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Wednesday, August 5, 2026
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सावधान! मोबाइल-लैपटॉप का ज़्यादा इस्तेमाल पड़ सकता है भारी

अंधेरे में काम न करें
मोबाइल लैपटॉप पर ज़्यादा समय बिताने वाले परेशान

हेल्थ डेस्क | navpravah.com 

कोरोना वायरस की वजह से सरकार ने लॉकडाउन की शुरुआत 24 मार्च से की थी। निजी और सरकारी कंपनियों ने पहले ही कर्मचारियों को घर से काम करने की सलाह दे दी थी, अब आलम यह है कि महीनों से घर में दफ्तरों का काम कर रहे लोगों में आँखों से सम्बंधित शिकायतें सामने आ रही हैं।

एक ऑप्थेल्मोलॉजिस्ट ने बताया कि लोग आंखों की परेशानी से जूझ रहे हैं और वॉट्सऐप मैसेज, फोटो और कॉल कर परामर्श ले रहे हैं। डॉक्टर के अनुसार, मरीज बिना बाहर जाए भी आंखों में रेडनेस का शिकार हो रहे हैं।

आई स्पेशलिस्ट डॉक्टर कहते हैं कि आंखों की परेशानी से जूझ रहे लोगों की संख्या बढ़ी है। डॉक्टर ने बताया कि गर्मियों में ड्रायनेस के मामले ज्यादा सामने आते हैं और ज्यादा स्क्रीनटाइम भी इसका मुख्य कारण है, वहीं स्क्रीनटाइम जितनी ज्यादा होगी, उतनी ज्यादा लोगों में दिक्कत हो रही है।

एक्सपर्ट्स के मुताबिक ये हैं प्रमुख लक्षण –

1- लगातार कंप्यूटर और मोबाइल स्क्रीन पर काम या मूवी-गेम्स के कारण इरिटेशन की समस्या होती है। इस दौरान व्यक्ति को आंखों की मदद से कोई भी काम करने में असुविधा होती है।

2- आंखों में रेडनेस और खुजली भी हो सकती है, हालांकि एलर्जी और इंफेक्शन जैसे कई कारणों से आंखों में रेडनेस की परेशानी हो सकती है।

3- गर्मियों में ड्रायनेस आम परेशानी है, ड्रायनेस ज्यादा बढ़ने पर मेडिकल एक्सपर्ट की सलाह लें।

4- आंखों में से पानी आने के कारण भी एलर्जी, इंफेक्शन, चोट हो सकते हैं, लगातार स्क्रीन पर काम करने के कारण आंखों से पानी आने की परेशानी हो सकती है।

चिकित्सक की सलाह –

1- अंधेरे में काम न करें

2- एसी में काम करने से बचें

3- एंटीग्लेयर का इस्तेमाल

4- काम करते वक्त ब्रेक लें

5- अगर चश्मा लगा है तो उसका उपयोग करें

Input: Saumya Kesarwani 

एक था चित्रकार: ” बाबूराव पेंटर “

डॉ. कुमार विमलेन्दु सिंह | Cinema Desk

“राजा हरिश्चंद्र” से भारतीय सिनेमा की शुरुआत हुई और समय बीतने के साथ इसने वो जगह पाई, कि आज इससे बड़ा और सशक्त कोई माध्यम ही नहीं है, विचारों को प्रकट करने का, धारणाओं को प्रदर्शित करने का।  कभी-कभी ये प्रश्न मन में उठता है, कि क्या फ़िल्मों को बना कर एक बार प्रदर्शित भर कर दिया जाना काफ़ी था?  उत्तर खोजने पर पता चलता है, नहीं ऐसा नहीं था।

बाबूराव पेंटर (PC- Upperstall)

इसमें कोई दोराय नहीं है कि, दादासाहेब फाल्के ने एक क्रांति का शंखनाद किया था और सिनेमा को पूर्णता देने के लिए, कई कलात्मक विधाओं से, बेहतरीन योद्धा, उस समर के लिए निकले थे, जहां सार्थकता सिद्ध करना ही युद्ध था। एक ऐसे ही कलाकार थे, बाबूराव कृष्ण राव मेस्त्री, जिनका जन्म 1890 में कोल्हापुर में हुआ था और ये इतने दक्ष थे चित्रकला में कि इनका नाम ही पड़ गया, बाबूराव पेंटर।

बाबूराव पेंटर निर्मित ‘माता लक्ष्मी’ का चित्र

अपने एक चचेरे भाई आनंदराव के साथ, संगीत नाटक मंडलियों और थिएटर कंपनियों के लिए, ये दोनों भाई चित्रों वाले बैकड्रॉप बनाते थे। इन्होंने एक कैमरा का जुगाड़ कर फ़िल्म बनाने की भी ठानी थी और कैमरे की तकनीकों को सीखने का ज़िम्मा, आनंदराव का था। इस सपने के बीच में ही आनंदराव चल बसे और बाबूराव पेंटर ने अकेले ही ये सपना पूरा किया। वी०जी० दामले उनके नए साथी और शिष्य बने और 1918 में कैमरा और उसकी तकनीकों का अध्ययन पूरा हुआ और 1919 में बाबूराव पेंटर ने महाराष्ट्र फ़िल्म कंपनी की स्थापना की। इन्होंने क़र्ज़ तक लिया और अपने प्रतिभावान मित्रों, दामले, फ़त्तेलाल और वी०शांताराम को जगह दी, अपनी रचनात्मकता को निखारने के लिए। कुछ ही वर्षों के बाद इन तीनों मित्रों ने, अपनी एक अलग कंपनी, प्रभात फ़िल्म कंपनी के नाम से बना ली।

बाबूराव पेंटर ने 1953 तक फ़िल्में बनाईं। “सैरांध्री”, “सावकार पाश”, “उषा”, “प्रतिभा”, “विश्वमित्र”, “महाजन” जेसी फ़िल्में बनाईं।

“बाबूराव पेंटर, पहले फ़िल्मकार थे, जिन्होंने फ़िल्मों के लिए पोस्टर बनाए और एक पुस्तिका भी बनायी, जो प्रचार करने के लिए, प्रयोग में लाई जाती थी। 1923 में आई इनकी  फ़िल्म “सिंहगढ़” बहुत कामयाब हुई। ये इतनी सफल रही कि पहली बार मनोरंजन टैक्स भी इसी फ़िल्म पर लगाया गया। ये वीर तान्हा जी के कोंडना दुर्ग के जीतने की घटना पर बनी फ़िल्म थी। “

आज के इस प्रचार युग में जो युक्तियां लगाई जाती हैं, वे नीति और मर्यादा के परे चली जाती हैं। बाबूराव पेंटर ने ऐसा कभी नहीं किया। 1954 में बाबूराव पेंटर चल बसे। इन्हें वो सम्मान आज तक नहीं मिल पाया है, जिसके ये हक़दार थे। सिनेमा से जुड़े लोगों को इनके नाम से प्रतिभावान चित्रकारों को प्रोत्साहन भी देना चाहिए, आपस में एक दूसरे को पुरस्कृत करने के अलावा।

बाबूराव पेंटर (PC-Phalke Factory)

इनकी पेंटिग्स, आज भी J J Art Gallery की दीवारों पर देखी जा सकती हैं और देखने वालों के मूंह से अनायास ही निकल जाता है, “ये कौन चित्रकार है?”

(लेखक जाने-माने साहित्यकार, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)

भूली हुई यादें- “ बॉब क्रिस्टो ”

डॉ० कुमार विमलेन्दु सिंह | Navpravah Desk

आना, बुलाया जाना, आ जाना, तीनों अलग बातें हैं लेकिन रुक जाना, ठहर जाना और बस जाना, इन तीनों में से किसी भी एक वजह से हो सकता है। बॉब क्रिस्टो आए थे, मुंबई में रुके, उन्हें मस्कट जाने के लिए वर्क परमिट चाहिए था, सो ठहरे और फ़िल्मों ने ऐसा लिया गिरफ़्त में कि यहीं बस गए।

बॉब क्रिस्टो

बॉब क्रिस्टो का जन्म, 1938 में ऑस्ट्रेलिया में हुआ था और बचपन से ही इन्हें खेल कूद का बहुत शौक़ था। ये पढ़ने में भी उतने ही अच्छे थे और गणित में ये ख़ासकर बहुत बेहतरीन थे। अच्छी परवरिश और मेहनत का नतीजा ये हुआ कि बॉब, एक सिविल इंजीनियर बने।

अपने परिवार के साथ बॉब क्रिस्टो (PC-Medium)

काम के सिलसिले में, ये सारी दुनिया में घूमा करते थे। एक बार ऐसे ही काम के सिलसिले में, इनका भारत आना हुआ और ये मुंबई में रुके। जिस कंपनी के लिए बॉब काम करते थे, उन्होंने, इन्हें मस्कट किसी प्रोजेक्ट के लिए भेजने का फ़ैसला किया था और वर्क परमिट के लिए इन्हें कुछ दिन मुंबई में ही रुकना था।

“इसी दौरान, किसी ने बॉब की मुलाक़ात, मशहूर अदाकारा परवीन बाबी से कराई और कुछ ही दिनों में बॉब, फ़िल्मी दुनिया की पार्टियों में दिखने लगे। ये साल था 1980। ये वो दौर था जिसमें गोरे लोगों को बतौर विलेन ख़ूब रोल दिए जाते थे। टॉम आल्टर को दर्शकों ने बार-बार देखा था और एक नए चेहरे की तलाश थी।”

संजय ख़ान ने एक बार बॉब से पूछा, कि क्या वे उनकी फ़िल्म में काम करेंगे? बॉब ने बताया कि उन्हें ऐक्टिंग नहीं आती। लेकिन संजय कहाँ मानने वाले थे और वैसे भी, हिन्दी फ़िल्मों का ये वो दौर था, जहाँ ऐक्टिंग, फ़िल्मों में काम करने की आख़िरी शर्त थी और परिवारवाद का बीज डाला जा चुका था। बॉब मान गए और उसी साल आई फ़िल्म, “अब्दुल्ला” में ये दिखे। दर्शकों को बॉब ख़ूब भाए और इसके बाद तो, “कुर्बानी”, “कालिया”, “नास्तिक”, “मर्द” जैसी, 200 फ़िल्मों में ये दिखे।

एक फ़िल्म के दृश्य में अमरीश पुरी और बॉब क्रिस्टो

बॉब हर घर में, ज़ालिम गोरे के रूप में पहचाने जाने लगे। भारत में रहकर हमने अपने देश से भले ही कुछ न लिया हो, लेकिन जो बाहर से आता है, वो यहां हैरत में पड़ जाता है। बॉब का शरीर तो पहले ही गठा था, ये कसरत करते थे, लेकिन यहां इन्होंने, योग भी सीखा।

इन्होंने, टीवी पर भी “द स्वोर्ड ऑफ़ टीपू सुल्तान” और “द ग्रेट मराठा” जैसे धारावाहिकों में भी काम किया। 2003 के बाद इन्होंने किसी फ़िल्म में काम नहीं किया। सन् 2000 से ही, ये बंगलोर में बतौर योग प्रशिक्षक, काम करते रहे। इन्होंने नरगिस नाम की महिला से शादी भी की।

फ़िल्म ‘सौगंध’के एक फाईट सीन में अक्षय कुमार और बॉब क्रिस्टो (PC-Cinestaan)

2011 में बॉब क्रिस्टो चल बसे और अपने देश से बहुत दूर एक ऐसे देश में दफ़न हो गए, जहाँ लुटेरों के भी क़सीदे पढ़े जाते हैं और फिर बॉब ने तो इस देश से प्यार किया था।

बॉब क्रिस्टो, हर सिनेमा देखने और चाहने वालों की यादों में ज़िंदा रहेंगे।

(लेखक जाने-माने साहित्यकार, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)

गृहस्थ संत देवप्रभाकर शास्त्री ‘दद्दा जी’ का हुआ देहावसान

न्यूज़ अपडेट | Navpravah Desk

मध्य प्रदेश | गृहस्थ संत देवप्रभाकर शास्त्री ‘दद्दा जी’ का रविवार को देहावसान हो गया। रविवार रात करीब आठ बजे उन्‍होंने अंतिम सांस ली। मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह चौहान और पूर्व सीएम कमलनाथ ने उनके निधन पर शोक व्‍यक्‍त किया।

सन्त देवप्रभाकर शास्त्री की हालत गंभीर थी और वे वेंटीलेटर पर थे। दिल्ली से शनिवार रात नौ बजे उन्हें एयर एंबुलेंस से जबलपुर लाया गया। यहां से उन्हें कटनी ले जाया गया। इसके बाद ही उनकी हालत गंभीर बनी हुई थी। प्रदेश के पूर्व मंत्री संजय पाठक ने संदेश जारी कर उनके गंभीर होने की जानकारी दी थी।

गृहस्थ संत पंडित देवप्रभाकर शास्त्री कुछ दिनों से अस्वस्थ थे और उनका दिल्ली के गंगाराम अस्पताल में इलाज चल रहा था। शनिवार शाम उनकी तबीयत ज्यादा बिगड़ गई। उन्हें सांस लेने में तकलीफ हुई और चिकित्सकों ने उन्हें वेंटीलेटर सपोर्ट दिया। लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका।

काँग्रेस नेता ने अपने अजीबोगरीब ट्वीट से दिया, हर भारतीय को करोड़पति बनाने का मंत्र

न्यूज़ अपडेट | Social Media Desk

हमारे राजनेता अक्सर ही अपनी सोशल मीडिया एक्टिविटीज़ को लेकर सुर्खियों में बने रहते हैं। इस बार भी एक राजनेता ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर एक अजीबोगरीब गणित का नमूना शेयर किया है जिसे लेकर उनके फ़ॉलोअर्स ख़ूब मजे ले रहे हैं।

दरअसल उत्तराखंड प्रदेश काँग्रेस कमेटी के पूर्व अध्यक्ष व राज्य के पूर्व उद्योग मंत्री किशोर उपाध्याय ने अपने ट्विटर हैंडल से एक पोस्ट किया जिसमें उन्होंने लिखा, “गज़ब का सुझाव एक डॉक्टर द्वारा।” इसके साथ उन्होंने एक स्टिल ग्राफ़िक भी लगाया जिसमें लिखा था, ‘सभी को 1-1 करोड़ दे देते, 135 करोड़ ही खर्च होते, 20 लाख करोड़ खर्च करने की क्या ज़रूरत थी।”

किशोर उपाध्याय ने अपने ट्वीट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व कांग्रेस के राहुल गांधी को भी टैग किया है। अब उनके इस अजीबोगरीब गणित के पीछे क्या रहस्य है यह समझना तो मुश्किल है लेकिन उनके इसी ट्वीट पर मजे लूटने वालों की लाइन लग गई है।

कुछेक लोगों ने मज़ाकिया लहजे में किशोर उपाध्याय से गणित कि शिक्षा लेने तक कि गुज़ारिश कर दी है।

31 मई तक के लिए बढ़ी लॉकडाउन अवधि, नए रंग रूप वाली होगी

न्यूज़ अपडेट | Navpravah Desk

कोरोना के चलते देश में लोकडाउन के तीसरे चरण का आज आखिरी दिन था। जिसके बाद देश मे कई राज्य सरकारों ने इसे 31 मई तक बढ़ा देने का फैसला लिया है। राज्य सरकारों ने यह फैसला बढ़ते कोरोना मामलों के चलते लिया है।

आज लॉकडाउन 3 का आखिरी दिन है। उम्‍मीद है कि कुछ ही देर में चौथे लॉकडाउन को लेकर नई गाइडलाइन जारी हो सकती है। महाराष्‍ट्र और तमिलनाडु ने 31 मई तक लॉकडाउन बढ़ाने की घोषणा कर दी। इससे पहले पंजाब, तेलंगाना और मिजोरम ने भी लॉकडाउन बढ़ाने की घोषणा कर दी है। तेलंगाना की सरकार ने 29 मई तक लॉकडाउन बढ़ाया है। वहीं पंजाब सरकार ने 18 मई से राज्‍य से कर्फ्यू हटाने की घोषणा कर दी है।

कर्नाटक सरकार राज्य में 2 दिनों के लिए लॉकडाउन का विस्तार किया है, अर्थात यह 19 मई की मध्यरात्रि तक जारी रहेगा। Lockdown3 के दिशा- निर्देश और मानदंड 19 मई मध्यरात्रि तक या अगली सूचना तक लागू रहेंगे।

सरकार के कैबिनेट सचिव राजीव गाबा लॉकडाउन 4.0 की गाइडलाइंस को लेकर आज रात 9 बजे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सभी राज्यों के मुख्य सचिवों, महा निदेशकों से चर्चा करेंगे।

गौरतलब है कि 24 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब पहली बार लॉकडाउन की घोषणा की थी तो देश में कोरोना वायरस के लगभग 300 मरीज थे। आज लगभग 53 दिनों बाद देश में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की कुल संख्या 90000 से ऊपर पहुंच गई है।

जानिए, कोरोना आपदा आर्थिक पैकेज के अन्तिम चरण में क्या है ख़ास

न्यूज़ डेस्क | navpravah.com

आज वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 20 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक पैकेज से जुड़ी पांचवीं और आखिरी चरण की घोषणाएं की। वित्त मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री ने कहा था कि आपदा को अवसर में बदलने की जरूरत है, उसी के मुताबिक ये आर्थिक पैकेज तैयार किया गया है‌।

वित्त मंत्री ने कहा कि शहरों से गांवों की ओर जा रहे प्रवासी मजदूरों को रोजगार की कमी न हो, इसलिए मनरेगा का बजट 40000 करोड़ रुपये बढ़ा दिया गया है। उन्होंने कहा है कि इस पैकेज में लैंड, लेबर, लॉ, लिक्विडिटी पर जोर दिया गया है।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि पीएम गरीब कल्याण योजना के तहत टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर कैश का किया गया, इसके तहत 8.19 करोड किसानों के खाते में 2-2 हजार रुपये दिए गए हैं।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि इसके अलावा देश के 20 करोड़ जन-धन खातों में डायरेक्ट ​बेनिफिट ट्रांसफर के जरिए 500-500 रुपये भेजे गए। उज्ज्वला योजना के तहत 6.81 करोड़ रसोई गैस धारकों को मुफ्त सिलेंडर दिया गया है।

वित्त मंत्री ने कहा है कि कोरोना वायरस से लड़ने के लिए स्वास्थ्य विभाग को 15 हजार करोड़ रुपये दिए गए हैं, टेस्टिंग और लैब किट के लिए 550 करोड़ रुपये भी दिए गए हैं।

सरकार ऑनलाइन लर्निंग पर पूरा ध्यान दे रही है, इस सिलसिले में सरकार पहले क्लास से लेकर 12वीं क्लास तक के लिए एक एक चैनल लॉन्च करेगी, बच्चों को मनोवैज्ञानिक रूप से स्वस्थ्य रखने के लिए मनोदर्पण कार्यक्रम शुरू किया जाएगा।

Input: Saumya Kesarwani 

केवल सरकारी संकल्पना नहीं, नागरिक संकल्प भी हो आत्मनिर्भर भारत

डॉ० अजय खेमरिया | Editorial Desk

मोदी सरकार ने कोविड संकट से उपजी आर्थिक चुनौतीयों के बीच “आत्मनिर्भर भारत” की जो पहल की है उसे जमीन पर उतारने के लिए दो मोर्चों पर समानांतर लड़ाई लड़नी होगी। पहली नागरिकबोध औऱ दूसरी सरकारी मशीनरी की जड़तामूलक सामंती मानसिकता।प्रधानमंत्री स्पष्ट कर चुके है कि स्वदेशी का आशय किसी के बहिष्कार से नही है जाहिर है वैश्विक आर्थिक समझौतों के बीच इस आत्मनिर्भर भारत के उद्देश्य में कोई अंतर्विरोध नही है। दुनियां की मजबूत आर्थिक महाशक्तियों ने अपनी आत्मनिर्भरता की बुनियाद पर ही सशक्तता को अर्जित किया है। 20 लाख करोड़ का आर्थिक पैकेज सरकार की प्राथमिकता को स्वयंसिद्ध करने के लिए मजबूत प्रमाण है। इस’ स्वदेशी संकल्प’के सामने सबसे पहली चुनौती है भारतीय लोकचेतना में नागरिकबोध की न्यूनता का है। जापान का उदाहरण हमारे सामने है द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका में बर्बाद हो चुका यह मुल्क आज सम्पन्नता और प्रौद्योगिकी के मामले में नजीर है।

जापान आज दुनियां की तीसरी आर्थिक महाशक्ति है तो इसके पीछे उसके नागरिकों की राष्ट्रीय चेतना ही आधार है। जापानी चरित्र में राष्ट्रीयता और अनुशासन का प्रधानभाव ही इस मुल्क को बगैर प्राकृतिक संसाधनों के बावजूद तकनीकी,उत्पादन से लेकर हर मोर्चे पर सिरमौर बनाने वाला निर्णायक तत्व है। सामंती जीवनशैली का अभ्यस्त रहा यह देश आज जबाबदेह नागरिक प्रशासन के मामले में भी अद्वितीय है। सवाल यह है कि हम भारतीय इस मोर्चे पर कहाँ खड़े है? जापान भी भारत की तरह करीब बारह सौ साल गुलामी में रहा है लेकिन आज लगभग 70 साल में यह वैश्विक ताकत बन गया। निसन्देह हमने भी अपनी विविधता के बाबजूद बड़ी उपलब्धियों को अर्जित किया है लेकिन यह भी तथ्य है कि हमें आर्थिक, सामाजिक मोर्चे पर आज भी बहुत कठिन चुनौतीयों से जूझना पड़ रहा है।कोरोना संकट ने हमारी आत्म क्षमताओं को तो प्रमाणित किया लेकिन शासन और नागरिकबोध के मोर्चे पर बहुत ही निराशाजनक तस्वीर उकेर कर रख दी।

नागरिकबोध और नागरिक प्रशासन दोनों ही आज विफलता के दस्तावेज लेकर खड़े है। स्वदेशी का मंत्र असल में हमारी सामूहिक चेतना में राष्ट्रीय तत्व की स्थाई अनुपस्थिति को प्रमाणित करता है। जिस आधुनिकता का अबलंबन हमने पिछले कुछ दशकों में किया वह हमारी परम्परागत सहअस्तित्व की शाश्वत जीवनशैली के विपरीत है।वस्तुतः नागरिक को उपभोक्ता बनाने और उसे लोकतंत्र के नाम पर बरगलाने की कुटिल चाल का शिकार भारत सर्वाधिक हुआ है।नई आर्थिक नीतियों के नाम पर दो बुनियादी काम करीने से किये गए है पहला नागरिक की जगह हर आदमी को वोटर और उपभोक्ता बनाना और दूसरा गरीबी औऱ अमीरी की खाई को गति देना।यह पूंजीवाद के नए वैश्विक अवतार उदारीकरण, वैश्वीकरण, नवउदारवाद और क्रोनी केपेटिलिज्म के आवरण में हुआ।आज इन्ही नीतियों के ने भारत को संकट के बाबजूद अपनी जड़ों की ओर वापसी का आह्वान किया है।प्रधानमंत्री मोदी ने लोकल के लिए वोकल का जो आग्रह किया है असल में वह भारत की विश्व बंधुत्व और सहअस्तित्व की सुचिंतित जीवन दृष्टि की पुनर्स्थापना का ही आह्वान है। यह केवल सरकार के भरोसे नही नागरिक संकल्प की दृढ़ता से ही साकार हो सकता है। कोरोना संकट में हमने अपनी उपभोक्ता केंद्रित जीवन शैली को आत्मप्रबंधित करके बताया है। क्या यह संभव नही की हम अपनी जीवनशैली में इसे स्थाई तत्व के रूप में आत्मसात करे।स्वदेशी का बुनियादी तत्व सह अस्तित्व ही है भारत की प्राचीन आत्मनिर्भर आर्थिकी में 64 कलाएं विधमान थी जो एक दुसरे को आर्थिक सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध कराती थी।आज बदले परिदृश्य में हम हमारी कम्पनियों के उपलब्ध उत्पाद अपनाकर सहअस्तित्व को सुदृढ करने वाली इन 64 आर्थिक कलाओं को जीवंत कर सकते है।

आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य में दूसरी बड़ी बाधा भारतीय प्रशासनिक तंत्र की औपनिवेशिक जड़ता है।सरकार को इस मोर्चे पर अत्यधिक कठोर निर्णयन की आवश्यकता है।तमाम आर्थिक पैकेज बेमानी और निष्फल होंगे जब तक डिलीवरी सिस्टम दुरस्त नही होगा।तथ्य यह है कि मौजूदा ढांचा सड़ चुका है वह यथास्थितिवाद से आगे नही सोचता है।जड़ता,भर्ष्टाचार, लालफीताशाही इस सिस्टम की रोम रोम में समा चुका है।मध्यम और लघु उधोगों की बर्बादी में जितना योगदान आर्थिक नीतियों का है कमोबेश उतना ही अफ़सरशाही का।

“यूपी के मुख्य सचिव और बाद में देश के कैबिनेट सचिव रहे टीएसआर सुब्रमण्यम की किताब “जर्नीज थ्रू बाबूडम एन्ड नेतालैंड “में यूपी की औधोगिक बर्बादी के सप्रमाण किस्से उपलब्ध है।योगी राज में आरम्भ “एक जिला एक उत्पाद” योजना असल में बाबूशाही के कलुषित कारनामों को समेटने की कोशिशें ही है। “

बाबूशाही के चरित्र को समझने के लिए हांगकांग की एक प्रतिष्ठित कंसल्टेंट फर्म “पॉलिटिकल एन्ड इकोनॉमिक रिस्क कंसल्टेंसी लिमिटेड”की वैश्विक व्यूरोक्रेसी रैंकिंग पर नजर डालनी होगी।भारत की ब्यूरोक्रेसी को 10 में से 9.21वे स्थान पर रखा गया है।यानी सबसे बदतर।वियतनाम 8.54, इंडोनेशिया 8.37, फिलीपींस 7.57, चीन7.11, सिंगापुर 2.25, हांगकांग3.53, थाईलैंड5.25, जापान 5.77, दक्षिण कोरिया 5.87, मलेशिया 5.84 रैंक पर रखे गए है। इस रपट में भारत की अफसरशाही को सबसे खराब रैंकिंग दी गई है।जाहिर है सरकार प्रायोजित किसी भी पैकेज को परिणामोन्मुखी नही बनाया जा सकता है जब तक इस अजगरफॉन्स का शमन नही हो पाता।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जनस्वीकृति लगातार प्रमाणित हो रही है उनके स्वदेशी आह्वान के साथ अधिकांश भारतवासी खड़े होंगे ही।यह भी तय है कि लोग लोकल के वोकल बनने में भी पीछे नही रहेंगे लेकिन बड़ा सवाल बाबूशाही का तो सामने खड़ा ही रहेगा जो इस मिशन मोड़ का बुनियादी शत्रु है।क्या नागरिकबोध के समानन्तर नागरिक प्रशासन को भी पुनर्स्थापित किये जाने की चुनौती को स्वीकार करेंगे पीएम।

(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक व टिप्पणीकार हैं।)

भूली हुई यादें- “ कुक्कु मोरे ”

डॉ० कुमार विमलेन्दु सिंह | Navpravah Desk

क़ायनात की फ़ितरत ही नहीं ख़ुद-ब-ख़ुद चलना, कोई चलाता है इसे नज़र की हदों के बाहर से, हंसाता है, रुलाता है, ठहराता है और जब नचाता भी है ज़ोर से, कुछ चल नहीं पाता दिल या दिमाग़ का और एक खामोश मंज़ूरी के साथ, एक ही सदा गूंजती है कहकशां में, “मी रक़्सम, मी रक़्सम (मैं नाचता/नाचती हूं, मैं नाचूंगा/नाचूंगी)।” कुक्कु मोरे भी नाचीं, पहले फ़िल्मों में और फिर क़िस्मत के इशारों पर।

कुक्कु मोरे (PC-Cinestaan)

कुक्कु मोरे का जन्म, 1928 में, एक ऐंग्लो इंडियन परिवार में हुआ और बचपन से ही नाचना इन्हें पसंद था। परिवार का माहौल भी बहुत ख़ुशनुमा था और आए दिन किसी न किसी बहाने इन्हें अपनी कला दिखाने का मौक़ा मिलता ही रहता था। इससे इन्हें ख़ुशी तो मिलती थी लेकिन मन ही मन ये ठान चुकी थीं कि ये फ़िल्मों में काम ज़रूर करेंगी। अभी इनकी उम्र 18 साल की ही थी, कि इनकी ख़्वाहिश पूरी हो गई।

1951 की फ़िल्म ‘सगाई’ में कुक्कु मोरे    (PC-Fantastik India)

1946 में आई फ़िल्म, “अरब का सितारा”, इसमें इनके डांस की इतनी तारीफ़ हुई कि इनके पास बड़ी फ़िल्मों के काम आने लगे। 1948 में आई फ़िल्म, “अनोखी अदा”, महबूब ख़ान बना रहे थे और इसमें एक डांस सीक्वेंस, कुक्कु मोरे का भी रखा गया। इसके बाद इन्हें कामयाब फ़िल्मों का फ़ार्मुला मान लिया गया।

“1949 की फ़िल्म, “बरसात” का गीत, ” पतली कमर है, तिरछी नज़र है”, इतना मक़बूल हुआ कि कुक्कु मोरे, ख़ूबसूरती का मिसाल बन गईं। इन्होंने ख़ूब काम किया, ख़ूब दौलत कमाई।”

कुक्कु बहुत मेहमाननवाज़ थीं और दोस्ती निभाना जानती थीं। जब हेलेन का परिवार मुंबई में मुफ़लिसी का दौर काट रहा था, तब इन्होंने ही 13 साल की हेलेन को पहली बार फ़िल्मों में काम दिलवाया था और आगे भी कई साल तक मदद करती रहीं। शुरुआत के दिनों में जब प्राण बमुश्किल अपने दिन गुज़ार रहे थे, उनकी भी मदद कुक्कु ने की थी। इनका एक आलीशान बंगला था और तीन मोटर कारें थीं, रोज़ जलसे होते थे, रोशनी होती थी।

नरगिस और कुक्कु मोरे (PC-The Buzzing Story)

हेलेन को ये बहुत मानती थीं। 1958 में आई “यहूदी” और “चलती का नाम गाड़ी” में दोनों को साथ नाचते देखा जा सकता है और आसानी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि कौन बेहतर है। 1963 में आई “मुझे जीने दो” इनकी आख़िरी फ़िल्म साबित हुई, क्योंकि इसके बाद फ़िल्मों ने मीठी ज़ुबान और ज़मीर का ज़्यादा ख़याल न रखने वाले नए सितारे खोज लिए थे।

अब कुक्कु के बंगले पर जलसे भी बंद हो गए, मोटर कारें भी न रहीं और इन्हें कैंसर भी हो गया। कोई हमसफ़र भी न था। कुक्कु इतनी ग़रीब हो चुकी थीं कि सड़ी गली सब्जियां मांग कर खाना पकाना पड़ता था उनको।

1981 में कुक्कु गुज़र गईं और कोई नहीं आया उनकी उस रौशन दुनिया से, जहाँ होना उनका ख़्वाब था।

” ख़ामोशी पे ही हक़ रहा किया अपना

हम चिराग़ थे, कहते भी क्या बुझने के पहले”

-डॉ० कुमार विमलेन्दु सिंह ‘विमल’

(लेखक जाने-माने साहित्यकार, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)

सुप्रीम कोर्ट: लॉकडाउन में शराब दुकान बंद किये जाने पर याचिकाएं खारिज, लगाया 1 लाख जुर्माना

न्यूज़ अपडेट | Navpravah Desk

उच्चतम न्यायालय में लॉकडाउन के दौरान शराब की दुकानें बंद रखने संबंधी याचिकाएं दायर की गईं थीं, जिन्हें माननीय न्यायालय ने गत शुक्रवार को खारिज कर दिया है। इसके साथ इन याचिकाकतार्ओं पर एक-एक लाख रुपये का अर्थदण्ड भी लगाया गया है। याचिकाकर्ताओं ने इन याचिकाओं में सोशल डिस्टेंसिंग नियमों के उल्लंघन हवाला दिया था।

जस्टिस एल नागेश्वर राव, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस बी आर गवई की बेन्च ने यह कहते हुए प्रकाश कुमार और गौतम सिंह की दो अलग याचिकाएं खारिज करते हुए कहा कि इस नेचर की कई याचिकाएं केवल प्रचार के लिए दायर की जा रही हैं।

जस्टिस राव ने याचिका की सुनवाई पर कहा कि, “हमारे पास इस तरह की कई याचिकाएं हैं। ये सभी प्रचारार्थ हैं। हम जुमार्ना लगाएंगे।”

न्यायालय ने प्रकाश कुमार पर 1 लाख का जुर्माना लगाया दिया। इसके कुछ देर बाद ही गौतम सिंह की याचिका सामने आई जिसपर न्यायालय ने रोष व्यक्त करते हुए याचिका खारिज की और जुर्माना भी लगा दिया।