अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत केस से जुड़े ड्रग्स मामले में एक्ट्रेस रिया चक्रवर्ती की पूरी रात नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) के लॉकअप में गुजरी। दरअसल, एनसीबी ने रिया को कल दोपहर गिरफ्तार किया था। इसके बाद देर शाम कोर्ट में पेशी हुई। निचली अदालत ने जमानत याचिका खारिज करते हुए 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। गिरफ्तारी के बाद रिया चक्रवर्ती को एनसीबी ऑफिस में ही रखा गया था। आज सुबह करीब सवा दस बजे उसे एनसीबी ऑफिस से भायखला जेल ले जाया गया, जहां वह ज्युडिशियल कस्टडी में रहेगी। इससे पहले भायखला जेल में रिया के रखने की सभी तैयारियां कर ली गई थी। भायखला जेल में रिया को वूमन सेल में रखा जाएगा। भायखला जेल में न्यायीक हिरासत में कैदी को रखने की सभी कागजी कार्यवाही को पूरा करने के बाद उसे वूमन सेल में भेज दिया जाएगा।
जेल रूल बुक के मुताबिक, शाम को जेल में कैदियों की गिनती के बाद नए कैदी को नहीं लिया जाता। इसलिए उन्हें मंगलवार रात को एनसीबी के लॉकअप में रखा गया। बुधवार सुबह करीब सवा दस बजे रिया को भायखला जेल में शिफ्ट किया गया। सूत्रों के मुताबिक, लॉकअप में रिया पूरी रात ठीक से सो नहीं पाईं। वह रात में कई बार उठीं और बैरक में टहलती हुई नजर आईं।
इस बीच, रिया और उसके भाई शोविक ने सेशन कोर्ट में जमानत के लिए फिर याचिका लगाई है। उनके वकील सतीश मानशिंदे ने इसकी पुष्टि की है। रिया पर ड्रग्स लेने, सुशांत को ड्रग्स देने सहित कई गंभीर आरोप लगे हैं। रिया का रोल ड्रग्स के ट्रांसपोर्टेशन और जमा करने वाले सिंडिकेट के सदस्य के तौर पर दिखाया गया है।
हालांकि, रिया ने अपने स्टेटमेंट में ये माना है कि वो ड्रग्स का सेवन करती थीं। एनसीबी की टीम ने उनसे तीन दिन पूछताछ की। उसके बाद उसे गिरफ्तार किया गया। ड्रग्स मामले में यह दसवीं गिरफ्तारी है। इससे पहले रिया के भाई शोविक, सुशांत के हाउस मैनेजर सैमुअल मिरांडा, कर्मचारी रहे दीपेश सावंत, ड्रग पैडलर अब्देल बासित परिहार, जैद विलात्रा और कैजिन इब्राहिम समेत 9 लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं।
अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत केस से जुड़े ड्रग्स मामले में एक्ट्रेस रिया चक्रवर्ती की पूरी रात नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) के लॉकअप में गुजरी। दरअसल, एनसीबी ने रिया को कल दोपहर गिरफ्तार किया था। इसके बाद देर शाम कोर्ट में पेशी हुई। निचली अदालत ने जमानत याचिका खारिज करते हुए 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। गिरफ्तारी के बाद रिया चक्रवर्ती को एनसीबी ऑफिस में ही रखा गया था। आज सुबह करीब सवा दस बजे उसे एनसीबी ऑफिस से भायखला जेल ले जाया गया, जहां वह ज्युडिशियल कस्टडी में रहेगी। इससे पहले भायखला जेल में रिया के रखने की सभी तैयारियां कर ली गई थी। एनसीबी ऑफिस से भायखला जेल में लाने के लिए एनसीबी ऑफिस के बाहर कड़ा पुलिस बंदोबस्त किया गया था, जिसमें महिला पुलिसकर्मियेां की बड़ी संख्या है. भायखला जेल में रिया को वूमन सेल में रखा जाएगा.
जेल रूल बुक के मुताबिक, शाम को जेल में कैदियों की गिनती के बाद नए कैदी को नहीं लिया जाता। इसलिए उन्हें मंगलवार रात को एनसीबी के लॉकअप में रखा गया। बुधवार सुबह करीब सवा दस बजे रिया को भायखला जेल में शिफ्ट किया गया। सूत्रों के मुताबिक, लॉकअप में रिया पूरी रात ठीक से सो नहीं पाईं। वह रात में कई बार उठीं और बैरक में टहलती हुई नजर आईं।
इस बीच, रिया और उसके भाई शोविक ने सेशन कोर्ट में जमानत के लिए फिर याचिका लगाई है। उनके वकील सतीश मानशिंदे ने इसकी पुष्टि की है। रिया पर ड्रग्स लेने, सुशांत को ड्रग्स देने सहित कई गंभीर आरोप लगे हैं। रिया का रोल ड्रग्स के ट्रांसपोर्टेशन और जमा करने वाले सिंडिकेट के सदस्य के तौर पर दिखाया गया है। हालांकि, रिया ने अपने स्टेटमेंट में ये माना है कि वो ड्रग्स का सेवन करती थीं।
एनसीबी की टीम ने उनसे तीन दिन पूछताछ की। उसके बाद उसे गिरफ्तार किया गया। ड्रग्स मामले में यह दसवीं गिरफ्तारी है। इससे पहले रिया के भाई शोविक, सुशांत के हाउस मैनेजर सैमुअल मिरांडा, कर्मचारी रहे दीपेश सावंत, ड्रग पैडलर अब्देल बासित परिहार, जैद विलात्रा और कैजिन इब्राहिम समेत 9 लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं।
संवैधानिक संस्थाएं औऱ लोकतंत्र 2014 से पहले कभी खतरे में क्यों नही थे ? अचानक ऐसा क्या हुआ है कि देश भर में एक वर्ग ऐसा वातावरण बनाने में जुटा है, मानों भारत में कोई तानाशाही राज आ गया है। दुहाई लोकतंत्र की दी जा रही है, लेकिन लोकतांत्रिक प्रक्रिया या संवैधानिक प्रावधानों पर खुद ही इस तबके को भरोसा नही है। असल में यह भारत के नए समावेशी लोकतंत्र को अस्वीकार करने का सामंती प्रलाप भर है।
देश की संसदीय राजनीति और संवैधानिक संस्थाओं को अपनी एकपक्षीय विचारसरणी से संचालित करने वाला कतिपय उदारवादी बौद्धिक जगत नए भारत की व्यवस्थाओं से बेदखल होता जा रहा है। यह बेदखली भी पूर्णतः लोकतांत्रिक प्रक्रिया के धरातल पर हो रही है।भारत के आत्मगौरव को कुचलकर अल्पसंख्यकवाद और तुष्टीकरण पर खड़ी की गई भारतीय शासन और राजनीति की व्यवस्थाओ के कमजोर होने से जिहादी बौद्धिक गिरोह अब उन्ही संस्थाओं को निशाने पर ले रहा है, जो कभी इनके एजेंडे को आगे बढ़ाने में सहायक थी।
वकील प्रशांत भूषण के ताजा अवमानना प्रकरण को बड़े व्यापक संदर्भ में समझने की आवश्यकता है। यह प्रकरण महज एक अवमानना भर का नहीं है, बल्कि वामपंथ एवं कांग्रेस विचारधारा का बिषैला औऱ भारत विरोधी चेहरा भी उजागर करता है। सुप्रीम कोर्ट से सजा सुनाएं जाने के बाद “स्वराज अभियान” के योगेंद्र यादव ने “कैम्पेन फ़ॉर ज्यूडिशियल अकाउंटबिलिटी एंड रिफॉर्म” शुरू करने का एलान किया। इस अभियान में अभिव्यक्ति की आजादी को बचाने के लिए देश भर से एक-एक रुपया एकत्रित करने का भी आह्वान है। योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण की राजनीतिक प्रतिबद्धता किसी से छिपी नही है। सवाल यह उठाया जा सकता है कि देश में करोड़ों मुकदमें बर्षों से लंबित है, लेकिन अकाउंटबिलिटी का सवाल इस अर्थ में पहले नही उठाया गया। भूषण एन्ड कम्पनी खुद देश की सर्वोच्च अदालत को अपने दबाब में लेती रही है।किसी भी मामले में जब इन्हें मनमाकिफ़ निर्णय की उम्मीद नही होती, तो सुनियोजित तरीके से बाहर आकर कोर्ट और जज के विरुद्ध चिल्लाने लगते हैं और जब फैक्ट के आधार पर निर्णय आ जाते है तब यही भूषण खुद को गांधी बनाने में जुट जाते है।
समस्या इस बार जस्टिस अरुण मिश्रा को लेकर इसलिए खड़ी की गई, क्योंकि वे भूषण के दबाब में नही आये।जस्टिस मिश्र की कोर्ट में भूषण के अधिकतर मामले लिस्टेड होने पर देश का सुप्रीम कोर्ट आखिर खराब हो जाता है, लेकिन तथ्य यह है कि प्रशांत भूषण जब गुजरात दंगों या अमित शाह से जुड़े मामले जस्टिस आफताब आलम के यहां लिस्टेड कराते रहे, तब सुप्रीम कोर्ट निष्पक्ष औऱ स्वतंत्र होता था! प्रशांत भूषण जिन संस्थाओं से सीधे और परोक्ष रूप से जुड़े है उनकी मानसिकता बीजेपी और आरएसएस ही नही भारत की संप्रभुता के भी विरुद्ध है। जाहिर है, अभिव्यक्ति की आजादी या न्यायिक जबाबदेही के उठाये गए सवाल देश हित से जुड़े न होकर एक घोषित एजेंडे का क्रियान्वयन भर है। इसलिए सवाल यह है कि क्या वाकई देश में संवैधानिक संस्थाएं औऱ लोकतंत्र संकट में है ? क्या प्रशांत भूषण, राजीव धवन या राहुल गांधी और उनके साथ समवेत एकेडेमिक्स ही सुप्रीम कोर्ट के रखवाले है?इन सवालों को हमें इतिहास और वर्तमान के बदले हुए वातावरण में भी देखना चाहिये।
तथ्य यह है कि 2014 के बाद यानी केंद्र में नरेन्द्र मोदी को जनता द्वारा सत्ता सौंपने के साथ ही बौद्धिक राजनीतिक जगत में इस जनादेश को ही खारिज करने के सतत प्रयास चल रहे है। देश में जनता पार्टी, सयुंक्त मोर्चा और यूपीए की सरकारें भी रही, लेकिन सवाल केवल मोदी सरकार के वोट परसेंट पर उठाया जाता है। तब भी, जब 2019 में जनता ने 2014 से बड़ा बहुमत मोदी को सौंपा है। असल में संसदीय राजनीति की पारदर्शी प्रक्रिया के जरिये भारत विरोधी तत्व जनता की अदालत से अलग थलग हो रहे है। जाति, सम्प्रदाय और क्षेत्रीयता के साथ अल्पसंख्यकवाद की चुनावी राजनीति लगातार हासिए पर आ पहुँची है, भारत के जिहादी बौद्धिक जगत (एकेडेमिक्स) को इस जमीनी स्थिति ने परेशान कर दिया है। यह वर्ग लंबे समय से भारतीय शासन और राजनीति का नियामक बना रहा है। प्रशांत भूषण घटनाक्रम इसी नियामकीय अस्तित्व के संकट की हताशा है। सुप्रीम कोर्ट भारत के लोकतंत्र का प्रधान पहरेदार है और इसे जनता की दृष्टि में विवादित करके मोदी सरकार के नीतिगत निर्णयों पर अराजकता पैदा करना ही भूषण एन्ड कम्पनी का असली मन्तव्य है।
वातावरण बनाया गया है कि मोदी सरकार ने कोर्ट, चुनाव आयोग, संसद, कार्यपालिका, विश्वविद्यालय, मीडिया को दबाब में ले लिया है। दावा किया जाता है कि लोग सरकार के भय से बोल नहीं पा रहे है।
सुप्रीम कोर्ट ने लॉक डाउन के दौरान मोदी सरकार के विरुद्ध याचिकाएं लेकर आये प्रशांत भूषण को चेतावनी जारी कर कहा था कि आप पीआईएल लेकर आये है या पब्लिसिटी याचिका। कोर्ट ने यहां तक कहा कि यह नहीं चल सकता है कि हम आपके मन मुताबिक निर्णय दें तो ठीक, नही दें तो कोर्ट पक्षपाती है। सच्चाई यह है कि राममंदिर, राफेल, सुशांत सिंह, तीन तलाक, पीएम केयर फ़ंड, सीएए, अनुच्छेद 370 पर सुप्रीम अदालत के निर्णय मोदी विरोधियों के मन मुताबिक नहीं हुए। सामाजिक कार्यकर्ता के वेष में सक्रिय लोगों का बड़ा तबका इस स्थिति से परेशान है। एक धारणा गढ़ी जा रही है कि “जज” डरे हुए है, भयादोहित है। लोकतंत्र खतरे में है और यह देश मे पहली बार हो रहा है।
हकीकत यह है कि 2014 के बाद से देश में अभिव्यक्ति की आजादी और संवैधानिक संस्थाओं की अक्षुण्णता प्रखरता से बढ़ी है। अतीत में भारत की न्यायिक आजादी को खंगालने की कोशिशें करें तो पता चलता है, कांग्रेस औऱ प्रशांत भूषण जैसे गिरोहों ने कोर्ट्स को सदैव सत्ता की पटरानी बनाने के प्रयास किया है। जिन जजों ने अतीत में कांग्रेस सरकारों की बादशाहत को चुनौती दी, उन्हें अपमानित कर ठिकाने लगा दिया गया। जबकि सुप्रीम कोर्ट में पदस्थ रहते हुए प्रेस कांफ्रेंस करने वाले जस्टिस रंजन गोगोई मोदी दौर में ही चीफ जस्टिस बने। इंदिरा गांधी ने तो खुलेआम बहुमत के बल पर प्रतिबद्ध न्यायपालिका और ब्यूरोक्रेसी को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता घोषित किया था।
केशवानंद भारती मामला भारत में लोकतंत्र की हत्या कर इंदिरागांधी द्वारा न्यायाधीश को भयादोहित, नियंत्रित और कब्जाने की नजीर है। इसकी चर्चा एकेडेमिक्स कभी नही करना चाहते है। 24 अप्रैल 1973 की तारीख को इस केस में निर्णय हुआ। 68 दिन जिरह हुई। इंदिरा सरकार ने एड़ी चोटी का जोर लगाया, लेकिन वह सुप्रीम कोर्ट में शिकस्त खा गई। भारत के न्यायिक इतिहास में पहली बार 13 जजों की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। 7-6 के बहुमत से निर्णय हुआ कि संसद को संविधान संशोधन का अधिकार तो है लेकिन “आधारभूत सरंचना” बेसिक स्ट्रक्चर से छेड़छाड़ नहीं की जा सकती है। संवैधानिक सर्वोच्चता, विधि का शासन, कोर्ट की अक्षुण्य आजादी, संसदीय शासन, निष्पक्ष संसदीय चुनाव, गणतन्त्रीय ढांचा, सम्प्रभुता आधारभूत ढांचे में परिभाषित किये गए। इनमें किसी भी प्रकार के संशोधन निषिद्ध कर दिये गए।
13 जजों की पीठ में 7 जज फैसले के पक्ष में थे, इनमें मुख्य न्यायाधीश एस एम सीकरी, के एस हेगड़े, एके मुखरेजा, जे एम शेलाट, एन एन ग्रोवर, पी जगनमोहन रेड्डी और एच आर खन्ना। 6 जज सरकार के साथ थे जस्टिस ए एन राय, डीजी पालेकर, के के मैथ्यू, एच एम बेग, एस एन द्विवेदी और वाय चन्द्रचूड़।
इस निर्णय से नाराज इंदिरा गांधी के दफ्तर से 25 अप्रेल 1973 को जस्टिस एन एन राय के घर फोन की घण्टी बजती है। क्या उन्हें नए सीजेआई का पद स्वीकार है? जबाब देने के लिए मोहलत मिली सिर्फ दो घण्टे की। 26 अप्रेल 1973 को जस्टिस ए एन राय को भारत का मुख्य न्यायाधीश बनाया जाता है तीन सीनियर जज जस्टिस शेलट, ग्रोवर और हेगड़े को दरकिनार कर दिया गया। ये तीनों जज उन 7 जजों में थे जिन्होंने सरकार को असिमित संविधान संशोधन देने से असहमति व्यक्त की थी। क्या ऐसी परिस्थितियां आज मोदी सरकार ने निर्मित की है?
1975 में इंदिरा गांधी ने 39 वा औऱ 41वा संवैधानिक संशोधन कर कानून बनाया था कि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, स्पीकर के चुनाव को कोर्ट में किसी भी आधार पर न चैलेंज किया जा सकता न कभी उन पर कोई मुकदमा दर्ज होगा। क्या यह संविधान को खूंटे पर टांगने जैसा नही था। हालाँकि केशवानंद केस के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने इन दोनों संशोधन को खारिज कर दिया था। 1975 में एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला केस आपातकाल में मौलिक अधिकारों की बहाली को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पहुँचा था। पांच जजों की पीठ ने 4-1के बहुमत से सरकार के पक्ष में निर्णय दिया। अकेले जस्टिस एच आर खन्ना ने सरकार से असहमत होते हुए निर्णय लिखा। जस्टिस खन्ना सबसे सीनियर थे, लेकिन इस निर्णय के चलते इंदिरा गांधी के निशाने पर आ गए। उन्हें सुपरसीड करते हुए एम एच बेग को भारत का मुख्य न्यायाधीश बना दिया गया।
एच एम बेग केशवानंद केस में भी सरकार के साथ खड़े थे। इसलिए उन्हें भी जस्टिस राय की तरह स्वामी भक्ति का इनाम मिला। वहीं जस्टिस खन्ना उस केस में भी सरकार के विरूद्ध थे। इसलिए उन्हें सजा दी गई। क्या इन हरकतों से तब संविधान की सर्वोच्चता खण्डित नही हुई थी ? बेग 1978 तक सीजेआई रहे फिर 1981 से 1988 तक अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष और वहां से हटने के बाद कांग्रेस के मुखपत्र दैनिक हेराल्ड के संचालक बने।
बहरूल इस्लाम के किस्से तो सबको पता ही है कि उन्हें जब चाहा सांसद, जब चाहा हाईकोर्ट जज, जब चाहा सुप्रीम कोर्ट जज बना दिया गया। 2010 से 2014 के मध्य जस्टिस अरुण मिश्रा वरिष्ठतम हाईकोर्ट जज होने के बाबजूद सुप्रीम कोर्ट में नामित नही किये गए तब किसी ने इस मुद्दे को नही उठाया, लेकिन उत्तराखंड हाईकोर्ट में पदस्थ जूनियर जज के एम जोसेफ को सुप्रीम कोर्ट में एलिवेट करने पर मोदी सरकार ने आपत्ति ली, तब पूरे एकेडेमिक्स भूषण जैसे लोगों के साथ न्यायपालिका की आजादी का रुदाली रुदन बजाने लगे। ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि जोसेफ अल्पसंख्यकवाद के प्रतीक थे। ऐसे ही तमाम पापों से वाकिफ होने के लिए हमें जस्टिस जगनमोहन रेड्डी की किताब “वी हैव रिपब्लिक” का अध्ययन करना चाहिये, जिसमें बताया गया है कि इंदिरा के कानून मंत्री रहे एच आर गोखले और इस्पात मंत्री कुमार मंगलम कैसे जजों को उस दौर में धमकाते थे।
कैसे अभिषेक मनु सिंघवी के शयन कक्ष से हाईकोर्ट जज निकलते है, यह जप्त स्टिंग में आज भी रहस्य ही है। पूर्व सीजेआई रंगनाथ मिश्रा बकायदा कांग्रेस के टिकट से राज्यसभा में विराजे। जबकि रंजन गोगोई तो नामित कोटे से सदस्य बने हैं। श्री मिश्रा के भतीजे तमाम आरोपों के बाद सीजेआई तक बनने में सफल रहे।
जस्टिस आफताब आलम और गुजरात दंगों की झूठी कहानियां गढ़ने वाली तीस्ता सीतलवाड़ की युगलबंदी न्यायिक इतिहास का शर्मनाक स्कैण्डल है। हिमाचल के पूर्व सीएम वीरभद्र सिंह की बेटी जस्टिस अभिलाषा सिंह ने गुजरात हाईकोर्ट और आफताब आलम द्वारा सुप्रीम कोर्ट में गुजरात दंगों पर दिए निर्णय प्रतिबद्ध न्यायपालिका का बदनुमा उदाहरण है।
आतंकी अफजल की फांसी टालने के लिए भूषण एन्ड कम्पनी के आग्रह पर आधी रात को खुलता सुप्रीम कोर्ट सेक्युलर था, गुजरात दंगों, शोहरबुद्दीन, इशरत जहां के मामलों में भी कोर्ट अच्छे थे, क्योंकि निर्णय मोदी, अमित शाह के विरुद्ध और लिबरल गैंग के एजेंडे के अनुरूप थे।लेकिन मनमाकिफ़ निर्णय न होने पर कोर्ट पक्षपाती औऱ डरे हुए हो गए। यह आम भारतीय भी अब समझ गया है। बहुमत के बल पर तानाशाही का एक भी उदाहरण मोदी सरकार के साथ नही जुड़ा है, जबकि इंदिरा औऱ राजीव गांधी के कार्यकाल सामाजिक न्याय से जुड़े बीसियों न्यायिक निर्णयों को पलटने के रहे है। कमोबेश यही वातावरण चुनाव आयोग और ईवीएम को लेकर बनाया जाता रहा है। हाल ही में दिग्विजयसिंह ने फिर कहा है कि 2024 में देश मे आखिरी चुनाव होंगे और यह भी ईवीएम के जरिये जीते जायेंगे, इसके बाद भारत में कभी चुनाव नही होंगे। इस तरह की दलीलें केवल संसदीय आरोप प्रत्यारोप तक सीमित नही है, बल्कि यह लोकतंत्र पर भी सीधा आघात है।
मीडिया का वह दौर याद किया जाना चाहिये, जब गुजरात दंगों के बाद मोदी को भारतीय मीडिया ने एक खलनायक की तरह विश्व भर में स्थापित कर दिया था।आज भी भारत में मोदी और उनकी नीतियों के आलोचक स्वतन्त्रता के साथ अपनी बात कहते है। टेलीग्राफ, हिन्दू जैसे अखबार रोजाना मोदी की खिलाफत में खड़े रहते है। वर्चुअल स्पेस पर द वायर, प्रिंट, जनचौक, सत्याग्रह, क्विंट, क्लिक, कारंवा, तहलका, स्क्रॉल, जनज्वार, न्यूज लाउंड्री जैसे तमाम पोर्टल बेधड़क अपना मोदी विरोधी एजेंडा चला रहे है। आपातकाल का दंश देने वालों को इसके बाबजूद अभिव्यक्ति की आजादी खतरे में नजर आती है तो इसके निहितार्थ हमें समझने होंगे।शाहीन बाग से लेकर जेएनयू, एमएमयू, जामिया में देश को तोड़ने तक की तकरीरें खुलेआम दी जाती हैं, फिर भी भारत मे एक वर्ग को डर लगता है। इस गिरोह में दस वर्ष उपराष्ट्रपति रहे हामिद अंसारी जैसे लोग भी शामिल है। सच तो यह है कि संवैधानिक संस्थाओं औऱ लोकतंत्र को जेबी बनाने के उपक्रम मोदी दौर से पहले बड़ी ही ठसक के साथ होतें रहे है। 1975 का आपातकाल हो या 356 के जरिये संघीय ढांचे को खत्म करना। कांग्रेस और वामपंथ ने देश की जनभावनाओं का कभी ख्याल नही रखा। आज अभिव्यक्ति की चरम आजादी के माहौल में लिबरल्स ने अपने सुगठित एवं विस्तृत सूचना एवं प्रचार तन्त्र से ऐसा माहौल बनाने की कोशिशें की है जो मिथ्या, मनगढ़ंत औऱ फर्जी है।
सुखद पक्ष यह भी है कि देश की अधिसंख्य जनता आज भूषण सरीखे उदारवादियों के वास्तविक एजेंडे को समझ चुकी है।
भीमा कोरेगांव हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराए जा रहे एल्गार परिषद के मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने कबीर कला मंच के सांस्कृतिक तीन कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया है। सागर तात्याराम गोरखे (32, वाकड, पुणे), रमेश मुरलीधर गायचोर (36, येरवडा, पुणे) और ज्योति राघोबा जगताप (33, कोंढवा, पुणे) को कई दिनों की पूछताछ के बाद सोमवार देर रात गिरफ्तार कर लिया।जाने-माने सांस्कृतिक गायक और पुणे के जाति विरोधी कार्यकर्ता गोरखे, गायचोर और जगताप भीमा-कोरेगांव शौर्य दिवस प्रेरणा अभियान का हिस्सा थे। इसके बाद 2018 में पुणे के शनिवारवाड़ा पर हुए एल्गार परिषद मामले में गिरफ्तारियों की संख्या अब 15 गिरफ्तारियां हो चुकी है।
एल्गार परिषद में दक्षिणपंथी तुषार दामगुडे ने कथित तौर पर पुणे में मराठों और दलितों के बीच हिंसा भड़काने की कोशिश की थी जिसके लिए पुलिस में एफआईआर दर्ज कराई गई थी, जिसमें छह लोगों को नामजद किया गया था।गोरखे, गायचोर और जगताप का नाम एफआईआर में दर्ज था लेकिन उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया था।इस साल जुलाई में उन्हें कई बार पूछताछ के लिए बुलाया गया था लेकिन फिर जाने दिया जाता लेकिन चार सितंबर को उन्हें दोबारा पूछताछ के लिए बुलाया गया। गोरखे और गायचोर का आरोप है कि एनआईए उन पर इस मामले में गिरफ्तार हो चुके लोगों के खिलाफ बयान देने के लिए दबाव डाल रही है।
इससे पहले सोमवार को ही एनआईए ने एल्गार परिषद मामले की जांच के संबंध में पूछताछ के लिए हैदराबाद के इंग्लिश एंड फॉरेन लैंग्वेज यूनिवर्सिटी (ईएफएलयू) में प्रोफेसर के। सत्यनारायण (51) और द हिंदू के पत्रकार केवी कुरमानाथ को बुलाया है।ये दोनों ही एल्गार परिषद मामले में जेल में बंद कवि एवं सामाजिक कार्यकर्ता वरवरा राव के दामाद हैं।
इसके साथ ही एनआईए ने कोलकाता के इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च (आईआईएसईआर) में एसोसिएट प्रोफेसर पार्थसारथी रे को भी एल्गार परिषद मामले में पूछताछ के लिए तलब किया है। पार्थसारथी ने एनआईए द्वारा उन्हें तलब करने को प्रताड़ित करने की रणनीति करार दिया है।
इस मामले में पहले की दौर की गिरफ्तारियां जून 2018 में हुई थीं, जब पुणे पुलिस ने लेखक और मुंबई के दलित अधिकार कार्यकर्ता सुधीर ढवले, यूएपीए विशेष और वकील सुरेंद्र गाडलिंग, गढ़चिरौली से विस्थापन मामलों के युवा कार्यकर्ता महेश राउत, नागपुर यूनिवर्सिटी के अंग्रेजी विभाग की प्रमुख शोमा सेन और दिल्ली के नागरिक अधिकार कार्यकर्ता रोना विल्सन को गिरफ्तार किया था।
दूसरे दौर की गिरफ्तारियां अगस्त 2018 से हुईं, जिसमें वकील अरुण फरेरा, सुधा भारद्वाज, लेखक वरवरा राव और वर्नोन गॉन्जाल्विस को हिरासत में लिया गया था।शुरु में पुणे पुलिस इस मामले की जांच कर रही थी लेकिन बाद में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने नवंबर 2019 में इस मामले को एनआईए को सौंपा था।इसके बाद एनआईए ने 14 अप्रैल 2020 को आनंद तेलतुम्बड़े और कार्यकर्ता गौतम नवलखा और जुलाई 2020 में हेनी बाबू को गिरफ्तार किया।
इस समय पूरे विश्व सहित भारत भी कोरोना महामारी से जूंझ रहा है, लेकिन अब भारत सरकार ने धीरे-धीरे अनलॉक शुरू किया है. अनलॉक-4 में केंद्र सरकार ने धार्मिक स्थल, मॉल, पार्क आदि सार्वजनिक स्थानों को शुरू करने संबंधी दिशा निर्देश जारी किए है. इसी के तहत बिहार में आज सुबह से ही अनलॉक-4 लागू हो गया है। पटना समेत पूरे बिहार में मंगलवार को धर्मस्थल-मॉल-पार्क खुल गए। सब्जी, फल, मीट-मछली सहित अन्य सभी तरह की दुकानों के खुलने और बंद होने के लिए तय समय सीमा की पाबंदी समाप्त कर दी गई है।
– महावीर मंदिर में पूजा करने पहुंचे भक्त
लंबे समय बाद मंदिर के गेट खुले तो भक्तों की भीड़ जुटी। पटना जंक्शन स्थित महावीर मंदिर में सुबह 6 बजे से ही लोग पूजा करने पहुंचने लगे। मंगलवार होने के चलते भी अधिक संख्या में लोग जुटे। यहां कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए लोगों के बीच जागरूकता दिखी। महिलाएं-पुरुष मास्क लगाकर मंदिर में पहुंचे। मंदिर प्रबंधन द्वारा भी बिना मास्क लगाए आए भक्तों को मास्क पहनकर ही मंदिर में प्रवेश के लिए कहा गया।
– मेंटेनेंस के बाद शुरू होगा पीएनएम मॉल
मंगलवार सुबह पीएनएम मॉल का गेट नहीं खुला। मॉल खुलने की सूचना पाकर लोग पहुंचे, लेकिन गेट बंद होने के चलते लौटना पड़ा। कहा गया कि मॉल कई माह से बंद है। आज पूरे दिन मेंटेनेंस होगा इसके बाद मॉल खुलेगा।
– सांसद पहुंचे मॉर्निंग वॉक पर
अनलॉक 4 में राजधानी के पार्क भी खुल गए हैं। इससे मॉर्निंग वाक करने वालों को सुविधा मिली है। मॉर्निंग वाक पर आए सांसद रामकृपाल यादव ने कहा कि गांधी मैदान और शहर के अन्य पार्क बंद होने से लोगों को काफी असुविधा हो रही थी। स्वस्थ्य रहने के लिए सुबह टहलना और एक्सरसाइज करना चाहिए। पार्क बंद होने के चलते मैं मजबूरी में सड़क पर टहल रहा था। एक बार तो मैं हादसे से बाल-बाल बचा।
हाल ही में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के निवास मातोश्री पर धमकी भरा फोन आया था. हालांकि इस फोन को लेकर शिवसेना के विरोधियों ने उद्धव ठाकरे को काफी ट्रोल भी किया, लेकिन अब एनसीपी प्रमुख शरद पवार और राज्य के गृहमंत्री अनिल देशमुख को भी धमकी भरे फोन आए हैं. बताया जाता है कि किसी अज्ञात व्यक्ति ने देशमुख के नागपुर स्थित दफ्तर पर फोन कर धमकी दी है, तो वहीं शरद पवार के घर भी ऐसा ही फोन आया है.
– पुलिस ने शुरू की जांच
इस संदर्भ में पुलिस को सूचना दे दी गई है और मामले की जांच शुरू हो गई है. राकां के महाराष्ट्र अध्यक्ष और जल संसाधन मंत्री जयंत सिंह ने कहा, मुख्यमंत्री और शरद पवार को धमकी भरे फोन आना गंभीर बात है. मुंबई पुलिस ने रविवार को ठाकरे के निवास मातोश्री में सुरक्षा बढ़ाई थी. वहीं नेता प्रतिपक्ष देवेंद्र फडणवीस ने इस मामले की उचित जांच कराये जाने की मांग की है.
आत्महत्या एक एेसा क्षण है, जिसने यदि टालना संभव हो जाए, तो अनेक लोगों की जान बच सकती है. कई ऐसे लोग भी है, जिन्हें आत्महत्या से बचाया जा सका, ऐसे लोग मानते हैं कि यदि वे आत्महत्या कर लेते, तो बहुत बड़ी गलती करते. लेकिन आत्महत्या एक ऐसा क्षण होता है, जब व्यक्ति को लगता है कि अब कुछ नहीं बचा, मृत्यु के अलावा कोई चारा नहीं है. आत्महत्या के अनेक कारण हो सकते हैं, इनमें निराशा या असफलता के कारण सर्वाधिक है. इसके अलावा आत्मसम्मान, बेरोजगारी, घरेलू मामले, हताशा आदि. माना जाता है कि आर्थिक तंगहाली से लोग सबसे ज्यादा आत्महत्या करते हैं, लेकिन एक रिपोर्ट के अनुसार घरेलू विवाद आत्महत्या के कारणाों में सबसे आगे है. इनमें पुरुषों की संख्या सबसे ज्यादा है. दूसरी ओर नौकरी पेशा महिलाओं की तुलना में घरेलू महिलाएं ज्यादा आत्महत्या करती है. हाल ही में नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी ने भी सुसाइड को लेकर नया डेटा जारी कर दिया है. इस डेटा के मुताबिक, 2019 में 1.39 लाख से ज्यादा लोगों ने सुसाइड कर अपनी जान गंवा दी. यानी हर दिन 381 और हर घंटे 16 लोग खुदकुशी कर रहे थे.रिपोर्ट के मुताबिक, 2019 में सुसाइड करने वालों का आंकड़ा 2018 की तुलना में 3.4% ज्यादा है. 2018 में 1.34 लाख लोगों ने सुसाइड की थी.
पिछले साल सुसाइड करने वाले 23.4% लोग दिहाड़ी मजदूरी करते थे. ऐसे 32 हजार 563 लोगों ने खुदकुशी कर ली. दिहाड़ी मजदूरों के बाद घर का काम संभालने वालीं हाउस वाइफ ने सबसे ज्यादा जान गंवाई. 2019 में देशभर में 21 हजार 359 हाउस वाइव्स ने सुसाइड कर ली. सुसाइड करने वालों में 14 हजार से ज्यादा लोग बेरोजगार थे. 10 हजार से ज्यादा स्टूडेंट्स ने भी आत्महत्या कर ली. इन सबके अलावा खेती-किसानी से जुड़े 10 हजार 281 लोगों ने भी सुसाइड कर जान दे दी. 2019 में देशभर में 72 मामले मास या फैमिली सुसाइड के भी दर्ज किए गए, जिनमें 180 लोगों ने जान दे दी. सबसे ज्यादा 16 मामले तमिलनाडु में आए थे, जिनमें 43 लोगों की जान गई.
अक्सर लोगों का मानना होता है कि सुसाइड के पीछे खराब आर्थिक हालत वजह होती होगी या फिर बेरोजगारी. लेकिन ऐसा नहीं है. एनसीआरबी के मुताबिक, पिछले साल जितने लोगों ने सुसाइड किया, उनमें से सबसे ज्यादा 32.4% ने परिवार की दिक्कतों से तंग आकर आत्महत्या कर ली. 2019 में 45 हजार 140 लोगों ने परिवार की दिक्कतों की वजह से सुसाइड की. सुसाइड का दूसरा बड़ा कारण बीमारी है. पिछले साल 23 हजार 830 लोगों ने बीमारी से परेशान होकर सुसाइड कर ली. इससे पता चलता है कि देश में अभी भी एक तबके तक स्वास्थ्य सेवाएं नहीं पहुंच पा रही हैं. तीसरा बड़ा कारण ड्रग एडिक्शन है, जिसकी वजह से पिछली साल 7 हजार 860 लोगों ने आत्महत्या कर ली. वहीं बेरोजगारी की वजह से 2 हजार से ज्यादा लोगों ने अपनी जान गंवाई.
सुसाइड करने वालों में 70% पुरुष पिछली साल सुसाइड करने वाले 1.39 लाख लोगों में से 70% से ज्यादा पुरुष थे. 2019 में पुरुषों ने 97 हजार 613 पुरुष और 41 हजार 493 महिलाएं थीं. जबकि, 17 ट्रांसजेंडर ने भी सुसाइड की.सबसे ज्यादा सुसाइड 18 से 30 साल की उम्र के लोगों ने की. इस एज ग्रुप के 48 हजार 774 लोगों ने सुसाइड की थी. जबकि, 45 साल से ऊपर 36 हजार 449 लोगों ने आत्महत्या कर ली थी.करीब 50% सुसाइड सिर्फ 5 राज्यों में2019 में सुसाइड के 49.5% मामले सिर्फ 5 राज्यों में ही दर्ज किए गए.
इनमें सबसे ज्यादा 13.6% मामले महाराष्ट्र में सामने आए.बाकी 50.5% मामले देश के बचे 24 राज्य और 7 केंद्र शासित प्रदेशों में मिले. एकमात्र लक्षद्वीप ही ऐसा था, जहां सुसाइड का एक भी मामला नहीं आया. 5 साल में कितने बढ़ गए सुसाइड के मामले?2015 में देश में 1.33 लाख से ज्यादा सुसाइड के मामले दर्ज किए गए थे. 2019 में यह आंकड़ा 1.39 लाख के पार पहुंच गया. यानी पिछले पांच साल में खुदकुशी के मामलों में 4% से ज्यादा का इजाफा हो गया है.एनसीआरबी का डेटा बताता है कि 2016 और 2017 में सुसाइड के मामलों में कमी आई थी. 2016 में 1.31 लाख और 2017 में 1.29 लाख लोगों ने सुसाइड की थी. लेकिन, 2018 और 2019 में मामले बढ़ गए. 2018 में 1.34 लाख मामले आए थे.
सुसाइड के मामले में भारत पहले नंबर परपिछले साल डब्ल्यूएचओ की एक रिपोर्ट आई थी. इस रिपोर्ट में बताया गया था कि साउथ-ईस्ट एशियाई देशों में भारत में सुसाइड रेट सबसे ज्यादा है. डब्ल्यूएचओ ने 2016 के डेटा के आधार पर ये रिपोर्ट जारी की थी. इसके मुताबिक, भारत में एक लाख आबादी पर 16.5 लोग सुसाइड कर लेते हैं. दूसरे नंबर पर श्रीलंका है, जहां एक लाख में 14.6 लोग खुदकुशी कर लेते हैं.डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, दुनियाभर में हर साल 8 लाख से ज्यादा लोग सुसाइड करते हैं, यानी हर 40 सेकंड में एक सुसाइड.0
मध्य प्रदेश के इंदौर में एक दिलदहला देनेवाला मामला सामने आया है. यहां 12 वर्षीय बच्चे ने अपनी 10 साल की दोस्त को महज इसलिए पत्थर से मार डाला, क्योंकि बच्ची ने लड़के की पालतू चुहिया को मार डाल था और गेम में वह उसे हरा देती थी. पुलिस पूछताछ में बच्चे ने खुद स्वीकार किया, वह मुझे बार-बार ऑनलाइन गेम में हरा देती थी। इतना ही नहीं उसने मेरी सफेद चुहिया पिंकी को भी मारकर गाड़ दिया। जब मैं यह पूछने के लिए उसे लेकर गया तो वह वहां भी मुझसे लड़ने लगी। उसने मुझे मारा तो मैंने भी उसके सिर पर पत्थर मारा। वह गिर गई तो पत्थर मारकर उसके सिर के पास दो बड़े पत्थर भी रख दिए। यह सुनते ही डीआईजी सहित अन्य अधिकारी सन्न रह गए। यह चौंकाने वाले शब्द उस 12 साल के बच्चे के, जिसने साथ खेलने वाली 10 साल की बच्ची की पत्थर से सिर कुचलकर हत्या की है। डीआईजी हरिनारायणचारी मिश्र ने बताया कि इस दर्दनाक घटना का खुलासा कम अभिभावकों के लिए एक सबक की तरह है। जो अपने बच्चों को वीडियो गेम दे देते हैं.
– मात्र दो घंटे में सुलझाई हत्या की गुत्थी
लसूड़िया थाने के जवानों ने दो घंटे में हत्या की गुत्थी सुलझा दी। पुलिस ने हत्या का केस दर्ज कर बालक को बाल संरक्षण गृह भेजा है। अब तक सबसे कम उम्र की हत्या का संभवत: यह पहला मामला है। डीआईजी हरिनारायणाचारी मिश्र ने बताया कि घटना सोमवार दोपहर 12 बजे लसूड़िया क्षेत्र की आईडीए मल्टी के पास की है। मल्टी में रहने वाली दस साल की वेदिका पिता निर्मल लौवंशी की पड़ोस में रहने वाले 12 वर्षीय बालक ने पत्थर से सिर कुचलकर मार डाला। बालिका सुबह घर से 12 बजे पूजा के लिए फूल तोड़ने का बोलकर निकली थी, तभी उसे बालक मिल गया। दोनों रोज खेलते थे इसलिए किसी को शंका नहीं हुई।
– फ्री फायर गेम खेलते थे बच्चे
डीआईजी के अनुसार लसूड़िया थाना क्षेत्र के आईडीए मल्टी के पास रहने वाली 5वीं क्लास की बच्ची और पड़ोस में ही रहने वाला 6वीं क्लास का बच्चा दोनों साथ रहते थे। ये अपने-अपने घर से फ्री फायर नाम का गेम खेला करते थे। इस गेम को चार लोग एक साथ खेल सकते हैं। इस ऑनलाइन गेम में हमेशा बच्ची जीत जाया करती थी। इतना ही नहीं जब वह अपने भाई के साथ भी खेलता था तो वह बच्ची उसकी ओर से खेलते हुए उसे हरा देती थी। लगातार हार से बच्चे के मन में बच्ची के प्रति ईष्या पनपने लगी थी। वह अब गेम को गेम की तरह ना खेलकर खुन्नस पालने लगा था।
– बच्चे की सफेद चुहिया को बच्ची ने मार डाला था
इसी बीच इनके बीच बच्चे की सफेद चुहिया पिंकी को लेकर विवाद हुआ था। बच्चे का कहना था कि बच्ची ने ही उसकी चुहिया को मारा है। खुन्नस पाले बैठा बच्चा इन्हीं बातों को लेकर उसे दोपहर में अपने साथ लेकर गया। घर से करीब 100 मीटर दूरी पर सड़क किनारे सुनसान जगह पर दाेनों के बीच इसी बात को लेकर विवाद हुआ। गुस्से में आकर बच्चे ने उसके सिर पर एक बड़ा सा पत्थर दे मारा। बच्ची के नीचे गिरते ही फिर से उसने पत्थर से सिर पर वार किया। इसके बाद वह सिर पर पत्थर रखकर वापस घर आया और खुद को बाथरूम में बंद कर लिया। करीब 40 मिनट तक समझाने के बाद वह बाहर आया और उसने पूरी बात बता दी।
– फूल लेने दोपहर को निकली थी बच्ची
बच्ची सुबह घर से 12 बजे पूजा के लिए फूल तोड़ने का बोलकर निकली थी। तभी उसे बच्चा मिल गया। दोनों रोज खेलते थे, इसलिए किसी को इनके साथ झगड़ने और जाने से शंका नहीं हुई। लेकिन घटना स्थल पर ये लड़ाई करते हुए पहुंचे थे। इन्हें लड़ते हुए इलाके की एक महिला और एक लड़की ने देखा था। कुछ देर बाद बच्चा हत्या कर घर लौट आया। घंटों तलाशने के बाद दोपहर 4 बजे जब मल्टी के पास खाली मैदान में गड्ढे में जाकर पिता व अन्य लोगों ने देखा तो बच्ची वहां मृत मिली। उसके सिर पर पत्थर के वार थे। मरने के बाद उसके चेहरे के आस-पास दो बड़े पत्थर भी सटाकर रख दिए थे। हत्या का पता चलते ही एएसपी राजेश रघुवंशी व लसूड़िया टीम मौके पर पहुंची।
– बच्चे को बाल संरक्षण गृह भेजेगी पुलिस
एएसपी राजेश रघुवंशी ने बताया कि हत्या करने वाले बालक को बाल संरक्षण गृह के हवाले किया जाएगा। बाद में उसे किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष पेश करेंगे। फिलहाल मामले में हत्या का केस दर्ज किया है। मृतका बच्ची का पिता ड्राइवरी करता है। मां गृहणी हैं। परिवार में उसका एक भाई है। शव को पोस्टमामर्टम के लिए एमवायएच भेजा है।
यह पहलेवाला भारत नहीं है, यह नया भारत है. वह दिन लद गए, जब कोई हमारी सीमाओं का अतिक्रमण करे और हम देखते रह जाए. प्रधानमंत्री मोदी ने कहा भी है, जब शांति चाहते हैं, लेकिन यदि कोई हमें छेड़ेगा, तो हम चुप भी नहीं बैठेंगे. इसका नजारा सोमवार को भारत-चीन सीमा पर देखने को मिला. लद्दाख में पैंगॉन्ग झील के दक्षिणी किनारे पर भारत और चीन के बीच फायरिंग की खबर है। चीनी सेना के वेस्टर्न थियेटर कमांड के प्रवक्ता के मुताबिक भारतीय सैनिकों ने 7 सितंबर को पैंगॉन्ग त्सो के दक्षिणी किनारे पर एलएसी पार कर घुसपैठ की कोशिश की है। चीन का ये भी दावा है कि भारतीय सेना ने लाइन ऑफ कंट्रोल (एलएसी) पार करने के बाद हवाई फायर भी किए। चीनी सेना के बयान के मुताबिक भारतीय सेना ने शेनपाओ इलाके में एलएसी पार की और जब चीनी सेना की पेट्रोलिंग पार्टी भारतीय जवानों से बातचीत करने के लिए आगे बढ़ी तो उन्होंने जवाब में वॉर्निंग शॉट किए यानी हवा में गोली चलाई। हालांकि, भारतीय सेना ने अब तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है। लेकिन सूत्रों के मुताबिक दोनों सेनाओं के बीच सोमवार को फायरिंग हुई है।
चीन के सैनिक आगे बढ़कर भारतीय इलाके में कब्जे की कोशिश कर रहे थे। वो भारतीय सेना की लोकेशन के काफी नजदीक आ रहे थे। भारतीय सेना ने उन्हें पीछे हटने को कहा। बहस बढ़ी और भारतीय सेना को चेतावनी देते हुए हवाई फायर करना पड़ा। ये इलाका रेचन ला है। सूत्रों के मुताबिक इस झड़प के दौरान एक दो नहीं बल्कि कई राउंड फायरिंग हुई। चीन के सैनिकों ने भी फायर किया। हालांकि, ये अब तक साफ नहीं हो पाया है कि पहले चीन के सैनिकों ने फायरिंग की या भारत के जवानों ने। इस फायरिंग के बाद चीन के सैनिक अपनी लोकेशन पर लौट गए। फिलहाल हालात सामान्य हैं।
इससे पहले, 1 सितंबर को भारत में चीनी दूतावास ने बयान जारी कर आरोप लगाया था कि भारतीय सैनिकों ने पैंगॉन्ग सो झील के दक्षिणी तट पर फिर से एलएसी क्रॉस की। चीनी सेना के वेस्टर्न थियेटर कमांड के प्रवक्ता कर्नल झांग शुइली ने यह भी कहा है कि भारत अपने सैनिकों को नियंत्रित करे। उनके मुताबिक जब चीन के बॉर्डर गार्ड्स ने भारतीय सैनिकों को रोका तो उन्होंने गोली चलाई। जिसके बाद पीएलए के सैनिकों को स्थिति को संभालना पड़ा। न्यूज एजेंसी एएनआई ने भी सूत्रों के हवाले से एलएसी पर फायरिंग होने की बात कही है।
दोनों देशों की सीमा पर इससे पहले 45 साल पहले गोली चली थी। 20 अक्टूबर 1975 को अरुणाचल प्रदेश के तुलुंग ला में चीन ने असम राइफल की पैट्रोलिंग पार्टी पर धोखे से एम्बुश लगाकर हमला किया था। इसमें भारत के 4 जवान शहीद हुए थे। वहीं इसी साल जून में गलवान में दोनों देशों के बीच हुई झड़प में हमारे 20 सैनिकों की शहादत हुई थी। हालांकि गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के दौरान भी चीनी और भारतीय जवानों की ओर से गोलियां नहीं चलाई गई थीं।
सगे साढ़ू की कोरोना से मौत के बाद दो किमी के अंतर पर स्थित श्मशानभूमि में पार्थिव शरीर को ले जाने के लिए एंबुलेन्स मिलने में हुई देरी से नाराज मनसे नगरसेवक वसंत मोरे का पारा गरम हो गया. उन्होंने मनपा उपायुक्त की कार का कांच तोड़ कर चकनाचूर कर दिया.
– सगे साढ़ू का कोरोना से हुआ था निधन
मनसे के महापालिका के गुटनेता वसंत मोरे के साढू का रविवार दोपहर कोरोना के कारण निधन हो गया. भारती हॉस्पिटल से केवल दो किमी पर स्थित कात्रज श्मशानभूमि में उसके अंतिम संस्कार के लिए उसके पार्थिव शरीर को ले जाना था. इसके लिए महापालिका के व्हीकल डिपो के पास एंबुलेंस की मांग की गई. बार बार फोन करने के बाद भी एंबुलेंस मिलने में तीन घंटे लग गए. इसके बाद श्मशान भूमि की विद्युतदाहिनी में पहले से एक शव का अंतिम संस्कार शुरू होने से व दो एंबुलेन्स के वेटिंग में खड़े होने से साढू के अंतिम संस्कार में रात दस बज गए. इसके लिए जब मोरे ने कारण पूछा तो संबंधित विद्युत विभाग के अधिकारी व व्हीकल डिपो के अधिकारी एक दूसरे पर जिम्मेदारी डालने लगे. जिससे वसंत मोरे का सब्र जवाब दे गया. सोमवार सुबह उन्होंने घोले रोड के क्षेत्रीय कार्यालय पहुंच कर व्हीकल डिपो के प्रमुख उपायुक्त नितिन उदास के कार की तोडफोड की.
– जब नगरसेवक का यह हाल है, तो आम नागरिक क्या करेंगे
इस संदर्भ में वसंत मोरे ने बताया कि इसके बाद सभी निजी एंबुलेंस को प्रशासन ने अपने कब्जे में ले लिया. मोरे ने कहा कि केवल दो किलोमीटर के अंतर पर शव को ले जाने के लिए जब नगरसेवक को एंबुलेन्स उपलब्ध नहीं हो पा रही है तो आम नागरिकों की बात ही छोड़ दें. उन्होंने बताया कि पूर्व महापौर दत्ता एकबोटे की मृत्यु के बाद भी अधिकारी गंभीर पहीं हैं व सही रणनीति नहीं बनाई.
– अंतिम संस्कार के लिए करना पड़ता है लंबा इंतजार
उन्होंने शिकायत की कि अंतिम संस्कार के लिए स्मशानभूमि में घंटों तक लोगों को इंतजार करना पड़ रहा है. ऐसे में मौत की संख्या को देखते हुए कोरोना मरीजों का अंतिम संस्कार केवल विद्युत दाहिनी में ही किया जा सकता है, यह निर्णय बेहद गलत है. पहले से अपनों के कोरोना की इलाज के लिए जद्दोजहद करने वाले रिश्तेदारों को अपनों की मौत के बाद पार्थिव शरीर की होनेवाली दुर्दशा से लोग खिन्न हैं. मोरे ने सवाल उठाए कि ग्रामीण भागों में विद्युत दाहिनी नहीं हैं, ऐसे में वहां पर कोरोनाबाधितों का परंपरागत तरीके से अंतिम संस्कार किया जा रहा है. ऐसे में पुणे शहर के श्मशान भूमि में भी परंपरागत तरीके से अंतिम संस्कार किया जाए.