भारतीय प्रौद्योगिकी संसथान दिल्ली और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस इंडस्ट्रियल साइंस एंड टेक्नोलॉजी ने कोरोना के इलाज को लेकर एक शोध किया है। इस शोध में एक अच्छी खबर सामने आई है। इस संयुक्त शोध में पाया गया है कि अश्वगंधा से कोरोना वायरस के लिए एक प्रभावी दवाई बनाई जा सकती है।
आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी अश्वगंधा (विथानिया सोम्नीफेरा) कोविड-19 संक्रमण के खिलाफ एक प्रभावी चिकित्सीय और निवारक दवा बन सकती है। शोध के दौरान पाया गया कि अश्वगंधा और प्रोपोलिस (मधुमक्खियों द्वारा अपने छत्ते को रोधक बनाने के लिए इस्तेमाल किया गया सलाइवा) में कोरोना वायरस के लिए प्रभावी दवा बनाने की क्षमता है।
आईआईटी दिल्ली में बॉयोकेमिकल इंजीनियरिंग एंड बॉयोटेक्नोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रोफेसर डी. सुंदर के अनुसार, आयुर्वेद का प्रचलन भारत में हजारों वर्षों से है। बीते एक दशक से आईआईटी दिल्ली व एआईएसटी के शोधार्थी आधुनिक तकनीकों के साथ पारंपरिक ज्ञान के साथ अध्ययन में जुटे हैं।
शोध में यह बात सामने आई है कि अश्वगंधा के एक केमिकल कंपाउंड विथानोन में यह क्षमता है कि कोरोना वायरस के शरीर में चल रहे रेप्लीकेशन को नियंत्रित कर सकता है। इसके साथ ही मधुमक्खी के छत्ते के अंदर भी एक केमिकल कंपाउंड कैफिक एसिड फेनेथाइल ईस्टर (सीएपीई) का पता लगा है, जो कि सॉर्स सीओवी-2 एम प्रो की मानव शरीर में चल रही गतिविधि को रोक सकता है। फिलहाल ये स्टडी समीक्षाधीन है और निकट भविष्य में प्रकाशित होने की उम्मीद है।
श्रमिक स्पेशल ट्रेनों के लिए अब राज्यों की अनुमति की ज़रूरत नहीं -रेलवे
ब्यूरो | navpravah.com
अब श्रमिक स्पेशल ट्रेनों को चलाने के लिए संबंधित राज्यों की मंजूरी की जरूरत नहीं है। रेलवे मन्त्री पीयूष गोयल ने इस बात की जानकारी ट्वीट करके दी। गृह मंत्रालय ने कुछ दिन पहले प्रवासी श्रमिकों को उनके गृह राज्यों में पहुंचाने के लिए इन ट्रेनों को चलावाने के लिए रेलवे के लिए स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग सिस्टम को जारी किया था।
आज रेलवे के प्रवक्ता राजेश बाजपेयी ने बताया कि नई एसओपी के बाद श्रमिक विशेष ट्रेनों को चलाने के लिए राज्यों की सहमति की आवश्यकता नहीं होगी, अब ट्रेन बिना राज्यों के सहमति से भी चलायी जायेगी।
रेल मंत्री पीयूष गोयल ने आज ट्वीट कर बताया कि ‘पश्चिम बंगाल, झारखंड और छत्तीसगढ़ इन ट्रेनों को मंजूरी देने के मामले में पीछे हैं। अब तक 20 लाख से अधिक प्रवासियों को उनके गृह राज्यों में पहुंचाया गया है।
कोच में यात्रियों को सोशल डिस्टेंसिंग के साथ बैठाया जा रहा है, रवानगी और संबंधित स्टेशन पर पहुंचने पर उनकी थर्मल स्क्रीनिंग की जाएगी। गृह जिले में 14 दिन क्वारैंटाइन करने के बाद ही उन्हें घर भेजा जाएगा। रास्ते में शुरुआती और आखिरी स्टेशन के बीच में ट्रेनें कहीं नहीं रुकेंगी।
प्रियंका वाड्रा द्वारा श्रमिकों के लिए एक हज़ार बसों की सहायता का मामला हास्यास्पद मोड़ लेता जा रहा है। भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने एक ट्वीट में लिखा कि प्रियंका वाड्रा ने श्रमिकों की सहायता के लिए एक हज़ार बसों के इंतज़ाम की बात कही थी, लेकिन उनकी लिस्ट में एम्बुलेंस, कार, रिक्शा और मोटरसाईकिल शामिल हैं।
प्रियंका वाड्रा ने जो “तथाकथित” बसों की लिस्ट सौंपी है ..उसमें काफ़ी गाड़ियाँ “unfit” है ..कुछ Ambulance है,कुछ Car,कुछ ट्रैक्टर और स्कूटर RJ 27 PA 9852 ambulance RJ14TD 1446 CAR RJ40PA 0186 THREE Wheeler RJ40PA 0123 AUTO RICSHA RJ34 PA 2938 AUTO RJ14PA 1932 AUTO इस में भी घोटाला
प्रियंका वाड्रा द्वारा श्रमिकों की सहायता के लिए हज़ार बस देने के वायदे को भाजपा हवाबाज़ी बता रही है। भाजपा नेता संबित पात्रा ने कहा कि यह देश के श्रमिकों का मखौल किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि जब देने की मंशा न हो, तो उस पर राजनीति करने की क्या आवश्यकता है। इससे देश के श्रमिकों का अपमान होता है, जो कि निंदनीय है। बसों की जगह रिक्शा और मोटरसाईकिल का नम्बर देना अशोभनीय है।
ज्ञातव्य है कि श्रमिकों की सहायता के लिए कांग्रेस नेत्री प्रियंका वाड्रा ने यूपी सरकार को एक हज़ार बस देने की बात कही थी, जिसे उत्तर प्रदेश सरकार ने स्वीकार कर लिया था।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने विश्व स्वास्थ्य संगठन को एक बार फिर से झटका दिया है। उन्होंने संगठन के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस ग्रेबियेसस को पत्र लिखकर कहा है कि अगर अगले 30 दिनों में संगठन कोई ठोस कदम नहीं उठाता, तो अमेरिका अपनी फंडिंग स्थायी रूप से रोक देगा।
यही नहीं डोनाल्ड ट्रम्प ने संगठन में अपनी सदस्यता पर भी पुनर्विचार करने की बात कह डाली। दुनियाभर में कोरोना फैलने पर संगठन के रूख को लेकर अमेरिका नाराज़ है। ग़ौरतलब है कि अमेरिका पहले ही डबल्यूएचओ की फ़ंडिंग अस्थायी रूप से रोक चुका है।
This is the letter sent to Dr. Tedros of the World Health Organization. It is self-explanatory! pic.twitter.com/pF2kzPUpDv
अमेरिका ने यह भी आरोप लगाया है कि चीन के कहने पर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दुनिया को महामारी के बारे में देरी से बताया। हालांकि ऐसे आरोपों के विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सिरे से खारिज किया है।
इसके पहले भी डोनाल्ड ट्रम्प डबल्यू॰एच॰ओ॰ पर कई हमले कर चुके हैं। वे संगठन पर चीन के प्रति पक्षपाती होने का आरोप लगा चुके हैं। कई बार ट्रम्प यह भी कह चुके हैं कि डबल्यू॰एच॰ओ॰ को हम सब से अधिक पैसे देते हैं, लेकिन संगठन चीन के सुर में सुर मिलाता नज़र आता है।
कोरोना वायरस से अब तक अमेरिका में सबसे ज्यादा मौतें हुई हैं और संक्रमण का आंकड़ा भी यहीं सबसे ज्यादा है। अमेरिका में अब तक करीब एक लाख लोगों की मौत हो चुकी है और 15 लाख से ज्यादा लोग कोरोना वायरस से संक्रमित हैं।
भारत की अभी कोरोना से लड़ाई ख़त्म हुई नहीं कि एक और ख़तरनाक बीमारी के दस्तक से लोगों की चिंता बढ़ने लगी है। कावासाकी नामक एक बीमारी भारत में घुस चुकी है, जिसने अपना पहला शिकार बनाया है चेन्नई के एक आठ साल के बच्चे को।
यह बच्चा हाल ही में कोरोना संक्रमण के चलते चेन्नई के कांची कामकोटि चाइल्डस ट्रस्ट हॉस्पिटल लाया गया था, जहाँ वह आईसीयू (ICU) में भर्ती कराया गया था। इस बच्चे में जहरीले शॉक सिंड्रोम (शरीर में उत्पन्न होने वाले विषाक्त पदार्थों) और कावासाकी बीमारी (जिससे रक्त वाहिकाओं में सूजन आती है) के लक्षण मिले थे। मात्र आठ साल के बच्चे में कई बीमारियों के लक्षण मिले हैं, जिसमें से एक कावासाकी भी है। वहीं शुरुआती जांच में बच्चे के अंदर सेप्टिक शॉक के साथ निमोनिया, कोविड-19 पेनुमोनिटिस, कावासाकी रोग और विषाक्त शॉक सिंड्रोम के संभावित लक्षण मिले थे।
हालाँकि, चिकित्सकों ने बताया कि इस मामले में अच्छी बात यह है कि बालक को कोरोना संक्रमण समेत हाइपर-इन्फ्लेमेटरी सिंड्रोम को इम्युनोग्लोबुलिन और टोसीलीजुंबैब जैसी दवाओ से ठीक कर दिया गया है। वहीं अस्पताल ने यह भी दावा किया है कि पीड़ित बच्चे की गहन देखरेख की गई है और 2 सप्ताह में वह स्वस्थ हो गया है।
एक एक्सपर्ट ने बताया कि हाल ही में लंदन में भी आठ बच्चों में यह बीमारी मिली थी और वहीं अमेरिका में भी कई बच्चों में इसकी संक्रमण की शिकायतें मिली हैं।
क्या है कावासाकी?
कावासाकी शरीर की रक्तवाहिनियों से जुड़ी बीमारी है। इसके चलते रक्तवाहिनी की दीवारों में सूजन पैदा होती है, जो हृदय में रक्त पहुंचाने वाली धमनियों को बहुत कमजोर कर देती है।इसके चलते अटैक होने की भी संभावना रहती है। शुरुआती लक्षणों में खार के साथ त्वचा पर चकत्ते दिखना, हाथों और गले में सूजन और आंखों का लाल होना शामिल है।
अब भारत में कोरोना मरीजों की संख्या एक लाख के पार हो चुकी है। यहां 30 जनवरी को पहला संक्रमण का केस सामने आया था, आज देश में कोरोना संक्रमित मरीजों की कुल संख्या 101139 हो चुकी है। इस संक्रमण से अब तक 3163 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 39173 लोग इस संक्रमण से ठीक भी हो चुके हैं, और देश में अभी 58802 कोरोना के एक्टिव पेशेंट हैं, जिनका इलाज चल रहा है।
पिछले 24 घंटे में 4970 नए मामले सामने आए हैं, वहीं 134 मरीजों की मौत हुई है। भारत में मौत की दर 3.12 प्रतिशत है, भारत के अलावा 10 देशों में एक लाख से ज्यादा मरीज हैं। महाराष्ट्र में कोरोना के मरीज सबसे ज्यादा हैं, यहां मरीजों की संख्या 35 हजार के पार है, यहां मरने वालों की संख्या 1249 है, वहीं, गुजरात में कोरोना पीड़ितों का आंकड़ा 11 हजार 745 तक जा पहुंच चुका है।
भारत 11वां देश है जहां एक लाख से ज्यादा कोरोना संक्रमित मरीज हैं, अमेरिका, रशिया, यूनाइटेड किंगडम, स्पेन, इटली, ब्राजील, जर्मनी, तुर्की, फ्रांस और ईरान इन देशों में एक लाख से ज्यादा मामले हैं।
राजस्थान प्रदेश में अब तक 5 हजार 507 कंफर्म केस सामने आ चुके हैं, जिसमें 138 लोगों की मौत हो चुकी. मध्य प्रदेश में अब तक 5 हजार 236 मामले सामने आ चुके हैं, जिसमें 252 लोगों की मौत हो चुकी है। उत्तर प्रदेश में भी कोरोना मरीजों की संख्या में इजाफा हुआ है। अब यहां मरीजों की संख्या 4605 हो गई है, जिसमें 118 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं।
भारतीय सिनेमा का आसमान जितना बड़ा है, उतने ही ज़्यादा हैं, इसके सितारे, जो खो गए, जो बुझ जाने तक की उम्र भी पूरी न कर पाए। ये रंगीन आसमान, सिर्फ ख़ुशी और कामयाबी से ख़ूबसूरत नहीं, इसमें निराशा और असफलता के भी रंग हैं। इसका बहुत बड़ा कारण है, सिनेमा का हर दौर में बदलते रहना। कभी तकनीक बदल गए, तो कभी अंदाज़, कभी अदाकारों का तरीका बदला तो कभी निर्देशकों का। जो कलाकार ढल गए बदलते वक़्त के साथ, वो बचे रहे और जो दिल लगाकर डूब गए थे, उन्हें बदलते वक़्त का अंदाज़ा न लगा, और वे खो गए।
फ़िल्म ‘आलम आरा’ में मास्टर विट्ठल और जुबैदा
मास्टर विट्ठल का जन्म 1906 में, महाराष्ट्र में ही हुआ था और 18 साल की उम्र में ही ये, फ़िल्मों में, बतौर टेक्नीशियन काम करने लगे। काफ़ी कुछ फ़िल्मों के बारे में सीखा और 1926 में आई “रतन मंजरी” में इन्हें बहैसियत नायक, रोल मिला। इसके पहले ये बाबूराव पेंटर के साथ काम करते रहे थे और पहली फ़िल्म में ये महिला नर्तकी बन कर नाचे थे। फ़िल्म का नाम था, “कल्याण खजीना”।
मूक फ़िल्मों में जल्दी ही ये बहुत प्रसिद्ध हो गए। पहली सवाक् फ़िल्म, “आलम आरा”, 1931 में आई और उसके पहले मास्टर विट्ठल कई स्टंट फ़िल्मों में काम कर चुके थे और इन्हें, भारत का “डगलस फ़ेयरबैंक्स” कहा जाने लगा था। डगलस फ़ेयरबैंक्स अमरीकी मूक स्टंट फ़िल्मों के सुपरस्टार थे और यही रुतबा, मास्टर विट्ठल का भारत में हो चुका था। जब आर्देशिर ईरानी, “आलम आरा” बना रहे थे तो मास्टर विट्ठल के अलावा, और कोई शख़्स नहीं था, जिसे दर्शक, अपना नायक मानते। महबूब ख़ान ने भी इस पहली भारतीय बोलती फ़िल्म का नायक बनने की पूरी कोशिश की थी, लेकिन मास्टर विट्ठल की शोहरत, इतनी ज़्यादा थी कि हिन्दी बहुत ख़राब बोलने के बावजूद, इन्हें ही चुना गया।
“इस ऐतिहासिक फ़िल्म का नायक बनने की ख़ुशी इतनी बड़ी थी कि मास्टर विट्ठल ने ईरानी के सागर स्टूडियो के साथ काम करने के लिए, शारदा स्टूडियो से अपना पुराना अनुबंध तोड़ दिया और इनपर मुक़दमा हो गया। मास्टर विट्ठल की ओर से मुहम्मद अली जिन्ना वक़ील थे। ये मुक़दमा जीत भी गए। लेकिन अब बोलती फ़िल्मों का दौर आ चुका था।”
मास्टर विट्ठल मराठी फ़िल्मों तक ही सीमित हो कर रह गए। काम तो इन्होंने ख़ूब किया लेकिन ललिता पवार और दुर्गा खोटे जैसी अभिनेत्रियों के नायक के रूप में मराठी और मूक फ़िल्मों तक ही सीमित रहे।
मास्टर विट्ठल ने ही पहली बार 1928 की मूक फ़िल्म, “राज तरंग” में डबल रोल निभाया था और हिन्दी फ़िल्मों में भी, अपने निर्देशन में बनी, “आवारा शहज़ादा” में ,1933 में पहली बार डबल रोल की शुरुआत की थी।
फ़िल्म ‘हरिकेन स्पेशल’ में मास्टर विट्ठल और वत्सला कम्ठेकर
मास्टर विट्ठल, 1966 तक, बतौर अभिनेता, डायरेक्टर, निर्देशक, नृत्य और संगीत निर्देशक फ़िल्मों के लिए 42 साल तक काम किया। इन्होंने 90 से ज़्यादा फ़िल्मों में ऐक्टिंग की, 2 फ़िल्में निर्देशित की। लेकिन जैसे जैसे भारतीय सिनेमा, मौलिकता से अनुकरण की ओर बढ़ती गई, इस सितारे की चमक कम होती गई और संवाद के लिए बस एक भाषा में दक्ष होने के कारण भी ये सितारा खो गया। लेकिन बहुत कुछ दिया है मास्टर विट्ठल ने, भारतीय सिनेमा को और उन्हें एकदम भूल जाना, बिल्कुल ठीक नहीं।
(लेखक जाने-माने साहित्यकार, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)
जिस ठौर बैठे, महफ़िल सी हुई, वीरान सा लगे उठ जाए है जहाँ से, सब हंसे तो मासूम चेहरा लिए सबको हैरत से देखे और जब हैरत में पड़े हो सब, तो ख़ूब हंसे। न डर, न दिखावा, न तकल्लुफ़, न छलावा और बेबाक़ी ऐसी कि शहंशाह से भी बेअदबी कर बैठे, रहम इतना कि सबके दर्द पे रो ले। ऐसी बातें किसी फ़कीराना मिज़ाज शख़्स के बारे में लगती हैं, लेकिन ये बातें एक रईस ख़ानदान की उस औरत के बारे में है, जिसे एक दौर में, सारा हिन्दुस्तान, मौसी कह कर बुलाता था, वैसे उनका नाम था, लीला मिश्रा।
लीला मिश्रा
लीला मिश्रा, 1908 में उत्तर प्रदेश के रायबरेली में, एक बेहद अमीर, ज़मींदार ब्राह्मण परिवार में पैदा हुईं। इनकी तरबियत ऐसे माहौल में हुई जहाँ इनके मिज़ाज में राजसी ठसक भी थी और आला दर्ज़े के ब्राह्मण-संस्कार भी। इनकी ज़िंदगी का एक अरसा बनारस में भी गुज़रा और ये तो सब जानते हैं कि बनारस किसी का नहीं होता, सब बनारस के हो जाते हैं, तो इनके बारे में भी कई बार ये कहा जाता है कि ये बनारस की थीं। वो दौर महिलाओं के लिए बहुत अच्छा न था, सो लीला मिश्रा भी स्कूल न गईं और महज़ 12 साल की उम्र में इनकी शादी राम प्रसाद मिश्रा जी से हो गई।
फ़िल्म छोटे बाबू’ के एक दृश्य में लीला मिश्रा और कन्हैया लाल
राम प्रसाद मिश्रा एक आज़ाद ख़याल इंसान थे और वे भी ज़मींदार ख़ानदान से ही थे। इन्हें ऐक्टिंग का शौक़ था और मुंबई में नाटक भी किया करते थे। वहाँ, मामा शिंदे, जो फाल्के साहब के सहायक थे, इनके मित्र थे। जब राम प्रसाद मिश्रा, अपनी पत्नी लीला मिश्रा के साथ मुंबई रहने लगे, तो मामा शिंदे का उनके यहाँ, अकसर आना जाना होता था। एक बार मामा शिंदे ने कहा कि मिश्रा दम्पति, फ़िल्मों में क्यों नहीं काम करते। पहले तो राम प्रसाद मिश्रा जी ने मना किया, लेकिन फिर मान गए। वो ऐसा दौर था, जहाँ मर्द ही औरत बन कर फ़िल्मों में काम करते थे ज़्यादातर। जब ये दोनों तैयार हुए तो राम प्रसाद मिश्रा जी को 150 रुपये और लीला मिश्रा जी को 500 रुपये देने का क़रार हुआ। लेकिन दोनों ने कैमरे के सामने बेहद ख़राब ऐक्टिंग की और ये मौक़ा जाता रहा। ये 1920 के दशक की बात है।
“1926 में फ़िल्म “होनहार” में, शाहू मोदक, नायक थे और लीला मिश्रा, नायिका। एक सीन में इन्हें शाहू मोदक को पकड़ के कहना था कि, ” मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकती।” लीला मिश्रा, भड़क गईं और साफ़ मना कर दिया कि अपने पति के अलावा, वे किसी और से, ऐसा व्यवहार नहीं कर सकतीं। क़ानूनी तौर पर इनका क़रार इस तरीके का था फ़िल्म कंपनी के साथ कि वे इन्हें फ़िल्म से हटा नहीं सकते थे, सो उन्होंने, लीला मिश्रा को नायक की मां का किरदार दे दिया और ये ज़बरदस्त कामयाब किरदार रहा। इसके बाद लीला मिश्रा ने पूरी ज़िंदगी में 200 से ज़्यादा फ़िल्में की और हमेशा, दादी, नानी, चाची, मौसी के ही किरदार में ही नज़र आईं। “
“चित्रलेखा” से लेकर “प्यासा” तक और “कॉलेज गर्ल” से लेकर “मंझली दीदी” तक हर बार लीला मिश्रा ने अपने ज़बरदस्त अभिनय की छाप छोड़ी। इनको सबसे ज़्यादा शोहरत मिली, फ़िल्म, “शोले” से, जो 1975 में आई।
देखें फ़िल्म शोले का एक सीन:
1979 में आई, बासु चटर्जी की फ़िल्म, “बातों बातों में” इनका अभिनय देखकर और बाकी फ़िल्मों में भी इनकी अदायगी से प्रभावित होकर, सत्यजीत रे ने इनसे कहा कि वे उनकी फ़िल्मों में काम करें। लीला मिश्रा ने उनसे कहा कि “काम तो करूंगी, लेकिन मुंबई आ कर फ़िल्में बनाओ, मैं कलकत्ते नहीं जाऊंगी।”
फ़िल्म ‘सदमा’ में श्रीदेवी और लीला मिश्रा
लीला मिश्रा खाने पीने की बहुत शौक़ीन थीं और ख़ूब हंसते गाते, खाते पीते 1988 में वे इस दुनिया से चली गईं। आज भी जब कभी किसी सीन में लीला मिश्रा दिखती हैं, एक अजीब सा अपनापन महसूस होता है। इनकी सादगी और साफ़गोई आज तक किसी और कलाकार में नहीं दिखी।
(लेखक जाने-माने साहित्यकार, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)
दिल्ली उच्च न्यायालय ने बहुचर्चित “बॉयज लॉकर रूम” मामले में पुलिस को जांच में तेजी लाने और संबंधित निचली अदालत के सामने अंतिम रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है। पुलिस की तरफ से दिल्ली सरकार के वकील राहुल मेहरा और चैतन्य गोसाईं न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत हुए।
न्यायालय ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये मामले की सुनवाई करते हुए ज़िक्र किया कि साइबर क्राइम सेल और दिल्ली पुलिस द्वारा मामले की जांच की जा रही है।
उच्च न्यायालय ने उस याचिका का निपटारा कर दिया जिसमें ‘ब्वॉयज लॉकर रूम’ मामले में (SIT) स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम या सीबीआई से जांच कराने और दोषियों को अरेस्ट किये जाने के लिए निर्देश देने का अनुरोध किया गया था।
जिन लड़कियों व महिलाओं ने इस पूरे मामले को उजागर किया उनकी सुरक्षा का निवेदन भी याचिकाकर्ता देवाशीष दुबे ने न्यायालय के समक्ष किया था। याचिकाकर्ता के वकील दुष्यंत तिवारी व ओम प्रकाश परिहार द्वारा उस विवादित इंस्टाग्राम चैट एकाउंट के मेम्बर्स को फौरन अरेस्ट करने के लिए आदेश दिए जाने का अनुरोध किया गया।
दिल्ली पुलिस के साइबर सेल द्वारा मामले की कार्यवाही के दौरान ही विवादित चैट ग्रुप के 18 वर्षीय एडमिन को गिरफ्तार किया था, जो कि इस वर्ष12वीं की परीक्षा में सम्मिलित हुआ था।
लॉकडाउन के चौथे चरण के पहले दिन ही दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने सभी सरकारी और निजी दफ्तर खोलने का आदेश दे दिया। मुख्यमंत्री ने एक तरफ तो पूरी क्षमता के साथ दफ्तर खोलने की बात कह दी, दूसरी तरफ कहा कि कम्पनियाँ प्रयास करें कि ज़्यादातर कर्मचारी घर से काम करें। आज लॉकडाउन 4 का पहला दिन है, एक दिन पहले ही केंद्र ने लॉकडाउन के दौरान रियायतें देने का अधिकार राज्य सरकारों को सौंप दिया था।
गैदरिंग की अनुमति नहीं-
आज घोषणा करते समय मुख्यमंत्री केजरीवाल ने कहा कि पूरी क्षमता के साथ कंपनियों को काम करने की इजाज़त दी जा रही है, लेकिन किसी भी तरह की गैदरिंग करने की अनुमति नहीं होगी। केजरीवाल ने यह भी कहा कि दिल्ली के कन्टेंटमेंट जोन में किसी तरह की कोई गतिविधि की अनुमति नहीं होगी।
मुख्यमंत्री केजरीवाल ने दिल्ली के लिए छूट की घोषणा करते हुए साफ किया कि अभी मेट्रो स्टेशन, स्कूल, कॉलेज, शॉपिंग मॉल, स्विमिंग पूल, पार्क, थिएटर, बार, ऑडिटोरियम और असेम्बली हाल सब बंद रहेंगे। यहां तक सैलून और स्पा एवं धार्मिक स्थल भी बंद रहेंगे।
मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपने सम्बोधन में कहा कि दिल्ली में मामले ज़्यादा है, लेकिन यह अच्छी बात है कि रिकवर हो रहे लोगों की संख्या में इज़ाफ़ा हो रहा है। दिल्ली में 10,054 मामले आए हैं, जिसमें से लगभग 45% लोग ठीक भी हो गए हैं। हालांकि, 160 लोगों की मौत हो गई, जो नहीं होनी चाहिए थी। केजरीवाल ने कहा कि हम हर व्यक्ति की जान बचाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने जानकारी दी कि अन्य राज्य या देश की अपेक्षा दिल्ली में मौत कम है।
मुख्यमंत्री केजरीवाल ने कहा कि सरकार ने कोरोना महामारी से निपटने के लिए लॉकडाउन का भरपूर इस्तेमाल किया गया। इस दौरान स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत किया। उन्होंने कहा कि हमने केंद्र की गाइडलाइंस के तहत ढील देने का निर्णय किया है।