आतंकवाद एक ‘नासूर’!

AnujHanumat@Navpravah.com

 

पेरिस में हुआ हमला मुम्बई में हुए हमले जैसा था। अंतर सिर्फ यह है की पेरिस हमले के तुरंत बाद फ्रांस ने आईएस के खिलाफ अभियान शुरू कर दिया और विश्व बिरादरी ने इसका समर्थन किया और एक हम हैं, जिसे यह पता है कि मुंबई पर हमला (अन्य आतंकी हमला भी) किसने किया, किसकी शह पर किया, कौन कौन शामिल था लेकिन हम सबूतों को भेजने में जुटे हैं और हाथ में हाथ धरे बैठे हैं। आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक मुहीम की यही सबसे बड़ी विसंगति है।

शांति किसे नहीं सुहाती लेकिन मौत के कुछ सौदागरों को दुनिया का अमन चैन रास नही आता है। ये आतंक का दानव जब किसी देश को अपना निशाना बनाता है तो उसकी निर्माता महाशक्तियां उसे धैर्य और शांति रखने का उपदेश देती नजर आती हैं लेकिन जब बात अपने पर आती है,तो ये एकजुट होकर पूरी दुनिया आतंक के रक्तबीज के संहार का आह्वान करते हैं। वैश्विक आतंकवाद के खिलाफ दुनिया की महाशक्तियों द्वारा चलाये जा रहे अभियान का यह विरोधाभास, बड़ी विडम्बना है।

इंस्टिट्यूट फॉर इकोनोमिकल एण्ड पीस द्वारा जारी वैश्विक आतंकवाद सूचकांक में आतंकवाद से प्रभावित शीर्ष दस देशों में भारत छठे स्थान पर है। आतंकी घटनाओं में होने वाली मौतों में 1.2 फीसद इजाफे के साथ यह आंकड़ा 416 तक पहुँच गया है। 2010 के बाद आतंकी हमलों और मौतों की यह सर्वाधिक संख्या है। दुनियाभर में 2014 के दौरान कुल 32,658 लोग मारे गए। अगर हम इन आतंकी हमलों से दुनिया भर में होने वाले नुकसान की बात करें तो 2014 में आतंकी घटनाओं के चलते 52.9 अरब डॉलर की चपत दुनिया को लगी जो पिछले साल के नुकसान 32.9 अर्ब डॉलर से 61 फीसदी अधिक है।

पिछले 15 सालों में दुनिया भर में मारे जाने वाले लोगो की संख्या में 15 गुना की बढ़ोत्तरी हुई है। कोई भी आतंकी घटना लम्बे समय के लिए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में अपना व्यापक असर छोड़ती है। तात्कालिक नुकसान के इतर, इस दीर्घकालिक प्रभाव के तहत लोगों में अवसाद घर कर जाता है। सामजिक वैमनस्यता बढ़ती है।

राजनीतिक असर के रूप में नियम कानून कठोर किये जाने से विभिन्न देशों के बीच रिश्तों पर असर पड़ते हैं। आतंकवाद से सर्वाधिक प्रभावित 11 में से 10 देशों में शरणार्थी और आंतरिक विस्थापन की दर सर्वाधिक है। पेरिस हमले के बाद से यही सवाल चारों ओर उठ रहा है कि कहीं हम अनायास ही ‘सभ्यताओं के संघर्ष’ की ओर तो नही बढ़ रहे ? इस सवाल का जवाब टटोलने के लिए जब मैंने आतंकवाद के विभिन्न पहलुओं पर नजर डाली तो तमाम आश्चर्यजनक आंकड़े सामने आये ।

ग्लोबल टेररिज्म इंडेक्स 2015 के मुताबिक़ साल 2014 में दुनिया में 13,463 आतंकवादी वारदातें हुयी। यह पिछले वर्ष से 35 फीसदी अधिक थी। इन दुर्भाग्यपूर्ण हमलों में जो लोग मारे गए उनमे 78 फीसदी ईराक, नाइजीरिया, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और सीरिया के थे। यह जानकर आपको आश्चर्य होगा कि इन शीर्षस्थ बदनसीब देशों में बाद भारत का स्थान आता है, जहाँ 2014 में 416 लोग मारे गए। यहीं एक जानलेवा विरोधाभास का दीदार होता है । पेरिस 13/11 को लेकर इतना बवाल मचा हुआ है! मुम्बई में भी तो 26/11 हुआ था ? तब किसी पश्चिमी देश ने हवाई हमलों की बात नही की और न ही पाकिस्तान पर प्रतिबन्ध लगाने की कोशिश की। आज भी दाऊद और हाफिज जैसे आतंकवादी पकिस्तान में खुले आम घूम रहे है। उधर फ्रांस के जंगी जहाज़ों ने रूस के साथ मिलकर सीरिया को तहस-नहस करना शुरू कर दिया है। क्या इस समस्या का यही इलाज है ? अगर यही समाधान होता, तो अफगानिस्तान से आतंकवाद कब का विदा हो गया होता। इसी तरह ईराक में भी सद्दाम हुसैन के खात्मे के बाद सब सामान्य हो जाना चाहिए था, या दुनिया के सबसे बड़े आतंकी रहे ओसामा के मारे जाने के बाद भी आतंकवाद को पूरे विश्व से खत्म हो जाना चाहिए। ऐसा कुछ भी नही हुआ।

आईएस को सबसे खतरनाक संगठन बताया जा रहा है, जो अर्धसत्य है। उसके खात्मे की आड़ में सीरिया के शहरों और गाँवों पर बम बरसाए जा रहे हैं मिसाइलें दागी जा रही हैं। यह आतंकवाद की नही, बल्कि अपने दुश्मन के खात्में की जुगत है। यहाँ जान बूझकर इस सच को अनदेखा किया जा रहा है कि बोको हराम आईएस से भी बड़ा दहश्तगरत संगठन बन गया है। नाइजीरिया के इस कट्टरवादी संगठन ने 2014 में 6,644 लोगो को मौत के घाट उतारा, जबकि आइएस ने इस दौरान 6,073 लोग मारे। बोको हराम सिर्फ अफ्रीका के एक भूभाग पर कहर ढा रहा है। उसके शिकार लोग गरीब देशों के तंगहाल गाँवों और शहरों में रहते हैं, इसलिए उसको नजरअंदाज कर देना आसान है । अगर इसके हत्यारे अमेरिका या यूरोप के लोगों को मारने लग जाएँ, तो हालात बदल जाएंगे।   अर्थात अमेरिका जैसे विकसित देशो को यह समझना होगा कि आतंकवाद सबके लिए जहर है इसलिए इसके खिलाफ सबको एकजुटता से आगे आना चाहिए चाहे यह आफत किसी भी देश में आये। पेरिस हमले के तत्काल बाद आयोजित जी-20 देशों की बैठक में प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने कहा, “दुनिया को एक सुर में बोलते हुए बिना राजनीतिक विचार किये आतंकवाद के खिलाफ एकजुट कार्यवाही करनी चाहिए” साथ ही उन्होंने जोडा, “हमें उनको अलग करना चाहिए जो आतंकवाद को समर्थन और प्रायोजित करते हैं और उनके साथ खड़े होना चाहिए जो हमारे मानवता के मूल्यों को साझा करते हैं ।

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