पुणे की भांति पिंपरी चिंचवड़ में एक कोविड हॉस्पिटल में ऑक्सीजन के अभाव में अनहोनी होने से टल गई। पिंपरी विधानसभा चुनाव क्षेत्र से राष्ट्रवादी कांग्रेस के वरिष्ठ विधायक अण्णा बनसोडे की सतर्कता से देर रात न केवल ऑक्सीजन सिलेंडर की आपूर्ति हो सकी बल्कि हॉस्पिटल में एडमिट 60 से 70 कोरोना संक्रमित मरीजों की जान भी बच गई। यह वाकया आकुर्डी में पिंपरी चिंचवड़ मनपा द्वारा कोरोना संक्रमित मरीजों के लिए अधिग्रहित स्टार हॉस्पिटल का है। यहां पर बुधवार की देर रात अचानक से ऑक्सीजन का स्टॉक खत्म हो गया। विधायक अण्णा बनसोडे की सतर्कता और मनपा आयुक्त श्रावण हार्डिकर की तत्परता से ऑक्सीजन सिलेंडरों की किल्लत दूर की जा सकी।
रोजाना होती है 120 ऑक्सीजन सिलेंडर की आवश्यकता
इस बारे में स्टार हॉस्पिटल के निदेशक डॉ. अमित वाघ ने जानकारी देते हुए बताया कि, स्टार हॉस्पिटल कोविड मरीजों के लिए मनपा द्वारा अधिग्रहित किया गया है। यहां फिलहाल 95 संक्रमितों का इलाज जारी है। रोजाना कम से कम 110 से 120 ऑक्सीजन सिलेंडरों की जरूरत होती है। बुधवार की मध्यरात्रि हॉस्पिटल में ऑक्सीजन का स्टॉक अचानक से खत्म हो गया। इसके चलते काफी असुविधाओं का सामना करना पड़ा। रात के एक बज चुके थे और सिलेंडर मिलना जरूरी था, क्योंकि मरीजों की जान का सवाल था। ऑक्सीजन सिलेंडरों की आपूर्ति तत्काल होना जरूरी था अन्यथा मरीजों की जान के लिए खतरा बढ़ जाता।
मनपा आयुक्त ने भी दिखाई तत्परता
हमनें तुरंत मनपा आयुक्त श्रावण हार्डिकर से संपर्क किया मगर उनसे संपर्क नहीं हो सका। इसके बाद हमने विधायक अण्णा बनसोडे से संपर्क किया। मनपा आयुक्त से संपर्क न हो सकने से हम सीधे उनके घर गए और उन्हें पूरी हकीकत बताई। मनपा आयुक्त से मिलने के बाद मनपा के वाईसीएम हॉस्पिटल से ऑक्सीजन सिलेंडर मिल सकते हैं क्या? इसकी कोशिश की गई। आयुक्त ने तुरंत इसकी अनुमति दी इसके बाद तड़के चार बजे तक वाईसीएम हॉस्पिटल से स्टार हॉस्पिटल को ऑक्सीजन सिलेंडरों की आपूर्ति की जा सकी। तब तक विधायक अण्णा बनसोडे हमारे साथ ही बने रहे। इसके बाद ही हमने राहत महसूस की।
सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में सामने आए ड्रग्स एंगल में एनसीबी ने मंगलवार को रिया को गिरफ्तार किया था और बुधवार को उसे भायखला जेल में शिफ्ट कर दिया गया. रिया का पहला दिन काफी तनाव पूर्ण गुजरा. उसने जेल में मिलनेवाला दाल चावल खाया और जमीन पर सोई. बताया जाता है कि जिस बैरेक में रिया को रखा गया है वह बैरक शीना बोरा हत्याकांड में गिरफ्तार इंद्राणी मुखर्जी की बैरक के ठीक बगल में है।
जमानत याचिक पर सुनवाई आज
ड्रग्स मामले में गिरफ्तार रिया चक्रवर्ती और उनके भाई शोविक की जमानत अर्जी पर आज मुंबई के सेशन कोर्ट सुनवाई होगी। ड्रग्स मामला भी सुशांत सिंह राजपूत की मौत से ही जुड़ा है। 14 जून को सुशांत का शव बांद्रा स्थित फ्लैट में मिला था। शुरुआत में इस केस को नेपोटिज्म से जोड़ते हुए आत्महत्या बताया गया था, लेकिन बाद में केस में कई अलग एंगल भी सामने आए और जांच बिहार पुलिस से होते हुए सीबीआई के पास पहुंची। फिलहाल सुशांत केस में एनसीबी के साथ ही सीबीआई और ईडी भी जांच कर रही है।
जेल में ठीक से सो नहीं पाई रिया
सूत्रों की माने तो रिया को बुधवार पूरे दिन जनरल बैरक में रखा गया है, हालांकि देर शाम उन्हें बैरक नंबर एक में शिफ्ट कर दिया गया। पहला दिन होने के कारण रिया चक्रवर्ती ने सिर्फ जेल कर्मचारियों से बात की और पूरे रात अपने बैरक में ही रहीं। सूत्रों की माने तो एक्ट्रेस रात में कई बार उठीं और ठीक से सो नहीं सकी। इससे पहले बुधवार दोपहर तक जेल के डॉक्टर ने रिया का टेस्ट किया और उनका ब्लड प्रेशर, शुगर लेवल और पल्स चेक की। चेकअप में सब कुछ नार्मल आने के बाद एक्ट्रेस को आराम करने के लिए भेज दिया गया। बैरक में एक कंबल, तकिया और सफेद चद्दर के साथ डेंटल किट और हर दिन के जरूरी सामान उन्हें दिए गए। एक्ट्रेस ने जेल कर्मचारियों से कुछ किताब पढ़ने के लिए मांगी है। जेल में कोई बेड नहीं होता इसलिए एक्ट्रेस जमीन पर ही सोई। शाम 5 बजे उन्हें खाने के लिए चावल, दाल और दो रोटी के साथ कद्दू की सब्जी भी दी गई थी। जेल में इंद्राणी मुखर्जी की अच्छी पहचान बन चुकी है, कैदी मंजुला की मौत के बाद 2017 में इंद्राणी के नेतृत्व में जेल में प्रदर्शन हुआ था। इसलिए माना जा रहा है कि रिया के जेल में आने के बाद उन्होंने रिया से भी मिलने का प्रयास किया।
हालांकि अभी बिहार विधान सभा चुनाव के तारीखों की घोषणा होना बाकी है, लेकिन भाजपा ने अपनी तैयारियां शुरू कर दि है. इसी के तहत भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा 11 सितंबर को बिहार आ रहे हैं। वह दो दिन बिहार में रहेंगे और पार्टी पदाधिकारियों और नेताओं को आगामी विधानसभा चुनाव के लिए गुरु मंत्र देंगे। 12 सितंबर को नड्डा मुजफ्फरपुर शहर में पार्टी की एक बैठक में हिस्सा लेंगे। वह मुजफ्फरपुर और आसपास के 25 विधानसभा क्षेत्र के प्रभारियों, तीन जिलाध्यक्ष और उस क्षेत्र के पार्टी पदाधिकारियों, विधायकों और सांसदों के साथ बैठक करेंगे। यह बैठक चुनाव की तैयारियों से जुड़ी होगी, जिसमें वह पार्टी नेताओं को तैयारियों से जुड़े निर्देश देंगे और इसकी समीक्षा करेंगे।
– सहयोगी पार्टियों से भी करेंगे चर्चा
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुजफ्फरपुर से पहले पटना से सीधे दरभंगा जाएंगे। 12 सितंबर को दरभंगा में पूसा कृषि विश्वविद्यालय में मखाना किसानों के साथ मुलाकात करेंगे। इस मुलाकात के दौरान उनके साथ कृषि वैज्ञानिक भी होंगे और उनके साथ वह मखाना पर बातचीत करेंगे। नड्डा मखाना के क्षेत्र में जुड़ी संभावनाओं पर बात करेंगे।
– 12 को दरभंगा, मुजफ्फरपुर का दौरा कर दिल्ली लौटेंगे
12 सितंबर को दरभंगा और मुजफ्फरपुर दौरे के बाद जेपी नड्डा वापस दिल्ली लौट जाएंगे। जेपी नड्डा का यह दो दिवसीय बिहार दौरा कई मायनों में खास माना जा रहा है। यह कहा जा सकता है कि यह दौरा बीजेपी के लिए चुनाव प्रचार की विधिवत शुरुआत है। नड्डा सहयोगी पार्टियों के साथ सीटों के तालमेल को लेकर बात कर सकते हैं।
– 120 प्रचार रथ मैदान में उतारे जाएंगे
प्रचार रथ पर 72 इंच का टीवी स्क्रीन लगा है। इसके जरिए भाजपा के नेता लोगों को संबोधित करेंगे और जन-जन तक भाजपा का प्रचार अभियान पहुंचेगा। भाजपा के इस कार्यक्रम के तहत करीब 120 रथों को पूरे बिहार में रवाना किया जाना है। 12 सितंबर को इसकी शुरुआत होगी और कुछ रथों को जेपी नड्डा कार्यक्रम के दौरान रवाना करेंगे।
– चुनाव के दौरान राष्ट्रीय अध्यक्ष के 10 दौरे
बीजेपी इस पूरे चुनाव प्रचार में अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष के करीब 10 ऐसे दौरों को तय कर चुकी है। वह हर बार 25 विधानसभाओं के नेताओं के साथ अलग-अलग जगह पर बैठक करेंगे और इस तरह से बीजेपी सभी विधानसभा क्षेत्रों तक राष्ट्रीय अध्यक्ष जाएंगे। कोरोना वायरस का असर भी इन बैठकों पर दिखेगा। बैठकों में यह विशेष तौर से ध्यान रखा जाना है कि इनमें 50 से अधिक लोग शामिल न हो पाएं।
फ्रांस से खरीदे गए 5 आधुनिक लड़ाकू विमान राफेल अब से कुछ ही देर के बाद अम्बाला एयरफोर्स स्टेशन में वायुसेना में शामिल किए जाएंगे। इस दौरान सर्वधर्म यानी हिंदू, मुस्लिम, सिख और इसाई धर्म के अनुसार पूजा होगी। फिर एयर-शो होगा। यह पूरा कार्यक्रम यानी सेरेमनी 6 घंटे चलेगी। इस कार्यक्रम में रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के साथ फ्रांस की रक्षामंत्री फ्लोरेंस पार्ले भी शामिल होंगी।
समारोह को ऐतिहासिक बनाने के लिए वायुसेना ने तैयारी पूरी कर ली है। सुबह 10 बजे राजनाथ सिंह और फ्रांस के रक्षामंत्री अम्बाला एयरफोर्स स्टेशन में लैंड करेंगे। इसके बाद 10:30 बजे एयर शो शुरू होगा। हवा में एक के बाद एक कई विमान प्रदर्शन करेंगे। इसके बाद ध्रुव हेलीकॉप्टर की सारंग टीम करतब दिखाएगी। इससे पहले 2016 में भी सारंग टीम अम्बाला में एयर शो कर चुकी है। अम्बाला के लोगों को घरों की छतों से एयर शो के करतब दिखाई दिखाई देंगे।
राफेल के साथ अम्बाला में पहली बार स्वदेशी तेजस भी करतब दिखाएंगे। तेजस विमान में राफेल की तरह डेल्टा विंग हैं। इनके अलावा जगुआर और सुखोई-30 भी परफॉर्म करेंगे। राफेल फाइटर जेट की अम्बाला स्थित 17 गोल्डन एरो स्क्वॉड्रन में औपचारिक एंट्री इतिहास के पन्नों में दर्ज होगी। 17 साल बाद कोई रक्षा मंत्री अम्बाला एयरफोर्स स्टेशन में किसी बड़े समारोह में शामिल होंगे।
निर्वाचन आयोग में बिहार विधानसभा चुनाव के कार्यक्रम के ऐलान की उलटी गिनती शुरू हो गई है। निर्वाचन आयोग के उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक कुछ ही दिन बाद यानी 13 सितंबर के आस-पास होने की संभावनाएं है. वैसे भी बिहार विधानसभा का कार्यकाल 29 नवंबर तक है. राज्य में 243 सीटों के लिए मतदान होना है।
तीन चरणों में होगा चुनाव
आयोग के मुताबिक चुनाव के लिए मतदान संभवतः तीन चरणों में हों। दशहरे के बाद और दिवाली से पहले के 20 दिनों की अवधि में चुनावी प्रक्रिया पूरी कर ली जाए। ये भी मुमकिन है कि बाढ़ की सबसे अधिक आशंका वाले इलाकों में सबसे आखिरी चरण में मतदान हो।
तेलुगु टेलीविजन अभिनेत्री कोंडापल्ली श्रावणी ने मंगलवार को हैदराबाद में अपने घर पर कथित रूप से आत्महत्या कर ली है। पुलिस ने बुधवार को यह जानकारी दी है। 26 साल की श्रावणी मंगलवार को मधुरनगर स्थित अपने आवास पर फांसी पर लटकी पाई गईं। परिवार के सदस्यों ने कहा कि वह अपने बेडरूम में गई और दरवाजा बंद कर लिया। उन्हें लगा कि वह नहा रही हैं लेकिन जब वह काफी देर तक बाहर नहीं आईं तो उन्होंने दरवाजा तोड़ा और देखा कि वो लटकी हुई हैं। वे उन्हें अस्पताल ले गए जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। पुलिस ने शव को परीक्षण के लिए भेज दिया है और मामले की जांच शुरू कर दी है। परिवार ने आरोप लगाया है कि श्रावणी ने अपने पूर्व प्रेमी देवराज रेड्डी के उत्पीड़न से परेशान होकर यह कदम उठाया है।
पुलिस ने कहा है कि परिवार ने उसके खिलाफ कुछ दिन पहले मामला दर्ज कराया था और उन्होंने श्रावणी को उसके साथ घूमने को लेकर चेतावनी भी दी थी। एस।आर। नगर सर्ल के इंस्पेक्टर नरसिम्हा रेड्डी ने कहा कि प्रारंभिक जांच से पता चला है कि देवराज के साथ घूमने को लेकर मंगलवार की देर रात श्रावणी की अपनी मां और भाई के साथ बहस हुई थी। इसके बाद वह अपने कमरे में गई और खुद को फांसी लगा ली। पुलिस ने देवराज को गिरफ्तार करने के लिए आंध्र प्रदेश के काकीनाडा शहर में एक टीम भेजी है। सब इंस्पेक्टर ने कहा, चूंकि श्रावणी का परिवार उस पर आरोप लगा रहा है, इसलिए हम उसे गिरफ्तार करेंगे और पूछताछ करेंगे।पुलिस अधिकारी ने कहा कि देवराज को जून में श्रावणी द्वारा शिकायत करने के बाद गिरफ्तार किया गया था, इसमें कहा गया था कि वह श्रावणी से शादी करने के लिए उसे परेशान कर रहा था। परिवार के सदस्यों ने आरोप लगाया है कि देवराज के खिलाफ शिकायत करने के बाद भी पुलिस कार्रवाई करने में विफल रही है।
बता दें कि देवराज कुछ महीने पहले टिक-टॉक के माध्यम से अभिनेत्री के संपर्क में आए थे और फिर दोनों की दोस्ती प्यार में बदल गई। श्रावणी के परिवार ने कहा है कि देवराज ने उसे पैसे के लिए उसे परेशान करना शुरू कर दिया था। वह उसकी निजी तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट करने की धमकी दे रहा था। लिहाजा परिवार ने देवराज को 1 लाख रुपये गूगल पे के माध्यम से दिए। हालांकि कथित रूप से वह पैसे लेने के बाद भी उसे परेशान करता रहा, लिहाजा उन्होंने उसके खिलाफ एस।आर। नगर थाने में 22 जून को शिकायत दर्ज कराई। वहीं पुलिस ने दावा किया है कि शिकायत में वीडियो और तस्वीरों का कोई जिक्र नहीं था। बता दें कि श्रावणी ने मनासु ममता और मौनरागम जैसे लोकप्रिय धारावाहिकों में अभिनय किया था।
बृहन्मुंबई महानगर पालिका (बीएमसी) ने उनके मुंबई स्थित ऑफिस में अवैध निर्माण को लेकर 24 घंटे में दूसरा नोटिस भेजा। बीएमसी की एक टीम उनके ऑफिस पहुंची और अवैध निर्माण तोड़ने की कार्रवाई की। उधर, कंगना ने इस कार्रवाई पर दो ट्वीट किए। उन्होंने कहा कि यह एक इमारत सिर्फ मेरा ऑफिस ही नहीं, बल्कि राम मंदिर है, आज वहां बाबर आया है। कंगना ने कहा कि मेरे आने से पहले ही महाराष्ट्र सरकार और उनके गुंडे मेरे ऑफिस के बाहर पहुंच गए हैं और उसे गिरा रहे हैं।
कंगना के मुंबई पहुंचने पर बवाल की आशंका
एक्ट्रेस सड़क के रास्ते मंडी (हिमाचल प्रदेश) से चंडीगढ़ पहुंची थीं। एक्ट्रेस ने मुंबई की तुलना पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) से की थी, जिसके बाद विवाद खड़ा हो गया था। केंद्र ने उन्हें Y कैटेगरी की सुरक्षा दी है, इस दौरान 11 सुरक्षाकर्मी हमेशा उनके साथ रहेंगे। इस बीच, मुंबई करणी सेना और रामदास अठावले की पार्टी आरपीआई ने भी उन्हें प्रोटेक्शन देने का ऐलान किया है। कंगना के मुंबई पहुंचते ही शिवसेना समेत कई अन्य पार्टियों की ओर से विरोध तय माना जा रहा है।
अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत केस से जुड़े ड्रग्स मामले में एक्ट्रेस रिया चक्रवर्ती की पूरी रात नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) के लॉकअप में गुजरी। दरअसल, एनसीबी ने रिया को कल दोपहर गिरफ्तार किया था। इसके बाद देर शाम कोर्ट में पेशी हुई। निचली अदालत ने जमानत याचिका खारिज करते हुए 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। गिरफ्तारी के बाद रिया चक्रवर्ती को एनसीबी ऑफिस में ही रखा गया था। आज सुबह करीब सवा दस बजे उसे एनसीबी ऑफिस से भायखला जेल ले जाया गया, जहां वह ज्युडिशियल कस्टडी में रहेगी। इससे पहले भायखला जेल में रिया के रखने की सभी तैयारियां कर ली गई थी। भायखला जेल में रिया को वूमन सेल में रखा जाएगा। भायखला जेल में न्यायीक हिरासत में कैदी को रखने की सभी कागजी कार्यवाही को पूरा करने के बाद उसे वूमन सेल में भेज दिया जाएगा।
जेल रूल बुक के मुताबिक, शाम को जेल में कैदियों की गिनती के बाद नए कैदी को नहीं लिया जाता। इसलिए उन्हें मंगलवार रात को एनसीबी के लॉकअप में रखा गया। बुधवार सुबह करीब सवा दस बजे रिया को भायखला जेल में शिफ्ट किया गया। सूत्रों के मुताबिक, लॉकअप में रिया पूरी रात ठीक से सो नहीं पाईं। वह रात में कई बार उठीं और बैरक में टहलती हुई नजर आईं।
इस बीच, रिया और उसके भाई शोविक ने सेशन कोर्ट में जमानत के लिए फिर याचिका लगाई है। उनके वकील सतीश मानशिंदे ने इसकी पुष्टि की है। रिया पर ड्रग्स लेने, सुशांत को ड्रग्स देने सहित कई गंभीर आरोप लगे हैं। रिया का रोल ड्रग्स के ट्रांसपोर्टेशन और जमा करने वाले सिंडिकेट के सदस्य के तौर पर दिखाया गया है।
हालांकि, रिया ने अपने स्टेटमेंट में ये माना है कि वो ड्रग्स का सेवन करती थीं। एनसीबी की टीम ने उनसे तीन दिन पूछताछ की। उसके बाद उसे गिरफ्तार किया गया। ड्रग्स मामले में यह दसवीं गिरफ्तारी है। इससे पहले रिया के भाई शोविक, सुशांत के हाउस मैनेजर सैमुअल मिरांडा, कर्मचारी रहे दीपेश सावंत, ड्रग पैडलर अब्देल बासित परिहार, जैद विलात्रा और कैजिन इब्राहिम समेत 9 लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं।
अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत केस से जुड़े ड्रग्स मामले में एक्ट्रेस रिया चक्रवर्ती की पूरी रात नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) के लॉकअप में गुजरी। दरअसल, एनसीबी ने रिया को कल दोपहर गिरफ्तार किया था। इसके बाद देर शाम कोर्ट में पेशी हुई। निचली अदालत ने जमानत याचिका खारिज करते हुए 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। गिरफ्तारी के बाद रिया चक्रवर्ती को एनसीबी ऑफिस में ही रखा गया था। आज सुबह करीब सवा दस बजे उसे एनसीबी ऑफिस से भायखला जेल ले जाया गया, जहां वह ज्युडिशियल कस्टडी में रहेगी। इससे पहले भायखला जेल में रिया के रखने की सभी तैयारियां कर ली गई थी। एनसीबी ऑफिस से भायखला जेल में लाने के लिए एनसीबी ऑफिस के बाहर कड़ा पुलिस बंदोबस्त किया गया था, जिसमें महिला पुलिसकर्मियेां की बड़ी संख्या है. भायखला जेल में रिया को वूमन सेल में रखा जाएगा.
जेल रूल बुक के मुताबिक, शाम को जेल में कैदियों की गिनती के बाद नए कैदी को नहीं लिया जाता। इसलिए उन्हें मंगलवार रात को एनसीबी के लॉकअप में रखा गया। बुधवार सुबह करीब सवा दस बजे रिया को भायखला जेल में शिफ्ट किया गया। सूत्रों के मुताबिक, लॉकअप में रिया पूरी रात ठीक से सो नहीं पाईं। वह रात में कई बार उठीं और बैरक में टहलती हुई नजर आईं।
इस बीच, रिया और उसके भाई शोविक ने सेशन कोर्ट में जमानत के लिए फिर याचिका लगाई है। उनके वकील सतीश मानशिंदे ने इसकी पुष्टि की है। रिया पर ड्रग्स लेने, सुशांत को ड्रग्स देने सहित कई गंभीर आरोप लगे हैं। रिया का रोल ड्रग्स के ट्रांसपोर्टेशन और जमा करने वाले सिंडिकेट के सदस्य के तौर पर दिखाया गया है। हालांकि, रिया ने अपने स्टेटमेंट में ये माना है कि वो ड्रग्स का सेवन करती थीं।
एनसीबी की टीम ने उनसे तीन दिन पूछताछ की। उसके बाद उसे गिरफ्तार किया गया। ड्रग्स मामले में यह दसवीं गिरफ्तारी है। इससे पहले रिया के भाई शोविक, सुशांत के हाउस मैनेजर सैमुअल मिरांडा, कर्मचारी रहे दीपेश सावंत, ड्रग पैडलर अब्देल बासित परिहार, जैद विलात्रा और कैजिन इब्राहिम समेत 9 लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं।
संवैधानिक संस्थाएं औऱ लोकतंत्र 2014 से पहले कभी खतरे में क्यों नही थे ? अचानक ऐसा क्या हुआ है कि देश भर में एक वर्ग ऐसा वातावरण बनाने में जुटा है, मानों भारत में कोई तानाशाही राज आ गया है। दुहाई लोकतंत्र की दी जा रही है, लेकिन लोकतांत्रिक प्रक्रिया या संवैधानिक प्रावधानों पर खुद ही इस तबके को भरोसा नही है। असल में यह भारत के नए समावेशी लोकतंत्र को अस्वीकार करने का सामंती प्रलाप भर है।
देश की संसदीय राजनीति और संवैधानिक संस्थाओं को अपनी एकपक्षीय विचारसरणी से संचालित करने वाला कतिपय उदारवादी बौद्धिक जगत नए भारत की व्यवस्थाओं से बेदखल होता जा रहा है। यह बेदखली भी पूर्णतः लोकतांत्रिक प्रक्रिया के धरातल पर हो रही है।भारत के आत्मगौरव को कुचलकर अल्पसंख्यकवाद और तुष्टीकरण पर खड़ी की गई भारतीय शासन और राजनीति की व्यवस्थाओ के कमजोर होने से जिहादी बौद्धिक गिरोह अब उन्ही संस्थाओं को निशाने पर ले रहा है, जो कभी इनके एजेंडे को आगे बढ़ाने में सहायक थी।
वकील प्रशांत भूषण के ताजा अवमानना प्रकरण को बड़े व्यापक संदर्भ में समझने की आवश्यकता है। यह प्रकरण महज एक अवमानना भर का नहीं है, बल्कि वामपंथ एवं कांग्रेस विचारधारा का बिषैला औऱ भारत विरोधी चेहरा भी उजागर करता है। सुप्रीम कोर्ट से सजा सुनाएं जाने के बाद “स्वराज अभियान” के योगेंद्र यादव ने “कैम्पेन फ़ॉर ज्यूडिशियल अकाउंटबिलिटी एंड रिफॉर्म” शुरू करने का एलान किया। इस अभियान में अभिव्यक्ति की आजादी को बचाने के लिए देश भर से एक-एक रुपया एकत्रित करने का भी आह्वान है। योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण की राजनीतिक प्रतिबद्धता किसी से छिपी नही है। सवाल यह उठाया जा सकता है कि देश में करोड़ों मुकदमें बर्षों से लंबित है, लेकिन अकाउंटबिलिटी का सवाल इस अर्थ में पहले नही उठाया गया। भूषण एन्ड कम्पनी खुद देश की सर्वोच्च अदालत को अपने दबाब में लेती रही है।किसी भी मामले में जब इन्हें मनमाकिफ़ निर्णय की उम्मीद नही होती, तो सुनियोजित तरीके से बाहर आकर कोर्ट और जज के विरुद्ध चिल्लाने लगते हैं और जब फैक्ट के आधार पर निर्णय आ जाते है तब यही भूषण खुद को गांधी बनाने में जुट जाते है।
समस्या इस बार जस्टिस अरुण मिश्रा को लेकर इसलिए खड़ी की गई, क्योंकि वे भूषण के दबाब में नही आये।जस्टिस मिश्र की कोर्ट में भूषण के अधिकतर मामले लिस्टेड होने पर देश का सुप्रीम कोर्ट आखिर खराब हो जाता है, लेकिन तथ्य यह है कि प्रशांत भूषण जब गुजरात दंगों या अमित शाह से जुड़े मामले जस्टिस आफताब आलम के यहां लिस्टेड कराते रहे, तब सुप्रीम कोर्ट निष्पक्ष औऱ स्वतंत्र होता था! प्रशांत भूषण जिन संस्थाओं से सीधे और परोक्ष रूप से जुड़े है उनकी मानसिकता बीजेपी और आरएसएस ही नही भारत की संप्रभुता के भी विरुद्ध है। जाहिर है, अभिव्यक्ति की आजादी या न्यायिक जबाबदेही के उठाये गए सवाल देश हित से जुड़े न होकर एक घोषित एजेंडे का क्रियान्वयन भर है। इसलिए सवाल यह है कि क्या वाकई देश में संवैधानिक संस्थाएं औऱ लोकतंत्र संकट में है ? क्या प्रशांत भूषण, राजीव धवन या राहुल गांधी और उनके साथ समवेत एकेडेमिक्स ही सुप्रीम कोर्ट के रखवाले है?इन सवालों को हमें इतिहास और वर्तमान के बदले हुए वातावरण में भी देखना चाहिये।
तथ्य यह है कि 2014 के बाद यानी केंद्र में नरेन्द्र मोदी को जनता द्वारा सत्ता सौंपने के साथ ही बौद्धिक राजनीतिक जगत में इस जनादेश को ही खारिज करने के सतत प्रयास चल रहे है। देश में जनता पार्टी, सयुंक्त मोर्चा और यूपीए की सरकारें भी रही, लेकिन सवाल केवल मोदी सरकार के वोट परसेंट पर उठाया जाता है। तब भी, जब 2019 में जनता ने 2014 से बड़ा बहुमत मोदी को सौंपा है। असल में संसदीय राजनीति की पारदर्शी प्रक्रिया के जरिये भारत विरोधी तत्व जनता की अदालत से अलग थलग हो रहे है। जाति, सम्प्रदाय और क्षेत्रीयता के साथ अल्पसंख्यकवाद की चुनावी राजनीति लगातार हासिए पर आ पहुँची है, भारत के जिहादी बौद्धिक जगत (एकेडेमिक्स) को इस जमीनी स्थिति ने परेशान कर दिया है। यह वर्ग लंबे समय से भारतीय शासन और राजनीति का नियामक बना रहा है। प्रशांत भूषण घटनाक्रम इसी नियामकीय अस्तित्व के संकट की हताशा है। सुप्रीम कोर्ट भारत के लोकतंत्र का प्रधान पहरेदार है और इसे जनता की दृष्टि में विवादित करके मोदी सरकार के नीतिगत निर्णयों पर अराजकता पैदा करना ही भूषण एन्ड कम्पनी का असली मन्तव्य है।
वातावरण बनाया गया है कि मोदी सरकार ने कोर्ट, चुनाव आयोग, संसद, कार्यपालिका, विश्वविद्यालय, मीडिया को दबाब में ले लिया है। दावा किया जाता है कि लोग सरकार के भय से बोल नहीं पा रहे है।
सुप्रीम कोर्ट ने लॉक डाउन के दौरान मोदी सरकार के विरुद्ध याचिकाएं लेकर आये प्रशांत भूषण को चेतावनी जारी कर कहा था कि आप पीआईएल लेकर आये है या पब्लिसिटी याचिका। कोर्ट ने यहां तक कहा कि यह नहीं चल सकता है कि हम आपके मन मुताबिक निर्णय दें तो ठीक, नही दें तो कोर्ट पक्षपाती है। सच्चाई यह है कि राममंदिर, राफेल, सुशांत सिंह, तीन तलाक, पीएम केयर फ़ंड, सीएए, अनुच्छेद 370 पर सुप्रीम अदालत के निर्णय मोदी विरोधियों के मन मुताबिक नहीं हुए। सामाजिक कार्यकर्ता के वेष में सक्रिय लोगों का बड़ा तबका इस स्थिति से परेशान है। एक धारणा गढ़ी जा रही है कि “जज” डरे हुए है, भयादोहित है। लोकतंत्र खतरे में है और यह देश मे पहली बार हो रहा है।
हकीकत यह है कि 2014 के बाद से देश में अभिव्यक्ति की आजादी और संवैधानिक संस्थाओं की अक्षुण्णता प्रखरता से बढ़ी है। अतीत में भारत की न्यायिक आजादी को खंगालने की कोशिशें करें तो पता चलता है, कांग्रेस औऱ प्रशांत भूषण जैसे गिरोहों ने कोर्ट्स को सदैव सत्ता की पटरानी बनाने के प्रयास किया है। जिन जजों ने अतीत में कांग्रेस सरकारों की बादशाहत को चुनौती दी, उन्हें अपमानित कर ठिकाने लगा दिया गया। जबकि सुप्रीम कोर्ट में पदस्थ रहते हुए प्रेस कांफ्रेंस करने वाले जस्टिस रंजन गोगोई मोदी दौर में ही चीफ जस्टिस बने। इंदिरा गांधी ने तो खुलेआम बहुमत के बल पर प्रतिबद्ध न्यायपालिका और ब्यूरोक्रेसी को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता घोषित किया था।
केशवानंद भारती मामला भारत में लोकतंत्र की हत्या कर इंदिरागांधी द्वारा न्यायाधीश को भयादोहित, नियंत्रित और कब्जाने की नजीर है। इसकी चर्चा एकेडेमिक्स कभी नही करना चाहते है। 24 अप्रैल 1973 की तारीख को इस केस में निर्णय हुआ। 68 दिन जिरह हुई। इंदिरा सरकार ने एड़ी चोटी का जोर लगाया, लेकिन वह सुप्रीम कोर्ट में शिकस्त खा गई। भारत के न्यायिक इतिहास में पहली बार 13 जजों की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। 7-6 के बहुमत से निर्णय हुआ कि संसद को संविधान संशोधन का अधिकार तो है लेकिन “आधारभूत सरंचना” बेसिक स्ट्रक्चर से छेड़छाड़ नहीं की जा सकती है। संवैधानिक सर्वोच्चता, विधि का शासन, कोर्ट की अक्षुण्य आजादी, संसदीय शासन, निष्पक्ष संसदीय चुनाव, गणतन्त्रीय ढांचा, सम्प्रभुता आधारभूत ढांचे में परिभाषित किये गए। इनमें किसी भी प्रकार के संशोधन निषिद्ध कर दिये गए।
13 जजों की पीठ में 7 जज फैसले के पक्ष में थे, इनमें मुख्य न्यायाधीश एस एम सीकरी, के एस हेगड़े, एके मुखरेजा, जे एम शेलाट, एन एन ग्रोवर, पी जगनमोहन रेड्डी और एच आर खन्ना। 6 जज सरकार के साथ थे जस्टिस ए एन राय, डीजी पालेकर, के के मैथ्यू, एच एम बेग, एस एन द्विवेदी और वाय चन्द्रचूड़।
इस निर्णय से नाराज इंदिरा गांधी के दफ्तर से 25 अप्रेल 1973 को जस्टिस एन एन राय के घर फोन की घण्टी बजती है। क्या उन्हें नए सीजेआई का पद स्वीकार है? जबाब देने के लिए मोहलत मिली सिर्फ दो घण्टे की। 26 अप्रेल 1973 को जस्टिस ए एन राय को भारत का मुख्य न्यायाधीश बनाया जाता है तीन सीनियर जज जस्टिस शेलट, ग्रोवर और हेगड़े को दरकिनार कर दिया गया। ये तीनों जज उन 7 जजों में थे जिन्होंने सरकार को असिमित संविधान संशोधन देने से असहमति व्यक्त की थी। क्या ऐसी परिस्थितियां आज मोदी सरकार ने निर्मित की है?
1975 में इंदिरा गांधी ने 39 वा औऱ 41वा संवैधानिक संशोधन कर कानून बनाया था कि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, स्पीकर के चुनाव को कोर्ट में किसी भी आधार पर न चैलेंज किया जा सकता न कभी उन पर कोई मुकदमा दर्ज होगा। क्या यह संविधान को खूंटे पर टांगने जैसा नही था। हालाँकि केशवानंद केस के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने इन दोनों संशोधन को खारिज कर दिया था। 1975 में एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला केस आपातकाल में मौलिक अधिकारों की बहाली को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पहुँचा था। पांच जजों की पीठ ने 4-1के बहुमत से सरकार के पक्ष में निर्णय दिया। अकेले जस्टिस एच आर खन्ना ने सरकार से असहमत होते हुए निर्णय लिखा। जस्टिस खन्ना सबसे सीनियर थे, लेकिन इस निर्णय के चलते इंदिरा गांधी के निशाने पर आ गए। उन्हें सुपरसीड करते हुए एम एच बेग को भारत का मुख्य न्यायाधीश बना दिया गया।
एच एम बेग केशवानंद केस में भी सरकार के साथ खड़े थे। इसलिए उन्हें भी जस्टिस राय की तरह स्वामी भक्ति का इनाम मिला। वहीं जस्टिस खन्ना उस केस में भी सरकार के विरूद्ध थे। इसलिए उन्हें सजा दी गई। क्या इन हरकतों से तब संविधान की सर्वोच्चता खण्डित नही हुई थी ? बेग 1978 तक सीजेआई रहे फिर 1981 से 1988 तक अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष और वहां से हटने के बाद कांग्रेस के मुखपत्र दैनिक हेराल्ड के संचालक बने।
बहरूल इस्लाम के किस्से तो सबको पता ही है कि उन्हें जब चाहा सांसद, जब चाहा हाईकोर्ट जज, जब चाहा सुप्रीम कोर्ट जज बना दिया गया। 2010 से 2014 के मध्य जस्टिस अरुण मिश्रा वरिष्ठतम हाईकोर्ट जज होने के बाबजूद सुप्रीम कोर्ट में नामित नही किये गए तब किसी ने इस मुद्दे को नही उठाया, लेकिन उत्तराखंड हाईकोर्ट में पदस्थ जूनियर जज के एम जोसेफ को सुप्रीम कोर्ट में एलिवेट करने पर मोदी सरकार ने आपत्ति ली, तब पूरे एकेडेमिक्स भूषण जैसे लोगों के साथ न्यायपालिका की आजादी का रुदाली रुदन बजाने लगे। ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि जोसेफ अल्पसंख्यकवाद के प्रतीक थे। ऐसे ही तमाम पापों से वाकिफ होने के लिए हमें जस्टिस जगनमोहन रेड्डी की किताब “वी हैव रिपब्लिक” का अध्ययन करना चाहिये, जिसमें बताया गया है कि इंदिरा के कानून मंत्री रहे एच आर गोखले और इस्पात मंत्री कुमार मंगलम कैसे जजों को उस दौर में धमकाते थे।
कैसे अभिषेक मनु सिंघवी के शयन कक्ष से हाईकोर्ट जज निकलते है, यह जप्त स्टिंग में आज भी रहस्य ही है। पूर्व सीजेआई रंगनाथ मिश्रा बकायदा कांग्रेस के टिकट से राज्यसभा में विराजे। जबकि रंजन गोगोई तो नामित कोटे से सदस्य बने हैं। श्री मिश्रा के भतीजे तमाम आरोपों के बाद सीजेआई तक बनने में सफल रहे।
जस्टिस आफताब आलम और गुजरात दंगों की झूठी कहानियां गढ़ने वाली तीस्ता सीतलवाड़ की युगलबंदी न्यायिक इतिहास का शर्मनाक स्कैण्डल है। हिमाचल के पूर्व सीएम वीरभद्र सिंह की बेटी जस्टिस अभिलाषा सिंह ने गुजरात हाईकोर्ट और आफताब आलम द्वारा सुप्रीम कोर्ट में गुजरात दंगों पर दिए निर्णय प्रतिबद्ध न्यायपालिका का बदनुमा उदाहरण है।
आतंकी अफजल की फांसी टालने के लिए भूषण एन्ड कम्पनी के आग्रह पर आधी रात को खुलता सुप्रीम कोर्ट सेक्युलर था, गुजरात दंगों, शोहरबुद्दीन, इशरत जहां के मामलों में भी कोर्ट अच्छे थे, क्योंकि निर्णय मोदी, अमित शाह के विरुद्ध और लिबरल गैंग के एजेंडे के अनुरूप थे।लेकिन मनमाकिफ़ निर्णय न होने पर कोर्ट पक्षपाती औऱ डरे हुए हो गए। यह आम भारतीय भी अब समझ गया है। बहुमत के बल पर तानाशाही का एक भी उदाहरण मोदी सरकार के साथ नही जुड़ा है, जबकि इंदिरा औऱ राजीव गांधी के कार्यकाल सामाजिक न्याय से जुड़े बीसियों न्यायिक निर्णयों को पलटने के रहे है। कमोबेश यही वातावरण चुनाव आयोग और ईवीएम को लेकर बनाया जाता रहा है। हाल ही में दिग्विजयसिंह ने फिर कहा है कि 2024 में देश मे आखिरी चुनाव होंगे और यह भी ईवीएम के जरिये जीते जायेंगे, इसके बाद भारत में कभी चुनाव नही होंगे। इस तरह की दलीलें केवल संसदीय आरोप प्रत्यारोप तक सीमित नही है, बल्कि यह लोकतंत्र पर भी सीधा आघात है।
मीडिया का वह दौर याद किया जाना चाहिये, जब गुजरात दंगों के बाद मोदी को भारतीय मीडिया ने एक खलनायक की तरह विश्व भर में स्थापित कर दिया था।आज भी भारत में मोदी और उनकी नीतियों के आलोचक स्वतन्त्रता के साथ अपनी बात कहते है। टेलीग्राफ, हिन्दू जैसे अखबार रोजाना मोदी की खिलाफत में खड़े रहते है। वर्चुअल स्पेस पर द वायर, प्रिंट, जनचौक, सत्याग्रह, क्विंट, क्लिक, कारंवा, तहलका, स्क्रॉल, जनज्वार, न्यूज लाउंड्री जैसे तमाम पोर्टल बेधड़क अपना मोदी विरोधी एजेंडा चला रहे है। आपातकाल का दंश देने वालों को इसके बाबजूद अभिव्यक्ति की आजादी खतरे में नजर आती है तो इसके निहितार्थ हमें समझने होंगे।शाहीन बाग से लेकर जेएनयू, एमएमयू, जामिया में देश को तोड़ने तक की तकरीरें खुलेआम दी जाती हैं, फिर भी भारत मे एक वर्ग को डर लगता है। इस गिरोह में दस वर्ष उपराष्ट्रपति रहे हामिद अंसारी जैसे लोग भी शामिल है। सच तो यह है कि संवैधानिक संस्थाओं औऱ लोकतंत्र को जेबी बनाने के उपक्रम मोदी दौर से पहले बड़ी ही ठसक के साथ होतें रहे है। 1975 का आपातकाल हो या 356 के जरिये संघीय ढांचे को खत्म करना। कांग्रेस और वामपंथ ने देश की जनभावनाओं का कभी ख्याल नही रखा। आज अभिव्यक्ति की चरम आजादी के माहौल में लिबरल्स ने अपने सुगठित एवं विस्तृत सूचना एवं प्रचार तन्त्र से ऐसा माहौल बनाने की कोशिशें की है जो मिथ्या, मनगढ़ंत औऱ फर्जी है।
सुखद पक्ष यह भी है कि देश की अधिसंख्य जनता आज भूषण सरीखे उदारवादियों के वास्तविक एजेंडे को समझ चुकी है।