यूपी चुनावी दंगल: जातीय और धार्मिक समीकरण में उलझा उत्तर प्रदेश

जटाशंकर पाण्डेय | Navpravah.com

एक समय में ऐसा माना जाता था कि सबसे अधिक लोकसभा सीटों वाला उत्तर प्रदेश, भारत में प्रधानमंत्री बनाने वाली पार्टी की जीत हार तय करता है। उत्तर प्रदेश के बंटवारे के बावजूद आज भी यह मान्यता बनी हुई ही है। उत्तर प्रदेश शुरू से ही एक राजनितिक अखाड़ा रहा है। एक से एक दिग्गज राजनेता भी उत्तर प्रदेश ने दिया है। पं. मोती लाल नेहरू, जवाहर लाल नेहरू, लालबहादुर शास्त्री, हेमवती नंदन बहुगुणा,  चंद्रशेखर सिंह, मुलायम सिंह, मायावती इत्यादि।

उत्तर प्रदेश में चुनाव की तारीख तय हो गई है और माहौल देखते हुए लग रहा है कि प्रदेश का चुनाव पूर्ण रूप से जातीय समीकरण और धार्मिक समीकरण पर आधारित होगा। दलित, यादव, ठाकुर, सवर्ण, मुस्लिम वगैरह। अब आप ही सोचिये, जो प्रान्त जाति धर्म और संप्रदाय के नाम पर मतदान करे और उस प्रान्त के ऊपर ही देश का भविष्य निर्भर हो, उस देश के भविष्य की डोर भी परमात्मा के हाथ में ही है।

‘भारत का संविधान’ संविधान सभा द्वारा 26 नवम्बर 1949 को पारित हुआ और 26 जनवरी 1950 से प्रभावी हुआ। पं जवाहर लाल नेहरू भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बने। उस समय के चुनाव में भी चालाक लोगों ने सत्ता की लोलुपता के कारण अपने निहित स्वार्थ से ओतप्रोत होकर जातीयता का जहर जनता के भीतर घोलना शुरू कर दिया। हालांकि उस समय जनता में भोलापन बहुत था। कांग्रेस उस वक़्त की एकछत्र शासन करने वाली पार्टी थी। उसके बाद एक खास पार्टी का उदय हुआ, ‘जनसंघ’। कुर्सी की लड़ाई और पेचीदा हो गई। वोट बटोरने के लिए पार्टी का नाम और जातीय आधार मिल जाने पर कोई भी कैंडिडेट विजयी हो जाता था, क्योंकि उस वक़्त बहुत ज्यादा छल कपट समाज में नहीं था। लोगों पर एक दूसरे का विश्वास रहता था, लोग एक दूसरे पर भरोसा करते थे। अब आलम यह है कि बाप का भरोसा बेटे-बेटी पर तक नहीं रहा न ही बेटे का बाप पर।

आज हमारा देश गर्व से कहता है कि हमारे देश में लगभग 76 % लोग शिक्षित हैं, लेकिन क्या ये 76 % लोग शिक्षा का महत्व जानते हैं? शायद लोग मात्र हस्ताक्षर करने वाले को शिक्षित कहते हैं और जो थोड़ा पढ़े लिखे हैं, उनको विद्वान। अगर शिक्षा का थोड़ा भी महत्व इस देश में है तो मतदान करने के पहले मतदाता को थोड़ा सा सोचना चाहिए कि जो भी हमारा नेता हो, वह पूरे देश का हो, हमारी जाति का, धर्म का और हमारे संप्रदाय का नहीं।

विभिन्न राज्यों, खासकर उत्तर प्रदेश व बिहार का चुनाव जातीय समीकरण और धार्मिक समीकरण पर ही टिका है और यही इस देश का दुर्भाग्य है। उस पर गरीब तबके के लोगों को वोट के बदले पैसे भी दिए जाते हैं। भ्रष्ट राजनेता कुर्सी हथियाने के चक्कर में पूरे परिवार के अनुसार पैसे देते हैं और कई गरीब परिवार नासमझी में पैसे लेकर वोट दे भी देते हैं। अब ये नेता जो पैसे बाट रहे हैं, ये देश के कल्याण के लिए? गरीबों के कल्याण के लिए? या अपने कल्याण के लिए? सामान्य जनता यह गणित नहीं समझ पाती है और उस क्षेत्र का विकास अवरुद्ध हो जाता है।

एक तरफ चुनाव आयोग और उच्चतम न्यायालय समय समय पर नये नये कानून बना रहे हैं कि चुनाव निष्पक्ष हो, लोगों में जागरुकता हो, अपना नेता चुनने का उत्साह हो, कहीं भी किसी प्रकार की गड़बड़ी चुनाव में नहीं होने पाए, लेकिन उम्मीदवारी को लेकर खिंचा तानी, टिकट देने में भी, चुनाव प्रचार में कानून का उलंघन, जनता से झूठे वादे, ये सारे हथकंडे पार्टियां अपनाती हैं। टिकट देने में किस क्षेत्र में ब्राह्मण वोट ज्यादा है, कहाँ यादव वोट ज्यादा है, कहाँ दलित ज्यादा हैं , बैकवर्ड-फारवर्ड दलित, इन सारे आकंड़ों को ध्यान में रखकर टिकट वितरण किया जाता है। फिर घर घर जा कर अपनी जाति, धर्म, समुदाय को सपोर्ट करने का आग्रह किया जाता है।

सारी बातों का निचोड़ यह है कि जनता जब तक जातिवाद, प्रान्तवाद, धर्मवाद से उठकर आगे नहीं आएगी, तब तक इस देश का समग्र विकास संभव नहीं है। उत्तर प्रदेश के सभी लोगों को शिक्षित, समझदार नहीं कहा जा सकता, क्योंकि पक्ष-विपक्ष और ‘निष्पक्ष’, सभी राजनितिक पार्टियां खुद नसीहत देती हैं कि जाति धर्म और प्रान्त से ऊपर उठिये, हमारी पार्टी को वोट  दीजिये, हम  ही जाति धर्म और प्रान्त से परे सबको सामान अधिकार देंगे, लेकिन निर्वाचन के बाद निहित स्वार्थ में आकर सब भूल जातें हैं और वही करते हैं, जिसको दूसरों को करने से मना करते हैं। आज जो भी हो रहा है, वह देश हित के लिए कम निजी हित के लिए ज्यादा। इससे ऊपर उठ कर लोग सिर्फ देशहित के विषय में सोचें, तो निजी हित अपने आप सध जायेगा।

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