अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ट्विटर के खिलाफ नए कड़े नियम लाने या उसे बंद करने की धमकी दी है, ट्रंप ने ट्वीट कर कहा कि, कंपनी रूढ़िवादी आवाजें दबाने की कोशिश कर रही है, जो कि सही नहीं है।
एक अन्य ट्वीट में ट्रंप ने कहा कि, बड़ी कार्रवाई की जाएगी, ट्रंप ने आगे कहा कि, टेक कंपनी पागल होती जा रही है, अब अमेरिकी राष्ट्रपति की इस धमकी पर ट्विटर के सीईओ ने जवाब दिया है पलटकर जवाब दिया है।
ट्विटर के सीईओ जैक डोर्सी ने अमेरिका में होने जा रहे राष्ट्रपति चुनाव में दखल देने के आरोपों को खारिज करते हुए ट्वीट किया है कि, फैक्ट चेक के लिए एक कंपनी के तौर पर आखिर कोई न कोई जिम्मेदार होगा तो वह मैं हूं।
उन्होंने आगे कहा कि, कृपया फैक्ट चेक का काम हमारे कर्मचारियों पर ही छोड़ दिया जाए, हम दुनिया भर के चुनावों के बारे में गलत और विवादित जानकारी के बारे में बताना जारी रखेंगें।
उल्लेखनीय है कि ट्विटर ने अमेरिकी राष्ट्रपति के दो ट्वीट पर फैक्ट चेक की चेतावनी दी थी जिसके बाद ट्रंप ने यह धमकी दी है, हालांकि गौर करने वाली बात यह है कि अमेरिका में राष्ट्रपति खुद कंपनियों को विनियमित या बंद नहीं कर सकते हैं।
कोरोना ने पूरी दुनिया दुनिया की हालत खराब कर रखी है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। पिछले 2 महीने से देश लॉक डाउन में है। ऐसे में मध्यप्रदेश के भोपाल में सांसद प्रज्ञा ठाकुर के लापता होने के पोस्टर लगाए जा रहे हैं। कोरोना अपना काम कर रहा है, राजनेता अपना।
कथित पोस्टर्स में प्रज्ञा ठाकुर की फोटो के साथ लिखा गया है, “गुमशुदा की तलाश, कोरोना महामारी में भोपाल की जनता परेशान। सांसद प्रज्ञा ठाकुर कहाँ लापता..”।
हालांकि पोस्टर में “कहाँ” की जगह “कहा” छपा हुआ है क्योंकि ऐसी हरकतें करने और करवाने वाले नेता अक्सर कम पढ़े लिखे, अनपढ़, या भाषा अज्ञानी होते हैं।
अब देखना यह है कि प्रज्ञा ठाकुर के विरुद्ध इस पोस्टर वॉर में भाजपा की तरफ से कौन सा वार किया जाएगा।
महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में सातवीं कक्षा के एक छात्र ने अपने अनोखे आविष्कार से सबको चौंका दिया है। छात्र ने एक रोबोट बनाया है, जो बिना मरीजों के सम्पर्क में आए दवाइयों और खाने की डिलीवरी करेगा।
औरंगाबाद के सातवीं कक्षा के छात्र साई सुरेश रंगदाल ने एक ऐसा रोबोट बनाया है, जो बिना सम्पर्क में आए खाने और दवाइयों का वितरण करेगा। यह बैट्री से संचालित होगा और किसी भी स्मार्टफ़ोन से नियंत्रित किया जा सकेगा। साई सुरेश ने बताया कि यह एक किलोग्राम तक भार ले जा सकता है। साई सुरेश ने कोरोना के मौजूदा हाल और बढ़ते मरीजों की संख्या को देखते हुए संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए रोबोट का विकास किया है।
साई ने कहा कि ये रोबोट बनाने के पीछे यही कारण था कि मेडिकल स्टाफ़ को इससे सहूलियत मिले। उन्होंने बताया कि मेडिकल स्टाफ़ में संक्रमण का मामला बढ़ता जा रहा है, ऐसे में यह रोबोट काफ़ी मददगार होगा और मेडिकल स्टाफ़ में संक्रमण रोकने में कारगर सिद्ध होगा।
देश में अब तक कोरोना वायरस संक्रमण के मामले एक लाख साठ हज़ार के पार पहुंच गए हैं और 4,700 से ज्यादा लोगों की सिर्फ कोविड-19 से मौत हो चुकी है। भारत दुनिया में कोरोना संक्रमित देशों की सूची में नौवें स्थान पर है।
कोरोना वायरस के संक्रमण के कारण देश में लम्बे समय से लॉकडाउन है, इससे प्रवासी कामगार व श्रमिक ज्यादा प्रभावित हुए हैं, इसी के मद्देनजर यूपी के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ की मौजूदगी में आज नौ लाख लोगों को रोजगार देने के लिए एमओयू (MOU) पर साइन हुआ।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि, हर हाथ को काम मिले, इस नीति पर प्रदेश सरकार काम कर रही है। इसी नीति के तहत इंडियन इंडस्ट्री एसोसिएशन सहित अन्य औद्योगिक संस्थाओं के साथ आज एमओयू साइन किया जा रहा है।
सीएम योगी ने निवेशकों से अपील करते हुए कहा कि, उनके योगदान से प्रदेश में स्वदेशी वस्तुओं के उत्पादन को गति मिलेगी। साथ ही बहुत से लोगों को रोजगार भी प्राप्त होगा। मुख्यमंत्री के निर्देश पर कृषि उत्पादन आयुक्त की अध्यक्षता में गठित विभिन्न कमेटियों में से एक कमेटी प्रमुख सचिव समाज कल्याण मनोज सिंह की अध्यक्षता में भी गठित की गई।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सरकारी आवास पर इस कार्यक्रम में सूक्ष्म, मध्यम तथा लघु उद्योग में काम के बड़े अवसर निकाले गए हैं। यूपी सरकार ने अपने घर वापस लौटे 26 लाख प्रवासी श्रमिकों को रोजगार देने का वादा किया है।
एक निजी पत्रिका से बात करते हुए प्रमुख सचिव समाज कल्याण श्री सिंह ने बताया कि फिलहाल ऐसे एक लाख दलित कामगारों को स्वत: रोजगार से जोड़ने की तैयारी की गई है। केंद्र सरकार के स्पेशल कमपोनेंट प्लान के तहत इन दलित कामगारों को आटा चक्की, लाण्ड्री, हेयर कटिंग सैलून, टेलरिंग आदि का रोजगार शुरू करने के लिए 50 हजार से डेढ़ लाख रुपये तक का ऋण बैंकों से उपलब्ध करवाया जाएगा।
दिल्ली में एक बार फिर से कोरोना के मामले बढ़ते जा रहे हैं, जिसकी वजह से पड़ोसी राज्य हरियाणा ने सीमा सील करने का निर्देश जारी कर दिया। गुरुवार शाम को यह निर्देश जारी किया गया और शुक्रवार सुबह से ही सीमा पर पांबंदियाँ लग गईं।
हरियाणा के इस ऐक्शन से वैध पास धारकों को भी भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। इसके चलते दिल्ली-गुरुग्राम सीमा पर लम्बा जाम लग गया। यही हाल बदरपुर सीमा पर भी है। यहां बदरपुर बॉर्डर के पास बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं, जिनके पास कार्ड है लेकिन उनका कहना है कि उन्हें आगे नहीं जाने दिया जा रहा है
ग़ौरतलब है कि गुरुवार को ही हरियाणा के गृह मंत्री अनिल विज ने इस आदेश को जारी किया था। उन्होंने कहा कि दिल्ली से सटे जिले हरियाणा के लिए बहुत बड़ी चिंता है। हमारे 80 फीसदी केस उन जिलों में हैं, जो दिल्ली से सटे हैं। ऐसे में बेहद जरूरी है कि दिल्ली से सटे हरियाणा बॉर्डर को सील रखा जाए। हरियाणा सरकार ने फ़ैसला तो ले लिया, लेकिन आनन-फ़ानन में लिया गया यह फ़ैसला उन लोगों के लिए सिरदर्द बन गया है, जो हरियाणा से दिल्ली काम पर जाते हैं, इनके पास सरकार द्वारा जारी यात्रा पास उपलब्ध है।
कोरोना के बढ़ते मामले में अनिल विज ने दावा किया कि हरियाणा में रोज गुरुग्राम और फरीदाबाद जैसे शहरों में केस बढ़ रहे हैं। और इसकी वजह है दिल्ली से सीधा संपर्क। इसी के बाद बॉर्डर सील करने का फैसला लिया गया।
मुल्क़ का तक़सीम होना और एक लकीर के दोनों तरफ़ हमेशा के लिए अलग बसर करने की कवायद में लगना, कुछ लोगों के लिए सियासत था, कुछ के लिए हसरत लेकिन सब के लिए ये फ़ुरक़त भी था। कितना ख़ून बहा, कितनी जानें गईं, कितने सपने जले और कितनी तमन्नाएं दफ़न हुईं, इसका हिसाब नहीं और जो बच गए लकीर के दोनों तरफ़, उनके पास माज़ी की रोशनी और मुस्तक़बिल के सन्नाटे के अलावा कुछ भी न था। बस एक चीज़ मुसलसल चल रहा थी और आगे बढ़ रहा था, वो था समय। समय अपने साथ कई बुनियादों को हिला रहा था और ऐसी ही एक परिवार की बुनियाद की कहानी थी, “बुनियाद”।
निर्देशक ‘रमेश सिप्पी’ बुनियाद के सेट पर
1986 वो साल था, जब दूरदर्शन के पिटारे से, एक के बाद एक ऐसे नायाब तोहफ़े निकल रहे थे, जिन्हें और जिनकी यादों को आज तक सहेज कर रखा गया है। “बुनियाद”, एक बहुत बड़ा धारावाहिक था। ये हर मामले में बड़ा था। जी० पी० सिप्पी के संरक्षण में, इसके निर्माण का काम अमित खन्ना ने संभाला और निर्देशन, रमेश सिप्पी और ज्योति सरूप ने किया। ये एक सोप ओपेरा था और भारत के टेलीविज़न के इतिहास में, यही पहला धारावाहिक था, जो सप्ताह में एक से ज़्यादा दिन दिखाया जाता था। ये सप्ताह में दो दिन प्रसारित किया जाता था।
“ये वो दौर था, जब दूरदर्शन के निदेशक, हरीश खन्ना थे और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के सचिव, एस०एस० गिल थे। इन दोनों ने दूरदर्शन का द्वार, निजी प्रोडक्शन हाउसेज़ के लिए खोला और जब, अमित खन्ना और रमेश सिप्पी ने इसकी ज़िम्मेदारी ली, तो कोई कसर न छोड़ी। कला निर्देशन के लिए, सुधेन्दु रॉय जैसे बेहतरीन निर्देशक को चुना गया, और वेश-भूषा के लिए सरोश मोदी को चुना गया।”
200 लोगों की टीम के 15 महीनों की मेहनत के बाद ये धारावाहिक बना और इसके 104 एपिसोड प्रसारित किए गए। सिनेमाटोग्राफ़ी, के०के० महाजन जैसे दिग्गज ने किया और संपादन एम०एस०शिंदे ने किया। इतने बड़े नाम इस धारावाहिक से जुड़े थे कि इसका स्तर बहुत उठ चला था।
धारावाहिक के सभी मुख्य पात्र
कलाकारों की बात की जाए, तो आलोकनाथ (हवेलीराम) के परिवार की ये कहानी उनकी आने वाली पीढ़ियों की ज़िंदगी तक चली। इतने बड़े कालखंड में बदलते तौर तरीकों और वेश-भूषा का भी पूरा ध्यान, निर्माता और निर्देशक ने रखा। अनीता कंवर (लाजो जी), गोगा कपूर (भाई आत्माराम),किरन जुनेजा (वीरावली), विजयेन्द्र घाटगे (वृषभान) के अलावा नीना गुप्ता, सोनी राज़दान, दलीप ताहिल, कंवलजीत, मज़हर ख़ान, लीला मिश्रा, कृतिका देसाई, गिरिजा शंकर, अभिनव चतुर्वेदी, राजेश पुरी, अरुण जोशी, विनोद नागपाल और अंजना मुमताज़ जैसे कई और बेहतरीन कलाकारों ने काम किया।
इतनी शानदार तैयारी के साथ, ये धारावाहिक दूरदर्शन पर आया कि इसने सबको अपना बना लिया। इस धारावाहिक के पहले एपिसोड में ही एक संवाद में अनीता कंवर (लाजो जी) कहती हैं, “कैसी रौनकें हुआ करती थीं इस गली में, लेकिन अब तो…” और यहीं से दर्शक, अपनी जिज्ञासा और कई सवाल लिए कथानक से सीधा जुड़ जाता है।
सुनें शीर्षक गीत-
इस धारावाहिक का शीर्षक गीत मशहूर गायक अनूप जलोटा ने बनाया था और हर एपिसोड के शुरू में जब ये बजता था, तो ज़िंदगी का एक फ़लसफ़ा दिल दोहराने लगता था, कितनी सच है ये बात कि:
“कहीं तो है सपना और कहीं याद
कहीं तो हंसी रे, कहीं फ़रियाद
पलछिन पलछिन तेरे मेरे
जीवन की यही बुनियाद…”
(लेखक जाने-माने साहित्यकार, फ़िल्म समालोचक, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)
कुछ कहानियाँ सुकून देती हैं, गुदगुदाती हैं और क्षण भर में स्तब्ध कर देती हैं। बहुत कुछ ऐसा छोड़ जाती हैं, जो हमें लम्बे समय तक गुमसुम रहने पर मजबूर करती हैं। ‘चिंटू का बर्थडे’ एक ऐसी ही एक वेब फ़िल्म है, जो आप को बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करेगी।
कहानी-
एक हँसता-खेलता मिडिल क्लास परिवार इराक़ में है तिवारी जी का। उनका छोटा बच्चा चिंटू है, उसके बर्थडे की तैयारियाँ चलती रहती हैं। चिंटू की अपने पापा से शिकायतें आपको मुस्कुराने पर विवश करती हैं। तभी अचानक से गोलियों की तेज़ आवाज़ डरा देता है। परिवार सन्न, सब सहम जाते हैं। तिवारी दरवाज़ा खोलते हैं, सामने अमेरिकी सेना के जवान बंदूक़ ताने अंदर घुसते हैं और तिवारी पर आतंकियों को पनाह देने का आरोप लगाते हुए तोड़-फ़ोड़ करते हैं। दरवाज़ा तोड़ते ही दरवाज़े के उस तरफ़ दो बच्चे खड़े होते हैं, इराक़ी लहजे में कहते हैं, “हम चिंटू का बर्थ डे सेलिब्रेट करने आए हैं, हम उसी स्कूल में पढ़ते हैं, जिसको आप ने आज सुबह तहस-नहस कर दिया। तभी चिंटू पापा से कहता है, “पापा हम इन्हें केक नहीं देंगे”। बेहद मार्मिक कहानी, जो बहुत अन्दर तक वार करती है।
विनय पाठक हैं, इसलिए इतनी निश्चिंतता है कि फ़िल्म देखने लायक तो होगी। उदाहरण के तौर पर, फ़िल्म के ट्रेलर में दो संवाद, “My chintu is crying on his happy birthday…it is wrong..”, और “जो बिगड़ना है बिगड़ जाए…चिंटू का बर्थडे तो हम मना के ही रहेंगे।” विनय पाठक के होने का अहसास करा रहे हैं।
साथ ही तिलोत्तमा शोम , जो कि अपने अभिनय के दमपर फ़िल्म जगत में एक अलग स्थान बना चुकी हैं, फ़िल्म में बतौर चिंटू की माँ और मिसेज तिवारी खासी जँच रही हैं।
बहरहाल, मनोरंजन के नामपर भसड़ मचाये अनेक फिल्मों के बीच, ‘चिंटू का बर्थडे’ बड़ी ही पॉजिटिव सी फ़ीलिंग दे रहा है। इस कहानी से बड़ी उम्मीद है, फ़्रेश फ़ील करेंगे। हँसेंगे, ग़ुस्सा होंगे और शायद रोऐँ भी। हम फ़िल्म की समीक्षा पाँच जून को पेश करेंगे। बेसब्री से इंतज़ार होगा इस फ़िल्म का।
कुछ वेब सीरीज़, जो मील का पत्थर साबित हुईं, उन्होंने वेब प्लेटफॉर्म्स का साहित्य ही बदल दिया। असली वाली फ़ीलिंग का ऐसा चस्का लगा कि संवाद में २५ प्रतिशत गाली ठेलना चलन में आ गया। इण्डस्ट्री में दो तरह के लोग हैं, एक क्रिएटर और दूसरे वाले रीक्रिएटर। क्रिएटर, बड़ी बारीकी से काम करता है और रीक्रिएटर उसकी नक़ल।
अमेज़न प्राइम वीडियो की ‘मिर्जापुर’, ज़ी-5 की ‘रंगबाज़’ और नेटफ्लिक्स की ‘सेक्रेड गेम्स’ जैसी वेब सीरीज़ की सफलता की वजह से ऐसी तमाम फ़िल्में बनीं, जो औंधें मुँह तो गिरीं लेकिन अभद्र कांटेंट में औसतन इज़ाफ़ा ही हुआ।
“एमएक्स प्लेयर अपनी नई वेब सीरीज़ ‘रक्ताचंल’ लेकर आया है। फ़िल्म में उत्तर प्रदेश के अपराध की कहानी दर्शाई गई है, जो कि सच्ची घटना से प्रेरित है। ऋतम श्रीवास्तव ने इस वेब सीरीज़ में क्या किया है, आइए जानते हैं।”
कहानी-
कहानी शुरू होती है बनारस के आबकारी विभाग से जहाँ शराब के ठेकों का आवंटन चल रहा होता है। घूसखोर अफ़सर बाहुबली वसीम खान को पैसा लेकर ठेका दे देता है। जिसके बाद एक और दबंग विजय सिंह ताबड़तोड़ फायरिंग कर देता है और ठेका हथिया लेता है।
एक दौर था जब पूर्वांचल में माफ़ियाओं के मठाधीश गोरखपुर में रहा करते थे। मतलब पूर्वांचल के जो माफ़िया गोरखपुर में रहते थे, उनका भौकाल सातवें आसमान पर होता था। शराब, कोयले, खनन सहित तमाम ठेकेदारी में चौधरी यही बने रहे थे। यहाँ के बाहुबली सिस्टम को अपने सिस्टम से चलाते थे, मतलब कट्टे के दम पे। रक्तांचल की कहानी इसी धारा में बहती है।
गाज़ीपुर का एक बाहुबली वसीम ख़ान, जिसके पास पूर्वांचल में राजनीतिक समर्थन हासिल है। इसके दम पर वह ठेकदारी समेते कई धंधों पर अपना वर्चस्व जमाए हुए है। अब वसीम ख़ान के गुण्डे अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए उन लोगों को मौत के घाट उतारने में नहीं कतराते, जो ठेकेदार के ख़िलाफ़ जाते हैं। एक ऐसे ही स्थानीय नेता को वसीम ख़ान के गुण्डे मौत की घाट उतार देते हैं, जो मज़दूरों के हित की बात करता है। इस स्थानीय मज़दूर नेता का बेटा बदले की आग में अपराध में दलदल में घुसता चला जाता है। जल्दी ही वो वसीम की आँख की किरकिरी बन जाता है। वर्चस्व की लड़ाई में लाशों की ढेर लगने लगती है। कौन किस पर भारी पड़ता है, इसके लिए आपको वेब सीरीज़ देखनी पड़ेगी।
अभिनय-
अब बात करते हैं अभिनय की। प्रमुख कलाकारों के ऊपर शायद पहले की वेब सीरीज़ के जैसा करने या उड़ाए बेहतर करने का दबाव रहा हो। कलाकार कैरेक्टर से अलग होते नज़र आते हैं, कई जगह नकलीपन झलकता है। ज़बरदस्ती की गाली से दिमाग़ झल्ला जाता है और गोली से सिर में पीड़ा होती है। इसके पहले पाताललोक में जनेऊ पहन कर सम्भोग करते हुए दिखाया गया, इसमें भगवाधारी को सम्भोग करते दिखाया गया है। मतलब सिनेमैटिक लिबर्टी लेने के नाम पर हिंदू धर्म से खुन्नस निकालने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ रहे फ़िल्म मेकर्स।
एक्टर क्रांति प्रकाश झा निराश करते हैं, जबकि छोटे किरदारों में नज़र आए विक्रम कोचर, प्रमोद पाठक और चित्तरंजन त्रिपाठी की एक्टिंग सुख देती है।
देखें या नहीं?
धीमी आवाज़ में अकेले देख लें, परिवार के सामने देखने पर घर से बाहर कर दिए जाने का ख़तरा है। हिन्दुवादी सोच है, तो कष्ट होगा। ये कहना ग़लत नहीं होगा कि अब फ़िल्म मेकर्स बिल्कुल शोध (रिसर्च) पर विश्वास नहीं करते। बात इतनी सी है कि कहानी वाले मास्टरजी ने मद्धम रोशनी में जो समझा दिया, वही बन गई।
देखें ट्रेलर-
(अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के आधार पर की गई समीक्षा एक जटिल काम है, जिसके अंतर्गत केवल पॉजिटिव कमेंट्स की उम्मीद रखना अनुचित है। हमारे यहाँ पेड रिव्यू जैसी भी कोई व्यवस्था उपलब्ध नहीं है।)
इन दिनों सोशल मीडिया पर एक वीडियो जमकर वायरल हो रहा है, जिसमें अबोध बच्चा चादर हटाकर मां को जगाने का प्रयास कर रहा है। दरअसल ये वीडियो मुज़फ्फरपुर रेलवे स्टेशन का है।
इस घटना की जानकारी मिलने के बाद दिल्ली से संचालित सामाजिक संस्था ‘राजनीति की पाठशाला’ बच्चे की मदद के लिए आगे आया। इस संस्था के सरंक्षक निजामुद्दीन खान ने ट्वीट कर कहा कि मासूम बच्चे की क़ानूनी तौर पर भरण-पोषण और पढ़ाई लिखाई की ज़िम्मेदारी लेंगे।
आपको बता दें कि अरवीना खातून नाम की ये महिला अहमदाबाद से अपने घर कटिहार लौट रही थी। महिला की ट्रेन में ही मौत हो चुकी थी। महिला का शव प्लेटफॉर्म पर उतारा गया था। इस वीडियो में मासूम अपनी मां के ऊपर पड़े चादर से खेलता रहा, और उम्मीद भरी नज़रों से मां को देखता रहा कि मां नींद से जाग कर उसे गोद में रख लेगी। वह बच्चा ये कहां जानता है कि अब उसकी मां कभी न जागेगी।
तो वहीं बिहार के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव भी मदद के लिए आगे आए। उन्होंने घोषणा की है कि वे मृत महिला के बच्चे के लिए पांच लाख रुपए की आर्थिक मदद करेंगे। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि वे उनकी पढ़ाई का जिम्मा और देखभाल करने वाले नजदीकी पारिवारिक सदस्य को नौकरी भी देंगे।
जीवन का औचित्य क्या है? कौन से निश्चित लक्ष्य की प्राप्ति के लिए, मानव अपने कृत्य करता है? संतोष क्या है? किस ठौर अपना सा लगेगा? क्या हृदय सभी स्थितियों में हर्ष और पीड़ा अनुभव कर सकता है? क्रमानुसार, इन्हीं प्रश्नों के उत्तर को खोजने के प्रयास का कलात्मक चित्रण है, 1978 में आई फ़िल्म, “अरविंद देसाई की अजीब दास्तान”, जिसे सईद अख़्तर मिर्ज़ा ने निर्देशित किया था और साइरस मिस्त्री के साथ मिलकर लिखा भी था। फ़िल्म को बेहद खूबसूरती से एडिट किया था सुप्रसिद्ध फ़िल्म निर्माता अशोक त्यागी ने।
फ़िल्म के एक दृश्य में ‘दिलीप धवन’
यह अरविंद देसाई (दिलीप धवन) की कहानी है जो अपने अंदर के माइक्रोकॉज़्म में खोया रहता है, उसके अंदर एक पुरा व्यवस्थित और विस्तृत ब्रह्मांड है और वो बाहर की दुनिया के कोलाहल से, अव्यवस्था से एकदम अलग है। अरविंद देसाई (दिलीप धवन), एक अमीर व्यापारी (श्रीराम लागू) का पुत्र होता है और उसके जीवन में सभी सुविधाएं होती हैं लेकिन संतोष नहीं होता। अपने मित्र राजन (ओम पुरी), से बौद्धिक संतुष्टि के लिए वो कई बार मिलता है और बिना कुछ कहे, चुपचाप वहाँ उसके साथियों की बातें अरविंद देसाई सुनता है। यहीं एक चर्चा में, राजन (ओम पुरी) का संवाद, ” ईश्वरीय सत्ता की अभिव्यक्ति के लिए, आदमी अपने दुनिया की बलि क्यों दे? आदमी को ख़ुद अपनी अभिव्यक्ति का कारण बनना चाहिए।”, अरविंद देसाई के लिए, कई मुलाक़ातों में प्राप्त हुआ सूत्र वाक्य होता है। मुंबई की सड़कों पर होने वाले दैनिक क्रियाकलापों को बार बार दर्शाते हुए, अरविंद देसाई के अंदर के ब्रह्मांड के समानांतर एक रेखा खींचने का प्रयास किया गया है। इन्हीं सड़कों पर राजन (ओम पुरी), एक बार कहता है कि यह गंदगी और बदबू भी जीवन का विस्तार ही है, और यह बात अरविंद के अंदर तक पहुंचती है।
फ़िल्म का एक दृश्य
अरविंद अपने ऐंटीक पीस के शोरूम में काम करने वाली ऐलिस (अंजलि पायगांकर ) से प्रेम करता है और उसके संबंध एक फ़ातिमा नाम की एक वेश्या से भी होते हैं। अरविंद बीच बीच में अपनी बहन (रोहिणी हतंगडी) से भी मिलता रहता है और कई बार अपनी मां से भी खुलकर बात करने की चेष्टा करता रहता है। इन सभी महिलाओं के साथ अरविंद के संबंध, अलग स्तर और महत्व के होते हैं और सबसे स्थायी और संतोषप्रद संबंध की तलाश में, वह सब के पास जाता रहता है।
फ़िल्म के एक दृश्य में, मुंबई की शाम में, टिमटिमाती रोशनियों के बीच अरविंद देसाई गाड़ी चला रहा होता है और बैकग्राउंड में एक के बाद एक बेगम अख़्तर की आवाज़ में , “ऐ मोहब्बत, तेरे अंजाम पे रोना आया” और शमशाद बेगम की आवाज़ में, ” तेरी महफ़िल में क़िस्मत आज़मा के” सुनाई पड़ता है जो प्रेम में दो अलग छोर के बीच दोलन कर रहे, अरविंद के जीवन को दर्शाता है। फ़िल्म में सुलभा देशपांडे और सतीश शाह का भी अच्छा अभिनय देखने को मिला है।
सईद अख्तर मिर्ज़ा (PC-Bangalore International Centre)
एक चीज़ जो बहुत बारीक़ी से दिखाई गई है, वो है अरविंद देसाई का विचित्र, प्रतिक्रिया विहीन व्यवहार। कई अवसर फ़िल्म में दिखे हैं, जहाँ अरविंद को अपमानित किया है किसी अन्य पात्र ने, लेकिन उसकी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई, जबकि वो सक्षम था पूर्णतः। दूसरी चीज़ है, अरविंद का कहीं भी बहुत देर तक नहीं रुकना। वह जहाँ भी जाता है, वहाँ से तुरंत निकल आता है। उसका अकेलापन साथ खोजता है, और जब कोई साथ आता है तो पुनः अकेलेपन की तरफ भागना चाहता है अरविंद।
“फ़िल्म एक धुन से शुरू होती है, और जब अरविंद अपने हृदय की संवेदनशीलता को मापने के लिए, स्वयं के सीने पर गोली चला बैठता है तो भी उसी धुन से फ़िल्म ख़त्म भी होती है। इस फ़िल्म का अर्थपूर्ण और प्रासंगिक संगीत, भास्कर चंदावरकर ने दिया है। 1 घंटा 53 मिनट की इस फ़िल्म में शुरूआत और अंत में धागे बुनते बुनकरों को दिखाया गया है, जो बाहरी दुनिया में हमारे जीवन की अलग-अलग तरह की कहानियां बुनते समय का प्रतीक हैं और बीच में पूरी तन्मयता से अरविंद, दर्शकों के साथ अंतर्मन की एक लंबी यात्रा पर चलते हैं, जो एक अन्वेषण है।”
1979 में बेस्ट फ़िल्म का क्रिटिक्स अवार्ड फ़िल्मफ़ेयर के द्वारा, इसी फ़िल्म को दिया गया और सच में यह फ़िल्म, अपने आप में एक “अन्वेषण” है।
(लेखक जाने-माने साहित्यकार, फ़िल्म समालोचक, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)