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Tuesday, August 11, 2026
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यूपी और उत्तराखंड के बीजेपी प्रत्याशियों की लिस्ट आज होगी जारी

अनुज हनुमत | Navpravah.com

यूपी विधानसभा चुनावों की तारीख नजदीक हैं, लेकिन सूबे की दो प्रमुख पार्टियों में अभी तक उम्मीदवारों को लेकर माथापच्ची हो रही है। कांग्रेस और भाजपा ने अभी तक उम्मीदवार नहीं घोषित किये हैं। सूत्रों की मानें तो दोनों ही पार्टियाँ 20 तारीख तक अपने उम्मीदवार घोषित कर देंगी।

कल देर शाम तक यूपी और उत्तराखंड में होने वाले विधानसभा चुनाव में प्रत्याशियों के नाम पर भाजपा की केंद्रीय चुनाव समिति में मंथन चला। लेकिन पार्टी सूत्रों का कहना है कि यूपी के उम्मीदवारों को लेकर पेंच फस रहा है, जिस कारण कल घोषणा नहीं हो पाई। गौरतलब हो कि कल भाजपा की केंद्रीय चुनाव समिति ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड विधानसभा चुनावों के उम्मीदवारों के नामों को अंतिम रूप देने के लिए रात में बैठक की। इस बैठक में राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित राजनाथ सिंह पार्टी के बड़े नेता मौजूद थे।

पार्टी सूत्रों की मानें तो यूपी विधानसभा चुनाव में बीजेपी की पहली लिस्ट सोमवार को जारी होगी। यूपी से 150 और उत्तराखंड से करीब 50 उम्मीदवारों के नाम लगभग तय हैं, जिनका ऐलान कल होने की संभावना है। खबर ये भी है कि पार्टी द्वारा उत्तराखंड की 70 सीटों में से अधिकतर पर उम्मीदवारों के नामों की घोषणा किए जाने की संभावना है, जहां 15 फरवरी को चुनाव होना है। उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए सात चरणों में चुनाव होगा जो 11 फरवरी से शुरू होगा।

देखना होगा कि भाजपा किन समीकरणों को ध्यान में रखकर अपने सियासी सूरमाओं को मैदान में उतारती है। जानकारों की मानें तो भाजपा का भी पूरा ध्यान अन्य विरोधी पार्टियों की तरह जातिगत समीकरणों पर होगा जो आज जारी होने वाली पहली लिस्ट से स्पष्ट हो जायेगा। सभी पार्टियों की नजर इस बार सबसे ज्यादा ब्राह्मण वोट बैंक पर है इसीलिए सपा, बसपा ने अपने उम्मीदवारों में ब्राह्मणों को सबसे ज्यादा मौक़ा दिया है। उधर कांग्रेस पहले ही अपना ब्राह्मण प्रेम दिखाते हुए सीयम चेहरे के रूप में शीला दीक्षित को मैदान में उतार चुकी है। अब नम्बर भाजपा का है, जो इन समीकरणों को साधने में सभी पार्टियों से पीछे नहीं रहना चाहेगी। देखना होगा कि भाजपा कितने ब्राह्मण प्रत्याशियों को मौक़ा देती है।

यूपी चुनावी दंगल: नारों से खुद को चमका रहीं राजनीतिक पार्टियां

शिखा पाण्डेय | Navpravah.com

वैसे तो चुनाव 5 राज्यों में होने हैं, लेकिन सारे देश की निगाहें उत्तर प्रदेश चुनाव पर टिकी हैं, क्योंकि वहां का चुनावी दंगल अपने अंदाज़ में निराला ही है। उत्तर प्रदेश में तीनों प्रमुख दल सपा, भाजपा व बसपा एक दूसरे को धोबी पछाड़ देने के लिए एड़ी चोटी का बल लगा रहे हैं। इसी के तहत तीनों  ने एक-दूसरे को हराने के लिए अलग अलग नारों का पिटारा खोला है। इसमें अखिलेश के नेतृत्व में सपा व भाजपा भारी पड़ रही है। वहीं बसपा ने ‘बहनजी को आने दो’ की मुख्य थीम पर कई नारे गढ़े हैं। कांग्रेस तो नारों की रेस में भी नदारद दिखाई दे रही है।

समाजवादी पार्टी आपस में भले लड़ भिड़ रही हो, पर नारे एक से एक गूँज रहे हैं। ‘जीत की चाभी, डिंपल भाभी’ ये नारा अच्छा खासा ट्रेंड में है। खबर है कि इस चुनाव में मुलायम सिंह की बहू डिंपल यादव स्टार प्रचारक होंगी।
युवाओं में सबसे अधिक ट्रेंड करने वाला नारा है ‘ये जवानी है कुर्बान, अखिलेश भैया तेरे नाम’। महिला कार्यकर्ताओं को भा रहा है, ‘हमारा सैंया कैसा हो, अखिलेश यादव जैसा हो।’ इसके अतिरिक्त ‘काम बोलता है’, ‘विकास का पहिया अखिलेश भैया’, ‘अखिलेश का जलवा कायम है, उसका बाप मुलायम है’, ‘नो कन्फ्यूजन, नो मिस्टेक, सिर्फ अखिलेश, सिर्फ अखिलेश’,’यूपी की मजबूरी है, अखिलेश यादव जरूरी है’ इत्यादि।

भारतीय जनता पार्टी ने अपना मुख्यमंत्री उम्मीदवार भले न घोषित किया हो, पर नारों से हुंकार भरने में कहाँ पीछे रहने वाली है। सपा परिवार को जड़ से उखाड़ने के चक्कर में पड़ी भाजपा का ट्रेंडिंग नारा है ‘बाप-बेटे के ड्रामे हजार, नहीं चाहिए सपा सरकार’। इसके अलावा जो नारे ज़ोर शोर पकड़े हुए हैं, वे हैं ‘गुंडागर्दी के ठेकेदार, नहीं चाहिए सपा सरकार’, ‘जिसमें घोटालों की भरमार, नहीं चाहिए बीएसपी सरकार’,’ट्रांसफर-पोस्टिंग से कमाया अपार, नहीं चाहिए बसपा सरकार’।

भाजपा और सपा की जद्दोजहद से पस्त बसपा ने हाथी की जगह बहनजी को ही अपना ‘सेंटर ऑफ़ अट्रेक्शन बनाया है। ‘बहनजी को आने दो’ को अपना सेंटर थीम बनाये हुए ‘गांव खुशहाल बनाने को बहनजी को आने दो’,’सर्वजन को सम्मान दिलाने को बहनजी को आने दो’, ‘नई रोशनी दिखाने को बहनजी को आने दो’,’न भ्रष्टाचार न गुंडाराज, अबकी बार बसपा सरकार’ जैसे तमाम नारे बसपा खेमे में गूँज रहे हैं।

आज, 15 जनवरी से, बहनजी के जन्मदिन के अवसर पर बसपा ने अपने आक्रामक चुनावी अभियान का आरम्भ किया है। लंबे समय तक सोशल मीडिया के गलियारे से दूरी बनाए रखने वाली मायावती की बहुजन समाज पार्टी अब इसी सस्ते, सुंदर व सघन प्रचार माध्यम का ब़़डे पैमाने पर उपयोग करने वाली है। 15 जनवरी को अपने जन्मदिन के मौके पर इसी डिजिटल मंच से वे अखिलेश सरकार व केंद्र की भाजपा सरकार के खिलाफ आक्रामक प्रचार शुरू करेंगी। बहनजी व बसपा के लिए फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्स एप और यूट्यूब पर व्यापक प्रचार किया जाएगा। पार्टी के ट्विटर व फेसबुक अकाउंट तो पहले से थे, लेकिन उनका उपयोग बहुत कम हो रहा था।

सपा को झटका, समाजवादी दंगल से ऊबे विधायक भागे

सौम्या केसरवानी | Navpravah.com

समाजवादी दंगल से अब पार्टी के विधायक ऊब कर दूसरे दलों में भागने लगे हैं। पहले से उथल पुथल के दौर से गुजर रही समाजवादी पार्टी को एक और झटका लगा है। आगरा की बाह विधानसभा सीट से वर्तमान सपा विधायक और प्रत्याशी राजा अरिदमन सिंह और खेरागढ़ प्रत्याशी रानी पक्षलिका सिंह ने सपा को अलविदा कह दिया है। इन दोनों ने भाजपा का दामन थाम लिया है और जैसा कि पार्टी छोड़ने के बाद होता है, इनकी वजह इन्होंने समाजवादी परिवार में सत्ता के लिए दंगल को बताया है।

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्या ने इन्हें भाजपा ज्वाइन कराया। भारतीय जनता पार्टी विपक्षी दलों के घोषित प्रत्याशी को अपने पाले में खींचने में लगी है, इसी क्रम में उसने समाजवादी पार्टी को करारा झटका उस समय दिया, जब उसके दो घोषित प्रत्याशियों को भाजपा में शामिल कर लिया गया।

राजा अरिदमन सिंह ने भाजपा के साथ अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत की थी और इस सीट से वह 6 बार विधायक रहे हैं। इस सीट को राजा ने ही समाजवादी पार्टी को जीत कर दी थी, लेकिन अब हराने की चुनौती देते नजर आ रहे हैं।

सपा विधायक राजा अरिदमन सिंह और उनकी पत्नी रानी पक्षलिका सिंह का आगरा और उसके आसपास के जिलों में खासा प्रभाव है। पिछले विधानसभा चुनाव में बाह विधानसभा सीट से सपा के प्रत्याशी थे, जबकि उनकी पत्नी रानी पक्षालिका सिंह को समाजवादी पार्टी ने खैरागढ़ से टिकट दिया था। राजा अरिदमन जीते और अखिलेश सरकार में परिवहन मंत्री बनाए गए थे। वर्ष 2015 में मंत्रीमंडल से उन्हें यह कहते न्हुए बर्खास्त कर दिया गया था कि परिवहन विभाग का काम ठीक से नहीं हो पा रहा है। अभी हाल ही में जारी की गई मुलायम सिंह और अखिलेश खेमे की सूची में दोनों के नाम थे।

सपा के लिए यह खबर खतरे की घंटी भर है, अगर अब भी न जागे तो यह बड़े खतरे के रूप सामने खड़ी होगी। सूत्रों की माने तो कई और विधायक भी सपा छोड़ने की तैयारी में है जिनमे कुछ का नाम अखिलेश और मुलायम दोनों की सूची में है। समाजवादी समीकरण में गठबंधन की संभावना को देखते हुए भी प्रत्याशी परेशान है और सुरक्षित ठिकाने की तलाश में लगे हैं।

यूपी चुनावी दंगल: चुनाव में गरमाएगा ‘तीन तलाक़’ वाला मुद्दा

सौम्या केसरवानी | Navpravah.com

मुस्लिम राष्ट्रीय मंच 15 जनवरी को लखनऊ में तलाक़ के मुद्दे को लेकर मुस्लिम महिलाओं का एक बड़ा सम्मेलन करने जा रहा है। इस सम्मेलन का मकसद इस मुद्दे पर मुस्लिम महिलाओं को एकजुट करना है, जो तीन तलाक के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद कर सके, इसीलिए इस सम्मेलन में बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाओं को शामिल करने की तैयारी है। क्योंकि इस सम्मेलन के बाद मुस्लिम राष्ट्रीय मंच प्रदेश के 30 से अधिक जिलों में इसी तरह का सम्मेलन आयोजित करने जा रहा है और अगले दो महीने तक यूपी में विधानसभा चुनाव होने है।

मुस्लिम राष्ट्रीय मंच राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का एक हिस्सा है। जिसको मुस्लिमों के कल्याण और उत्कर्ष के लिए बनाया हुआ है। इसके समन्वयक का कहना है कि तीन तलाक के जरिए मुस्लिम महिलाओं का शोषण हो रहा है। बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाएं तीन तलाक के खिलाफ है। तीन तलाक मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों और स्वाभिमान के भी खिलाफ है। उन्होंने कहा कि इस्लाम सभी के अधिकारों की रक्षा करता है, फिर मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को कोई कैसे छीन सकता है। मुस्लिम महिलाओं के हितों की रक्षा के लिए ही तीन तलाक को लेकर लोगों की एक राय बनाई जा रही है।

हालांकि उन्होंने इस सम्मेलन के पीछे किसी प्रकार के चुनावी एजेंडे से इनकार किया। लेकिन राजधानी के अलावा आगरा, उन्नाव, जालौन, रामपुर सहित 30 से अधिक जिलों में इस तरह के सम्मेलन का आयोजन कुछ और ही इशारा करता नजर आ रहा है। सम्मेलन में बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाएं शामिल हों, इसका जिम्मा मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की महिला शाखा को सौंपा गया है।

साईकिल की सवारी को लेकर जंग, आज फैसला

सौम्या केसरवानी | Navpravah.com

समाजवादी पार्टी के साईकिल चुनाव चिन्ह को लेकर आज चुनाव आयोग फैसला दे सकता है। फैसले पर निर्भर करेगा कि इस बार मतदाताओं को यूपी चुनाव में साइकिल चुनाव चिन्ह का बटन दबाने का मौका मिलेगा या नहीं। चुनाव आयोग के सूत्र के अनुसार न मुलायम गुट और न ही अखिलेश गुट, दोनों साइकिल की सवारी नहीं कर पाएंगे।

समाजवादी पार्टी के लिए आज का दिन बेहद अहम है, आज चुनाव आयोग इस बात का फैसला कर देगा कि साइकिल चुनाव चिन्ह पर हक किसका है। सूत्रों के अनुसार चुनाव आयोग ने तो मान लिया है कि समाजवादी पार्टी टूट चुकी है।

मुलायम ने कहा पार्टी में कोई टूट नहीं है। मुख्य चुनाव आयुक्त नसीम ज़ैदी ने पूछा चुनाव चिन्ह किसी दिया जाए, तो मुलायम बोले, साईकिल मुझे दिया जाए। मुलायम के इस जवाब पर मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा, इसका मतलब पार्टी में टूट है।

चुनाव आयोग में साईकिल को पाने के लिए दोनों गुटों ने अपनी-अपनी दलीलें दे दीं हैं, अखिलेश यादव की ओर से कांग्रेस नेता और वकील कपिल सिब्बल भी चुनाव आयोग में मौजूद थे, तो ऐसे में सवाल ये है कि साइकिल चुनाव चिन्ह का क्या हो सकता है ? भारत के इतिहास में ऐसा दो बार हुआ है, जब चुनाव चिन्ह पर दो गुटों में जंग हुई हो।

यूपी चुनावी दंगल: जातीय और धार्मिक समीकरण में उलझा उत्तर प्रदेश

जटाशंकर पाण्डेय | Navpravah.com

एक समय में ऐसा माना जाता था कि सबसे अधिक लोकसभा सीटों वाला उत्तर प्रदेश, भारत में प्रधानमंत्री बनाने वाली पार्टी की जीत हार तय करता है। उत्तर प्रदेश के बंटवारे के बावजूद आज भी यह मान्यता बनी हुई ही है। उत्तर प्रदेश शुरू से ही एक राजनितिक अखाड़ा रहा है। एक से एक दिग्गज राजनेता भी उत्तर प्रदेश ने दिया है। पं. मोती लाल नेहरू, जवाहर लाल नेहरू, लालबहादुर शास्त्री, हेमवती नंदन बहुगुणा,  चंद्रशेखर सिंह, मुलायम सिंह, मायावती इत्यादि।

उत्तर प्रदेश में चुनाव की तारीख तय हो गई है और माहौल देखते हुए लग रहा है कि प्रदेश का चुनाव पूर्ण रूप से जातीय समीकरण और धार्मिक समीकरण पर आधारित होगा। दलित, यादव, ठाकुर, सवर्ण, मुस्लिम वगैरह। अब आप ही सोचिये, जो प्रान्त जाति धर्म और संप्रदाय के नाम पर मतदान करे और उस प्रान्त के ऊपर ही देश का भविष्य निर्भर हो, उस देश के भविष्य की डोर भी परमात्मा के हाथ में ही है।

‘भारत का संविधान’ संविधान सभा द्वारा 26 नवम्बर 1949 को पारित हुआ और 26 जनवरी 1950 से प्रभावी हुआ। पं जवाहर लाल नेहरू भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बने। उस समय के चुनाव में भी चालाक लोगों ने सत्ता की लोलुपता के कारण अपने निहित स्वार्थ से ओतप्रोत होकर जातीयता का जहर जनता के भीतर घोलना शुरू कर दिया। हालांकि उस समय जनता में भोलापन बहुत था। कांग्रेस उस वक़्त की एकछत्र शासन करने वाली पार्टी थी। उसके बाद एक खास पार्टी का उदय हुआ, ‘जनसंघ’। कुर्सी की लड़ाई और पेचीदा हो गई। वोट बटोरने के लिए पार्टी का नाम और जातीय आधार मिल जाने पर कोई भी कैंडिडेट विजयी हो जाता था, क्योंकि उस वक़्त बहुत ज्यादा छल कपट समाज में नहीं था। लोगों पर एक दूसरे का विश्वास रहता था, लोग एक दूसरे पर भरोसा करते थे। अब आलम यह है कि बाप का भरोसा बेटे-बेटी पर तक नहीं रहा न ही बेटे का बाप पर।

आज हमारा देश गर्व से कहता है कि हमारे देश में लगभग 76 % लोग शिक्षित हैं, लेकिन क्या ये 76 % लोग शिक्षा का महत्व जानते हैं? शायद लोग मात्र हस्ताक्षर करने वाले को शिक्षित कहते हैं और जो थोड़ा पढ़े लिखे हैं, उनको विद्वान। अगर शिक्षा का थोड़ा भी महत्व इस देश में है तो मतदान करने के पहले मतदाता को थोड़ा सा सोचना चाहिए कि जो भी हमारा नेता हो, वह पूरे देश का हो, हमारी जाति का, धर्म का और हमारे संप्रदाय का नहीं।

विभिन्न राज्यों, खासकर उत्तर प्रदेश व बिहार का चुनाव जातीय समीकरण और धार्मिक समीकरण पर ही टिका है और यही इस देश का दुर्भाग्य है। उस पर गरीब तबके के लोगों को वोट के बदले पैसे भी दिए जाते हैं। भ्रष्ट राजनेता कुर्सी हथियाने के चक्कर में पूरे परिवार के अनुसार पैसे देते हैं और कई गरीब परिवार नासमझी में पैसे लेकर वोट दे भी देते हैं। अब ये नेता जो पैसे बाट रहे हैं, ये देश के कल्याण के लिए? गरीबों के कल्याण के लिए? या अपने कल्याण के लिए? सामान्य जनता यह गणित नहीं समझ पाती है और उस क्षेत्र का विकास अवरुद्ध हो जाता है।

एक तरफ चुनाव आयोग और उच्चतम न्यायालय समय समय पर नये नये कानून बना रहे हैं कि चुनाव निष्पक्ष हो, लोगों में जागरुकता हो, अपना नेता चुनने का उत्साह हो, कहीं भी किसी प्रकार की गड़बड़ी चुनाव में नहीं होने पाए, लेकिन उम्मीदवारी को लेकर खिंचा तानी, टिकट देने में भी, चुनाव प्रचार में कानून का उलंघन, जनता से झूठे वादे, ये सारे हथकंडे पार्टियां अपनाती हैं। टिकट देने में किस क्षेत्र में ब्राह्मण वोट ज्यादा है, कहाँ यादव वोट ज्यादा है, कहाँ दलित ज्यादा हैं , बैकवर्ड-फारवर्ड दलित, इन सारे आकंड़ों को ध्यान में रखकर टिकट वितरण किया जाता है। फिर घर घर जा कर अपनी जाति, धर्म, समुदाय को सपोर्ट करने का आग्रह किया जाता है।

सारी बातों का निचोड़ यह है कि जनता जब तक जातिवाद, प्रान्तवाद, धर्मवाद से उठकर आगे नहीं आएगी, तब तक इस देश का समग्र विकास संभव नहीं है। उत्तर प्रदेश के सभी लोगों को शिक्षित, समझदार नहीं कहा जा सकता, क्योंकि पक्ष-विपक्ष और ‘निष्पक्ष’, सभी राजनितिक पार्टियां खुद नसीहत देती हैं कि जाति धर्म और प्रान्त से ऊपर उठिये, हमारी पार्टी को वोट  दीजिये, हम  ही जाति धर्म और प्रान्त से परे सबको सामान अधिकार देंगे, लेकिन निर्वाचन के बाद निहित स्वार्थ में आकर सब भूल जातें हैं और वही करते हैं, जिसको दूसरों को करने से मना करते हैं। आज जो भी हो रहा है, वह देश हित के लिए कम निजी हित के लिए ज्यादा। इससे ऊपर उठ कर लोग सिर्फ देशहित के विषय में सोचें, तो निजी हित अपने आप सध जायेगा।

‘जो बाइडेन’ को अमेरिका के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाज़ा गया

शिखा पाण्डेय | Navpravah.com

अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अमेरिकी उपराष्ट्रपति ‘जो बाइडेन’ को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘प्रेसिडेंशियल मेडल ऑफ फ्रीडम’ से सम्मानित किया। व्हाइट हाउस में आयोजित एक समारोह में उन्हें यह उपाधि प्रदान की गई। ओबामा ने इस अवसर पर 74 वर्षीय बाइडेन को ‘अमेरिका का सबसे अच्छा उपराष्ट्रपति’ और ‘अमेरिकी इतिहास का शेर’ घोषित किया।

ओबामा ने कहा, “मैं राष्ट्रपति के रूप में आाखिरी बार हमारे देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘प्रेसिडेंशियल मेडल ऑफ फ्रीडम’ को प्रदान करते हुए बहुत खुशी महसूस कर रहा हूं।” उन्होंने कहा, “साढ़े आठ वर्ष पहले मैंने बाइडेन को उपराष्ट्रपति के रूप में चुना था। उसके बाद कभी एक पल भी ऐसा नहीं आया जब मुझे अपने उस निर्णय पर संदेह हुआ हो। यह सबसे अच्छा चुनाव था, सिर्फ मेरे लिए ही नहीं बल्कि अमेरिकी लोगों के लिए भी।” आपको बता दें कि बाइडेन आठ वर्षों से व्हाइट हाउस में ओबामा के सहयोगी रहे हैं।

सर्वोच्च नागरिक सम्मान पाकर अभिभूत हुए बाइडेन ने कहा कि वह जिस सम्मान के हकदार हैं, यह सम्मान उसकी तुलना में कहीं अधिक बड़ा है। उन्होंने राष्ट्रपति ओबामा से कहा, “मैं आपका आभारी हूं। मैं आपकी दोस्ती का आभारी हूं। मैं आपके परिवार का आभारी हूं।”

महात्मा गांधी के चरखे पर पीएम मोदी का कब्ज़ा!

सौम्या केसरवानी | Navpravah.com

आजादी के दौरान लोगों ने खादी अपनाकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ इंकलाब और आजादी की मुहिम में एक खास आयाम जोड़ा था। देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने ‘स्वदेशी अपनाओ’ नारे के तहत लोगों से खादी का इस्तेमाल करने की अपील की थी।

खादी ग्राम उद्योग हर साल अपना कैंलेडर प्रकाशित करता है लेकिन इस बार का कैलेंडर सुर्खियों में है, क्योंकि यहां से गांधी जी की तस्वीर गायब है और उनकी जगह पीएम मोदी की तस्वीर है।

खादी ग्राम उद्योग के कैलेंडर का इतिहास बताता है कि अब तक इसके कैलेंडर में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की तस्वीर रहती थी जो चरखा चलाते और सूत कातते हुए दिखाई पड़ते थे, लेकिन इस बार चरखे पर पीएम मोदी की तस्वीर दिखाई पड़ रही है। जिसके बाद यह चर्चा का विषय बना हुआ है।

आयोग के चेयरमैन विनय कुमार सक्सेना ने कहा कि यह कोई नई बात नहीं है, क्योंकि ऐसा पहले भी होता रहा है। उन्होंने कहा कि मोदी खादी ग्राम उद्योग के ब्रांड एंबेस्डर हैं और खादी के प्रति उन्होंने दुनिया भर के लोगों का ध्यान दिलाया है। विनय कुमार के बयान से इतर सोशल मीडिया पर यह खबर वायरल हो चुकी है और लोग अपनी प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं।

ग्राहकों की जेब क़तर रहे ऑनलाइन शॉपिंग पोर्टल्स!

इंद्रकुमार विश्वकर्मा । Navpravah.Com

पिछले कुछ वर्षों से ऑनलाइन शॉपिंग का कुछ क्रेज़ सा चल पड़ा है। बाज़ार में जाकर चीजों को देखकर खरीदने की बजाय हम मोबाइल या कंप्यूटर से घर बैठे शॉपिंग करने के आदी से होते जा रहे हैं। हर रोज़ कई कम्पनियाँ इस कॉम्पिटिशन में लुभावने नये-नये ऑफर के साथ बाजार में उतर रही हैं। रोज नए-नए प्रोडक्ट्स, बेस्ट डील व डिस्काउंट्स के साथ लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रही हैं।

घर बैठे शॉपिंग करने का फायदा हम सब उठा ही रहे हैं, लेकिन दूसरी तरफ हम यह घ्यान नहीं दे रहे हैं कि क्या जो उत्पाद हम खरीद रहे हैं, वह अच्छी गुणवत्ता की हैं! कहीं ये कम्पनियाँ मार्केट में एक बार नाम कमा लेने के बाद दूसरी तरफ लोगों को मूर्ख तो नहीं बना रही हैं। मुम्बई के कुर्ला इलाके में रहने वाले अजय रजक फ्लिपकार्ट से खरीदे गए एक मोबाइल को लेकर पिछले एक सप्ताह से काफी परेशान हैं। उनके अनुसार मोबाइल में मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट होने के बावजूद फ्लिपकार्ट फ़ोन रिप्लेस करने को तैयार नहीं है।

फ्लिपकार्ट आज भारत में ऑनलाइन शॉपिंग का एक अहम पर्याय बन गया है। लाखों लोग रोज फ्लिपकार्ट से अपनी मनचाहे उत्पाद खरीदते हैं, लेकिन पिछले कुछ महीनों से ग्राहक फ़ोन के रिप्लेसमेंट को लेकर फ्लिपकार्ट से ज्यादा खुश नहीं आ रहे हैं। ऐसी ही एक घटना शिकायतकर्ता अजय रजक के साथ हुई। उन्होंने २ जनवरी २०१७ को फ्लिपकार्ट से एक ‘मोटो इ ३ पावर’ मोबाईल ख़रीदा। खरीदने के दूसरे दिन से ही सॉफ्टवेयर सम्बंधित कई प्रॉब्लम आने लगी। उन्होंने इस सन्दर्भ में फ्लिपकार्ट के ग्राहकसेवा अधिकारी से बात की। अजय रजक के मुताबिक उनका इंजीनियर दो बार आकर मोबाइल फ़ोन चेक करके गया, पर प्रॉब्लम फिर वही आने लगा।

१० दिन का मोबाइल रिप्लेसमेंट दिया हुआ था, फिर भी वापस लेने को तैयार नहीं-

अजय रजक का कहना है ,”जब उन्होंने फ़ोन ख़रीदा तो उसमे १० दिन के रिप्लेसमेंट का ऑप्शन दिया हुआ था। फ़ोन से वे पूरी तरह से असंतुष्ट हैं और फ्लिपकार्ट का कहना है कि उनके टेक्निशियन को कोई प्रॉब्लम नहीं दिखा। फ्लिपकार्ट ने 10 दिन का रिप्लेसमेंट दिया है, तो उनको फ़ोन रिप्लेस करना चाहिए। वैसे भी १ साल मोबाइल वारंटी में हम सर्विस सेंटर में ही जाते हैं, तो फ्लिपकार्ट रिप्लेस करने को तैयार नहीं तो रिप्लेसमेंट ऑफर का क्या मतलब है!”

अजय रजक ने बताया कि उन्होंने कई बार फ्लिपकार्ट के ग्राहक सेवा अधिकारी से बात की, लेकिन जब उन्होंने फ़ोन रिप्लेस करने की बात की तो फ्लिपकार्ट के ग्राहकसेवा अधिकारी ने फ़ोन बदलने से साफ इनकार कर दिया और १० दिन की रिप्लेसमेंट गारंटी होने के बावजूद मोटोरोला के सर्विस सेंटर जाने की सलाह दी।

प्रश्न यह उठता है कि फ्लिपकार्ट जैसी कम्पनियाँ एक बार नाम काम लेने के बाद क्या ग्राहक को बेवकूफ़ बनाने लगती हैं ! एक बार अपनी अच्छी सर्विस से लोगों का दिल जीतकर विश्वास हासिल करने के बाद केवल लाभ कमाने के उद्देश्य से ग्राहकों के इमोशन के साथ खिलवाड़ करने लगती हैं। इस तरह की ऑनलाइन शॉपिंग कंपनियों की मनमानी क्या ऐसे ही चलती रहेगी ?

डॉ. बंसल की गोली मारकर हत्या, कानून व्यवस्था की उड़ रही धज्जियां

अनुज हनुमत-अरविन्द मौर्य | Navpravah.com

इलाहाबाद। सूबे में चुनाव सर पर हैं, लेकिन अभी भी कानून व्यवस्था की सरेआम धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं। आज संगम नगरी इलाहाबाद में बेखौफ बदमाशों ने कानून व्यवस्था को धता बताते हुए शहर के जाने माने चिकित्सक व जीवन ज्योति अस्पताल के प्रबंधक डॉ अश्वनी कुमार बंसल को गोली मार दी।

घटना कल देर शाम की है। डॉ बंसल को गोली अस्पताल परिसर में उस समय मारी गई, जब वह अपने चैम्बर में मौजूद थे। बंसल पर जानलेवा हमले से पुलिस फौरन हरकत में आ गई। जिसके बाद अस्पताल पर भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया। देर रात खबर आई कि इलाज के दौरान डॉ बंसल ने दम तोड़ दिया है।

इस घटना ने इलाहबादवासियों को हिलाकर रख दिया है। अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि हत्यारा कौन था? उसने गोली मारी क्यों? अभी इसे लेकर सिर्फ कयासबाजी हो रही है। वैसे डॉक्टर बंसल को पहले कई बार धमकियां मिल चुकी थीं। उन्होंने इसके आधार पर सिक्योरिटी भी मांगी थी और साथ में अपना सिक्योरिटी सिस्टम खड़ा कर रखा था।

इधर पुलिस से जुड़े तत्वों की मानें तो पुलिस  सीसीटीवी फुटेज की जाँच के साथ लोगों से पूछताछ करके उन तमाम बिंदुओं की जाँच कर रही है, जिससे कोई भी छोटा से छोटा सुराग छूटे न। अब ये जाँच के बाद ही पता चलेगा कि इस घटना में किसका हाथ है, लेकिन सरेआम हुई घटना से आसपास के लोगों में भय व्याप्त है।

प्रदेश के जाने माने सर्जन थे डॉ बंसल-

आपको बता दें कि दूरबीन विधि से सर्जरी करने वाले डॉक्टरों में डॉ. एके बंसल का अहम स्थान है। उनकी गणना प्रदेश के चर्चित लेप्रोस्कापिक सर्जनों में की जाती है। लखनऊ व नोएडा के कई बड़े अस्पतालों में भी वह सर्जरी करने के लिए जाते रहते हैं।