Betaal Review: अब पता चला इसका नाम ‘बे-ताल’ क्यों रखा!

अमित द्विवेदी | Cinema Desk

नवप्रवाह रेटिंग : ⭐⭐

“बेताल पचीसी” वाले हिंदी प्रेत से प्रेरित इस वेब सीरीज़ में आपको अंग्रेजी भूत बवाल काटते नज़र आएंगे। लेकिन पूरी सीरीज़ देखने के बाद पता लगता है कि इसका नाम “बे-ताल” क्यों रखा गया होगा। सीरीज़ तो हॉरर है, लेकिन किसी भी सीन में डर नहीं लगता। प्रेत आत्माओं को गोली और ग्रेनेड से मारकर गिराने वाले कलाकारों के चेहरे का लेस-एक्सप्रेशन देखने लायक नहीं है।

इस वेब सीरीज़ के रीलीज़ होने के पहले ही मेकर्स पर कहानी के चोरी हो जाने का आरोप लग चुका है और मराठी लेखक समीर न्यायालय तक पहुंच चुके हैं। रीलीज़ होने के पहले ऐसा लगा था कि सीरीज़ कुछ कमाल होगी, लेकिन देखकर लगता है कि ऐसी सीरीज़ में कहानी चोरी करने की क्या आवश्यकता थी?
खैर, कहानी की तरफ मुड़ते हैं।

कहानी-
एक आदिवासी गाँव में कंस्ट्रक्शन का काम शुरू होता है। गाँव के एक टनल को तोड़कर कंस्ट्रक्शन कंपनी उसे हाइवे में मिलाना चाहती है। क्योंकि आने वाले कुछ दिनों में ही उसका उद्घाटन मुख्यमंत्री को करना है। कंपनी पर ये काम जल्दी करने का दबाव होता है, जिसके लिए वह कुछ भी करने के लिए तैयार होती है। लेकिन टनल तोड़ने की बात का गाँव के लोग विरोध करते हैं। बात जब बनती नहीं दिखती, तो प्रोजेक्ट डायरेक्टर स्पेशल फ़ोर्स की मदद लेता है। सीरीज़ में स्पेशल फ़ोर्स को भ्रष्ट दिखाया गया है। ये पूरा ऑपरेशन चीफ कमांडेंट त्यागी पैसे लेकर करती हैं। स्पेशल फ़ोर्स गाँव पहुँचती है और गाँव वालों को दूर शिफ्ट करवाने का आश्वासन देती है, लेकिन वे मानने को तैयार नहीं होते। पहले तो फ़ोर्स गाँव वालों पर लाठी चार्ज करती है, उसके बाद उन पर गोलियां भी चलाती है।

गाँव के लोग फ़ोर्स वालों को बताते हैं कि टनल में घुसने की कोशिश न करें क्योंकि वहाँ प्रेत आत्माएं हैं, जो सब को मार डालेंगी। लेकिन फ़ोर्स यानि बाज़ स्क्वाड को ये बातें दकियानूसी लगती हैं। बाज़ स्क्वाड गाँव वालों की बात नहीं मानता और टनल में घुस जाता है, उसके बाद शुरू होता है प्रेत आत्माओं का ताण्डव। बाज़ स्क्वाड और प्रेत आत्माओं के बीच होने वाले इसी ख़ूनी संघर्ष में बाज़ स्क्वाड कैसे बाहर आता है और उसे किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, यही कहानी है सीरीज़ ‘बेताल’ की।

“एक बात तो माननी पड़ेगी, सीरीज़ में मैसेज की कमी तो नहीं है। नक्सलियों के नामपर कैसे सुरक्षाबल राजनीतिक और उद्योगपतियों के दबाव व लालच में गलत काम करने लगती है, ये एक सीरियस सब्जेक्ट है।”

बहरहाल, जब बनानी ही थी तो सीरीज़ के भूत थोड़े मंहगे वाले बनवाने चाहिए। प्रोड्यूसर के पास कौन सा पैसों की कमी है। “रेसिडेंट ईविल”,”ट्रेन टू बुसान”,”आई एम लेजेंड” जैसी फिल्मों के दर्शकों को आप ये ज़ीरो वाट बल्ब सरीखी लाल आंखों वाले प्लास्टिक के भूत दिखाकर महफ़िल लूटना चाहते हैं, तो सब बे-ताल ही होगा।

एक सीन जहाँ भूत और जीतेन्द्र जोशी की दोस्ती दिखाई गई है

भूत भी ऐसा नकारा जो पूरी आर्मी तो खड़ी कर सकता है, लेकिन एक दरवाज़े के बाहर उसको नानी याद आ जाती है। महज़, माँ-बहन की भद्दी गलियों के मत्थे फिल्में चलतीं तो आज का ओटीटी ऐसी फूहड़ सीरीजों/फिल्मों से भरा पड़ा है।

देखें या नहीं-
सीरीज़ अगर हॉरर की वजह से देखना चाहते हैं, तो आप को निराशा होगी। क्योंकि यह आपको डरा पाने में सफल नहीं होगी। अभिनय भी कुछ खास नहीं है। विनीत सिंह जैसे मंझे हुए कलाकार से जो अभिनय करवाया जा सकता था, उसकी भी कमी दिखी। किसी भी अभिनेता के चेहरे पर डर नहीं नज़र आता।

(अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के आधार पर की गई समीक्षा एक जटिल काम है, जिसके अंतर्गत केवल पॉजिटिव कमेंट्स की उम्मीद रखना अनुचित है। हमारे यहाँ पेड रिव्यू जैसी भी कोई व्यवस्था उपलब्ध नहीं है।)

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