

आपको बता दें कि सुशांत सिंह के पिता ने पटना में एफआईआर दर्ज करवाई है। एफआईआर में रिया चक्रवर्ती को सुशांत को सुसाइड करने के लिए उकसाने और उसके बैंक खाते से पैसे ट्रांसफर होने का आरोप लगाया है।

सुशांत की खुदकुशी के बाद मुंबई में भी जांच चल रही है। मुंबई पुलिस अब तक 35 से ज्यादा लोगों के बयान दर्ज कर चुकी है।
रिया चक्रवर्ती ने अपनी याचिका में पटना में दर्ज एफआईआर को मुंबई ट्रांसफर करने की मांग की है। रिया चक्रवर्ती की ओर से वकील सतीश मानशिंदे ने याचिका दायर की है। याचिका में कहा गया है कि मुंबई में पहले से जांच चल रही है। एक ही घटना की दो जगह जांच नहीं हो सकती।
अभिनेता सुशांत सिंह के पिता ने अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती के सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने के बाद कैविएट याचिका दायर की है। सुशांत सिंह के पिता ने कहा है कि रिया चक्रवर्ती की याचिका पर बिना उनका पक्ष सुने कोई फैसला न सुनाया जाए।
डॉ अजय खेमरिया | नवप्रवाह न्यूज़ नेट्वर्क
जय जय कमलनाथ के उदघोष के बीच जब मप्र काँग्रेस के विधायकों ने कमलनाथ के नेतृत्व में आस्था व्यक्त की तो लगा कि मप्र की राजनीति में कमलनाथ एक नई ताकत बन बीजेपी का मुकाबला करेंगे। ज्योतिरादित्य सिंधिया के पार्टी छोड़ने के घटनाक्रम का एक पक्ष यह भी स्थापित करने का प्रयास किया गया कि सिंधिया से मुक्ति के बाद कैडर बेस कांग्रेस खड़ी हो सकेगी। सरकार गिरने के चार महीने बाद भी क्या मप्र में कांग्रेस की हालत बदल पाई है? यह सवाल इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि आने वाले मिनी विधानसभा चुनावों के लिए कांग्रेस मैदान में कहीं नजर ही नही आ रही है।
22 विधायकों ने कमलनाथ का साथ छोड़ा था। यह सिलसिला बीजेपी सरकार बनने के बाद थम जाना चाहिये था, लेकिन इस दौरान तीन अन्य विधायक भी कांग्रेस छोड़कर बीजेपी का दामन पकड़ चुके है। खबर है कि मालवा और निमाड़ के करीब आठ से दस विधायक भी आने वाले समय में कांग्रेस छोड़ सकते है। यानी मप्र में कांग्रेस उपचुनाव की चुनौती को स्वीकार करने से पहले खुद के बचे हुए घर को महफूज करने की चुनौती से ज्यादा हलाकान है।
ध्यान से समझा जाए, तो मप्र में कांग्रेस की इस हालत के लिए कमलनाथ खुद ही जिम्मेदार हैं। उनकी अपनी क्षमताओं और बढ़ती उम्र भी एक बड़ा कारक है। तथ्य यह है कि कमलनाथ मप्र के स्वाभाविक नेता है ही नही।वह आज भी दिल्ली दरबार के लिए फिट है, जबकि राज्य की राजनीति के लिए अशोक गेहलोत जैसे चपल और स्थानीय स्वीकार्यता वाले नेता ही सफल हो पाते हैं। खासकर मप्र जैसे राज्य जहाँ बीजेपी का संगठन देश भर में सबसे मजबूत और विस्तृत है और शिवराज सिंह जैसे ऊर्जावान नेता से किसी का मुकाबला हो तो 73 साल के कमलनाथ नैसर्गिक तौर पर भी मुकाबले में नही टिक सकते है। असल में मप्र कांग्रेस का अब संकट कमलनाथ ही हैं इसे निर्विवाद रूप से स्वीकार करना ही होगा। वे कभी उस स्वरूप में मप्र के नेता रहे ही नही है जैसा दिग्विजयसिंह, सिंधिया, अर्जुनसिंह अंदाज लगा सकते है कि कमलनाथ करीब 3 साल से मप्र कांग्रेस के अध्यक्ष है लेकिन 2018 का चुनाव जीतने तक वह मप्र के आधे जिलों में भी दोरे पर नही गए।सिंधिया के प्रभाव वाले आठ जिलों में तो वे एक बार भी नही आये।
जब 2018 में वे मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आ गए तब भी पूर्व मुख्यमंत्री होने तक उन्होंने प्रदेश के किसी इलाके में जाने की जहमत नहीं उठाई। उनके बारे में कहा जाने लगा था कि कमलनाथ का प्लेन भोपाल, छिंदवाड़ा, दिल्ली के बीच ही उड़ता है। दूसरी तरफ शिवराज सिंह कुर्सी गंवाने के बाबजूद मप्र के मैदानी दौरों पर डटे रहे।यहां तक कि दिग्विजयसिंह भी पूरे प्रदेश में सरकार रहने तक घूमते रहे। इससे पहले वे नर्मदा परिक्रमा कर प्रदेश के मालवा, महाकौशल, निमाड़ और नर्मदांचल को पैदल नाप चुके थे। मुख्यमंत्री के रूप में कमलनाथ शायद शिवराज सिंह की जनता के सीएम की छवि को खत्म करना चाहते थे वे मैदानी सीएम की जगह डीपी मिश्रा की तरह वल्लभ भवन से ही हुकूमत चलाने में भरोसा करने लगे। इसके लिए पार्टी संगठन या जनसंवाद के चैनल की जगह उन्होंने अपने निजी लोगों का सहारा लिया जो अंततः उनकी सरकार पतन के एक महत्वपूर्ण कारक साबित हुए। यह भी तथ्य है कि कमलनाथ को मप्र में कांग्रेस के मैदानी कैडर की भी कोई समझ नहीं रहीं है यही कारण है कि सीएम हाउस के नजदीक दिग्विजयसिंह के बंगले पर प्रदेश भर के कांग्रेसीयों का जमघट लगा रहता था और आम कार्यकर्ता मुख्यमंत्री निवास जाने से कतराते थे।
दिग्विजयसिंह जब कार्यकर्ताओं को सीएम से मिलने का परामर्श देते तो अधिकतर का जबाब यही होता था कि सीएम उन्हें पहचानते ही नही है।खासकर मालवा, विंध्य, मध्यभारत बैल्ट के लोगों के साथ यह समस्या थी।5 बार के विधायक और अब शिवराज सरकार में खाद्य मंत्री बिसाहूलाल सिंह ने कमलनाथ पर यही आरोप लगाया था कि वे विधायकों से मिलते नही है। चूंकि मप्र में पार्टी के चीफ भी कमलनाथ खुद ही थे इस कारण जनता और पार्टीगत नाराजगी का इनपुट आने का सिस्टम ही 15 साल बाद सत्ता में आई कांग्रेस सरकार ने विकसित ही नही किया। मंत्री विधायक एक दूसरे पर पैसा खाने , काम न करने के खुले आरोप लगाने लगे। यह एक मुख्यमंत्री के रूप में कमलनाथ की नाकामी ही थी जो अंततः उनके पतन का अहम कारण बनी। वैसे भी मप्र में कांग्रेस की सरकार कमलनाथ के चेहरे पर नही बनी थी बल्कि सभी क्षत्रपों ने अपने अपने इलाकों में अपने लोगों को टिकट बांटकर जीत के लिए जो दम लगाई उसका नतीजा थी। दूसरा पक्ष सवर्ण नाराजगी और कर्जमाफी थी जिसने बीजेपी के कोर वोटर को नाराज कर दिया था।
अब मप्र में कमलनाथ सरकार जा चुकी है और 27 सीटों पर उपचुनाव होना है पार्टी कमलनाथ और दिग्विजयसिंह के कबीलों में बंटती दिख रही है।कमलनाथ बगैर जमीनी पकड़ और मेहनत के केवल अपने पुराने बैकग्राउंड के बल पर मप्र को अपने कब्जे में करना चाहते है।उन्हें अब दिग्विजयसिंह से भी खतरा लगने लगा है इसीलिए उनके विरुद्ध भी राकेश चौधरी जैसे नेताओं को सार्वजनिक रूप आगे किया जा रहा है। नेता विपक्ष का पद भी कमलनाथ खुद संभाल रहे है जबकि स्वाभाविक दावा डॉ गोविंद सिंह और केपी सिंह जैसे 6 बार के विधायकों का है। ये सभी दावेदार दिग्विजयसिंह के समर्थक है। जाहिर है कमलनाथ मप्र में सिंधिया की तरह दिग्विजयसिंह और उनकी लॉबी को मजबूत नही होने देना चाहते है। अनौपचारिक रूप से वह सरकार के पतन के लिए दिग्विजयसिंह को जिम्मेदार भी बता चुके है लेकिन वह भूल गए कि अपने विधायकों पर नजर रखना और उन्हें सन्तुष्ट करना मुख्यमंत्री का काम होता है। अशोक गेहलोत इसका उदाहरण है। जाहिर कमलनाथ इस मोर्चे पर भी बुरी तरह नाकाम रहे हैं ऐसा इसलिए भी हुआ क्योंकि करीब 60 फीसदी विधायको से कमलनाथ का कोई पूर्व परिचय ही नही था, न टिकट वितरण, न उन्हें जिताने, न उनके लिए स्थानीय प्रबंधन में कमलनाथ की कोई भूमिका रही।
मप्र के आधे जिले आज भी ऐसे है जहाँ कमलनाथ जीवन मे कभी नहीं गए है। इन परिस्थितियों में अगर कमलनाथ डीपी मिश्रा की तर्ज पर मप्र की सरकार चलाने की कोशिशें कर रहे थे तब उसका पतन अवश्यंभावी ही था। आगामी उपचुनावों में कमलनाथ पार्टी के मुखिया के नाते बीजेपी और सिंधिया की तगड़ी चुनौती को कैसे पार पायेंगे? इस सवाल का जबाब बहुत कठिन नही है उनके मौजूदा वर्क कल्चर से समझा जा सकता है कि काँग्रेस भोपाल से ही मैदानी लड़ाई लड़ने वाली है।बीजेपी जहाँ दो महीने से ग्रासरूट पर फील्डिंग जमाने में जुटी है वहीं पूर्व मुख्यमंत्री और पीसीसी चीफ कांग्रेस के लड़ाकों को भोपाल बंगले पर तलब करते है।वहीं फोटो सेशन होता है और बयान जारी कर दिया जाता है कि बीजेपी केवल एक सीट जीतेगी।सवाल यह है कि भोपाल में बैठकर कमलनाथ कैसे उस सीएम और पार्टी से लड़ेंगे जो हमेशा ही इलेक्शन मोड़ में रहते है।
इसलिए मप्र का संकट तो फ़िलहाल कांग्रेस के लिए कमलनाथ का कल्चर ही बन गया है।
(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक व टिप्पणीकार हैं।)
Health desk | नवप्रवाह न्यूज़ नेट्वर्क
तमाम देशों के वैक्सीन बनाने के प्रयास पर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। डबल्यूएचओ ने स्पष्ट किया कि विभिन्न प्रयासों के बावजूद साल 2021 के पहले वैक्सीन का तैयार हो पाना मुश्किल है। WHO के मुताबिक, अगले साल तक वैक्सीन मिलने की उम्मीद है, लेकिन इसके मैन्यूफैक्चरिंग और डिस्ट्रीब्यूशन में और भी वक़्त लग सकता है।
रूस, चीन, अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में कोरोना वैक्सीन का विभिन्न चरणों में ट्रायल चल रहा है। लोग ये उम्मीद लगाए बैठे हैं कि जल्दी से वैक्सीन आ जाए तो सबकी गाड़ी पटरी पर आए, लेकिन डबल्यूएचओ के बयान ने एक बार फिर लोगों की उम्मीदों पर ब्रेक लगा दिया।
WHO के कार्यकारी निदेशक माइक रेयान ने स्पष्ट किया कि कोरोना वायरस की वैक्सीन बनाने के मामले में शोधकर्ताओं को कामयाबी मिल रही है, लेकिन साल 2021 के शुरुआती दिनों से पहले उसकी उम्मीद नहीं की जा सकती है। उन्होंने ये भी कहा कि ये ज़रूरी है कि वैक्सीन की सुरक्षा मानकों में कोई कमी नहीं की जाए, भले ही वैक्सीन बनने की गति थोड़ी धीमी हो जाए। आम लोगों को ये वैक्सीन देने से पहले, हमें उन्हें सुनिश्चित करना है कि वैक्सीन को सुरक्षित और प्रभावी बनाने के लिए हमने हर संभव एहतियात बरता है।
उन्होंने कहा कि कई संभावित वैक्सीन अपने ट्रायल के तीसरे फ़ेज़ में हैं और कोई भी वैक्सीन सुरक्षा मानकों या प्रभावी होने में अभी तक फ़ेल नहीं हुई है।