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Thursday, September 10, 2026
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महाराष्ट्र में सियासी घमासान, सीएम के बंगले पर सहयोगी दलों की बैठक जारी

Political desk | Navpravah.com
महाराष्ट्र में राजनीतिक हलचल एक बार फिर तेज हो गई है।  मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के बंगले ‘वर्षा’ में महाअघाड़ी की बैठक जारी है। महाराष्ट्र में शिवसेना की सहयोगी पार्टी के मुखिया शरद पवार 25 मई को प्रदेश के राज्यपाल से मिले उसी दिन भाजपा नेता नारायण राणे भी राज्यपाल से मिले, जिसकी वजह से सरकार में तनाव की स्थिति बनी हुई है। इसी वजह से आज मुख्यमंत्री के बंगले पर सहयोगी दलों की बैठक जारी है।
कल (मंगलवार) शाम को एक प्रेस वार्ता के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने एक सवाल के जवाब में कहा कि सरकार स्वास्थ्य व्यवस्था में फ़ेल हो चुकी है और समझ नहीं पा रही कि करना क्या है। देवेंद्र फडणवीस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि, ‘राज्य सरकार अभी भी केंद्र की ओर से उपलब्ध कराई गई आर्थिक मदद भी खर्च नहीं कर पाई है। मैं यह समझ ही नहीं पा रहा हूं कि राज्य सरकार की प्राथमिकता क्या है, आज राज्य को सकारात्मक नेतृत्व चाहिए। मैं आशा करता हूं कि उद्धव ठाकरे उचित फैसले लेंगे।
राज्य में कोरोना वायरस के बढ़ते आँकड़े को देखते हुए भाजपा ने राष्ट्रपति शासन लागू करने की मांग की है। इस बैठक को अब पूरे घटनाक्रम से जोड़कर देखा जा रहा है। अब इस सियासी घमासान में शिवसेना का मुखपत्र सामना भी सामने आ गया है। मुखपत्र के सम्पादकीय में राज्यपाल पर तंज कसा गया है। सम्पादकीय में मीडिया पर भी सवाल उठाया गया है।

हालाँकि शरद पवार पहले ही राज्यपाल से हुई मुलाक़ात को शिष्टाचार भेंट बता चुके हैं। उन्होंने कहा कि इस बैठक का राजनीतिकरण करने की ज़रूरत नहीं है। यह बिल्कुल सामान्य और शिष्टाचार मुलाक़ात थी। 

बोलती तस्वीरें- “रजनी (1985)”

डॉ० कुमार विमलेन्दु सिंह | Navpravah Desk

1980 का दशक एक ऐसा समय था, जब भविष्य की मज़बूत नींव पड़ रही थी, सामाजिक चेतना का वह दौर शुरू हो चुका था, जिसमें भारत, सदियों की ग़ुलामी और दोहन के बाद, एक बार फिर अदम्य उत्साह से उठने को मचल रहा था। युवा शक्ति तैयार थी, लेकिन सरकारी तंत्र, जहाँ सबसे ज़्यादा ईमानदारी की आवश्यकता थी वहीं सबसे ज़्यादा भ्रष्टाचार था। उस समय किसी भी सरकारी विभाग में कार्यरत अधिकारी का घर देखकर आज भी ये मान लेना असंभव लगता है कि सिर्फ़ वेतन से ये बन कैसे सकता है।

भ्रष्टाचार इतना बढ़ा हुआ था कि सरकारी अधिकारियों का रवैया एकदम ज़िम्मेदारी से भरा नहीं था और इसका सीधा असर पड़ा आम लोगों के जीवन पर। जब भी कभी ऐसी स्थितियां बनती हैं, एक जागरूकता की आवश्यकता होती है और ज़िम्मेदारी होती है कलाकारों और साहित्कारों पर, कि वे आवाज़ उठाएं और बताएं कि क्या ग़लत हो रहा है और साथ ये भी, कि इसे ठीक कैसे किया जा सकता है। 1985 में ये बीड़ा उठाया, निर्भीक “रजनी” ने।

आनंद महेन्द्रू

यह धारावाहिक, दूरदर्शन के उन बेमिसाल धारावाहिकों में से है, जो सीधे सामाजिक मुद्दों से जुड़े थे। “रजनी” की भूमिका निभा रही थीं, प्रिया तेंदुलकर, जो कि प्रख्यात साहित्यकार और नाटककार, विजय तेंदुलकर की बेटी थीं।

पिता ‘विजय तेंदुलकर’ के साथ ‘प्रिया तेंदुलकर’

हर एपिसोड में एक समस्या होती थी और रजनी उस से भिड़ जाया करती थी, उस के समाधान निकाला करती थी।  इस धारावाहिक का निर्देशन, बासु चटर्जी ने किया था और इसे करन राज़दान और अनिल चौधरी ने लिखा था।  इसके तीन एपिसोड, महान साहित्यकार, मन्नू भंडारी ने भी लिखे।

करन राज़दान

करन राज़दान, उस दौर में लेखन में बहुत सक्रिय थे और ये वही अभिनेता थे, जो मशहूर फ़िल्म “डिस्को डांसर” में मिथुन चक्रवर्ती के प्रतिद्वंदी डांसर “सैम” बने थे। आगे जाकर इन्होंने, प्रिया तेंदुलकर से शादी भी की। आने वाले वर्षों में ये दूरदर्शन के लिए, अपनी लेखनी से और भी उपहार लाने वाले थे।

“ऐसे भी कई कलाकार थे जो आगे जा कर भारतीय सिनेमा के प्रसिद्ध चेहरे बन जाने वाले थे। सायाजी शिंदे, विक्रम गोखले, अमर उपाध्याय और भी कई नाम थे। इसके एक एपिसोड में शाहरुख ख़ान और एक एपिसोड में सुभाष घई भी दिखे थे। “रजनी” का किरदार पहले पद्मिनी कोल्हापुरे करने वाली थीं, लेकिन उनके मना कर देने के बाद ये रोल प्रिया तेंदुलकर को मिला।”

इसे “वीडियो सिटी इंडिया लि०” के अंतर्गत आनंद महेन्द्रू ने प्रोड्यूस किया था। उस दौर के धारावाहिकों की ख़ास बात ये होती थी, कि इसके शीर्षक गीत बहुत बड़े गायक, कवि और संगीतकार मिल कर बनाते थे।

“रजनी” का शीर्षक गीत, महान आशा भोंसले ने गाया था और इसे योगेश ने लिखा था। संगीत निर्देशन राजू सिंह का था। इसका हर एपिसोड 25 मिनट का होता था और लोग इन लम्हों में अपनी बातों को अभिव्यक्त होते हुए देखना, सुनना ख़ूब पसंद करते थे।

आजकल के टीवी सीरीज़ बनाने वाले लोग, इस धारावाहिक से बहुत कुछ सीख सकते हैं और विवाहेत्तर संबंधों के अलावा भी और भी कई मुद्दे हैं, ये जान सकते हैं।

प्रिया तेंदुलकर का निधन 2002 में हो गया, लेकिन “रजनी”, आज भी ज़िंदा है।

(लेखक जाने-माने साहित्यकार, फ़िल्म समालोचक, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)

“पाताल लोक जैसी हिन्दू विरोधी वेब सीरीज़ के लिए बने सेंसरबोर्ड, जाएंगे कोर्ट” – सुप्रीम कोर्ट वकील अलख आलोक श्रीवास्तव

न्यूज़ अपडेट | Navpravah Desk

हाल ही में प्रदर्शित वेब सीरीज “पाताल लोक” रिलीज़ के बाद से ही विवादों में घिर चुकी है। अब सुप्रीम कोर्ट के वकील अलख आलोक श्रीवास्तव जल्द ही ऐसी वेब सीरीज़ जो हिन्दू धर्म की संवेदनशील भावनाओं को आहत करती हैं, उनकी सेंसरशिप के लिए न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाने वाले हैं।

एडवोकेट अलख आलोक श्रीवास्तव की जनहित याचिका के प्रयासों से ही देश में रेप जैसे जघन्य अपराध में मृत्यु दण्ड का प्रावधान बनाया गया था। इसके साथ ही वो पालघर साधु हत्याकाण्ड में भी अहम कानूनी सहभागिता कर रहे हैं। कानून के अच्छे जानकार एड. अलख ने अब वेब सीरिज़ उद्योग के लिए सेंसर बोर्ड बनाया जाए ऐसी मांग भी प्रधानमंत्री से की है।

दरअसल पाताल लोक पर हिन्दू धर्म विरोधी फिल्मांकन का आरोप लगा है, जिसके चलते जल्द ही इसपर कानूनी कदम उठाए जाने वाले हैं। वकील अलख आलोक श्रीवास्तव ने इस बात की जानकारी अपने सोशल मीडिया अकाउंट से शेयर की है।

गौरतलब है कि बॉलीवुड अभिनेत्री अनुष्का शर्मा के प्रोडक्शन हाउस तले बनी वेबसीरीज पाताल लोक रिलीज होने के बाद से ही चर्चाओं में है। अमेजन प्राइम ओटीटी पर रिलीज़ हुई इस सीरीज़ को काफी लोग पसंद कर रहे हैं, लेकिन इस सीरीज़ में फिल्माए गए दृश्यों/डायलॉग्स पर अब धार्मिक भावनाएँ आहत करने का आरोप लग रहा है जिसके साथ फ़िल्म अभिनेत्री, और क्रिकेटर विराट कोहली की पत्नी अनुष्का शर्मा मुश्किलों में आ गई हैं।

इसके पहले सिख धर्म के लोगों द्वारा भी उनकी धार्मिक भावनाओं को आहत करने का आरोप लगाया गया था। निर्माताओं पर इस वेब सीरीज़ के कुछ दृश्य ब्राह्मण विरोधी व हिन्दू धर्म की साख को ख़राब करने के नीयत से फिल्माए गए हैं, ऐसे आरोप लग रहे हैं।

मज़दूरों की दुर्दशा पर सुप्रीम कोर्ट का स्वतः संज्ञान, 28 मई को सुनवाई

न्यूज़ डेस्क | navpravah.com
देश में लगाए गए लॉकडाउन की वजह से विभिन्न स्थानों पर फंसे प्रवासी श्रमिकों की समस्याओं का संज्ञान सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः लिया है। न्यायालय ने इस मामले की सुनवाई के लिए २८ मई की तारीख़ निर्धारित की है और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से इस मामले में सहयोग करने को कहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मज़दूरों को हुई परेशनियाँ दुखद हैं और इसमें केंद्र और विभिन्न राज्य सरकारों दोनों ओर से कमियाँ सामने आई हैं। कोर्ट ने कहा कि प्रवासी मजदूरों को आवास, भोजन और यात्रा की सुविधा देने के लिए तत्काल कदम उठाए जाने की जरूरत है।
ग़ौरतलब है कि लॉकडाउन के चलते लाखों की संख्या में प्रवासी श्रमिक उन राज्यों में फंस गए, जहां वे काम करने गए थे। आय और भोजन का कोई साधन न होने के चलते कई श्रमिक घर जाने के लिए पैदल ही सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा पर निकल गए थे।
हालांकि, बाद में केंद्र सरकार ने इन मजदूरों को घर पहुंचाने के लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेन और बस सुविधा संचालित करने का फैसला किया था। ज्ञातव्य है कि पलायन की वजह से कई दुखद घटनाएँ प्रकाश में आईं। कई दुर्घटनाओं ने सरकार कार्यप्रणाली पर प्रश्न खड़े किए हैं।

“कथा (1982)” -प्रतीक्षा, संयम, प्रेम के किस्से का खूबसूरत बयान

डॉ० कुमार विमलेन्दु सिंह | Cinema Desk

सभी देश, काल और परिस्थितियों में कहानियों का विशेष महत्व  रहा है। कहानियां , कई आविष्कारों का आधार रहीं है और कई मान्यताओं की संस्थापक भी। कुछ कहानियां तो ऐसी हैं कि उनकी उम्र के बारे में किसी को नहीं पता।

कब से खरगोश, चाँद पे बैठा है, या कब से मुर्गा हमें सुबह उठाने की कोशिश करता आ रहा है या कब से सूरजमुखी, सूरज के प्रेम में है, इन सवालों का जवाब आज तक किसी को नहीं पता। ये भी नहीं पता कि ऐसा क्या हुआ था कि खरगोश रास्ते में सो गया और कछुआ जीत गया? क्या कछुआ जीत जाने के बाद हमेशा खुश रहा ? क्या फिर खरगोश कभी उस से नहीं मिला ? ऐसे सवाल हमेशा ज़ेहन में आते रहे और इन्हीं कहानियों को, अलग-अलग कलेवर में, कहानीकार परोसते रहे। मराठी नाटककार , एस० जी० सथ्ये ने भी खरगोश और कछुए की इस कहानी को अपने नाटक “ससा अणि कसव” में एक नए अंदाज़ में दिखाया और वहीँ से उठा कर, प्रतिभाशाली फिल्मकार , सई परांजपे ने 1983 में  फिल्म बनायी, और फिल्म का नाम था “कथा”।

सई परांजपे

फिल्म में जो किरदार थे वे खरगोश और कछुए की प्रवृत्ति लिए मनुष्य थे और उनकी यही प्रवृत्तियां उनके जीवन में घटने वाली घटनाओं और उनके भविष्य का निर्धारण करते नज़र आये हैं। नसीरुद्दीन शाह (राजाराम), एक मेहनती और सीधा सादा आदमी होता है, जो एक साधारण नौकरी करता है और अपने पड़ोस में रहने वाली दीप्ति नवल (संध्या सबनीस) से प्रेम तो करता है लेकिन उसे बता नहीं पाता। जीवन एक धीमी गति के साथ और ऐसी ही परिस्थितियों के साथ उस चॉल में चल रही होती है जहां राजाराम  और संध्या रहते है।

कोई भी किरदार उस माहौल को बदलने के लिए कुछ नहीं करता है। लेकिन उन सब के मन में एक परिवर्तन की आशा ज़रूर होती है। सब जीवन की एकरसता के आगे सर झुका कर अपनी अपनी ज़िन्दगी जी रहे होते है कि अचानक प्रवेश होता है , बाशु का, जो कि राजाराम का मित्र होता है।  वो चॉल में आता है और धीमे से उस माहौल को अचानक से तेज़ कर देता है। अपने और अपनी सफलताओं की झूठी कहानियां सुना कर वो सब का मन मोह लेता है और राजाराम के ही ऑफिस में एक बड़े पद पर नौकरी भी ले लेता है,  संध्या भी उसके धोखे में पड़कर उस से प्रेम करने लगती है और उसके माता पिता बाशु से उसकी शादी कराने को भी तैयार हो जाते हैं।

फ़िल्म का एक दृश्य

इन सब घटनाओं के बीच, राजाराम का जीवन आंशिक अभिव्यक्ति और कठोर निराशा के बीच डोलती रहती है, लेकिन वो अपनी प्रवृत्ति, यानि कि सहनशील होना, प्रेम करते रहना, नहीं छोड़ पाता, वहीँ दूसरी ओर उसका मित्र बाशु भी अपनी आदतें नहीं छोड़ पाता और ऑफिस के मालिक की ही पत्नी और बेटी दोनों के साथ प्रेम प्रसंग में होता है। एक दिन वो पकड़ा जाता है और ये वही दिन होता है, जिस दिन संध्या के माता पिता शादी के लिए बाशु की प्रतीक्षा कर रहे होते है।  बाशु नहीं आता है और इस बात से आहत, संध्या का हाथ राजाराम थामने को तैयार हो जाता है।  संध्या इसके बाद बताती है कि बाशु के साथ उसके सम्बन्ध बहुत अंतरंग रहे होते हैं और बहुत हद तक संभव है कि वो गर्भवती भी हो चुकी है, उस से। राजाराम फिर भी उसे अपना लेता है।

फ़िल्म के एक दृश्य में ‘नसीरुद्दीन शाह’ व ‘फारुख शेख’

फिल्म में राजाराम की लगातार प्रतीक्षा और संयम उसे अपने प्रेम के साथ जोड़ ज़रूर देता है, लेकिन इस प्रश्न के साथ कि इतने प्रतीक्षा और संयम के बाद जो उसे प्राप्त होता है, क्या उसके लिए इतनी तपस्या सही थी? बाशु जब अपनी झूठी कहानियों के बल पर सब कुछ हासिल करता चला जाता है तो यह प्रमाणित भी करता चला जाता है कि प्रशंसा और चापलूसी से किसी को भी जीता जा सकता है और किसी को भी पीछे धकेला जा सकता है। जब बाशु ये दिखाता है कि कंपनी के मालिक की तरह, उसे भी गोल्फ पसंद है तो उसके माध्यम से यह दिखाया जा रहा होता है कि आने वाले समय में, सौंदर्य, वीरता और बुद्धिमत्ता के सारे पर्याय, वही निर्धारित करेंगे जो धनी होंगे और जो श्रम करेंगे इन्हें धनी बनाये रखने के लिए, वे अपने उत्थान के सबसे ऊंचे स्थल पर भी, प्रशंसक मात्र बन पाएंगे।

“फिल्म का निर्देशन सई परांजपे ने किया है और फिल्म का सार्थक संगीत, राजकमल ने दिया है।  ये २ घंटे २१ मिनट की एक पूरी फिल्म है। सई परांजपे की 1980 में आयी फिल्म को रिलीज़ करने में, बासु चटर्जी ने देरी कर दी थी, जिस से सई नाराज़ थीं।  इसीलिए, इस फिल्म में उन्होंने फ़ारुक़ शेख का नाम बाशु रखा था, जो कि एक निगेटिव किरदार था।” 

खरगोश और कछुए का वही पुराना क़िस्सा, एक नए अंदाज़ में, हमारे लिए कई सवाल, कुछ जवाब और ढेर सारा मनोरंजन लेकर “कथा” के रूप में सामने आया और जब भी भारत में, बेहतरीन फिल्मों की बात होगी, इस फिल्म की भी बात ज़रूर होगी।

(लेखक जाने-माने साहित्यकार, फ़िल्म समालोचक, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)

देखें फ़िल्म

‘भारत का लॉकडाउन फेल’ -राहुल गाँधी का सरकार पर हमला

न्यूज़ अपडेट | Navpravah Desk

राहुल गाँधी ने अपनी ऑनलाइन प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिये देश के हालात पर चर्चा करते हुए सरकारी नीतियों को असफल ठहरा दिया है।

राहुल ने कहा, ‘नरेंद्र मोदी जी ने कहा था कि 21 दिनों में कोरोना की लड़ाई जीती जाएगी करीब साठ दिन हो गए हैं। हिंदुस्तान पहला देश है जो बीमारी के बढ़ते वक्त लॉकडाउन बंद कर रहा है। हम आदर से सरकार और प्रधानमंत्री से पूछना चाहते हैं कि अब आपका प्लान बी क्या है?’

समाचार एजेंसी ANI ने ट्वीट कर इस बात की पुष्टि की है। राहुल गांधी ने सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि, ‘भारत एक मात्र ऐसा देश है जहाँ तेज़ी से वायरस फ़ैल रहा है और ऐसे में हम लॉकडाउन हटा रहे हैं। भारत का लॉकडाउन फेल हो गया है। हम असफल लॉकडाउन के परिणामों का सामना कर रहे हैं।

क्या महाराष्ट्र में सरकार बनाने की तैयारी में है BJP-NCP ?

Political desk | Navpravah.com
महाराष्ट्र में सियासी सरगर्मी तेज़ हो गई है। महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी से भाजपा नेता नारायण राणे और शरद पवार की अलग-अलग मुलाक़ात ने राजनीतिक गलियारे की हलचल बढ़ा दी है।
देश की आर्थिक राजधानी मुंबई वायरस का हॉटस्पॉट बनी हुई है। जिसको लेकर भाजपा ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की है। इस पूरी घटना को लेकर कांग्रेस का कहना है कि भाजपा से सत्ता से बाहर होना बर्दाश्त नहीं हो रहा है। इसी बीच पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता नारायण राणे ने राज्यपाल से मुलाकात कर सेना बुलाने की मांग की है। वहीं शिवसेना सांसद संजय राउत का कहना है कि सरकार मजबूत है और चिंता की कोई बात नहीं है।
भाजपा नेता नारायण राणे ने सरकार की विफलता गिनाते हुए कहा कि इस सरकार में कोरोना से सामना करने की क्षमता नहीं हैं। इसलिए राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया जाना चाहिए। राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी से मुलाकात के बाद राणे ने सेना बुलाने की भी बात कही है।
राणे यहीं नहीं रुके, उन्होंने कहा, ‘हमने राज्यपाल जी से अनुरोध किया है कि लोगों की जान बचाने, उनको सही इलाज देने के लिए महानगर पालिका और राज्य सरकार के अस्पतालों को सेना के हवाले कर दिया जाए।’ राणे ने दावा किया है कि उद्धव ठाकरे अनुभवहीन मुख्यमंत्री हैं, जो पुलिस और प्रशासन को नहीं चला सकते हैं। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार के अस्पतालों की हालत खराब है।
राज्यपाल से मुलाक़ात को लेकर शरद पवार ने स्पष्ट किया कि यह मुलाक़ात राज्यपाल के आमंत्रण पर हुई, जिसमें किसी भी तरह का राजनीतिक मुद्दा नहीं था। उन्होंने इस मुलाक़ात को शिष्टाचार भेंट बताया।

Trailer Review: “रक्तांचल” में पूर्वांचल को ख़ून से रंग दिया जाएगा

ट्रेलर रिव्यू |Cinema Desk

पहली बात, 18 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए यह वेब सीरीज़ नहीं है। दूसरी बात, पूर्वांचल कैसे बना रक्तांचल, बस इतनी सी कहानी है वेब फ़िल्म ‘रक्तांचल’ की। वेब सीरिज़ अनावश्यक गाली-गलौज, सस्ता सेक्स फ़िल्मांकन और बेवजह की हवाबाज़ी का मज़बूत चलन है। यही सब है वेब सीरीज़ रक्तांचल में भी।

रक्तांचल खनन माफ़ियाओं, शराब के ठेकों, राजनेताओं और पुलिसवालों के इर्द-गिर्द घूमती है। ये सब मिलकर सिस्टम को कैसे चलाते हैं, यही बेस है वेब सीरीज़ का। गाली और गोली तो इतनी मात्रा में मिलेगी कि एक पूरी डिक्शनरी तैयार हो जाये।

वेब सीरीज़ 80 के दशक की एक सच्ची घटना पर आधारित है। उस दौर में पूर्वांचल में खनन माफ़िया, शराब कारोबारी और राजनेताओं की कितनी ज़्यादती थी, यही फ़िल्म में दर्शाया गया है। ट्रेलर देखकर प्रतीत होता है कि निर्देशक का भरोसा सिनेमाई ताम-झाम से अधिक गाली और गोली पर है।

ट्रेलर देखकर तो ये ओटीटी प्लेटफ़ार्म पर आई तमाम वेब फ़िल्मों सी लग रही है, बाक़ी वेब सीरीज़ रीलीज़ होने के बाद बताया जाएगा।

देखें ट्रेलर (18 साल से कम उम्र के बच्चे यहाँ न देखें)-

कोरोना छोटा मामला, बड़ी समस्याओं के लिए रहें तैयार- चीनी वायरोलॉजिस्ट

हेल्थ डेस्क | navpravah.com 

चीन की एक प्रमुख वायरोलॉजिस्ट ने आज एक बड़ा बयान देते हुए कहा है कि कोरोना वायरस महज एक ‘छोटा मामला’ है, अभी तो बड़ी समस्यायें हमारा इंतजार कर रही हैं, ये तो बस शुरुआत है।

वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी की डिप्टी डायरेक्टर शी झेंगली ने चीन के सरकारी टेलिविजन पर बात करते हुए नए वायरसों को लेकर चेतावनी दी है कि कोरोना वायरस से भी बड़ा वायरस आयेगा। डेली मेल की रिपोर्ट के अनुसार, झेंगली चमगादड़ों में मौजूद बैट कोरोना वायरस पर रिसर्च कर चुकी हैं। शी झेंगली ने कहा कि, वायरस को लेकर जो रिसर्च किए जाते हैं, उसको लेकर सरकार और वैज्ञानिकों को पारदर्शी रहना चाहिए, ताकि सही बातें व आंकड़े लोगों तक पहुंच सके।

झेंगली ने आगे कहा कि अगर हम इंसानों को अगली आने वाली संक्रामक बीमारी से बचाना है, तो हमें जीवों में मौजूद अज्ञात वायरस को लेकर पहले से जानकारी जुटाकर चेतावनी देनी होगी, ताकि उस वायरस को पहले ही रोक ली जाये‌।

दुनिया के कई देश काफी वक्त से वुहान स्थित चीनी लैब को शक की निगाह से देख रहे हैं। अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने यह भी कहा था कि इस बात का बड़ा सबूत है कि कोरोना वायरस का संक्रमण चीनी लैब से फैला है, लेकिन अभी तक ऐसा साबित नहीं हुआ है।

WHO ने हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन दवा के क्लीनिकल ट्रायल पर लगा दी रोक

न्यूज़ अपडेट | Navpravah Desk

जिस दवा को कोरोना वायरस के खिलाफ एक कारगर हथियार मानकर क्लीनिकल ट्रायल किये जा रहे थे, उसी पर WHO ने रोक लगा दी है।

दुनिया के कई देशों में कोरोना वायरस की रोकथाम के लिए मलेरिया की इस दवा के ट्रायल हो रहे थे। हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन वही दवा है जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने कोरोना वायरस से बचाव का सबसे कारगर दवा माना था

WHO ने बयान जारी कर कहा है कि हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन मलेरिया से बचाव के लिए सबसे प्रभावी दवा है, लेकिन ये दवा कोरोना वायरस से बचाव के लिए कारगर नहीं है।

सुरक्षा कारणों को देखते हुए दुनिया के विभिन्न देशों में चल हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन के ट्रायलों को तत्काल प्रभाव से बंद करने के निर्देश दिए गए हैं