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Saturday, August 8, 2026
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छात्रों की सुविधा के लिए बैंक जारी कर रहे ‘स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड’, विद्यार्थियों में ख़ुशी की लहर

अनुज हनुमत,

भारत में अधिकतर पेरेन्ट्स की सोच यही है कि अगर बच्चों को क्रेडिट कार्ड दिया तो वो बिगड़ जायेंगे। लेकिन इसके उलट बैंकों की तरफ से स्टूडेंट्स को स्पेशल फीचर्स और बेनिफिट्स के साथ क्रेडिट कार्ड दिए जा रहे हैं। हालाँकि ये क्रेडिट कार्ड्स उन स्टूडेंट्स को जारी किया जाता है, जो 18 साल से अधिक उम्र के हैं या उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।

स्टूडेंट्स क्रेडिट कार्ड की सबसे अच्छी बात यह है कि इसका डाक्यूमेंटेशन काफी सरल है। बता दें कि इसके लिए स्टूडेंट्स को ऐज प्रूफ, रेजिडेंस प्रूफ और अपना एजुकेशनल इनरोलमेंट बैंक को दस्तावेज के रूप में उपलब्ध कराना होगा। सबसे खास बात ये है कि भारत में स्टूडेंट्स को जारी किए जाने वाले क्रेडिट कार्ड्स की दो कैटेगरी है- सिक्योर्ड क्रेडिट कार्ड और एड-आॅन क्रेडिट कार्ड्स।

सिक्योर्ड क्रेडिट कार्ड की खासियत-

सिक्योर्ड क्रेडिट कार्ड्स फिक्स डिपॉजिट्स पर जारी किया जाता है। इस क्रेडिट कार्ड में क्रेडिट लिमिट फिक्स डिपॉजिट के तहत जमा राशि का 70 से 80 फीसदी तक होता है। इसलिए इस कार्ड में किसी तरह की असुरक्षा की गुंजाइश कम होती है। सिक्योर्ड क्रेडिट कार्ड्स के लिए बैंकों द्वारा बहुत ही कम सालाना चार्ज लिया जाता है। इन कार्ड्स में स्टूडेंट्स को फ्यूल सरचार्ज में छूट, डिपार्टमेंटल स्टोर्स में कैश बैक की सुविधा, आॅन लाइन ट्रांजेक्शन पर पॉइंट्स और कार्ड होल्डर के बर्थ डे वाले मंथ में एक्स्ट्रा पॉइंट्स जैसे आॅफर्स मिलते हैं।

स्टेट बैंक आॅफ इंडिया की ओर से स्टूडेंट्स को 5000 तक के फिक्स डिपॉजिट पर सिक्योर्ड क्रेडिट कार्ड उपलब्ध करवाया जाता है। वहीं, प्राइवेट सेक्टर के अग्रणी बैंको आईसीआईसीआई, एचडीएफसी और एक्सिस बैंक भी बहुत कम फिक्स डिपॉजिट अमाउंट पर स्टूडेंट्स को सिक्योर्ड क्रेडिट कार्ड उपलब्ध करवा रहे हैं।

एड-आॅन क्रेडिट कार्ड की खासियत-

यदि पेरेन्ट्स बच्चों को क्रेडिट कार्ड देना चाहते हैं और यह भी चाहते हैं कि वह इसका मिस यूज ना करे तो उनके लिए एड-आॅन क्रेडिट कार्ड एक अच्छा आॅप्शन है। इस तरह के क्रेडिट कार्ड में अभिभावक बच्चों द्वारा किए जा रहे खर्च का पूरा विवरण रख सकते हैं और क्रेडिट लिमिट भी सेट कर सकते हैं। स्टूडेंट्स एड-आॅन क्रेडिट कार्ड का विवेक पूर्ण इस्तेमाल करके अपने पेरेन्ट्स का विश्वास जीत सकते हैं। उन्हें यह विश्वास दिला सकते हैं कि वे अब जिम्मेदारी उठाना सीख गए हैं और जरूरत पड़ने पर ही क्रेडिट कार्ड का प्रयोग करते हैं, फिजूल खर्ची नहीं करते।

सच तो ये है कि क्रेडिट कार्ड का मतलब ही होता है आप उधार के पैसों का इस्तेमाल कर रहे हैं और जब आपके पैसे होंगे तो आप लौटा देंगे। बैंकों की तरफ से क्रेडिट कार्ड देने के लिए उपभोक्ताओं को तरह तरह के लुभावने आॅफर्स दिए जाते हैं। यदि आप खुद के पैरों पर नहीं खड़े हैं या जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार नहीं हैं तो क्रेडिट कार्ड के चक्कर में न ही पड़ें। यदि क्रेडिट कार्ड लेना ही चाहते हैं तो स्टूडेंट्स क्रेडिट कार्ड आपके लिए बेहतर आॅप्शन है। क्योंकि इसमें ज्यादा फायदे है। वैसे बड़े शहरों में स्टूडेंट क्रेडिट कार्डस के प्रति छात्रों का जबरदस्त उत्साह देखा जा रहा है ।

केरल के बीजेपी कार्यकर्ता सीख रहे हिंदी

शिखा पाण्डेय,

कोझीकोड में भाजपा की तीन दिवसीय राष्ट्रीय परिषद और कार्यकारणी की बैठक  के लिए पार्टी की और से तैयारियां ज़ोरों पर हैं। इस बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित देश के विभिन्न क्षेत्रों से करीब 3000 पार्टी प्रतिभागी हिस्सा लेने वाले हैं। विभिन्न क्षेत्रों से आनेवाले विभिन्न भाषा-भाषी प्रतिभागियों को ध्यान में रखते हुए पार्टी कार्यकर्ता यहां सभी भाषाओं को जोड़नेवाली भाषा ‘हिंदी’ सीख रहे हैं ताकि भाषा के कारण उत्पन्न होने वाली बाधाओं को दूर किया जा सके।

इस बैठक में विभिन्न केंद्रीय मंत्रियों, भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों, सांसदों, पार्टी के राष्ट्रीय नेताओं के हिस्सा लेने की संभावना है। इसलिए केरल और पड़ोसी राज्यों के करीब 549 कार्यकर्ताओं को बुनियादी हिन्दी और अंग्रेजी के शब्द बोलने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है जो आमतौर पर बोलचाल की भाषा में प्रयोग में आते हैं।

पार्टी कार्यकर्ताओं को कम से कम 60 ऐसे शब्द और वाक्य याद करने के लिए दिये गए हैं जो आम तौर पर बोलचाल में उपयोग में आते हैं। कार्यकर्ताओं को “आपने चाय पी ? आपको कब रुम में जाना है, आपको कब गाडी चाहिए ?” जैसे वाक्य याद करने को कहा गया है।

भाजपा की प्रदेश समिति के सदस्य और कार्यकर्ता प्रकोष्ठ के प्रमुख शजुमोन वेट्टाकाड ने कहा, ” इस बैठक में हिस्सा लेने आने वाले 90 प्रतिशत पार्टी प्रतिभागी हिन्दी पट्टी से हैं, इसलिए कार्यकर्ताओं का लिए हिन्दी जानना जरुरी है। खाद्य, परिवहन, स्वागत, आवास समेत 33 विभागों के लिए ऐसे कार्यकर्ताओं को तैनात किया गया है।”

…जब जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया की हुई बोलती बंद

शिखा पाण्डेय,

अपने अति बोलने के कारण अक्सर विवादों में रहने वाले, देशद्रोह के मामले में जमानत पर चल रहे जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार की एक कार्यक्रम में बोलती ही बंद कर दी गई। कन्हैया को शनिवार को एक कार्यक्रम में श्रोताओं ने बोलने ही नहीं दिया, जिससे उन्हें अपना भाषण बीच में ही रोकना पड़ा।

कन्हैया को शनिवार को ‘इंडिया टुडे माइंड रॉक्स सम्मेलन’ में हिस्सा लेना था और आजादी पर संबोधन देना था। लेकिन श्रोताओं ने उन्हें पसंद नहीं किया और जब वह मंच पर पहुंचे तो लोग उन्हें हूट करने लगे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमेशा की तरह ज्यों ही कन्हैया ने निशाना साधा और कहा “आज उनका जन्मदिन है, लेकिन आधे लोग सड़कों पर हैं और अन्य जेलों में। खुशियां क्यों मनाना। यदि देश की 65 फीसदी आबादी युवा है तो 65 साल का व्यक्ति उनका नेता कैसे हो सकता है?”, श्रोताओं को अपने प्रधानमंत्री पर यह टिप्पणी इतनी नागवार गुजरी कि वे मोदी के पक्ष में नारे लगाते हुए कन्हैया को हूट करने लगे।

इसपर कन्हैया ने मजाकिया लहज़े में कहा, “जो लोग यहां हूटिंग कर रहे हैं वे भी ऐसा करने के लिए स्वतंत्र हैं। देश में आजादी है। आप पर राजद्रोह का मामला नहीं लगेगा।”

जेल का अपना अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा, “जेल में रहने में क्या बुराई है? महात्मा गांधी और भगत सिंह भी जेल जा चुके हैं।” जब कन्हैया से पूछा गया कि क्या जेल जाना वे अपनी शान समझते हैं, तो उन्होंने कहा, “यह दुनिया हममें से बहुतों के लिए जेल है। जब लड़कियों को रात में बाहर नहीं जाने दिया जाता तो वे जेल में हैं, जब लोग बेरोजगार हों और फुटपाथों पर रहते हों तो वे जेल में हैं। ऐसे में बड़े जेल (दुनिया) की तुलना में छोटे जेल में रहना बेहतर है।”

जब उनसे पूछा गया कि क्या जेएनयू में नौ फरवरी को हुई नारेबाजी देशद्रोह है, कन्हैया ने कहा, “नारेबाजी देशद्रोह नहीं है। कोई भी गतिविधि जो देश को तोड़े या ऐसा करने का प्रयास करे, देशद्रोह है। नारे कभी देश नहीं तोड़ते और भारत इतना कमजोर नहीं है कि वह किसी के नारों से विभाजित हो जाएगा या टुकड़ों में बंट जाएगा।” इस बीच श्रोताओं द्वारा व्यवधान जारी रखने के चलते कन्हैया को अपना भाषण बीच में छोड़ना पड़ा।

गौरतलब है कि कन्हैया को इस साल फरवरी में एक कार्यक्रम में कथित रूप से राष्ट्रविरोधी नारे लगाए जाने के बाद देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।

जियो ने एयरटेल पर लगाया कॉल ड्राप का आरोप, कहा, ‘रोजाना 2 करोड़ कॉल्स हो रहे ड्राप’

शिखा पाण्डेय,

रिलायंस जियो की अपार सफलता के चलते इंटरकनेक्शन की समस्या व बाक़ी कंपनियों के साथ उसका विवाद बढ़ता ही जा रहा है। रिलायंस जियो ने इस मुद्दे पर भारती एयरटेल पर फिर आरोप लगाया है कि भारती एयरटेल के चलते दोनों कंपनियों के नेटवर्क के बीच हर दिन दो करोड़ कॉल्स विफल हो रही हैं। अर्थात कॉल करने वाले को अक्सर नेटवर्क व्यस्त मिलता है या कॉल ही नहीं मिल पाती। हालांकि एयरटेल ने इस आरोप का खंडन किया है।

रिलायंस जियो शुरु से ही एयरटेल पर आरोप लगा रही है कि वह बाजार में अपनी मजबूत स्थिति को बरकरार रखने के लिए किसी प्रतिस्पर्धी को ऊपर आने नहीं देना चाहता और इसीलिए वह अपनी मज़बूती का दुरूपयोग करते हुए ‘गैर प्रतिस्पर्धी व्यवहार’ कर रही है।

रिलांयस जियो  की ओर से आये एक बयान में कहा गया है, “ऐसा लग रहा है कि एयरटेल बाजार में अपनी मजबूत स्थिति का दुरुपयोग जारी रखे हुए है। इस तरह के गैर प्रतिस्पर्धी व्यवहार का नुकसान भारतीय ग्राहकों को होगा जो कि बेहतर व मुफ्त वॉइस सेवाओं का फायदा नहीं उठाया पा रहे।”

आपको बता दें कि एक दिन पहले ही एयरटेल ने कहा था कि वह रिलायंस जियो को और अधिक प्वाइंट आफ इंटरकनेक्शन (पीओआई) उपलब्ध कराने की दिशा में काम करेगी। रिलायंस जियो इन्फोकाम लिमिटेड ने भारती एयरटेल के इस बयान का स्वागत किया है, लेकिन उसका कहना है, “एयरटेल ने जितने पीओआई जारी करने का प्रस्ताव किया है वे बहुत कम हैं।”

जियो ने आरोप लगाया, “दोनों कंपनियों के नेटवर्क के बीच हर दिन दो करोड़ से अधिक कॉलें विफल हो रही हैं जो कि सेवाओं की गुणवत्ता के मानकों के लिहाज से चेतावनीपरक है। ” वहीं भारती एयरटेल ने इन आरोपों का खंडन करते हुए कहा है कि रिलांयस जियो एयरटेल द्वारा अतिरिक्त पीओआई जारी किए जाने व मोबाइल नंबर पोर्टेबिलिटी आग्रह के बारे में गलत बयान जारी कर रही है।

खुन्नस में शिवपाल, राम गोपाल के भांजे अरविन्द को किया पार्टी से बाहर

अमित द्विवेदी,

ऐसा लगा था कि मुलायम सिंह के हस्तक्षेप के बाद चाचा-भतीजे का बवाल शांत हो गया, लेकिन ऐसा है नहीं। शिवपाल ने पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष पद को संभालते ही लगाम कसनी शुरू कर दी है। शिवपाल ने विधान परिषद सदस्य अरविन्द यादव को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया है।

ऐसा माना जा रहा है कि शिवपाल ने यह कदम खुन्नस में लिया है। शिवपाल-अखिलेश के आपसी विवाद में रामगोपाल अखिलेश के पक्ष में थे। इस बात से शिवपाल काफी खफा थे। अरविन्द राम गोपाल के भांजे हैं, जिसकी वजह से वे शिवपाल के राडार पर आ गए।

गौरतलब है कि अरविंद यादव पर जमीनों के अवैध क़ब्ज़ों का आरोप है। मैनपुरी के विधान परिषद सदस्य अरविन्द प्रताप यादव को राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह के विरोध में असम्मानजनक एवं अमर्यादित टिप्पणियां करने, पार्टी विरोधी कार्यों में लिप्त रहने तथा अनुशासनहीन आचरण जैसे कई वजहों के चलते पार्टी से निष्कासित किया गया है।

ऋतिक के साथ हुए विवाद में कंगना का सनसनीखेज़ खुलासा

अमित द्विवेदी,

बॉलीवुड ‘क्वीन’ कंगना रनौत ने बॉलीवुड अभिनेता ऋतिक रोशन के साथ हुए विवाद को लेकर एक सनसनीखेज खुलासा किया है। कंगना ने कहा कि इस पूरी घटना के दौरान उन पर ऐसी कहानी बयान करने का दबाव था, जिससे उन्हें हमदर्दी मिले, लेकिन उनके पास इस तरह की कोई दास्तान नहीं थी।

कंगना ने कहा, “मैंने हाल में जिस वाकये का सामना किया, वह मेरे अतीत के अनुभवों से काफी अलग था। इस बार मेरे खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं हुई। मीडिया का काफी ड्रामा था, धमकियां थीं, चरित्र पर लांछन लगाए गए लेकिन मेरे खिलाफ कोई केस नहीं किया गया।”

कंगना ने कहा, “अचानक लड़ने के लिए मुझ पर नारीवादी दबाव पड़ने लगे। मुझे ऐसी कहानी बयान करने को कहा गया जिससे मुझे हमदर्दी मिले, लेकिन मेरे पास ऐसी कोई कहानी थी ही नहीं।” उन्होंने कहा कि वह एक शख्स के साथ सहमति वाले समीकरण से जुड़ी थीं।

उन्होंने कहा, “लोग मेरी पीठ के पीछे क्या कहते हैं, मुझे इससे कोई मतलब नहीं। मेरी जिंदगी बस मेरी है। मेरी पीठ पीछे क्या हो रहा है, मुझे इससे कोई मतलब नहीं है। मैं आगे देखना पसंद करती हूं।”

कंगना ने कहा कि एक परिपक्व युवती के तौर पर वह अपनी राह में आने वाली मुश्किलों से निपटने में सक्षम हैं, लेकिन कहीं न कहीं उन पर लड़ने का काफी ‘नारीवादी’ दबाव था।

नारियों की स्वतंत्रता और तरक्की का दावा करने वाले पुरुष प्रधान समाज के विषय में कंगना ने कहा, “हम पर हर जगह धौंस दिखाई जाती है। चाहे स्कूल हो, कॉलेज हो या आपके काम की जगह हो। इसमें कुछ भी असामान्य नहीं है। मेरा मानना है कि इससे आपमें लड़ने की क्षमता विकसित हो जाती है।”

‘पतंजलि’ ब्रांड के सर्वेसर्वा आचार्य बालकृष्ण देश के सबसे अमीर कारोबारियों में एक!

शिखा पाण्डेय,

चीन की एक बिज़नस मैगज़ीन ‘हुरुन’ के अनुसार पतंजलि के सीईओ आचार्य बालकृष्ण भारत के सबसे अमीर कारोबारियों में से एक हैं। आपको बता दें कि योग गुरु बाबा रामदेव के साथ शुरू किए गए इस शत प्रतिशत स्वदेशी आयुर्वेदिक उद्योग में आचार्य बालकृष्ण के कंपनी में 96 फीसदी शेयर्स हैं।

दरअसल बिजनेस मैगजीन ने एक लिस्ट रिलीज की है। इसमें 399 भारतीय उद्योगपतियों के नाम शामिल हैं। इसमें 25 हजार करोड़ रुपए की अनुमानित संपत्ति के साथ आचार्य बालकृष्ण का नाम सूची में 25वें नंबर पर है। रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी लिस्ट में पहले नंबर पर हैं। दूसरे नंबर पर सन फार्मास्युटिकल्स के दिलीप संघवी हैं।

आचार्य बालकृष्ण का इस विषय में कहना है कि ‘पतंजलि आयुर्वेद’ एक अनलिस्टेड कंपनी है और अगर यह देश की सबसे अमीर कंपनियों में से एक पाई गई है तो यह बहुत बड़ी उपलब्धि है। यह इसलिए संभव हो सका क्योंकि हमें देश के लोगों का अपार प्यार और सहयोग मिला। बहुत जल्द ही पतंजलि सूची में प्रथम स्थान पर होगी।

रिपोर्ट के मुताबिक, पतंजलि भारत में सबसे तेजी से बढ़ते एफएमसीजी ब्रैंड्स में से एक है। वित्तीय वर्ष 2015-16 में कंपनी का टर्नओवर पांच हजार करोड़ से भी ज्यादा रहा है। आश्चर्य की बात यह है कि आचार्य बालकृष्ण ने यह स्थान ‘पतंजलि आयुर्वेद’ की स्थापना के पांच साल के भीतर हासिल कर लिया।

रियो पैरालंपिक: प्रतियोगता के दौरान ईरानी साइकलिस्ट की मौत!

Bahman Golbarnezhad became the first athlete to die during Paralympic competition on Saturday

शिखा पाण्डेय,

रियो पैरालंपिक से एक बेहद दुःखद खबर आयी है। पुरुषों की ‘साइकिल सी 4-5 रोड रेस’ के दौरान हुई एक दुर्घटना में ईरान के एक साइक्लिस्ट की मौत हो गई है।

अंतरराष्ट्रीय पैरालंपिक समिति के अनुसार 48 वर्षीय बहमान गोल्बर्नेजहद ट्रैक पर गिर गए। उन्हें तुरंत पास के उनिमेड रियो अस्पताल में ले जाया गया, लेकिन कुछ देर बाद ही गंभीर चोट में कारण उनकी मौत हो गई। यूसीआई के साइक्लिंग गवर्निंग बॉडी के खेल निदेशक पीयर्स जोंस ने बताया कि मामले की जांच जारी है।

पैरालंपिक खेलों के रविवार को समापन समारोह में कुछ समय के लिए मौन रखा जाएगा। रियो स्थित पैरालंपिक गांव में ईरान का झंडा आधा झुका दिया गया है। ईरान पैरालंपिक समिति के महासचिव मसूद अशरफ़ी ने कहा कि रविवार को बहमान का शव पूरे सम्मान के साथ ईरान पहुंचाया जाएगा। उन्होंने बताया कि बहमान 12 साल से साइकिल चला रहे थे और वे ईरान की पैरालंपिक टीम के बेहतरीन साइक्लिस्ट थे।

पैरालंपिक समिति ने कहा कि सरफराज एक बेहतरीन पैराथलीट थे जिन्होंने पूरे जोश और प्यार के साथ ईरान को गौरवान्वित किया और  अपना जीवन  खेल को समर्पित कर दिया। उल्लेखनीय है कि बहमान ने 2012 के लंदन ओलंपिक में भी भाग लिया था।

आपको बता दें कि ओलंपिक और पैरालिंपिक खेलों में प्रतियोगिता के दौरान 1960 के बाद यह दूसरी मौत है। इससे पहले रोम गेम्स में डच साइक्लिस्ट एनमार्क जेंसन की साइकिल ट्रैक पर दुःखद मृत्यु हो गई थी।

उत्तर प्रदेश: विधानसभा चुनाव जीतने के लिए 100 दिन की परिवर्तन यात्रा करेगी भाजपा

शिखा पाण्डेय,

आगामी उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनावों में विजय पताका फहराने के लिए सभी राजनीतिक पार्टियां ज़ोर शोर से तैयारी में जुटी हैं। इन्हीं तैयारियों के तहत भारतीय जनता पार्टी अगले महीने उत्तर प्रदेश में चार परिवर्तन यात्राएं शुरू करेगी और ये 100 दिन से ज्यादा चलेंगी। इसका अंत  संभवत: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली के साथ होगा।

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और कई केंद्रीय मंत्रियों सहित शीर्ष पार्टी नेता यात्रा के दौरान जनसभाओं को संबोधित करेंगे। सूत्रों के अनुसार पार्टी ने प्रदेश के हर जिले में एक युवा और महिला सभा आयोजित करने का फैसला किया है। राज्य की प्रत्येक पंचायत को यात्रा से जोड़ने तथा बूथ स्तर पर सभाएं आयोजित करने की भी उम्मीद है। पार्टी द्वारा मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा किए जाने की संभावना नहीं है।

सूत्रों के अनुसार चार यात्राएं सहारनपुर, ललितपुर, सोनभद्र और गोरखपुर या बलिया से शुरू हो सकती हैं। श्राद्ध के खत्म होने के बाद ये यात्राएं एक स्थान पर आकर मिल सकती हैं जो लखनऊ हो सकता है।

दरअसल भाजपा उत्तर प्रदेश में पिछले 14 साल से सत्ता से बाहर है। दलित वोट बैंक मायावती के पास है, जबकि यादव और अधिकांश मुस्लिम समुदाय सपा के साथ है। ऐसे में भाजपा राज्य में चुनाव में जीत दर्ज करने के लिए सवर्ण जातियों और अन्य पिछड़ी जातियों का एक सामाजिक गठबंधन बनाने पर काम कर रही है।

भाजपा के एक नेता ने कहा, ‘‘विकास का एजेंडा, मोदी सरकार का अच्छा काम और सपा तथा पिछली मायवती सरकार का कुशासन हमारे अभियान के केंद्र में हैं। अब तक का नजरिया यह है कि मुख्यमंत्री पद के लिए हमारे पास चेहरा नहीं होगा।”

यात्रावृत्त- छप्पन भोग

डॉ. जितेंद्र पाण्डेय,

अपने-अपने कमरों से निकलकर लोग निर्धारित जगह पर इकट्ठा होने लगे। प्रशासन का बैंड पथक भी धीरे-धीरे सक्रिय हो रहा था। उत्सवी रंग में रंगे लगभग दो सौ लोग मंदिर की परिक्रमा के लिए तैयार थे। कुछ लोग सामान्य कपड़ों में थे, तो कुछ अवसर विशेष के नाते पारंपरिक परिधान में सजे-संवरे। दर्प, मस्ती, आस्था और भक्ति में डूबे लोग बैंड की मधुर संगीत पर थिरकने लगे। अधिकांश लोग अपने दोनों हाथ ऊपर उठाए थे। बिलकुल प्रणाम वाली मुद्रा। क्षण विशेष को अपने-अपने मोबाइल में कैद करने की ज़द्दोज़हद हो रही थी।

“कितना रोमांचक है नज़ारा ! जिन हाथों को श्रद्धा और भक्ति में जुड़े रहना चाहिए, वक़्त ने उन्हीं हाथों में मोबाइल पकड़ा दिया। है न सर ?” कंधे पर हाथ रखते हुए मेरे एक साथी ने कान में जोर से चिल्लाया। “हूं” रुमाल से पसीना पोछते हुए मैंने प्रतिक्रिया दी। इस समय तकनीकी-चर्चा उचित नहीं लगी। मन आस्थामय हो चला था, परिक्रमा के दौरान रह-रहकर “छप्पन भोग” का काल्पनिक बिंब मन में उभरने लगा, उभरे भी न क्यों ? “छप्पन भोग” का  श्रीनाथजी से पुराना नाता जो ठहरा! माना जाता है कि छप्पन भोग  की विधिवत शुरुआत 1615 संवत् में मार्गशीष शुक्ल पूर्णिमा के दिन गोवर्धनधारक श्रीनाथजी को समर्पित करके हुई। इसके अलावा कई रोचक कथाएं भी 56 भोग से जुड़ी हैं। एक कथा के अनुसार, मां यशोदा भगवान कृष्ण को आठों प्रहर भोजन करवाती थीं। ब्रजवासियों को इंद्र के प्रकोप से बचाने के लिए भगवान ने एक सप्ताह तक गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठाए रखा। इस अवधि में प्रभु ने अन्न का एक दाना भी नहीं लिया। घनघोर वर्षा थम जाने के बाद कृष्ण ने गोवर्धन को यथास्थान रख दिया। सात दिनों तक कान्हा को भूखा रहने की सर्वाधिक पीड़ा मां यशोदा को हुई। ब्रज वासियों ने भी अपनी अनन्य भक्ति का परिचय दिया। मां यशोदा सहित पूरे ब्रजमंडल ने एक सप्ताह की भरपाई करने की ठान ली। अतः आठ प्रहर के हिसाब से सात दिनों के लिए कुल (8×7=56) छप्पन प्रकार के व्यंजन तैयार किए गए – 1. भक्त (भात), 2. सूप (दाल), 3. प्रलेह (चटनी), 4. सदिका (कढ़ी), 5. दधिशाकजा ( दही-शाक की कढ़ी), 6. सिखरिणी (सिखरन), 7. अवलेह (शरबत), 8. बालका (बाटी), 9. इक्षु खेरिणी (मुरब्बा), 10. त्रिकोण (शर्करायुक्त), 11. बटक (वड़ा), 12. मधु शीर्षक (मठरी), 13. फेणिका (फेनी), 14. परिष्टाश्च (पूरी), 15. शतपत्र (खजला), 16. सधिद्रक (घेवर), 17. चक्राम (मालपुआ), 18. चिल्डिका (चोला), 19. सुधाकुण्डलिका (जलेबी), 20. धृतपूर (मेसू), 21. वायुपूर (रसगुल्ला), 22. चन्द्रकला (पगी हुई), 23. दधि (महारायता), 24. स्थूली (थूली), 25. कर्पूरनाड़ी (लौंगपूरी), 26. खंड मंडल (खुरमा), 27. गोधूम (दलिया), 28. परिखा, 29. सुफलाढ्या (सौँफयुक्त), 30. दधिरूप (बिलसारू), 31. मोदक(लड्डू), 32. शाक (साग), 33. सौधान (अधानौ अचार), 34. मंडका (मोठ), 35. पायस (खीर), 36. दधि (दही), 37. गोघृत, 38. हैयंगपीनम (मक्खन), 39. मंडूरी (मलाई), 40. कूपिका (रबड़ी), 41. पर्पट (पापड़), 42. शक्तिका (सीरा), 43.  लसिका (लस्सी), 44. सुवत, 45. संघाय (मोहन), 46. सुफल (सुपारी), 47. सिता (इलायची), 48. फल, 49. ताम्बूल, 50. मोहन भोग, 51. लवण, 52. कषाय, 53. मधुर, 54. तिक्त, 55. कटु और 56. अम्ल। भगवान कृष्ण ने भी छककर इन व्यंजनों का भोग लगाया।

दूसरी मान्यता के अनुसार, श्री भगवान का आसन कमल पर है। कमल की तीन परतें हैं। पहली परत में आठ, दूसरी में सोलह और तीसरी परत में बत्तीस पंखुड़ियां होती हैं। इस प्रकार इनका भी  योग (8+16+32=56) छप्पन है, जिनकी छप्पन भोग से साम्यता है। एक अन्य कथा में राजसूय यज्ञ के बाद द्वारिकाधीश भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न दिग्विजयी होने के लिए बड़ी यात्रा पर निकले थे। इसी दौरान उनकी मुलाकात परशुराम से हुई। प्रद्युम्न की विनयशीलता से परशुराम काफी प्रभावित हुए। अतः उन्होंने भी छप्पन भोग अर्पित किया था। पुष्टिमार्गीय सिद्धांत चौरासी लाख योनियों में विश्वास करता है। उनका मानना है कि इन योनियों में मनुष्य-योनि कर्म प्रधान है। यदि इस योनि को चौरासी लाख योनियों में से घटा दें, तो शेष 8399999 लाख बचेंगी। इन अंकों का योग भी छप्पन (8+3+9+9+9+9+9=56) है। इसलिए इन योनियों के कर्म फल (जीवन-मरण का चक्र) से मुक्ति के लिए प्रतीकात्मक रूप में कृष्ण को छप्पन भोग अर्पित करने का विधान है।

पाकशास्त्र के अनुसार रसोइयां छह प्रकार के रस (कटु, तिक्त, कषाय, अम्ल, लवण और मधुर) से नाना प्रकार के व्यंजन तैयार कर सकता है। भोजन बनाते समय यदि इन रसों का विवेकपूर्ण इस्तेमाल किया जाए, तो तैयार व्यंजन जायकेदार और स्वास्थ्यप्रद होगा, साथ ही भोजन में गुणवत्ता इतनी उम्दा होगी कि त्रिदोष (वात, पित्त और कफ) खुद-ब-खुद संतुलित हो जाएगा। पाकशास्त्र की सभी नियमावलियों को ध्यान में रखते हुए ‘छप्पन भोग’ तैयार किया जाता है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी भगवान को अर्पित भोग भक्तों के लिए अमृत तुल्य होता है।

हमारी परिक्रमा कब की पूरी हो चुकी थी। अगले ही पल हम श्रीनाथजी के गर्भगृह में खड़े थे। मंदिर को ‘श्रीनाथजी की हवेली’ के नाम से भी जाना जाता है। आँखें विग्रह पर ठहर गईं। गोवर्धन उठाने के समय की भंगिमा। बायां हाथ ऊपर और दाहिना कमर पर, आराम की मुद्रा में। इन्हें देवदमन भी कहा जाता है। ‘गर्गसंहिता’ के गिरिजाखंड में लिखा है – “श्रीनाथं देवदमनं वदिष्यन्ति सज्जनाः।” भक्तों के लिए श्रीनाथजी के आठ दर्शन (मंगला, श्रृंगार, ग्वाल, राजभोग, उथापन, भोग, संध्या और शयन) प्रतिदिन सुलभ हैं। नाथद्वारा पुष्टिमार्गीय वैष्णव सम्प्रदाय की प्रधान पीठ है। इस सम्प्रदाय के अन्य मंदिर पाकिस्तान, रूस (वोल्गा), न्यू हवेल, न्यू जर्सी, फोनिक्स, अरिजोना, फ्लोरिडा, कैलिफोर्निया आदि देशों में भी है। नाथद्वारा राजस्थान राज्य के राजसमंद जिला में स्थित है। यह उदयपुर से 48 किलोमीटर दूर उत्तर पूर्व में है।

श्रीनाथजी के वर्तमान विग्रह का प्राकट्य गोवर्धन पर्वत पर हुआ था। सदू पांडे की हजार गायों में से एक गाय नंदराय जी के गोवंश की थी। धूमर नाम की यह गाय प्रतिदिन अपराह्न में गोवर्धन पर्वत पर जाती थी। वहां एक स्थान पर खड़ी हो जाती और उसके थनों से दूध की धारा झरने लगती। गाय का पीछा करने पर सदू पांडे के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उन्हीं दिनों बल्लभाचार्य छत्तीसगढ़ के चंपारण में अपनी यात्रा पर थे। उन्हें एक अलौकिक प्रेरणा मिली। यात्रा की दिशा बदलकर वे आन्योर गांव आ गए, जहां सदू सपरिवार रहता था। बल्लभाचार्य उसे लेकर गोवर्धन पर्वत पर गए। वहां उन्हें पहली बार श्रीनाथजी के मुखारविंद का दर्शन मिला। पास के मंदिर में ही उन्होंने विग्रह की स्थापना करवाई। हिंदी के भक्तिकालीन ‘अष्टछाप’ कवियों का संबंध यहीं से था। कुम्भनदास श्रीनाथजी के चरणों में बैठकर संगीत-साधना करते थे। कृष्णदास प्रबन्धन में एक अधिकारी थे। सूरदास के अधिकांश पद श्रीनाथजी के सानिघ्य में लिखे गए। सूर की काव्य-ख्याति यहीं से फैली। अकबर की बेगम श्रीनाथजी की परम भक्त थीं। वे प्रतिदिन मंदिर के पूजा-अर्चना में शामिल होती थीं। दुर्भाग्य की बात यह थी कि अकबर के ही वंशज औरंगजेब के कारण श्रीनाथजी गोवर्धन छोड़ने के लिए विवश हो गए। बल्लभाचार्य-कुल के विट्ठलदासजी उन्हें रथ में बिठाकर सपरिवार नाथद्वारा ले आए। यहां तक आने में चार वर्ष लग गए थे। यह समय विट्ठलदासजी और उनके परिवार के लिए काफी संघर्षपूर्ण था।

इसी बीच श्रीनाथजी का जयघोष करता हुआ भीड़ का एक रेला आया और एक झटके में मैं गर्भगृह के बाहर। घूम-घूमकर देखने लगा वहां का दूधघर, गहनाघर, पानघर, मिश्रीघर, पेड़ाघर, फूलघर, रसोईघर, खर्चाभंडार, अश्वशाला, बैठक ….। एकदम हवेली जैसी बनावट है इस मंदिर की। इसी बीच भाई राकेश कुमार, रोहित और संतोष आते दिखाई दिए।

“आप यहां घूम रहे हैं ? छप्पन भोग में जाना नहीं है क्या ? उत्साह ज़ाहिर करते हुए संतोष ने एक साथ कई प्रश्न दाग दिए। “ओह ! तो छप्पन भोग की प्रक्रिया शुरू हो गई ? सूचना देने के लिए आप तीनों का आभार है भाई” कहते हुए मैंने स्वयं को उस स्थान की तरफ धकेला जहां सबको इकट्ठा होने के लिए कहा गया था।

“रुकिए…..रुकिए……।” रोहित ने जोर देकर चिल्लाया। “जी……..कहिए।” अपने को नियंत्रित करते हुए मैंने झुंझलाकर पूछा। “आप तो बंडी ही नहीं पहने हो?” मुस्कुराते हुए रोहित ने कहा।
” बंडी…….?”
” हाँ……. बंडी। बिना इसे पहने आप छप्पन भोग में भाग नहीं ले सकते।” मेरे उत्साह पर ठंडा पानी उलीचते हुए राकेश जी ने सही जानकारी मुहैया करा दी। “प्रयास करने में क्या जाता ?” मन को समझाते हुए आगे बढ़ गया। सामने नयनाभिराम दृश्य था। पुरुष बंडी (छप्पन भोग के लिए वस्त्र-विशेष) और स्त्रियां साड़ी पहने छप्पन भोग ढोने में व्यस्त। राजेश भाटिया अपने परिवार और सगे-संबंधियों के साथ कंधे पर मिष्ठानों की टोकरी रखे तेजी से आ-जा रहे थे, साथ ही व्यवस्थापकों को ज़रूरी हिदायतें देना नहीं भूलते, इतना बड़ा आयोजन जो इनके सौजन्य से था। अपने सिर  और कन्धों पर टोकरी रख, लोग स्वयं को धन्य समझ रहे थे। किसी के टोकरी से पूरी बाहर गिर पड़ती तो किसी का घी से बना बड़ा लड्डू। एक दूसरे को सम्भालते और आगे बढ़ते रहते। पूरा वातावरण फूलों की खुशबू और छप्पन भोग से मह-मह कर रहा था। ब्रजभूमि जैसा एहसास। समृद्धि और  ऐश्वर्य का साम्राज्य। दरिद्रता का नामोनिशान नहीं। लगता था नंदबाबा का महल साकार और सवाक् हो उठा है। दूसरे ही क्षण मन आधुनिक नंद बाबाओं पर केंद्रित होने लगा। इनके शीश महल शस्य श्यामला धरती की उर्वरता को लगातार अपनी ओर खींच रहे हैं। भूमि के पालक – ‘जवान और किसान’ लाचार। हाय ! बावरा मन भी किन चीजों का रोना लेकर बैठ गया ! इधर भोग की प्रक्रिया अंतिम दौर में थी। चारों ओर चहल-पहल, मुड़कर पीछे देखा तो एक वयोवृद्ध पुजारी, प्रौढ़ दम्पत्ति को ज्योतिष का ज्ञान पिला रहे थे। श्रद्धावनत युगल मूर्ति के पास बैठा इनका सत्रह वर्षीय पढ़ाकू बेटा एक किताब से जूझ रहा था। बीच-बीच में चेहरा उठाकर पुजारी को देखता जाता। पूरी यात्रा के दौरान इसकी नज़रें एक अंग्रेजी उपन्यास में गड़ी रहीं। बचपन से “किताबी कीड़ा” वाला मुहावरा पढ़ता और सुनता आ रहा हूँ, आज देख भी लिया।

कमरे में आराम करने के लिए मैं मंदिर परिसर से बाहर आ गया। गली में दुकानें पिछवायियों और पेंटिंग्स से भरी पड़ीं थीं। फुटपाथ पर गुप्ती, चाकू व मध्यम आकार के कटार खुलेआम बिक रहे थे। शाम में मंदिर का प्रसाद ठेलों पर सज जाता। असली घी के ये प्रसाद निहायत कम दामों में खरीदे जा सकते हैं। सुबह-सुबह खोमचों पर बनती हरबलयुक्त कांटेदार चाय बेहद जायकेदार लगती। यहां के लोग इसे पीकर अपनी दिनचर्या में लग जाते। व्यस्त और मस्त। कमरे तक आते-आते मैं थक गया था। बिस्तर पर पड़ते ही आँखें बंद होने लगीं। साथ ही अवचेतन मन में कुछ मटमैली आकृतियां उभरने लगीं। वे अपने सिरों पर टोकरियाँ रखे बड़ी तेजी से मेरी तरफ बढ़ रही थीं। वही मंदिर वाला दृश्य, किंतु धुंधला-धुंधला सा। दूसरे ही पल चीजें साफ-साफ दिखाई देने लगीं। अरे ! यह क्या ? ये लोग तो धूल-मिट्टी से सने नर-कंकाल हैं। टोकरियों में छप्पन भोग नहीं , ईंट और पत्थर हैं। इन्होंने मुझे चारों ओर से घेर रखा था। इनका सम्मिलित रुदन मुझे डराने लगा। मैं भागना चाहता था, दूर…..बहुत दूर।