ‘यह मितेश है और वह जेसंगपुरा गाँव का है।’ स्वामी जी ने पूछा, ‘नरसिंह भाई वाला जेसंगपुरा?’ मितेश ने हाँ कहा, तो स्वामीजी ने कहा, ‘तुम्हारा नाम मितेश है। मितेश के पिता रमेश। रमेश के पिता नरसिंहभाई और नरसिंह के पिता नारायणभाई थे । नरसिंह छोटे और गिरधर बड़े भाई थे. वे सभी बहुत पुराने सत्संगी। शास्त्री जी महाराज के समय से उनका सत्संग।’ यह कहकर स्वामीजी ने मितेश से पूछा, ‘गजानन कहाँ है?’ मितेश ने बताया , ‘ स्वामी जी ! वे मेरे घर के बगल में रहते हैं।’ स्वामीजी कहते हैं, ‘यह नरसिंहभाई हमारे देवचरण स्वामी के मामा हैं।’ स्वामी जी के मुख से नाम का जाप सुनकर कमरे में उपस्थित संत व विद्यार्थी अवाक रह गए।

मैंने कई हरिभक्तों से सुना है कि स्वामीजी मेरे पूरे परिवार को जानते हैं। यदि आप उन्हें मेरा नाम बताते हैं, तो वे मुझे तुरंत पहचान लेंगे। प्रमुख स्वामी महाराज का प्रातः स्मरणीय नाम आज हमारे होठों पर है क्योंकि हम सभी के नाम, गांव और काम उनके दिल और होठों पर थे।

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